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बुधवार, 6 नवंबर 2024

क्या अमेरिकन समाज स्त्रीविरोधी है? : (डॉ.) कविता वाचक्नवी

क्या अमेरिकन समाज स्त्रीविरोधी है? :  (डॉ.) कविता वाचक्नवी

अमेरिका के चुनाव परिणाम की मेरी भविष्यवाणी पुनः सत्य हुई। लोग मुझे पूछते और बहुधा हँसते भी हैं कि मैं फलित ज्योतिष को तो मानती नहीं, फिर किस आधार पर भविष्यवाणियाँ किया करती हूँ और वे कैसे सत्य भी हो जाती हैं। तो ऐसे लोगों के लिए मेरा उत्तर है : समाज के मनोभावों, उस के सुख दुःख, उस की सोच तथा उस के मनोविज्ञान की मेरी कुछ–कुछ समझ के सहारे ही यह सम्भव होता है और शेष ईश्वर की कृपा से।

 अमेरिकन चुनावों पर 2016 से अब तक तीसरी बार जो भविष्यवाणी मैंने की उस की पृष्ठभूमि बताती हूँ। जो बात मैं कहने जा रही हूँ, मेरे उस आकलन / निष्कर्ष को पढ़ लोगों को आश्चर्य होगा और असहमति भी; किन्तु आधुनिक सामाजिक मनोविज्ञान का एक सत्य जानना हो तो इसे ठीक से समझना ही होगा।

 मुझे 90 के दशक से अब तक यूरोप, यूके और अमेरिका के समाज में रहने का अवसर मिला है, या कहें कि अनुभव प्राप्त हैं, अतः इस अत्याधुनिक समाज में रहते हुए इन की सम्वेदना, सोच तथा समझ के अलिखित सत्य का बहुत ठीक आभास भी मुझे प्राप्त है। उसी आधार पर यह तथ्य बताना समीचीन और आवश्यक भी है कि क्यों और कौन स्त्रियाँ / पुरुष / समाज अपना क्या भविष्य बनायेंगे।

जिन लोगों को लगता है कि अमेरिकन जनता महिला राष्ट्रपति को नहीं स्वीकार सकती इसलिए हिलेरी या कमला हारीं ; उन की समझ गलत है। वास्तविकता यह है कि (जैसा कि मैंने लगभग 5–6 वर्ष पूर्व लिखा भी था) यॉरोप तथा अमेरिका आदि देशों में फ़ेमिनिज़्म खोटा सिक्का हो चुका है, जो महिलाएँ, समूह अथवा वर्ग/दल/संगठन या व्यक्ति ऐसी मानसिकता के हों या इस के पक्षधर हों, वे पिछड़े और यहाँ तक कि वे कम आईक्यू के / या थोड़े मूर्ख माने जाते हैं। बहुधा इसलिए; क्यों कि फेमिनिज्म का सत्य फेमिनिस्टों ने उघाड़ कर दिखा दिया है। इन देशों में फेमिनिज्म को समूचे सामाजिक अध: पतन का मूल समझा जाता है अब, और निजी स्वार्थों की इच्छापूर्ति का हिंसक माध्यम भी।

यह तथ्य भले ही कहीं लिखित रूप में या उद्धृत रूप में उपलब्ध नहीं है, किन्तु है यही सत्य। समाज फेमिनिज्म को एक ऐसी प्रवृत्ति मानता है जो राक्षसत्व के तुल्य है और जिस ने समाज, परिवार तथा सम्बन्धों को नष्ट किया है। अतः समाज उन स्त्रियों को तथा उन समूहों को स्वीकार नहीं करता जो फेमिनिज्म की राह पर हों और पुरुषों को अपनी उस सोच के कारण नकारती हों। 

 इस के विपरीत निजी जीवन में जो जितनी स्त्रियोचित हैं, उन की समाज स्वीकार्यता उतनी अधिक है। आप इस के उदाहरण यहाँ के समाज और घरों में तो स्वाभाविक है दूर से नहीं देख सकते, किन्तु अमेरिका तथा यॉरॉप की राजनीति में तो कहीं से भी देख सकते हैं। 

कई अन्य तथ्यों के अतिरिक्त यह बड़ा तथ्य इन परिणामों की पृष्ठभूमि में बहुत बड़ा कारक था। कुछ और कारक भी थे, उन का उल्लेख कभी फिर समयानुसार करुँगी 

यह सत्य बताना इसलिए आवश्यक प्रतीत हुआ ताकि भारतीय समाज में जो स्त्रियाँ फेमिनिज्म का झण्डा उठा स्वयं को आधुनिक समझती हैं, वे अपना आकलन कर सकें और उन्हें अपनी वास्तविकता तथा भविष्य समझ आ सके। 
दूसरा कारण इसे लिखने का यह है कि जो लोग मेरी की भविष्यवाणियों पर प्रश्न करते हैं, उन्हें मेरी सामाजिक तथा मानवीय चित्त की समझ इस के मूल में है, यह पता लग सके।
– ✍️डॉ. कविता वाचक्नवी©

शुक्रवार, 30 जून 2023

पाककला की चुनौती और टमाटर : कविता वाचक्नवी

टमाटर बारहमासी फसल नहीं है। 🍅🍅🍅

जब हम भारत में रहते थे तो लहसुन–प्याज न खाने के चलते हमारे यहाँ टमाटर के अधिक प्रयोग की अनिवार्यता थी। जो लोग प्याज खा लेते हैं, उन्हें वैसे भी टमाटर की अनिवार्यता कुछेक भोज्य पदार्थों के लिए ही होती है। मैंने क्योंकि स्वयं अधिकांश फसलें अपने हाथ से बोई, उगाई काटी हैं अतः एक–एक फल, एक –एक फली, एक–एक कन्द, व एक–एक शाक की प्रत्येक इकाई का महत्व तथा प्रतीक्षा से परिचित हूँ। उन के हमारी इच्छानुसार उग कर तैयार न होने का अर्थ उगाने वाले का दोष नहीं, अपितु प्रकृति व पर्यावरण का चक्र, नियम तथा सन्तुलन है। 

ऐसे में जिन दिनों टमाटर की फसल नहीं होती थी, या मण्डई में नहीं मिलते थे तो गृहणी के रूप में जो–जो उपाय करती थी, उन्हें पाठकों की सहायता के लिए साझा कर रही हूँ। 

(प्याज–लहसुन न खाने–पकाने के चलते मेरी गृहस्थी में प्रतिदिन  बड़े आकार के सात–आठ टमाटर शाक–दाल हेतु बारहों माह चाहिए होते थे)। ऐसे में विकल्प दो–तीन थे। गृहणियों को बिना हाय–तौबा मचाए शान्ति से अभाव को भी भाव से पूर लेने का गुण अनिवार्यतः बनाए रखना चाहिए। यह हमारे ही पारिवारिक सम्मान का कारक बनता है। तो आइए, मेरे अनुभव से आप को कुछ लाभ मिले तो इन्हें अपना सकते हैं –

कोकम
दक्षिण में गहरे लाल रंग का एक बहुत खट्टा फल आता है, जिसे कोकम कहते हैं। उस का खट्टा–सा शरबत भी बाजार में मिलता है।  इस कोकम की सूखी लाल–भूरी फाँकें बिकती हैं। जिस किसी में डाल दें, खटाई और रंग देती हैं। मैं सदा उन्हें घर में रखती थी। जिस किसी दिन टमाटर घर में समाप्त हुए, उस दिन दाल को कोकम तथा अदरक डाल कर उबाला व फिर बघारा करती थी। कोकम आज भी मेरी गृहस्थी में सदा रहता है। यहाँ तो उस की दीर्घावधि तक सुरक्षित रहने वाली गीली फाँकें उपलब्ध हो जाती हैं।

साबुत लाल मिर्च
सूखी साबुत लाल मिर्च भी टमाटर के अभाव में काम आती है। आप को अधिक मिर्च नहीं रुचती तो आप प्रत्येक मिर्च को तोड़, उस के बीज व दाने बाहर निकाल अलग प्रयोग हेतु सहेज लें तथा छिलके को पानी से धो, कुछेक छोटे–छोटे टुकड़े कर लें, जैसे एक लम्बी मिर्च हो तो चार–छह टुकड़े हो सकते हैं। उन्हें अलग से उबाल कर, पानी से निकाल दाल या शाक में ऊपर से मिला दें तो टमाटर के लाल रंग का आभास देंगी। उबालने से बचा हुआ पानी भी स्वादानुसार मिलाया जा सकता है। ऐसे में टमाटर की खटाई की कमी पूरी करने हेतु अमचूर प्रयोग करें।

इमली का अवलेह
बाजार में इमली का बिना गुठली–डण्ठल का तैयार अवलेह उपलब्ध होता है। मेरी गृहस्थी में वह सदा रहता आया है। उसे भी रंगत तथा खटाई हेतु, विशेषतः साम्भर हेतु प्रयोग करती आई हूँ।

इन उपायों से सम्भवतः आप भी अपनी गृहस्थी और चौके को अभाव रहित तथा अनवरत चला सकते हैं।
–✍🏻 कविता वाचक्नवी


मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

ऐतिहासिक ध्वंस और पुनर्निर्माण : (डॉ.) कविता वाचक्नवी

 2-3 सौ वर्ष पूर्व आई औद्यौगिक क्रान्ति के साथ पश्चिम में साईंस और रिलीजन दो हुए, और रिलीजन के फंदे से कुछ लोग बाहर निकले तथा कुछ आधुनिक होने लगे अन्यथा रिलीजन वालों का उस से पूर्व के लगभग 17-अठारह सौ वर्ष कितना भयंकर कुत्सित एवं क्रूर रूप था, इस का अनुमान आज के आतंकी को देख कर भी आप नहीं लगा सकते। एकदम जंगली, नृशंस और हत्यारा समाज था।

केवल स्त्रियों के प्रति सभी प्रकार के आत्यन्तिक अमानुषिक व्यवहार की ही परत खोलें तो उस समाज की पारिवारिक व पंथानुगत संरचना का कलुषित रूप देखा–सोचा न जा सकेगा। साईंस इसीलिए रिलीजन की शत्रु बनी। उन आत्यन्तिक अमानुषिक कदाचारों व नृशंसताओं के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के चलते तुलनात्मक सन्दर्भों में उस क्रूर काल के घटनाक्रम को पितृसत्तात्मकता के रूप में परिभाषित किया गया। वह अपने समाज पर उन के अपनों का दोषारोपण था।

दुर्भाग्यवश भारत के कुपढ़ों ने, जिन्हें इस पश्चिमी समाज की तत्कालीन संरचना, इतिहास व वास्तविकता का रञ्चमात्र भी अनुमान नहीं, पता होना तो दूर; उन्होंने यहाँ के वर्तमान से सारे आरोप अपने समाज पर आरोपित कर लिए, यहाँ पश्चिम के आयातित विमर्शों, चिन्तन, मुद्दों, बहसों को ज्यों-का-त्यों अपना बना-कह-समझ-लिख कर । इस से बड़ा, क्रूर विद्रूप कोई अन्य नहीं हो सकता था।

जिन मूर्खों को यहाँ के घटनाक्रम, इतिहास, संरचना, समाज का आभास तक नहीं था, वे अपने अन्धे दीदों के मारे अपना अभिशाप समूची भारतीय संस्कृति के मत्थे मढ़ झूठे गवेषक बन गए। और कई भारतीय पीढ़ियाँ अभिशप्त रही हैं इस तथाकथित गवेषणा को ढो अपनी पीठ रक्तिम करते। पितृसत्तात्मक क्रूरता पश्चिम के समाज का इतिहास व अभिशाप थी।

यदि भारतीय इतिहास को ठीक से पढ़ा-जाना होता, और पश्चिमी समाज के इतिहास की वास्तविकता का किञ्चित भी आभास होता तब तो कोई समझ पाता कि रजकण की सूर्य किरण से क्या तुलना ? किन्तु भारतीय समाज के साथ अपने अज्ञान और धूर्ततावश किए इस दुराचार को करने वालों ने जो जघन्य अपराध किया है, उस की गम्भीरता का 1% भी अनुमान आज संस्कृति- संस्कृति चिल्लाने वाले तथाकथित पढ़े-लिखों तक को नहीं है।

हतभागी हैं ये सब पीढ़ियाँ और हतभागी है हमारा क्रीत समाज। ऐसा भयंकर पाप किया गया है। और ऐसा करने वाले अभी चुके नहीं हैं, वे निरन्तर अजस्र उन्हीं स्खलनों में स्वयं भी रत हैं और अन्यों को स्खलित करने की कुचेष्टाओं में भी निमग्न।

इधर भारतीय समाज है कि उसे इस लूट व कदाचार का कोई अनुमान ही नहीं, वह जरा-सी राजनैतिक जीत को ही अपनी परम संतुष्टि का माध्यम व ध्येय मान लेता है, या जरा-सी छुटपुट गति बढ़ने को अपनी परम विजय। ऐसे लोगों का यह जानना अत्यावश्यक है कि आप देश व संस्कृति के साथ खड़े हैं तो यह युद्ध तो अभी पूरा शेष है। युद्ध क्षेत्र में अभी तो आप पूरे डटे तक नहीं हैं। युद्ध अभी शेष हैं, विजय तो उस के बहुत बाद होगी और विजय के बहुत पश्चात् फिर ध्वंस का अनुमान लगाया जाना होगा; तब कहीं जा कर पुनर्निर्माण के कार्यों की नींव रखी जा सकेगी।

इतना धैर्य है न ? नहीं है तो सीखिए अन्यथा विश्व में अन्य कोई शक्ति नहीं है जो उस वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर को खोज या बचा सके। वह धरोहर विलुप्ति की सीमा पर है और विश्व इतिहास आप को व हमें कभी क्षमा नहीं करेगा, किञ्चित नहीं, कदापि नहीं।
© - कविता वाचक्नवी

सोमवार, 4 सितंबर 2017

अमेरिका : डूब-उबरने के दिन

अमेरिका में 'हार्वी' : डूब-उबरने के दिन    - कविता वाचक्नवी



यों तो चक्रवात और उसका ताण्डव समाप्त हो चुका है किन्तु किन्तु अभी भी हजारों परिवार बेघर हैं, उनके घर पानी में डूबे हैं और विपदा से उनकी लड़ाई आगामी 6 माह कम-से-कम और चलनी है। हमारे संस्थान के अध्यापक-अध्यापिकाएँ मिलकर अनेक प्रकार के सेवाकार्यों, उन्हें अस्थाई सुरक्षित आवास उपलब्ध करवाना, दैनिक आवश्यकता का सामान पहुँचाना, शाकाहारी भोजन स्वयम् घरों में बना कर प्रतिदिन उन्हें पहुँचाना, उनके पानी में डूबे घरों की मरम्मत की व्यवस्था, उनके घरों के पुनर्निर्माण में सामग्री, फर्नीचर, बिस्तर आदि क्रय कर देना आदि प्रकार की भागदौड़ में लगे हैं। दानदाताओं से $32000 एकत्र भी किए हैं, हमारा लक्ष्य $50000 का है।

जिन्होंने परिजन-घर और बहुत कुछ खोया है, वह तो नहीं लौटाया जा सकता, किन्तु इस विपदा में पूरे देश का एकजुट सहयोग अनुकरणीय है। ध्यातव्य है कि प्रयोग की हुई वस्तुएँ यहाँ दान में नहीं दी जातीं, जिसे जो देना है वह क्रय कर देना है। रेस्टोरेंट्स, संस्थान, स्टोर्ज़, कम्पनियाँ, व्यापारिक घराने, आम जनता, विद्यालय, विश्वविद्यालय, युवा संगठन, छात्र संगठन, अध्यापक संगठन, कर्मचारी संगठन, आवास संगठन आदि लाखों-लाख संस्थाएँ और संगठन, हाथ का काम करने वाले कामगार और आम जन तक अपनी निःशुल्क सेवाएँ और सहयोग जनता और सरकार को दे रहे हैं। 


कहीं कोई चीख-पुकार, शिकायतों का कोई शब्द, दोषारोपण, तेरा-मेरा, पहले आप, छीना-झपटी, या सरकार भरोसे की स्थित अथवा दृश्य नहीं है। सब शान्ति व सद्भाव से सहयोग एवं सेवा में एकजुट हैं, किसी को सेवा के बहाने अपना या अपनी संस्था का नाम चमकाने में रुचि नहीं। डेढ़-दो लाख से भी बहुत अधिक संख्या में स्वयंसेवक जुटे हुए हैं। कई स्वयंसेवक तो ऐसे हैं, जो स्वयं अपना बहुत कुछ इस आपदा में गँवा चुकने के बाद आँसू छिपाए दूसरों की आँसू पोंछ रहे हैं, सरकारी सहायता भी आई है।

देश ऐसे बनते हैं, जनता से बनते हैं, जनता देश को जैसा चाहे बना सकती है, उसे देश में जो व जैसा परिवर्तन चाहिए वैसा व उस दिशा में स्वयं काम करने लगे..... बस उसी दिन से पुनर्निर्माण एवम् परिवर्तन प्रारम्भ जो जाता है। आरोप, शिकायतें, अपेक्षाएँ, उत्पात, छद्म और स्वार्थ भौगोलिक सीमाओं को #देश होने से रोकते हैं।


बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

स्त्रीविमर्श स्त्री को शोषण का अधिकार देने/दिलवाने का अभियान नहीं है : कविता वाचक्नवी

स्त्रीविमर्श स्त्री को शोषण का अधिकार देने/दिलवाने का अभियान नहीं है : कविता वाचक्नवी


कुछ मित्र/पाठकों ने सन्देश भेज पूछा है कि मैं तो सदा से स्त्री व स्त्रीविमर्श सम्बन्धी लेखन व कार्यों के प्रति प्रतिबद्ध/ पैरोकार रही हूँ, फिर १२ फरवरी के अपने लेख में "दूसरों के जीवन में काँटे बोने और टीवी देखने के अतिरिक्त कुछ नहीं करतीं" जैसी स्त्री-विरुद्ध टिप्पणी कैसे लिख गयी।  


Image result for women empowerment paintingsतो प्रिय पाठको / मित्रो ! आपको स्त्री-विमर्श का आशय, अभिप्राय और उद्देश्य इत्यादि समझना बहुत अनिवार्य है। मेरा स्त्री-विमर्श स्त्री को शोषण का अधिकार देने/दिलवाने का अभियान नहीं है; और सिद्धान्ततः भी स्त्रीविमर्श इस अवधारणा पर नहीं टिका। स्त्री-विमर्श और स्त्री-सशक्तीकरण मूलतः शोषित स्त्री को शोषण से मुक्त करवा उसे सबल बनाने व लैंगिक असमानता को दूर कर समानता का अधिकार दिलवाने का अभियान हैं ताकि वे भी समाज की उन्नति में बराबर की सहभागी हो सकें; न कि उसे समाज के किसी अन्य वर्ग के शोषण का अधिकार दिलवाने का। जो लोग स्त्री-विमर्श का उपयोग इसके विपरीत अथवा इतर अर्थों में करते हैं वे मूलतः अपनी स्वार्थसिद्धि और अज्ञानता का ही परिचय देते हैं। यदि स्त्री का सशक्तीकरण दूसरों के शोषण हेतु है तो फिर उनमें और समाज के दूसरों स्त्री-शोषकों में अन्तर ही क्या रह गया। ऐसे में स्त्री-विमर्श के हम जैसे पैरोकारों का दायित्व समाज को ऐसी शोषक स्त्री के शोषण से मुक्ति दिलवाने का भी हो जाता है। 


जिस प्रकार कोई न्यायालय किसी अपराधी को इसलिए क्षमा या दया नहीं दे सकता कि उसके अपराधी बनने के मूल में अमुक-अमुक व्यक्ति और अमुक-अमुक घटना का हाथ है तो परिस्थितिवश वह अपराधी बन गया, अतः उसे क्षमा कर दिया जाए ! न ! कदापि नहीं ! ऐसे में तो उन्हें दोहरा दण्ड मिलना चाहिए कि एक तो स्वयं अपराध किया और साथ ही दूसरों को अपराधी बनाने वाला घटनाक्रम और परिस्थितियाँ रचीं। इसी प्रकार भले ही स्त्री हो या पुरुष, वह भले ही किन परिस्थितियों में शोषण का अपराध करे, उसे उसके अपराध के लिए दोषी ठहराया जाना होगा। किसी को इसलिए क्षमा नहीं किया जा सकता कि वह स्त्री है या पुरुष। अपराध, दण्ड और क्षमा में किसी भी व्यक्ति को रिज़र्वेशन नहीं मिलना चाहिए। अन्यथा समाज का ढाँचा चरमरा जाएगा और असन्तुलन, असमानता व अत्याचार बढ़ेगा। इसलिए स्त्री-सशक्तीकरण स्त्रियों को दूसरों के प्रति दुर्व्यवहार, छल, कपट, प्रपञ्च, शोषण और अत्याचार करने का लाईसेन्स देने / दिलवाने का अभियान नहीं है। जो इसका उपयोग इन अर्थों में करते हैं, वे अपराधी हैं, भर्त्सना-योग्य हैं और स्त्री-मुक्ति के प्रत्येक अभियान को उनकी निन्दा व विरोध करना चाहिए। 


जो पुरुष स्त्री-विमर्श की आड़ में अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं, उनको उठा बाहर फेंकना चाहिए और जो स्त्रियाँ घरों में या बाहर अपने स्त्री होने का लाभ लेते हुए समाज के किसी भी वर्ग के विरुद्ध किसी भी प्रकार की धूर्तता, चालाकी, वितण्डा या लाभ उठाने की मनोवृत्ति दिखाती हैं या कार्य करती हैं, तो उनकी भी खबर ली जानी चाहिए और उनका किसी भी प्रकार समर्थन / सहयोग नहीं किया जाना चाहिए। स्त्री-सशक्तीकरण का अर्थ पुरुष का शोषण करना भी नहीं होता। यह शोषण का हथियार नहीं, अपितु आपकी आत्मरक्षा का उपाय और सामर्थ्य प्रदान करने का अभियान है, ताकि कोई आपकी अस्मिता पर आघात न करे ; किन्तु आप आत्मरक्षा के अतिरिक्त संहार और शोषण में इस हथियार को प्रयोग करने लगेंगी तो आपको भी उसी प्रकार धिक्कार मिलेगा जैसा आपका शोषण करने पर पुरुष को मिलता है ! 
- Kavita Vachaknavee





शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

महिलाओं के दोष

महिलाओं के दोष : कविता वाचक्नवी 


तीन वर्ष पहले (आज ही के दिन जब यह लेख लिखा गया था) एक तथाकथित लेखिका (म.ग.) के लेख में लिखे गए शब्द थे - "मेरे द्रष्टिकोण से "सर्वोतम माँ " वो है जो प्रारम्भ से अपने बेटे को स्त्री जाति का सम्मान करना सिखाती है। जो पुरुष स्त्री जाति को हीन भावना से देखते हैं, उन के विकास में बाधक बनते हैं, उन के प्रति दुर्व्यवहार करते हैं ,हाथ उठाते हैं, बलात्कार करते हैं उन की हत्या करते हैं ,ये सब एक असफल माँ की "अमानुष" संतान होते हैं ". ……


पहले भी अनेक महिलाओं के इस प्रकार के वक्तव्य पढ़ती आई हूँ, कई महिलाएँ तो मेरे यहाँ आकर इस तरह के अपने विचार लेकर मुझसे दूर तक झगड़ती रही हैं, उन्हीं दिनों एक महिला (अ.भा.) लंबा युद्ध छेड़े रही महिलाओं के विरोध में मेरे यहाँ  फेसबुक पर।


Image result for blaming women वस्तुतः महिलाओं को दोष देने की यह प्रवृत्ति पुरुषवादी सोच का परिणाम है। अतः इसीलिए मेरा विरोध पुरुषों से नहीं अपितु पुरुषवादी सोच से है, चाहे वह स्त्रियों में हो या पुरुषों में। अधिकाँश स्त्रियों की कंडीशनिंग ही ऐसी होती है।

उक्त महिला की माओं को कटघरे में खड़ी करने वाली प्रारम्भ में लिखी बात पर, मेरी दो-तीन आपत्तियाँ हैं, वे संक्षेप में इस प्रकार समझी जा सकती हैं।

- पहली बात उनका वह स्टेटस उसी भावना से प्रेरित लगता है जैसे 60-100 साल पहले 'स्त्रियाँ सन्नारी कैसे बनें', 'पत्नी पथ प्रदर्शक' आदि पुस्तकें तमाम लोगों ने लिखीं, जो ये समझते थे कि स्त्रियों को सुधारना चाहिए, हमें स्त्रियों को सुधारना है, हमें स्त्रियों को सही पथ पर चलाना है, स्त्रियाँ मूर्ख, अशिक्षित और असभ्य होती हैं, उन्हें शिक्षित करने और घर गृहस्थी, पति की सेवा, बच्चे पालन, सन्नारी व सु-नारी बनने के उपदेशों की आवश्यकता है और घर चलाने, पति की सेवा करने, बच्चों को पालने, सास ससुर की सेवा करने, पति का आज्ञा पालन करने, पति को परमेश्वर समझने, सिलाई बुनाई करने में अपना समय लगाने, इधर-उधर की बातों में न फँसने की शिक्षा पुरुषों द्वारा दी जानी चाहिए। इसलिए लोगों ने स्त्री को उपदेश देने वाली पुस्तकें लिखीं ताकि स्त्रियाँ सुधरी रह सकें।

- दूसरी बात, बच्चे कभी उपदेशों से नहीं सीखते, न सिखाने से सीखते हैं। बच्चे केवल और केवल आचरण से सीखते हैं। माँ या पिता भले ही उन्हें लाख उपदेश देते रहें, वे इन उपदेशों और आदेशों से कुछ नहीं सीख सकते, क्योंकि बच्चे केवल आचरण से सीखते हैं। उनके घर-परिवार में या फिर समाज में क्या व्यवहार होता है, वे इस से सीखते हैं।

माँ उन्हें लाखों सदुपदेश भली ही दे भी ले, तब भी यदि घर के लोगों या पिता का व्यवहार उन संस्कारों के अनुकूल या मेल न खाता हुआ है, तो बच्चे उन उपदेशों से कभी नहीं सीखेंगे अपितु वही सीखेंगे जो वे अपने घर में देखते हैं।

साथ ही ध्यान रखने की बात यह है कि कितने प्रतिशत भारतीय परिवारों में स्त्री को पारिवारिक निर्णय या संतान के निर्णय लेने का अधिकार होता है ? स्त्रियाँ अपने जीवन के निर्णय लेने तक में स्वतंत्र नहीं होतीं, भला क्या तो वे संतान के जीवन के निर्णय लेंगी ! जो कुछ वे सिखाना-बनाना चाहती होंगी अपने बच्चों को, पूरा परिवार मिलकर एक झटके में उस पर पानी फेर देता है। उदाहरण स्वरूप, स्त्री सिखाए कि शराब पीना गलत है, न पियो, किन्तु यदि पिता ही रोज पीता है और पीटता व झगड़ा करता है तो क्या स्त्री का बस चलता है? संतान वही सीखेगी जो वह देखती है। सारे संस्कार धरे रह जाते हैं। इसलिए ऐसी बातें वे स्त्रियाँ कर सकती हैं जो अपने घरों में बैठी सौभाग्य से अपने अच्छे मिले पति के कारण सारी दुनिया की स्त्रियों को वैसा ही समझती हैं और संसार के सारे दुष्कर्मी पुरुषों की बुराइयों का दोष उनकी माओं के मत्थे मढ़कर उन्हें ही नाकारा और अपराधिनी घोषित करती हैं।


संतान के दुष्कर्मी या बुरे आदि होने का आरोप या तो बराबर सब (समाज, परिवार, पिता व अंत में माँ) पर है, अन्यथा अकेले माँ पर तो कदापि नहीं है, जब तक कि पिता सहित पूरा परिवार माँ का सहयोगी न हो। इसलिए सर्वोत्तम माँ की अपेक्षा सर्वोत्तम पिता की बात लिखनी चाहिए। सर्वोत्तम माँ की बात लिखना नीच संतान या नीच, अमानुष व दुष्ट संतान के अपराधी या अमानुष होने का आरोप माँ पर लगाने जैसा है।


शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

अमेरिका में उग्र विरोधप्रदर्शन क्यों

अमेरिका में उग्र विरोधप्रदर्शन क्यों : कविता वाचक्नवी


#अमेरिका के #युवा बच्चे और युवा पीढ़ी राष्ट्रपति ट्रम्प #President #Trump के चुनाव के बाद और #Europe में #Brexit के बाद, दुःख और क्षोभ में सड़कों पर और सब प्रकार के विरोध में जुटी है। यह इसलिए नहीं कि इनकी कोई राजनैतिक विचारधारा है या वे किसी दल के पक्षधर और विरोधी हैं, या इसलिए भी नहीं कि ये हिलेरी या जर्मन नीतियों के समर्थक हैं; अपितु इसलिए क्योंकि ये सरल हृदय, निष्कपट और निष्पाप हैं, इन्हें चालाकी, छल, प्रपञ्च, दुराव, कपट और झूठ आदि का अनुभव नहीं, ये किसी पर भी भरोसा कर लेते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि इन्हें लिबरल्ज़, लेफ्टिस्ट्स, सेक्युलर्ज़, नस्लीय, जाति-वर्गऔर संख्या आदि को देश से बड़े मानने वालों की सच्चाई का कोई अनुभव नहीं, इन्हें उनकी सच्चाई और असली रंग नहीं पता, इन्हें हाथी के अलग-अलग दाँतों वाली बात का पता ही नहीं, इन्हें नहीं पता कि समता, दया, प्रेम, उदारता, ममत्व, सहानुभूति, सह-अस्तित्व, साम्य, सामाजिक न्याय, वर्ग-हीनता, शोषण-मुक्ति जैसे हजारों शब्दों का सहारा केवल चुनाव जीतने और इन्हीं को संकट में डालने के लिए किया जाता है और इन्हें यह भी नहीं पता कि इसके क्या दूरगामी परिणाम हो सकते हैं, कि कैसे लेने और देने की भाषा अलग होती है और कैसे चालाक लोग दो चेहरे वाले होते हैं, कि कैसे इनकी ही सहायता ले इनके विरूद्ध षड्यंत्र रचा जाता है, कि कैसे 'फेसवैल्यू' पर नहीं जाना चाहिए, इन्हें नहीं पता कि इन सब के पीछे कौन-सी और किन की धूर्त चाले काम कर रही हैं । ये इतने सरल हैं कि झट से पिघल जाते हैं, दुष्परिणामों का इन्हें कोई अनुमान नहीं, इन्हें झट से बहकाया जा सकता है, ये किसी पर भी भरोसा कर लेते हैं, इनके निष्कलुष हृदय मानव-मात्र को सरल और सच्चा समझते हैं और इसीलिए इन्हें 'टार्गेट' किया जाता है, लुभावनी और द्रवित कर देने वाली बातों से इन्हें बरगलाया, भड़काया और भावुक किया जाता है और ये पिघल जाते हैं, प्रत्येक पर भरोसा कर लेते हैं। इसीलिए ये आज उन षड्यंत्रकारी शक्तियों के समर्थन में दिखाई देते हैं। यह वैसा ही है जैसे छोटे बच्चों को कम आयु में कभी-कभी अपने माता-पिता अपने शत्रु लगते हैं जब वे बच्चों के दूरगामी हितों के कारण कुछ कड़े और कड़वे निर्णय लेते हैं।


इसलिए, संसारभर के तथाकथित विचारको, साम्यवादियो, वामियो, अल्पसंख्यक तुष्टि-कारको, सेक्युलरो और राष्ट्र-भञ्जको ! हमारे सीधे सरल बच्चों के बहकने को अपनी जीत नहीं, अपितु उनकी सरलता और सिधाई समझिए। आज नहीं तो कल वे आपकी धूर्तता, षड्यन्त्र और चतुराई समझ जाएँगे। ये भारत के पले-बढ़े उन बच्चों जैसे नहीं हैं जो माँ के गर्भ से ही तेरा-मेरा और स्वार्थ या दूसरे के सर पर पैर रख कर आगे बढ़ना सीख कर आए हों ! पुरानी पीढ़ी ने अपने ढंग से नई पीढ़ी को आपके चंगुल में फँसने से बचा लिया है। 


मंगलवार, 6 सितंबर 2016

गगन गिल और अनिल जनविजय विवाद : कीचड़उछाल का खेल

गगन गिल और अनिल जनविजय विवाद  : कीचड़उछाल का खेल     - क. वा.


इधर कुछ दिनों से दो लोगों का एक व्यक्तिगत विवाद हिन्दी साहित्य से जुड़े लोगों की चर्चा के केंद्र में है और उसकी आग लगातार फ़ैल रही है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर #कीचड़ उछालने के खेल में रस ले-ले कर या बदले की भावना से तत्पर हो नित नए प्रहार कर रहे हैं और इस तरह वस्तुतः अपने आप को ही एक्सपोज़ कर रहे हैं और अपना स्तर गिराते-दिखाते जा रहे हैं। 


जो अनिल #जनविजय ने किया, वह गलत था और पहल उन्होंने ही की, जिसकी प्रतिक्रिया में #गगनगिल ने जो किया वह भी गलत ही था। एक व्यक्ति किसी की इज्जत उतारे तो वह गलत होता ही है, किन्तु बदले में हम उसकी इज्जत उतारते समय यह भूल जाएँ कि हमारी प्रतिक्रिया हमारा स्तर भी बताती है, यह तो कोई बात न हुई। 


दो लोगों के निजी संबंधों के चलते साहित्य से जुड़ा प्रत्येक व्यक्ति कटघरे में आ गया है,इसकी परवाह दोनों पक्षों में से किसी को नहीं रही। इक-दूजे के मान-सम्मान की धज्जियाँ उड़ाते समय अपने मान-सम्मान की धज्जियाँ और उड़ रही हैं, यह जब उनकी चिंता का विषय नहीं तो साधारण पाठक और दूसरे लोग क्यों और कब तक चिंतित हों ! 


दो लोग कीचड़ से खेल रहे हैं तो लथपथ होना स्वाभाविक है। जो निकट जाएगा, उस पर भी कीचड़ के कुछ न कुछ छींटे गिरेंगे ही। ऐसे में दोनों पक्षों के आत्मीय अपने पर कीचड़ गिरने का खतरा उठाते हुए भी उन्हें बचाने या साथ देने आगे बढ़ते हैं और कुछ-न-कुछ कीचड़ इस सहानुभूति के चलते वहन करते हैं। किन्तु बाकी बचे हुओं को उस कीचड़ में जाने की आवश्यकता क्यों है ? जो जितना कीचड़ से दूर रहकर बच सके उतना अच्छा है। 
यह कोई बड़ी सामाजिक नैतिकता और सामजिक मूल्यों या समाज-कल्याण की बात तो है नहीं कि हर किसी को लोक-कल्याण के लिए कीचड़ की परवाह न करते हुए भी उसमें कूदना-ही-कूदना है। 


इसलिए आवश्यक है कि किसी भी पक्ष की निंदा करने की अपेक्षा दोनों को शांत करने की और दूर हटाने की चेष्टा की जाए और उन्हें यह सन्मति और सलाह दी जाए कि इस कीचड़-उछाल में आपकी अपनी भी हानि ही हानि है। दूसरे पर कीचड़ उछाल कर आप दूध से धुले हुए निष्कलंक नहीं रह सकते। जितनी जल्दी जिसे समझ आ जाए और जो जितनी जल्दी इस से बचेगा उतना उसी का कल्याण है। 


दूसरे की गरिमा भंग करते समय व्यक्ति अपनी ही गरिमा से च्युत हो रहा होता है। हम तो इससे दूर रहने में ही सबका भला समझते हैं। जितने लोग अधिक जुड़ेंगे वे अपने-अपने पक्ष की हानि ही अधिक करेंगे, लाभ नहीं। सभी का दूर रहना और चुप रहना ही साहित्य और समाज के हित में है अन्यथा इस विकराल कीचड़-उछाल को और-और हवा-पानी मिल रहा है। 
यह कैसा प्रेम है, भई ?
- कविता वाचक्नवी 

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

जूते वर्जित क्यों हैं

जूते वर्जित क्यों हैं :  क. वा.



दक्षिण-भारत में रहने वाले जानते हैं कि वहाँ लोग अपने व दूसरों के घरों के भीतर भी जूते नहीं ले कर जाते हैं। यदि पहनने ही हों तो घर के जूते अलग होते हैं जिन्हें भीतर ही पहना जाता है। इसके पीछे कारण यह है कि बाहर पहने जाने वाले जूतों में मल, मूत्र, थूक और इस बहाने जाने किस किस बीमारी के बैक्टीरिया घर व भवन के भीतर प्रवेश कर जाते हैं और अंदर / भीतर पनपने लगते हैं। खुले वातावरण में धूप आदि रहती है तो कुछ कीटाणु नष्ट भी होते हैं और खुले में अंकुश रखा भी नहीं जा सकता, सिवाय लोगों को यह समझाने के कि जगह जगह थूको / मूतो आदि मत / कूड़ा कबाड़ा न फेंको और न सड़ने दो। किन्तु घरों के भीतर छाया व बंद होने के कारण ऐसे कीटाणु दिन दूनी गति से पनपते हैं और बीमारियाँ फैलाते हैं। ऐसे में घरों की साफ सफाई दिन-भर / बार-बार / हर-बार करते रहना गृहिणी के लिए संभव ही नहीं होता। अतः सभी सामाजिक सदस्य अपने उत्तरदायित्व को समझ कर बाहर की गंदगी के संपर्क में आए जूते बाहर ही छोड़ देते हैं, बहुधा परिवारों में तो शौचालय के जूते भी अलग होते हैं। इसके पीछे बड़ा वैज्ञानिक रहस्य है कोई कठमुल्लापन नहीं। जिन स्थानों को हम शुद्ध देखना चाहते हैं, वहाँ ऐसा करते हैं। जापान में आज भी ऐसा ही होता है।  



मन की बात, तो मन कोई पदार्थ नहीं है जो कक्ष अथवा भवन में कीटाणु ले आएगा। वह तो यदि व्याधि वाले कीटाणुओं / विषाणुओं जैसे दोष से भरा है तो उसकी शुद्धि के तरीके अलग हैं, वह भले बाहर हो या भवन के भीतर बराबर बीमार करेगा। दूसरों को बीमार करने से पहले खुद अपने मालिक को ही। उसे शोध न सकने वाले को दूसरों को शारीरिक रूप से बीमार करने की अनुमति दे दी जाए यह उचित तो नहीं। न उस पर अंकुश लगाना संभव है। परंतु जितना अंकुश संभव है, उतना करना कोई अपराध नहीं।


शायद कुछ ने वह ज़माना देखा होगा जब ऑफिस के कंप्यूटर हॉल में जूते उतार कर जाना पड़ता था, क्योंकि उस समय के सिस्टम धूल आदि में तुरंत ठप्प पड़ जाते थे। आज यद्यपि कंप्यूटर सिस्टम काफी हद्द तक रफ इस्तेमाल करने योग्य हो गए हैं किन्तु अभी भी सेंसेटिव उत्पाद यथा ऑडियो स्टूडिओ, रोगियों के लिए बने विशेष यंत्रादि कक्ष व कई बार रोगी का विशेष (इंटेसिव केयर ) कक्ष आदि इस नियम का अनुपालन करते हैं। आजकल विकसित पाश्चात्य देशों में डिस्पोज़ेबल 'शू-कवर' भी होते हैं। मेरे अपने ही घर में प्रवेशद्वार पर रखे रहते हैं, हैंडीमैन, बिजलीवाला या कामगार आदि जिन्हें सुरक्षा कारणों से जूते पहने हुए ही रहना होता है, वे जब घर के भीतर आते हैं तो अपने जूतों पर उन्हें पहन लेते हैं और फिर शू-कवर को फेंक दिया जाता है। पुरातन समय में दरवाजे पर हल्दी की रंगोली और गोबर से लीपना प्राकृतिक कीटाणुनाशक विधि ही थी। हम परम्परा की वैज्ञानिकता को भूल कर पोंगापंथी मात्र बन गए, जिसका परिणाम यह निकला कि जो कुछ पारम्परिक है,वह सब त्याज्य है और उसे गाली दी जानी चाहिए का अधिकार तथाकथित आधुनिकों को दे दिया। #KavitaVachaknavee
(ये विचार वर्ष २०१२ में किसी प्रसंग में व्यक्त किए थे)

शुक्रवार, 24 जून 2016

ब्रिटेन का भविष्य अब संसद (सांसत) में !

ब्रिटेन का भविष्य अब संसद (सांसत) में : कविता वाचक्नवी



‪#‎ब्रिटेन‬ की अर्थव्यवस्था, समाज और राजनीति में भारी उथल-पुथल मचा हुआ है। जनमत में योरोपीय महासंघ से अलग होने को बहुमत जो मिला है। 


इस वस्तुस्थिति के दो पक्ष हैं। एक तो यह कि वस्तुतः इस जनमत से आज की तिथि में ब्रिटेन महासंघ से न अलग हुआ है , न अलग होने जा रहा है। पहली बात तो यह कि जनमत के पश्चात् अब यह निर्णय देश की संसद में लिया जाना शेष है (यद्यपि संभावना यही है कि सांसद भी अपने अपने क्षेत्रों की जनता के विरोध में नहीं जाएँगे), फिर दूसरी बात यह कि यदि वे भी अलग होने पर मुहर लगा दें तो आधिकारिक रूप से महासंघ से अलग होने में 2 वर्ष का समय लगेगा, प्रक्रिया पूरी होने में।

दूसरा पक्ष यह कि मुद्रा ने डुबकी लगाई है जिससे राष्ट्र का सकल मुद्रा भण्डार निस्संदेह कमतर हुआ है, बृहद व्यापारिक प्रतिष्ठानों ( विशेषतः जो विदेशी मूल वालों द्वारा संचालित हैं) के विदेशी मूल के कर्मचारियों में अनिश्चय है। इस मध्य मात्र गत 2 घण्टे में ब्रिटेन ने 350 बिलियन पाउण्ड के अंतरराष्ट्रीय निवेश खो दिए हैं,  यह राशि योरोपीय महासंघ की चालीस वर्ष  की सदस्यता राशि के बराबर है।  पर ये सब छोटी बातें हैं। 

इन सबके मध्य सबसे भयंकर स्थिति यह है कि देश टूटने की कगार पर आ गया है, विशेषतः स्कॉटलैंड और आयरलैंड राज्य (जिन्होंने महासंघ के साथ रहने के पक्ष में मत दिया) वे अब अब देश से अलग होकर स्वतन्त्र देश के रूप में अपने भविष्य पर पुनर्विचार करने लगे हैं और आगामी 2 वर्ष में यह कभी भी घट सकता है। उत्तरी आयरलैण्ड के लोगों ने तो आज ही से अपनी नागरिकता बदलने की कवायद भी प्रारम्भ कर दी है।

इन सब स्थितियों को देखते हुए ब्रिटिश सांसदों (विशेषतः जो योरोपीय महासंघ से अलग होने का समर्थन करते हैं) पर संसद में अपना मत देते समय यह उत्तरदायित्व (बल्कि दबाव) होगा कि वे महासंघ से अलग होने की पैरवी करते समय देश के भी टुकड़े करने की पैरवी करेंगे।

संसद का निर्णय ही इस देश का इस देश के भौगौलिक रूप में भविष्य को भी तय करने वाला होगा। अन्यथा महासंघ से अलग होना यानि इस देश का दो या तीन भागों में विभक्त होना सिद्ध हो सकता है।

ध्यातव्य है कि यह सारा खेल अति-उदारवादी विचारधारा  के गर्भ से जन्मा और उसी की प्रचण्ड प्रतिक्रिया है। इसका सीधा प्रभाव अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव पर भी पड़ेगा।
 भारत इस से कुछ संकेत ग्रहण कर सके तो हितकर होगा।

  ‪#‎KavitaVachaknavee‬ #‎Brexit‬ ‪#‎UK‬

गुरुवार, 19 मई 2016

चुनाव-परिणामों के बाद कुछ बातें भाजपा से

चुनाव-परिणामों  के बाद कुछ बातें भाजपा से : कविता वाचक्नवी 


#भाजपा #BJP यद्यपि असम में जीत गयी है, यह अच्छी बात है, यह केवल @PMO India #Narendra Modi जी के चलते सम्भव हुआ है। भाजपा नेताओं को इस से खुशी मनाने की आवश्यकता नहीं। 


राष्ट्रीय स्तर पर अभी खतरे बहुत हैं और उन खतरों के सामने भाजपा ने चुनौती प्रस्तुत नहीं की। केरल और बंगाल में उसे जो व जैसा करना चाहिए था, वह वैसा नहीं किया। राष्ट्रीय ऐक्य व सुरक्षा की दृष्टि से यह लापरवाही घातक है। कई घातक संकेत इसमें छिपे हैं। जिन कार्यकर्त्ताओं ने स्वयं को अधिक महत्त्व न मिलने के बाद शिकायतों के अम्बार लगा दिए, उनका नकारात्मक योगदान भी इसमें कम नहीं, भले ही वे लोग दल या #मोदी जी के प्रति अपनी निष्ठा के चिट्ठे दिखाते रहें या कसमें खाते रहें। आप यदि सच में निस्स्वार्थ स्वयंसेवक हैं तो बदले में आपको किसी भी प्रकार की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। आपका प्रतिदान केवल राष्ट्र की सुरक्षा सुनिश्चित होना है; जब तक वह नहीं होती तब तक आपको बिना किसी अपेक्षा के अथक काम करना है और उसके बाद भी करना है। 


ऐसा नहीं है कि भाजपा में गलत या स्वार्थी लोग / नेता नहीं हैं; वे भरपूर हैं। पर उनके चलते आप राष्ट्र को तिलाञ्जलि नहीं दे सकते, न उनके भरोसे देश को छोड़ सकते। मेरे जैसे लाखों लोग भाजपा के पक्षधर इसलिए हैं , क्योंकि हम राष्ट्र के साथ हैं। मैं तो भाजपा की सदस्य या मतदाता भी नहीं हूँ। फिर भी हम लोग भाजपा के साथ हैं तो इसलिए कि हमें #मोदी जी की दूरदर्शिता, देशभक्ति, ईमानदारी और कर्मठता पर अथाह विश्वास है। हमारी वरीयता भारत और भारतीय हैं (केवल वे भारतीय जो भारत को राष्ट्र के रूप में पूजनीय मानते हैं)। हम मोदी जी के साथ उनकी इस निष्ठा और उन पर अथाह विश्वास के चलते हैं ; भाजपा के प्रति अंध आस्था के चलते नहीं। 


इसलिए यदि भाजपा के कार्यकर्त्ता और स्वयंसेवक लड़खड़ाते या अपेक्षा करते या तज्जन्य शिकायतें करते हैं तो वे मूलतः भाजपा को कमज़ोर करते हैं। दूसरी ओर उन्हें समझना चाहिए कि दो चार नेताओं को छोड़ कर भाजपा के किसी नेता को जनता ने नहीं चुना अपितु जनता ने मोदी प्रशासन को चुना है। हमें किसी नेता से कोई बड़ी आशा भी नहीं, वे भी मोदी जी को कमजोर करने वाले कारकों में सम्मिलित हैं। अतः उन नेताओं के भरोसे देश को नहीं छोड़ा जा सकता। केरल और बंगाल की विफलता उसी का फल है। यह विफलता भाजपा की विफलता नहीं अपितु राष्ट्र की सुरक्षा में विफलता है ; कार्यकर्त्ताओं की विफलता है, उनके जीवनव्यवहार और सेवाभाव की कमी की द्योतक है। 


इस विफलता में छिपे घातक संकेतों को पकड़ने की #दूरदर्शिता लाइए और फूँक-फूँक कर कदम उठाइए। मेरे लिए इन दो राज्यों के परिणाम विशेषतः चिन्तादायक और सतर्क करने वाले हैं। ध्यान रखिए कि राष्ट्र अभी सुरक्षित नहीं है। इस असुरक्षा की जिम्मेदारी हम सब की है। स्थानीय भाषाओं में काम करने वाले निष्ठावान कार्यकर्त्ताओं की आवश्यकता है, सोशल मीडिया पर उन भाषाओं के कार्यकर्त्ताओं का सहयोग करने की आवश्यकता है, अंग्रेज़ी में भी विचार को विस्तार देने और सबसे बढ़कर निरपेक्ष भाव से स्वयंसेवक होने की, सेवा को अपना जीवनदर्शन बनाने की, राष्ट को प्रथम रखने की, न कि स्वयं को या कुछ और को। 


चुनाव-क्षेत्र को ही अपना कर्मस्थल न समझिए, समूचा भारतीय व वैश्विक मानव-मन आपका कर्मक्षेत्र होना चाहिए। #KavitaVachaknavee

शुक्रवार, 6 मई 2016

मेरे चरणचिह्न काजल-सिक्त

मेरे चरणचिह्न काजल-सिक्त : कविता वाचक्नवी


मैं ही राष्ट्र हूँ, मैं ही भारत,
मैं ही लोकतन्त्र
मैं ही मैं काँग्रेस हूँ
और केवल एकमात्र मैं ही मैं समूचा राज-वंश भी।

मेरे ख़तरे में पड़ते ही राष्ट्र खतरे में
मेरे खतरे में ही आते ही लोकतन्त्र चिरनिद्रा में
मुझ पर ख़तरा आते ही काँग्रेस पर आक्रमण
मेरे रँगे हाथ पकड़े जाने की आशंका ही राज-वंश का अस्तित्व मिटाने की साजिश;

मेरा विस्तार अपरिमित है
मेरे रूप और महिमा अपार
देश को धू धू जलाने की युक्तियाँ अपरम्पार
वंश और परिवारियों समेत सबके
भूमिसमाधि ले चुके रहस्यों वाले महाप्रस्थान के बावजूद
मैं कालजयी हूँ रक्तजायों सहित,

मेरे डैने सर्वग्रासी हैं
मेरी छाया देश की जड़ों को गला देने वाली
वंश की देहरी पर मेरे चरणचिह्न काजल-सिक्त


मेरे जिह्वा-गह्वर के अतल में, हे 'नर-पुंगव' ! ब्रह्माण्ड घूमता है
घूम जाएगा तुम्हारा मस्तिष्क भी
घुमाने के खेल युगाब्द से मेरा ही एकाधिकार हैं

By #KavitaVachaknavee

(यह कविता नहीं है)

गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

वैदिक नववर्ष मंगलमय व शुभकारी हो : कविता वाचक्नवी



सृष्टिसम्वत्सर (युगादि पर्व), नव विक्रमीसंवत्सर तथा आर्यसमाज स्थापना-दिवस की अनेकानेक शुभकामनाएँ !

हमारी सृष्टि की आयु एक अरब, छियानवें करोड़, आठ लाख, तिरपन हजार, एक सौ सोलह वर्ष व्यतीत हो चुकी है और आज एक अरब, छियानवे करोड़, आठ लाख, तिरपन हजार, एक सौ सत्तरहवाँ वर्ष प्रारम्भ हुआ है। दक्षिण भारत में सृष्टि सम्वत के दिन ही विक्रमी सम्वत मनाया जाता है, किन्तु भारत के कुछ भागों में विक्रमी सम्वत अलग दिन मनाया जाता है, यथा, गुजरात में दीपावली के अगले दिन नया विक्रमी सम्वत (नव वर्ष) मनाने का चलन है। 

वस्तुतः नव वर्ष विक्रमी सम्वत का सम्बद्ध राजा विक्रमादित्य की विजयों से सम्बंधित है, अतः विक्रमी सम्वत कुछ भागों में अलग-अलग दिनों को प्रारम्भ होता है; और दूसरी बात, उत्तर भारत तथा दक्षिण भारत में माह का अन्त भिन्न भिंन्न होता है, उत्तरभारत में पूर्णिमा पर माह समाप्त होता है और दक्षिण भारत में अमावस्या को माह समाप्त होता है, इन सब कारणों बिहार में होली के अगले दिन नव वर्ष समझा जाता है और दक्षिण में आज के दिन। 

यह तो रही विक्रमी सम्वत की बात। परन्तु सृष्टि सम्वत सदा से, एक साथ, आज ही के दिन मनाया जाता है। 

आज ही के दिन अर्थात् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (तदनुसार 7 अप्रैल 1875) ही के दिन महर्षि दयानन्द सरस्वती ने मुम्बई के काकड़वाड़ी में आर्यसमाज की स्थापना की थी। अतः आज आर्यसमाज का स्थापना दिवस भी है। 

तीनों अति विशिष्ट व महत्वपूर्ण शुभ पर्वों की ढेर सारी हार्दिक शुभ कामनाएँ। परस्पर सभी प्रकार के मतभेद व ईर्ष्या-द्वेष मिटाकर सब एक दुसरे के सुख और उन्नति में सहायक बनें, सन्मार्ग पर चलें तथा विश्वशान्ति हेतु मिलकर समूचे मानव समाज की उन्नति में सहयोग दें। इन्हीं समस्त शुभ कामनाओं सहित !


शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

यौवन ऐसा भी ....

यौवन ऐसा भी हो सकता है : कविता वाचक्नवी


एक स्त्री के रूप में, एक मनुष्य के रूप में और विशेषतः एक माँ के रूप में कल का दिन भावविह्वल कर देने वाला दिन रहा। एक ऐसी घटना घटी जिसने मातृत्व को सार्थक कर दिया। कनिष्ठ पुत्र इन दिनों पाँच वर्ष बाद भारत गया हुआ है और उसके पिताजी भी।

कल वह वहाँ अपने पिताजी को किसी यात्रा के लिए गाड़ी में बिठाकर स्टेशन से बाहर आया तो कुछ दूर तक चलकर एक ऐसे स्थान पर पहुँचा जहाँ से उसे अपने इंगित स्थान के लिए ऑटो लेना था। वहाँ ऑटो की प्रतीक्षा करते करते समीप ही उसे एक 60 वर्ष से अधिक की महिला एक छोटे बच्चे के साथ दिखाई दी। बच्चा बहुत दुबला व कठिनाई से चल पा रहा था, क्योंकि नंगे पाँव था। वह महिला भी एकदम ठीक-ठाक तो नहीं किन्तु ऐसी लग रही थी कि अपने बच्चे को जूता दिलवाने में समर्थ है।

मेरे बेटा उन दोनों को कुछ देर देखता रहा और फिर अन्तत: उनके पास जाकर सीधा उस से पूछने का मन बनाया कि बच्चा नंगे पाँव क्यों है। जाकर उस महिला से पूछा तो उस महिला ने अपनी रामकहानी सुनानी शुरू की कि बच्चा उसका पोता है और बच्चे की माँ मर चुकी है व पिता (महिला का बेटा) अस्पताल में है उसे कुछ लीवर का रोग है आदि।

मेरे बेटे को उसकी कहानी में कोई रुचि नहीं हुई क्योंकि तब तक उसने देख लिया था कि महिला गहने आदि पहने हुई थी, अच्छी साड़ी और सैन्डिल आदि भी पहने थी ; जबकि दुर्बल-सा छोटा बच्चा एकदम नंगे पाँव था। महिला ने मेरे बेटे को यह भी बताया कि वह चर्च जा रही है (जो वहाँ समीप ही था) । मेरे बेटे को महिला के हाव-भाव आदि से सन्देह हो रहा था और लग रहा था कि महिला उस बेचारे बच्चे का इस्तेमाल लोगों को ठगने या पैसा आदि वसूलने के लिए करती है। बच्चा मानसिक रुग्ण भी प्रतीत हो रहा था।

तो मेरे सुपुत्र ने बच्चे को जूता दिलवाने की भावना के बावजूद महिला को नकद कुछ भी नहीं देने का मन बनाया, क्योंकि इसे पक्का लग रहा था कि महिला उस राशि से कुछ और कर लेगी और बच्चा जैसे-का-तैसा ही रह जाएगा। इसलिए सुपुत्र ने एक ऑटो लिया और महिला व बच्चे को भी अपने साथ ऑटो में बैठने को कहा और उन्हें ऑटो में अपने साथ लेकर एक स्थान पर गया जहाँ जूते की दुकान थी । वहाँ स्वयं उतर कर उस बच्चे को जूते खरीद कर दिए और उस ऑटो वाले को पैसे दे कर कहा कि महिला व बच्चे को वहीं छोड़ आओ जहाँ से ऑटो में चढ़े थे।

वह बच्चा जूते पहनते समय बहुत प्रसन्न था और हँस भी रहा था तो मेरे बेटे ने उसके दो चित्र भी लिए और वहाँ से अपने कक्ष पर लौट कर फिर यह सारी घटना तुरन्त वाट्सएप पर हमें लिख कर बताई व चित्र भी भेजे।

























                                                               





















और हाँ, चलते-चलते अन्तिम बात सुपुत्र ने ज़ोर देकर महिला से कही -
"चर्च में जाने से कुछ नहीं होगा"  :) 


यह जोड़ना चाहूँगी कि सबसे कनिष्ठ मेरा बेटा लगभग 24 वर्ष का है और यह वही बेटा है जो दिसम्बर में मध्य रात्रि को एक अनजान युवती की सुरक्षा की भावना से उसे नगर सीमा से भी 20 किलोमीटर बाहर उसके घर तक पहुँचाने गया था, जिसे मैंने 22 दिसम्बर को विस्तार लिखा भी था, वह घटना तो काफी रोमांचक भी थी क्योंकि उसमें बड़ा खतरा भी था। उसे यहाँ पढ़ा जा सकता है-https://www.facebook.com/kvachaknavee/posts/10153151019579523

अपने पुत्र पर गौरवान्वित तो हूँ ही पर यह घटना इसलिए बाँट रही हूँ कि यदि आप हम कुछ करना चाहें तो हमारे आसपास ही बहुत कुछ करने को है, बस देखने वाली आँख होनी चाहिए और संस्कार भी। दूसरी बात यह कि सन्तान को बनाना आपके-हमारे हाथ में है बशर्ते हमें यह पता हो कि सन्तान / बच्चे उपदेशों से नहीं अपितु आपके आचरण से सीखते हैं। तीसरा कारण इसे लिखने का अपने सुपुत्र के अच्छे कार्य का सम्मान व प्रशंसा करना क्योंकि इस प्रकार उसके नेक कार्य को सम्मानित कर उसे भविष्य में मनुष्यता के कार्यों के लिए प्रोत्साहित करना भी उद्देश्य है।



मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

भाषा और 'एक्स्पायरी डेट'

भाषा और 'एक्स्पायरी डेट' : कविता वाचक्नवी


‪#‎भाषा‬-प्रयोग का एक ‪#‎मनोरंजक‬ उदाहरण आज आपसे बाँटती हूँ।
भारत में हम लोगों को अभ्यास होता है कि किसी की मृत्यु के विषय में बात करते हुए हम

  • - 'उसके पिताजी एक्सपायर हो गए थे' 
  • - 'उसकी माता जी/बहन/पत्नी/पति/मित्र आदि को एक्सपायर हुए तो कई साल हो गए'
  • - वह छुट्टी गया है, उसकी माता जी एक्सपायर हो गईं
  • - रोड एक्सीडेंट में एक्सपायर हुए उसके भाई भाभी ... 
आदि वाक्य सामान्यतः बोलते हैं। अर्थात् मृत्यु के लिए 'एक्सपायर होना' क्रिया का प्रयोग करते हैं।

कई बरस पहले जब मैंने यहाँ ब्रिटेन में एक प्रसंग में किसी से अंग्रेजी में आदतवश कहा कि 'मेरी माँ एक एक्सीडेंट में कई बरस पहले एक्सपायर हो गईं थीं' तो उसके चेहरे की रंगत और हाव-भाव बहुत ही अजीब-से थे, मानो वह कुछ समझा ही नहीं। मेरे बच्चों ने तब उसे समझाया कि वस्तुतः मैं कहना चाहती हूँ कि मेरी माँ की मृत्यु कई बरस पहले एक दुर्घना में हो गई थी।

बाद में बच्चों ने मुझे समझाया कि, माँ ! एक्सपायर होने की क्रिया / प्रक्रिया वस्तुओं व पदार्थों की होती है, माँ या कोई भी व्यक्ति पासपोर्ट, ऑफिस कार्ड, कॉलेज कार्ड, दवा या अचार या खाद्य पदार्थ नहीं होता कि उसकी कोई 'एक्स्पायरी डेट' हो और वह उस तिथि के बाद 'एक्सपायर' हो जाए। व्यक्तियों के लिए मृत्यु के वाचक शब्दों जैसे Death, Died, No more इत्यादि का प्रसंगानुसार व वाक्यरचनानुसार प्रयोग किया जाता है।

यद्यपि अब मैं सचेत रहती हूँ किन्तु अपनी भारतीय आदत से अभी भी पूरी तरह पीछा नहीं छुड़ा पाई और आज ही डॉक्टर द्वारा मेरी माँ के बारे में एक प्रश्न पूछने पर 'शी एक्स्पायर्ड इन हर अर्ली ट्वेंटी प्लस' जैसा वाक्य निकल गया तो डॉक्टर को चौंक कर कहना पड़ा कि "मैं आपकी माँ के विषय में पूछ रही हूँ"। तब मुझे अपनी गलती का भान हुआ ।

आप लोग भी इसे पढ़ने के बाद शायद भविष्य में व्यक्ति की मृत्यु के साथ 'एक्सपायर' शब्द का प्रयोग करते समय अवश्य एक बार ठिठकेंगे, यह सोच कर कि व्यक्ति कोई दवा या खाद्य पदार्थ है क्या कि जो उसकी 'एक्स्पायरी' होती है।#‎KavitaVachaknavee‬

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गुरुवार, 27 नवंबर 2014

जसोदाबेन का पत्नीत्व

जसोदाबेन का पत्नीत्व  :  कविता वाचक्नवी




मैं स्त्रियों व उनके अधिकारों की समर्थक हूँ किन्तु स्त्रियों को आगे कर उनके नाम पर अपना मंतव्य सीधा करने वालों व उनकी महत्वाकांक्षाओं की नहीं और उन स्त्रियों की भी नहीं जो ऐसा करती या माध्यम बनती हैं।
जसोदाबेन लगभग 50 बरस से अलग रह रही हैं और वे कोई अनपढ़ या दूसरों पर निर्भर हो कर नहीं बल्कि पढ़ी लिखी हैं, जॉब करते हुए। इन पचास बरसों में उन्हें अपने पति से अधिकार लेने और उनके साथ बसने का ख्याल और अदालत को बीच में डाल कर अपने अधिकारों की जानकारी लेने का ख्याल नहीं आया ? इतनी लम्बी अवधि तक उनके पति गुजरात के मुख्यमन्त्री थे तब भी उनकी महत्वाकांक्षाएँ या अधिकारभावना या जानकारी प्राप्त करने की कभी सुध नहीं जागी। अब पूर्व पति के प्रधानमन्त्री बनते ही अधिकारों की याद आ गई, पति के साथ रहने की इच्छा का सार्वजनिक उद्घोष और प्रचार होने लगा। अब वे ऐसे व्यवहार कर रही हैं जैसे वे एकदम मूढ़ और अपढ़ हैं और यह भी जानतीं कि मीडिया को क्या कहना है, क्या नहीं कहना या क्या करना है क्या नहीं करना।

50 बरस के बाद अब पत्नी के अधिकारों और साथ बसने की याद आ गयी और समाज व् मीडिया के सामने एकदम वंचित और पीड़ित होने का प्रदर्शन होने लगा जबकि अध्यापिका रही पढ़ी लिखी हैं और आत्मनिर्भर रही हैं।

अब पति प्रधानमन्त्री बन गए तो सारे अधिकारों की याद आ गयी। इसे ही कहते हैं कि जब व्यक्ति शिखर पर पहुँच जाता है तो सबको अपने युगों से ख़त्म हुए रिश्ते याद आने लगते हैं।


जसोदाबेन के इस व्यवहार के पीछे उनके मायके परिवार की लालसाओं की बड़ी भूमिका प्रतीत हो रही है। वे जसोदाबेन को आगे कर अपने इरादे पूरे करने, प्रधानमन्त्री के रिश्तेदार होने का लाभ लालच पूरा करना चाहते हैं, यही साफ़ दिखाई देता है और सम्भव है कि उस परिवार को ऐसा करने के लिए उकसाने और अपनी बहन जसोदाबेन पर दबाव बनाने के लिए उकसाया जा रहा हो। मीडिया को दबी कुचली शोषित स्त्रियों के अधिकारों की चिंता से अधिक आत्मनिर्भर और लालसाओं वाले रिश्तेदारों के ईशारों व चर्चा में आने के लिए 50 साल बाद पत्नी के अधिकारों का ढिंढोरा पीटना शुरु करने वाली एक आत्मनिर्भर रही स्त्री के अधिकारों की स्वार्थी चिन्ता ज्यादा है।

 आज अब यकायक क्या बदल गया ? जो लोग इस अवसर पर त्याग को मुद्दा बना कर सहानुभूति का खेल खेल रहे हैं वे जान लें कि यहाँ मुद्दा त्याग का नहीं है। त्याग क्या मोदी जी ने नहीं किया ? क्या मोदी जी ने पुनर्विवाह किया ? फिर इस तरह के मुद्दे उठाने का क्या मतलब है त्याग आदि के ? या जिन पर पहले बात हो चुकी है, पति पत्नी सम्बन्धों आदि के। उन पर बहुत अधिक बहुत पहले लिख चुकी हूँ। उनकी चर्चा करने के इच्छुक लोग यहाँ अपना व मेरा समाय व ऊर्जा बर्बाद न करें अगर उन्होने वे सब चीजें यहाँ पढ़ी या समझी नहीं हैं, जब लिखी गई थीं।

यदि असुविधा के अतिरिक्त कोई मुद्दा ही नहीं है तो मीडिया के सामने अन्य चीजों पर बयान देने से बचा तो जा सकता है, किसी ने हलक में हाथ डाल कर नहीं कहा कि कैमरे के आगे दूसरे मुद्दों पर बोलो। यह सरासर सहानुभूति के नाम पर  द्रवित हो उठने वाली जनता से सहानुभूति बटोरने का प्रयास है।


रही अलग रहने के कारण उनसे सहानुभूति करने वालों की बात, तो उन लोगों को पता होना चाहिए कि इस देश दुनिया में प्रतिदिन कई लाख पति पत्नी अलग होते हैं, तलाक लेते हैं, उनकी नहीं बनती। यदि आप लोगों को सहानुभूति और अन्याय दिखाई देता है तो जाकर उनके लिए लड़िए। जिस दुनिया में तीन बार तलाक बोलकर छोड़ दिया जाता है, उनके लिए लड़िए और संसार में में सभी जगह तलाक या सेपेरेशन बंद करवाइए। जिस पति या पत्नी को अपने साथी में रुचि ही न हो उसके साथ जीवन बिताना उस से अलग जीवन बिताने से कई सौ गुना बुरा है। पति पत्नी किसी कारण से अलग हो गए, इसमें कुछ भी अनूठा नहीं है, न संसार में पहली बार हुआ है। मैं कई माह पूर्व भी विस्तार से लिख चुकी हूँ कि इसका अधिकार जोड़े को है कि वह साथ रहना चाहता है या नहीं। हमारे यहाँ महादेवी वर्मा स्वयं इसका उदाहरण हैं कि वे अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती थीं अतः उन्होने उस विवाह को नहीं माना और अलग रहीं। न उन्होने पुनर्विवाह किया न कोई अपराध। इसी तरह मोदी जी ने न पुनर्विवाह किया और न ही कुछ और। मोदी जी ने भी यह सारा जीवन भीषण संकटों में काटा है, दर दर भटके हैं। इसलिए आज वे प्रधानमंत्री बन गए तो आप लोगों को मौका मिल गया उनके जीवन के नियामक बन फैसले सुनाने का ?


असल में राजनैतिक शत्रुओं को और कोई मौका नहीं मिल रहा लांछन लगाने का तो यही एक मुद्दा सही। और ये सब वे लोग हैं जिन्होंने व्यभिचारी मंत्रियों और नेताओं की घरों पर सड़ रही पत्नियों के दु:खो और पीड़ाओं पर कभी कोई घड़ियाली आँसू तक भी नहीं बहाया । और इनमें से अधिकांश जिस वर्ग के हैं उस वर्ग के लोगों की बीवियाँ गाँवों में इनके बच्चे पालती सड़ती रहती हैं और ये दूसरी औरतों के साथ खुलेआम पत्नी की तरह शहरों में रहते गुलछर्रे उड़ाते हैं, यह मटुकनाथ को जायज सिद्ध करने वाली जमात है, ये हिन्दी साहित्य के उस वर्ग के प्रतिनिधि हैं, जहाँ प्रत्येक विवाहित पत्रकार, अध्यापक, संपादक, लेखक अपनी छात्राओं, पाठिकाओं व प्रशंसिकाओं के शोषण और प्रेम में सरेआम संलिप्त होता है। इसलिए इनका चरित्र हम जानते हैं, उस पर हमारा मुँह न ही खुलवाया जाए तो अपनी इज्जत बचाए रख सकते हैं ये ।


स्त्रियॉं के साथ सहानुभूति रखने वाले ऐसे स्त्रीशोषकों को उन स्त्रियों के शोषण की याद नहीं आती, जहाँ वास्तव में शोषण हुआ है। दिग्विजय से लेकर एक एक आदमी नंगा है और स्त्री शोषण में संलिप्त। जसोदाबेन के कितने हमदर्दों ने जाकर दिग्गी सहित एक एक शोषक से शोषित होने वाली किसी महिला के पक्ष में आवाज़ उठाई ?


कमलेश जी, भारत की मूल समस्या ही यही है कि वहाँ कोई व्यक्ति अपनी तरफ से किसी चीज में कुछ भी सार्थक योगदान नहीं देता न देना चाहता है, उल्टे बिगाड़ने में सब एक से बढ़कर एक आगे रहते हैं। भारत की बरबादी का मूल कारण ही यही है कि योगदान की बजाय सबको केवल शिकायतें शिकायतें शिकायतें ही करना आता है। किसी को कुछ काम धंधा नहीं है सिवाय दुनिया जहान से दुनिया जहान भर की शिकायतें करने के। केवल मुंह चलाना और यह बताना की फलाने ने ऐसा गलत किया ठिकाने ने यह क्यों किया, यह ऐसा होना चाहिए यह वैसा होना चाहिए आदि अनादि। जो व्यक्ति स्वयं कुछ सार्थक योगदान नहीं देता उसकी शिकायतें सबसे ज्यादा .... वाह कमाल है !

एक मनुष्य होने के नाते जसोदाबेन के प्रति पूरा सम्मान है और उनके मौलिक अधिकारों के प्रति भी। वे एक साधारण स्त्री हैं और शांति से जी रही थीं, किन्तु बदमाश मीडिया और विरोधी पार्टियों के हाथ एक अस्त्र लग गया है और इस तरह वे उन्हें इस्तेमाल करते हुए उनकी शांति भंग कर रहे हैं। एक साधारण सामान्य ढंग से जीने वाली स्त्री को शांति से जीने दे लेना चाहिए। भगवान के लिए उन्हें शांति से जीने दो।

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 जिन्हें पति पत्नी सम्बन्धों के चलते सहानुभूति हैं, वे डॉ दीप्ति की 24 मई की निम्नलिखित स्टेटस व वहाँ चली परिचर्चा को ध्यान से पढ़ें। यहाँ पर अपनी टिप्पणियों में मैंने कुतर्कों के उत्तर दे ही दिए हैं।
पहले दीप्ति जी की यह प्रतिक्रिया व स्टेटस -

डॉ. दीप्ति भारद्वाज says
May 24 ·मोदी जी , ये कैसी महत्वाकांक्षा -------
क्यों हर बार रामराज्य की स्थापना के लिए सीता की ही अग्नि परीक्षा होती है ? क्यो सीता ही वनवास भोगे ? क्यों पुरुष की अतिशय महत्वाकांक्षा स्त्री के अस्तित्व को नकारती है ? क्यों हर बार स्त्री का ही बलिदान क्यों ? कृष्ण को द्वारिका बसाने के लिए रुक्मिणी को साथ लेना पड़ा था।
मोदी जी ये जीत तब तक अधूरी है जब तक आप अपनी अर्धागिनी को उचित सम्मान नही देते ? मोदी जी हर माँ आप जैसे पुत्र की कामना करेगी पर हर स्त्री आपसे डरेगी। आपने भारत के लिये जो साधना की वो तब तक बेमानी है जब तक उस साधना की मौन साधिका जसोदाबेन को उनका मान न मिले। आपने जो किया वह दुनिया ने देखा लेकिन. उसके लिए किसी स्त्री ने अपने सपनों और आकाँक्षाओ की बलि दी। भरी जवानी में खण्डित दाम्पत्य को जिया। फिर भी आपके लिए मंगलकामनाए कीं ।
क्या माँ की तरह ही उस मौन साधिका को प्रधानमंत्री बने पति से मिलना नही चाहिये ।
मोदी जी आपकी ये जीत स्त्री की एकान्तिक साधना के सहयोग से सम्भव हो सकी । कितनी पीड़ा झेली है जसोदाबेन ने जब लोग उन्हें दयाभाव से देखते रहे होंगे । कितना कष्ट रहा होगा उन्हें जब सब होते हुए भी कुछ नही के दंश को पीया होगा।
मोदी जी कभी बचपन में ये भजन सुना था आज आपको सुनाती हूँ -
कान्हा रे तू राधा बन जा भूल पुरुष का मान
तब होगा तुझको राधा की पीड़ा का अनुमान ।
मैं तो पूरी खुशी नही मना पा रही ।

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  • Malik Rajkumar nic complaint
  • Mahendra Tiwari "बिलकुल ...."

    "सहमत होना ही पड़ेगा आपकी बात से ...
  • Subodh Agrawal mujhe lagta hai, mujhe aapse milna hi padega.
  • Sushil Mishra डॉ. दीप्ति जी आपकी बात से शायद ही कोई असहमत हो....लेकिन शायद इस समय अगर मोदी जी ये पारिवारिक मामलों में उलझ गए तो संभवतः उनका और जशोदाबेन दोनों का इतने वर्षों का तप देश के किसी काम न आ सकेगा....इस देश की तुच्छ और स्वार्थी राजनीति को इस नितान्त व्यक्तिगत मामले में राजनीति की असीम संभावनाएं दिखने लगेंगी और जिस संकल्प और स्वप्न को लेकर इस देश की जनता ने इतना अदम्य समर्थन दिया है वह कही खो जाने की भी संभावना बन जायेगी. इस विषय में बिलकुल सटीक गजेन्द्र सोलंकी जी की पंक्तियाँ याद आ रही हैं............................... दिलों के बीच दूरी से बड़ी दूरी नहीं होती, गरीबी से बड़ी कोई भी मज़बूरी नहीं होती. यहाँ कोई सिकंदर हो या अफलातून हो यारों ,तमन्ना हर किसी की हर समय पूरी नहीं होती.
  • DrArvind Mishra Delicate issue indeed!
  • Pramendra Maheshwari ये विचारों का झंझावात कहीं किसी और जगह की पीड़ा तो नहीं...प्रेम तो अद्र्श्य ही है निरंतर निस्वार्थ बिना किसी चाह के...न भौतिक न दैहिक 
    और असंभव सी मंजिल पाने के लिए सबसे पहले परिवार की बेड़ियाँ ही तो काटनी पड़ी हैं वरना पति पत्नी परिवार और समाज ने तो असंख्य संभावनाओ वालों को सिर्फ धरातल पर ही समेट लिया...घर गृहस्थी के और त्रिया चरित्र के लग लपेट में न जाने कितने जीवन शून्य पर ही सिमट गए...चिंता न करो जिस मोदी ने पूरे समाज का ध्यान रखा वो निश्चित ही अपनी तपस्या की इस मौन साधिका का सम्मान अवश्य करेंगे...
  • Girish Pandey Misra g ,,,आपकी सौ फिसदी सदी सही है,,,,
  • DrKavita Vachaknavee जब दो लोग किसी रिश्ते से अलग हो जाते हैं, इच्छा से, अनिच्छा से, जबर्दस्ती, कागजी तलाक लेकर या मन से अलग होकर तो संसार के दूसरों लोगों को उन्हें जबर्दस्ती रिश्ते में सिद्ध करने का अधिकार नहीं होता है। संविधान के अनुसार यदि तीन वर्ष ( अवधि घट-बढ़ हो सकती है) तक पति पत्नी के संबंध न रहें तो उसे भी कानूनी दृष्टि से तलाक माना जाता है। तलाक लेने का अधिकार तब तक सबका है जब तक संसार में बहस चलाकर पूरे विश्व में इसे प्रतिबंधित न करवा दिया जाए। लोग तो फोन पर तीन बार तलाक ! तलाक! तलाक! कह कर तलाक ले लेते हैं। उन सब के तलाक लेने के अधिकारों को जिस दिन विश्व की सहमति से प्रतिबंधित कर दिया जाएगा उस दिन ही मोदी या किसी भी अन्य का अपनी पत्नी या पति से अलग होना जैसे विषय चर्चा का विषय बने तो अच्छा है। मैं बहुत पहले इस विषय पर लंबी परिचर्चा कर चुकी हूँ फेसबुक पर, इसलिए उसे दोहराने की आवश्यकता नहीं समझती। जिन पुरुषों की स्त्री में रुचि न हो (किसी भी कारण, भले ही इसलिए कि वे दूसरी स्त्री में रुचि रखते हैं, भले ही इसलिए कि वे समलैंगिक हैं, भले ही इसलिए कि वे वीतराग हैं या भले ही इसलिए कि वे नपुंसक आदि हैं) इनमें से किसी भी प्रकार के पुरुष के साथ स्त्री को बांधना स्त्री का जीवन नर्क करना है, वह न ब्याहता होती है, न पति का प्रेम पाती है, न मुक्त और स्वतंत्र। मैं ऐसी हजारों नहीं उस से अधिक स्त्रियों से व्यक्तिगत परिचित हूँ और कई लोमहर्षक किस्से सुन-देख चुकी हूँ। कई यहाँ विदेश में भी। और आपको शायद पता नहीं कि इनका बालविवाह हुआ था, परिवार वालों ने जबर्दस्ती किया था क्योंकि ये सन्यासी होना चाहते थे और घर छोड़ कर जा रहे थे। 50 वर्ष पहले की दुनिया में 17 साल और 15 साल के लोग अपने माता पिता और बड़ों के प्रति विद्रोह नहीं कर सकते थे। पर विवाह भी इन्हें बांध न सका और इसलिए ये जसोदाबेन को पढ़ने व अपने जीवन से इन्हें अलग करने की बात कहकर सहमति से अलग हो गए थे। उसके बाद मोदी जी ने सन्यास ले लिया था। आपने शायद बेल्लूर मठ में इन्हें सन्यासी के भेस में रहते हुए वाले चित्र नहीं देखे हैं। और भारत में भी यह कोई नई बात नहीं है। यह अधिकार महिला को भी रहा है कि वह यदि पुरुष में अनुरक्त नहीं तो अलग हो जाए। दूर क्यों जाना, महादेवी वर्मा इसका हमारे सामने का उदाहरण हैं। इसलिए इस तरह की बातें करना लोगों को चटखारे लेने का अवसर देना है। फेसबुक पर घूमने वाले लाखों करोड़ों में से कोई दो चार ही होंगे जो विषयवासना से विरक्ति का अर्थ भी समझते हों। उनके लिए विवाह भी भोग का ही माध्यम है, कामक्रीड़ा के लिए रचा गया खेल। ऐसे लोगों के बीच दो सम्मानित व्यक्तियों के व्यक्तिगत सम्बन्धों पर चर्चा करना सम्मानजनक नहीं। कोई आज का तलाक़शुदा आधुनिक सामान्य दंपत्ति भी हमें या आपको इसकी अनुमति नहीं देगा कि उनके पूर्व पति या उनकी पूर्व पत्नी को टार्गेट कर जबर्दस्ती एकदूसरे के साथ जोड़ा जाए। ऐसा कर हम जसोदाबेन के एकाकी जीवन का अपमान कर रहे हैं। क्या दुनिया के लोगों में तलाक नहीं होते? लम्पट और व्यभिचारियों को धिक्कारने की बजाय ( हजारों प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी हमारे आपके देखने और परिचय में हैं जिनकी बीबियाँ इनके नाम पर गाँव में सड़ रही हैं और ये शहरों में दूसरी औरतों के साथ खुल्लमखुल्ला रहते हैं, जीवन भर) धिक्कारना है तो उन व्यभिचारियों को धिक्कारा जाना चाहिए। पति पत्नी संबंध से सदा के लिए अलग हो चुके दो लोगों को जबर्दस्ती एक दूसरे के गले बांधना कदापि उचित नहीं,
    May 24 at 5:37pm · Edited · Like · 3
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज अजीब बात है जब हम अपने लिए सोचते हैं तो संवेदना के धरातल पर सोचते हैं । और जब अन्य के लिए, तो आदर्श वादी हो जाते हैं ।
  • Raghvendra Awasthi सिद्धार्थ के परिवार को त्यागने पर बुद्ध को समाज ने किस तरह देखा ? 

    फोकस स्त्री की अवहेलना पर है या किसी ईमानदार व्यक्ति के चुनाव पर ...जो जब वह समर्थ हुआ उसने वही चुना जो उसका मार्ग था ....

    गलत और सही सब सापेक्षिक ...समझ और दृष्टि के अनुपात में
  • DrKavita Vachaknavee मैं अपने लिए भी सोचूँ तो मैं कभी ऐसे पुरुष के साथ रहना नहीं चाहूंगी, जिसकी मुझ में अनुरक्ति न हो।
    May 24 at 5:30pm · Edited · Like · 2
  • Raghvendra Awasthi दुरुस्त बात ........चुनाव अनुरक्ति ही कराती है .......और अनुरक्ति अपनी-अपनी
  • DrKavita Vachaknavee रही आदर्श की बात , तो इसमें कौन सा आदर्शवाद है। दो तलाक़शुदा लोगों को उनका जीवन जी लेने दिया जाए , इसमें आदर्शवाद नहीं व्यावहारिकता है। संसार भर में माँ बेटे का रिश्ता किसी भी नियम से अलग नहीं हो सकता क्योंकि वह हमारे हाथ में नहीं है, पर संसार में पति पत्नी अलग होते हैं, सो ये भी हो गए।
  • DrKavita Vachaknavee दीप्ति जी, आपके इस नियम से चलें तो महादेवी वर्मा भी अत्याचारी, क्रूर शोषक और अमानवीय राक्षसी ठहरा दी जाएँगी क्योंकि उन्होने अपने पति को स्वीकार नहीं किया था और उन्हें छोड़ दिया था जबकि उनके पति ने जीवनभर विवाह नहीं किया।
    May 24 at 5:32pm · Edited · Like · 3
  • Raghvendra Awasthi समाज जब अति कर देता है तब संवेदनशील नहीं क्रूर हो जाता है ....
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज मेरी पोस्ट तो सहज थी । इतनी असहजता कैसे आ गयी। मैंने उस स्त्री की पीड़ा को अनुभव करने की कोशिश की जिसका जिक्र पत्नी के रूप में किया गया है। यदि कोई सम्बनध नही रहा तो पहले की तरह मौन साधना चाहिये था।
  • Raghvendra Awasthi दीप्ति .....कोई अफेंस नहीं किया तुमने ....सहज अभिव्यक्ति है तुम्हारी ...ईमानदार भी
  • Raghvendra Awasthi प्रारब्ध एक बहुत गंभीर और रहस्यमय शब्द ही नहीं ....अर्थ भी है
  • DrKavita Vachaknavee इसका उत्तर हजारों लोग मीडिया और सोशल मीडिया पर दे चुके। पहले ऐसा नियम नहीं था कि यदि कभी आपका विवाह हुआ है तो उसकी जानकारी भरनी अनिवार्य है , इसलिए पहले नहीं उल्लेख किया। जिस दिन संविधान ने इसे अनिवार्य कर दिया उस दिन उल्लेख करना पड़ा , न करते तो झूठ बोलते।
    May 24 at 5:41pm · Edited · Like · 2
  • Raghvendra Awasthi सहमत
  • Raghvendra Awasthi अब मैं गंभीर चर्चा का आह्वाहन करता हूँ .....करिए मित्रो
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज तुम भूल गये पुरुषत्व मोह में 
    कुछ सत्ता है नारी की
    समरसता ही सम्बन्ध बनी 
    अधिकार और अधिकारी की।
  • Raghvendra Awasthi मोह को विसर्जन करने के बाद चर्चा के लिए उत्सुक और उन्मुख हूँ दीप्ति
  • DrKavita Vachaknavee पुरुष के साथ बंधने मात्र में ही प्रत्येक स्त्री की सार्थकता और उपलब्धि नहीं है।
  • Raghvendra Awasthi सहमत
  • DrKavita Vachaknavee इतना लंबा लेख दिया मैंने तीन चार टिप्पणियों में, अभी और क्या गंभीर करें? इस से गंभीर कर सकने की अब शक्ति नहीं
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज मैंने भी ये जानकारी मीडिया से ही पायी कि मोदी जी विवाहित है। उनके अभियान के लिए ये जरूरी था। पर एक स्त्री जिसने पूरे जीवन उनके नाम के साथ जिया , बात तो वहाँ की है। हाँ , अब कह सकती हूँ कि मैंने स्त्री को विसर्जित होते देखा है। भारतीय स्त्री का पारम्परिक शास्त्रीय चेहरा हैं जसोदाबेन
  • Raghvendra Awasthi स्त्री द्वारा बड़ी लाल बिंदी लगाने और टेपुये तक सिंदूरी मांग भरना उसकी पीटीआई के प्रति या प्रारब्ध के प्रति सहज स्वीकार्यता भी नहीं है
  • Manika Mohini कविता जी, आपकी बात बहुत सारगर्भित, अर्थपूर्ण एवं तर्कसंगत है लेकिन एक जानकारी का अभाव है, वह यह कि जसोदाबेन का वक्तव्य अखबार में छपा है कि वे स्वयं चाहती हैं कि उनके पति उन्हें शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित करें। यह जगजाहिर बात है कि मोदी जी ने पत्नी को किसी अन्य महिला के लिए नहीं छोड़ा था. आज मोदी और जसोदाबेन के व्यक्तिगत जीवन को खंगाला जा रहा है तो भी दोनों के अन्यत्र सम्बन्ध की जानकारी नहीं मिलती। उम्र के इस आखिरी पड़ाव पर अनुरक्ति होना, न होना बराबर है, सम्मान होना पर्याप्त है जो जसोदाबेन में दिख रहा है. इस मामले में मैं मोदी जी को दोषी नहीं मानती क्योंकि जिसके मन में ही वैराग्य है, उसके लिए किसी भी रिश्ते की अहमियत नहीं रहती। वैरागी व्यक्ति बीतर से कोई बहुत शांत नहीं होता, वह अपनी मानसिक उलझनों में जकड़ा होता है. जसोदाबेन पढ़-लिख कर नौकरी करती थीं, लेकिन उन्होंने पुनर्विवाह के बारे में सोचा हो, इस बात के सबूत नहीं मिलते। तो उम्र के इस पड़ाव पर यदि दोनों मिलना भी चाहते हैं या Sirf पत्नी मिलना चाहती हैं और लोग उनकी मदद करने के लिए सद्भाव रखते हैं तो कविता जी, इसे आपको सहज भाव से लेना चाहिए, इतना उत्पीड़ित नहीं होना चाहिए।
    May 24 at 5:50pm · Edited · Like · 2
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज वो दोनों जिस वय में हैं वहाँ न कामेच्छा है न भोगेच्छा।
  • Raghvendra Awasthi वैराग्य युग्म का विषय नहीं .......यह एक में हो सकता है ....दूसरे में अनुराग सो सकता है ...किन्तु जीवित रह सकता है ......हर जीवित व्यक्ति एक स्वतंत्र इकाई है
  • Anju Shalini jab dono ne alag reh ker yeh sweekar kiya hai barsoo pehle .....itna adbhut rishta nibhaya hai to ab yeh charcha kyu ,,,yeh nirnay bhi un dono ka hona chahiye samaj ka nahi ....
  • Raghvendra Awasthi हम खामखाँ हलाक हो रहे है अब तो ......
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज जसोदाबेन ने पति के स्वप्न को स्वीकार किया है। माँ सारदा ने भी पूरे जीवन ठाकुर को साधना में सहायता दी। पर ठाकुर ने उनका मान रखा। मोदी जी स्वेच्छा से गये
  • Anju Shalini ha ha awasthi ji yeh kham kha hi to bade kaam ki cheej hai .....baal ki khaal nilal deti hai
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज नहीं राघवेन्द्र जी
  • DrKavita Vachaknavee मैं कहाँ से किसको उत्पीड़ित लगी? मूझे तो ऐसी कोई पीड़ा नहीं। मणिका जी ! आपने भी कहा वैराग्य वाली बात को। तो वैराग्य वाले व्यक्ति के साथ यह हमारी आपकी ज़बरदस्ती नहीं कि उसका जीवनभर का वैराग्य यों तमाम कर दिया जाए? और वैसे कोई तीसरा होता कौन है दो लोगों के व्यक्तिगत सम्बन्धों को अपनी इच्छा या अपनी सोच से निर्णायक बन चलाने वाला ?कोई स्त्री अपने दाम्पत्य जीवन में पति से अलग हो जाए और पति की किसी दिन बुढ़ापे में उसके जीवन में आ खड़े होने की इच्छा हो जाए तो क्या वह स्त्री बड़ी सहजता से 50 बरस पहले से अलग हो चुके पति को अपने जीवन में घुसने देगी ? यह कहाँ का न्याय है ? संबन्ध इस तरह इकतरफा होते हैं ? या बच्चों का मेला देखने की ललक की तरह कि मेरी गुब्बारा खरीदने की इच्छा है तो सारी दुनिया गुब्बारा न दिलवाने को अन्याय और अत्याचार कहे। कमाल है।
  • DrKavita Vachaknavee कामेच्छा नहीं है तो कोई भी किसी के साथ रहने लगेगा ? कमाल है दीप्ति !
  • DrKavita Vachaknavee अजीब बात नहीं लग रही कि हम दो लोगों को अपना चाबी वाला खिलौना समझ कर उनके जीवन में उन्हें क्या और कैसे अपने संबंध को चलाना चाहिए इस पर निर्णय दे रहे हैं । मैं तो मेरे व्यक्तिगत जीवन पर निर्णय देने वाले तो क्या बोलने वाले तक को कभी क्षमा न करूँ।
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज जिस समाज से जसोदाबेन या मोदी जी आते हैं वहाँ तलाक अभी भी सहज स्वीकार्य तो नही। स्त्री पूरा जीवन पति के नाम पर काट देती थी। ये जसोदाबेन का पति की साधना में सहयोग ही है। उसकी कद्र होनी चाहिये ।
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज कविता जी ये निर्णय नही सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति से अपेक्षा है।
  • DrKavita Vachaknavee उसकी कद्र की बजाय ऐसी चर्चा करना ही उसका मखौल बना देना है
    May 24 at 6:01pm · Edited · Like · 1
  • DrKavita Vachaknavee व्यक्तिगत सम्बन्धों में और वह भी जो पचास बरस पहले छोड़े जा चुके हैं।
  • Raghvendra Awasthi सहमत
  • DrKavita Vachaknavee मैं अपनी बात कह चुकी। अब आप लोग अदालत बन मोदी के गृहस्थ बनने न बनाने का निर्णय सुनाएँ और फिर उन दोनों को आदेश दें कि वे आपका निर्णय मानें ही मानें। न मानने पर देश की जनता से उन्हें नीच और मक्कार प्रमाणित करवाएँ। धन्यवाद !
    May 24 at 6:03pm · Edited · Like · 1
  • Manika Mohini कविता जी, यह आपसी समझ की बात है. जसोदाबेन को यह समझ में आ गया कि उनके पति किसी अनुचित इच्छावश उनसे लग नहीं हो रहे बल्कि मन में दुनिया के प्रति विरक्ति होने से अलग हुए हैं. उन्होंने उनके इस निर्णय का सम्मान किया। ज़रूरी नहीं कि अलग होने से संबंधों में विष ही पैदा हो. फिर हमें क्या अधिकार है कि हम इस नकारात्मक तरीके से उनके रिश्ते की व्याख्या करें?
  • Raghvendra Awasthi जिस स्त्री ने पूरा जीवन साधना में बिताया और शांत रही .....लक्ष्मण जी की पत्नी का नाम याद नहीं आ रहा .........जिनके उद्देश्य बड़े होते हैं वे बड़ा त्याग ही करते हैं ....मित्रो '
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज अगर ये मखौल है तो उन्हें जसोदाबेन को अखबार में दिए बयान से रोकना चाहिये था
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज राजा का व्यक्तिगत कुछ नही होता सब समाज का होता है।
  • DrKavita Vachaknavee मैंने कब कहा कि नकारात्मक या विष ? कमाल है । मैं तो उल्टे कह रही हूँ कि ऐसा कर हम जसोदा जी के एकनिष्ठ जीवन का अपमान कर रहे हैं।
  • Raghvendra Awasthi नहीं .....स्त्री या पुरुष .....अकेले में एक स्वतंत्र इकाई है .....वह अपनी बात कह सकता है
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज राघवेन्द्र जी उर्मिला
  • Raghvendra Awasthi राजा कौन ?
  • Anju Shalini pati yani modi ji ne bhi doosa vivaha nahi kiya .....mutual understanding hai yeh ....dono apni apni jagha santusht aur khush hai ...mahan vyaktitiv hai dono ka ...ek desh seva ke liye pariwar chod ta hai to dusra chup chap sehmati deta hai saath nibhane ki ...esko yu mat prastut karo ki kuch galat hai ,....yeh patni ke tyag ka apmaan hoga aur modi ji ke saath anyaaye
  • DrKavita Vachaknavee उनके संबंध 'राजा' बनने से पहले से तय हो चुके हैं, इसलिए यह तर्क निराधार है। आप उनके पूर्व जीवन के सम्बन्धों को पलटने की जिद्द कर रही हैं।
  • Raghvendra Awasthi विषय एक बार फिर दोहरा लें .......सीधा प्रश्न करो दीप्ति ......बिना भूमिका के
  • Renu Bali Khurana jasodaben ji ek mahan tapasvini hai,prem may sirf dene ka bhaav hota hai,vo bilkul bhi peedit nahi hongi,....
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज कविता जी , आप पजेसिव क्यों ? मैंने तो मोदी जी की ही टीम में उत्तर प्रदेश में काम किया है। वे तो हम सब के हृदय हार हैं । एक बार उस स्त्री की पीड़ा कै अनुभव करिये । जिसने किसी कै नाम पर पूरा जीवन जिया है। स्त्री के प्रति ऐसी कठोरता
  • Anju Shalini dipti ji ....prashan ab adhikar ka hai hi nahi ....dono apni icha se alag reh ker ek doosre ko samman de rahe hai ....
  • DrKavita Vachaknavee आप तथ्य और सत्य को पज़ेसिवनेस्स समझती हैं ? भावुकता के समर्थन को सहमति ?
  • Shiva Tomar madam ji app kyu modi ke pichhe pade ho plzzzz..... rahne dooo
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज कविता जी। मेरी पोस्ट अखबार में छपे जसोदाबेन के बयान पर है। इसमें भावुकता नहीं वरन् प्रश्न है।
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज आज मोदी इन बहसो से ऊपर हैं ।
  • Anju Shalini aary patrakar baar baar puchte hai aap delhi aayengi to unhone kaha bulayenge to jaroor aaoongi
  • DrKavita Vachaknavee  डॉ. सरोज गुप्ता
  • Virendra Jain कुछ को मोदी को पत्नी के बिना देख कर अंतर्मन से सुख मिलता है। अरे भाई ये पति पत्नी के बीच का मामला है उन्हें आपस में तय करने दें
  • Kavi Sanjay Shukla आप लोग चिन्ता ना करे माननीय मोदी जी जसोदाबेन को पूरा सम्मान देगे! जो हो गया सो हो गया!
  • Krishna Bihari yah nitaant niji maamla hai .... anuchit hoga kuch bhi kahna .
  • Kamlesh Chauhan DrKavita Vachankavi ki har baat per sehmat hu . Lekin Deepti Bhardwaz aap kis yug ki baat kar rahi hai us yug ki jo ghar mai aurto ke rakhte huve bahar ki aurto se gulshare udate hai ? Modi ji se Pukar karne se pehale Jaayiye us samaz ka udhar Ki...See More
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    May 25 at 2:22am · Edited · Like · 1
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज Kavita VachaknaveeKamlesh ChauhanKrishna Bihari,Virendra Jain, जी ... आप सबके तर्क को प्रणाम । देश को एक सशक्त प्रधानमंत्री मिला है ये सौभाग्य है। आप सब मेरी पोस्ट एक बार फिर ध्यान. से पढ़ना । मैंने स्त्री दृष्टि से स्त्री के समर्पित जीवन को दृष्टि गत रखते हुए स्त्री के अवसर पर उचित सम्मान की बात की है। तीन वर्ष के साहचर्य ने मोदी जी के व्यवहार ने जसोदाबेन को जीवनभर बाँधे रखा। ये बात आज के संदर्भों में एक उदाहरण है। भारत में पतिव्रताओ के उदाहरण दिये जाते हैं ये उनमें से एक है। जिन्होंने पढ़ाई पूरी की शिक्षिका बनीं और मोदी जी के लिए एकनिष्ठ भाव से जीवन जिया। 
    जसोदाबेन जिस गाँव और परिवार से आती हैं वहाँ दूसरा विवाह या तलाक जैसे शब्द आम प्रचलन में नही हैं । पढ़ी लिखी कुछ स्त्रियों के आधार पर पूरे भारत की सामाजिक मान्यताओं की अनदेखी नही की जा सकती। 
    जसोदाबेन का जिक्र आया तो इसीलिए कि उन्होंने कोई दूसरा विवाह नही किया। उनकी साधना भी कम महत्वपूर्ण नहीं । स्त्री दृष्टि से स्त्री की संवेदना को अनुभव करते हुए ही मैंने बात कही है। एक मानवीय गरिमा के हितार्थ।सादर
  • Kumar Sauvir मोदी जब तक जसोदा को नहीं समझ सकते, तब तक वे खुद को जसोदा के तौर पर महसूस करें। लेकिन दीप्ति जी, जसोदा को भी मुंह खोलना पड़ेगा। केवल मोदी को नहीं, जसोदा को भी समझना पड़ेगा कि वह कब तक जसोदा बनी रहेगी। माना कि यह युद्ध महिलावादियों का भी है, लेकिन मूलत: तो यह प्रकरण जसोदा का ही है।
  • Arvind K Singh दीप्ति जी ये तो सचमुच बहुत गंभीर सवाल उठाया है आपने
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज Kumar Sauvir जी , बात महिलावादी की कतई नही है। मेरी बात सिर्फ संवेदना के धरातल से उपजे यक्ष प्रश्न की है। जैसे मोदी अब व्यक्ति गत नही रहे वैसे ही जसोदाबेन अब दुनिया के सामने हैं गुमनामी से बाहर। मैं बचपन से सीखती आई हूँ कि वरिष्ठो का जैसा आचरण होगा छोटे भी वैसे ही बनेंगे
  • Kamlesh Chauhan kitne dukh ki baat hai ki abh Yoshda ji ko muhn khulane pr ham majbur kar rahe hai . Logo ko koi aur kaam nahi hai? kaya Modi ji ko desh ki aur uljhane kaya kam hai jo aap log Yashodabhen ke muddo ko uthakar baith gaye ho . had ho gayi hai
  • Kamlesh Chauhan Kaya Modi ji apni ghar ki uljhane le kar desh mai shashan karenge
  • Ashok Rawat मोदी जी हर माँ आप जैसे पुत्र की कामना करेगी पर हर स्त्री आपसे डरेगी। आपने भारत के लिये जो साधना की वो तब तक बेमानी है जब तक उस साधना की मौन साधिका जसोदाबेन को उनका मान न मिले।..........आपकी बात सौ फीसदी सही है मोदी की पत्नी के त्याग को सम्मान मिलना चाहिए.
    May 25 at 4:41am · Edited · Like · 2
  • Kamlesh Chauhan Yoshoda ji ke naam per kar di hai rajniti ab nari ke hakko ke baare bolne walo logo ne .. achhi Rajniti hai .. Rape ke baare nahi , Kashmir mai hindu aurto ko blatkar kiya gaya unke gale kaate gaye unke liye to awaj uthi nahi lekin Yashodabhen jo...See More
  • Amit Agarwal Jab ye shadi barso pehle se khatm hai to ab biwi biwi ka shor kyun macha rahe ho. Abhi tak kuch nahi tha jaise hi pm bana to biwi saath aaney ko ready. Ye Kya???
  • Preet N Singh bullshit ................
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज बड़ी अजीब बात है कि जो स्त्री वादी होने का दावा करते रहे अब तक वे ही अपने निहित स्वार्थों के कारण. सच स्वीकारने से कतराने लगे। कोई बड़ा पुरस्कार या पद मिलने की आस में भाव और भाषा बदल गयी। मोदी जी के क्लोज फ्रैण्ड बन फोटो लगाने से बिजनेस मिलने में आसानी होगी । इसी लिए एक स्त्री के समर्पित भाव को स्वीकारने में इतना कष्ट। मुझे तो मीडिया से ही जानकारी हुई की मोदी जी की पत्नी हैं ।
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज preet n singh ji मैं आपसे परिचित नहीं ।
  • Shalini Nagaich Deepti ji, adbhut n hradysparshy chitran.
  • Kamlesh Chauhan Amit aggarwal very good point kaya kare logo ko dusro kai nizi mamalo mai bolna mahanata lagti hai. Please dont know how to mind their own biz sad.
  • Kamlesh Chauhan http://youtu.be/hSJbmB-AxMg She is not weak woman . This woman can speak for her own right . She is not weak woman get a life friends
    Jashodaben, a 62-year-old retired school teacher...
    YOUTUBE.COM
  • DrKavita Vachaknavee हम लोग दूसरों की निजता की सम्मान करना कब सीखेंगे !
  • Pratibha Dave Kitani shalinata hai Jasodabahenme!. Kyun anya log ise dhatane pe lagna chahte hai? Kisi ko is vishay me bolana, charcha uthana uchi nahi lagata aur vo bhi apani mahata ke liye!. Please, is sambandh ki shalinata aise hi rahene digia. Dil se vairagya ...See More
  • Kamlesh Chauhan I dont know You Pratibha Dave but I salute you. Thanks Ham Hind ki hai Nariya Jalti Chingariya Samjhe na Humen koi Phoolo Ki Kyariya.. If My hubby leave me I will not look back .. I wont let anyone to tell me what to do and I respect whatever the reason he has to leave me Politics or something else. Do we want men to be suffocated with us?
  • Kavi Laxminarain Agarwal मोदी देश निर्माण के कार्य में लगे हुए हैं न कि सत्‍ता भोग में।कोई भी भावनात्‍मक बाधा या कमजोरी इस यज्ञ खन्‍डित कर देगी।ये एक स्‍त्री के जीवन का सवाल नहीं है देश की 60 करोड़ स्‍त्रीयों के भविष्‍य का सवाल है।अगर ये देश तालिबानी मुसलमानों के हाथों में चला जाता है तो सोचिए 50 करोड़ हिन्‍दू महिलाओं का भविष्‍य क्‍या होगा।पाकिस्‍तान में हिन्‍दू महिलाओं का अपहरण करके तालिबान के लिए वंश्‍या की तरह इस्‍तेमाल होता है।जहॉ तक राम और सीता का प्रश्‍न है ये भी सत्‍य है कि राम ही वो महापुरूष हैं जिसने एक पत्‍नी प्रथा की नींव रखकर नारी के गौरव को बढ़ाया।
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज Kavi Laxminarain Agarwal ji आपने मेरी पोस्ट का सटीक जबाव दिया।वरना सारे गुजराती मुझे ये सोच कर घेर रहे थे कि सत्य बोल मैंने अपराध कर दिया और दिल्ली पर काबिज होने से उन्हें रोक दिया। सबका स्त्री वाद धरा रह गया।
  • Shyam Bhatia Well said -beautiful letter to Sh Narendra Modi
  • Kavi Laxminarain Agarwal कांग्रेस,RJD,JDU.SP,BSP. आदि ने तो सत्‍ता मुसलमानों को सौंपने की पूरी तैयारी कर ली थी हिन्‍दूओं के भातर निराशा बैठने लगी थी।मोदी जी के आने से हिन्‍दूओं में एक आशा का संचार हुआ है।केवज एक स्‍त्री की के दृष्‍टिकोण से हर बात को मत देखा कीजिए।नरेन्‍द्र मोदी न भी कभी किसी अन्‍य महिला से सम्‍बंध नहीं रखा वरना अन्‍य नेताओं को देख लीजिए।ये एक यज्ञ है जिसमें जशोदाबेन और नरेन्‍द्र मोदी दोनों ही अपने सुखों,भावनाओं की आहुति दे रहे हैं।मोदी की नजर बहुत दूर तक है बहुत विशाल एजेन्‍डा है उनके मष्‍तिस्‍क में उन्‍हें ऑख बन्‍द करके समर्थन दें।मेरी किसी टिप्‍पणी से आपको ठेस पहुंची हो तो क्षमा करें।
  • DrKavita Vachaknavee भाईसाहब बहुत अच्छा उत्तर दिया आपने कि मोदी सत्ता सुख में नहीं लगे, राष्ट्रनिर्माण में लगे हैं। 'मोदी की महत्वाकांक्षा' कह कर जबर्दस्ती गाली दी जा रही थीं। यदि उन्होने व्यभिचारियों की तरह किया होता या किसी अन्य से संबंध बनाने के लिए जबर्दस्ती पत्नी को तजा होता तब तो भी कोई कुछ कह भी सकता था, पर... हद्द हुई पड़ी थी। खैर ! धन्यवाद। Kavi Laxminarain Agarwal
  • Raghvendra Awasthi सहमत ....मोदी की जीवनयात्रा को एक अनुष्ठान की तरह देखा जाना ही समीचीन है ....वे समय द्वारा देश में परिवर्तन के लिए चुने गए व्यक्ति हैं .........मोदी को जो सफलता मिली है वह किसी भी दृष्टि से मानवीय सीमाओं से परे और अलौकिक है ...मोदी स्वयं भी यह सब न तो जानते होंगे ....न उन्होंने ऐसा सोचा होगा ....उनका कार्य उनके लिए तय पट कथानुसार चल रहा है ......वे बस उसमे अभिनेता हैं ...ऐसे समझे मित्रों 
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज सौ फीसदी राघवेन्द्र जी
  • Raghvendra Awasthi अब तुम खुश हो जाओ दीप्ति ......तुम्हारी पोस्ट सार्थक रही 
  • Rajeev Agnihotri bilkul sahi
  • Mahendra Tiwari  सार्थक तर्क वितर्क....
  • DrKavita Vachaknavee

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