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मंगलवार, 10 जनवरी 2023

भारत की राजभाषा के चयन का इतिहास

भारत की राजभाषा के चयन का इतिहास : © (डॉ.) कविता वाचक्नवी


आप में से बहुत काम लोग जानते होंगे कि भारत की राजभाषा क्या हो,  इस के लिए संविधान समिति और संसद के समक्ष  जब विचार प्रारम्भ हुआ तो संस्कृत को ही राजभाषा बनाने का प्रस्ताव सब से मुख्य था। यह कोई किंवदन्ती अथवा अपवाद नहीं, अपितु सत्य है। स्वयं मेरे पिता श्री इस का प्रमाण हैं, जिन से हम इसे गत 55 वर्ष से सुनते आए हैं। तत्कालीन रेडियो /समाचारों आदि के द्वारा इस तथ्य से देशवासी भली प्रकार परिचित करवाए गए थे। पूरा प्रकरण यह है कि अधिकांश नेता, संविधान-समिति के सदस्य और सांसद संस्कृत को ही भारत की राजभाषा बनाए जाने के के पक्ष में थे। यहाँ तक कि समाचार पत्रों आदि में घोषणा भी हो गई थी कि भारत की राजभाषा संस्कृत होगी; क्योंकि संस्कृत को राजभाषा बनाने के प्रस्तावकों में स्वयं संविधान समिति से अम्बेडकर भी सम्मिलित थे। 

यदि अम्बेडकर तथा उन सब की बात मान ली गई होती तो आज संस्कृत ही भारत की राजभाषा होती। 

उत्तर भारत के कुछ राज्यों के अतिरिक्त देश के समस्त राज्य संस्कृत ही के पक्ष में थे। उत्तर भारत के कुछ लोग जब संस्कृत के विरोध में उतरे, तो संसद में राजभाषा के निर्णय हेतु मतगणना करवानी पड़ी, जिस में संस्कृत तथा हिन्दी को एक समान मत पड़े। भाषा के प्रश्न पर जब संसद दो फोड़ होती दिखी तो उबारने के लिए ऐसी स्थिति में केवल एक मत से हिन्दी को जिताया गया, और वह एक निर्णायक मत था राष्ट्रपति स्व. राजेन्द्र प्रसाद जी का। 

 इस घटना ने दक्षिण भारतीयों के मन में हिन्दी विरोध का बीज बोने का काम किया.. जिस का परिणाम हम सब अब तक देखते आ रहे हैं। दो भारतीय भाषाओं की लड़ाई दो बिल्लियों की लड़ाई हो चुकी है; जिस में लाभ बन्दर को ही हुआ था। दो भारतीय भाषाओं की लड़ाई का लाभ अंग्रेजी को मिला, मिलता आया है।

संलग्न चित्र में समेकित तत्कालीन समाचार-पत्रों की कतरनों के माध्यम से इस तथ्य के प्रमाण देखे जा सकते हैं - 

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शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

हिन्दी के मरण के वाचाल और मूक साक्षी

 हिन्दी के मरण के वाचाल और मूक साक्षी  : कविता वाचक्नवी 





लन्दन के एक प्रतिष्ठित संस्थान ने उनके यहाँ #हिन्दी अध्यापन के लिए अपनी पहल पर मुझे एक लिखित प्रस्ताव गत दिनों भेजा है। मना करने का इतना दुःख नहीं है जितना उनकी इस बात पर चुप रह जाने का कि कोई और मातृभाषा हिन्दी का, अध्यापन अनुभव वाला तथा न्यूनतम मास्टर्ज़, पीएचडी योग्यता का सुयोग्य पात्र उन्हें सुझाऊँ।

जिन्हें हिन्दी को लेकर बहुत से भ्रम हैं , उनकी जानकारी के लिए बता दूँ कि हिन्दी की स्थिति अब लगभग 'बोली' हो चुकने की हो गयी है। सामान्य व प्रबुद्ध जन तो क्या, इस भाषा के लेखक तक अकादमिक विषयों से अछूते हैं। क्योंकि किसी भी भाषा को जीवित रहने में सहायक होते हैं उसमें व्यक्त-निहित 'विचार', किस्से-कहानी नहीं और उस भाषा में दिए जाने जाने वाले ईनाम-इकराम नहीं और उनकी ओर दौड़ने में सब कुछ तबाह कर देने वाली अन्धी भीड़ नहीं।

आप यदि यूनेस्को द्वारा जारी बची रह जाने वाली भाषाओं की सूची में हिन्दी का नाम देखकर निश्चिन्त हैं अथवा उसकी विश्व की भाषा-सूचियों में आगे-पीछे सरकता हिन्दी का नाम देखकर प्रसन्न हैं, तो आप किसी बहुत बड़े भ्रम, धोखे और नासमझी में हैं। आप गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, या सोशल मिडिया पर हिन्दी के टूल्ज़ और उनकी चर्चा से आह्लादित और कृतकार्य अनुभव करते हैं तो आपसे बड़ा चार्वाकी और कोई नहीं। आप विदेशों में मुट्ठीभर लेखकों द्वारा अपनी अभिव्यक्ति के लिए हिन्दी को प्रयोग होता देख सीना फुलाते अथवा नतमस्तक होते हैं तो आप पर हँसना तक व्यर्थ है। क्योंकि आप को पता होना चाहिए कि लन्दन के संस्कृत स्कूल में कोई भारतीय नहीं जाता, ब्रिटेन में हिन्दी पढ़ने की सारी व्यवस्थाओं में से भारतीय नदारद हैं। अमेरिका के जिस नगर में मैं रहती हूँ उसमें न्यूयॉर्क से इतर सर्वाधिक भारतीय रहते हैं, यह स्वयं में लघु-भारत ही है किन्तु हिन्दी के अकादमिक अध्ययन की विद्यालय और विश्व विद्यालयीय व्यवस्थाओं में से भारतीय लगभग गायब हैं। पूरे अमेरिका की लगभग यही स्थिति है।

विश्वभर का भारतीय और भारतवंशी समाज इस भाषा में अवमिश्रण आदि के साथ बोल सकने की कामचलाऊ योग्यता अर्जित करने की स्थिति से बहुत सन्तुष्ट और निश्चिन्त है। जिस भाषा के उच्चरित भाषा रूपों से उसका अपना समाज सन्तुष्ट हो जाता है और किसी प्रकार के योगदान व श्रम से किनारा कर लेता है और प्रशासन तथा तन्त्र पर सब आरोप मढ़ता है, उस भाषा का अन्त सुनिश्चित है। इसलिए यह तय मानिए कि हिन्दी आगामी सौ वर्ष भी जीवित रह पाई, इसकी सम्भावना अत्यल्प है। #संस्कृत की स्थिति को देखकर किसी भ्रम में न रहें, हिन्दी न तो संस्कृत है, न ही कभी उतनी समृद्ध हो सकी, आगे तो कभी अब हो भी नहीं सकती।


The bottom line is that if there is only one person left who speaks the language as their native tongue and fluently, then the language has died. It doesn’t matter if there are still other members of the community that understand the language or maybe speak a little bit of it. Even if there are elders in the community who refuse to teach their native tongue to the younger generation, the language is doomed as it won’t survive to be passed on to a new generation as a native language.

आइये हम सब 10 जनवरी को मनाए विश्वहिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी के इस मरण के साक्षी बनें और उसकी चिता में कुछ समिधाएँ रख सकने लायक नाता इस से बनाए रख सकें।



मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

भाषा और 'एक्स्पायरी डेट'

भाषा और 'एक्स्पायरी डेट' : कविता वाचक्नवी


‪#‎भाषा‬-प्रयोग का एक ‪#‎मनोरंजक‬ उदाहरण आज आपसे बाँटती हूँ।
भारत में हम लोगों को अभ्यास होता है कि किसी की मृत्यु के विषय में बात करते हुए हम

  • - 'उसके पिताजी एक्सपायर हो गए थे' 
  • - 'उसकी माता जी/बहन/पत्नी/पति/मित्र आदि को एक्सपायर हुए तो कई साल हो गए'
  • - वह छुट्टी गया है, उसकी माता जी एक्सपायर हो गईं
  • - रोड एक्सीडेंट में एक्सपायर हुए उसके भाई भाभी ... 
आदि वाक्य सामान्यतः बोलते हैं। अर्थात् मृत्यु के लिए 'एक्सपायर होना' क्रिया का प्रयोग करते हैं।

कई बरस पहले जब मैंने यहाँ ब्रिटेन में एक प्रसंग में किसी से अंग्रेजी में आदतवश कहा कि 'मेरी माँ एक एक्सीडेंट में कई बरस पहले एक्सपायर हो गईं थीं' तो उसके चेहरे की रंगत और हाव-भाव बहुत ही अजीब-से थे, मानो वह कुछ समझा ही नहीं। मेरे बच्चों ने तब उसे समझाया कि वस्तुतः मैं कहना चाहती हूँ कि मेरी माँ की मृत्यु कई बरस पहले एक दुर्घना में हो गई थी।

बाद में बच्चों ने मुझे समझाया कि, माँ ! एक्सपायर होने की क्रिया / प्रक्रिया वस्तुओं व पदार्थों की होती है, माँ या कोई भी व्यक्ति पासपोर्ट, ऑफिस कार्ड, कॉलेज कार्ड, दवा या अचार या खाद्य पदार्थ नहीं होता कि उसकी कोई 'एक्स्पायरी डेट' हो और वह उस तिथि के बाद 'एक्सपायर' हो जाए। व्यक्तियों के लिए मृत्यु के वाचक शब्दों जैसे Death, Died, No more इत्यादि का प्रसंगानुसार व वाक्यरचनानुसार प्रयोग किया जाता है।

यद्यपि अब मैं सचेत रहती हूँ किन्तु अपनी भारतीय आदत से अभी भी पूरी तरह पीछा नहीं छुड़ा पाई और आज ही डॉक्टर द्वारा मेरी माँ के बारे में एक प्रश्न पूछने पर 'शी एक्स्पायर्ड इन हर अर्ली ट्वेंटी प्लस' जैसा वाक्य निकल गया तो डॉक्टर को चौंक कर कहना पड़ा कि "मैं आपकी माँ के विषय में पूछ रही हूँ"। तब मुझे अपनी गलती का भान हुआ ।

आप लोग भी इसे पढ़ने के बाद शायद भविष्य में व्यक्ति की मृत्यु के साथ 'एक्सपायर' शब्द का प्रयोग करते समय अवश्य एक बार ठिठकेंगे, यह सोच कर कि व्यक्ति कोई दवा या खाद्य पदार्थ है क्या कि जो उसकी 'एक्स्पायरी' होती है।‪#‎KavitaVachaknavee‬

 इस लेख पर विचार-विमर्श और विचारोत्तेजक प्रतिक्रियाएँ पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें  ।


शनिवार, 1 मार्च 2014

ज्ञान का एक दुर्लभ खज़ाना ऑनलाईन : कविता वाचक्नवी

ज्ञान का एक दुर्लभ खज़ाना ऑनलाईन : कविता वाचक्नवी


पूर्व राष्ट्रपति ए.पी. जे. अब्दुल कलाम के अथक प्रयासों से प्रारम्भ की गई परियोजना Digital Library of India का मूर्त रूप आज भारतीय ऐतिहासिक पुस्तकों और पत्रिकाओं के एक ऐसे विशाल संग्रह का नाम बन चुका है, जिसमें आप एक बार जाने के पश्चात जाने कितने घंटे, दिन, माह और बरस बिताना पसंद करेंगे| यहाँ विभिन्न भाषाओं की दुर्लभ पुस्तकें और पत्रिकाएँ आपको मिल सकती हैं जो आप को किसी पुस्तकालय तक में धक्के खाने और भटकते खोजने पर भी संभवतः ना मिलें|


भाषा / वर्ष / विषय / अनुक्रम का चयन कर आप वहाँ डाऊनलोड के लिए उपलब्ध रीडर द्वारा इन पुस्तकों/ पत्रिकाओं को ऑनलाईन इनके मूल रूप में पढ़ सकते हैं|

लाखों पृष्ठों में समाहित यह एक ऐसा ऐतिहासिक संग्रह और कार्य है कि जाने आने वाली कितनी पीढियाँ इस से लाभान्वित और गौरवान्वित होंगी| पुनरपि अभी बहुत कार्य शेष है और निरंतर प्रगति पर है|

आप इस लिंक को अवश्य बुकमार्क कर लें व सहेज कर रख लें| नीचे इस परियोजना में सहायक और संलग्न संस्थाओं की सूची दी गई है -

Partners : India :
Coordination and Research Centre in India : Indian Institute of Science, Bangalore

Academic Institutions 
  • Anna University, Chennai, Tamil Nadu 
  • Arulmigu Kalasligam College of Engineering (AKCE), Srivilliputur, Madurai, Tamil Nadu 
  • Goa University, Goa 
  • Indian Institute of Astrophysics, Bangalore,Karnataka 
  • Indian Institute of Information Technology, Allahabad, Uttar Pradesh 
  • International Institute of Information Technology, Hyderabad, Andhra Pradesh 
  • Osmania University, Hyderabad 
  • Punjab Technical University, Punjab 
  • Shanmugha Art, Science, Technology & Research Academy, Tanjavur, Tamil Nadu 
  • University Of Hyderabad, Hyderabad 
  • University of Pune, Pune, Maharashtra 
Religious and Cultural Institutions 
  • Kanchi University, Kanchi, Tamil Nadu 
  • Poornapragna Vidyapeetha, Bangalore 
  • Salarjung Museum, Hyderabad 
  • Sringeri Mutt, Sringeri, Karnataka 
  • Tirumala Tirupati Devasthanams, Tirupati, Andhra Pradesh 
  • Tibetan Monasteries and Literature on Jainism
Government and Research Agencies 
  • Academy of Sanskrit Research , Melkote, Karnataka 
  • CDAC- Noida 
  • Indian Institute of Astrophysics, Bangalore,Karnataka 
  • Maharashtra Industrial Development Corporation (MIDC), Mumbai, Maharashtra 
  • Rashtrapathi Bhavan, New Delhi 
United States of America
  • Carnegie Mellon University
China 
  • Beijing University 
  • Chinese Academy of Science 
  • Fudan University 
  • Ministry of Education of China 
  • Nanjing University 
  • State Planning Commission of China 
  • Tsinghua University 
  • Zhejiang University 

इसके अतिरिक्त मैसूर विश्व विद्यालय ने अपना पूरा पुस्तकालय डिजिटलाईज़ करवा लिया हुआ है। 

हिन्दी पुस्तकों की दृष्टि से वर्धा विश्वविद्यालय का हिन्दी समय तो नवीन स्रोत है ही, इसके अतिरिक्त 'होमी भाभा विज्ञान शिक्षा केन्द्र' भी पठनीय है। 

कुछ अन्य स्थल ये भी हैं - 

नेशनल लायब्रेरी नाम की इस राजकीय परियोजना को भी देखा जा सकता है - 


इस नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी लिंक को देखना भी प्रासंगिक होगा - 


NCERT की हिन्दी पुस्तकें भी ऑनलाईन उपलब्ध हैं - 


कई लोगों ने निजी तौर पर भी बहुत बढ़िया प्रयास किए हैं जिनमें यह प्रमुख है 'अपनी हिन्दी' - http://www.apnihindi.com/


और तो और, मोबाईल के लिए ऑनलाईन हिन्दी पुस्तकालय भी उपलब्ध है, जिसका उपयोग मैं यात्रा आदि में नियमित पढ़ने के लिए करती हूँ। एण्ड्ररॉयड के लिए यह एप्लीकेशन यहाँ उपलब्ध है - 

कुछ दुर्लभ हिन्दी पुस्तकें यहाँ भी -

मंगलवार, 26 मार्च 2013

भारतीय उच्चायोग, लन्दन द्वारा “सम्मान-समारोह" संपन्न

भारतीय उच्चायोग, लन्दन द्वारा “सम्मान-समारोह" संपन्नडॉ.कविता वाचक्नवी को ‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान’ प्रदत्त

लन्दन स्थित भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान प्राप्त करते हुए डॉ. कविता वाचक्नवी.

ब्रिटेन के विभिन्न नगरों से आए लेखक, पत्रकार तथा कला एवं साहित्य क्षेत्र के प्रतिष्ठित अतिथिगण. 


डॉ. कविता वाचक्नवी को प्रदत्त स्मृतिचिह्न और प्रशस्तिपत्र

 डॉ. कविता वाचक्नवी को  स्मृतिचिह्न भेंट करते हुए भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती. 

 “जॉन गिलक्रिस्ट हिन्दी शिक्षण सम्मान” प्राप्त करते हुए प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा

डॉ. कविता वाचक्नवी को प्रदत्त प्रशस्ति-पत्र

भारतीय उच्चायोग, लंदन द्वारा
“ सम्मान-समारोह"
सम्पन्न 
24 मार्च 2013

भारतीय जीवन मूल्यों के वैश्विक प्रचार-प्रसार की संस्था “विश्वम्भरा” की संस्थापक-महासचिव डॉ.कविता वाचक्नवी को विश्व हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में भारतीय उच्चायोग, लंदन द्वारा इण्डिया हाउस में आयोजित समारोह में “आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान” किया गया। इस अवसर पर भारत के उच्चायुक्त महामहिम डा. जे॰ भगवती ने उन्हें नकद राशि, स्मृति चिह्न, शॉल और प्रशस्ति पत्र प्रदान किए। उन्हें यह सम्मान मुख्यतः इन्टरनेट व प्रिंट मीडिया द्वारा भाषा, साहित्य, संस्कृति व पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया गया है.


उल्लेखनीय है कि अमृतसर में जन्मीं कविता वाचक्नवी समाज-भाषा-विज्ञान तथा काव्यसमीक्षा जैसे विषयों में 'दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद' से एमफिल और पीएचडी अर्जित करने के बाद सपरिवार लन्दन में रह रही हैं. भारतीय उच्चायोग द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि "आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान" ग्रहण करते हुए डॉ कविता वाचक्नवी ने अपने दादाश्री व पिताश्री का विशेष उल्लेख किया व लाहौर से हिमाचल और पंजाब तक उनके किए कार्यों व बलिदानों को उपस्थितों के साथ बाँटते हुए बताया कि कैसे हिन्दी सत्याग्रह में जेल में रहने से लेकर हिमाचल को हिन्दीभाषी राज्य का दर्जा दिलाने तक के लिए उनके परिवार ने कष्ट सहे। वाचक्नवी ने अपना सम्मान उन्हीं को समर्पित करते हुए कहा कि वे यह सम्मान उनके प्रतिनिधि के रूप में ग्रहण कर रही हैं। उन्होंने राजदूत व उच्चायोग से अनुरोध किया कि ब्रिटेन में भारतीय उच्चायोग की वेबसाईट को द्विभाषी बनाया जाना चाहिए व उसे अंग्रेजी के साथ साथ हिन्दी में भी उपलब्ध होना चाहिए।


विज्ञप्ति के अनुसार इस समारोह में दो अन्य विशिष्ट हिंदी सेवियों तथा एक हिंदी संस्था को भी सम्मान प्रदान किए गए. “जॉन गिलक्रिस्ट हिन्दी शिक्षण सम्मान” से यॉर्क विश्वविद्यालय के विख्यात भाषाविद प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा को तथा “डा॰ हरिवंश राय बच्चन हिन्दी साहित्य सम्मान” से बर्मिंघम के हिंदी लेखक डॉ॰ कृष्ण कुमार को सम्मानित किया गया जबकि नाटिङ्घम की संस्था “काव्य रंग” को “फ़्रेडरिक पिनकोट हिन्दी प्रचार सम्मान” प्रदान किया गया.


इस अवसर पर सम्मानितों को बधाई देते हुए सभा को संबोधित अपना वक्तव्य हिन्दी में देते हुए उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती ने कहा कि वे स्वयं असमिया भाषी होते हुए दिल्ली में रहने के कारण हिन्दी में व्यवहार करते रहे हैं व उनकी शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी रही है। उन्होने ज़ोर देकर कहा कि निजी रूप से वे त्रिभाषा नीति को भारत के लिए श्रेयस्कर समझते हैं। विश्व पटल पर भारत से बाहर के लोगों के लिए अंग्रेजी, समस्त भारतीय कार्यकलापों के लिए हिन्दी व अपनी मातृभाषा अथवा एक प्रांतीय भाषा प्रत्येक भारतीय को अवश्य सीखनी पढ़नी चाहिए। 


“जॉन गिलक्रिस्ट यू.के.हिन्दी शिक्षण सम्मान” स्वीकार करते हुए प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा ने अपने वक्तव्य में यॉर्क विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम हिन्दी अध्यापन प्रारम्भ होने सम्बन्धी अपने संस्मरण सुनाए और यूके में हिन्दी अध्यापन से जुड़ी स्थितियों का उल्लेख करते हुए 35 वर्ष के अध्यापन का उल्लेख किया। इसी प्रकार "डॉ. हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य सम्मान" ग्रहण करते हुए डॉ. कृष्ण कुमार ने भारत में संस्कृत, हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए भावपूर्ण अपील करते हुए चेतावनी दी कि ऐसा नहीं करने पर आने वाले दिनों में भारत को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।


समारोह में “डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी प्रकाशन अनुदान योजना” के अंतर्गत श्रीमती उषा वर्मा को उनकी पुस्तक 'सिम कार्ड तथा अन्य कहानियाँ’ और डा॰ कृष्ण कन्हैया को उनके काव्य संग्रह 'किताब जिंदगी की’ के प्रकाशन हेतु नकद राशि और मानपत्र दिया गया।


लंदन स्थित इंडिया हाउस में हुए इस पुरस्कार समारोह में उप उच्चायुक्त डॉ. वीरेंद्र पाल और उच्चायोग में मंत्री (समन्वय) एसएस सिद्धू भी उपस्थित थे। सिद्धू जी ने अपना स्वागत वक्तव्य हिन्दी में दिया व धन्यवाद वक्तव्य भी डॉ वीरेंद्र पॉल द्वारा हिन्दी में ही दिया गया। कार्यक्रम का संचालन उच्चायोग के हिन्दी व संस्कृति अताशे श्री बिनोद कुमार ने सफलतापूर्वक किया। ब्रिटेन के विभिन्न नगरों से आए लेखक, पत्रकार तथा कला एवं साहित्य क्षेत्र के भारतीय मूल के लोग बड़ी संख्या में समारोह में उपस्थित थे ।


चित्र परिचय –
  • 1. लन्दन स्थित भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान प्राप्त करते हुए डॉ. कविता वाचक्नवी.
  • 2. ब्रिटेन के विभिन्न नगरों से आए लेखक, पत्रकार तथा कला एवं साहित्य क्षेत्र के प्रतिष्ठित अतिथिगण.
  • 3. डॉ. कविता वाचक्नवी को प्रशस्तिपत्र और स्मृतिचिह्न भेंट करते हुए भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती.
  • 4. “जॉन गिलक्रिस्ट हिन्दी शिक्षण सम्मान” प्राप्त करते हुए प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा.


[प्रेषक – डॉ. ऋषभदेव शर्मा (संवीक्षक – ‘विश्वम्भरा’), प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, खैरताबाद, हैदराबाद-500004; मोबाइल – 08121435033]  

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

हमदर्द की हिन्दी

 हमदर्द की हिन्दी  :  कविता वाचक्नवी





अपनी भाषा के प्रति हमदर्दी दिखाने के नाम पर दूसरी भाषाओं का मखौल उड़ाना अत्यंत हास्यास्पद और लज्जाजनक काम है। हिन्दी के दिखावटी हमदर्दों में यह प्रवृत्ति बहुत आम है कि वे हिन्दी को श्रेष्ठ दिखाने के लिए अंग्रेजी का मखौल उड़ाते हैं। अंग्रेजी की शक्ति को कम करके आँकने से हिन्दी की श्रेष्ठता सिद्ध नहीं होती अपितु उल्टे इस से हम हिन्दी वाले और मूर्ख ही प्रमाणित होते हैं। 


आज ऐसी ही एक और घटना देखी जब एक व्यक्ति ने प्रश्न उछला - "अगर शुभ रात्रि "GOOD NIGHT" होता है तो शुभ दीपावली "GOOD DEEPAWALI" क्यों नहीं ? या अगर शुभ दीपावली "HAPPY DEEPAWALI" होता है तो शुभ रात्रि "HAPPY NIGHT" क्यों नहीं ?"


उस पर उत्तर देने वालों ने लिखा - (1) "Because ...English is a very Funnnny language :)" और किसी ने लिखा "Kyunki Engligh Koi language nhi hai....jabardasti hi language haii"


यदि किसी भाषा के दो अलग अलग शब्दों का अनुवाद कोई अन्य भाषा अपने एक ही शब्द से करती है तो यह अनुवाद करने वाले की गलती है। Good और Happy दो अलग-अलग शब्दों को यदि दूसरी भाषा वाले एक ही अर्थ दे रहे हैं तो यह मूल भाषा की गलती कैसे हो गई, यह या तो अनुवादकों की गलती है या उनकी सुविधा। 


हिन्दी के दो अलग अलग शब्दों को अंग्रेजी के किसी एक ही शब्द से अनूदित कर दिया जाए तो आपको कैसा लगेगा ? यह हमारी समस्या या सुविधा है कि हम Haapy, Merry और Good तीनों के लिए 'शुभ' ही अर्थ लगा रहे हैं। .... और मजे की बात यह कि लोग हिन्दी से हमदर्दी दिखाने के नाम पर अंग्रेजी का मखौल उड़ा रहे हैं। 


काश, इन्होंने संस्कृत पढ़ी होती तो भाषा के विकल्पों की जानकारी होती और अंग्रेजी के तीन अलग-अलग शब्दों के लिए कुछ अन्य पर्याय प्रयोग करना कम से कम जानते तो, और संस्कृत पढ़ी होती तो हिन्दी की शब्दावली में पर्यायों का अभाव है जैसा हिन्दी का मखौल भी न बनाते। फिर उसे जानने के बाद तो अंग्रेजी का यह मखौल बनाने का आधार ही समाप्त हो जाता। अस्तु ! 


कोई भी समझदार व्यक्ति अपनी भाषा की श्रेष्ठता दिखाने के लिए दूसरी भाषा का मखौल कभी नहीं उड़ाता। अंग्रेजी यदि हिन्दी की तुलना में कमतर है तो उसके पक्ष में यह बात हिन्दी वालों को नीचा दिखाने के लिए पर्याप्त है कि एक कमतर भाषा होने के बावजूद संसार के सारे अधुनातन ज्ञान-विज्ञान को वे अपनी भाषा में ले आए हैं, यह उस भाषा की शक्ति भी है कि वह उस सारे को अभिव्यक्त करने में समर्थ है। दूसरी ओर हम लोग आज तक अपने यहाँ के उच्चशिक्षा के पाठ्यक्रमों में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों तक को हिन्दी में नहीं ला सके हैं। कोई भी समझदार व्यक्ति दूसरी भाषाओं का बहिष्कार नहीं करता क्योंकि स्वयं में कोई भी भाषा निकृष्ट या हास्यास्पद नहीं होती है वह एक बड़े भाषासमाज के सम्प्रेषण का सशक्त माध्यम होती है। फिर किसी बड़े भाषासमाज की भाषा का मखौल उड़ाना तो वस्तुतः अपनी मूर्खता या उथलापन प्रमाणित करना होता है। 


आम तौर पर दिनों दिन अधिसंख्य लोगों के वैचारिक 'बरियर' और वैचारिकता के अभाव पर चकित रह जाना पड़ता है, इतना अधिक दिवालियापन है। इसका कारण उनकी जल्दबाज़ी नहीं लगता और न ही बोलने से पहले सोचना नहीं, अपितु सोचने की क्षमता और संस्कार कम होता जा रहा है, क्योंकि बहुसंख्य समाज अब पढ़ता नहीं। स्वाध्याय बहुत आवश्यक होता है। पाती हूँ कि ऐसे लोग बड़े बड़े पदों पर हैं और ऐसी मूर्खता के साथ। तिस पर ये पद उनके अहंकार में और वृद्धि करते हैं । एक तो अज्ञान के कारण थोथा अहंकार और ऊपर से पद का अहंकार। 


लोगों की दूसरी भाषाओं का अपमान करने की ऐसी मूर्खताओं के चलते ही भारत में हिन्दी के विरुद्ध वातावरण निर्मित होने में बड़ी भूमिका बनी। ऐसे लोग अंग्रेजी ही नहीं अपितु दक्षिण भारतीय भाषाओं या उत्तरपूर्व की भाषाओं का भी ऐसा ही अपमान करते चले आए हैं। जिसका परिणाम है कि भाषा के नाम पर देश बुरी तरह बंट चुका है और दूसरी भाषाओं के लोग भी इस कारण हिन्दी के विरोधी होते चले गए हैं। 

किसी ने सच ही कहा है कि "जो दूसरे की माँ का सम्‍मान नहीं कर सकता, वह अपनी माँ का सम्‍मान स्‍वयं ही नष्‍ट कर देता है..." 


हिन्दी से हमदर्दी दिखाने के दूसरे भी कई तरीके हैं, कई काम हैं। वैसे हिन्दी को ऐसी हास्यास्पद हमदर्दी की जरूरत भी नहीं है।


शनिवार, 21 जुलाई 2012

हिन्दी : सम्मेलन, सार्थकता और औचित्य

हिन्दी : सम्मेलन, सार्थकता और औचित्य 
- कविता वाचक्नवी




सितंबर में होने जा रहे "9वें विश्व हिन्दी सम्मेलन" की सार्थकता और औचित्य पर उठाए जाते प्रश्नों को पढ़ कर कुछ विचित्र-सा लगा कि मित्र लोग इसके आयोजन को लेकर हिन्दी के भले और बुरे की बात कर रहे हैं....  कि इस से हिन्दी का भला क्या भला होगा। 


किसी भी सम्मेलन से हिन्दी का या किसी और चीज का क्या भला होता है? किसी सम्मेलन आदि से कुछ नहीं। तब भी वे होते आए हैं। फिर हिन्दी के विश्व-सम्मेलन के औचित्य पर ही आपत्ति क्यों की जाए, उसे क्यों संदिग्ध बनाया जाए ?  मेरे जैसे हजारों लाखों लोगों के लिए दुनिया के किसी भी कोने में ऐसे कार्यक्रम का होना एक सात्विक गौरव की अनुभूति-भर है, संवेदना से जुड़ा हुआ। उसे काहे ध्वस्त किया जाए !  

जब देश और दुनिया में इतना कुछ निरर्थक हो रहा है .... तो कम से हिन्दी का नाम इस बहाने विश्वपटल या कुछ समाचारों में आ जाएगा, वहाँ की जनता के लिए एक ज्वलंत विषय के रूप में कौतूहलवश कुछ परिचय और जानने का अवसर देगा, वहाँ बसे हिन्दीभाषियों की आत्मीयता को कुछ विस्तार के अवसर देगा....  आदि-आदि कुछ तो चीजें हैं ही। इस बात पर प्रसन्न और संतुष्ट क्यों न हो लिया जाए ? 

सम्मेलन का इतना सुंदर,सार्थक और सर्जनात्मक `लोगो' चयनित किया गया है कि मैं तो बस मुग्ध हो गई।

 कुछ चीजें कई बार तर्क से परे रख दी जानी अच्छी लगती हैं, उनसे संवेदना जुड़ी होती है, परंपरा और इतिहास जुड़ा होता है;  जो मेरे जैसे अदना-से व्यक्ति को भी आत्मगौरव से भर देता है और इस बहाने कितने लोग बार-बार विश्व हिन्दी सम्मेलनों के इतिहास आदि से परिचित होंगे, यह भी ऐसे दुर्दिनों में कम है क्या ?


  मैं तो भाग न ले सकने की विवशता के बावजूद इस बात पर हर बार आह्लादित होती आई हूँ कि हिन्दी का एक विश्वस्तर का आयोजन कहीं हो रहा है । .... और अपने इस आह्लाद, आत्मगौरव, इतिहास /परंपरा से (भले ही मन ही मन ) जुडने के भाव में निमग्न रहना चाहती हूँ और इस बृहत घटना से आनंदित भी !!   :-)  और आप ? 



शनिवार, 16 जून 2012

"विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण : परिदृश्य' और "यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी 2012"

`यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी 2012' और ग्रंथ का प्रकाशन :  (डॉ.) कविता वाचक्नवी 



आज का सुप्रभात दरवाजे पर तेज खटखटाए जाने पर टूटी नींद से हुआ ।

 डाक में हिन्दी बुक सेंटर से अभी अभी कुछ ही दिन पूर्व प्रकाशित -  " विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण : परिदृश्य : संगोष्ठी समग्र "  ग्रंथ की लेखकीय प्रति मिली है। 

यह ग्रंथ प्रोफेसर श्रीश चंद्र जैसवाल जी के सम्पादन में छपा है और स्पेन के वय्यादोलिद विश्वविद्यालय में हुई यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी (15-17 मार्च 2012)    में  प्रस्तुत किए गए सभी शोध पत्रों का संकलन है। 

पूरा ग्रंथ आर्ट पेपर जैसे कागज़ पर छपा है। ग्रंथ के स्वत्वाधिकार हिन्दी विभाग, विदेश मंत्रालय के पास सुरक्षित हैं। 

कुल 32 आलेख इसमें संकलित हैं।  लेखों का क्रम सत्रवार रखा गया है।  
मेरे आलेख " भाषा प्रकार्यों के अधुनातन संदर्भ और हिन्दी " को पृष्ठ  46 से 51 पर पढ़ा जा सकता है।


प्रकाशक का पूरा पता है  -

हिन्दी बुक सेंटर 
4/5-बी, आसफ अली रोड, नई दिल्ली 110 002 


सम्मिलित लेखक हैं -

सर्वश्री


  • उदय नारायण सिंह (विश्वभारती शांति निकेतन )
  • अफजाल अहमद (Lisboa)
  • अलका आत्रेय चूडाल (ऑस्ट्रिया)
  • आलेसांद्रा कोंसोलारो (इटली)
  • यूस्तीना कुरोव्स्का (बॉन, जर्मनी)
  • महेंद्र किशोर वर्मा (यॉर्क)
  • रमेश चन्द्र शर्मा (बेल्जियम)
  • ऐश्वर्ज कुमार (केंब्रिज )
  • गेनादी श्लोम्पेर (इज़राईल)
  • हर्मन वान ऑल्फेन (अमेरिका)
  • कविता वाचक्नवी (लंदन )
  • अरुण प्रकाश मिश्रा (स्लोवेनिया)
  • बिलजाना ज़्रनिक (क्रोएशिया )
  • दानूता स्ताशिक (पोलैंड )
  • हैंज़ वेर्नर वैस्लर (उपासला, स्वीडन )
  • इंदिरा गाज़िएवा (मॉस्को)
  • लुदमीला खोखलोवा (मॉस्को)
  • सबीना पोपर्लान (बुखारेस्ट, रोमानिया )
  • विजया सती (बुदापैस्ट)
  • मोहन कान्त गौतम (नीदरलैंड)
  • जगन्नाथ वी. आर. (वर्धा )
  • वैश्ना नारंग (दिल्ली)
  • कैलाश नारायण तिवारी (पोलैंड )
  • नवीन चंद्र लोहानी (स्विट्जरलैंड)
  • एस. वी. एस. एस. नारायण राजू (बुल्गारिया)
  • तात्याना औरन्स्कया (हैम्बर्ग, जर्मनी)
  • शिव कुमार सिंह (लिस्बन, पुर्तगाल )
  • दीप्ति गोलानी (बार्सेलोना, स्पेन)
  • श्रीश चंद्र जैसवाल (वय्यादोलिद, स्पेन)
  • अशोक चक्रधर (दिल्ली)
  • विभूति नारायण राय (वर्धा)
  • पूनम जुनेजा (मॉरीशस)



स्पेन संगोष्ठी के बारे में अधिक जानने व चित्रों के लिए निम्नलिखित लिंक्स क्लिक कर देखें - 


योरोपीय हिन्दी कॉन्फ्रेंस 2012




यूरोपीय हिन्दी कॉन्फ्रेंस 2012, स्पेन से लौटकर 




यूरोपीय हिन्दी कॉन्फ्रेंस और स्पेन : जैसा मैंने देखा 




यूरोपीय हिंदी संगोष्ठी,स्पेन, 2012 :समग्र रिपोर्ट व विवरण









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