समाचार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
समाचार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 30 जून 2023

पाककला की चुनौती और टमाटर : कविता वाचक्नवी

टमाटर बारहमासी फसल नहीं है। 🍅🍅🍅

जब हम भारत में रहते थे तो लहसुन–प्याज न खाने के चलते हमारे यहाँ टमाटर के अधिक प्रयोग की अनिवार्यता थी। जो लोग प्याज खा लेते हैं, उन्हें वैसे भी टमाटर की अनिवार्यता कुछेक भोज्य पदार्थों के लिए ही होती है। मैंने क्योंकि स्वयं अधिकांश फसलें अपने हाथ से बोई, उगाई काटी हैं अतः एक–एक फल, एक –एक फली, एक–एक कन्द, व एक–एक शाक की प्रत्येक इकाई का महत्व तथा प्रतीक्षा से परिचित हूँ। उन के हमारी इच्छानुसार उग कर तैयार न होने का अर्थ उगाने वाले का दोष नहीं, अपितु प्रकृति व पर्यावरण का चक्र, नियम तथा सन्तुलन है। 

ऐसे में जिन दिनों टमाटर की फसल नहीं होती थी, या मण्डई में नहीं मिलते थे तो गृहणी के रूप में जो–जो उपाय करती थी, उन्हें पाठकों की सहायता के लिए साझा कर रही हूँ। 

(प्याज–लहसुन न खाने–पकाने के चलते मेरी गृहस्थी में प्रतिदिन  बड़े आकार के सात–आठ टमाटर शाक–दाल हेतु बारहों माह चाहिए होते थे)। ऐसे में विकल्प दो–तीन थे। गृहणियों को बिना हाय–तौबा मचाए शान्ति से अभाव को भी भाव से पूर लेने का गुण अनिवार्यतः बनाए रखना चाहिए। यह हमारे ही पारिवारिक सम्मान का कारक बनता है। तो आइए, मेरे अनुभव से आप को कुछ लाभ मिले तो इन्हें अपना सकते हैं –

कोकम
दक्षिण में गहरे लाल रंग का एक बहुत खट्टा फल आता है, जिसे कोकम कहते हैं। उस का खट्टा–सा शरबत भी बाजार में मिलता है।  इस कोकम की सूखी लाल–भूरी फाँकें बिकती हैं। जिस किसी में डाल दें, खटाई और रंग देती हैं। मैं सदा उन्हें घर में रखती थी। जिस किसी दिन टमाटर घर में समाप्त हुए, उस दिन दाल को कोकम तथा अदरक डाल कर उबाला व फिर बघारा करती थी। कोकम आज भी मेरी गृहस्थी में सदा रहता है। यहाँ तो उस की दीर्घावधि तक सुरक्षित रहने वाली गीली फाँकें उपलब्ध हो जाती हैं।

साबुत लाल मिर्च
सूखी साबुत लाल मिर्च भी टमाटर के अभाव में काम आती है। आप को अधिक मिर्च नहीं रुचती तो आप प्रत्येक मिर्च को तोड़, उस के बीज व दाने बाहर निकाल अलग प्रयोग हेतु सहेज लें तथा छिलके को पानी से धो, कुछेक छोटे–छोटे टुकड़े कर लें, जैसे एक लम्बी मिर्च हो तो चार–छह टुकड़े हो सकते हैं। उन्हें अलग से उबाल कर, पानी से निकाल दाल या शाक में ऊपर से मिला दें तो टमाटर के लाल रंग का आभास देंगी। उबालने से बचा हुआ पानी भी स्वादानुसार मिलाया जा सकता है। ऐसे में टमाटर की खटाई की कमी पूरी करने हेतु अमचूर प्रयोग करें।

इमली का अवलेह
बाजार में इमली का बिना गुठली–डण्ठल का तैयार अवलेह उपलब्ध होता है। मेरी गृहस्थी में वह सदा रहता आया है। उसे भी रंगत तथा खटाई हेतु, विशेषतः साम्भर हेतु प्रयोग करती आई हूँ।

इन उपायों से सम्भवतः आप भी अपनी गृहस्थी और चौके को अभाव रहित तथा अनवरत चला सकते हैं।
–✍🏻 कविता वाचक्नवी


मंगलवार, 6 सितंबर 2016

गगन गिल और अनिल जनविजय विवाद : कीचड़उछाल का खेल

गगन गिल और अनिल जनविजय विवाद  : कीचड़उछाल का खेल     - क. वा.


इधर कुछ दिनों से दो लोगों का एक व्यक्तिगत विवाद हिन्दी साहित्य से जुड़े लोगों की चर्चा के केंद्र में है और उसकी आग लगातार फ़ैल रही है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर #कीचड़ उछालने के खेल में रस ले-ले कर या बदले की भावना से तत्पर हो नित नए प्रहार कर रहे हैं और इस तरह वस्तुतः अपने आप को ही एक्सपोज़ कर रहे हैं और अपना स्तर गिराते-दिखाते जा रहे हैं। 


जो अनिल #जनविजय ने किया, वह गलत था और पहल उन्होंने ही की, जिसकी प्रतिक्रिया में #गगनगिल ने जो किया वह भी गलत ही था। एक व्यक्ति किसी की इज्जत उतारे तो वह गलत होता ही है, किन्तु बदले में हम उसकी इज्जत उतारते समय यह भूल जाएँ कि हमारी प्रतिक्रिया हमारा स्तर भी बताती है, यह तो कोई बात न हुई। 


दो लोगों के निजी संबंधों के चलते साहित्य से जुड़ा प्रत्येक व्यक्ति कटघरे में आ गया है,इसकी परवाह दोनों पक्षों में से किसी को नहीं रही। इक-दूजे के मान-सम्मान की धज्जियाँ उड़ाते समय अपने मान-सम्मान की धज्जियाँ और उड़ रही हैं, यह जब उनकी चिंता का विषय नहीं तो साधारण पाठक और दूसरे लोग क्यों और कब तक चिंतित हों ! 


दो लोग कीचड़ से खेल रहे हैं तो लथपथ होना स्वाभाविक है। जो निकट जाएगा, उस पर भी कीचड़ के कुछ न कुछ छींटे गिरेंगे ही। ऐसे में दोनों पक्षों के आत्मीय अपने पर कीचड़ गिरने का खतरा उठाते हुए भी उन्हें बचाने या साथ देने आगे बढ़ते हैं और कुछ-न-कुछ कीचड़ इस सहानुभूति के चलते वहन करते हैं। किन्तु बाकी बचे हुओं को उस कीचड़ में जाने की आवश्यकता क्यों है ? जो जितना कीचड़ से दूर रहकर बच सके उतना अच्छा है। 
यह कोई बड़ी सामाजिक नैतिकता और सामजिक मूल्यों या समाज-कल्याण की बात तो है नहीं कि हर किसी को लोक-कल्याण के लिए कीचड़ की परवाह न करते हुए भी उसमें कूदना-ही-कूदना है। 


इसलिए आवश्यक है कि किसी भी पक्ष की निंदा करने की अपेक्षा दोनों को शांत करने की और दूर हटाने की चेष्टा की जाए और उन्हें यह सन्मति और सलाह दी जाए कि इस कीचड़-उछाल में आपकी अपनी भी हानि ही हानि है। दूसरे पर कीचड़ उछाल कर आप दूध से धुले हुए निष्कलंक नहीं रह सकते। जितनी जल्दी जिसे समझ आ जाए और जो जितनी जल्दी इस से बचेगा उतना उसी का कल्याण है। 


दूसरे की गरिमा भंग करते समय व्यक्ति अपनी ही गरिमा से च्युत हो रहा होता है। हम तो इससे दूर रहने में ही सबका भला समझते हैं। जितने लोग अधिक जुड़ेंगे वे अपने-अपने पक्ष की हानि ही अधिक करेंगे, लाभ नहीं। सभी का दूर रहना और चुप रहना ही साहित्य और समाज के हित में है अन्यथा इस विकराल कीचड़-उछाल को और-और हवा-पानी मिल रहा है। 
यह कैसा प्रेम है, भई ?
- कविता वाचक्नवी 

शनिवार, 29 नवंबर 2014

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा सम्मान-समारोह एवं आमन्त्रण

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा सम्मान-समारोह एवं आमन्त्रण


उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा प्रदत्त अपने जीवन के इस अमोल अवसर पर मैं तो उपस्थित नहीं हो सकूँगी (मेरी ओर से मेरा कनिष्ठ पुत्र यह सम्मान ग्रहण करेगा), किन्तु मित्रों को आग्रहपूर्वक निमन्त्रण है कि वे अधिकाधिक उपस्थित होकर शोभा बढ़ाएँ। 

बड़े आकार में देखने के लिए एक-एक कर चित्रों पर क्लिक करें  -






शनिवार, 1 नवंबर 2014

भाषा और साहित्य के विद्वान व लेखक सम्मानित

भाषा और साहित्य सम्मान

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान सहित प्रत्येक ज्ञात-अज्ञात के प्रति आभार सहित

मुखपृष्ठ, दैनिक जागरण, 1/11/14
पृष्ठ 4,  दैनिक जागरण, 1/11/14 

बुधवार, 9 जुलाई 2014

संकलन हेतु रचनाएँ आमन्त्रित

संकलन हेतु रचनाएँ आमन्त्रित 

An appeal to the writers based outside India / भारत से बाहर के लेखकों से रचनाएँ आमन्त्रित

A book named `Meri Maan' (My Mother) has been planned to be published on the concept, ethos and practices of motherhood in different parts of the world. The nature of the book will be literary, cultural and social only. The object of the book is to present a contemporary scenario as well as traditional aura of motherhood in different societies. 

The project is being supported and sponsored by Shri B. K. Birla, renowned industrialist of India. A committee of Indian scholars has been constituted for compilation of articles related to the subject.

We will be grateful if you kindly spare some time for this noble cause and write an article on the above subject, especially in view of the land to which you belong or the country in which at present you reside. The language of the article should be either Hindi or English. In special cases, we will try to translate valuable articles received in other languages too. 
We shall also welcome some poems related to the subject, composed by you or other prominent poets of your country.

We will also require your photograph (passport size) and your bio data. Please, try your best to mail to me all the press materials at the earliest.

A copy of the printed book along with a memento will be sent to you as a mark of respect.

'मेरी माँ' शीर्षक से एक पुस्तक के लिए विश्वभर के रचनाकारों की रचनाएँ/लेख ( साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक) आमन्त्रित हैं। पुस्तक का उद्देश्य विभिन्न समाजों में मातृत्व और उसकी गरिमा/महिमा के विविध पक्षों को रेखांकित/प्रस्तुत करना है। यह योजना भारत के प्रमुख उद्योगपति श्री बी. के. बिरला द्वारा संपोषित है। 

आप जिस देश में रहते हैं, वहाँ मातृत्व की किसी विशिष्ट छवि को उकेरेते हुए एक लेख हिन्दी अथवा अंग्रेजी में हमें शीघ्रातिशीघ्र भेजें। कुछेक महत्वपूर्ण लेखों के अनुवाद का प्रावधान भी है। कुछ बहुत महत्वपूर्ण कविताओं को भी इसमें सम्मिलित किया जाएगा। अतः आप अपने देश के किसी महत्वपूर्ण रचनाकार की 'माँ' विषयक कोई विशिष्ट कविता भी हमें भेज सकते हैं। प्रयास करें कि शब्दसीमा 1000 के लगभग रहे। शेष जानकारी हेतु टिप्पणी द्वारा सम्पर्क करें। 

रचना के साथ रचनाकार का पासपोर्ट आकार का चित्र व संक्षिप्त औपचारिक परिचय भी शीघ्रातिशीघ्र भेजें।  30 अगस्त के पश्चात् भेजी गई रचनाएँ स्वीकार नहीं की जाएँगी। 

प्रकाशनोपरांत स्मृतिचिह्न के साथ लेखकीय प्रति सादर भिजवाई जाएगी। पुस्तक का लोकार्पण आगामी वर्ष दिल्ली में होगा। 

(यदि आप किसी विदेश में रहने वाले लेखक से परिचित हैं तो कृपया उन तक इस सूचना को भिजवाएँ)



बुधवार, 22 जनवरी 2014

समाचार व कतरनें

समाचार व कतरनें 

लोकस्वामी, वर्ष 2 अंक 13, नोएडा


'स्रवन्ति', दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद की मासिक पत्रिका 





दैनिक हिन्दी मिलाप, हैदराबाद


'शान्तिधर्मी', हिसार 




आर्य सन्देश (दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा का मुखपत्र )




रविवार, 17 नवंबर 2013

साहित्य का अभिशप्त माह : चली गईं डोरिस भी

Type your summary here


आज सुबह ही लिखा था -  



"सर्व श्री रावूरि भारद्वाज, राजेन्द्र यादव, परमानन्द श्रीवास्तव, विजयदान देथा, के. पी. सक्सेना, हरिकृष्ण देवसरे जैसे साहित्यकारों के गत कुछ ही दिनों में एकसाथ परलोक गामी होने के क्रम में आज एक नाम और जुड़ गया- 'जूठन' जैसी कृति के रचनाकार ओम प्रकाश वाल्मीकी का।



कुछ वर्ष पूर्व जैसे एकसाथ कई हास्यव्यंग्य के रचनाकार अल्पावधि में दिवंगत हुए थे, साहित्य के लिए यह वैसा ही अभिशप्त माह बन गया है। एक साथ दिवंगत आत्माओं को शान्ति लिखते- लिखते व श्रद्धांजलि जैसा शब्द टाईप करते हाथ काँप-काँप जाते हैं। " 

पर इस सब के बावजूद ...... ओह्ह्ह्ह्ह एक और दु:खद समाचार !


नहीं रहीं नोबेल विजेता उपन्यासकार : डोरिस लेस्सिंग 
- कविता वाचक्नवी


मेरी अत्यंत प्रिय ब्रिटिश लेखिका व नोबेल से सम्मानित डोरिस लेस्सिंग नहीं रहीं। अभी अभी उनका देहान्त हो गया। जिस वर्ष उन्हें नोबेल मिला था तब मैंने विकीपीडिया पर उनके विषय में हिन्दीलेख तैयार किया था जो आज भी यथावत् वहाँ है और साथ ही उन्हें (डोरिस को) हिन्दी में लिखकर सीधे बधाई भेजी थी जिसे उन्होंने हिन्दी में प्राप्त / हिन्दी समाज से प्राप्त एकमात्र बधाई-सन्देश के रूप में लेते हुए उसे व्यक्तिगत मान दिया था और इस तरह उन से सीधा परिचय हुआ था। यहीं लन्दन में ही रहती थीं। उनका न रहना व्यक्तिगत रूप से बड़े आघात जैसा है। किसी जीते जागते नोबेल विजेता से व्यक्तिगत परिचय कैसा गर्व देता है यह बताया नहीं जा सकता। आज वह स्थिति बदल गयी....। नोबेल की घोषणा होते ही प्रेस और मीडिया की भीड़ जब उनके यहाँ पहुँची तो उनके सामने वे शाक-फल खरीद कर लौटी थीं। मीडिया से बातचीत उन्होने अपने घर के मुख्यद्वार की चौखट पर बैठ कर की। वह वीडियो व चित्र संसार भर में खूब चर्चा में आए। न्यूयॉर्क टाईम्स की साईट पर आज भी उन्हें देखा जा सकता है। 

डोरिस के दो वक्तव्य -

“I’ve got the feeling that the sex war is not the most important war going on, nor is it the most vital problem in our lives.”

और १९९४ में भी उनका वक्तव्य था - “Things have changed for white, middle-class women,” और कहा, “but nothing has changed outside this group.”


उन्हें नोबेल पुरस्कार घोषणा के तुरंत बाद सूचना देने पत्रकार उनके घर पहुँचे तो यह दृश्य हुआ


डोरिस लेसिंग (२२ अक्तूबर १९१९-१७ नवंबर, २०१३) २००७ में साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाली ब्रितानी लेखिका थीं। उन्हें यह पुरस्कार अपने पाँच दशक लंबे रचनाकाल के लिए दिया गया। महिला, राजनीति और अफ़्रीका में बिताए यौवनकाल उनके लेखन के प्रमुख विषय रहे। १९०१ से प्रारंभ इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाली लेसिंग ११वीं महिला रचनाकार थीं। ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य रह चुकी डोरिस ने हंगरी पर रूसी आक्रमण से व कार्यप्रणाली व नीतियों से क्षुब्ध होकर १९५४ में पार्टी ही छोड़ दी थी। अपने आरम्भिक दिनों में उन्होंने डिकेंस, स्कॉट,स्टीवेन्सन, किपलिंग, डी.एच. लोरेन्स, स्टेन्थॉल, टॉल्स्टॉय, दोस्तोवस्की आदि को जी भ­र पढ़ा। अपने लेखकीय व्यक्तित्व में माँ की सुनाई परीकथाओं की बड़ी भूमिका को डोरिस रेखांकित करती थीं। १७ नवम्बर २०१३ रविवार को तड़के अपने आवास पर उनका निधन हो गया। इनके निधन से 3 सप्ताह पहले ही लंबी बीमारी से जूझ रहे इनके पुत्र का निधन हो गया था।

जीवन परिचय

ईरान में जन्मीं डोरिस के माता-पिता दोनों ब्रिटिश थे। पिता पर्शिया के इम्पीरियल बैंक में क्लर्क व माँ एक नर्स थीं। १९२५ में परिवार (आज के) जिम्बाब्वे में स्थानांतरित हो गया। जिन सपनों को लेकर वे यहाँ आए थे- वे चकनाचूर हो गए। लेसिंग के अनुसार उनका बचपन सुख व दु:ख की छाया था,जिसमें सुख कम व पीड़ा का अंश ही अधिक रहा। अपने भाई हैरी के साथ प्राकृतिक जगत के रहस्यों को समझने-बूझने में लगी लेसिंग को अनुशासन, घरेलू साफ़-सफ़ाई व घरेलू तथा सामान्य लड़की बनाने आदि के प्रति माँ बहुत सतर्क व कठोर रहीं। १३ वर्ष की आयु में लेसिंग की विधिवत शिक्षा का अंत हो गया । किंतु ये अन्य दक्षिण अफ़्रीकी लेखिकाओं की भाँति न रहकर शिक्षा से वहीं विरत नहीं हो गईं अपितु स्वयं ही शिक्षार्जन की दिशा में बढ़ती रहीं । अभी पिछले दिनों दिए गए इनके एक वक्तव्य के अनुसार- "दु:खी बचपन 'फ़िक्शन"(लेखन) का जनक होता है, मेरे विचार से यह बात सोलह आने सही है"। १९ वर्ष की आयु में १९३७ में सैलिस्बरी आने पर टेलीफ़ोन ऑपरेटर के रूप में भी इन्होंने कार्य किया। यहीं इनके दो विवाह हुए। पहला १९३९ में फ़्रैन्क विज़डम से, जिससे इन्हें दो बच्चे हुए। किन्तु यह सम्बंध चार वर्ष ही रहा और १९४३ में तलाक हो गया। दूसरा विवाह एक जर्मन राजनैतिक कार्यकर्ता गॉटफ्रीड लेसिंग से किया जिसकी परिणति भी १९४९ में तलाक के रूप में हुई। इस विवाह से हुए एकमात्र बेटे को लेकर ये ब्रिटेन आ गई थीं।


साहित्यिक जीवन

डोरिस लेसिंग के साहित्यिक जीवन का प्रारंभ १९४९ से माना जा सकता है जब वे दूसरे विवाह से हुए बेटे के साथ १९४९ में लंदन पहुँचीं। उनका पहला उपन्यास "द सिंगिंग ग्रास" इसी वर्ष प्रकाशित हुआ और यहीं से विधिवत इनके लेखकीय जीवन की शुरुआत हुई। इनका साहित्य अधिकांश अपने अफ़्रीकी जीवनानुभ­वों से जुड़ा है, जिसमें बचपन की स्मृतियाँ, राजनीति से जुड़ाव व समाज-संलग्नता ही अधिकांश है। सांस्कृतिक टकराव, जड़ों में जमा अन्याय, वर्णभेद, आत्मद्रोह, आत्मद्वन्द्व की स्थितियाँ इनके साहित्य में बहुतायत से हैं। दक्षिण अफ़्रीका में श्वेत उपनिवेशवाद के प्रति असहमत लेखन के कारण १९५६ में इन्हें वर्जित लेखक तक घोषित कर दिया गया। उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक, एकांकी, आदि विधाओं के अतिरिक्त भी इन्होंने लिखा था।

पुरस्कार सम्मान

"अंडर माई स्किन:वोल्यूम वन ऑफ़ माई आटोबायोग्राफ़ी टू१९४९" (१९९५ में प्रकाशित) के लिए इन्हें 'जेम्स टैईट ब्लैक प्राईज़' से सम्मानित किया गया। १९९५ में हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने इन्हें ऒनरेरी डिग्री प्रदान की। इसी वर्ष ये ४० वर्ष बाद पुन: दक्षिणी अफ़्रीका गईं और बेटी व नाती-पोतों से मिलीं। ४० वर्ष पूर्व जिस लेखन के लिए इन्हें प्रतिबन्धित व निष्कासित किया गया था, उसी लेखन के कारण इस बार इनका वहाँ गर्मजोशी से स्वागत-सत्कार किया गया । १९५४ से २००५ तक देश-विदेश में अपने साहित्य व लेखन पर मिले अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों व पुरस्कारों की शृंखला में २००७ का 'नोबेल' साहित्य पुरस्कार इस वर्ष इन्हें मिला। उनका अन्तिम उपन्यास - " द क्लेफ्ट" था जिसका कथानक समुद्र के किनारे रहने वाले स्त्री-समुदाय ‘क्लेफ़्ट’ पर केन्द्रित है। यह उपन्यास एक ऐसे स्त्री-समाज की कथा है जो पुरुष-शून्य है। 


=============================================================

सोमवार, 9 सितंबर 2013

ब्रिटेन में आय / कमाई के औसत आंकड़े

ब्रिटेन में आय / कमाई के औसत आंकड़े (गत वर्ष के आकलन के आधार पर) -
स्रोत - याहू से प्राप्त आंकड़ों का अनुवाद  (By कविता वाचक्नवी) 

(कुछ समय से ब्रिटेन के अर्थतन्त्र ( अर्थव्यवस्था)  पर एक लेख लिख रही हूँ, ये आंकड़ें व तथ्य उसी लेख का एक हिस्सा हैं) 


नल आदि ठीक करने वाले (प्लम्बर) की -  न्यूनतम  £27,866   -  अधिकतम  £50,000

बस ड्राईवर - £22,701 (वार्षिक)

ट्राम व ट्रेन ड्राईवर - £44,617 (वार्षिक)

सेक्रेटरी आदि  - £20,474 and £18,866 (मेडिकल व लीगल वालों की इससे अपवाद हैं, जबकि व्यक्तिगत पीए £24,067 तक भी कमा पाते हैं)।(वार्षिक)

बहुराष्ट्रीय कंपनियों में सेक्रेटरी  -  £50,000 (वार्षिक)

सामान्यतः प्रकाशित होने वाला लेखक - £5,000 (J. K. Rowling जैसे लेखक इसके एकमात्र ढंग के अपवाद हैं जो £560 मिलियन तक कमा लेते हैं) (वार्षिक)

दिन में चौदह घंटे काम करने वाले टीवी के कलाकार -  £30,500 (एक पूरी शृंखला के लिए)

 टीवी कार्यक्रमों में सिलेब्रिटी जज आदि £110,000 से £550,000 (त्रैमासिक) व कुछ अति विशिष्ट सिलेब्रिटी £850,000 (पूरी सीरीज़)

प्रधानमंत्री - £142,500 (वार्षिक)

काऊन्सिल के 2,525 कर्मचारी - £100,000 से अधिक (वार्षिक)

42 स्थानीय संकाय-कर्मचारी -£250,000  से अधिक (वार्षिक)

राष्ट्रीय स्वास्थ्य परियोजना (NHS) के लगभग 8,000 कर्मचारियों को गत वर्ष (डॉक्टर स्तर) £340,000 वार्षिक (प्रति व्यक्ति) का भुगतान हुआ

वार्ड नर्स - £21,000 (वार्षिक)

गॉर्डन ब्राऊन ने अपने संसदीय दायित्वों से इतर कार्यों (भाषणों व लेखन) द्वारा £1.37m कमाए (गत वर्ष)

पद निवृत्ति के पश्चात् टोनी ब्लेयर ने निजी व्यापारिक रुचियों आदि से £20 मिलियन कमाए (गत वर्ष)

स्रोत - याहू से प्राप्त आंकड़ों का अनुवाद  (By कविता वाचक्नवी) 

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

'हाशिये उलाँघती स्त्री' .... व आप और मैं

'हाशिये उलाँघती स्त्री' .... व आप और मैं 
http://vaagartha.blogspot.com/2013/09/Indian-women-fiction-writers-and-a-historical-collection-of-their-stories-in-25-volumes.html


वर्ष 2008 में रमणिका गुप्ता जी ने 'युद्धरत आम आदमी' के "हाशिये उलाँघती स्त्री" विशेषांक की योजना का सूत्रपात किया था। जिसके अन्तर्गत सभी भारतीय भाषाओं की महिला रचनाकारों की स्त्रीविमर्श विषयक रचनाओं के संकलन की योजना थी, जिसे 'रमणिका फाऊण्डेशन' द्वारा काव्य-संकलन और कहानी-संकलन के रूप में छपना था। काव्य संकलन तो दो भागों में 26 मार्च 2011 को लोकार्पित हो गया था (यहाँ विस्तार से देखें - http://vaagartha.blogspot.co.uk/2011/12/blog-post_9899.html


... किन्तु कहानी संकलन का काम अब पूरा हुआ है।
यह कहानी संकलन कुल लगभग 25 खण्डों में आएगा व इसमें कुल 23 भाषाओं की महिला कथाकारों की कहानियाँ सम्मिलित हैं।  इसके प्रारम्भिक (भारत की हिन्दी कहानी) के तीन खण्डों का प्रकाशन हो चुका है और इनका लोकार्पण 11 सितम्बर को साहित्य अकादमी, दिल्ली में हो रहा है। शेष लगभग 20-22 खण्ड भी धीरे-धीरे एक-एक कर शीघ्र ही पाठकों के हाथ में होंगे। अच्छी बात यह भी है कि काव्य की तरह इस कहानी अंक में भी रचनाओं का क्रम रचनाकारों की जन्मतिथि के क्रम से रखा गया है। यथा भारत की हिन्दी कहानी के इन 3 खण्डों को 'कोठी में धान' नामक पहले खण्ड में 8 दिवंगत रचनाकार और तथा 1947 से पहले जन्मी रचनाकार सम्मिलित हैं। दूसरे खण्ड 'खड़ी फसल' में 1948 से लेकर 1964 तक जन्मी (36)  कथाकार सम्मिलित हैं व  तीसरे खण्ड 'नयी पौध' में 1965 वर्ष से लेकर 1984 तक जन्मी (33) युवा कथाकारों की कहानियाँ सम्मिलित हैं।


इस ऐतिहासिक महायोजना की मुख्य सम्पादक रमणिका दीदी है व सह संपादक हैं अर्चना वर्मा जी। कविता व कहानी वाले दोनों संकलनों में रचनाकार के रूप में तो मैं यद्यपि हूँ ही किन्तु मेरे लिए और सुखद बात यह भी है कि इसके विदेश / प्रवासी वाले खण्ड की सम्पादक के रूप में भी मुझे इस से जुड़ने का सौभाग्य मिला है; यह अवसर मेरे लिए एक ऐतिहासिक अनुभव व घटना है। यह अवसर उपलब्ध करवाने के लिए मैं रमणिका दीदी के प्रति कृतज्ञ हूँ; यद्यपि उनका आत्मीय स्नेह तो मैं लंबे अरसे से लेती आ ही रही हूँ । 


प्रवासी / विदेश वाले खण्ड के लोकार्पण में यद्यपि मुझे निस्संदेह उपस्थित रहना था, तदनुसार ही जनवरी 2014 में प्रवासी सम्मेलन में उसके लोकार्पण की योजना भी बना ली थी, किन्तु किन्हीं अपरिहार्य स्थितियों के कारण मेरा भारत जाना गत वर्ष से सम्भव ही नहीं हो पा रहा है। फिलहाल शायद जनवरी 2014 में लोकार्पण पर भी मैं उपस्थित न हो पाऊँ। ... इसका मलाल मन पर हावी है। 


जिन-जिन लेखिकाओं की रचनाएँ इसमें सम्मिलित हैं वे अपनी लेखकीय प्रति लोकार्पण के समय स-सम्मान प्राप्त करना चाहें व लोकार्पण के ऐतिहासिक अवसर पर सम्मिलित होना चाहें तो जनवरी में भारत जाने का कार्यक्रम बनाएँ। तिथियों की सूचना अलग से दूँगी। यदि भाग लेने के / की इच्छुक हैं तो सम्पर्क बनाए रखें
 जो लेखिकाएँ भाग नहीं ले सकेंगी वे भी कृपया सूचित करें ताकि उनकी लेखकीय प्रति भिजवाने की व्यवस्था तब की जा सके। ​


  



मंगलवार, 6 अगस्त 2013

ऐतिहासिक 'चित्रपट' (साप्ताहिक) की दुर्लभ प्रति और मुखपृष्ठ पर 'हरिऔध'

ऐतिहासिक 'चित्रपट' (साप्ताहिक) की दुर्लभ प्रति और मुखपृष्ठ पर हरिऔध : कविता वाचक्नवी


आज एक दुर्लभ वस्तु हाथ लगी है। ' चित्रपट' पत्रिका का वर्ष 1934 नव-वर्षांक (वर्ष दो)। इसके मुखपृष्ठ पर कवि अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की रचना प्रकाशित है। 


यह अंक सम्पादक श्री ऋषभचरण जैन द्वारा समालोचनार्थ भेंट की गई हस्ताक्षरित प्रति है, जो Tübingen विश्वविद्यालय जर्मनी में संरक्षित है। यह अंक लगभग 310 पृष्ठों का है। 

कई रोचक तथ्य इस अंक को देखने से पता चलते हैं, जिनमें से एक यह कि वर्ष 1934 तक भी अपने देश का नाम विधिवत् 'भारतवर्ष' ही लिखा/कहा जाता था। इसे देख कर मुझे सुखदानुभूति हो रही है :) 


मुखपृष्ठ का चित्र देखें -


रविवार, 4 अगस्त 2013

"भाषा, साहित्य और सर्जनात्मकता" : कविता और दिल्ली विश्वविद्यालय

"भाषा, साहित्य और सर्जनात्मकता" में कविता  : कविता वाचक्नवी



आज आधिकारिक रूप से यह सुखद सूचना आप सब से बाँट सकती हूँ कि - 

दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने नए पाठ्यक्रम में 'अनिवार्य हिन्दी' के 'आधार पाठ्यक्रम' की पुस्तक ("भाषा, साहित्य और सर्जनात्मकता") में मेरी कविता "जल" को सम्मिलित किया है। 

पुस्तक गत दिनों 26 जुलाई 2013 को​ जारी हुई ​व इसी सत्र से पढ़ाई जानी प्रारम्भ हुई है। इस सत्र से सभी विद्यार्थी 'अनिवार्य विषय हिन्दी​' की पुस्तक के रूप में इसे पढ़ेंगे। 


- ध्यातव्य है कि ​ वर्ष 2002 में​ एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा उनकी अन्यभाषा/ हिन्दी की पाठ्यपुस्तक में भी कई वर्ष मेरी​ कविता सम्मिलित रही है व केंद्र सरकार द्वारा संचालित देश भर के विद्यालयों में पढ़ाई जाती रही है।

- साथ ही दिल्ली के पब्लिक स्कूलों के पाठ्यक्रम हेतु 'ओरियंट लाँगमैन' ने भी वर्ष 2003 में अपनी 'नवरंग रीडर' में मेरे दोहे सम्मिलित किए थे।

- इसके अतिरिक्त केरल राज्य की 7वीं व 8वीं की द्वितीय भाषा हिन्दी की पाठ्यपुस्तकों में भी वर्ष 2002 में ही ​मेरी बाल कविताएँ सम्मिलित की गई थीं।

- अब देश के शीर्षस्थ विश्वविद्यालय के मुख्य​ पाठ्यक्रम का हिस्सा​ होने का सौभाग्य मिला है, जो अत्यंत विरलों को संभव है। ​

.... तो इस प्रकार अब दिल्ली विश्वविद्यालय ने भी रचनाकार के रूप में प्रसन्न होने का एक बड़ा कारण उपलब्ध करवा दिया है।


यह गौरव अपने माता-पिता, आचार्यों, शुभचिन्तकों, मित्रों व परिवार को समर्पित करती हूँ।


जल 
===

जल, जल है
पर जल का नाम
बदल जाता है।


हिम नग से
झरने
झरनों से नदियाँ
नदियों से सागर
तक चल कर
कितना भी आकाश उड़े
गिरे
बहे
सूखे
पर भेस बदल कर
रूप बदल कर
नाम बदल कर
पानी, पानी ही रहता है।

श्रम का सीकर
दु:ख का आँसू
हँसती आँखों में सपने, जल!


कितने जाल डाल मछुआरे
पानी से जीवन छीनेंगे ?
कितने सूरज लू बरसा कर
नदियों के तन-मन सोखेंगे ?
उन्हें स्वयम् ही
पिघले हिम के
जल-प्लावन में घिरना होगा
फिर-फिर जल के
घाट-घाट पर
ठाठ-बाट तज
तिरना होगा,


महाप्रलय में
एक नाम ही शेष रहेगा
जल …..
जल......
जल ही जल ।

===================================================

यह कविता मेरे काव्यसंकलन “मैं चल तो दूँ” (2005, सुमन प्रकाशन) में संकलित है।

शुक्रवार, 17 मई 2013

लन्दन में कवि अशोक वाजपेयी : मेरे कैमरे से

लन्दन में कवि अशोक वाजपेयी : मेरे कैमरे से  : कविता वाचक्नवी

गत दिनो कवि अशोक वाजपेयी ब्रिटेन आए थे। कैलाश बुधवार जी के आवास पर 3 मई को उनके सम्मान में आयोजित पारिवारिक गोष्ठी में बरसों बाद उनसे भेंट हुई..... । 

पहले सुरम्य बगीचे की धूप में हम सब बाहर बैठे रहे व पश्चात् शीत बढ़ने पर भीतर चले गए। मेज के दूसरी ओर ठीक मेरे सामने अशोक जी बैठे थे और उनके सिर के पीछे चमचमाता सूर्य था अतः चित्र लेने की दृष्टि से 'बैकलाईट' के कारण एकदम असंभव था चित्र लेना। किन्तु कुछ यत्न कर मैंने मोबाईल कैमरा से चित्र लिए भी और वे बहुत ही बढ़िया आए भी। आप भी देखें कि कैसे 'बैक लाईट' के बीच मैंने ये चित्र लिए। 

भीतर जाने के लिए उठने पर अशोक जी से एक आवश्यक बात करने के सिलसिले में (वस्तुत: 11 वर्ष से चले आ रहे एक मुद्दे पर गलतफहमी के सन्दर्भ में ) उनके पास की कुर्सी पर ऐसी बैठी कि तेजेन्द्र जी के लिए 'आरक्षित' वह कुर्सी अंत तक उन्हें न मिल पाई क्योंकि कार्यक्रम के बीच में कुर्सियों की अदल-बदल व्यवधान डालती।

बाहर की गोष्ठी में अशोक जी ने अपने संस्मरण सुनाए और उस बहाने कला क्षेत्र के कई दिग्गजों के जीवन से परिचित करवाया । भीतर वाली गोष्ठी में अशोक जी ने अपने संकलन "कहीं कोई दरवाज़ा" से कई कविताएँ सुनाईं। कैलाश जी के परिवार के उस आत्मीय आतिथ्य का अपना अनूठा रंग रहा। 

अशोक जी को तो यद्यपि उसी समय ये चित्र दिखा दिए थे, बाद में ईमेल भी कर दिए किन्तु नेट और सोशल मीडिया आदि पर लगा पाने का अवसर आज ही मिला है। 












































गुरुवार, 9 मई 2013

कविता का मन

कविता का मन : कविता वाचक्नवी


2-4 महीनों से सुपुत्र के कार्यक्रम लंदन के प्रतिष्ठित स्थलों पर लगभग क्रम से आयोजित होते रहे हैं। यों तो लगभग वर्ष-भर से वह कार्यक्रम देता आ रहा था किन्तु इस मार्च अंत में O2 Academy Islington के कार्यक्रम में मैं भी पहली बार उसके दर्शकों-श्रोताओं में भाग लेने पहुँची क्योंकि उस दिन बेटे की पहली EP का लोकार्पण भी कार्यक्रम से पूर्व होने वाला था जो उसी दिन ( 28 मार्च को)  उसके 'शो' से पूर्व सम्पन्न  हुआ। ... माँ के रूप में ये अत्यन्त गौरवशाली क्षण थे बेटे के सपनों के पहले चरण को साकार होते देखना। तैयार EP का पहला 'सेट' बेटे ने लाकर मेरे ही हाथों में सौंपा था। 

 बाद में उसे प्रस्तुति देते देख, वहाँ पूरा समय उस घड़ी को याद करती रही जब नन्हें-से अपने सुपुत्र को पहली बार मंच पर खड़ा करने के लिए गोद से उतारा था और वह था कि मेरी उंगली ही नहीं छोड़ता था। 

जितना रोमांच एक माँ को उस नन्हें बालक को मंच पर देखा कर हुआ होगा कुछ वैसा ही रोमांच 'मेटल बैंड' के क्षेत्र में अपनी पहचान बना चुके और अपने बैंड के संस्थापक के रूप में बेटे को मंच पर प्रस्तुति देते देखकर हुआ था। 

इस बात का एक सुखद पक्ष और यह भी है कि मेरा यह बेटा अपने बैंड व अपनी EP आदि के सब गीत स्वयं लिखता है, यह बात मुझे अधिक आह्लादित करती है।

इन चले आ रहे कार्यक्रमों के क्रम में बेटे का एक भव्य कार्यक्रम Nambucca London में गत माह आयोजित हुआ था। उसका एक अंश यहाँ देखा जा सकता है -

अधिक जानकारी व उसके शेष वीडियोज़ (जो अब तक 24 हैं) के लिए यहाँ देखा जा सकता है - 








शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

ऐसे प्राण दिए जाते हैं .....

ऐसे प्राण दिए जाते हैं .....   :  कविता वाचक्नवी

खोजी पत्रकारिता में निडर होकर रिपोर्ट कैसे बनाई जाती है इसका उदाहरण देने के लिए बेघर लोगों के जीवन पर फिल्म बनाने के उद्देश्य से काम करते हुए 27 वर्ष के युवक ने अपने प्राण दे दिए।

  हाड़ कम्पाती सर्दी में बेघर लोगों का जीवन कितना त्रासद, दूभर व यातना-भरा होता है, इस पर एक डॉक्यूमेंटरी बनाने के उद्देश्य से  Lee Halpin ने सात दिन तक पूरी तरह उन्हीं का जीवन जीने का निर्णय किया और रविवार से 'न्यू कैसल' (ब्रिटेन का एक नगर)  में उन्हीं की परिस्थितियों में बिना किसी सुविधा के रहना, खाना व सोना शुरू कर दिया।

 इस कार्य में लगने से पूर्व उसने रविवार को एक वीडियो बनाया और उसमें कहा कि सात दिन तक वह समाज के बेघरबार लोगों वाला जीवन जी कर उन वर्ग के अधिकाधिक लोगों तक पहुँचना चाहता है । उसका मानना था कि उसकी यह डॉक्यूमेंटरी समाज के हृदय तक पहुँचने के उसके उद्देश्य को साकार कर सकेगी।

बेघर व निर्धन लोगों की यातना व जीवन के प्रति समाज में जागृति लाने के लिए शुरू किए गए अपने अभियान में उसने अपना जीवन दे दिया। निर्धन व बेघर लोगों की यातनाओं को समझने के लिए उनके जीवन को स्वयं जी कर देखने की भावना से प्रेरित होकर किए गए इस कार्य में  अपने जीवन की आहुति दे देने वाले इस युवक के लिए मन पीड़ा व आदर से भर उठा है। बताया जा रहा है कि इस भयंकर शीत व हिमपात में खुले में सोने के कारण उसे Hypothermia ने जकड़ लिया और उसके प्राण ले लिए।

भारतीय पत्रकारिता में पूरी तरह पसर गई व्यावसायिकता, क्रूरता, स्वार्थ व मूल्यहीनता के इस काल में ऐसे समाचार मुझ जैसे व्यक्ति को रुला रुला जाते हैं।

रविवार 31 मार्च को बनाए अपने वीडियो में इस डॉक्यूमेंटरी योजना की जानकारी देने वाले  Lee Halpin के वीडियो को यहाँ देखा जा सकता है -




मंगलवार, 26 मार्च 2013

भारतीय उच्चायोग, लन्दन द्वारा “सम्मान-समारोह" संपन्न

भारतीय उच्चायोग, लन्दन द्वारा “सम्मान-समारोह" संपन्नडॉ.कविता वाचक्नवी को ‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान’ प्रदत्त

लन्दन स्थित भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान प्राप्त करते हुए डॉ. कविता वाचक्नवी.

ब्रिटेन के विभिन्न नगरों से आए लेखक, पत्रकार तथा कला एवं साहित्य क्षेत्र के प्रतिष्ठित अतिथिगण. 


डॉ. कविता वाचक्नवी को प्रदत्त स्मृतिचिह्न और प्रशस्तिपत्र

 डॉ. कविता वाचक्नवी को  स्मृतिचिह्न भेंट करते हुए भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती. 

 “जॉन गिलक्रिस्ट हिन्दी शिक्षण सम्मान” प्राप्त करते हुए प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा

डॉ. कविता वाचक्नवी को प्रदत्त प्रशस्ति-पत्र

भारतीय उच्चायोग, लंदन द्वारा
“ सम्मान-समारोह"
सम्पन्न 
24 मार्च 2013

भारतीय जीवन मूल्यों के वैश्विक प्रचार-प्रसार की संस्था “विश्वम्भरा” की संस्थापक-महासचिव डॉ.कविता वाचक्नवी को विश्व हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में भारतीय उच्चायोग, लंदन द्वारा इण्डिया हाउस में आयोजित समारोह में “आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान” किया गया। इस अवसर पर भारत के उच्चायुक्त महामहिम डा. जे॰ भगवती ने उन्हें नकद राशि, स्मृति चिह्न, शॉल और प्रशस्ति पत्र प्रदान किए। उन्हें यह सम्मान मुख्यतः इन्टरनेट व प्रिंट मीडिया द्वारा भाषा, साहित्य, संस्कृति व पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया गया है.


उल्लेखनीय है कि अमृतसर में जन्मीं कविता वाचक्नवी समाज-भाषा-विज्ञान तथा काव्यसमीक्षा जैसे विषयों में 'दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद' से एमफिल और पीएचडी अर्जित करने के बाद सपरिवार लन्दन में रह रही हैं. भारतीय उच्चायोग द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि "आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान" ग्रहण करते हुए डॉ कविता वाचक्नवी ने अपने दादाश्री व पिताश्री का विशेष उल्लेख किया व लाहौर से हिमाचल और पंजाब तक उनके किए कार्यों व बलिदानों को उपस्थितों के साथ बाँटते हुए बताया कि कैसे हिन्दी सत्याग्रह में जेल में रहने से लेकर हिमाचल को हिन्दीभाषी राज्य का दर्जा दिलाने तक के लिए उनके परिवार ने कष्ट सहे। वाचक्नवी ने अपना सम्मान उन्हीं को समर्पित करते हुए कहा कि वे यह सम्मान उनके प्रतिनिधि के रूप में ग्रहण कर रही हैं। उन्होंने राजदूत व उच्चायोग से अनुरोध किया कि ब्रिटेन में भारतीय उच्चायोग की वेबसाईट को द्विभाषी बनाया जाना चाहिए व उसे अंग्रेजी के साथ साथ हिन्दी में भी उपलब्ध होना चाहिए।


विज्ञप्ति के अनुसार इस समारोह में दो अन्य विशिष्ट हिंदी सेवियों तथा एक हिंदी संस्था को भी सम्मान प्रदान किए गए. “जॉन गिलक्रिस्ट हिन्दी शिक्षण सम्मान” से यॉर्क विश्वविद्यालय के विख्यात भाषाविद प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा को तथा “डा॰ हरिवंश राय बच्चन हिन्दी साहित्य सम्मान” से बर्मिंघम के हिंदी लेखक डॉ॰ कृष्ण कुमार को सम्मानित किया गया जबकि नाटिङ्घम की संस्था “काव्य रंग” को “फ़्रेडरिक पिनकोट हिन्दी प्रचार सम्मान” प्रदान किया गया.


इस अवसर पर सम्मानितों को बधाई देते हुए सभा को संबोधित अपना वक्तव्य हिन्दी में देते हुए उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती ने कहा कि वे स्वयं असमिया भाषी होते हुए दिल्ली में रहने के कारण हिन्दी में व्यवहार करते रहे हैं व उनकी शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी रही है। उन्होने ज़ोर देकर कहा कि निजी रूप से वे त्रिभाषा नीति को भारत के लिए श्रेयस्कर समझते हैं। विश्व पटल पर भारत से बाहर के लोगों के लिए अंग्रेजी, समस्त भारतीय कार्यकलापों के लिए हिन्दी व अपनी मातृभाषा अथवा एक प्रांतीय भाषा प्रत्येक भारतीय को अवश्य सीखनी पढ़नी चाहिए। 


“जॉन गिलक्रिस्ट यू.के.हिन्दी शिक्षण सम्मान” स्वीकार करते हुए प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा ने अपने वक्तव्य में यॉर्क विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम हिन्दी अध्यापन प्रारम्भ होने सम्बन्धी अपने संस्मरण सुनाए और यूके में हिन्दी अध्यापन से जुड़ी स्थितियों का उल्लेख करते हुए 35 वर्ष के अध्यापन का उल्लेख किया। इसी प्रकार "डॉ. हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य सम्मान" ग्रहण करते हुए डॉ. कृष्ण कुमार ने भारत में संस्कृत, हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए भावपूर्ण अपील करते हुए चेतावनी दी कि ऐसा नहीं करने पर आने वाले दिनों में भारत को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।


समारोह में “डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी प्रकाशन अनुदान योजना” के अंतर्गत श्रीमती उषा वर्मा को उनकी पुस्तक 'सिम कार्ड तथा अन्य कहानियाँ’ और डा॰ कृष्ण कन्हैया को उनके काव्य संग्रह 'किताब जिंदगी की’ के प्रकाशन हेतु नकद राशि और मानपत्र दिया गया।


लंदन स्थित इंडिया हाउस में हुए इस पुरस्कार समारोह में उप उच्चायुक्त डॉ. वीरेंद्र पाल और उच्चायोग में मंत्री (समन्वय) एसएस सिद्धू भी उपस्थित थे। सिद्धू जी ने अपना स्वागत वक्तव्य हिन्दी में दिया व धन्यवाद वक्तव्य भी डॉ वीरेंद्र पॉल द्वारा हिन्दी में ही दिया गया। कार्यक्रम का संचालन उच्चायोग के हिन्दी व संस्कृति अताशे श्री बिनोद कुमार ने सफलतापूर्वक किया। ब्रिटेन के विभिन्न नगरों से आए लेखक, पत्रकार तथा कला एवं साहित्य क्षेत्र के भारतीय मूल के लोग बड़ी संख्या में समारोह में उपस्थित थे ।


चित्र परिचय –
  • 1. लन्दन स्थित भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान प्राप्त करते हुए डॉ. कविता वाचक्नवी.
  • 2. ब्रिटेन के विभिन्न नगरों से आए लेखक, पत्रकार तथा कला एवं साहित्य क्षेत्र के प्रतिष्ठित अतिथिगण.
  • 3. डॉ. कविता वाचक्नवी को प्रशस्तिपत्र और स्मृतिचिह्न भेंट करते हुए भारतीय उच्चायुक्त डॉ जैमिनी भगवती.
  • 4. “जॉन गिलक्रिस्ट हिन्दी शिक्षण सम्मान” प्राप्त करते हुए प्रो. महेंद्र किशोर वर्मा.


[प्रेषक – डॉ. ऋषभदेव शर्मा (संवीक्षक – ‘विश्वम्भरा’), प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, खैरताबाद, हैदराबाद-500004; मोबाइल – 08121435033]  

सोमवार, 14 जनवरी 2013

साहित्यिक पत्रिका 'वागर्थ' का दिसंबर अंक व मेरी 3 कविताएँ

साहित्यिक पत्रिका 'वागर्थ' का दिसंबर अंक व मेरी 3 कविताएँ  :  कविता वाचक्नवी



'भारतीय भाषा परिषद'  कोलकाता की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'वागर्थ' के  दिसंबर 2012  अंक में मेरी तीन कविताएँ क्रमशः 'राख' , 'व्रतबंध'  व 'औरतें डरती हैं'   प्रकाशित हुई हैं। पत्रिका परिवार व संपादक के प्रति कृतज्ञ हूँ।

 इस बीच जिन अनेकानेक लोगों ने ईमेल से व भारत से यहाँ फोन करके कविताओं पर अपनी-अपनी शुभकामनाएँ व प्रतिक्रियाएँ दी हैं, उन सब के प्रति हृदय से कृतज्ञ हूँ। 

यद्यपि 'व्रतबंध' शीर्षक कविता के अंत में कुछ शब्द बदल दिए गए हैं । इस त्रुटि के चलते कविता का सांस्कृतिक अर्थ व रूपक छिन्न-भिन्न हो गया है। इस कविता की मूल पंक्तियाँ हैं - 


मैं आँखें टिका

दो आँसुओं से
हस्त-प्रक्षालन करवा दूँ।

(कृपया उक्त कविता की पंक्तियों को इसी रूप में पढ़ें) 

पत्रिका के ध्यान में लाने पर अब वे 'वागर्थ'  के आगामी अंक (फरवरी) में इस त्रुटि पर पाठकों का ध्यान दिलाएँगे, ऐसी सूचना मिली है। अस्तु !

 नीचे उक्त अंक के वे पन्ने सम्हाल सहेज रही हूँ । पन्नों पर क्लिक कर बड़े आकार में पढ़ा जा सकता है। 











अपडेट फरवरी 2013

मूल कविता के एक शब्द को बदल कर प्रकाशित किए जाने पर आपत्ति करते हुए  'वागर्थ' को भेजा पत्र उनके अंक फरवरी 2013 में प्रकाशित हुआ -




सोमवार, 24 दिसंबर 2012

स्त्री, यौन-हिंसा व समाज : कविता वाचक्नवी

स्त्री, यौन-हिंसा व समाज  : कविता वाचक्नवी  







बलात्कारों के विरुद्ध इतने हंगामे और विरोध के बीच भी गत सप्ताह-भर में कितने बलात्कार भारत में हुए हैं, इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि प्रति २० मिनट पर एक स्त्री बलात्कार की शिकार होती है भारत में. यह केवल दर्ज अपराधों का आंकड़ा है. अतः वास्तव में यह दर क्या होगी, इसकी कल्पना से रोंगटे खड़े हो जाएँगे ३, ५ व ८ वर्ष की बच्ची से तो आगामी दिन ही बलात्कार की सूचना समाचारपत्रों में थी. 


इसी बीच इम्फाल में १८ दिसंबर को ही एक २२ वर्ष की अभिनेत्री व मॉडल Momoko को भरी भीड़ में से खींच कर उसके साथ यौनिक व्यभिचार के लिए ले जाया गया . इसके विरुद्ध सड़कों पर विरोध के लिए उतरी भीड़ पर पुलिस द्वारा चलाई गयी गोली से दूरदर्शन के एक पत्रकार मारे गए हैं.


इस बार की दिल्ली की यह दुर्घटना छोड़ दें तो इस से पूर्व जब-जब भी महिलाओं के पक्ष में कुछ लिखा तब -तब लोग (अधिकाँश पुरुष बिरादरी ) ताबड़तोड़ विरोध, धमकियाँ, अश्लील टिप्पणियाँ, गाली गलौज करने के लिए जुट जाते रहे हैं. यह हाल आम भारतीय का नहीं बल्कि बहुधा राजनेता, नामचीन लोग, और साहित्य के पहरुए तक महिलाओं के प्रति इतनी अश्लील भाषा, अश्लील व्यवहार, अश्लील लेखन, अश्लील मानसिकता व अश्लील दृष्टि के शिकार हैं कि घिन व शर्म आती है. 'फेसबुक' पर ही मेरे द्वारा गोहाटी वाली घटना का विरोध करने पर 'हेमंत शेष' की आपत्ति व अश्लीलता वाला प्रकरण भी अभी ताजा ही है. दूसरे अनेक ख्यातनामों के किस्से भी साहित्य के लोग जानते ही हैं कि अमुक अमुक की स्त्री के प्रति दृष्टि कैसी है, बातें कैसी व व्यवहार कैसा है. 


स्त्री घर में हो, बाजार में हो, कार्यालय में हो, विद्यालय / कॉलेज में हो, बस / गाड़ी में हो, दिन में हो, रात में हो, ब्याही हो, अनब्याही हो, अकेली हो, दुकेली हो ..... प्रत्येक स्थान, प्रत्येक स्थिति व प्रत्येक अवसर /अवस्था में उसके साथ हर आयु वर्ग का पुरुष छेड़ छाड़ से लेकर अश्लील हरकत तक करने में स्वतन्त्र होता है और स्त्री यह सब देखती - झेलती है. ऐसे लोग अपनी क्लीवता, तुच्छताओं, कुंठाओं व दुर्बलताओं के कारण स्त्री को मनुष्य तक होने का अधिकार न देकर घृणित कार्य करते हैं या उस पर शासन करने की हिंसक प्रवृत्ति के शिकार हैं। ऐसे लोग मानव सभ्यता पर कलंक हैं....


फिलहाल दिल्ली के इस बलात्कार व उसके विरोध में उठ खड़े हुए जनसमूह के शोर से आक्रान्त होकर भले ही कुछ लोग अभी देखादेखी या सामाजिकता व दिखावे के लिए स्त्री व उसकी अस्मिता की पक्षधरता में बयान दे रहे हों या स्वयं को शालीन सिद्ध करते हुए स्त्रीपक्षीय छवि गढ़ने में लगे हों...... किन्तु सत्य यही है कि अधिकाँश पुरुषवर्ग स्त्री को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता व उसे 'मनोरंजन व दैनिक उपयोग की वस्तु' के रूप में ही स्वीकार करता है. जब तक समाज के एक एक व्यक्ति का यह कुसंस्कार नहीं दूर होता तब तक स्त्री की दशा भारतीय व दक्षिण एशियाई समाज में कदापि सुधरने वाली नहीं है. सड़कों पर उतरा जनसमूह स्त्री के प्रति मर्यादा का एजेंडा लेकर उसकी पक्षधरता में वस्तुतः नहीं है, अपितु यह विरोध व आन्दोलन भारतीय जनता में भरे जनाक्रोश की अभिव्यक्ति अधिक है. इस जनाक्रोश को सही दिशा देने की आवश्यकता कुछ इस तरह है कि दंड का प्रावधान भी किया जाए और दूसरी और समाज के जन जन को स्त्री के प्रति नैतिक, पारिवारिक, मानवीय, सामाजिक उत्तरदायित्वों की दैनंदिन जीवन में आवश्यकता समझ में आए . अन्यथा स्त्री के विरुद्ध अपराधों का क्रम अपनी जड़ों से सुधरता नहीं दीखता. आमूलचूल परिवर्तन के लिए स्त्री के प्रति एक एक व्यक्ति का रवैया बदलना आवश्यक है. जबतक स्त्री घर परिवार में सही मान सम्मान की अधिकारिणी नहीं बन जाती तब तक समाज व खुले में उसके लिए मान सम्मान की  कल्पना वृथा है और अधूरी व दिखावटी रहेगी। 




Related Posts with Thumbnails

फ़ॉलोअर