बुधवार, 6 नवंबर 2024
क्या अमेरिकन समाज स्त्रीविरोधी है? : (डॉ.) कविता वाचक्नवी
शुक्रवार, 30 जून 2023
पाककला की चुनौती और टमाटर : कविता वाचक्नवी
जब हम भारत में रहते थे तो लहसुन–प्याज न खाने के चलते हमारे यहाँ टमाटर के अधिक प्रयोग की अनिवार्यता थी। जो लोग प्याज खा लेते हैं, उन्हें वैसे भी टमाटर की अनिवार्यता कुछेक भोज्य पदार्थों के लिए ही होती है। मैंने क्योंकि स्वयं अधिकांश फसलें अपने हाथ से बोई, उगाई काटी हैं अतः एक–एक फल, एक –एक फली, एक–एक कन्द, व एक–एक शाक की प्रत्येक इकाई का महत्व तथा प्रतीक्षा से परिचित हूँ। उन के हमारी इच्छानुसार उग कर तैयार न होने का अर्थ उगाने वाले का दोष नहीं, अपितु प्रकृति व पर्यावरण का चक्र, नियम तथा सन्तुलन है।
ऐसे में जिन दिनों टमाटर की फसल नहीं होती थी, या मण्डई में नहीं मिलते थे तो गृहणी के रूप में जो–जो उपाय करती थी, उन्हें पाठकों की सहायता के लिए साझा कर रही हूँ।
(प्याज–लहसुन न खाने–पकाने के चलते मेरी गृहस्थी में प्रतिदिन बड़े आकार के सात–आठ टमाटर शाक–दाल हेतु बारहों माह चाहिए होते थे)। ऐसे में विकल्प दो–तीन थे। गृहणियों को बिना हाय–तौबा मचाए शान्ति से अभाव को भी भाव से पूर लेने का गुण अनिवार्यतः बनाए रखना चाहिए। यह हमारे ही पारिवारिक सम्मान का कारक बनता है। तो आइए, मेरे अनुभव से आप को कुछ लाभ मिले तो इन्हें अपना सकते हैं –
– कोकम
दक्षिण में गहरे लाल रंग का एक बहुत खट्टा फल आता है, जिसे कोकम कहते हैं। उस का खट्टा–सा शरबत भी बाजार में मिलता है। इस कोकम की सूखी लाल–भूरी फाँकें बिकती हैं। जिस किसी में डाल दें, खटाई और रंग देती हैं। मैं सदा उन्हें घर में रखती थी। जिस किसी दिन टमाटर घर में समाप्त हुए, उस दिन दाल को कोकम तथा अदरक डाल कर उबाला व फिर बघारा करती थी। कोकम आज भी मेरी गृहस्थी में सदा रहता है। यहाँ तो उस की दीर्घावधि तक सुरक्षित रहने वाली गीली फाँकें उपलब्ध हो जाती हैं।
– साबुत लाल मिर्च
सूखी साबुत लाल मिर्च भी टमाटर के अभाव में काम आती है। आप को अधिक मिर्च नहीं रुचती तो आप प्रत्येक मिर्च को तोड़, उस के बीज व दाने बाहर निकाल अलग प्रयोग हेतु सहेज लें तथा छिलके को पानी से धो, कुछेक छोटे–छोटे टुकड़े कर लें, जैसे एक लम्बी मिर्च हो तो चार–छह टुकड़े हो सकते हैं। उन्हें अलग से उबाल कर, पानी से निकाल दाल या शाक में ऊपर से मिला दें तो टमाटर के लाल रंग का आभास देंगी। उबालने से बचा हुआ पानी भी स्वादानुसार मिलाया जा सकता है। ऐसे में टमाटर की खटाई की कमी पूरी करने हेतु अमचूर प्रयोग करें।
– इमली का अवलेह
बाजार में इमली का बिना गुठली–डण्ठल का तैयार अवलेह उपलब्ध होता है। मेरी गृहस्थी में वह सदा रहता आया है। उसे भी रंगत तथा खटाई हेतु, विशेषतः साम्भर हेतु प्रयोग करती आई हूँ।
इन उपायों से सम्भवतः आप भी अपनी गृहस्थी और चौके को अभाव रहित तथा अनवरत चला सकते हैं।
–✍🏻 कविता वाचक्नवी
मंगलवार, 4 अप्रैल 2023
ऐतिहासिक ध्वंस और पुनर्निर्माण : (डॉ.) कविता वाचक्नवी
2-3 सौ वर्ष पूर्व आई औद्यौगिक क्रान्ति के साथ पश्चिम में साईंस और रिलीजन दो हुए, और रिलीजन के फंदे से कुछ लोग बाहर निकले तथा कुछ आधुनिक होने लगे अन्यथा रिलीजन वालों का उस से पूर्व के लगभग 17-अठारह सौ वर्ष कितना भयंकर कुत्सित एवं क्रूर रूप था, इस का अनुमान आज के आतंकी को देख कर भी आप नहीं लगा सकते। एकदम जंगली, नृशंस और हत्यारा समाज था।
केवल स्त्रियों के प्रति सभी प्रकार के आत्यन्तिक अमानुषिक व्यवहार की ही परत खोलें तो उस समाज की पारिवारिक व पंथानुगत संरचना का कलुषित रूप देखा–सोचा न जा सकेगा। साईंस इसीलिए रिलीजन की शत्रु बनी। उन आत्यन्तिक अमानुषिक कदाचारों व नृशंसताओं के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के चलते तुलनात्मक सन्दर्भों में उस क्रूर काल के घटनाक्रम को पितृसत्तात्मकता के रूप में परिभाषित किया गया। वह अपने समाज पर उन के अपनों का दोषारोपण था।
दुर्भाग्यवश भारत के कुपढ़ों ने, जिन्हें इस पश्चिमी समाज की तत्कालीन संरचना, इतिहास व वास्तविकता का रञ्चमात्र भी अनुमान नहीं, पता होना तो दूर; उन्होंने यहाँ के वर्तमान से सारे आरोप अपने समाज पर आरोपित कर लिए, यहाँ पश्चिम के आयातित विमर्शों, चिन्तन, मुद्दों, बहसों को ज्यों-का-त्यों अपना बना-कह-समझ-लिख कर । इस से बड़ा, क्रूर विद्रूप कोई अन्य नहीं हो सकता था।
जिन मूर्खों को यहाँ के घटनाक्रम, इतिहास, संरचना, समाज का आभास तक नहीं था, वे अपने अन्धे दीदों के मारे अपना अभिशाप समूची भारतीय संस्कृति के मत्थे मढ़ झूठे गवेषक बन गए। और कई भारतीय पीढ़ियाँ अभिशप्त रही हैं इस तथाकथित गवेषणा को ढो अपनी पीठ रक्तिम करते। पितृसत्तात्मक क्रूरता पश्चिम के समाज का इतिहास व अभिशाप थी।
यदि भारतीय इतिहास को ठीक से पढ़ा-जाना होता, और पश्चिमी समाज के इतिहास की वास्तविकता का किञ्चित भी आभास होता तब तो कोई समझ पाता कि रजकण की सूर्य किरण से क्या तुलना ? किन्तु भारतीय समाज के साथ अपने अज्ञान और धूर्ततावश किए इस दुराचार को करने वालों ने जो जघन्य अपराध किया है, उस की गम्भीरता का 1% भी अनुमान आज संस्कृति- संस्कृति चिल्लाने वाले तथाकथित पढ़े-लिखों तक को नहीं है।
हतभागी हैं ये सब पीढ़ियाँ और हतभागी है हमारा क्रीत समाज। ऐसा भयंकर पाप किया गया है। और ऐसा करने वाले अभी चुके नहीं हैं, वे निरन्तर अजस्र उन्हीं स्खलनों में स्वयं भी रत हैं और अन्यों को स्खलित करने की कुचेष्टाओं में भी निमग्न।
इधर भारतीय समाज है कि उसे इस लूट व कदाचार का कोई अनुमान ही नहीं, वह जरा-सी राजनैतिक जीत को ही अपनी परम संतुष्टि का माध्यम व ध्येय मान लेता है, या जरा-सी छुटपुट गति बढ़ने को अपनी परम विजय। ऐसे लोगों का यह जानना अत्यावश्यक है कि आप देश व संस्कृति के साथ खड़े हैं तो यह युद्ध तो अभी पूरा शेष है। युद्ध क्षेत्र में अभी तो आप पूरे डटे तक नहीं हैं। युद्ध अभी शेष हैं, विजय तो उस के बहुत बाद होगी और विजय के बहुत पश्चात् फिर ध्वंस का अनुमान लगाया जाना होगा; तब कहीं जा कर पुनर्निर्माण के कार्यों की नींव रखी जा सकेगी।
इतना धैर्य है न ? नहीं है तो सीखिए अन्यथा विश्व में अन्य कोई शक्ति नहीं है जो उस वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर को खोज या बचा सके। वह धरोहर विलुप्ति की सीमा पर है और विश्व इतिहास आप को व हमें कभी क्षमा नहीं करेगा, किञ्चित नहीं, कदापि नहीं।
© -
कविता वाचक्नवी
सोमवार, 4 सितंबर 2017
अमेरिका : डूब-उबरने के दिन
बुधवार, 15 फ़रवरी 2017
स्त्रीविमर्श स्त्री को शोषण का अधिकार देने/दिलवाने का अभियान नहीं है : कविता वाचक्नवी
- Kavita Vachaknavee
शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017
महिलाओं के दोष
वस्तुतः महिलाओं को दोष देने की यह प्रवृत्ति पुरुषवादी सोच का परिणाम है। अतः इसीलिए मेरा विरोध पुरुषों से नहीं अपितु पुरुषवादी सोच से है, चाहे वह स्त्रियों में हो या पुरुषों में। अधिकाँश स्त्रियों की कंडीशनिंग ही ऐसी होती है।उक्त महिला की माओं को कटघरे में खड़ी करने वाली प्रारम्भ में लिखी बात पर, मेरी दो-तीन आपत्तियाँ हैं, वे संक्षेप में इस प्रकार समझी जा सकती हैं।
शुक्रवार, 11 नवंबर 2016
अमेरिका में उग्र विरोधप्रदर्शन क्यों
मंगलवार, 6 सितंबर 2016
गगन गिल और अनिल जनविजय विवाद : कीचड़उछाल का खेल
गुरुवार, 1 सितंबर 2016
जूते वर्जित क्यों हैं
दक्षिण-भारत में रहने वाले जानते हैं कि वहाँ लोग अपने व दूसरों के घरों के भीतर भी जूते नहीं ले कर जाते हैं। यदि पहनने ही हों तो घर के जूते अलग होते हैं जिन्हें भीतर ही पहना जाता है। इसके पीछे कारण यह है कि बाहर पहने जाने वाले जूतों में मल, मूत्र, थूक और इस बहाने जाने किस किस बीमारी के बैक्टीरिया घर व भवन के भीतर प्रवेश कर जाते हैं और अंदर / भीतर पनपने लगते हैं। खुले वातावरण में धूप आदि रहती है तो कुछ कीटाणु नष्ट भी होते हैं और खुले में अंकुश रखा भी नहीं जा सकता, सिवाय लोगों को यह समझाने के कि जगह जगह थूको / मूतो आदि मत / कूड़ा कबाड़ा न फेंको और न सड़ने दो। किन्तु घरों के भीतर छाया व बंद होने के कारण ऐसे कीटाणु दिन दूनी गति से पनपते हैं और बीमारियाँ फैलाते हैं। ऐसे में घरों की साफ सफाई दिन-भर / बार-बार / हर-बार करते रहना गृहिणी के लिए संभव ही नहीं होता। अतः सभी सामाजिक सदस्य अपने उत्तरदायित्व को समझ कर बाहर की गंदगी के संपर्क में आए जूते बाहर ही छोड़ देते हैं, बहुधा परिवारों में तो शौचालय के जूते भी अलग होते हैं। इसके पीछे बड़ा वैज्ञानिक रहस्य है कोई कठमुल्लापन नहीं। जिन स्थानों को हम शुद्ध देखना चाहते हैं, वहाँ ऐसा करते हैं। जापान में आज भी ऐसा ही होता है। शुक्रवार, 24 जून 2016
ब्रिटेन का भविष्य अब संसद (सांसत) में !
ध्यातव्य है कि यह सारा खेल अति-उदारवादी विचारधारा के गर्भ से जन्मा और उसी की प्रचण्ड प्रतिक्रिया है। इसका सीधा प्रभाव अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव पर भी पड़ेगा।
भारत इस से कुछ संकेत ग्रहण कर सके तो हितकर होगा।
#KavitaVachaknavee #Brexit #UK
गुरुवार, 19 मई 2016
चुनाव-परिणामों के बाद कुछ बातें भाजपा से
शुक्रवार, 6 मई 2016
मेरे चरणचिह्न काजल-सिक्त
मैं ही राष्ट्र हूँ, मैं ही भारत,
मैं ही लोकतन्त्र
मैं ही मैं काँग्रेस हूँ
और केवल एकमात्र मैं ही मैं समूचा राज-वंश भी।
मेरे ख़तरे में पड़ते ही राष्ट्र खतरे में
मेरे खतरे में ही आते ही लोकतन्त्र चिरनिद्रा में
मुझ पर ख़तरा आते ही काँग्रेस पर आक्रमण
मेरे रँगे हाथ पकड़े जाने की आशंका ही राज-वंश का अस्तित्व मिटाने की साजिश;
मेरा विस्तार अपरिमित है
मेरे रूप और महिमा अपार
देश को धू धू जलाने की युक्तियाँ अपरम्पार
वंश और परिवारियों समेत सबके
भूमिसमाधि ले चुके रहस्यों वाले महाप्रस्थान के बावजूद
मैं कालजयी हूँ रक्तजायों सहित,
मेरे डैने सर्वग्रासी हैं
मेरी छाया देश की जड़ों को गला देने वाली
वंश की देहरी पर मेरे चरणचिह्न काजल-सिक्त
मेरे जिह्वा-गह्वर के अतल में, हे 'नर-पुंगव' ! ब्रह्माण्ड घूमता है
घूम जाएगा तुम्हारा मस्तिष्क भी
घुमाने के खेल युगाब्द से मेरा ही एकाधिकार हैं
By #KavitaVachaknavee
(यह कविता नहीं है)
गुरुवार, 7 अप्रैल 2016
वैदिक नववर्ष मंगलमय व शुभकारी हो : कविता वाचक्नवी
शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015
यौवन ऐसा भी ....
वह बच्चा जूते पहनते समय बहुत प्रसन्न था और हँस भी रहा था तो मेरे बेटे ने उसके दो चित्र भी लिए और वहाँ से अपने कक्ष पर लौट कर फिर यह सारी घटना तुरन्त वाट्सएप पर हमें लिख कर बताई व चित्र भी भेजे।
और हाँ, चलते-चलते अन्तिम बात सुपुत्र ने ज़ोर देकर महिला से कही -
यह जोड़ना चाहूँगी कि सबसे कनिष्ठ मेरा बेटा लगभग 24 वर्ष का है और यह वही बेटा है जो दिसम्बर में मध्य रात्रि को एक अनजान युवती की सुरक्षा की भावना से उसे नगर सीमा से भी 20 किलोमीटर बाहर उसके घर तक पहुँचाने गया था, जिसे मैंने 22 दिसम्बर को विस्तार लिखा भी था, वह घटना तो काफी रोमांचक भी थी क्योंकि उसमें बड़ा खतरा भी था। उसे यहाँ पढ़ा जा सकता है-https://www.facebook.com/kvachaknavee/posts/10153151019579523
मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015
भाषा और 'एक्स्पायरी डेट'
#भाषा-प्रयोग का एक #मनोरंजक उदाहरण आज आपसे बाँटती हूँ।
भारत में हम लोगों को अभ्यास होता है कि किसी की मृत्यु के विषय में बात करते हुए हम
- - 'उसके पिताजी एक्सपायर हो गए थे'
- - 'उसकी माता जी/बहन/पत्नी/पति/मित्र आदि को एक्सपायर हुए तो कई साल हो गए'
- - वह छुट्टी गया है, उसकी माता जी एक्सपायर हो गईं
- - रोड एक्सीडेंट में एक्सपायर हुए उसके भाई भाभी ...
कई बरस पहले जब मैंने यहाँ ब्रिटेन में एक प्रसंग में किसी से अंग्रेजी में आदतवश कहा कि 'मेरी माँ एक एक्सीडेंट में कई बरस पहले एक्सपायर हो गईं थीं' तो उसके चेहरे की रंगत और हाव-भाव बहुत ही अजीब-से थे, मानो वह कुछ समझा ही नहीं। मेरे बच्चों ने तब उसे समझाया कि वस्तुतः मैं कहना चाहती हूँ कि मेरी माँ की मृत्यु कई बरस पहले एक दुर्घना में हो गई थी।
बाद में बच्चों ने मुझे समझाया कि, माँ ! एक्सपायर होने की क्रिया / प्रक्रिया वस्तुओं व पदार्थों की होती है, माँ या कोई भी व्यक्ति पासपोर्ट, ऑफिस कार्ड, कॉलेज कार्ड, दवा या अचार या खाद्य पदार्थ नहीं होता कि उसकी कोई 'एक्स्पायरी डेट' हो और वह उस तिथि के बाद 'एक्सपायर' हो जाए। व्यक्तियों के लिए मृत्यु के वाचक शब्दों जैसे Death, Died, No more इत्यादि का प्रसंगानुसार व वाक्यरचनानुसार प्रयोग किया जाता है।
यद्यपि अब मैं सचेत रहती हूँ किन्तु अपनी भारतीय आदत से अभी भी पूरी तरह पीछा नहीं छुड़ा पाई और आज ही डॉक्टर द्वारा मेरी माँ के बारे में एक प्रश्न पूछने पर 'शी एक्स्पायर्ड इन हर अर्ली ट्वेंटी प्लस' जैसा वाक्य निकल गया तो डॉक्टर को चौंक कर कहना पड़ा कि "मैं आपकी माँ के विषय में पूछ रही हूँ"। तब मुझे अपनी गलती का भान हुआ ।
आप लोग भी इसे पढ़ने के बाद शायद भविष्य में व्यक्ति की मृत्यु के साथ 'एक्सपायर' शब्द का प्रयोग करते समय अवश्य एक बार ठिठकेंगे, यह सोच कर कि व्यक्ति कोई दवा या खाद्य पदार्थ है क्या कि जो उसकी 'एक्स्पायरी' होती है।#KavitaVachaknavee
इस लेख पर विचार-विमर्श और विचारोत्तेजक प्रतिक्रियाएँ पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें ।
गुरुवार, 27 नवंबर 2014
जसोदाबेन का पत्नीत्व
मैं स्त्रियों व उनके अधिकारों की समर्थक हूँ किन्तु स्त्रियों को आगे कर उनके नाम पर अपना मंतव्य सीधा करने वालों व उनकी महत्वाकांक्षाओं की नहीं और उन स्त्रियों की भी नहीं जो ऐसा करती या माध्यम बनती हैं।
एक मनुष्य होने के नाते जसोदाबेन के प्रति पूरा सम्मान है और उनके मौलिक अधिकारों के प्रति भी। वे एक साधारण स्त्री हैं और शांति से जी रही थीं, किन्तु बदमाश मीडिया और विरोधी पार्टियों के हाथ एक अस्त्र लग गया है और इस तरह वे उन्हें इस्तेमाल करते हुए उनकी शांति भंग कर रहे हैं। एक साधारण सामान्य ढंग से जीने वाली स्त्री को शांति से जीने दे लेना चाहिए। भगवान के लिए उन्हें शांति से जीने दो।
------------------------------------------------------------------------------
जिन्हें पति पत्नी सम्बन्धों के चलते सहानुभूति हैं, वे डॉ दीप्ति की 24 मई की निम्नलिखित स्टेटस व वहाँ चली परिचर्चा को ध्यान से पढ़ें। यहाँ पर अपनी टिप्पणियों में मैंने कुतर्कों के उत्तर दे ही दिए हैं।
पहले दीप्ति जी की यह प्रतिक्रिया व स्टेटस -
डॉ. दीप्ति भारद्वाज says
May 24 ·मोदी जी , ये कैसी महत्वाकांक्षा -------
क्यों हर बार रामराज्य की स्थापना के लिए सीता की ही अग्नि परीक्षा होती है ? क्यो सीता ही वनवास भोगे ? क्यों पुरुष की अतिशय महत्वाकांक्षा स्त्री के अस्तित्व को नकारती है ? क्यों हर बार स्त्री का ही बलिदान क्यों ? कृष्ण को द्वारिका बसाने के लिए रुक्मिणी को साथ लेना पड़ा था।
मोदी जी ये जीत तब तक अधूरी है जब तक आप अपनी अर्धागिनी को उचित सम्मान नही देते ? मोदी जी हर माँ आप जैसे पुत्र की कामना करेगी पर हर स्त्री आपसे डरेगी। आपने भारत के लिये जो साधना की वो तब तक बेमानी है जब तक उस साधना की मौन साधिका जसोदाबेन को उनका मान न मिले। आपने जो किया वह दुनिया ने देखा लेकिन. उसके लिए किसी स्त्री ने अपने सपनों और आकाँक्षाओ की बलि दी। भरी जवानी में खण्डित दाम्पत्य को जिया। फिर भी आपके लिए मंगलकामनाए कीं ।
क्या माँ की तरह ही उस मौन साधिका को प्रधानमंत्री बने पति से मिलना नही चाहिये ।
मोदी जी आपकी ये जीत स्त्री की एकान्तिक साधना के सहयोग से सम्भव हो सकी । कितनी पीड़ा झेली है जसोदाबेन ने जब लोग उन्हें दयाभाव से देखते रहे होंगे । कितना कष्ट रहा होगा उन्हें जब सब होते हुए भी कुछ नही के दंश को पीया होगा।
मोदी जी कभी बचपन में ये भजन सुना था आज आपको सुनाती हूँ -
कान्हा रे तू राधा बन जा भूल पुरुष का मान
तब होगा तुझको राधा की पीड़ा का अनुमान ।
मैं तो पूरी खुशी नही मना पा रही ।
Like · · ShareManisha Jain, Manika Mohini, Suraj Kumar and 46 others like this.11 shares






