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शुक्रवार, 24 जून 2016

ब्रिटेन का भविष्य अब संसद (सांसत) में !

ब्रिटेन का भविष्य अब संसद (सांसत) में : कविता वाचक्नवी



‪#‎ब्रिटेन‬ की अर्थव्यवस्था, समाज और राजनीति में भारी उथल-पुथल मचा हुआ है। जनमत में योरोपीय महासंघ से अलग होने को बहुमत जो मिला है। 


इस वस्तुस्थिति के दो पक्ष हैं। एक तो यह कि वस्तुतः इस जनमत से आज की तिथि में ब्रिटेन महासंघ से न अलग हुआ है , न अलग होने जा रहा है। पहली बात तो यह कि जनमत के पश्चात् अब यह निर्णय देश की संसद में लिया जाना शेष है (यद्यपि संभावना यही है कि सांसद भी अपने अपने क्षेत्रों की जनता के विरोध में नहीं जाएँगे), फिर दूसरी बात यह कि यदि वे भी अलग होने पर मुहर लगा दें तो आधिकारिक रूप से महासंघ से अलग होने में 2 वर्ष का समय लगेगा, प्रक्रिया पूरी होने में।

दूसरा पक्ष यह कि मुद्रा ने डुबकी लगाई है जिससे राष्ट्र का सकल मुद्रा भण्डार निस्संदेह कमतर हुआ है, बृहद व्यापारिक प्रतिष्ठानों ( विशेषतः जो विदेशी मूल वालों द्वारा संचालित हैं) के विदेशी मूल के कर्मचारियों में अनिश्चय है। इस मध्य मात्र गत 2 घण्टे में ब्रिटेन ने 350 बिलियन पाउण्ड के अंतरराष्ट्रीय निवेश खो दिए हैं,  यह राशि योरोपीय महासंघ की चालीस वर्ष  की सदस्यता राशि के बराबर है।  पर ये सब छोटी बातें हैं। 

इन सबके मध्य सबसे भयंकर स्थिति यह है कि देश टूटने की कगार पर आ गया है, विशेषतः स्कॉटलैंड और आयरलैंड राज्य (जिन्होंने महासंघ के साथ रहने के पक्ष में मत दिया) वे अब अब देश से अलग होकर स्वतन्त्र देश के रूप में अपने भविष्य पर पुनर्विचार करने लगे हैं और आगामी 2 वर्ष में यह कभी भी घट सकता है। उत्तरी आयरलैण्ड के लोगों ने तो आज ही से अपनी नागरिकता बदलने की कवायद भी प्रारम्भ कर दी है।

इन सब स्थितियों को देखते हुए ब्रिटिश सांसदों (विशेषतः जो योरोपीय महासंघ से अलग होने का समर्थन करते हैं) पर संसद में अपना मत देते समय यह उत्तरदायित्व (बल्कि दबाव) होगा कि वे महासंघ से अलग होने की पैरवी करते समय देश के भी टुकड़े करने की पैरवी करेंगे।

संसद का निर्णय ही इस देश का इस देश के भौगौलिक रूप में भविष्य को भी तय करने वाला होगा। अन्यथा महासंघ से अलग होना यानि इस देश का दो या तीन भागों में विभक्त होना सिद्ध हो सकता है।

ध्यातव्य है कि यह सारा खेल अति-उदारवादी विचारधारा  के गर्भ से जन्मा और उसी की प्रचण्ड प्रतिक्रिया है। इसका सीधा प्रभाव अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव पर भी पड़ेगा।
 भारत इस से कुछ संकेत ग्रहण कर सके तो हितकर होगा।

  ‪#‎KavitaVachaknavee‬ #‎Brexit‬ ‪#‎UK‬

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

लन्दन में भारतीय इतिहास का यह पृष्ठ



गत दिनों एक दूर के सम्बन्धी के देहावसान पर लन्दन के गोल्डर्स ग्रीन शवदाह गृह (क्रेमेटोरियम) जाना हुआ। इस के विशाल प्रार्थना सभाकक्ष की मुख्य दीवार में लगभग 15 फीट की ऊँचाई पर सोने की तारों और मीनाकारी से सजी तीन संगमरमर की शिलाएँ गड़ी हुई हैं, जिन्हें अपनी खोजबीन वाली आदत के चलते ध्यान से पढ़ा तो पता चला कि एक ही परिवार के तीन व्यक्तियों (पिता व दो पुत्र) के निधन पर उनकी सूचना देने के लिए लगाई गई हैं और वे तीनों भारतीय थे। मुख्य शिला 21 अगस्त 1911 को दिवंगत हुए महाराजा नृपेन्द्र नारायण भूप बहादुर की स्मृति में है और उसकी एक ओर लगी छोटी शिला उनके बड़े बेटे महाराजा राज राजेन्द्र नारायण भूप बहादुर (11 अप्रैल 1882 - 1 सितम्बर 1913 ) की स्मृति में तथा दूसरी ओर लगी छोटी शिला नृपेन्द्र नारायण जी के द्वितीय पुत्र महाराजा जितेन्द्र नारायण भूप बहादुर (20 दिसम्बर 1886 - 20 दिसम्बर 1922) की। इनका एक चित्र भी वहाँ लगा है। 

अन्त्येष्टि व श्रद्धांजलि सभा में चित्र लेने का अवसर न होते हुए भी निकलते-निकलते भारतीय इतिहास से जुड़ी इन शिलाओं के जो चित्र मैंने अपने मोबाईल कैमरा से लिए वे नीचे देखे जा सकते हैं - 

बड़े आकार में देखने के लिए चित्र पर क्लिक करें। 
सभी चित्रों का स्वत्वाधिकार © सुरक्षित है। 









शनिवार, 1 नवंबर 2014

भाषा और साहित्य के विद्वान व लेखक सम्मानित

भाषा और साहित्य सम्मान

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान सहित प्रत्येक ज्ञात-अज्ञात के प्रति आभार सहित

मुखपृष्ठ, दैनिक जागरण, 1/11/14
पृष्ठ 4,  दैनिक जागरण, 1/11/14 

रविवार, 17 नवंबर 2013

साहित्य का अभिशप्त माह : चली गईं डोरिस भी

Type your summary here


आज सुबह ही लिखा था -  



"सर्व श्री रावूरि भारद्वाज, राजेन्द्र यादव, परमानन्द श्रीवास्तव, विजयदान देथा, के. पी. सक्सेना, हरिकृष्ण देवसरे जैसे साहित्यकारों के गत कुछ ही दिनों में एकसाथ परलोक गामी होने के क्रम में आज एक नाम और जुड़ गया- 'जूठन' जैसी कृति के रचनाकार ओम प्रकाश वाल्मीकी का।



कुछ वर्ष पूर्व जैसे एकसाथ कई हास्यव्यंग्य के रचनाकार अल्पावधि में दिवंगत हुए थे, साहित्य के लिए यह वैसा ही अभिशप्त माह बन गया है। एक साथ दिवंगत आत्माओं को शान्ति लिखते- लिखते व श्रद्धांजलि जैसा शब्द टाईप करते हाथ काँप-काँप जाते हैं। " 

पर इस सब के बावजूद ...... ओह्ह्ह्ह्ह एक और दु:खद समाचार !


नहीं रहीं नोबेल विजेता उपन्यासकार : डोरिस लेस्सिंग 
- कविता वाचक्नवी


मेरी अत्यंत प्रिय ब्रिटिश लेखिका व नोबेल से सम्मानित डोरिस लेस्सिंग नहीं रहीं। अभी अभी उनका देहान्त हो गया। जिस वर्ष उन्हें नोबेल मिला था तब मैंने विकीपीडिया पर उनके विषय में हिन्दीलेख तैयार किया था जो आज भी यथावत् वहाँ है और साथ ही उन्हें (डोरिस को) हिन्दी में लिखकर सीधे बधाई भेजी थी जिसे उन्होंने हिन्दी में प्राप्त / हिन्दी समाज से प्राप्त एकमात्र बधाई-सन्देश के रूप में लेते हुए उसे व्यक्तिगत मान दिया था और इस तरह उन से सीधा परिचय हुआ था। यहीं लन्दन में ही रहती थीं। उनका न रहना व्यक्तिगत रूप से बड़े आघात जैसा है। किसी जीते जागते नोबेल विजेता से व्यक्तिगत परिचय कैसा गर्व देता है यह बताया नहीं जा सकता। आज वह स्थिति बदल गयी....। नोबेल की घोषणा होते ही प्रेस और मीडिया की भीड़ जब उनके यहाँ पहुँची तो उनके सामने वे शाक-फल खरीद कर लौटी थीं। मीडिया से बातचीत उन्होने अपने घर के मुख्यद्वार की चौखट पर बैठ कर की। वह वीडियो व चित्र संसार भर में खूब चर्चा में आए। न्यूयॉर्क टाईम्स की साईट पर आज भी उन्हें देखा जा सकता है। 

डोरिस के दो वक्तव्य -

“I’ve got the feeling that the sex war is not the most important war going on, nor is it the most vital problem in our lives.”

और १९९४ में भी उनका वक्तव्य था - “Things have changed for white, middle-class women,” और कहा, “but nothing has changed outside this group.”


उन्हें नोबेल पुरस्कार घोषणा के तुरंत बाद सूचना देने पत्रकार उनके घर पहुँचे तो यह दृश्य हुआ


डोरिस लेसिंग (२२ अक्तूबर १९१९-१७ नवंबर, २०१३) २००७ में साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाली ब्रितानी लेखिका थीं। उन्हें यह पुरस्कार अपने पाँच दशक लंबे रचनाकाल के लिए दिया गया। महिला, राजनीति और अफ़्रीका में बिताए यौवनकाल उनके लेखन के प्रमुख विषय रहे। १९०१ से प्रारंभ इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाली लेसिंग ११वीं महिला रचनाकार थीं। ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य रह चुकी डोरिस ने हंगरी पर रूसी आक्रमण से व कार्यप्रणाली व नीतियों से क्षुब्ध होकर १९५४ में पार्टी ही छोड़ दी थी। अपने आरम्भिक दिनों में उन्होंने डिकेंस, स्कॉट,स्टीवेन्सन, किपलिंग, डी.एच. लोरेन्स, स्टेन्थॉल, टॉल्स्टॉय, दोस्तोवस्की आदि को जी भ­र पढ़ा। अपने लेखकीय व्यक्तित्व में माँ की सुनाई परीकथाओं की बड़ी भूमिका को डोरिस रेखांकित करती थीं। १७ नवम्बर २०१३ रविवार को तड़के अपने आवास पर उनका निधन हो गया। इनके निधन से 3 सप्ताह पहले ही लंबी बीमारी से जूझ रहे इनके पुत्र का निधन हो गया था।

जीवन परिचय

ईरान में जन्मीं डोरिस के माता-पिता दोनों ब्रिटिश थे। पिता पर्शिया के इम्पीरियल बैंक में क्लर्क व माँ एक नर्स थीं। १९२५ में परिवार (आज के) जिम्बाब्वे में स्थानांतरित हो गया। जिन सपनों को लेकर वे यहाँ आए थे- वे चकनाचूर हो गए। लेसिंग के अनुसार उनका बचपन सुख व दु:ख की छाया था,जिसमें सुख कम व पीड़ा का अंश ही अधिक रहा। अपने भाई हैरी के साथ प्राकृतिक जगत के रहस्यों को समझने-बूझने में लगी लेसिंग को अनुशासन, घरेलू साफ़-सफ़ाई व घरेलू तथा सामान्य लड़की बनाने आदि के प्रति माँ बहुत सतर्क व कठोर रहीं। १३ वर्ष की आयु में लेसिंग की विधिवत शिक्षा का अंत हो गया । किंतु ये अन्य दक्षिण अफ़्रीकी लेखिकाओं की भाँति न रहकर शिक्षा से वहीं विरत नहीं हो गईं अपितु स्वयं ही शिक्षार्जन की दिशा में बढ़ती रहीं । अभी पिछले दिनों दिए गए इनके एक वक्तव्य के अनुसार- "दु:खी बचपन 'फ़िक्शन"(लेखन) का जनक होता है, मेरे विचार से यह बात सोलह आने सही है"। १९ वर्ष की आयु में १९३७ में सैलिस्बरी आने पर टेलीफ़ोन ऑपरेटर के रूप में भी इन्होंने कार्य किया। यहीं इनके दो विवाह हुए। पहला १९३९ में फ़्रैन्क विज़डम से, जिससे इन्हें दो बच्चे हुए। किन्तु यह सम्बंध चार वर्ष ही रहा और १९४३ में तलाक हो गया। दूसरा विवाह एक जर्मन राजनैतिक कार्यकर्ता गॉटफ्रीड लेसिंग से किया जिसकी परिणति भी १९४९ में तलाक के रूप में हुई। इस विवाह से हुए एकमात्र बेटे को लेकर ये ब्रिटेन आ गई थीं।


साहित्यिक जीवन

डोरिस लेसिंग के साहित्यिक जीवन का प्रारंभ १९४९ से माना जा सकता है जब वे दूसरे विवाह से हुए बेटे के साथ १९४९ में लंदन पहुँचीं। उनका पहला उपन्यास "द सिंगिंग ग्रास" इसी वर्ष प्रकाशित हुआ और यहीं से विधिवत इनके लेखकीय जीवन की शुरुआत हुई। इनका साहित्य अधिकांश अपने अफ़्रीकी जीवनानुभ­वों से जुड़ा है, जिसमें बचपन की स्मृतियाँ, राजनीति से जुड़ाव व समाज-संलग्नता ही अधिकांश है। सांस्कृतिक टकराव, जड़ों में जमा अन्याय, वर्णभेद, आत्मद्रोह, आत्मद्वन्द्व की स्थितियाँ इनके साहित्य में बहुतायत से हैं। दक्षिण अफ़्रीका में श्वेत उपनिवेशवाद के प्रति असहमत लेखन के कारण १९५६ में इन्हें वर्जित लेखक तक घोषित कर दिया गया। उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक, एकांकी, आदि विधाओं के अतिरिक्त भी इन्होंने लिखा था।

पुरस्कार सम्मान

"अंडर माई स्किन:वोल्यूम वन ऑफ़ माई आटोबायोग्राफ़ी टू१९४९" (१९९५ में प्रकाशित) के लिए इन्हें 'जेम्स टैईट ब्लैक प्राईज़' से सम्मानित किया गया। १९९५ में हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने इन्हें ऒनरेरी डिग्री प्रदान की। इसी वर्ष ये ४० वर्ष बाद पुन: दक्षिणी अफ़्रीका गईं और बेटी व नाती-पोतों से मिलीं। ४० वर्ष पूर्व जिस लेखन के लिए इन्हें प्रतिबन्धित व निष्कासित किया गया था, उसी लेखन के कारण इस बार इनका वहाँ गर्मजोशी से स्वागत-सत्कार किया गया । १९५४ से २००५ तक देश-विदेश में अपने साहित्य व लेखन पर मिले अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों व पुरस्कारों की शृंखला में २००७ का 'नोबेल' साहित्य पुरस्कार इस वर्ष इन्हें मिला। उनका अन्तिम उपन्यास - " द क्लेफ्ट" था जिसका कथानक समुद्र के किनारे रहने वाले स्त्री-समुदाय ‘क्लेफ़्ट’ पर केन्द्रित है। यह उपन्यास एक ऐसे स्त्री-समाज की कथा है जो पुरुष-शून्य है। 


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सोमवार, 9 सितंबर 2013

ब्रिटेन में आय / कमाई के औसत आंकड़े

ब्रिटेन में आय / कमाई के औसत आंकड़े (गत वर्ष के आकलन के आधार पर) -
स्रोत - याहू से प्राप्त आंकड़ों का अनुवाद  (By कविता वाचक्नवी) 

(कुछ समय से ब्रिटेन के अर्थतन्त्र ( अर्थव्यवस्था)  पर एक लेख लिख रही हूँ, ये आंकड़ें व तथ्य उसी लेख का एक हिस्सा हैं) 


नल आदि ठीक करने वाले (प्लम्बर) की -  न्यूनतम  £27,866   -  अधिकतम  £50,000

बस ड्राईवर - £22,701 (वार्षिक)

ट्राम व ट्रेन ड्राईवर - £44,617 (वार्षिक)

सेक्रेटरी आदि  - £20,474 and £18,866 (मेडिकल व लीगल वालों की इससे अपवाद हैं, जबकि व्यक्तिगत पीए £24,067 तक भी कमा पाते हैं)।(वार्षिक)

बहुराष्ट्रीय कंपनियों में सेक्रेटरी  -  £50,000 (वार्षिक)

सामान्यतः प्रकाशित होने वाला लेखक - £5,000 (J. K. Rowling जैसे लेखक इसके एकमात्र ढंग के अपवाद हैं जो £560 मिलियन तक कमा लेते हैं) (वार्षिक)

दिन में चौदह घंटे काम करने वाले टीवी के कलाकार -  £30,500 (एक पूरी शृंखला के लिए)

 टीवी कार्यक्रमों में सिलेब्रिटी जज आदि £110,000 से £550,000 (त्रैमासिक) व कुछ अति विशिष्ट सिलेब्रिटी £850,000 (पूरी सीरीज़)

प्रधानमंत्री - £142,500 (वार्षिक)

काऊन्सिल के 2,525 कर्मचारी - £100,000 से अधिक (वार्षिक)

42 स्थानीय संकाय-कर्मचारी -£250,000  से अधिक (वार्षिक)

राष्ट्रीय स्वास्थ्य परियोजना (NHS) के लगभग 8,000 कर्मचारियों को गत वर्ष (डॉक्टर स्तर) £340,000 वार्षिक (प्रति व्यक्ति) का भुगतान हुआ

वार्ड नर्स - £21,000 (वार्षिक)

गॉर्डन ब्राऊन ने अपने संसदीय दायित्वों से इतर कार्यों (भाषणों व लेखन) द्वारा £1.37m कमाए (गत वर्ष)

पद निवृत्ति के पश्चात् टोनी ब्लेयर ने निजी व्यापारिक रुचियों आदि से £20 मिलियन कमाए (गत वर्ष)

स्रोत - याहू से प्राप्त आंकड़ों का अनुवाद  (By कविता वाचक्नवी) 

सोमवार, 22 जुलाई 2013

अविश्वसनीय अनुभव का एक दिन

अविश्वसनीय अनुभव का एक दिन /  कविता वाचक्नवी


कल मैं लन्दन में बसे हुए एक अद्भुत परिवार से मिली। बड़े भाई 82 वर्ष के हैं और छोटे भाई उनसे कुछ वर्ष कम, दोनों की बहुपठ पत्नियाँ हैं, दोनों भाई कल्पनातीत ढंग से एक दूसरे पर न्यौछावर रहते हैं व दोनों भाई व परिवार एक साथ रहते हैं, दोनों के तीन बच्चे हैं, परंतु कौन किसकी संतान है यह पता किसी तरह कदापि नहीं चल पाता क्योंकि दोनों ही भाई व दोनों की पत्नियाँ उन बच्चों को 'मेरा बेटा', 'मेरी बेटी' कहते हैं। प्रतिदिन हर बार छोटे भाई सबसे पहले अपने हाथ से परस कर अपने बड़े भाई को भोजन खिलाते हैं और तब बड़ी भाभी खाने बैठती हैं, जब वे खा चुकती हैं तब छोटा भाई व भाभी खाने बैठते हैं। 


मैं इस दुर्लभ व अविश्वसनीय परिवार के साथ कल लगभग 3 घण्टे रही और बार-बार धन्यता अनुभव कर मेरी आँखें आह्लाद से भीगती रहीं। बड़े भाई के बड़प्पन व विशिष्टता को सराहें तो हर बार कहते हैं कि असल में मैं कुछ नहीं हूँ सब कुछ इस छोटे के कारण समझा जाता हूँ और छोटे भाई के 'लक्ष्मणत्व' पर एक शब्द भी कहें तो वे कहते कि मैं तो जड़मति सेवक हूँ और बड़े भाई के कारण मुझे 'क्रेडिट' मिलता है व विशेष समझ लिया जाता है। 


परिवार सदा से एक साथ रहता आया है और एक साथ रहते हैं। जाने कितनी संस्थाओं के पोषण का दायित्व उन्होंने ले रखा है, एक भारतीय भाषा की पत्रिका का सम्पादन/ संचालन आदि सब भी बड़े भाई करते हैं। निर्धनों के लिए एक कैंसर अस्पताल भारत में स्थापित किया है। उनका निजी पुस्तकालय है, जिसकी एक-एक पुस्तक पर सफ़ेद आर्ट पेपर से उन्होने अपने हाथ से जिल्द चढ़ाई हुई हैं व अपने हाथ से उस पर पुस्तक का नाम आदि लिखा करीने से सजा है, पूरा पुस्तकालय सफ़ेद रंग के सौम्य अनुशासन में मानो सरस्वती का स्वरूप धारे है। पुस्तकालय में संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती व कुछ अन्य भाषाओं की पुस्तकें भरी पड़ी हैं। दोनों पूरी तरह सक्रिय व सचेत हैं और दोनों के मुखमण्डल पर एक ऐसी दिव्य आभा, सौम्यता व शिष्टता है कि उसे बखाना नहीं जा सकता। दोनों की पत्नियाँ अविश्वसनीय ढंग से एक दूसरे पर मरने मिटने को तैयार रहने वाली बहनों से भी कई गुणा बढ़कर हैं। हम सब लोगों को खाना आदि देकर छोटे भाई रसोई में बर्तन साफ करते रहे जब तक बड़े भाई खा नहीं चुके, बड़ी भाभी हमें परसती रहीं और छोटी भाभी रसोई में पकाने आदि का काम करती रहीं। हम सब के खा चुकने के बाद बड़ी भाभी जब खाने बैठीं तो तब छोटी भाभी रसोई साफ कर बर्तन साफ करने लगीं 


...... क्या क्या कहा जाए ..... जीवन में ऐसा परिवार, ऐसा प्रेम, ऐसा बड़प्पन म्यूजियम में संरक्षित कर आश्चर्य से देखी जाने की वस्तु जैसा है... रिश्तों का ऐसा दुर्लभ रूप कि शब्द मेरे किसी काम नहीं आ रहे हैं कि उसे बखान सकूँ.... बस हृदय को आकण्ठ रसानुभूति से लबालब पा रही हूँ । सौजन्यता के ऐसे मूर्तिमान रूप कि जो देखा अनुभव किया है, ये शब्द उसका हजारवाँ अंश भी नहीं हैं। कितने गंभीर विषयों पर कितनी बातें उनसे हुईं उसका लेखा जोखा भी अलग ही चीज है। संसार में मनुष्य ऐसे प्रेम और ऐसे रिश्ते आचरण में जीने लगें तो संसार स्वर्ग बन जाए। मुझे उनके यहाँ वास्तव में स्वर्गिक सुख की अनुभूति हुई। और वे अपनी बेटी से भी कम आयु की मुझ तक को दीदी कह कर संबोधित करते और विदाई के समय 'बहन का भाइयों पर आशीष बना रहे' जैसे शब्द का कर उन क्षणों को दुर्लभ बना रहे थे... ! जिन पारिवारिक व जीवन मूल्यों को पुस्तकों में पढ़ा-पढ़ाया जाता है, यह परिवार उन मूल्यों को सुखपूर्वक पूरी तरह जी रहा है ! क्या कहूँ ..... कल के उस अनुभव की कोई तुलना नहीं .... बस दुर्लभ !!!


गुरुवार, 4 जुलाई 2013

लन्दन : राजहंसों का जोड़ा, झील व हम

लन्दन : राजहंसों का जोड़ा, झील व हम / कविता वाचक्नवी

अपने जीवन व घर में गाय, मोर, तोता, खरगोश, मछलियाँ आदि पालने व उनका स्नेह सान्निध्य लेने के जाने कितने दुर्लभ संस्मरण हैं। इन प्राणियों में गाय, कुत्ता आदि जीव ऐसे हैं कि कइयों ने उन्हें पाला होगा और उनके संस्मरण होंगे। कुछ कम अन्य लोगों के तोता, मछलियों आदि के पालने की संस्मरण भी होंगे किन्तु बहुत कम लोगों के खरगोशों के शावक-जोड़े के संस्मरण होंगे और किन्हीं बेहद विरले लोगों के मोर के साथ। कुछ दिन पूर्व मैंने अपने पालतू मोर के संस्मरण लिखे थे। 
फेसबुक पर यहाँ -
https://www.facebook.com/kvachaknavee/posts/10151614001859523

व 'वागर्थ' पर "जब दुल्हन आने पर घर में नाचे मोर" के रूप में देखे जा सकते हैं। (यहाँ क्लिक कर देखें)

"मंजरी और हंस : लन्दन आज"  (यहाँ क्लिक कर देखें)
में व अन्य भी अलग-अलग संस्मरणों के रूप में कई बार अपने घर से सटी झील और अपार शान्त प्राकृतिक सुषमा वाले वातावरण का उल्लेख करते हुए मैंने राजहंसों के जोड़ों व बतखों आदि के साथ अपने दैनिक नैकट्य का उल्लेख किया है, जिनकी जाने कई सौ रूपों में विविध छवियाँ मैंने अपने कैमरे में सुरक्षित की हैं और नेट पर भी डाली हैं। 

इतना ही नहीं अपनी पालतू 'मौलि' तथा बगीचे में दिन-रात आ कर घूमने वाली लोमड़ी (कई बार दल-बल सहित भी) की छवियाँ और वीडियो भी बनाए - यहाँ क्लिक कर देखें 


"लन्दन का हिमपात व मेरा कैमरा" तथा उसमें दिए लिंक्स व चित्रों में जिस झील के श्वेत सौन्दर्य व पक्षियों आदि की रूपरेखा सहेजी है, उस झील में रहने वाली बतखों व हंसों की ढेर सारी छवियाँ हृदय पटल पर भी अंकित हैं - यहाँ । 

सबसे विशेष बात यह है कि इस झील में दो-तीन प्रकार के हंसों के जोड़े हैं, जिनमें से सबसे विशेष हैं राजहंसों के दो जोड़े; जिनके विषय में गत दिनों मैंने लिखा था कि हंसिनी नवप्रसूता है और अपने नन्हें बाल-हंसों के साथ जोड़ा पानी में घूमता है। दो वर्ष पहले हंसिनी के आसन्न-प्रसवा और फिर बाल-हंसों के साथ जोड़े के कई चित्र लिए थे किन्तु वे सब पुराने चित्र बहुत ढूँढने पर भी अभी खोज नहीं पाई क्योंकि वे सब पुराने मोबाईल कैमरा में थे। 

भारत में मैंने हंस देखना तो क्या, उसका उल्लेख-मात्र पढ़ा है, वह भी संस्कृत साहित्य में। नल-दमयन्ती कथा में राज-हंस की कुछ विशद भूमिका से परिचय भी वहीं हुआ था। किन्तु जीवन में कभी राजहंस मेरे नियमित साथी बन जाएँगे, इसकी कल्पना व अनुमान भी असंभव था। किन्तु इधर वर्ष-भर से राज-हंसों का यह जोड़ा मेरा प्रतिदिन का साथी है। मैं जैसे ही प्रतिदिन झील पर जा कर इनकी प्रतीक्षा में बैठती हूँ, यह जोड़ा मुझे देखते ही जाने कैसे बहुत दूर से पहचान कर तैरते-तैरते मेरे पास आ बैठता है। 


बड़ी बहन सरीखी शन्नो दी' लंदन में लगभग 42 वर्ष से रह रही हैं और इस बीच उन्होंने भी जीवन में जाने कई सौ राजहंस यहाँ देखे हैं; किन्तु उनके लिए भी मेरे द्वारा बार-बार अपने वाले इन राजहंसों का यह उल्लेख अविश्वसनीय था। तो पहली बार मेरे यहाँ उनके आने का एक बड़ा उद्देश्य इन दृश्यों व अनुभूतियों को साक्षात् करना भी था।परसों ( 2 जुलाई को प्रातः वे यहाँ आईं तो उन्हें साथ लेकर लगभग अढ़ाई घंटे मैंने उन्हें निसर्ग के वे दृश्य भी दिखाए जिनके सान्निध्य में मेरा दिन-रात व्यतीत होता है।


प्रारम्भ में झील पर केवल ढेर सारी अलग-अलग नस्ल की बतख़ें ही थीं, किन्तु जब हम थोड़ा घूम कर फिर से झील के निकट आए तो बहुत दूरी पर झील के मध्य भाग में राज-हंसों का जोड़ा भी तैरता दीख गया। तब तो शन्नो दी' के आश्चर्य का पारावर न रहा, जब वह जोड़ा मुझे देखते ही मेरे संकेत पर तुरन्त ही हमारी ओर बढ़ने लगा और एकदम से किनारे पर हमारे हाथ से छू लेने की पहुँच में एकदम आ कर हमसे सट गया। शन्नो दी' तो एकदम किलक उठीं कि उन्होंने जीवन में पहली बार इतनी निकट से हंसों को देखा है। मैंने झटपट उनके कई चित्र लिए। इस बीच वे भी अपने कैमरे में मुझे व निसर्ग को कैद करती रहीं। उस पूरी परिक्रमा और वातावरण के कई सारे चित्र सहेजे गए । 


फिर वहाँ से हम लोग घर आए तो हमारी 'मौलि' भी शन्नो दी' के स्वागत के लिए तत्पर थी। हमने अपने बगीचे में गुलाबों की तीखी मीठी सुगन्ध, स्ट्राबरी, चेरी व पुदीने आदि के बूटों में भी देर तक सुखद समय बिताया। वह पूरा दिन हम लोगों का बतियाते और हँसते कैसे बीत गया पता ही न चला। शन्नो दी' को यों देर तक हँसते मुसकाते देखना अच्छा लगा। और हाँ, वे आते समय अपने साथ गुलाबजामुन ले कर आई थीं.... जिनकी मिठास ने उस दिन की मिठास को और बढ़ा दिया। अस्तु ! वह अविस्मरणीय दिन जाने कितने बरसों तक मन पर अंकित रहेगा। 


झील पर लिए चित्र यहाँ संकलित हैं। ये कई अर्थों में दुर्लभ हैं, अविश्वसनीय व संग्रहणीय हैं। इन दृश्यों को देखने से बार-बार जीवनीशक्ति मिलती है। और लोग भी इन दुर्लभ क्षणों का आनंद ले सकें इसलिए वे सब चित्र यहाँ सहेज दिए हैं। 


(©): सभी चित्रों का सर्वाधिकार (कॉपीराईट) सुरक्षित है। कृपया कदापि उसका उल्लंघन न करें।


























































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