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शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

हिन्दी वॉयस टायपिंग व हिन्दी वॉयस सर्च/ हिन्दी-श्रुतलेखन अर्थात् जादू का पिटारा : कविता वाचक्नवी

हिन्दी वॉयस टायपिंग व हिन्दी वॉयस सर्च/ हिन्दी-श्रुतलेखन अर्थात् जादू का पिटारा  : कविता वाचक्नवी 




कल मैंने गूगल द्वारा हिन्दी में जारी श्रुतलेखन सुविधा की सूचना दी थी। यह सुविधा ने गूगल ने कई माह से उपलब्ध करवा रखी है। मैंने फ़ोन पर इसे स्थापित/सक्रिय भी किया हुआ था किन्तु प्रयोग नहीं किया था। इसी बीच मध्य अगस्त में जब गूगल ने वॉयस सर्च के लिए भी हिन्दी उच्चारण की सुविधा जारी की तो मित्रों से बातचीत करते हुए लम्बे लेख आदि लिखने के लिए पूर्व में ही जारी व अपने मोबाईल पर स्थापित की हुई इस सुविधा को सक्रिय करने का प्रसंग भी आ गया और कल उसका तुरन्त प्रयोग कर पहला ईमेल व फेसबुक आदि पर इसकी सार्वजनिक सूचना भी जारी की। 

उत्तर में कल से अब तक कई सौ लोगों ने इसके प्रयोग की विधि पूछी है। क्रमवार दोनों सुविधाओं का प्रयोग करने की विधि यों है - 


गूगल हिन्दी वॉयस सर्च 

सिस्टम पर हिन्दी वायस-सर्च 

गूगल ने ऍण्ड्रॉइड पर मध्य अगस्त में हिन्दी में वॉयस सर्च की सुविधा जारी की। वॉयस सर्च का नया अपडेट हिन्दी का विकल्प साथ ले कर आया है 


यदि आप हिन्दी को वाचिक 'सर्च' की भाषा के रूप में प्रयोग करना चाहते हैं तो ऐसा करें - 

Google Settings >> select Search and Now >> Voice >> Language >> select हिन्दी (भारत)

  • यह सुविधा सक्रिय करने के बाद आप गूगल सर्च पर जाने पर पाएँगे कि सर्च बॉक्स में एक माईक्रोफ़ोन का चिह्न बना हुआ है। 
  • उस पर कर्सर ले जाने पर 'ध्वनि द्वारा खोजें' लिखा हुआ दिखाई देगा। इसे आप क्लिक कीजिए। 
  • क्लिक करते ही लाल रंग का माईक दिखाई देगा और लिखा होगा 'अब बोलें'। 
  • आपको जो खोजना है उसे बोलिए। मैंने तो मन्त्रों का उच्चारण कर भी देखा। किसी आश्चर्य की भाँति आपके बोले जाने वाले शब्द स्वतः 'सर्च बार' में लिखे जाते हुए दिखाई देंगे व तुरन्त उन शब्दों के सर्च परिणाम आपके सामने प्रकट हो जाएँगे। सर्च परिणाम इस बात पर निर्भर करते हैं कि आपका उच्चारण कितना शुद्ध व स्पष्ट था, आसपास शोर व ध्वनियों का स्तर कितना था आदि। 
क्योंकि यह वाचिक सर्च है अतः माईक में जाने वाली अन्य कोई भी ध्वनि इसे प्रभावित कर सकती है। सर्च में 'हूँ' इत्यादि के लिए कभी-कभी आपको परिणाम सन्तोषप्रद नहीं भी लग सकते हैं। वस्तुतः मशीन अक्षर व ध्वनि का अन्तर नहीं समझ पाती। हिन्दी का कोई शब्द/ अक्षर यदि किसी ध्वनि से साम्यता रखता है, जैसे 'हूँ', तो सर्चपरिणाम कुछ बेमेल आ सकते हैं। 

यह सुविधा आप लैपटॉप (क्रोम ब्राऊज़र) व ऍण्ड्रॉइड फोन दोनों पर पा सकते हैं।


गूगल हिन्दी श्रुतलेखन / वॉयस टायपिंग / डिक्टेशन

मोबाईल पर आप अब बोलकर कितना भी बड़े आकार का लेख लिख सकते हैं। गूगल की इस सुविधा द्वारा आप मोबाईल से मैसेज, फेसबुक अपडेट, वाट्सएप पर चैट, ब्लॉग में लेख, वर्ड फाईल में सामग्री आदि अर्थात जहाँ-जहाँ आप मोबाईल से टाईप कर करते हैं, वहाँ-वहाँ केवल बोलकर देवनागरी में टाईप किया हुआ पा सकते हैं। 

यह सुविधा ऍण्ड्रॉइड वाले फ़ोन पर ही उपलब्ध है, अर्थात जहाँ-जहाँ गूगल लैंग्वेज़ इनपुट टूल लगाया हो। लैपटॉप अथवा सिस्टम पर यह सुविधा उपलब्ध नहीं। हाँ, आप लंबे आकार का लेख आदि लिखने के बाद उसे गूगल ड्राईव पर 'सेव' कर सकते हैं और फिर जब समय व सुविधा हो उसे लैपटॉप या सिस्टम पर बैठ सम्पादित कर सकते हैं। 
  मोबाईल पर हिन्दी श्रुतलेखन 

अतः इस सुविधा का प्रयोग करने के लिए आवश्यक है कि आप अपने गूगल खाते से गूगल के 'प्ले स्टोर' पर जाकर 'गूगल हिन्दी इनपुट टूल' को अपने फोन में स्थापित (इन्स्टाल) कर लें व भाषा सेटिंग्स में जाकर इसे सक्रिय कर लें। 


अब फोन पर श्रुत लेखन करने के लिए आपको इस प्रकार करना होगा - 

  • Settings >>Language & Input >>Google Voice Typing (आप इसे सलेक्ट करें व इसके सामने बने 'स्टार' के चिह्न को क्लिक कर खोलें) तो भाषाओं की सूची दिखाई देगी।
  • इस सूची के लगभग एकदम अन्त में 'हिन्दी (भारत)' लिखा हुआ पाएँगे। इसे सलेक्ट करें और फिर सबसे नीचे लिखा हुआ Save दबा दें।
  • सेव होते ही वापिस 'गूगल वॉयस' पर आ जाएँगे। यहाँ Languages के बाद Speech output को क्लिक करें तो तीन विकल्प खुलेंगे। उसमें आपको On चुन कर उसे चिह्नित करना है। 
  • इसके पश्चात् पुनः मुख्य सूची में थोड़ा नीचे जाने पर Block offensive words लिखा दिखाई देगा, उसे भी चिह्नित रहने दें, ताकि हिन्दी के वे शब्द जिन्हें संभवतः ध्वनियाँ मान कर सर्च में रोक दिया जाता हो, वे भी प्रकट हो सकें। 
  • अब लौट कर पुनः language & Input में आइये, Google Hindi Input के पश्चात् सूची में Google voice typing का विकल्प सलेक्ट किया हुआ दीखेगा। आपका काम हो गया है। 

चाहें तो, भाषाओं की सूची से जब हिन्दी (भारत) चुन रहे थे उस समय अंग्रेजी को सलेक्ट करना हटा दें और केवल हिन्दी को ही रखें। ऐसा करने से हिन्दी श्रुतलेखन के परिणाम अधिक स्पष्ट व अच्छे/उत्तम होंगे।

जिन लोगों के पास ऍण्ड्रॉइड फोन की सुविधा न हो, उनके लिए लैपटॉप या सिस्टम पर प्रयोग करने का केवल एक ही विकल्प गूगल ने अभी दिया है। गूगल क्रोम के ब्राऊज़र में गूगल ट्रान्सलेट को खोल कर अपने बाएँ बने विभाग में भाषाओं में 'हिन्दी' को चुनें और वहीं नीचे बने स्पीकर को क्लिक करें। जब वह लाल रंग में दीखने लगे तो बोलना प्रारम्भ करें। वहाँ स्वतः टाईप होता चला जाएगा। टाईप हो चुकी सामग्री को आप जहां चाहें प्रयोग कर सकते हैं। आशा है आगामी दिनों में गूगल इसे ब्लॉगर और ईमेल इत्यादि में भी सक्रिय कर देगा और उस से भी बढ़कर सिस्टम में गूगल इनपुट टूल के साथ ही इसे जोड़ देगा ताकि आप जहाँ चाहे सीधे वहीं जाकर हिन्दी बोलकर बोल कर देवनागरी में लिखवा सकें।
 लैपटॉप पर श्रुतलेखन 


तो इस प्रकार अब आप फेसबुक, ब्लॉग, ईमेल, वाट्सएप, मैसेज आदि पर कहीं भी देवनागरी श्रुतलेखन के लिए तैयार हैं। टाईप करने के लिए कीबोर्ड खुलते ही स्पेस बार को थोड़ी अधिक देर तक दबाए रखने पर या तो स्वतः माईक का चिह्न आ जाएगा अथवा एक पॉपअप विंडो खुलेगी जिसमें आपको Google voice typing को सलेक्ट करना होगा। ऐसा करते ही एक माईक प्रकट होगा जिस के साथ अब बोलें अथवा Speak Now लिखा होगा। आप एक एक शब्द को ठहर ठहर कर शुद्ध रूप में बोलते जाइए, जैसे डिक्टेशन देते हुए बोलते हैं, वे शब्द स्वतः टाईप होते जाएँगे। 

बस इस सुविधा का प्रयोग करते समय आपको विराम चिन्ह इत्यादि स्वयं हाथो से प्रयोग करने होंगे। मैंने बोलकर चिह्न लगवाना चाहा तो पाया कि यदि मैं पूर्णविराम का उच्चारण करुँ तो गूगल 'पूर्णविराम' शब्द लिखकर टाइप कर देता है। अभी इस सुविधा मेँ कुछ ओर सुझाव सुधार भविष्य मेँ होते रहेंगे ऐसी आशा है। कल भेजी श्रुतलेखन वाली मेरी सूचना व ईमेल में इस तथ्य का उल्लेख पढ़कर मित्र श्रीश बेंजवाल ने इसका निदान करने का उपयोगी सुझाव यों दिया है - 

"अगर लम्बा डॉक्यूमेंट है तो विरामचिह्नों का एक जुगाड़ कर सकती हैं। पहले बोलते समय उन्हें शब्द रूप में ही आ जाने दें यानि जहाँ-जहाँ पू्र्णविराम हो 'पूर्णविराम' ही बोलें। दस्तावेज पूरा हो जाने पर वर्ड या किसी अन्य एडीटर में Find and Replace में "पूर्णविराम" को "।" से रिप्लेस कर दें।"


श्रुत लेखन की इस सुविधा का उपयोग करते समय ध्यान रखें कि आप शोर-शराबे में न बैठे हों व आसपास लोगों के बोलने आदि की आवाजें न आ रही हों। 
कल क्योंकि मैं दिन भर हीथ्रो एयरपोर्ट पर थी, लोगों के ईमेल लगातार आ रहे थे कि इसकी विधि बताऊँ तो मैंने बोलकर उत्तर देने का प्रयोग करने की सोची, यत्न भी किया किन्तु आसपास निरन्तर लोगों के बोलने-चालने की ध्वनियों के बीच शुद्ध परिणाम आ ही नहीं पा रहे थे। 


आशा है, आप लोग लोग इस निश्शुल्क सुविधा का उपयोग करते समय गूगल व उसकी टीम को धन्यवाद अवश्य देंगे और हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग नेट पर करने के लिए लोगों को प्रेरित व उत्साहित अवश्य करेंगे। 

हिन्दी-दिवस (14 सितम्बर) वाले माह में ये दोनों सुविधाएँ प्रयोग में लाना प्रारम्भ कर सही अर्थों में हिन्दी-दिवस मनाएँ। 




शनिवार, 1 मार्च 2014

ज्ञान का एक दुर्लभ खज़ाना ऑनलाईन : कविता वाचक्नवी

ज्ञान का एक दुर्लभ खज़ाना ऑनलाईन : कविता वाचक्नवी


पूर्व राष्ट्रपति ए.पी. जे. अब्दुल कलाम के अथक प्रयासों से प्रारम्भ की गई परियोजना Digital Library of India का मूर्त रूप आज भारतीय ऐतिहासिक पुस्तकों और पत्रिकाओं के एक ऐसे विशाल संग्रह का नाम बन चुका है, जिसमें आप एक बार जाने के पश्चात जाने कितने घंटे, दिन, माह और बरस बिताना पसंद करेंगे| यहाँ विभिन्न भाषाओं की दुर्लभ पुस्तकें और पत्रिकाएँ आपको मिल सकती हैं जो आप को किसी पुस्तकालय तक में धक्के खाने और भटकते खोजने पर भी संभवतः ना मिलें|


भाषा / वर्ष / विषय / अनुक्रम का चयन कर आप वहाँ डाऊनलोड के लिए उपलब्ध रीडर द्वारा इन पुस्तकों/ पत्रिकाओं को ऑनलाईन इनके मूल रूप में पढ़ सकते हैं|

लाखों पृष्ठों में समाहित यह एक ऐसा ऐतिहासिक संग्रह और कार्य है कि जाने आने वाली कितनी पीढियाँ इस से लाभान्वित और गौरवान्वित होंगी| पुनरपि अभी बहुत कार्य शेष है और निरंतर प्रगति पर है|

आप इस लिंक को अवश्य बुकमार्क कर लें व सहेज कर रख लें| नीचे इस परियोजना में सहायक और संलग्न संस्थाओं की सूची दी गई है -

Partners : India :
Coordination and Research Centre in India : Indian Institute of Science, Bangalore

Academic Institutions 
  • Anna University, Chennai, Tamil Nadu 
  • Arulmigu Kalasligam College of Engineering (AKCE), Srivilliputur, Madurai, Tamil Nadu 
  • Goa University, Goa 
  • Indian Institute of Astrophysics, Bangalore,Karnataka 
  • Indian Institute of Information Technology, Allahabad, Uttar Pradesh 
  • International Institute of Information Technology, Hyderabad, Andhra Pradesh 
  • Osmania University, Hyderabad 
  • Punjab Technical University, Punjab 
  • Shanmugha Art, Science, Technology & Research Academy, Tanjavur, Tamil Nadu 
  • University Of Hyderabad, Hyderabad 
  • University of Pune, Pune, Maharashtra 
Religious and Cultural Institutions 
  • Kanchi University, Kanchi, Tamil Nadu 
  • Poornapragna Vidyapeetha, Bangalore 
  • Salarjung Museum, Hyderabad 
  • Sringeri Mutt, Sringeri, Karnataka 
  • Tirumala Tirupati Devasthanams, Tirupati, Andhra Pradesh 
  • Tibetan Monasteries and Literature on Jainism
Government and Research Agencies 
  • Academy of Sanskrit Research , Melkote, Karnataka 
  • CDAC- Noida 
  • Indian Institute of Astrophysics, Bangalore,Karnataka 
  • Maharashtra Industrial Development Corporation (MIDC), Mumbai, Maharashtra 
  • Rashtrapathi Bhavan, New Delhi 
United States of America
  • Carnegie Mellon University
China 
  • Beijing University 
  • Chinese Academy of Science 
  • Fudan University 
  • Ministry of Education of China 
  • Nanjing University 
  • State Planning Commission of China 
  • Tsinghua University 
  • Zhejiang University 

इसके अतिरिक्त मैसूर विश्व विद्यालय ने अपना पूरा पुस्तकालय डिजिटलाईज़ करवा लिया हुआ है। 

हिन्दी पुस्तकों की दृष्टि से वर्धा विश्वविद्यालय का हिन्दी समय तो नवीन स्रोत है ही, इसके अतिरिक्त 'होमी भाभा विज्ञान शिक्षा केन्द्र' भी पठनीय है। 

कुछ अन्य स्थल ये भी हैं - 

नेशनल लायब्रेरी नाम की इस राजकीय परियोजना को भी देखा जा सकता है - 


इस नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी लिंक को देखना भी प्रासंगिक होगा - 


NCERT की हिन्दी पुस्तकें भी ऑनलाईन उपलब्ध हैं - 


कई लोगों ने निजी तौर पर भी बहुत बढ़िया प्रयास किए हैं जिनमें यह प्रमुख है 'अपनी हिन्दी' - http://www.apnihindi.com/


और तो और, मोबाईल के लिए ऑनलाईन हिन्दी पुस्तकालय भी उपलब्ध है, जिसका उपयोग मैं यात्रा आदि में नियमित पढ़ने के लिए करती हूँ। एण्ड्ररॉयड के लिए यह एप्लीकेशन यहाँ उपलब्ध है - 

कुछ दुर्लभ हिन्दी पुस्तकें यहाँ भी -

सोमवार, 30 सितंबर 2013

फेसबुक तथा सोशल मीडिया के शिष्टाचार : कविता वाचक्नवी

फेसबुक तथा सोशल मीडिया के शिष्टाचार  :  कविता वाचक्नवी


छुट्टी के दिन सुबह पाँच बजे मेरे मोबाईल में चैटिंग के लिए इनबॉक्स में अवतरित हुए एक मित्र को कहना पड़ा कि भई अभी यहाँ सुबह के पाँच बजे हैं और यात्रा पर निकलना है, इसी कारण मैंने इतनी तड़के उठ कर अपना मोबाईल ऑन किया है, अभी बात नहीं कर सकती। यह एक दिन नहीं बल्कि हर दिन होता है कि किसी-न-किसी को कहना पड़ता है।


मैं ( व पूरा परिवार) अपना मोबाईल रात में सोते समय या तो 'ऑफ' कर देती हूँ या 'फ्लाईट मोड' पर डाल देती हूँ, ताकि परिवार की नींद में कोई व्यवधान न डाले। सुबह नींद टूटने या उठने पर उसे 'ऑन' करती हूँ। उसे 'ऑन' करते ही संभवतः सबको ऐसा प्रतीत होता है कि मैं ऑनलाईन बैठी हूँ और लोग चैटिंग करने लग जाते हैं। मुझे बड़ा संकोच होता है कि उत्तर न देने पर अगला बुरा मान जाएगा, अतः अधमुँदी आँखों और दिनचर्या व घर के कामों की बजाय सब कुछ छोड़ कर उन्हें उत्तर देना पड़ता है। बहुत असुविधा होती है। ऐसे मित्रों से निवेदन है कि यदि सामने वाला आपको ऑनलाईन उपलब्ध दीख रहा है और हरी बत्ती भी जलती रही दीख रही है, तब भी आवश्यक नहीं कि वह ऑनलाईन हो ही। हम लोग रात्रि सोने के अतिरिक्त शेष पूरा समय ऑनलाईन दिखाई देते हैं क्योंकि मोबाईल सदा ही 3G+ या वाईफ़ाई में होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर समय फेसबुक या चैट पर समाधि जमाए बैठे हैं। इसलिए यदि कोई विशेष बात न हो तो यों ही इनबॉक्स में सन्देश भेजते रहना अच्छी बात नहीं है। या यदि कोई बहुत आवश्यक बात हो भी व सन्देश भेज ही दिया तो उत्तर की तुरन्त आशा न किया करें। 


दूसरी बात यह भी ध्यान रखनी चाहिए कि यहाँ ब्रिटेन का समय भारत से साढ़े पाँच घंटे पीछे है। जरा यह सोच-समझ लिया करें कि इस समय मेरे यहाँ क्या समय होगा। क्या उस समय किसी मित्र से व्यक्तिगत सन्देशों का आदान-प्रदान/चैटिंग उचित भी है या नहीं। उसके कामों में व्यवधान तो नहीं डाल रहे हम। आज के आधुनिक समय में ऐसा करके अपने को कितना नासमझ और मूर्ख प्रमाणित करते हैं। 


और तीसरी बात, मुझे शाम छह /सात बजे से अगली प्रातः 10 बजे तक किसी से बात करने में कोई रुचि नहीं होती है। मैं अपने परिवार के साथ व्यस्त भी होती हूँ और शाम के बाद किसी से व्यक्तिगत बातचीत व सन्देश आदि भेजने को उचित नहीं समझती हूँ। वह मेरा निजी पारिवारिक समय होता है, उसमें मैं ऑनलाईन तो हूँ, मध्यरात्रि तक नेट पर काम भी करती हूँ किन्तु व्यक्तिगत वार्तालाप में उलझने में कतई रुचि नहीं। इसलिए कृपया मुझ से व्यक्तिगत वार्तालाप करते समय इन बातों का ध्यान रखें। 


अपनी ओर से मैं बहुत ही आवश्यक होने पर वार्तालाप प्रारम्भ करती हूँ। कोई व्यक्तिगत सन्देश देना हो तो वह सन्देश इनबॉक्स में छोड़ देती हूँ, वार्तालाप करना उसका उद्देश्य कदापि नहीं होता, अपितु ईमेल की भाँति सन्देश भेजना ही उद्देश्य होता है। इसलिए जब आपको कोई आवश्यक सन्देश मुझे भेजना हो तो अपना सन्देश इनबॉक्स में छोड़ दें। मुझसे वार्तालाप की आशा न करें। न ही अपनी रचनाओं को पढ़ने के लिए बार-बार पुकार लगाएँ। अपने पटल (वॉल) पर या अपने ग्रुप्स पर इसकी सूचना दें। निजी रूप में  अपनी रचनाओं के लिए बुलाने वालों का सम्मान मेरी दृष्टि में बहुत ही कम हो जाता है, प्रत्येक की दृष्टि में कम होता है; इसलिए अपने मान-सम्मान की कीमत पर अपनी रचना के लिए पाठक न बटोरें। 


कुछ इसी विषय पर मैंने एक बार पहले भी अपने नोट्स में लिखा था, उसे भी एक बार यहाँ क्लिक कर पढ़ा जा सकता है -   आधी रात के असमय कष्ट

सामाजिकता के जिन सामान्य शिष्टाचारों का पालन समाज में आवश्यक व अपेक्षित होता है, वे सब शिष्टाचार व मर्यादाएँ सोशल नेटवर्किंग में भी आवश्यक होती हैं। यह ध्यान बना रहे तो सोशल नेटवर्किंग सबके लिए लाभकारी बनी रहेगी। 

मंगलवार, 28 मई 2013

आधी रात के असमय कष्ट

आधी रात के असमय कष्ट  : कविता वाचक्नवी


भारत व ब्रिटेन के समय में मुख्यतः साढ़े पाँच घण्टे का अन्तर है। प्रतिदिन होता यह है कि मैं रात्रि 2-3 बजे तक काम करती रहती हूँ। और इस बीच यदि 'फेसबुक' पर सोने से पूर्व कोई नया 'स्टेटस' लिख दूँ या कहीं टिप्पणी कर दूँ तो फेसबुक खोले जाग रहे दूसरे व्यक्तियों को पता चल जाता है कि मैं अभी जाग रही हूँ। ....बस लोग आधी रात में ही ( मेरी 'चैट' लगभग स्थायी रूप से बंद होने के बावजूद) 'इनबॉक्स' में बातचीत करने और संदेश भेजने में जुट जाते हैं। मैं समय देखती हूँ तो बहुधा यहाँ रात्रि 7 से 1 बजे का समय होता है, अर्थात् उस समय भारत में रात 12 से तड़के 6 बजे तक की अवधि। मुझे जबर्दस्ती उन्हें विदा कहना पड़ता है और त्रस्त जो होती हूँ, वह अलग। 


उन्हें यह सामान्य-सी समझ नहीं है कि मध्य रात्रि में यदि कोई परिवार वाली महिला जाग रही है तो उसके पास कार्यों का कितना दबाव होगा कि वह आधी रात को काम कर रही है। दूसरे, उन्हें यह साधारण शिष्टाचार भी नहीं पता कि मध्य रात्रि को किसी महिला से 'चैट' नहीं की जानी चाहिए। यदि आपको यहाँ का समय न भी पता हो, तो भी अपने यहाँ का समय तो पता ही होता है कि अभी रात 7-8 से तड़के 8-9 बजे का समय किसी से संपर्क करने का समय नहीं होता।


आधी रात को लोग अपनी कविताएँ भेजना चालू हो जाते हैं, कहानियों के लिंक भजते हैं कि 'कृपादृष्टि' (?) डालूँ, अपनी 'स्टेटस' पर आकर एक टिप्पणी करने के लिए आमंत्रण देते हैं। या यों ही फालतू की बातें करते हैं कि कैसी हैं, परिवार कैसा है, आजकल क्या कर रही हैं, वहाँ मौसम कैसा है, लंदन तो बहुत सुन्दर होगा, भारत कब आ रही हैं, मैं यह करता हूँ, मैं वह करता हूँ, मेरे बेटे को ईनाम मिला, आपकी पोस्ट बहुत अच्छी थी, आपकी फोटो बहुत सुन्दर है, आपके घर में कौन-कौन हैं, आपके पति क्या करते हैं, बच्चे कितने हैं (वैसे घर में कौन-कौन आदि जैसे व्यक्तिगत प्रश्नों के उत्तर में मैं एक ही बात कहती हूँ कि "भई, अभी मुझे अपना बेटा नहीं ब्याहना, जब ब्याहना होगा तब लड़की वालों के सवालों का सब उत्तर दूँगी, अभी से तहक़ीक़ात क्यों ?" ) 


.... परन्तु मैं उस अविवेक, अशिष्टता, आत्म मुग्धता, छपास, दुर्व्यवहार व अभद्रता आदि पर चकित हूँ कि जिन लोगों में इतनी-सी सामान्य सामाजिक शिष्टाचार तक की समझ तक नहीं है, वे कैसे स्वयं को लेखक समझ कर भ्रम में जीने लगते हैं। हम लोग अपने घनघोर परिचितों को कॉल करते समय भी बीस बार सोचते हैं कि यह खाने का समय होगा, यह आराम का और यह अमुक-अमुक दिनचर्या का, अतः उन घंटों में अत्यावश्यक होने पर भी फोन तक नहीं करते जब तक कि कोई आपत्ति या समस्या न हो।


समझ के इतने अभाव में जीने वालों से सम्पर्क, सम्वाद, मित्रता, परिचय आदि में मुझ कोई रुचि नहीं है। मैं ऐसे लोगों से कोई वास्ता नहीं रखना चाहती। हो सकता है ऐसी घटना के बाद मैं अपने कई मित्रों से कन्नी काट लूँ (करती ही हूँ )। ऐसे में उन्हें समझ जाना चाहिए कि उनका व्यवहार मुझे नागवार गुजरा है। कम से कम ऐसी अशिष्टता भविष्य में वे दूसरों के साथ करके अपनी मूर्खता सहित दसियों अशोभन मनोवृत्तियों का प्रदर्शन न करें, तो उनके हित में होगा। 


बुधवार, 8 मई 2013

जीवन की व्यक्तिगत गाथा ....

जीवन की व्यक्तिगत गाथा ....  :  कविता वाचक्नवी



पिताश्री इंद्रजित देव 


विगत एक माह से पिताजी की भीषण अस्वस्थता व जीवन के साथ संघर्ष में उनके, मेरे व हमारे मित्रों, परिचितों, परिवारिजनों व शुभचिंतकों तक कम से कम समय में एक साथ सूचना पहुँचाने के माध्यम के रूप में इन्टरनेट और विशेषतः फेसबुक ने बड़ा सहयोग दिया। 

ऐसे समय में जब परिवार बार-बार एकाधिक लोगों के फोनकॉल्ज़ आदि का उत्तर देकर उन्हें विस्तार से जानकारी, सूचना आदि नहीं दे सकता या निश्चिन्त नहीं कर सकता ऐसे में ये माध्यम बड़े कारगर होते हैं, हुए।

विदेशों में लोगों के आकस्मिक संकट की स्थितियों में फंसे होने पर अपने ट्वीटर खातों से एक संदेश दे कर जीवन रक्षक सहायता लेने के कई उदाहरण हैं। कभी कोई घर में फँस गया या सड़क में हिमपात में अटक गया तो इन नवीनतम संसाधनों ने उसे जीवनदान दिया क्योंकि उसके एक सन्देश से उसके सब जगह फैले सहयोगी मित्रों ने अपने अपने तईं सहायता दिलवाने के यत्न शुरू किए। कई बार तो दूसरे देश में कोई सहायता की आवश्यकता पड़ने पर लोगों ने फेसबुक, ट्वीटर के माध्यम से जुड़े अपने मित्रों का सहयोग दिया/लिया। कई बरसों से बिछड़े परिवार इस माध्यम से मिले और कइयों ने अपने खोए बच्चों को इस माध्यम से ढूँढ निकाला। इस तरह ये संसाधन केवल ज्ञान और जानकारी के लिए ही नहीं अपितु जीवनरक्षक और सम्बन्धियों तक पहुँच बनाने के बड़े माध्यम भी बने, व्यक्तिगत से व्यक्तिगत और सामाजिक से सामाजिक, राष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय अवसरों, कार्यों व उद्देश्यों के लिए इनका उपयोग मानव-समाज के लिए अतीव महत्व का है। जो लोग इस महत्व को नहीं जानते वे दूसरों को उनकी निजी आवश्यकताओं से जुड़े मुद्दों पर लिखने के लिए हास्यास्पद ढंग से शिक्षा देते दिखाई देते हैं या आलोचना करते पाए जाते हैं। जैसा कि गत दिनों से आज तक यहाँ मुझे भी देखने/झेलने को मिला। 

मेरे लिए फेसबुक की दुनिया एक आत्मीय परिवार और सामाजिक परिवेश की भाँति है, जिसमें लोग परस्पर एक दूसरे के सुख दु:ख में सहायक बनते हैं और सहायक न बन सकें तो कम से कम सुख दु:ख में साथ खड़े होते हैं, सुख दु:ख बाँटते हैं। किसी का जन्मदिवस और वर्षगाँठ है तो बधाइयाँ देते हैं, कष्ट है तो सान्त्वना देते हैं, सहयोग का प्रस्ताव देते हैं। इसीलिए 'सोशल नेटवर्किंग साईट्स' कहा जाता है इन्हें। 

पिताजी के स्वास्थ्य को लेकर हमारे मित्रों ने हमारी संकट की घड़ी में जिस प्रकार अपने शब्दों, आशीर्वचनों, कइयों ने स्वयं जाकर, कुछ ने मेडिकल क्षेत्र के लोगों से जान-पहचान की जानकारी आदि दे कर जिस प्रकार हमारा मनोबल बढ़ाया वह अविस्मरणीय है। उन के प्रति कृतज्ञ हूँ। लोग बारम्बार अपनी ओर से सन्देश भेज कर आज, अभी तक उनके विषय में चिन्तित हैं। इसलिए मुझे उपयुक्त लगता है कि आज सब को एक साथ निश्चिन्त किया जाना अनिवार्य हो गया है। क्योंकि अभी कुछ घंटे पूर्व ही अस्पताल ने उन्हें कल छुट्टी देने के कागज तैयार कर दिए हैं। अभी यद्यपि आगामी 6 माह उनका उपचार चलेगा और 10-12 दिन में ऑपरेशन से जुड़ी अंतिम कार्यवाही पूरी होगी किन्तु अब वे घर जा सकते हैं। 

पिताजी के स्वास्थ्य में सुधार से मानो मेरा जीवन लौट आया हो और मेरी ही आयु बढ़ गई हो। मैंने कभी अपने पिताजी को सिर दर्द होते भी नहीं देखा। वे मेरे जीवन का उत्स केवल दैहिक रूप में ही नहीं, अपितु मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक आदि सभी प्रकार से भी हैं। पिताजी ने जितनी तपस्या मुझे गढ़ने में की है, संसार में शायद ही कोई पिता अपनी संतान के लिए उतनी और वैसी तपस्या कर सकता होगा... लगभग असंभव ! उसे बताया बखाना भी नहीं जा सकता। 
मेरे लिए अपने पिताश्री का अस्तित्व मेरे होने की अनिवार्य शर्त है। यह कल्पना भी दुष्कर है कि मैं हूँ और वे नहीं हैं। उनके प्राण मुझ में और मेरे उनमें अटके हैं...... । 
आज मेरा मन, उन्हें रोग से उबरते देख, पुनः जीवन की ओर अग्रसर होता जान पड़ता है। यद्यपि आगामी 6 माह अभी उन्हें डॉक्टरी निर्देशों व परिचर्या में रहना होगा ईश्वर का लाख-लाख धन्यवाद। 

मुझे मानो अपने मन में उत्सव की अनुभूति जैसा लग रहा है। प्रभु की अपार कृपा, पिताजी की तपस्या, भाई-भाभी व परिवार की सेवा तथा हजारों लाखों लोगों की शुभकामनाओं व प्रार्थनाओं ने यह सुखद दिन दिखाया है। मैं किस किस को धन्यवाद दूँ और कैसे समझ नहीं पा रही। जो मित्र आत्मीय सम्बल बन इन घड़ियों में साथ रहे उन सब को व्यक्तिगत संदेश भेजना संभव नहीं अतः इस माध्यम के द्वारा आप सभी के प्रति आभार व्यक्त करना चाहती हूँ। स्वीकारें ! पिताजी के शतायु होने की कामना व उनका वरद हस्त हम पर सदा बने रहने की अशेष कामना है। शुभचिंतकों, मित्रों व हितैषियों का पुनः धन्यवाद। इस आड़े समय में जिन जिन ने जो सहयोग दिया उनके प्रति आभारी हूँ।



सोमवार, 6 मई 2013

तकनीक, विवेक और उगालदान

तकनीक, विवेक  और उगालदान : कविता वाचक्नवी



मानव के हित व सुविधा के लिए विज्ञान ने नवीनतम कल्पनातीत संसाधन विकसित कर लिए हैं, किन्तु इन संसाधनों के सदुपयोग का विवेक जब तक इसके प्रयोक्ताओं में विकसित नहीं होता तब तक ये संसाधन मानव के लिए अहितकारी ही हैं, क्योंकि अधिकांश प्रयोक्ता विवेकहीन ही हैं या इनका सामर्थ्य नहीं जानते। टीवी के साथ भी यही स्थिति थी कि पूरा समाज उसका गुलाम हो कर मनोरंजन, स्वार्थ और सामाजिक पतन के लिए बहुधा उसका उपयोग करता आ रहा है।


उस से भी बदतर स्थिति इंटरनेट की है। इंटरनेट पर हिन्दी की स्थिति को यदि देखें तो, इसके सुदूरगामी उपयोगों की जानकारी इसके 95% प्रयोक्ताओं को नहीं है, और विवेक तो 98% प्रयोक्ताओं को नहीं। वे अपने भीतर की सारी गंदगी, सारा व्यभिचार, समस्त कुंठाएँ, दूसरों को अपमानित कर अपनी हीनताग्रंथि को संतुष्ट करने वाले मनोरोगों, नीचताओं, छपास, लोगों की जानकारियाँ चुरा कर सुरक्षा सम्बन्धी दाँव-पेंचों, महिलाओं /लड़कियों से छेड़छाड़ व उन्हें नीचा दिखाने/आक्रान्त करने/कुत्सित्तापूर्ण आचरण करने व अपने घिनौने से घिनौने गंदे से गंदे आचरण को छद्म की तरह प्रस्तुत करने में अधिक रमे हैं। 


सामाजिक शिष्टाचार (?) से कोसों दूर, ध्यानाकर्षण हेतु  ('अटेन्शन सीकर' के रूप में)  कुछ भी/ किसी भी हद तक करने को उतारू लोगों के हाथ में ऐसे उपयोगी संसाधनों का लग जाना इसीलिए मानवहित की अपेक्षा अहित का बड़ा कारण है। इसीलिए तकनीक विध्वंस की जनक है यदि उसके प्रयोक्ताओं में उसके उपयोग का विवेक न हो। विवेकहीन समाज के हाथ में ये बंदर के हाथ में उस्तरे की भाँति हैं। परमाणु की खोज और उस से परमाणु हथियारों की तरह... । 


मर्यादा, सीमा व अंकुश जैसे शब्दों तक से अपरिचित इन निरंकुश लोगों के चलते नेट पर सदा के लिए ऐसी गंदगी सुरक्षित हो रही है जिसे देख, पढ़, जान कर आगामी पीढ़ियाँ क्या अर्थ लगाएँगी इसकी करुण कल्पना की जा सकती है। काश लोग अपनी ऊर्जा, समय व शक्ति किन्हीं सार्थक, महत्वपूर्ण व आवश्यक कार्यों में लगाएँ और इस संसाधन की शक्ति पहचानें। इतना अनुत्तरदायी वातावरण किसी भी समाज के असली चरित्र का पता देने के लिए पर्याप्त है। 


तकनीक का दुरुपयोग करने वाला समाज अपने विनाश की कगार पर तो बैठा ही है, साथ ही वह अपनी गंदगी के सार्वजनीकीकरण की शक्ति और प्रसार का माध्यम पा गया है। महिलाओं को अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है। जिन-जिन को उनके घिनौने कारनामों के लिए निकाल बाहर फेंका गया होता है वे बदला लेने के लिए भयंकर हथकंडे, झूठ व अस्त्र लेकर चरित्रहनन के अपने पारंपरिक तरीकों में जुट जाते हैं, जुटे हुए हैं। जनता न्यायधीश बनकर आह और वाह करती बिना सच जाने फैसले लेती अपनी मूढ़ता व मूर्खता प्रमाणित करती है।


यह सारा दृश्य इतना घृणास्पद, इतना कलुषित, इतना आपराधिक, निंदनीय व लज्जास्पद है कि कोई हिन्दी पढ़ सकने वाला बाहर का अन्य व्यक्ति (थर्ड पर्सन) इसे पढ़े तो हिन्दी वालों की ओर कभी मुँह न करे, और खूब वितृष्णा से भर जाए। ऐसे कम से कम 20-22 उदारहण मेरे पास हैं जब किसी परिचित परिवार के नई पीढ़ी के युवक युवतियों ने ब्लॉग और फेसबुक जगत के पचासों उदाहरणों का उल्लेख कर हिन्दी-समाज के इस घिनौने ताण्डव के चलते अपनी खूब घृणा व्यक्त की और इनसे हजार कदम दूर रहने की बात की। 


स्पैम, वायरस और आर्थिक फ्रॉड जैसे इन्टरनेट अपराधों में भारतीय समाज यद्यपि अग्रणी नहीं है अपितु आनुपातिक दृष्टि से यद्यपि कम है, किन्तु मूल्यहीनता, चारित्रिक अपराधों, सामाजिक दूषणों, भाषिक व्यभिचारों, छीना-झपटी, मारामारी, हाय-हाय, लड़कियों व बच्चों की खरीद फरोख्त, मानव तस्करी, राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ धोखाधड़ी, रिश्वतों के आदान-प्रदान, कॉपीराईट के उल्लंघन, रचनात्मकता कृतियों की चोरी, हेराफेरी, अश्लीलता, देह व्यापार, ठगी, हिंसात्मक गतिविधियों, झूठ बोलने, धमकाने, छेड़छाड़ करने, नकली पहचान बनाने, बाल-पोर्नोग्राफ़ी, हथियारों की तस्करी, हैकिंग, ईमेल व चैटरूम अपराधों, सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर अपमानित करना/ धमकाना/ छेड़छाड़, भुगतान किए बिना डाऊनलोड, महिलाओं के चित्रों के साथ छेड़छाड़ कर उन्हें मनोवांछित अश्लील रूप में ढालना, अश्लील सामग्री को वितरित करना व दुरुपयोग करना, वर्ग और वाद को लेकर हिंसात्मकता, भाषिक आक्रामकता, सम्पर्कों से छ्द्म व लाभ उठाने की प्रवृत्ति, घृणा फैलाने वाली सामग्री व व्यवहार, अधिकाधिक लोगों के व्यक्तिगत नेट खातों में निरर्थक ताकझाँक व फूहड़ टिप्पणियाँ इत्यादि पचासों छोटे बड़े हथकण्डे बहुत अधिक व खतरनाक मात्रा में हैं। गुणवत्तापूर्ण लेखन का नेट पर लगभग नितान्त अभाव व दूसरी ओर निरर्थक व कूड़ा सामग्री का अम्बार भी चिंतनीय तथ्य हैं। अपनी तुच्छताओं व कुंठाओं का बेहद भोंडा प्रदर्शन, अपढ़ता व तज्जन्य हाहाकार की भयावहता अत्यन्त गम्भीर सीमा तक देखी जा सकती है। 


जो चपल, चालाक, धूर्त, दुष्ट, पतित, बदमाश, चोर, उचक्के व चरित्रहीन समाज के सभ्य वर्ग में वर्जित व प्रतिबंधित थे, दरवाजे की देहरी तक न लाँघ सकते थे, न लाँघने की अनुमति किसी सभ्य परिवार में दी जा सकती है, वे इन माध्यमों से दूर बैठे कैसी भी गंदी से गंदी भाषा, गंदे से गंदे व्यवहार, धमकियाँ, झूठ और अश्लीलता करने में निश्शंक हो गए हैं। जिन लोगों का किसी क्षेत्र में कोई अस्तित्व नहीं है, कोई भूमिका नहीं है, नेपथ्य में रहने योग्य हैं, गली-सड़ी मानसिकता के हैं, नजर में आने के लिए कुछ भी लम्पटई तक करने को उतारू हो सकते हैं, वे सब इन्टरनेट का उपयोग कर अपने अहम को पोसने व दंभ के प्रदर्शन के लिए दूसरों पर कीचड़ उछाल का खेल तक खेलने से नहीं चूकते।


इतने उपयोगी संसाधन का ऐसा घटिया, अनुत्तरदायी, अविवेकी, दुरुपयोग जहाँ समकालीन समाज के लिए खतरे व चिंता का विषय है, वहाँ आने वाले समय के लिए सुरक्षित कर रखे जा सकने वाले ज्ञान व वाङ्मय के कोश में कोई योगदान न देने के लिए भी दोषी है। नेट पर फैले इस भाषा, वर्तनी, सामग्री व व्यवहारों के कचरे में से कैसे आने वाली पीढ़ियाँ सही सामग्री खोज पा सकेंगी ! क्या सीख सकेंगी और अपने इतिहास के मूल्यांकन से कैसे जूझेंगी, यह किसी की चिंता का विषय नहीं। जिसके जो मन में आता है वमन कर देता है। इन्टरनेट उनके लिए उगालदान हो गया है। ऐसे लोगों को देख, सुन, जान कर वितृष्णा से मन भर उठता है उनके प्रति। 

हाय रे भारत देश ! कब विवेक जागेगा लोगों का !



बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

विश्व हिंदी सम्मेलन : सार्थकता, औचित्य व दायित्व


विश्व हिंदी सम्मेलन : सार्थकता, औचित्य व दायित्व  :  (डॉ.) कविता वाचक्नवी



गत दिनों दक्षिण अफ्रीका में सम्पन्न हुए 9वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के संदर्भ में हिन्दी से जुड़े लेखकों, कलमकारों, तकनीक विशेषज्ञों, पाठकों व प्रेमियों के मध्य सम्मेलन को लेकर भिन्न भिन्न  प्रकार के संवाद, सम्मतियाँ, आपत्तियाँ, आरोप प्रत्यारोप, प्रश्नाकुलताएँ व विरोध, समर्थन इत्यादि का दौर चलता रहा है। इसी बीच हिन्दी के तकनीकी पक्ष से जुड़े हरिराम जी ने हिन्दी-भारत (याहूसमूह) पर एक लंबी टिप्पणी लिखी जिसमें सम्मेलन में भाग लेने वालों से कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे गए थे। उन प्रश्नों वाले संदेश को पढ़कर जो प्रतिक्रिया मैंने लिखी  उसे अगले दिन 'प्रवासी दुनिया' ने स्वतंत्र आलेख के रूप में प्रकाशित भी कर दिया    

 निम्नलिखित बॉक्स में हरिराम जी द्वारा उठाए गए वे महत्वपूर्ण प्रश्न ज्यों के त्यों पढे जा सकते हैं और
उत्तर में लिखी मेरी टिप्पणी को भी आलेख  (विश्व हिंदी सम्मेलन : सार्थकता, औचित्य व दायित्व ) के रूप में पढ़ा जा सकता है।  




*निम्न कुछ तथ्यपरक व चुनौतीपूर्ण प्रश्न 9वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में पधारे विद्वानों से करते हुए इनका उत्तर एवं समाधान मांगा जाना चाहिए..

 (1)---- हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने के लिए कई वर्षों से आवाज उठती आ रही है, कहा जाता है कि इसमें कई सौ करोड़ का खर्चा आएगा... बिजली व पानी की तरह भाषा/राष्ट्रभाषा/राजभाषा भी एक इन्फ्रास्ट्रक्चर (आनुषंगिक सुविधा) होती है.... अतः चाहे कितना भी खर्च हो, भारत सरकार को इसकी व्यवस्था के लिए प्राथमिकता देनी चाहिए।

 (2) ---- हिन्दी की तकनीकी रूप से जटिल (Complex) मानी गई है, इसे सरल बनाने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं? 
 -- कम्प्यूटरीकरण के बाद से हिन्दी का आम प्रयोग काफी कम होता जा रहा है...
 -- -- हिन्दी का सर्वाधिक प्रयोग डाकघरों (post offices) में होता था, विशेषकर हिन्दी में पते लिखे पत्र की रजिस्ट्री एवं स्पीड पोस्ट की रसीद अधिकांश डाकघरों में हिन्दी में ही दी जाती थी तथा वितरण हेतु सूची आदि हिन्दी में ही बनाई जाती थी, लेकिन जबसे रजिस्ट्री और स्पीड पोस्ट कम्प्यूटरीकृत हो गए, रसीद कम्प्यूटर से दी जाने लगी, तब से लिफाफों पर भले ही पता हिन्दी (या अन्य भाषा) में लिखा हो, अधिकांश डाकघरों में बुकिंग क्लर्क डैटाबेस में अंग्रेजी में लिप्यन्तरण करके ही कम्प्यूटर में एण्ट्री कर पाता है, रसीद अंग्रेजी में ही दी जाने लगी है, डेलिवरी हेतु सूची अंग्रेजी में प्रिंट होती है। -- -- 
अंग्रेजी लिप्यन्तरण के दौरान पता गलत भी हो जाता है और रजिस्टर्ड पत्र या स्पीड पोस्ट के पत्र गंतव्य स्थान तक कभी नहीं पहुँच पाते या काफी विलम्ब से पहुँचते हैं। अतः मजबूर होकर लोग लिफाफों पर पता अंग्रेजी में ही लिखने लगे है।
 *डाकघरों में मूलतः हिन्दी में कम्प्यूटर में डैटा प्रविष्टि के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं?* 

 (3)-- -- रेलवे रिजर्वेशन की पर्चियाँ त्रिभाषी रूप में छपी होती हैं, कोई व्यक्ति यदि पर्ची हिन्दी (या अन्य भारतीय भाषा) में भरके देता है, तो भी बुकिंग क्लर्क कम्प्यूटर डैटाबेस में अंग्रेजी में ही एण्ट्री कर पाता है। टिकट भले ही द्विभाषी रूप में मुद्रित मिल जाती है, लेकिन उसमें गाड़ी व स्टेशन आदि का नाम ही हिन्दी में मुद्रित मिलते हैं, जो कि पहले से कम्प्यूटर के डैटा में स्टोर होते हैं, रिजर्वेशन चार्ट में नाम भले ही द्विभाषी मुद्रित मिलता है, लेकिन "नेमट्रांस" नामक सॉफ्टवेयर के माध्यम से लिप्यन्तरित होने के कारण हिन्दी में नाम गलत-सलत छपे होते हैं। मूलतः हिन्दी में भी डैटा एण्ट्री हो, डैटाबेस प्रोग्राम हो, इसके लिए व्यवस्थाएँ क्या की जा रही है? 

 (4)-- -- मोबाईल फोन आज लगभग सभी के पास है, सस्ते स्मार्टफोन में भी हिन्दी में एसएमएस/इंटरनेट/ईमेल की सुविधा होती है, लेकिन अधिकांश लोग हिन्दी भाषा के सन्देश भी लेटिन/रोमन लिपि में लिखकर एसएमएस आदि करते हैं। क्योंकि हिन्दी में एण्ट्री कठिन होती है... और फिर हिन्दी में एक वर्ण/स्ट्रोक तीन बाईट का स्थान घेरता है। यदि किसी एक प्लान में अंग्रेजी में 150 अक्षरों के एक सन्देश के 50 पैसे लगते हैं, तो हिन्दी में 150 अक्षरों का एक सन्देश भेजने पर वह 450 बाईट्स का स्थान घेरने के कारण तीन सन्देशों में बँटकर पहुँचता है और तीन गुने पैसे लगते हैं... क्योंकि हिन्दी (अन्य भारतीय भाषा) के सन्देश UTF8 encoding में ही वेब में भण्डारित/प्रसारित होते हैं। *हिन्दी सन्देशों को सस्ता बनाने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं?*

 (5)-- -- अंग्रेजी शब्दकोश में अकारादि क्रम में शब्द ढूँढना आम जनता के लिेए सरल है, हम सभी भी अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश में जल्दी से इच्छित शब्द खोज लेते हैं, -- -- लेकिन हमें यदि हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोश में कोई शब्द खोजना हो तो दिमाग को काफी परिश्रम करना पड़ता है और समय ज्यादा लगता है, आम जनता/हिन्दीतर भाषी लोगों को तो काफी तकलीफ होती है। हिन्दी संयुक्ताक्षर/पूर्णाक्षर को पहले मन ही मन वर्णों में विभाजित करना पड़ता है, फिर अकारादि क्रम में सजाकर तलाशना पड़ता है... विभिन्न डैटाबेस देवनागरी के विभिन्न sorting order का उपयोग करते हैं। *हिन्दी (देवनागरी) को अकारादि क्रम युनिकोड में मानकीकृत करने तथा सभी के उपयोग के लिए उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?*

 (6) -- -- चाहे ऑन लाइन आयकर रिटर्न फार्म भरना हो, चाहे किसी भी वेबसाइट में कोई फार्म ऑनलाइन भरना हो, अधिकांशतः अंग्रेजी में ही भरना पड़ता है... -- -- Sybase, powerbuilder आदि डैटाबेस अभी तक हिन्दी युनिकोड का समर्थन नहीं दे पाते। MS SQL Server में भी हिन्दी में ऑनलाइन डैटाबेस में काफी समस्याएँ आती हैं... अतः मजबूरन् सभी बड़े संस्थान अपने वित्तीय संसाधन, Accounting, production, marketing, tendering, purchasing आदि के सारे डैटाबेस अंग्रेजी में ही कम्प्यूटरीकृत कर पाते हैं। जो संस्थान पहले हाथ से लिखे हुए हिसाब के खातों में हिन्दी में लिखते थे। किन्तु कम्प्यूटरीकरण होने के बाद से वे अंग्रेजी में ही करने लगे हैं। *हिन्दी (देवनागरी) में भी ऑनलाइन फार्म आदि पेश करने के लिए उपयुक्त डैटाबेस उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?*

 (7) ---सन् 2000 से कम्प्यूटर आपरेटिंग सीस्टम्स स्तर पर हिन्दी का समर्थन इन-बिल्ट उपलब्ध हो जाने के बाद आज 12 वर्ष बीत जाने के बाद भी अभी तक अधिकांश जनता/उपयोक्ता इससे अनभिज्ञ है। आम जनता को जानकारी देने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? 

 (8)--- भारत IT से लगभग 20% आय करता है, देश में हजारों/लाखों IITs या प्राईवेट तकनीकी संस्थान हैं, अनेक कम्प्यूटर शिक्षण संस्थान हैं, अनेक कम्प्टूर संबंधित पाठ्यक्रम प्रचलित हैं, लेकिन किसी भी पाठ्यक्रम में हिन्दी (या अन्य भारतीय भाषा) में कैसे पाठ/डैटा संसाधित किया जाए? ISCII codes, Unicode Indic क्या हैं? हिन्दी का रेण्डरिंग इंजन कैसे कार्य करता है? 16 bit Open Type font और 8 bit TTF font क्या हैं, इनमें हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाएँ कैसे संसाधित होती हैं? ऐसी जानकारी देनेवाला कोई एक भी पाठ किसी भी कम्प्यूटर पाठ्यक्रम के विषय में शामिल नहीं है। ऐसे पाठ्यक्रम के विषय अनिवार्य रूप से हरेक computer courses में शामिल किए जाने चाहिए। हालांकि केन्द्रीय विद्यालयों के लिए CBSE के पाठ्यक्रम में हिन्दी कम्प्यूटर के कुछ पाठ बनाए गए हैं, पर यह सभी स्कूलों/कालेजों/शिक्षण संस्थानों अनिवार्य रूप से लागू होना चाहिए। *इस्की और युनिकोड(इण्डिक) पाठ्यक्रम अनिवार्य करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?* 


 (9)---हिन्दी की परिशोधित मानक वर्तनी के आधार पर समग्र भारतवर्ष में पहली कक्षा की हिन्दी "वर्णमाला" की पुस्तक का संशोधन होना चाहिए। कम्प्यूटरीकरण व डैटाबेस की "वर्णात्मक" अकारादि क्रम विन्यास की जरूरत के अनुसार पहली कक्षा की "वर्णमाला" पुस्तिका में संशोधन किया जाना चाहिए। सभी हिन्दी शिक्षकों के लिए अनिवार्य रूप से तत्संबंधी प्रशिक्षण प्रदान किए जाने चाहिए। *इसके लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? 

 (10)--- अभी तक हिन्दी की मानक वर्तनी के अनुसार युनिकोड आधारित कोई भी वर्तनी संशोधक प्रोग्राम/सुविधा वाला साफ्टवेयर आम जनता के उपयोग के लिए निःशुल्क डाउनलोड व उपयोग हेतु उपलब्ध नहीं कराया जा सका है। जिसके कारण हिन्दी में अनेक अशुद्धियाँ के प्रयोग पाए जाते हैं। इसके लिए क्या व्यवस्थाएँ की जा रही हैं? 
 -- हरिराम



विश्व हिंदी सम्मेलन : सार्थकता, औचित्य व दायित्व   
 (डॉ.) कविता वाचक्नवी


“विश्व हिन्दी सम्मेलन” एक बहुत अच्छे उद्देश्य व मंतव्य से प्रारम्भ हुआ था। सरकार इसका खर्च वहन करती है, यह भी प्रशंसनीय है । किन्तु जैसा कि एकदम निर्धारित व स्थापित तथ्य बन चुका है कि बंदरबाँट के कारण बरती जाने वाली अदूरदर्शिता के चलते दुर्भाग्य से यह मात्र कुछ सांसदों, अधिकारियों व सम्बन्धों का आयोजन बन चुका है।


इसके लिए दोष किन्हीं अँग्रेजी वालों या अँग्रेजी को देना बहुत सीमा तक अनुचित है।....  क्योंकि मैं इसके लिए स्वयं हिन्दी वालों को उत्तरदायी समझती हूँ… वे किसी भी चीज का विरोध या समर्थन विवेक व सही गलत के आधार पर नहीं अपितु अपना लाभ-हानि देख कर करते हैं। इसीलिए जिन्हें जब तक इस सम्मेलन में सरकारी खर्च पर नहीं बुलाया जाता और जब तक इनके वांछितों के नियंत्रण में इसे नहीं सौंप दिया जाता, तब तक वे (हिन्दी से संबन्धित प्रत्येक संस्था, आयोजन, प्रकाशन आदि की तर्ज पर) इसका भी विरोध और मखौल उड़ाते रहेंगे/ रहते हैं और इस सम्मेलन के औचित्य पर प्रश्नचिह्न लगा कर इसे बंद कर देने के पक्ष में हल्ला मचाए रहेंगे/ रहते हैं। किन्तु हिन्दी से संबन्धित प्रत्येक संस्था, आयोजन, प्रकाशन आदि की तर्ज पर जैसे ही चीज उनके हाथ में आए या उन्हें सम्मिलित कर लिया जाए, उनका सारा विरोध और बहिष्कार टाँय टाँय फिस्स हो जाता है। मूलतः हम अधिकांश हिन्दी वालों की सारी लड़ाई अपने कारणों से शुरू होती है और अपने स्वार्थ की पूर्ति हो जाने पर समाप्त हो जाती है। हिन्दी वालों की पक्षधरताएँ स्वार्थ के बूते तय होती हैं। वे इस व्यापार को बखूबी जानते हैं कि कब किस के पक्ष में बोलना है, कब किसका विरोध करना है। मूलतः हिन्दी उनके व्यावसायिक हितों (?) को साधने का माध्यम- भर रह गई है।


ऐसे काल व वातावरण में व ऐसे ही लोगों के वर्चस्व के चलते कुछ बचे खुचे वास्तविक भाषाप्रेमियों की जगह-जगह व बार बार ऐसी-तैसी होती रहती है और उनके विचारों, सुझावों एवं मान्यताओं सहित उन्हें भी झटक कर दूर कर देने का कुचक्र जोर-शोर व सर्वमान्य ढंग से नियमित तथा प्रत्येक प्रकरण में जारी है।


इसी प्रवृत्ति का शिकार यह सम्मेलन भी गत कई वर्षों से होता आया है व हो रहा है। अधिकांश स्थापित लोग भी इसकी निंदा इसलिए करते हैं क्योंकि वे स्वयं इसका हिस्सा नहीं हैं। वे इसका बहिष्कार यहाँ तक करना चाहते हैं कि इस सम्मेलन को पूर्णतया समाप्त कर देने व सरकार द्वारा इसका खर्च न दिए जाने की वकालत करते हैं। जबकि सम्मेलन न होने देना समस्या का समाधान नहीं और न ही सम्मेलन का औपचारिकता-भर बन जाना केवल सरकार का दोष है। मेरे विचार में तो हिन्दी और भारतीय भाषाओं के पतन के लिए मूलतः इन भाषाओं के प्रयोक्ताओं  ही अधिक जिम्मेदार हैं, जो अपनी मानसिकता के कारण एक अच्छी चीज को भी अपने स्वार्थ/स्वार्थों के चलते नष्ट कर देने में सदा निमग्न रहते हैं।


वर्तमान संदर्भों में हिन्दी को जोड़ कर देखने वाले व उसका उत्थान चाहने वाले कुछ वरिष्ठ हिन्दी सेवियों ने इस सम्मेलन की `थीम’ सुझाने के लिए आयोजित हुई बैठक में `तकनीक और हिन्दी’ को `थीम’ के रूप में रखना प्रस्तावित किया था। किन्तु प्रस्ताव के चरण में ही उसे उस रूप में स्वीकार नहीं किया गया। इसका कारण क्या हो सकता है, यह अनुमान आप ऊपर लिखे गए वाक्यों के साथ जोड़ कर लगा सकते हैं। `तकनीक और हिन्दी’ एक ऐसा विषय है, जिस पर वही साधिकार बोल लिख सकता है, जो इस क्षेत्र से जुड़ा है। यह क्षेत्र नया होने के कारण इस पर सालों से तैयार पड़ी सामग्री का ढेर भी नहीं है कि कोई भी, कहीं से भी शुरू करे और कुछ भी बोल दे… जो कि सम्मेलनों में बरसों से बोलते चले आने का अभ्यास रखने वालों के लिए कठिन हो जाता । ऐसे में इस विषय का इस रूप में धराशायी हो जाना स्वाभाविक ही था।


अब इसी का दूसरा पक्ष एक और भी है। वह यह कि हिन्दी में तकनीक से जुड़े लोगों का 2-3 प्रतिशत भी ऐसा नहीं है जो भाषा संरचना, भाषा की सैद्धांतिकी आदि से परिचित हो। भारतीय भाषाओं और मुख्यतः हिन्दी में तकनीक के प्रयोक्ताओं में बहुत विरले लोग हैं जो भाषा का शास्त्र और भाषा का विज्ञान व सैद्धांतिकी जानते हैं व जिनकी एकेडमिक समझ प्रशंसनीय व तलस्पर्शी हो। इन 2-3 प्रतिशत को यदि हमारा भाषासमाज, आयोजक, संस्थाएँ और संगठन आदि सही व समुचित आदर, स्थान व महत्व नहीं देते हैं तो यह दोष उन लोगों का है, उस समाज का है और उसे हानि उठानी ही पड़ेगी। हर क्षेत्र की तरह यहाँ भी नकली लोग अपनी चाँदी काटने में व्यस्त हो ही जाएँगे… यथापूर्वम्… ! तकनीक व भाषिक उर्वरता के मध्य की इस खाई का लाभ स्वार्थसिद्धि में रत मानसिकता को मिलता ही है। इसका कुछ दोष उन अकादमिक लोगों पर भी है जो तकनीक से बिदकते हैं और उसे भाषा व साहित्य के लिए त्याज्य व निकृष्ट समझते हैं।


इन तथ्यों और वस्तुस्थिति के आलोक में देखने पर आपके ये प्रश्न जिनसे समाधान की आशा करते हैं …. उनके पास उत्तर नहीं होने से पहले, उत्तर देने वालों का ही न होना एक बड़ी त्रासदी है। किन्तु इस त्रासदी के लिए हम सभी स्वयं उत्तरदायी हैं, हमारे भाषा-समाज की मानसिकता उत्तरदायी है। … क्योंकि वस्तुत: सरकार पैसा लगा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है और कुम्भ की तरह सांसद, अधिकारी व उनके परिचित भी कृतकृत्य हो जाते हैं। आयोजन को सार्थक व ठोस बनाने रखने का दायित्व तो स्वयं हिन्दी वालों का है, अतः उसके सार्थक व ठोस न होने का दायित्व भी हमारा ही हुआ। सम्मेलन के आयोजन पर ही प्रश्नचिह्न लगाना मुझे इसीलिए उपयुक्त नहीं लगता।


जब तक हिन्दी भाषासमाज की मानसिकता कई ढेरों-ढेर इच्छाओं (?) से उबरती नहीं है, तब तक आपको व हमें यक्ष की तरह युधिष्ठिर के आने की प्रतीक्षा में अपने प्रश्नों के साथ जलाशय की रखवाली जिस किसी तरह करते रहने को शापित रहना होगा और युधिष्ठिरों का पथ प्रशस्त करने के लिए स्वयं बुरे बन कर अन्य `प्यासों’ को मूर्छना की कसैली औषध पिलाते रहना होगा।

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सोमवार, 10 सितंबर 2012

सामाजिक न्याय और वेब मीडिया : (डॉ.) कविता वाचक्नवी

 सामाजिक न्याय और वेब मीडिया : एक छोटी टीप    - (डॉ.) कविता वाचक्नवी



सामाजिक न्याय में वेब मीडिया की भूमिका के संदर्भ में हमें मीडिया के सभी आधुनिक स्वरूपों से व उसकी शक्ति से परिचित होना अनिवार्य है। इस आधुनिक स्वरूप में उसकी जनांदोलनकारी भूमिका के साथ साथ सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर उपस्थित आम आदमी की सामाजिक न्याय के प्रति आस्था व आवश्यकता भी कोई कम महत्व की नहीं है। वह आम आदमी अपने छोटे छोटे सरोकारों से लेकर व्यापक अंतरराष्ट्रीय सरोकारों तक से अपने को प्रभावित पाता है व उन पर अपनी राय देता है। ऐसे अनेकानेक छोटे बड़े मुद्दों पर वह अपने मित्रों, परिचितों व साथियों तक को विचार विमर्श के लिए साथ ले लेता है और एक संवाद स्थापित करता चलता है। आधुनिक तकनीक का कमाल यह है कि जितने अधिक लोग जिस कथ्य को अधिक देखते हैं वह कथ्य उतना ऊपर व आगे आता जाता है और इस अनुपात में व इस तकनीक से और- और लोगों के सम्मुख वह स्वतः ही उपस्थित हो जाता है और उनकी सोच को प्रभावित करने के साथ साथ उन्हें राय देने या राय बनाने को विवश कर देता है। कथ्य, तथ्य अथवा विचार की नकारात्मकता अथवा सकारात्मकता इसमें मायने नहीं रखती। इसलिए और भी आवश्यक हो जाता है कि सकारात्मक व जनोपयोगी लोकहितकारी प्रसंगों के साथ अधिकाधिक लोग खड़े हों ताकि वे ही चीजें वेबपन्नों पर क्रम से आगे आती जाएँ। यह एक प्रकार से समाज-मानसिकता के निर्माण की तकनीक भी है।


वेब ने सामाजिक न्याय के प्रति आस्था व उसकी इच्छा रखने वाले विश्वभर के व्यक्तियों व समूहों को परस्पर निकट लाने व संवाद स्थापित करने, सूचनाएँ, जानकारियाँ व विचारों के आदान-प्रदान के साथ साथ विमर्श को सरल व संभव कर दिया है। ये मुद्दे स्थानीय राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर तक के होते हैं। 


वेब पर मीडिया से अभिप्राय मात्र पत्र-पत्रिकाओं तक ही सीमित नहीं है।  ईमेल, ब्लॉग, माईक्रोब्लॉग्ज, पॉडकास्ट, कंटेन्ट शेयरिंग साईट्स (यूट्यूब, फ्लिकर, विमिओ आदि ) सोशल नेटवर्किंग साईट्स, भांति भांति के गूगल व याहू समूह, ऑनलाईन पटीशन, ईमेल कैम्पेन्स (email campaigns),  दूरस्थ वीडियो अदालतें आदि वेब के माध्यम से संभव हुई हैं और जनमत तैयार करने से लेकर न्यायप्रणाली पर दबाव बनाने तक में अपनी कारगर भूमिका निभा रही हैं। `विकीलीक्स' से बड़ा उदाहरण शायद ही कोई हो, जिसके कर्ता धर्ता जूलियन असांजे को लंदन स्थित किसी दूसरे देश (Ecuador) के दूतावास में जीवन बिताने को बाध्य होना पड़ रहा है क्योंकि उसने वेब मीडिया की न्यायपक्षीय ऐसी शक्ति व हथियार का उपयोग किया जिससे कई देशों की सरकारें सांसत में पड़ गईं। 


वेब मीडिया की सामाजिक न्याय में बढ़ती इसी भूमिका के चलते सरकारें इन्टरनेट और वेब पर पर तरह तरह के प्रतिबंधों पर उतर आई हैं। ऐसे प्रतिबंधों का सीधा-सा अर्थ यही है कि सामाजिक न्यायप्रणाली में कोई खोट है, जिसके प्रतिकार के लिए उठी आवाजों की शक्ति के आगे सत्ता का भूगोल डोलने लगा है।  


भारत में अभी-अभी असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी ने वेब की शक्ति व सामाजिक न्याय के प्रति उसकी भूमिका  को भारतीय मानस के सम्मुख फिर से प्रमाणित कर दिया है। इस समय वेब पर असीम के बनाए कार्टूनों को एक दूसरे के साथ बाँटने की बाढ़ आई हुई है और इन्टरनेट पर छोटे बड़े पोर्टल से लेकर आम आदमी तक इस घटना का विरोध करता दीख रहा है। बीबीसी की साईट की पहली पंक्तियाँ थीं - "जिस तरह से असीम त्रिवेदी को गिरफ्तार किया गया है उससे लगता है कि इस सरकार का आम जनता के साथ, भारत के लोकतंत्र के साथ रिश्ता खत्म हो चुका गया है।"   एक तरह से पूरा वेब मीडिया असीम के पक्ष में जनमत जुटाने व तैयार करने में कमर कस कर लगा है। वेब मीडिया की ऐसी भूमिका उन बड़े सामाजिक परिवर्तनों की सूत्रधार निस्संदेह बन रही है जिनकी आवाश्यकता आम आदमी को न्याय जुटाने के लिए अक्सर होती है।

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शनिवार, 16 जून 2012

"विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण : परिदृश्य' और "यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी 2012"

`यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी 2012' और ग्रंथ का प्रकाशन :  (डॉ.) कविता वाचक्नवी 



आज का सुप्रभात दरवाजे पर तेज खटखटाए जाने पर टूटी नींद से हुआ ।

 डाक में हिन्दी बुक सेंटर से अभी अभी कुछ ही दिन पूर्व प्रकाशित -  " विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण : परिदृश्य : संगोष्ठी समग्र "  ग्रंथ की लेखकीय प्रति मिली है। 

यह ग्रंथ प्रोफेसर श्रीश चंद्र जैसवाल जी के सम्पादन में छपा है और स्पेन के वय्यादोलिद विश्वविद्यालय में हुई यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी (15-17 मार्च 2012)    में  प्रस्तुत किए गए सभी शोध पत्रों का संकलन है। 

पूरा ग्रंथ आर्ट पेपर जैसे कागज़ पर छपा है। ग्रंथ के स्वत्वाधिकार हिन्दी विभाग, विदेश मंत्रालय के पास सुरक्षित हैं। 

कुल 32 आलेख इसमें संकलित हैं।  लेखों का क्रम सत्रवार रखा गया है।  
मेरे आलेख " भाषा प्रकार्यों के अधुनातन संदर्भ और हिन्दी " को पृष्ठ  46 से 51 पर पढ़ा जा सकता है।


प्रकाशक का पूरा पता है  -

हिन्दी बुक सेंटर 
4/5-बी, आसफ अली रोड, नई दिल्ली 110 002 


सम्मिलित लेखक हैं -

सर्वश्री


  • उदय नारायण सिंह (विश्वभारती शांति निकेतन )
  • अफजाल अहमद (Lisboa)
  • अलका आत्रेय चूडाल (ऑस्ट्रिया)
  • आलेसांद्रा कोंसोलारो (इटली)
  • यूस्तीना कुरोव्स्का (बॉन, जर्मनी)
  • महेंद्र किशोर वर्मा (यॉर्क)
  • रमेश चन्द्र शर्मा (बेल्जियम)
  • ऐश्वर्ज कुमार (केंब्रिज )
  • गेनादी श्लोम्पेर (इज़राईल)
  • हर्मन वान ऑल्फेन (अमेरिका)
  • कविता वाचक्नवी (लंदन )
  • अरुण प्रकाश मिश्रा (स्लोवेनिया)
  • बिलजाना ज़्रनिक (क्रोएशिया )
  • दानूता स्ताशिक (पोलैंड )
  • हैंज़ वेर्नर वैस्लर (उपासला, स्वीडन )
  • इंदिरा गाज़िएवा (मॉस्को)
  • लुदमीला खोखलोवा (मॉस्को)
  • सबीना पोपर्लान (बुखारेस्ट, रोमानिया )
  • विजया सती (बुदापैस्ट)
  • मोहन कान्त गौतम (नीदरलैंड)
  • जगन्नाथ वी. आर. (वर्धा )
  • वैश्ना नारंग (दिल्ली)
  • कैलाश नारायण तिवारी (पोलैंड )
  • नवीन चंद्र लोहानी (स्विट्जरलैंड)
  • एस. वी. एस. एस. नारायण राजू (बुल्गारिया)
  • तात्याना औरन्स्कया (हैम्बर्ग, जर्मनी)
  • शिव कुमार सिंह (लिस्बन, पुर्तगाल )
  • दीप्ति गोलानी (बार्सेलोना, स्पेन)
  • श्रीश चंद्र जैसवाल (वय्यादोलिद, स्पेन)
  • अशोक चक्रधर (दिल्ली)
  • विभूति नारायण राय (वर्धा)
  • पूनम जुनेजा (मॉरीशस)



स्पेन संगोष्ठी के बारे में अधिक जानने व चित्रों के लिए निम्नलिखित लिंक्स क्लिक कर देखें - 


योरोपीय हिन्दी कॉन्फ्रेंस 2012




यूरोपीय हिन्दी कॉन्फ्रेंस 2012, स्पेन से लौटकर 




यूरोपीय हिन्दी कॉन्फ्रेंस और स्पेन : जैसा मैंने देखा 




यूरोपीय हिंदी संगोष्ठी,स्पेन, 2012 :समग्र रिपोर्ट व विवरण









मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

यमुनानगर में हुआ इंटरनेट हिन्दी लेखक सम्मेलन

यमुनानगर में हुआ इंटरनेट हिन्दी लेखक सम्मेलन : रवीन्द्र पुञ्ज 
http://nukkadh.blogspot.com/2012/04/blog-post_10.html


हमारे हाथ में इंटरनेट पर हिंदी रूपी ऐसी तलवार है जिससे हम बहुत कुछ कर सकते हैं लेकिन वास्तव में हम उससे घास ही खोद रहे हैं। उक्त बात ब्लॉगर मिलन कार्यक्रम की मुख्य अतिथि यमुनानगर की प्रवासी साहित्यकार डॉ. कविता वाचक्नवी ने कही।

यमुनानगर में संपन्न हुए ब्लॉगर सम्मेलन में हिन्दी चिठाकार (ब्लॉगर) एकत्रित हुये। इस कार्यक्रम की मुख्य अतिथि लंदन से पधारी साहित्यकार डॉ. कविता वाचक्नवी हिन्दी भारत नामक ब्लॉग की संचालिका हैं जिस पर हिन्दी भाषा, साहित्य एवं समसामयिक विषयों पर अपने विचार लिखती हैं और स्त्रीविमर्श की मुखर लेखिका हैं।

ब्लॉगिंग के द्वारा हिन्दी साहित्य के प्रसार के बारे में विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति का बेहतरीन माध्यम है। यहां पर हम खुद लेखक और खुद ही प्रकाशक हैं इसलिए विचारों की अभिव्यक्ति के बीच कोई बाधक नहीं है। सबसे बड़ी बात कि हमें बिना कुछ खर्च किए एक बड़ा पाठक वर्ग मिल जाता है। उन्होंने हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए इसके कंप्यूटरीकरण की आवश्यकता पर बल दिया। आज की युवा पीढ़ी के लिए उन्होंने हिंदी की पुस्तकों के डिजिटलाइजेशन पर विशेष बल दिया। उन्होने कहा कि सरकार को कंप्यूटर के क्षेत्र में हिंदी समर्थन को अनिवार्य बनाना चाहिए। उनका यह भी कहना था कि हिंदी उत्थान की दिशा में विदेशों में भारत की अपेक्षा अधिक काम हो रहा है क्योंकि वे हिंदी की मार्किट पर कब्जा जमाना चाहते हैं।

कार्यक्रम में उपस्थित चिटाकार गणित अध्यापक श्रीश बेंजवाल हिन्दी कम्प्यूटिंग विशेषज्ञ हैं तथा हिन्दी में ई-पण्डित नामक लोकप्रिय टैक्नोलॉजी ब्लॉग चलाते हैं। वे यमुनानगर के पहले हिन्दी ब्लॉगर हैं। डॉ. प्रवीण चोपड़ा रेलवे में चिकित्सक हैं तथा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सम्बन्धी ब्लॉग सेहतनामा और मीडिया डाक्टर चलाते हैं। दर्शनलाल बवेजा विज्ञान अध्यापक हैं, विज्ञान लेखन में सक्रिय हैं तथा विज्ञान गतिविधियां नामक ब्ल$ॉग चलाते हैं। रविन्द्र पुंज ग्राफिक्स डिजाइनर हैं तथा यमुनानगर हलचल नामक न्यूज ब्लॉग और आरकेपुंज नामक ब्लॉग चलाते हैं। हिन्दी अध्यापक एवं सामाजिक कार्यकर्ता उमेश प्रताप वत्स कवि एवं कथाकार हैं तथा उमेश का अखाड़ा नामक ब्लॉग लिखते हैं। 

कार्यक्रम में हिन्दी ब्लॉगिंग के स्वरूप तथा प्रचार-प्रसार के बारे में विचार विमर्श हुआ। प्रवीण चोपड़ा तथा दर्शनलाल बवेजा ने विज्ञान एवं स्वास्थ्य ब्लॉगिंग सम्बंधी अपने अनुभव साझा किये। रविन्द्र पुंज ने ब्लॉग को पत्रकारिता के माध्यम के तौर पर प्रयोग करने सम्बंधी जानकारी दी। कार्यक्रम का समापन उमेश प्रताप वत्स ने अपनी कविता से किया। यमुनानगर के हिन्दी ब्लॉगरों का प्रयास है कि इंटरनेट पर हिन्दी भाषा लोकप्रिय हो और अधिक से अधिक यमुनानगर वासी इससे जुड़ें।

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गौरतलब है कि ब्लॉग एक डायरी शैली की वेबसाइट होती है तथा ब्लॉग लिखने वाला ब्लॉगर कहलाता है। हिन्दी में ब्लॉग को चिटठा तथा ब्लॉगर को चिटाठाकार कहा जाता है। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो इंटरनेट को लेखन के माध्यम के तौर पर प्रयोग करने वाला ब्लॉगर कहलाता है।
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गत रविवार को यमुनानगर में हुये चिट्ठाकार सम्मेलन की आज के समाचार-पत्रों में धूम रही। आइये नजर डालते हैं इस कार्यक्रम सम्बन्धी कुछ प्रमुख अखबारों की कतरनों पर।

दैनिक जागरण
» समाचार वाला पूरा पन्ना (दायीं तरफ बीच में देखें)

पंजाब केसरी
» समाचार वाला पूरा पन्ना (नीचे दायें कोने में देखें)

दैनिक भास्कर
» समाचार वाला पूरा पन्ना (ऊपर दायें कोने में देखें)
» अलग से समाचार देखें (दायीं तरफ वाला)



अमर उजाला
» समाचार वाला पूरा पन्ना (Edition बॉक्स में Chandigarh-Ambala चुनकर, बायीं तरफ साइडबार में MyCity YMN क्लिक करके पेज नं॰ 4 क्लिक करें)
» अलग से समाचार देखें (यूनिकोड में)


हरिभूमि
» समाचार वाला पूरा पन्ना (बायीं तरफ Rohtak पर क्लिक कर पेज नं॰ 12 पर जायें, पन्ने पर नीचे दायीं तरफ देखें)




दैनिक ट्रिब्‍यून» दैनिक ट्रिब्‍यून के पेज नं0 4 पर न्‍यूज 



पूरा समाचार यमुनानगर-हलचल पर भी यहाँ पढ़ा जा सकता है।


रविवार, 5 फ़रवरी 2012

`स्त्री होकर सवाल करती है..!' : `दैनिक जागरण' में

`स्त्री होकर सवाल करती है..!' : `दैनिक जागरण' में 



गत दिनों मैंने बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित एक संकलन के विमोचन की सूचना इन्हीं पन्नों पर दी थी। 
आज 5 फरवरी 2012 के `दैनिक जागरण' में `स्त्री होकर सवाल करती है...' संकलन पर एक प्रतिक्रिया -







 facebook women writer
स्त्री होकर सवाल करती है..!


राजू मिश्र।


फेसबुक को लेकर यह भ्रम टूटा है कि आत्म प्रचार का अखाड़ा या फिर टाइमपास का ही माध्यम मात्र है। यह भी साबित हुआ है कि सकारात्मक कर गुजरने की गुंजाइश हर जगह और हर परिस्थिति में होती है। इस बात की गवाह है-'स्त्री होकर सवाल करती है..!' इस पुस्तक में ऐसी कविताओं को संकलन सूत्र में पिरोया गया है, जो फेसबुक पर सक्रिय 383 महिला रचनाकरों की हैं। यह ऐसी रचनाएं हैं, जिन्हें अपनी वाल पर टैग देखकर मित्र सराहना करते, कुछ दो शब्द लिखने में भी सकुचाते, तो कुछ लाइक का बटन दबाकर काम चलाते रहे। इन रचनाओं को संकलित किया है साहित्यकार मायामृग ने।


यह संकलन उस धारणा को भी बकवास करार देता है कि किचन में आटा रांधने वाली घरेलू स्त्री का सृजनात्मकता से कोई वास्ता नहीं। संकलन निकालने का विचार कैसे कौंधा? इस सवाल पर मायामृग कहते हैं-'..विचार लगातार रचनाओं को पढ़ते हुए बना। महसूस हुआ कि यहां मौजूद रचनाकारों पर जो आक्षेप साहित्यिक गोष्ठियों में बहुधा लगाए जाते हैं, वे वैसे नहीं हैं।'


बहरहाल फेसबुक पर इस संकलन की चर्चा बुलंदी पर है। रचनाकार अपनी कविताओं को किताबी शक्ल में पाकर फूली नहीं समा रहीं। कवि ललिता प्रदीप पांडेय का मानना है कि संकलन का यह प्रयोग सर्वथा नया है और स्वस्तिमयी आश्वस्ति देने वाला है। संकलन की संपादक डा. लक्ष्मी शर्मा कहती हैं कि यह पूरी परंपरा को चुनौती है, जिसने सवालों का सदा कत्ल किया। पुरुष सत्ता स्त्री के सवाल को हमेशा दबाती आई है। मायामृग कहते कैं कि रिस्पांस वाकई उत्साह बढ़ाने वाला है। नई योजनाओं के लिए प्रोत्साहित करता है। अभी आगे के लिए कुछ स्पष्ट तय नहीं किया है, लेकिन फेसबुक पर मौजूद रचनाकारों से विषय के बंधन से रहित कविताएं, गजलें आमंत्रित करने पर विचार चल रहा है। उम्मीद है जल्द कुछ तय हो पाएगा।


प्रमुख रचनाएं


अनवरत युद्ध [आभा], प्रेम करने वाली औरतें [अतुल कनक], नदी [अर्पण], ए आदमी [अलका], तुम्हारा यह घर [अनुज], स्त्री और स्त्री [अर्पिता], औरत [बेबी], कमरा, बच्ची और तितलियां [गोपीनाथ], पहचान हूं मैं [गीता], डर है [हिमांशु], दोष [प्रयास], स्तब्ध [कविता], सोचना तो होगा [अजय], भरोसे की कीमत [ललिता पांडेय], अभाव [निशा], कैसे कर लेते हो ? [निधि ] नई युद्ध नीति [प्रेम], मैं हूं स्त्री [प्रेरणा], स्त्रियां [रमेश], स्त्रियों के नाम [रवि], परिचय [शर्मिष्ठ], कल जब मैं न रहूंगी [सुमन]।
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