Monday, December 15, 2008

घर : दस भावचित्र


घर : १० भाव चित्र

घर : दस भावचित्र

( कविता वाचक्नवी )






(1)
*

ये बया के घोंसले हैं,
नीड़ हैं, घर हैं- हमारे
जगमगाते भर दिखें
सो
टोहती हैं
केंचुओं की मिट्टियाँ
हम।
**********

(2)
*

आज
मेरी बाँह में
घर गया है
किलक कर,
रह रहे
फ़ुटपाथ पर ही
एक नीली छत तले।
*********

(3)
*

चिटखती
उन
लकड़ियों की गंध की
रोटी मिले
दूर से
घर लौटने को
हुलसता है
मन बहुत।
**********

(4 )
*

सपना था
काँच का
टूट गया झन्नाकर
घर,
किरचें हैं आँखों में

नींद नहीं आती।
*************

(5 )
*

जब
विवशता
हो गए संबंध
तो फिर घर कहाँ,
साँस पर
लगने लगे प्रतिबंध
तो फिर घर कहाँ?
***************

(6 )
*

अंतर्मन की
झील किनारे
घर रोपा था,
आँखों में
अवशेष लिए
फिरतीं लहरें।
*************

(7)
*

लहर-लहर पर
डोल रहा
पर
खेल रहा है
अपना घर,
बादल!
मत गरजो बरसो
चट्टानों से
लगता है डर।
************


(8 )
*

घर
रचाया था
हथेली पर
किसी ने
उँगलियों से,
आँसुओं से धुल
मेहँदियाँ
धूप में
फीकी हुईं।
************


(9 )
*

नीड़ वह
मन-मन रमा जो
नोंच कर
छितरा दिया
तुमने स्वयं
विवश हूँ
उड़ जाऊँ बस
प्रिय!
रास्ता दूजा नहीं।
***************

(10 )
*


साँसों की
आवाजाही में
महक-सा
अपना घर
वार दिया मैंने
तुम्हारी
प्राणवाही
उड़ानों पर।


(अपनी पुस्तक "मैं चल तो दूँ ", सुमन प्रकाशन, २००५, से )






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