Monday, May 6, 2013

तकनीक, विवेक और उगालदान

तकनीक, विवेक  और उगालदान : कविता वाचक्नवी



मानव के हित व सुविधा के लिए विज्ञान ने नवीनतम कल्पनातीत संसाधन विकसित कर लिए हैं, किन्तु इन संसाधनों के सदुपयोग का विवेक जब तक इसके प्रयोक्ताओं में विकसित नहीं होता तब तक ये संसाधन मानव के लिए अहितकारी ही हैं, क्योंकि अधिकांश प्रयोक्ता विवेकहीन ही हैं या इनका सामर्थ्य नहीं जानते। टीवी के साथ भी यही स्थिति थी कि पूरा समाज उसका गुलाम हो कर मनोरंजन, स्वार्थ और सामाजिक पतन के लिए बहुधा उसका उपयोग करता आ रहा है।


उस से भी बदतर स्थिति इंटरनेट की है। इंटरनेट पर हिन्दी की स्थिति को यदि देखें तो, इसके सुदूरगामी उपयोगों की जानकारी इसके 95% प्रयोक्ताओं को नहीं है, और विवेक तो 98% प्रयोक्ताओं को नहीं। वे अपने भीतर की सारी गंदगी, सारा व्यभिचार, समस्त कुंठाएँ, दूसरों को अपमानित कर अपनी हीनताग्रंथि को संतुष्ट करने वाले मनोरोगों, नीचताओं, छपास, लोगों की जानकारियाँ चुरा कर सुरक्षा सम्बन्धी दाँव-पेंचों, महिलाओं /लड़कियों से छेड़छाड़ व उन्हें नीचा दिखाने/आक्रान्त करने/कुत्सित्तापूर्ण आचरण करने व अपने घिनौने से घिनौने गंदे से गंदे आचरण को छद्म की तरह प्रस्तुत करने में अधिक रमे हैं। 


सामाजिक शिष्टाचार (?) से कोसों दूर, ध्यानाकर्षण हेतु  ('अटेन्शन सीकर' के रूप में)  कुछ भी/ किसी भी हद तक करने को उतारू लोगों के हाथ में ऐसे उपयोगी संसाधनों का लग जाना इसीलिए मानवहित की अपेक्षा अहित का बड़ा कारण है। इसीलिए तकनीक विध्वंस की जनक है यदि उसके प्रयोक्ताओं में उसके उपयोग का विवेक न हो। विवेकहीन समाज के हाथ में ये बंदर के हाथ में उस्तरे की भाँति हैं। परमाणु की खोज और उस से परमाणु हथियारों की तरह... । 


मर्यादा, सीमा व अंकुश जैसे शब्दों तक से अपरिचित इन निरंकुश लोगों के चलते नेट पर सदा के लिए ऐसी गंदगी सुरक्षित हो रही है जिसे देख, पढ़, जान कर आगामी पीढ़ियाँ क्या अर्थ लगाएँगी इसकी करुण कल्पना की जा सकती है। काश लोग अपनी ऊर्जा, समय व शक्ति किन्हीं सार्थक, महत्वपूर्ण व आवश्यक कार्यों में लगाएँ और इस संसाधन की शक्ति पहचानें। इतना अनुत्तरदायी वातावरण किसी भी समाज के असली चरित्र का पता देने के लिए पर्याप्त है। 


तकनीक का दुरुपयोग करने वाला समाज अपने विनाश की कगार पर तो बैठा ही है, साथ ही वह अपनी गंदगी के सार्वजनीकीकरण की शक्ति और प्रसार का माध्यम पा गया है। महिलाओं को अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है। जिन-जिन को उनके घिनौने कारनामों के लिए निकाल बाहर फेंका गया होता है वे बदला लेने के लिए भयंकर हथकंडे, झूठ व अस्त्र लेकर चरित्रहनन के अपने पारंपरिक तरीकों में जुट जाते हैं, जुटे हुए हैं। जनता न्यायधीश बनकर आह और वाह करती बिना सच जाने फैसले लेती अपनी मूढ़ता व मूर्खता प्रमाणित करती है।


यह सारा दृश्य इतना घृणास्पद, इतना कलुषित, इतना आपराधिक, निंदनीय व लज्जास्पद है कि कोई हिन्दी पढ़ सकने वाला बाहर का अन्य व्यक्ति (थर्ड पर्सन) इसे पढ़े तो हिन्दी वालों की ओर कभी मुँह न करे, और खूब वितृष्णा से भर जाए। ऐसे कम से कम 20-22 उदारहण मेरे पास हैं जब किसी परिचित परिवार के नई पीढ़ी के युवक युवतियों ने ब्लॉग और फेसबुक जगत के पचासों उदाहरणों का उल्लेख कर हिन्दी-समाज के इस घिनौने ताण्डव के चलते अपनी खूब घृणा व्यक्त की और इनसे हजार कदम दूर रहने की बात की। 


स्पैम, वायरस और आर्थिक फ्रॉड जैसे इन्टरनेट अपराधों में भारतीय समाज यद्यपि अग्रणी नहीं है अपितु आनुपातिक दृष्टि से यद्यपि कम है, किन्तु मूल्यहीनता, चारित्रिक अपराधों, सामाजिक दूषणों, भाषिक व्यभिचारों, छीना-झपटी, मारामारी, हाय-हाय, लड़कियों व बच्चों की खरीद फरोख्त, मानव तस्करी, राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ धोखाधड़ी, रिश्वतों के आदान-प्रदान, कॉपीराईट के उल्लंघन, रचनात्मकता कृतियों की चोरी, हेराफेरी, अश्लीलता, देह व्यापार, ठगी, हिंसात्मक गतिविधियों, झूठ बोलने, धमकाने, छेड़छाड़ करने, नकली पहचान बनाने, बाल-पोर्नोग्राफ़ी, हथियारों की तस्करी, हैकिंग, ईमेल व चैटरूम अपराधों, सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर अपमानित करना/ धमकाना/ छेड़छाड़, भुगतान किए बिना डाऊनलोड, महिलाओं के चित्रों के साथ छेड़छाड़ कर उन्हें मनोवांछित अश्लील रूप में ढालना, अश्लील सामग्री को वितरित करना व दुरुपयोग करना, वर्ग और वाद को लेकर हिंसात्मकता, भाषिक आक्रामकता, सम्पर्कों से छ्द्म व लाभ उठाने की प्रवृत्ति, घृणा फैलाने वाली सामग्री व व्यवहार, अधिकाधिक लोगों के व्यक्तिगत नेट खातों में निरर्थक ताकझाँक व फूहड़ टिप्पणियाँ इत्यादि पचासों छोटे बड़े हथकण्डे बहुत अधिक व खतरनाक मात्रा में हैं। गुणवत्तापूर्ण लेखन का नेट पर लगभग नितान्त अभाव व दूसरी ओर निरर्थक व कूड़ा सामग्री का अम्बार भी चिंतनीय तथ्य हैं। अपनी तुच्छताओं व कुंठाओं का बेहद भोंडा प्रदर्शन, अपढ़ता व तज्जन्य हाहाकार की भयावहता अत्यन्त गम्भीर सीमा तक देखी जा सकती है। 


जो चपल, चालाक, धूर्त, दुष्ट, पतित, बदमाश, चोर, उचक्के व चरित्रहीन समाज के सभ्य वर्ग में वर्जित व प्रतिबंधित थे, दरवाजे की देहरी तक न लाँघ सकते थे, न लाँघने की अनुमति किसी सभ्य परिवार में दी जा सकती है, वे इन माध्यमों से दूर बैठे कैसी भी गंदी से गंदी भाषा, गंदे से गंदे व्यवहार, धमकियाँ, झूठ और अश्लीलता करने में निश्शंक हो गए हैं। जिन लोगों का किसी क्षेत्र में कोई अस्तित्व नहीं है, कोई भूमिका नहीं है, नेपथ्य में रहने योग्य हैं, गली-सड़ी मानसिकता के हैं, नजर में आने के लिए कुछ भी लम्पटई तक करने को उतारू हो सकते हैं, वे सब इन्टरनेट का उपयोग कर अपने अहम को पोसने व दंभ के प्रदर्शन के लिए दूसरों पर कीचड़ उछाल का खेल तक खेलने से नहीं चूकते।


इतने उपयोगी संसाधन का ऐसा घटिया, अनुत्तरदायी, अविवेकी, दुरुपयोग जहाँ समकालीन समाज के लिए खतरे व चिंता का विषय है, वहाँ आने वाले समय के लिए सुरक्षित कर रखे जा सकने वाले ज्ञान व वाङ्मय के कोश में कोई योगदान न देने के लिए भी दोषी है। नेट पर फैले इस भाषा, वर्तनी, सामग्री व व्यवहारों के कचरे में से कैसे आने वाली पीढ़ियाँ सही सामग्री खोज पा सकेंगी ! क्या सीख सकेंगी और अपने इतिहास के मूल्यांकन से कैसे जूझेंगी, यह किसी की चिंता का विषय नहीं। जिसके जो मन में आता है वमन कर देता है। इन्टरनेट उनके लिए उगालदान हो गया है। ऐसे लोगों को देख, सुन, जान कर वितृष्णा से मन भर उठता है उनके प्रति। 

हाय रे भारत देश ! कब विवेक जागेगा लोगों का !



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