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गुरुवार, 12 अक्टूबर 2023

वर्तमान की वह पगडण्डी जो इस देहरी तक आती थी.....

युद्ध : बच्चे और माँ (कविता)

साहित्य अकादमी के वार्षिक राष्ट्रीय बहुभाषीकवि सम्मेलन (2008) की चर्चा मैंने अभी पिछली बार की थी। वहाँ काव्यपाठ में प्रस्तुत अपनी रचनाओं में से एक अभी बाँट रही हूँ।

२५ नव. की रात्रि में इसका पाठ करने से पूर्व मैंने अन्यभाषी श्रोताओं के लिए इसका सार अंग्रेजी में उपलब्ध कराते हुए कहा था कि बच्चे का आतंकवादी में रूपांतरण, आतंक और सृष्टि की निर्मात्री माँ के बीच दो विपरीत ध्रुवों को स्पष्ट करने के साथ साथ यह कविता रेखांकित करती है कि आतंक और युद्ध की स्थितियों की सर्वाधिक पीड़ा स्त्री भोगती है क्योंकि यह संसार उसका रचा हुआ है। तब क्या पता था कि अगले ही दिन २६ नव. को एक बड़ा हादसा भारत की धरती भी घटने की तैयारी कर चुका था। उन अर्थों में इस कविता को उन्नीकृष्णन की माता ( जिसे मैं भारत की वीर माता विद्यावती की प्रतीक मानती हूँ) के चरणों में समर्पित कर रही हूँ व प्रत्येक उस माँ के भी जिनके जाये आतंक या युद्ध का शिकार बने ।




युद्ध : बच्चे और माँ
- कविता वाचक्नवी





निर्मल जल के
बर्फ हुए आतंकी मुख पर
कुँठाओं की भूरी भूसी
लिपटा कर जो
गर्म रक्त मटिया देते हैं
वे,
मेरे आने वाले कल के
कलरव पर
घात लगाए बैठे हैं सब।



वर्तमान की वह पगडंडी
जो इस देहरी तक आती थी
धुर लाशों से अटी पड़ी है,
ओसारे में
मृत देहों पर घात लगाए
हिंसक कुत्तों की भी
भारी
भीड़ लगी है।



मैं पृथ्वी का
आने वाला कल सम्हालती
डटी हुई हूँ
नहीं गिरूँगी....
नहीं गिरूँगी....


पर इस अँधियारे में
ठोकर से बचने की भागदौड़ में
चौबारे पर जाकर
बच्चों को लाना है,
इन थोथे औ’ तुच्छ अहंकारी सर्पों के
फन की विषबाधा का भी
भय
तैर रहा है......।




कोई रोटी के कुछ टुकड़े
छितरा समझे
श्वासों को उसने
प्राणों का दान दिया है
और वहीं दूजा बैठा है
घात लगाए
महिलाओं, बच्चों की देहों को बटोरने

बेच सकेगा शायद जिन्हें
किसी सरहद पर
और खरीदेगा
बदले में
हत्याओं की खुली छूट, वह।



एक ओर विधवाएँ
कौरवदल की होंगी
एक ओर द्रौपदी
पुत्रहीना
सुलोचना
मंदोदरी रहेंगी..........।



किंतु आज तो
कृष्ण नहीं हैं
नहीं वाल्मीकि तापस हैं,
मैं वसुंधरा के भविष्य को
गर्भ लिए
बस, काँप रही हूँ
यहीं छिपी हूँ
विस्फोटों की भीषण थर्राहट से विचलित
भीत, जर्जरित देह उठाए।




त्रासद, व्याकुल बालपने की
उत्कंठा औ' नेह-लालसा
कुंठा बनकर
हिटलर या लादेन जनेगी
और रचेगी
ऐसी कोई खोह
कि जिसमें
हथियारों के युद्धक साथी को
लेकर
छिप
जाने कितना रक्त पिएगी।



असुरक्षित बचपन
मत दो
मेरे बच्चों को,
इन्हें फूल भाते हैं
लेने दो
खिलने दो,
रहने दो मिट्टी को उज्ज्वल
पाने दो सुगंध प्राणों को।



जाओ कृष्ण कहीं से लाओ
यहाँ उत्तरा तड़प रही है !!
वाल्मीकि !
सीता के गर्भ
भविष्य
पल रहा ।
अपनी पुस्तक "मैं चल तो दूँ" (२००५) से


शुक्रवार, 30 जून 2023

पाककला की चुनौती और टमाटर : कविता वाचक्नवी

टमाटर बारहमासी फसल नहीं है। 🍅🍅🍅

जब हम भारत में रहते थे तो लहसुन–प्याज न खाने के चलते हमारे यहाँ टमाटर के अधिक प्रयोग की अनिवार्यता थी। जो लोग प्याज खा लेते हैं, उन्हें वैसे भी टमाटर की अनिवार्यता कुछेक भोज्य पदार्थों के लिए ही होती है। मैंने क्योंकि स्वयं अधिकांश फसलें अपने हाथ से बोई, उगाई काटी हैं अतः एक–एक फल, एक –एक फली, एक–एक कन्द, व एक–एक शाक की प्रत्येक इकाई का महत्व तथा प्रतीक्षा से परिचित हूँ। उन के हमारी इच्छानुसार उग कर तैयार न होने का अर्थ उगाने वाले का दोष नहीं, अपितु प्रकृति व पर्यावरण का चक्र, नियम तथा सन्तुलन है। 

ऐसे में जिन दिनों टमाटर की फसल नहीं होती थी, या मण्डई में नहीं मिलते थे तो गृहणी के रूप में जो–जो उपाय करती थी, उन्हें पाठकों की सहायता के लिए साझा कर रही हूँ। 

(प्याज–लहसुन न खाने–पकाने के चलते मेरी गृहस्थी में प्रतिदिन  बड़े आकार के सात–आठ टमाटर शाक–दाल हेतु बारहों माह चाहिए होते थे)। ऐसे में विकल्प दो–तीन थे। गृहणियों को बिना हाय–तौबा मचाए शान्ति से अभाव को भी भाव से पूर लेने का गुण अनिवार्यतः बनाए रखना चाहिए। यह हमारे ही पारिवारिक सम्मान का कारक बनता है। तो आइए, मेरे अनुभव से आप को कुछ लाभ मिले तो इन्हें अपना सकते हैं –

कोकम
दक्षिण में गहरे लाल रंग का एक बहुत खट्टा फल आता है, जिसे कोकम कहते हैं। उस का खट्टा–सा शरबत भी बाजार में मिलता है।  इस कोकम की सूखी लाल–भूरी फाँकें बिकती हैं। जिस किसी में डाल दें, खटाई और रंग देती हैं। मैं सदा उन्हें घर में रखती थी। जिस किसी दिन टमाटर घर में समाप्त हुए, उस दिन दाल को कोकम तथा अदरक डाल कर उबाला व फिर बघारा करती थी। कोकम आज भी मेरी गृहस्थी में सदा रहता है। यहाँ तो उस की दीर्घावधि तक सुरक्षित रहने वाली गीली फाँकें उपलब्ध हो जाती हैं।

साबुत लाल मिर्च
सूखी साबुत लाल मिर्च भी टमाटर के अभाव में काम आती है। आप को अधिक मिर्च नहीं रुचती तो आप प्रत्येक मिर्च को तोड़, उस के बीज व दाने बाहर निकाल अलग प्रयोग हेतु सहेज लें तथा छिलके को पानी से धो, कुछेक छोटे–छोटे टुकड़े कर लें, जैसे एक लम्बी मिर्च हो तो चार–छह टुकड़े हो सकते हैं। उन्हें अलग से उबाल कर, पानी से निकाल दाल या शाक में ऊपर से मिला दें तो टमाटर के लाल रंग का आभास देंगी। उबालने से बचा हुआ पानी भी स्वादानुसार मिलाया जा सकता है। ऐसे में टमाटर की खटाई की कमी पूरी करने हेतु अमचूर प्रयोग करें।

इमली का अवलेह
बाजार में इमली का बिना गुठली–डण्ठल का तैयार अवलेह उपलब्ध होता है। मेरी गृहस्थी में वह सदा रहता आया है। उसे भी रंगत तथा खटाई हेतु, विशेषतः साम्भर हेतु प्रयोग करती आई हूँ।

इन उपायों से सम्भवतः आप भी अपनी गृहस्थी और चौके को अभाव रहित तथा अनवरत चला सकते हैं।
–✍🏻 कविता वाचक्नवी


शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

यौवन ऐसा भी ....

यौवन ऐसा भी हो सकता है : कविता वाचक्नवी


एक स्त्री के रूप में, एक मनुष्य के रूप में और विशेषतः एक माँ के रूप में कल का दिन भावविह्वल कर देने वाला दिन रहा। एक ऐसी घटना घटी जिसने मातृत्व को सार्थक कर दिया। कनिष्ठ पुत्र इन दिनों पाँच वर्ष बाद भारत गया हुआ है और उसके पिताजी भी।

कल वह वहाँ अपने पिताजी को किसी यात्रा के लिए गाड़ी में बिठाकर स्टेशन से बाहर आया तो कुछ दूर तक चलकर एक ऐसे स्थान पर पहुँचा जहाँ से उसे अपने इंगित स्थान के लिए ऑटो लेना था। वहाँ ऑटो की प्रतीक्षा करते करते समीप ही उसे एक 60 वर्ष से अधिक की महिला एक छोटे बच्चे के साथ दिखाई दी। बच्चा बहुत दुबला व कठिनाई से चल पा रहा था, क्योंकि नंगे पाँव था। वह महिला भी एकदम ठीक-ठाक तो नहीं किन्तु ऐसी लग रही थी कि अपने बच्चे को जूता दिलवाने में समर्थ है।

मेरे बेटा उन दोनों को कुछ देर देखता रहा और फिर अन्तत: उनके पास जाकर सीधा उस से पूछने का मन बनाया कि बच्चा नंगे पाँव क्यों है। जाकर उस महिला से पूछा तो उस महिला ने अपनी रामकहानी सुनानी शुरू की कि बच्चा उसका पोता है और बच्चे की माँ मर चुकी है व पिता (महिला का बेटा) अस्पताल में है उसे कुछ लीवर का रोग है आदि।

मेरे बेटे को उसकी कहानी में कोई रुचि नहीं हुई क्योंकि तब तक उसने देख लिया था कि महिला गहने आदि पहने हुई थी, अच्छी साड़ी और सैन्डिल आदि भी पहने थी ; जबकि दुर्बल-सा छोटा बच्चा एकदम नंगे पाँव था। महिला ने मेरे बेटे को यह भी बताया कि वह चर्च जा रही है (जो वहाँ समीप ही था) । मेरे बेटे को महिला के हाव-भाव आदि से सन्देह हो रहा था और लग रहा था कि महिला उस बेचारे बच्चे का इस्तेमाल लोगों को ठगने या पैसा आदि वसूलने के लिए करती है। बच्चा मानसिक रुग्ण भी प्रतीत हो रहा था।

तो मेरे सुपुत्र ने बच्चे को जूता दिलवाने की भावना के बावजूद महिला को नकद कुछ भी नहीं देने का मन बनाया, क्योंकि इसे पक्का लग रहा था कि महिला उस राशि से कुछ और कर लेगी और बच्चा जैसे-का-तैसा ही रह जाएगा। इसलिए सुपुत्र ने एक ऑटो लिया और महिला व बच्चे को भी अपने साथ ऑटो में बैठने को कहा और उन्हें ऑटो में अपने साथ लेकर एक स्थान पर गया जहाँ जूते की दुकान थी । वहाँ स्वयं उतर कर उस बच्चे को जूते खरीद कर दिए और उस ऑटो वाले को पैसे दे कर कहा कि महिला व बच्चे को वहीं छोड़ आओ जहाँ से ऑटो में चढ़े थे।

वह बच्चा जूते पहनते समय बहुत प्रसन्न था और हँस भी रहा था तो मेरे बेटे ने उसके दो चित्र भी लिए और वहाँ से अपने कक्ष पर लौट कर फिर यह सारी घटना तुरन्त वाट्सएप पर हमें लिख कर बताई व चित्र भी भेजे।

























                                                               





















और हाँ, चलते-चलते अन्तिम बात सुपुत्र ने ज़ोर देकर महिला से कही -
"चर्च में जाने से कुछ नहीं होगा"  :) 


यह जोड़ना चाहूँगी कि सबसे कनिष्ठ मेरा बेटा लगभग 24 वर्ष का है और यह वही बेटा है जो दिसम्बर में मध्य रात्रि को एक अनजान युवती की सुरक्षा की भावना से उसे नगर सीमा से भी 20 किलोमीटर बाहर उसके घर तक पहुँचाने गया था, जिसे मैंने 22 दिसम्बर को विस्तार लिखा भी था, वह घटना तो काफी रोमांचक भी थी क्योंकि उसमें बड़ा खतरा भी था। उसे यहाँ पढ़ा जा सकता है-https://www.facebook.com/kvachaknavee/posts/10153151019579523

अपने पुत्र पर गौरवान्वित तो हूँ ही पर यह घटना इसलिए बाँट रही हूँ कि यदि आप हम कुछ करना चाहें तो हमारे आसपास ही बहुत कुछ करने को है, बस देखने वाली आँख होनी चाहिए और संस्कार भी। दूसरी बात यह कि सन्तान को बनाना आपके-हमारे हाथ में है बशर्ते हमें यह पता हो कि सन्तान / बच्चे उपदेशों से नहीं अपितु आपके आचरण से सीखते हैं। तीसरा कारण इसे लिखने का अपने सुपुत्र के अच्छे कार्य का सम्मान व प्रशंसा करना क्योंकि इस प्रकार उसके नेक कार्य को सम्मानित कर उसे भविष्य में मनुष्यता के कार्यों के लिए प्रोत्साहित करना भी उद्देश्य है।



मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

भाषा और 'एक्स्पायरी डेट'

भाषा और 'एक्स्पायरी डेट' : कविता वाचक्नवी


‪#‎भाषा‬-प्रयोग का एक ‪#‎मनोरंजक‬ उदाहरण आज आपसे बाँटती हूँ।
भारत में हम लोगों को अभ्यास होता है कि किसी की मृत्यु के विषय में बात करते हुए हम

  • - 'उसके पिताजी एक्सपायर हो गए थे' 
  • - 'उसकी माता जी/बहन/पत्नी/पति/मित्र आदि को एक्सपायर हुए तो कई साल हो गए'
  • - वह छुट्टी गया है, उसकी माता जी एक्सपायर हो गईं
  • - रोड एक्सीडेंट में एक्सपायर हुए उसके भाई भाभी ... 
आदि वाक्य सामान्यतः बोलते हैं। अर्थात् मृत्यु के लिए 'एक्सपायर होना' क्रिया का प्रयोग करते हैं।

कई बरस पहले जब मैंने यहाँ ब्रिटेन में एक प्रसंग में किसी से अंग्रेजी में आदतवश कहा कि 'मेरी माँ एक एक्सीडेंट में कई बरस पहले एक्सपायर हो गईं थीं' तो उसके चेहरे की रंगत और हाव-भाव बहुत ही अजीब-से थे, मानो वह कुछ समझा ही नहीं। मेरे बच्चों ने तब उसे समझाया कि वस्तुतः मैं कहना चाहती हूँ कि मेरी माँ की मृत्यु कई बरस पहले एक दुर्घना में हो गई थी।

बाद में बच्चों ने मुझे समझाया कि, माँ ! एक्सपायर होने की क्रिया / प्रक्रिया वस्तुओं व पदार्थों की होती है, माँ या कोई भी व्यक्ति पासपोर्ट, ऑफिस कार्ड, कॉलेज कार्ड, दवा या अचार या खाद्य पदार्थ नहीं होता कि उसकी कोई 'एक्स्पायरी डेट' हो और वह उस तिथि के बाद 'एक्सपायर' हो जाए। व्यक्तियों के लिए मृत्यु के वाचक शब्दों जैसे Death, Died, No more इत्यादि का प्रसंगानुसार व वाक्यरचनानुसार प्रयोग किया जाता है।

यद्यपि अब मैं सचेत रहती हूँ किन्तु अपनी भारतीय आदत से अभी भी पूरी तरह पीछा नहीं छुड़ा पाई और आज ही डॉक्टर द्वारा मेरी माँ के बारे में एक प्रश्न पूछने पर 'शी एक्स्पायर्ड इन हर अर्ली ट्वेंटी प्लस' जैसा वाक्य निकल गया तो डॉक्टर को चौंक कर कहना पड़ा कि "मैं आपकी माँ के विषय में पूछ रही हूँ"। तब मुझे अपनी गलती का भान हुआ ।

आप लोग भी इसे पढ़ने के बाद शायद भविष्य में व्यक्ति की मृत्यु के साथ 'एक्सपायर' शब्द का प्रयोग करते समय अवश्य एक बार ठिठकेंगे, यह सोच कर कि व्यक्ति कोई दवा या खाद्य पदार्थ है क्या कि जो उसकी 'एक्स्पायरी' होती है।#‎KavitaVachaknavee‬

 इस लेख पर विचार-विमर्श और विचारोत्तेजक प्रतिक्रियाएँ पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें  ।


मंगलवार, 4 नवंबर 2014

लन्दन में भारतीय इतिहास का यह पृष्ठ



गत दिनों एक दूर के सम्बन्धी के देहावसान पर लन्दन के गोल्डर्स ग्रीन शवदाह गृह (क्रेमेटोरियम) जाना हुआ। इस के विशाल प्रार्थना सभाकक्ष की मुख्य दीवार में लगभग 15 फीट की ऊँचाई पर सोने की तारों और मीनाकारी से सजी तीन संगमरमर की शिलाएँ गड़ी हुई हैं, जिन्हें अपनी खोजबीन वाली आदत के चलते ध्यान से पढ़ा तो पता चला कि एक ही परिवार के तीन व्यक्तियों (पिता व दो पुत्र) के निधन पर उनकी सूचना देने के लिए लगाई गई हैं और वे तीनों भारतीय थे। मुख्य शिला 21 अगस्त 1911 को दिवंगत हुए महाराजा नृपेन्द्र नारायण भूप बहादुर की स्मृति में है और उसकी एक ओर लगी छोटी शिला उनके बड़े बेटे महाराजा राज राजेन्द्र नारायण भूप बहादुर (11 अप्रैल 1882 - 1 सितम्बर 1913 ) की स्मृति में तथा दूसरी ओर लगी छोटी शिला नृपेन्द्र नारायण जी के द्वितीय पुत्र महाराजा जितेन्द्र नारायण भूप बहादुर (20 दिसम्बर 1886 - 20 दिसम्बर 1922) की। इनका एक चित्र भी वहाँ लगा है। 

अन्त्येष्टि व श्रद्धांजलि सभा में चित्र लेने का अवसर न होते हुए भी निकलते-निकलते भारतीय इतिहास से जुड़ी इन शिलाओं के जो चित्र मैंने अपने मोबाईल कैमरा से लिए वे नीचे देखे जा सकते हैं - 

बड़े आकार में देखने के लिए चित्र पर क्लिक करें। 
सभी चित्रों का स्वत्वाधिकार © सुरक्षित है। 









मंगलवार, 3 जून 2014

वह दुर्घटना और मैं ....

वह दुर्घटना और मैं  ....   :  कविता वाचक्नवी


वर्ष 2006 या 2007 में तीन-चार दिन के पुणेप्रवास से लौटने के लिए स्टेशन जाते हुए अपने साथ हुई एक दुर्घटना की याद आज आ गई। भारी वर्षा में ऑटो में अपने पैरों को भीगने से बचाने के लिए दोनों ओर नीचे बड़े सूटकेस अटका कर खड़े कर दिए थे। रास्ते में एक साईकिल वाले ने सामने आए किसी खड्डे से बचने के लिए झटके से जैसे ही साईकिल घुमाई तो वह एकदम आटो के आगे आ गया, उसे बचाने के लिए तेज भागते ऑटो वाले को झटके से ऑटो मोड़ना पड़ा और इस तरह ऑटो फिसल कर इतनी तेज फिसला कि जाकर दूर दूसरी ओर सड़क किनारे के एक बिजली से खंभे से टकराया और हवा में बहुत ऊपर उछल कर तीन चार पलटियाँ खा गया। ऑटो वाला तो शुरू में ही बाहर गिर गया था,  पर मैं दोनों ओर सूटकेस अटके होने के कारण हवा में गुलाटियाँ खाते ऑटो के भीतर ही फँसी रह गई और जाने कहाँ से कहाँ कितनी पलटियाँ खा गई। सिर, बाहों आदि में जो प्रत्यक्ष चोटें आईं वे तो कम थीं किन्तु गर्दन, कंधे और सिर की हड्डियाँ मानो चरमरा गईं और आज तक उनका फल भुगत रही हूँ। ऑटो वाले का ऑटो लगभग तहस-नहस हो गया।

 कैण्टोंन्मेंट का क्षेत्र था और वर्षा के कारण सड़क पर पैदल कोई था ही नहीं, तो ऑटो वाला और एक दो अन्य खाली ऑटो वाले दौड़ते हुए आए, बल्कि कहना चाहिए कि गिरते ऑटो को सबने हवा से लपका, ताकि नीचे टकरा कर अनिष्ट न हो जाए। मुझे तुरंत बाहर निकाल कर दूसरे ऑटो में बैठा दिया, मुझे बहते खून और चोटों के साथ स्टेशन के लिए तुरंत सिसकते हुए निकलना था क्योंकि सामान बहुत था और रेल में रिज़र्वेशन था, गाड़ी पहुँचने को थी। किसी तरह कुली ले उसी तरह गाड़ी पकड़ी किन्तु अंतिम समय में स्टेशन पहुँचने के कारण लगभग छूटती गाड़ी के सामने वाले डिब्बे में जिस किसी तरह घुसी, वहाँ न न सीट मिली, न रिज़र्वेशन, रात को सोने तक जब तक टीटी महोदय आते और उन्हें कह कर अपने रिज़र्वेशन की कहानी बताती, ताकि वे मुझे सही डिब्बे तक पहुँचाने का अता-पता करते, तब तक पता चला कि मेरी बर्थ किसी अन्य को वितरित कर दी गई है, इसलिए किसी तरह उसी डिब्बे में किसी की बर्थ के सिरे पर टिके-टिके रात बिताकर अगली सुबह हैदराबाद पहुँची, पति ने लिया और घर ले गए...! मोबाईल क्योंकि ऑटो में हाथ में था तो वह भी उखड़ फूट गया। 

दुर्घटना की चोटें, मानसिक आघात लिए, अकेले तुरंत भागना, गाड़ी पकड़ना और रेलवे का अनुभव सब ने बहुत कष्ट दिया... ! आज भी वह घटना कंपकंपी पैदा करती है और दर्द जब-तब जग उठते हैं। 

भारतीय रेलों और भारतीय सड़कों के बेहद भयावह संस्मरण मेरी यादों में हैं। पता नहीं कब लोगों को आत्मानुशासन आएगा। जाने कितने प्राण प्रतिदिन लील जाते हैं ये अनुशासनहीन / व्यवस्थाहीन चालक और सड़कें। #Vachaknavee

बुधवार, 28 मई 2014

समाज मेरे लेखन का उपादान कारण है


"समाज मेरे लेखन का उपादान कारण है"
अमेरिका व कैनेडा से संयुक्त रूप में प्रकाशित होने वाली पत्रिका 'हिन्दी-चेतना' के अप्रैल 2014 अंक में संपादक सुधा ढींगरा जी द्वारा लिए गए मेरे साक्षात्कार के कुछ अंश प्रकाशित हुए हैं, जिसे आप यहाँ नीचे  पीडीएफ फाईल को स्क्रॉल कर सरलता से पढ़ सकते हैं। 

शनिवार, 1 मार्च 2014

राष्ट्रीय साहित्य अकादमी के बहुभाषी कवि सम्मेलन की एक पुरानी कतरन



Report of Sahitya Akademi's Multilingual Poets Meet / Times Of India (26 Jan. 2008

केंद्रीय 'साहित्य अकादमी' द्वारा 'सेंट्रल यूनिवर्सिटी, हैदराबाद'  में आयोजित बहुभाषी कवि सम्मेलन में हिन्दी कविता का प्रतिनिधित्व तीन लोगों ने किया था - स्व. वेणुगोपाल (नन्दकिशोर शर्मा), ऋषभ देव शर्मा व स्वयं मैं। 

उस अवसर की एक 6 वर्ष से अधिक पुरानी कतरन। चित्र पर क्लिक कर व फिर लेंस को + कर इसे स्पष्ट पढ़ा जा सकता है। 

अथवा टाईम्स ऑफ इंडिया की साईट के इस लिंक पर पढ़ सकते हैं - 



रविवार, 9 फ़रवरी 2014

आज एक भावुक संस्मरण

आज एक भावुक संस्मरण मेरा  :  कविता वाचक्नवी


मुझे हिन्दी को नेट पर प्रयोग करते 8 वर्ष हो गए हैं। इन आठ वर्षों में विश्व-भर के पाठकों का जो कल्पनातीत स्नेह आदर व प्यार मुझे मिला है, उसके अनूठे किस्से हैं। लोगों ने ऐसे-ऐसे शब्दों और ऐसे ढंग से अपना स्नेह व्यक्त किया है कि यदि मैंने उनका लेखा-जोखा बनाया होता तो स्वयं मुझे व पढ़ने वालों को विश्वास न होता कि सच में लोगों ने ऐसे शब्द लिखे-कहे होंगे। गिनती के कुछ कड़वे अनुभव भी हैं किन्तु कइयों हजार लोगों के अपार स्नेह के सामने इन 8-10 कटु अनुभवों का कोई मोल नहीं। 


शायद ही किसी के 'सम्मान-पत्र' या 'प्रशस्ति पत्र' में वे शब्द लिखे जाते होंगे जो शब्द मुझे मेरे पाठकों ने 2006 से नेट पर व उस से पूर्व 1998 से 2006 तक पत्रिकाओं में या व्यक्तिगत पत्रादि लिख कर भेजे हैं। अपने 10-15 पुरस्कार और दो-चार सौ बार हुए अपने अभिनन्दन आदि के अवसरों पर भी कभी ऐसा आह्लाद या रोमाञ्च मुझे नहीं हुआ जैसा पाठकों से मित्र बने और मित्र से आत्मीय बने अनगिनित अनजान लोगों के प्रेम से सुख मिला और आह्लाद हुआ है। मेरा रोम-रोम इन लोगों के प्रति स्नेह के भार से दबा हुआ है। उसे बखाना भी नहीं जा सकता। यद्यपि मैंने उनके लिए व्यक्तिगत रूप से कभी भी कुछ विशेष नहीं किया। मैं अपने इन शब्दों द्वारा आपको या किसी को भी उस कल्पनातीत प्रेम, सम्मान व आदर का एक हजारवाँ हिस्सा भी नहीं बता पा रही जो इन लोगों ने मुझे दिया है। संसार-भर में फैले ये लोग मेरी आत्मा का अंश जैसे बन गए हैं। पल-पल इनकी ऋणी हूँ। 


यों तो लाखों घटनाएँ हैं किन्तु आज यह सब लिखने का एक विशेष कारण है। एक सज्जन हैं, जो यहीं फेसबुक पर मुझसे जुड़े। कभी अधिक संवाद नहीं हुआ। वर्ष में संभवतः एक बार का अनुपात होगा जब दो-चार वाक्यों का आदान प्रदान हुआ होगा। किन्तु गत दिनों उन्होने मुझे बताया कि उनके यहाँ संतान का जन्म होने वाला है और मुझे कहा कि - "मेरी प्रार्थना है कि आप ही कोई नाम रख दें ..परिवार में बड़े के नाम पर मेरी माँ ही जीवित है, कहती है तू ही कोई नाम रख दे....."। 


ईश्वर कृपा से उन्हें स्वस्थ सुंदर पुत्र प्राप्त हुआ। बालक का नाम रखा गया। उन्होने मुझे लिखा " thank u so much ! i will never forget u in my entire life." मैंने पूछा ऐसा क्या कर दिया मैंने तो बोले - " nothing special madam! it's happen because of blessings of persons like u. Sudha murthy, APJ Kalam , M.M Malviye , Vinoba Bhave are my role model, now u are my role model too. Regards ....." । 


उनके बड़प्पन ने दिल छू लिया मेरा। और आज वे बोले - "एक अनुरोध है, न मत कहियेगा ! ... अपने ख़ुशी के मौके पर अपनी माँ के साथ -साथ आपको भी कुछ भेंट देना चाहता हूँ ........कोई हिंदुस्तानी चीज जो आपको वहाँ न मिलती हो ....ये मेरी श्रद्धा है, जब भी कोई धर्म संकट आता है , आपकी शरण ही आता हूँ ..आप ऐसा मत सोचियेगा कि कोई आर्थिक या व्यवसायिक लाभ के लिए आप से जुड़ना चाहता हूँ ......आभार" 


मैं उनके संस्कार, भावना और इस सरल आत्मीयता से आकण्ठ भावुक हो उठी। कोई इतनी दूर बैठा व्यक्ति अपने ऐसे अनमोल अवसर पर अपनी माँ के समतुल्य आदर मान देने के लिए तत्पर है, यह प्रेम क्या कुछ भी देकर पाया जा सकता है ? मैं तब से भावुक हूँ। उनके व उनके परिवार के प्रति मन से जाने कितने प्रेम व स्नेह के भाव उमड़ रहे हैं।

यह है 5 दिन का नवजात 'अगस्त्य' 
ऐसे पिता की संतान को श्रेष्ठ व्यक्ति होने से संसार की कोई शक्ति रोक नहीं सकती। वह बेटा धन्य है जिसने ऐसे पिता के घर जन्म लिया और वह माँ धन्य है जिसने ऐसे संस्कारवान पुत्र को जन्मा। मैं इन सज्जन का नाम जानबूझ कर नहीं दे रही ताकि उनकी प्राईवेसी भंग न हो। किन्तु सच है कि मैं बहुत छोटी हूँ इस स्नेह व आदर के समक्ष ! 'अगस्त्य' के लिए मेरा रोम-रोम असीस भेजता है आपको ! 


हम प्रतिदिन दिन से रात तक सब ओर नकारात्मक व मनुष्य की बुराई के समाचार सुनते हैं, ऐसे में अच्छाई कैसे आगे बढ़ेगी। अच्छाई को हमें ही लिख कर आगे बढ़ाना होगा। इसलिए इस घटना को लिखना आवश्यक समझा। पाठकों से निवेदन है कि उनके सुपुत्र अगस्त्य के लिए अपने आशीष दें और उनकी खुशी में सहभागी बनें।

रविवार, 20 अक्टूबर 2013

अक्तूबर का अवसाद और स्मृतियाँ

अक्तूबर का अवसाद और स्मृतियाँ  :  कविता वाचक्नवी




मेरी स्वर्गीया बहन 
मेरे घर में आज में पचास -पचपन वर्ष से भी अधिक पहले फोन लग गया था। तब उसका नम्बर केवल तीन अंकों में 677 हुआ करता था। उन दिनों फोन उठाने पर टेलीफोन कार्यालय से अपने आप जुड़ता था और जो भी नम्बर चाहिए होता था, वह वहाँ बैठी कर्मचारी (ऑपरेटर) को बताना होता था, तब वह उस नम्बर को डायल करती व मिलाकर देती थी, अपने सिस्टम में डायल करने का प्रावधान नहीं होता था।


जहाँ फोन रखा रहता था, वहाँ दादा जी की गद्दी ( ऑफिस) हुआ करती थी, जहाँ से वे और ताऊ जी / चाचा जी इत्यादि सब मिलकर भट्ठों का कारोबार संचालित करते थे। जब वे दोपहर के भोजन के लिए वहाँ से हटते तो मेरी स्वर्गीया बड़ी बहन सुषमा, मैं व मेरा छोटा भाई आलोक हम तीनों मिलकर अपने उस ऑफिस में घुस जाते और दादा जी का हुक्का पीने से लेकर जाने किन-किन कारस्तानियों को अंजाम देते। हम तीनों में आयु का लगभग दो-दो वर्ष का अन्तर था तो सदा साथ ही रहा करते थे। प्रत्येक काम साथ करते, हँसते तो साथ और रोते तो साथ। 


हमारे लिए हुक्का और फोन सबसे उमंगपूर्ण उपादान होते थे। मैंने लगभग रोज ही दादा जी के उस चिलम-बुझे हुक्के से बरसों तक हुक्का पिया है ... गुड़गुड़ किया है ।


हम तीनों उस कक्ष में घुसते ही फोन की ओर एक-एक कर लपकते। उस काल में (लगभग पचास वर्ष पूर्व) किसी के घर में फोन होना अत्यधिक 'लक्ज़री' की बात थी। पूरे नगर में केवल इने-गिने एकाध सम्पन्न घरों में यह सुविधा थी। फोन करने को लपकने वाले हम बच्चों के पास यह भी समझ न थी कि फोन उठाने पर फोन टेलीफोन भवन की कर्मचारी से जुड़ता है और उसे नम्बर देना होता है, तब नम्बर मिलाकर उसके देने के बाद संबन्धित पार्टी/ व्यक्ति से बात की जाती है। 


हम एक एक कर फोन लेते। हम में कोई एक पहले उठाता और उधर से महिला कर्मचारी की आवाज़ आते ही कहता - " हैलो, टाईम क्या हुआ है?" उधर से कुछ उत्तर आता " एक बजा है " या कभी कुछ और ऐसे ही। तब 2-4 मिनट रुक कर दूसरा बच्चा उठाता और वही प्रश्न करता तब वह फिर दोहराती कि " अरे अभी बताया था ना कि एक बजा है"। अब पाँच मिनट ठहर कर तीसरे बच्चे की बारी होती। वह भी फिर वही प्रश्न करता (क्योंकि इससे अधिक किसी सम्वाद को करने की समझ उस 5-6 वर्ष की आयु में विकसित ही नहीं हुई थी), तो इस बार वह डपटती हुई उत्तर देती " टेलीफोन घर में लगवा लिया पर घड़ी नहीं लगवाई क्या? ठहर जाओ तुम लोग, आज पण्डित जी को कहूँगी कि एक घड़ी भी घर में अलग-से लगवा दें " ।


इतना सुनते ही जिसके हाथ में चोगा (रिसीवर) होता उसे क्रेडल पर फटाक से पटक देता और हम तीनों मिलकर अपने-अपने मुँह पर अपने नन्हें -नन्हें हाथ रखकर देर तक खिलखिलाते हँसा करते, थोड़े डरते भी कि अरे उस महिला को कैसे पता चला कि हम किस परिवार के लोग हैं। ... और फिर कुछ देर में किसी नई शैतानी में उलझ जाते... कभी पीपल पर सवारी करते और कभी उसके पत्तों में चीनी और सौंफ भर कर पान बना कर खाया करते। वे दिन, हाय !, नहीं रहे। लाखों यादें और लाखों खेल मन में दबे हैं। 


सुषमा के जाने से हमउम्र बहन का अभाव सदा के लिए साथी हो गया है। न माँ रहीं..... न ही बहन .... ! 
सुषमा अक्तूबर 1993 में कैंसर से हमें सदा के लिए छोडकर चली गई। इसलिए अक्तूबर गुज़ारना हर बार भारी पड़ता है। बार-बार इस महीने मन को अवसाद और डिप्रेशन घेरते रहते हैं। इन दिनों उसकी याद बेतरह आती है, आ रही थी/आ रही है ... तो बचपन बार-बार सामने आ खड़ा हो रहा था। आज सोचा इसे लिख ही डालूँ... बस इस बहाने उन दिनों को सजीव करने की चेष्टा में कुछ चीजें याद हो आईं और यह टेलीफोन गाथा भी ! 
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भाई आलोक के विवाह पर बहन सुषमा का यह लगभग 22 वर्ष पुराना चित्र काफी धुंधला है क्योंकि इसे एक वीडियो से स्क्रीनशॉट लेकर निकाला है।

शनिवार, 17 अगस्त 2013

जाने कब से दहक रहे हैं ......

जाने कब से दहक रहे हैं .... कविता वाचक्नवी


वर्ष 1998 में नागार्जुन की 'हमारा पगलवा' पढ़ते हुए एक अंश पर मन अटक गया था -

"बाप रे बाप, इस कदर भी 
किसी की नाक बजती है ... 
यह तीसरी रात है 
पलकों के कोए जाने कब से दहक रहे हैं 
मर गई मैं तो "

इस अंश की यह पंक्ति "पलकों के कोए जाने कब से दहक रहे हैं" मुझे पंजाबी के अमर कवि शिव कुमार बटालवी के प्रसिद्ध गीत (माए नी मैं इक शिकरा यार बनाया) के पास ले गई, जिसकी एक पंक्ति थी- 

"दुखन मेरे नैना दे कोए,
ते विच हड़ हंजुआँ दा आया

पंजाबी के कवि शिव 'नैनों के कोए दुखने' की बात करते हैं तो नागार्जुन 'पलकों के कोए दहकने' की बात करते हैं। अतः स्मरण स्वाभाविक था। दूसरी ओर "निराला की साहित्य साधना" में मुंशी नवजादिकलाल का निराला के सौंदर्य के एक प्रसंग में कथन आता है कि -

 "एक तो महाकवि बिहारीलाल की नायिका भौंहों से हँसती थी, दूसरे हमारे निराला जी भौंहों में हँसा करते हैं। बल्कि ये तो बिहारी की नायिका के भी कान कुतर चुके है। इनकी पलकें हँसती हैं, बरौनियाँ हँसती हैं, आँखों के कोए हँसते हैं, अजी इनकी नसें और मसें हँसती हैं। " 

कुल मिलाकर यह 'कोए' शब्द तीन तरह से मन में गड़ा हुआ था। तभी नागार्जुन की उपर्युक्त एक पंक्ति को आधार बना कर मैंने उस समय एक नया गीत रचा था (जिसे भाषा व साहित्यिक मासिक "पूर्णकुम्भ" ने 1998 /99 में प्रकाशित भी किया था)। अपने उस पुराने गीत की याद गत कई दिन से रह-रह कर आ रही है। 
वह गीत कुछ यों था - 

जाने कब से ....
- (कविता वाचक्नवी) 

जाने कब से दहक रहे हैं इन पलकों के कोए 
जाने कितनी रातें बीतीं जाने कब थे सोए 


द्रुमदल छायादार न उपजे मीठे अनुरागों के 
स्मृतियों के वन पर न बरसे अमृत कण भादों के 
अब बस केवल भार बना है तन मिट्ठी का ढेला 
आह ! आह को सींचा प्रतिक्षण पुष्कल आँसू बोए 

                             जाने कितनी रातें बीतीं जाने कब थे सोए 


(इसके आगे चार बन्ध और थे, जो फिलहाल स्मरण नहीं आ रहे हैं, जब कभी उस प्रकाशित प्रति की कतरन मिलगी या 15 बरस पुरानी अपनी कोई डायरी मिलेगी तो ही इसे पूरा यहाँ दे पाऊँगी, तब तक इतना ही )


गुरुवार, 1 अगस्त 2013

मॉर्निंग न्यूज़, जयपुर में ललित निबन्ध

मॉर्निंग न्यूज़, जयपुर में ललित निबन्ध


28 जुलाई, 2013 को जयपुर से प्रकाशित दैनिक हिन्दी समाचारपत्र 'मॉर्निंग न्यूज़' के रविवारीय साहित्यिक परिशिष्ट के मुखपृष्ठ (संख्या10) पर प्रकाशित मेरा ललित निबन्ध - "रंगों का पंचांग"


जिन्हें पढ़ने में असुविधा हो वे इस लिंक पर जाकर 28 जुलाई चुन कर उस दिन का ई-पेपर देख सकते हैं । http://www.morningnewsindia.com/epaper/news.php?city=Jaipur


नेट पर इसे अन्यत्र यहाँ पढ़ सकते हैं -



बड़े आकार में पढ़ने के लिए चित्र पर क्लिक करें -


सोमवार, 22 जुलाई 2013

अविश्वसनीय अनुभव का एक दिन

अविश्वसनीय अनुभव का एक दिन /  कविता वाचक्नवी


कल मैं लन्दन में बसे हुए एक अद्भुत परिवार से मिली। बड़े भाई 82 वर्ष के हैं और छोटे भाई उनसे कुछ वर्ष कम, दोनों की बहुपठ पत्नियाँ हैं, दोनों भाई कल्पनातीत ढंग से एक दूसरे पर न्यौछावर रहते हैं व दोनों भाई व परिवार एक साथ रहते हैं, दोनों के तीन बच्चे हैं, परंतु कौन किसकी संतान है यह पता किसी तरह कदापि नहीं चल पाता क्योंकि दोनों ही भाई व दोनों की पत्नियाँ उन बच्चों को 'मेरा बेटा', 'मेरी बेटी' कहते हैं। प्रतिदिन हर बार छोटे भाई सबसे पहले अपने हाथ से परस कर अपने बड़े भाई को भोजन खिलाते हैं और तब बड़ी भाभी खाने बैठती हैं, जब वे खा चुकती हैं तब छोटा भाई व भाभी खाने बैठते हैं। 


मैं इस दुर्लभ व अविश्वसनीय परिवार के साथ कल लगभग 3 घण्टे रही और बार-बार धन्यता अनुभव कर मेरी आँखें आह्लाद से भीगती रहीं। बड़े भाई के बड़प्पन व विशिष्टता को सराहें तो हर बार कहते हैं कि असल में मैं कुछ नहीं हूँ सब कुछ इस छोटे के कारण समझा जाता हूँ और छोटे भाई के 'लक्ष्मणत्व' पर एक शब्द भी कहें तो वे कहते कि मैं तो जड़मति सेवक हूँ और बड़े भाई के कारण मुझे 'क्रेडिट' मिलता है व विशेष समझ लिया जाता है। 


परिवार सदा से एक साथ रहता आया है और एक साथ रहते हैं। जाने कितनी संस्थाओं के पोषण का दायित्व उन्होंने ले रखा है, एक भारतीय भाषा की पत्रिका का सम्पादन/ संचालन आदि सब भी बड़े भाई करते हैं। निर्धनों के लिए एक कैंसर अस्पताल भारत में स्थापित किया है। उनका निजी पुस्तकालय है, जिसकी एक-एक पुस्तक पर सफ़ेद आर्ट पेपर से उन्होने अपने हाथ से जिल्द चढ़ाई हुई हैं व अपने हाथ से उस पर पुस्तक का नाम आदि लिखा करीने से सजा है, पूरा पुस्तकालय सफ़ेद रंग के सौम्य अनुशासन में मानो सरस्वती का स्वरूप धारे है। पुस्तकालय में संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती व कुछ अन्य भाषाओं की पुस्तकें भरी पड़ी हैं। दोनों पूरी तरह सक्रिय व सचेत हैं और दोनों के मुखमण्डल पर एक ऐसी दिव्य आभा, सौम्यता व शिष्टता है कि उसे बखाना नहीं जा सकता। दोनों की पत्नियाँ अविश्वसनीय ढंग से एक दूसरे पर मरने मिटने को तैयार रहने वाली बहनों से भी कई गुणा बढ़कर हैं। हम सब लोगों को खाना आदि देकर छोटे भाई रसोई में बर्तन साफ करते रहे जब तक बड़े भाई खा नहीं चुके, बड़ी भाभी हमें परसती रहीं और छोटी भाभी रसोई में पकाने आदि का काम करती रहीं। हम सब के खा चुकने के बाद बड़ी भाभी जब खाने बैठीं तो तब छोटी भाभी रसोई साफ कर बर्तन साफ करने लगीं 


...... क्या क्या कहा जाए ..... जीवन में ऐसा परिवार, ऐसा प्रेम, ऐसा बड़प्पन म्यूजियम में संरक्षित कर आश्चर्य से देखी जाने की वस्तु जैसा है... रिश्तों का ऐसा दुर्लभ रूप कि शब्द मेरे किसी काम नहीं आ रहे हैं कि उसे बखान सकूँ.... बस हृदय को आकण्ठ रसानुभूति से लबालब पा रही हूँ । सौजन्यता के ऐसे मूर्तिमान रूप कि जो देखा अनुभव किया है, ये शब्द उसका हजारवाँ अंश भी नहीं हैं। कितने गंभीर विषयों पर कितनी बातें उनसे हुईं उसका लेखा जोखा भी अलग ही चीज है। संसार में मनुष्य ऐसे प्रेम और ऐसे रिश्ते आचरण में जीने लगें तो संसार स्वर्ग बन जाए। मुझे उनके यहाँ वास्तव में स्वर्गिक सुख की अनुभूति हुई। और वे अपनी बेटी से भी कम आयु की मुझ तक को दीदी कह कर संबोधित करते और विदाई के समय 'बहन का भाइयों पर आशीष बना रहे' जैसे शब्द का कर उन क्षणों को दुर्लभ बना रहे थे... ! जिन पारिवारिक व जीवन मूल्यों को पुस्तकों में पढ़ा-पढ़ाया जाता है, यह परिवार उन मूल्यों को सुखपूर्वक पूरी तरह जी रहा है ! क्या कहूँ ..... कल के उस अनुभव की कोई तुलना नहीं .... बस दुर्लभ !!!


गुरुवार, 4 जुलाई 2013

लन्दन : राजहंसों का जोड़ा, झील व हम

लन्दन : राजहंसों का जोड़ा, झील व हम / कविता वाचक्नवी

अपने जीवन व घर में गाय, मोर, तोता, खरगोश, मछलियाँ आदि पालने व उनका स्नेह सान्निध्य लेने के जाने कितने दुर्लभ संस्मरण हैं। इन प्राणियों में गाय, कुत्ता आदि जीव ऐसे हैं कि कइयों ने उन्हें पाला होगा और उनके संस्मरण होंगे। कुछ कम अन्य लोगों के तोता, मछलियों आदि के पालने की संस्मरण भी होंगे किन्तु बहुत कम लोगों के खरगोशों के शावक-जोड़े के संस्मरण होंगे और किन्हीं बेहद विरले लोगों के मोर के साथ। कुछ दिन पूर्व मैंने अपने पालतू मोर के संस्मरण लिखे थे। 
फेसबुक पर यहाँ -
https://www.facebook.com/kvachaknavee/posts/10151614001859523

व 'वागर्थ' पर "जब दुल्हन आने पर घर में नाचे मोर" के रूप में देखे जा सकते हैं। (यहाँ क्लिक कर देखें)

"मंजरी और हंस : लन्दन आज"  (यहाँ क्लिक कर देखें)
में व अन्य भी अलग-अलग संस्मरणों के रूप में कई बार अपने घर से सटी झील और अपार शान्त प्राकृतिक सुषमा वाले वातावरण का उल्लेख करते हुए मैंने राजहंसों के जोड़ों व बतखों आदि के साथ अपने दैनिक नैकट्य का उल्लेख किया है, जिनकी जाने कई सौ रूपों में विविध छवियाँ मैंने अपने कैमरे में सुरक्षित की हैं और नेट पर भी डाली हैं। 

इतना ही नहीं अपनी पालतू 'मौलि' तथा बगीचे में दिन-रात आ कर घूमने वाली लोमड़ी (कई बार दल-बल सहित भी) की छवियाँ और वीडियो भी बनाए - यहाँ क्लिक कर देखें 


"लन्दन का हिमपात व मेरा कैमरा" तथा उसमें दिए लिंक्स व चित्रों में जिस झील के श्वेत सौन्दर्य व पक्षियों आदि की रूपरेखा सहेजी है, उस झील में रहने वाली बतखों व हंसों की ढेर सारी छवियाँ हृदय पटल पर भी अंकित हैं - यहाँ । 

सबसे विशेष बात यह है कि इस झील में दो-तीन प्रकार के हंसों के जोड़े हैं, जिनमें से सबसे विशेष हैं राजहंसों के दो जोड़े; जिनके विषय में गत दिनों मैंने लिखा था कि हंसिनी नवप्रसूता है और अपने नन्हें बाल-हंसों के साथ जोड़ा पानी में घूमता है। दो वर्ष पहले हंसिनी के आसन्न-प्रसवा और फिर बाल-हंसों के साथ जोड़े के कई चित्र लिए थे किन्तु वे सब पुराने चित्र बहुत ढूँढने पर भी अभी खोज नहीं पाई क्योंकि वे सब पुराने मोबाईल कैमरा में थे। 

भारत में मैंने हंस देखना तो क्या, उसका उल्लेख-मात्र पढ़ा है, वह भी संस्कृत साहित्य में। नल-दमयन्ती कथा में राज-हंस की कुछ विशद भूमिका से परिचय भी वहीं हुआ था। किन्तु जीवन में कभी राजहंस मेरे नियमित साथी बन जाएँगे, इसकी कल्पना व अनुमान भी असंभव था। किन्तु इधर वर्ष-भर से राज-हंसों का यह जोड़ा मेरा प्रतिदिन का साथी है। मैं जैसे ही प्रतिदिन झील पर जा कर इनकी प्रतीक्षा में बैठती हूँ, यह जोड़ा मुझे देखते ही जाने कैसे बहुत दूर से पहचान कर तैरते-तैरते मेरे पास आ बैठता है। 


बड़ी बहन सरीखी शन्नो दी' लंदन में लगभग 42 वर्ष से रह रही हैं और इस बीच उन्होंने भी जीवन में जाने कई सौ राजहंस यहाँ देखे हैं; किन्तु उनके लिए भी मेरे द्वारा बार-बार अपने वाले इन राजहंसों का यह उल्लेख अविश्वसनीय था। तो पहली बार मेरे यहाँ उनके आने का एक बड़ा उद्देश्य इन दृश्यों व अनुभूतियों को साक्षात् करना भी था।परसों ( 2 जुलाई को प्रातः वे यहाँ आईं तो उन्हें साथ लेकर लगभग अढ़ाई घंटे मैंने उन्हें निसर्ग के वे दृश्य भी दिखाए जिनके सान्निध्य में मेरा दिन-रात व्यतीत होता है।


प्रारम्भ में झील पर केवल ढेर सारी अलग-अलग नस्ल की बतख़ें ही थीं, किन्तु जब हम थोड़ा घूम कर फिर से झील के निकट आए तो बहुत दूरी पर झील के मध्य भाग में राज-हंसों का जोड़ा भी तैरता दीख गया। तब तो शन्नो दी' के आश्चर्य का पारावर न रहा, जब वह जोड़ा मुझे देखते ही मेरे संकेत पर तुरन्त ही हमारी ओर बढ़ने लगा और एकदम से किनारे पर हमारे हाथ से छू लेने की पहुँच में एकदम आ कर हमसे सट गया। शन्नो दी' तो एकदम किलक उठीं कि उन्होंने जीवन में पहली बार इतनी निकट से हंसों को देखा है। मैंने झटपट उनके कई चित्र लिए। इस बीच वे भी अपने कैमरे में मुझे व निसर्ग को कैद करती रहीं। उस पूरी परिक्रमा और वातावरण के कई सारे चित्र सहेजे गए । 


फिर वहाँ से हम लोग घर आए तो हमारी 'मौलि' भी शन्नो दी' के स्वागत के लिए तत्पर थी। हमने अपने बगीचे में गुलाबों की तीखी मीठी सुगन्ध, स्ट्राबरी, चेरी व पुदीने आदि के बूटों में भी देर तक सुखद समय बिताया। वह पूरा दिन हम लोगों का बतियाते और हँसते कैसे बीत गया पता ही न चला। शन्नो दी' को यों देर तक हँसते मुसकाते देखना अच्छा लगा। और हाँ, वे आते समय अपने साथ गुलाबजामुन ले कर आई थीं.... जिनकी मिठास ने उस दिन की मिठास को और बढ़ा दिया। अस्तु ! वह अविस्मरणीय दिन जाने कितने बरसों तक मन पर अंकित रहेगा। 


झील पर लिए चित्र यहाँ संकलित हैं। ये कई अर्थों में दुर्लभ हैं, अविश्वसनीय व संग्रहणीय हैं। इन दृश्यों को देखने से बार-बार जीवनीशक्ति मिलती है। और लोग भी इन दुर्लभ क्षणों का आनंद ले सकें इसलिए वे सब चित्र यहाँ सहेज दिए हैं। 


(©): सभी चित्रों का सर्वाधिकार (कॉपीराईट) सुरक्षित है। कृपया कदापि उसका उल्लंघन न करें।


























































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