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शनिवार, 1 मार्च 2014

राष्ट्रीय साहित्य अकादमी के बहुभाषी कवि सम्मेलन की एक पुरानी कतरन



Report of Sahitya Akademi's Multilingual Poets Meet / Times Of India (26 Jan. 2008

केंद्रीय 'साहित्य अकादमी' द्वारा 'सेंट्रल यूनिवर्सिटी, हैदराबाद'  में आयोजित बहुभाषी कवि सम्मेलन में हिन्दी कविता का प्रतिनिधित्व तीन लोगों ने किया था - स्व. वेणुगोपाल (नन्दकिशोर शर्मा), ऋषभ देव शर्मा व स्वयं मैं। 

उस अवसर की एक 6 वर्ष से अधिक पुरानी कतरन। चित्र पर क्लिक कर व फिर लेंस को + कर इसे स्पष्ट पढ़ा जा सकता है। 

अथवा टाईम्स ऑफ इंडिया की साईट के इस लिंक पर पढ़ सकते हैं - 



सोमवार, 9 सितंबर 2013

ब्रिटेन में आय / कमाई के औसत आंकड़े

ब्रिटेन में आय / कमाई के औसत आंकड़े (गत वर्ष के आकलन के आधार पर) -
स्रोत - याहू से प्राप्त आंकड़ों का अनुवाद  (By कविता वाचक्नवी) 

(कुछ समय से ब्रिटेन के अर्थतन्त्र ( अर्थव्यवस्था)  पर एक लेख लिख रही हूँ, ये आंकड़ें व तथ्य उसी लेख का एक हिस्सा हैं) 


नल आदि ठीक करने वाले (प्लम्बर) की -  न्यूनतम  £27,866   -  अधिकतम  £50,000

बस ड्राईवर - £22,701 (वार्षिक)

ट्राम व ट्रेन ड्राईवर - £44,617 (वार्षिक)

सेक्रेटरी आदि  - £20,474 and £18,866 (मेडिकल व लीगल वालों की इससे अपवाद हैं, जबकि व्यक्तिगत पीए £24,067 तक भी कमा पाते हैं)।(वार्षिक)

बहुराष्ट्रीय कंपनियों में सेक्रेटरी  -  £50,000 (वार्षिक)

सामान्यतः प्रकाशित होने वाला लेखक - £5,000 (J. K. Rowling जैसे लेखक इसके एकमात्र ढंग के अपवाद हैं जो £560 मिलियन तक कमा लेते हैं) (वार्षिक)

दिन में चौदह घंटे काम करने वाले टीवी के कलाकार -  £30,500 (एक पूरी शृंखला के लिए)

 टीवी कार्यक्रमों में सिलेब्रिटी जज आदि £110,000 से £550,000 (त्रैमासिक) व कुछ अति विशिष्ट सिलेब्रिटी £850,000 (पूरी सीरीज़)

प्रधानमंत्री - £142,500 (वार्षिक)

काऊन्सिल के 2,525 कर्मचारी - £100,000 से अधिक (वार्षिक)

42 स्थानीय संकाय-कर्मचारी -£250,000  से अधिक (वार्षिक)

राष्ट्रीय स्वास्थ्य परियोजना (NHS) के लगभग 8,000 कर्मचारियों को गत वर्ष (डॉक्टर स्तर) £340,000 वार्षिक (प्रति व्यक्ति) का भुगतान हुआ

वार्ड नर्स - £21,000 (वार्षिक)

गॉर्डन ब्राऊन ने अपने संसदीय दायित्वों से इतर कार्यों (भाषणों व लेखन) द्वारा £1.37m कमाए (गत वर्ष)

पद निवृत्ति के पश्चात् टोनी ब्लेयर ने निजी व्यापारिक रुचियों आदि से £20 मिलियन कमाए (गत वर्ष)

स्रोत - याहू से प्राप्त आंकड़ों का अनुवाद  (By कविता वाचक्नवी) 

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

हमदर्द की हिन्दी

 हमदर्द की हिन्दी  :  कविता वाचक्नवी





अपनी भाषा के प्रति हमदर्दी दिखाने के नाम पर दूसरी भाषाओं का मखौल उड़ाना अत्यंत हास्यास्पद और लज्जाजनक काम है। हिन्दी के दिखावटी हमदर्दों में यह प्रवृत्ति बहुत आम है कि वे हिन्दी को श्रेष्ठ दिखाने के लिए अंग्रेजी का मखौल उड़ाते हैं। अंग्रेजी की शक्ति को कम करके आँकने से हिन्दी की श्रेष्ठता सिद्ध नहीं होती अपितु उल्टे इस से हम हिन्दी वाले और मूर्ख ही प्रमाणित होते हैं। 


आज ऐसी ही एक और घटना देखी जब एक व्यक्ति ने प्रश्न उछला - "अगर शुभ रात्रि "GOOD NIGHT" होता है तो शुभ दीपावली "GOOD DEEPAWALI" क्यों नहीं ? या अगर शुभ दीपावली "HAPPY DEEPAWALI" होता है तो शुभ रात्रि "HAPPY NIGHT" क्यों नहीं ?"


उस पर उत्तर देने वालों ने लिखा - (1) "Because ...English is a very Funnnny language :)" और किसी ने लिखा "Kyunki Engligh Koi language nhi hai....jabardasti hi language haii"


यदि किसी भाषा के दो अलग अलग शब्दों का अनुवाद कोई अन्य भाषा अपने एक ही शब्द से करती है तो यह अनुवाद करने वाले की गलती है। Good और Happy दो अलग-अलग शब्दों को यदि दूसरी भाषा वाले एक ही अर्थ दे रहे हैं तो यह मूल भाषा की गलती कैसे हो गई, यह या तो अनुवादकों की गलती है या उनकी सुविधा। 


हिन्दी के दो अलग अलग शब्दों को अंग्रेजी के किसी एक ही शब्द से अनूदित कर दिया जाए तो आपको कैसा लगेगा ? यह हमारी समस्या या सुविधा है कि हम Haapy, Merry और Good तीनों के लिए 'शुभ' ही अर्थ लगा रहे हैं। .... और मजे की बात यह कि लोग हिन्दी से हमदर्दी दिखाने के नाम पर अंग्रेजी का मखौल उड़ा रहे हैं। 


काश, इन्होंने संस्कृत पढ़ी होती तो भाषा के विकल्पों की जानकारी होती और अंग्रेजी के तीन अलग-अलग शब्दों के लिए कुछ अन्य पर्याय प्रयोग करना कम से कम जानते तो, और संस्कृत पढ़ी होती तो हिन्दी की शब्दावली में पर्यायों का अभाव है जैसा हिन्दी का मखौल भी न बनाते। फिर उसे जानने के बाद तो अंग्रेजी का यह मखौल बनाने का आधार ही समाप्त हो जाता। अस्तु ! 


कोई भी समझदार व्यक्ति अपनी भाषा की श्रेष्ठता दिखाने के लिए दूसरी भाषा का मखौल कभी नहीं उड़ाता। अंग्रेजी यदि हिन्दी की तुलना में कमतर है तो उसके पक्ष में यह बात हिन्दी वालों को नीचा दिखाने के लिए पर्याप्त है कि एक कमतर भाषा होने के बावजूद संसार के सारे अधुनातन ज्ञान-विज्ञान को वे अपनी भाषा में ले आए हैं, यह उस भाषा की शक्ति भी है कि वह उस सारे को अभिव्यक्त करने में समर्थ है। दूसरी ओर हम लोग आज तक अपने यहाँ के उच्चशिक्षा के पाठ्यक्रमों में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों तक को हिन्दी में नहीं ला सके हैं। कोई भी समझदार व्यक्ति दूसरी भाषाओं का बहिष्कार नहीं करता क्योंकि स्वयं में कोई भी भाषा निकृष्ट या हास्यास्पद नहीं होती है वह एक बड़े भाषासमाज के सम्प्रेषण का सशक्त माध्यम होती है। फिर किसी बड़े भाषासमाज की भाषा का मखौल उड़ाना तो वस्तुतः अपनी मूर्खता या उथलापन प्रमाणित करना होता है। 


आम तौर पर दिनों दिन अधिसंख्य लोगों के वैचारिक 'बरियर' और वैचारिकता के अभाव पर चकित रह जाना पड़ता है, इतना अधिक दिवालियापन है। इसका कारण उनकी जल्दबाज़ी नहीं लगता और न ही बोलने से पहले सोचना नहीं, अपितु सोचने की क्षमता और संस्कार कम होता जा रहा है, क्योंकि बहुसंख्य समाज अब पढ़ता नहीं। स्वाध्याय बहुत आवश्यक होता है। पाती हूँ कि ऐसे लोग बड़े बड़े पदों पर हैं और ऐसी मूर्खता के साथ। तिस पर ये पद उनके अहंकार में और वृद्धि करते हैं । एक तो अज्ञान के कारण थोथा अहंकार और ऊपर से पद का अहंकार। 


लोगों की दूसरी भाषाओं का अपमान करने की ऐसी मूर्खताओं के चलते ही भारत में हिन्दी के विरुद्ध वातावरण निर्मित होने में बड़ी भूमिका बनी। ऐसे लोग अंग्रेजी ही नहीं अपितु दक्षिण भारतीय भाषाओं या उत्तरपूर्व की भाषाओं का भी ऐसा ही अपमान करते चले आए हैं। जिसका परिणाम है कि भाषा के नाम पर देश बुरी तरह बंट चुका है और दूसरी भाषाओं के लोग भी इस कारण हिन्दी के विरोधी होते चले गए हैं। 

किसी ने सच ही कहा है कि "जो दूसरे की माँ का सम्‍मान नहीं कर सकता, वह अपनी माँ का सम्‍मान स्‍वयं ही नष्‍ट कर देता है..." 


हिन्दी से हमदर्दी दिखाने के दूसरे भी कई तरीके हैं, कई काम हैं। वैसे हिन्दी को ऐसी हास्यास्पद हमदर्दी की जरूरत भी नहीं है।


मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012

प्रचलित तत्सम / तद्भव शब्द और उनके भाषांतर पर्याय

प्रचलित तत्सम / तद्भव शब्द और उनके भाषांतर पर्याय
               - (डॉ.) कविता वाचक्नवी
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संस्कृत के 'संस्कार' के लिए अंग्रेज़ी पर्याय खोजने वालों को बहुधा समस्या आती है क्योंकि संबन्धित कोषों में इसका एक ही अर्थ Rite (जैसे अंतिम संस्कार/ Last rites) बताया जाता है, जबकि इसके अनेक निहितार्थ होते हैं। 

केवल 'संस्कार' ही नहीं अपितु 'धर्म' के लिए भी किसी भाषा में कोई शब्द नहीं है, 'रिलिजन' तो 'सम्प्रदाय' अथवा 'पंथ' का वाचक है; इसी प्रकार `निर्वाण' शब्द के लिए भी कोई समानार्थी शब्द, असंभव है कि कहीं मिले। क्योंकि निर्वाण की संकल्पना केवल भारतीय दर्शन में उपलब्ध है। 

वस्तुत: दर्शन (+ जीवनदर्शन ) की शब्दावली के लिए यह समस्या बनी रहेगी कि उसके लिए अधूरे विकल्पों में से ही किसी का चुनाव मन मार कर करना पड़ेगा। 

जिन भाषासमाजों में जिस जीवनदर्शन की परम्परा है, उन भाषासमाजों में ही तो वे शब्द मिलेंगे ना! 

यही स्थिति रिश्ते नाते के शब्दों की भी है कि साढ़ू, समधिन, चचिया सास, पतोहू, चचेरा, ममेरा, फुफेरा, सलहज जैसे ढेरों संबंध वाचक शब्दों के लिए सही, सटीक व निश्चित शब्द भारतीय भाषाओं से इतर भाषा-समाजों में नहीं है; जहाँ भाभी भी 'सिस्टर इन लॉ ' है, तो साली भी, सलहज भी, ननद भी, जेठानी भी और देवरानी भी। 

अतः इनके लिए भी सही शब्द बस ढूँढते रह जाएँगे वाली बात है । 


इसीलिए भारतीय रचनाओं के अनुवाद करते समय, यहाँ तक कि गद्य का अनुवाद करते समय भी, हमारी जीवन व दर्शन की शब्दावली का सही सही अनुवाद नहीं हो पाता है। ऐसे में अनुवादक पाद-टिप्पणियों के द्वारा संबन्धित संकल्पना को कितना व कैसे समझा पाता है, यह उसकी निजी क्षमता पर निर्भर है। किन्तु इसके अभाव में सांस्कृतिक शैली की रचनाओं की हत्या अनुवाद में बहुधा हो ही जाती है। 


इसका एक पक्ष संस्कृत से भी जुड़ा है। खेद है कि देश के नहीं अपितु समूची मानव जाति के अहित में है / हुआ, कि भारत में संस्कृत को वर्गविशेष की भाषा के रूप में कर्मकाण्ड तक सीमित मान लिया गया और अब ऐसा ही षड्यंत्र हिन्दी के साथ स्वयं कुछ हिन्दी वाले भी करने में लगे हैं ( कि हिन्दी हिन्दुओं कि व उर्दू मुस्लिमों की भाषा है) | इसके कितने घातक परिणाम होंगे, इसका उन्हें अनुमान भी नहीं। विश्व के अन्य देशों के भाषाविदों या विद्यार्थियों द्वारा जिस प्रकार संस्कृत को भाषाओं की मूल मान कर अध्ययन किया जाता है उसी प्रकार भारत में भी सभी पूर्वाग्रहों से हट कर संस्कृत का अध्ययन किया जाना अनिवार्य है। दुर्भाग्य है कि भारत के अधिकाँश आधुनिक भाषाविज्ञानी संस्कृत के अध्ययन से कोरे होते हैं। प्रसंगवश बता दूँ कि पाणिनी पर अब तक विश्व में जितने कार्य हुए हैं उनकी परिगणना मात्र करने वाला एक सर्वेक्षण जर्मनी के एक भाषाचेता ने किया है, जो कई वॉल्यूम में छपा ( यद्यपि उसमें केवल लिस्टिंग की गई है)| दुर्भाग्य यह कि केवल दो भारतीय प्रखर विद्वान उस में अपनी महता प्रमाणित कर विशेषष रूप में उल्लिखित हैं, वे हैं श्रद्धेय ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी ( जो लाहौर में रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा संचालित एक मात्र आर्ष गुरुकुल के आद्य आचार्य व संस्थापक थे व पश्चात् मोतीझील बनारस आ गए थे; दूसरे उल्लिखित विद्वान हैं महामहोपाध्याय स्वर्गीय पं. युधिष्ठिर जी मीमांसक। 


मात्र इन दो प्रकांड विद्वानों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि इनके जितना गंभीर काम करने वालों में शेष सभी भाषावेत्ता विदेशी मूल के हैं, बहुधा फ्रांस व जर्मनी के। है ना आश्चर्य की बात ! यह संस्कृत और संस्कृत के भाषाविज्ञानी पाणिनी का महत्व प्रतिपादित करता है; जिसे अपने देश में ही सही महत्व नहीं मिला,जो मिलना चाहिए। इसलिए यदि कोई इस पूर्वाग्रह के कारण संस्कृत से पल्ला झाड़ता है कि वह केवल पंडितों या कर्मकाण्ड की भाषा है तो यह उस भाषा का नहीं अपितु स्वयं ऐसा करने वालों का दुर्भाग्य है। 

.... और उस भाषा का ही नहीं अपितु व्यापक अर्थ में यह हिंदी का भी दुर्भाग्य ही है; मात्र भाषा के रूप में नहीं अपितु हिंदी के साहित्य का भी दुर्भाग्य। क्योंकि आप हम भारतीय भाषाओं के साहित्य से सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को वर्जित या अलग नहीं कर सकते। उस पृष्ठभूमि के चलते उसके अनुवाद की ऐसी समस्याएँ सदा बनी रहेंगी। साहित्यानुवादकों का मात्र लक्ष्यभाषा में अधिकार होने ही से काम नहीं चलता अपितु स्रोतभाषा और उसकी पृष्ठभूमि पर उनकी बहुत अच्छी पकड़ होना अनिवार्य होता है। उसके अभाव में किस बूते हम भारतीय भाषाओं के सही व सटीक साहित्यिक अनुवाद की कल्पना कर सकते हैं ? 


अनध्ययन और अभाव के चलते होने वाली हानियों का यह मात्र एक ही पक्ष है। भाषा के सरलीकरण का कुतर्क भी इसी के साथ जुड़ा है। 

उन सब पर फिर कभी....

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

संस्कृत : छंदविज्ञान, सैद्धांतिकी, काव्यशास्त्र और कबीर

संस्कृत : छन्दविज्ञान, सैद्धान्तिकी और कबीर  :  कविता वाचक्नवी


बहुत बचपन में ही पूरा छन्दशास्त्र पढ़ डालने के अनगिन लाभों की याद बरबस ही बनी रहती है। आज वह सैद्धान्तिकी तो भले याद नहीं, किन्तु कविता रचते समय उस सैद्धान्तिकी का नियमन हर समय कलम की नोक को साधता आ रहा है। 


बचपन के उन दिनों में गुरुजी से निरुक्त पढ़ना कभी-कभी बड़ा कष्टसाध्य और कभी बड़ा रोचक लगा करता था। हजारों प्रसङ्ग आज भी मन में करवट लिया करते हैं और किसी रुष्क विषय को कैसे सरस बनाया जा सकता है, यह स्मरण दिलाए रखते हैं। 


परन्तु उसके पश्चात् जैसे ही लौकिक संस्कृत का छन्दशास्त्र पढ़ने लगे तो अलग प्रकार का आनन्द आने लगा। पूरे छन्दविज्ञान की आधार गणना को एक श्लोक में पढ़ लेने के बाद छन्दशास्त्र हस्तामलकवत् लगने लगा था। वह श्लोक आज भी कण्ठस्थ है जिसने सारी गणना साधना सिखा दिया था - 

मस्त्रिगुरुस्त्रिलघुश्च नकारो ।
भादिगुरुः पुनरादिलघुर्यः ।
जो गुरुमध्यगतो रलमध्यः
सोऽन्तगुरुः कथितोऽन्तलघुस्तः ॥

गत दिनों एक पाठक / सज्जन ने भाषा के प्रसङ्ग में  एक आपत्ति व तर्क दिया और कहने लगे कि "जो भाषा आम आदमी की समझ में आ सके, उसी में अभिव्यक्ति हो तो मन को सुन्दर लगता है,और बरसों से अब रचनाकार, इसी सरलता की तरफ चल पड़े है। पक्का तो पता नही , लेकिन अमीर खुसरों और तुलसीदास जी आदि ने सरल, आम आदमी की ही भाषा को अपनाया और जनता में प्रसिद्ध भी हुये। कालिदास, भास  आदि कवि महान तो अवश्य है, मगर स्कूल--- कोलिज और पुस्तकालय तक सीमित हैं' । "


अब उन्हें कौन समझाए कि जो जिसे समझता है या समझने के लिए कुछ यत्न करता है, वही उसे समझने लगता है। बिना पढ़े और समझे तो लोगों को अब तुलसी और रसखान तक समझ नहीं आते। कल को वे इसी तर्क से ही उन्हें भी 'आऊटडेटेड' करार दे देंगे और उन्हें भी स्कूल, कॉलेज और पुस्तकालय तक सीमित रह जाने वाले घोषित कर देंगे, तब क्या कीजिएगा? किस-किस को तज कर 'अपडेटेड' और 'अप टू डेट' बनेंगे हम ? सरलता के नाम पर तो सब से सरल कुछ भी न जानना है, तो फिर सारा ज्ञान-विज्ञान भी क्यों पढ़ना उसे पढ़ना कोई सरल है क्या ? लोगों को अब हिन्दी भी अंग्रेजी मिलाकर बोली जाने पर समझ आती है। तब तो हिन्दी भी ठण्डे बस्ते में डाल दी जाए। दया यह करें कि हम जैसे कुछ लोगों को हमारे हाल पर चीजों को बचाए रखने की अलख जगाने के लिए छोड़ दें। 


इतने पर ही मामला ठण्डा नहीं हुआ। उनका साथ देने कुछ और सज्जन फिर कबीर को घसीटने लगे कि 'कबीर तो पढे-लिखे नहीं थे, ये सब बेकार की चीजें हैं, असली चीज अपने मन के भाव होती है, क्या जरूरत है शास्त्र-वास्त्र की, आज के समय में कौन शास्त्र पढ़ता है और बिना शास्त्र जाने भी इतने कवि आदि हैं। कविता के लिए यह सब जरूरी चीजें नहीं हैं। बेकार है यह सब ' आदि आदि। 


उन्हें कैसे समझाया जा सके कि पढ़ा तो आज लाखों कवियों ने काव्यशास्त्र भी नहीं, या अलंकारशास्त्र भी नहीं । हजारों-लाखों लोगों ने आलोचना की प्रविधियाँ नहीं पढीं। इससे क्या आलोचना-शास्त्र को पढ़ने वाले अपराधी हो गए ? या विश्वविद्यालयों में उसका अध्ययन-अध्यापन बंद करवा दिया जाना चाहिए ? या पुस्तकों को आग के हवाले कर देना चाहिए और लिखने-पढ़ने पर प्रतिबन्ध लगवा देना चाहिए ? लोगों द्वारा किसी विषय के न पढ़ने से किसी ज्ञान की उपादेयता कम हो जाती तो संसार के सारे ज्ञान को तिलाञ्जलि दे देनी चाहिए कि अमुक का जीवन उक्त विषय के ज्ञान के बिना भी मजे से कट गया। किसी ने कुछ नहीं पढ़ा तो उनके न पढ़ने से पढ़ने वाला दोषी कैसे हो गया ? अजब तर्क हैं ! किसी चीज को न पढ़ कर पढ़ने वालों या ज्ञान को ही धिक्कारा जाए .... क्या यही महानता है !! अहम् की भी पराकाष्ठा होनी  चाहिए और अहम भी कैसा !!  सही कहा गया है कि अज्ञानी का अहम् बहुत बड़ा होता है। 


 अत्याधुनिक पाश्चात्य जगत तक में अभी भी संगीत के शास्त्र से लेकर सब विद्याओं के शास्त्रों का मनोयोगपूर्वक अध्ययन-अध्यापन होता है और यह नया युग तो विधिवत् पारङ्गतता (स्पेशलाईज़ेशन) प्राप्त करने का है, लोग विषय की पारङ्गतता (स्पेशलाईज़ेशन) प्राप्त करने के लिए सम्बन्धित विषय की सैद्धान्तकी पर जीवन लगा देते हैं आजकल। ऐसे में हिन्दी साहित्य के प्रबुद्ध कहे जाने वालों की इस मानसिकता पर क्षोभ ही किया जा सकता है। वस्तुतः कष्ट सारा संस्कृत को लेकर है। इसलिए इनके तर्क से तो नागार्जुन और त्रिलोचन भी निरस्त हो जाएँ। मूलतः यह हिन्दी-साहित्य की एक बड़ी प्रवृत्ति के रूप में समाज में पनप रहा नया रोग है। लोग 'भाषा समझ नहीं आती' के तर्क से हमारी भाषाओं की हत्या कर रहे हैं, 'ग्रन्थ समझ नहीं आते' के तर्क से भारतीय ज्ञान-विज्ञान को खारिज करने की साजिश कर रहे हैं। अपना स्तर बढ़ाने की अपेक्षा चीजों के सरलीकरण के नाम पर हर चीज की हत्या करने को सहन करना उपयुक्त नहीं। 


इससे भी अधिक हास्यास्पद बात यह कि लोग चीजों को बिना पढ़े उन्हें अनावश्यक, घटिया, निरर्थक व महत्वहीन सिद्ध करने में दौड़े रहते हैं और उन्हें खारिज करने में जुट जाते हैं। इस से यही प्रमाणित होता है कि लोग अपने न पढ़े होने को भी अपनी विशिष्टता प्रमाणित करने की जिद्द इसलिए करते हैं क्योंकि मनोविज्ञान के अनुसार वे किसी कुंठा (कॉम्प्लेक्स) से ग्रस्त होते हैं। ऊपर से मजे की बात यह है कि ले-दे कर ऐसे लोगों को कबीर ही याद आते हैं, अर्थात् एक तरह से ये लोग स्वयं को कबीर सिद्ध करना चाहते हैं। लोगों द्वारा इस प्रकार अपनी तुलना कबीर से करते हुए रत्ती-भर भी संकोच नहीं करना हत्प्रभ करता है कि क्या खाकर लोग स्वयं को कबीर समझते हैं ? कबीर क्या अपढ़ या कुपढ़ थे, जो ज्ञान को निरस्त करने वाले ऐसे लोग कबीर को सदा ज्ञान के विरोध का प्रतीक मान कर अपने स्वार्थ के लिए प्रयोग करते हैं? कबीर की 'मसि-कागद न छूने और कलम न पकड़ने' की बात से लोगों ने यह कैसे प्रमाणित कर दिया कि कबीर अज्ञानी थे या ज्ञानविरोधी थे, या अपढ़ थे ? कबीर के काव्य में रत्ती-भर भी छन्द-मात्रा का दोष ढूँढ कर दिखाएँ तो सही ! कबीर का ज्ञान का स्रोत भले किताबें नहीं थीं, किन्तु उन्होंने अपने गुरुओं से जो शिक्षा पाई, उसका क्या कोई मोल नहीं है ? क्या कबीर ने उस शिक्षा को गाली दी, नकारा या निरस्त किया ? 


किसी भी विद्या के शास्त्र और ज्ञान अथवा सैद्धान्तिकी को खारिज / निरस्त करने वाले तर्कों और तार्किकों  का दम्भ देखकर यह तो निस्सन्देह पता चलता ही है कि दम्भ का स्रोत कहाँ व क्या होता है। ज्ञान को खारिज करना निस्सन्देह सबको दम्भी ही बनाता है।


छन्दविज्ञान की उपर्युक्त चार पंक्तियाँ जो उद्धृत की थीं; उन पंक्तियों का हिन्दी में भी अर्थ बताने की इच्छा कुछ पाठकों ने सन्देश भेजकर व्यक्त की। अतः इस बहानेअपनी स्मृतियों को व प्राप्त सीख को इन पंक्तियों के माध्यम से दुहराने का अवसर मिल रहा है। अतः थोड़ा संक्षेप में इन पंक्तियों के बारे में - 

काव्यशास्त्र के अनुसार विविध छन्दों में विविध मात्राओं ( जिन्हें वहाँ लघु व दीर्घ कहा जाता है ) का नियोजन होता है। यों तो प्रत्येक काव्यरचना में वही दो प्रकार की मात्राएँ होती हैं, किन्तु संस्कृत में इन दो मात्राओं को तीन-तीन के अलग-अलग प्रकार के 'सेट' (वर्गों ) में बाँट दिया गया है (मात्राओं को अलग-अलग ढंग से प्रयोग करने के निर्धारित इन वर्गों को गण कहा जाता है) तो कई गण बने हुए हैं, जैसे यगण, मगण, तगण इत्यादि। ये यगण, मगण, तगण इत्यादि जिस क्रम से रचना में प्रयोग होते हैं, वही क्रम तय करता है कि उक्त रचना में उक्त-उक्त छंद है। संगीत में जैसे राग-रागिनियाँ होते हैं, कुछ वैसा ही समझ लीजिए। 


एक उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। जैसे, एक छन्द है 'इन्द्रवज्रा  ' । 'इन्द्रवज्रा' छन्द के प्रत्येक चरण में 11 -11 वर्ण होते हैं। ये 11 -11 वर्ण (यगण, तगण. मगण आदि ) जब, जहाँ, जिस रचना में एक निर्धारित क्रम मे आएँगे, वह रचना इन्द्रवज्रा छन्द की होगी। इस छ्न्द की परिभाषा है - " स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः " अर्थात् इन्द्रवज्रा के प्रत्येक चरण में दो तगण, एक जगण और दो गुरु के क्रम से वर्ण होते हैं। 


अब छन्द के इस लक्षण (परिभाषा) का पता होने के बावजूद किसी को भी 'वर्ण' को पहचानना कठिन हो सकता है कि तगण किसे कहते हैं और जगण आदि क्या होता है। इसलिए पूरे छन्दविज्ञान के आधार को ऊपर  उल्लिखित चार पंक्तियों में समाहित कर दिया गया है। ( उन पंक्तियों की व्याख्या लिखने से पहले यह सब भूमिका लिखना अनिवार्य था ताकि बात पूरी स्पष्ट हो सके )। 


अब आते हैं उन चार पंक्तियों के शाब्दिक अर्थ पर। उनका अर्थ यह है कि -

म (मगण ) में तीन गुरु, तीन लघु न (नगण) में, भ (भगण) के आदि में गुरु (अर्थात् बाकी दो लघु), य (यगण) के आदि में लघु (अर्थात् बाकी दो गुरु), ज (जगण) के मध्य में गुरु (अर्थात् बाकी दोनों ओर लघु), र (रगण) के मध्य में ल (लघु) (अर्थात् बाकी दोनों ओर गुरु, स (सगण) के अंत में गुरु (अर्थात् उस से पूर्व दो लघु), त (तगण) के अन्त में लघु (अर्थात् उस से पूर्व दो गुरु)। 

( 'ऽ' यह चिह्न गुरु मात्रा का है ) व '।' यह चिह्न लघु मात्रा का है ) 

म ऽऽऽ 
न ॥। 
भ ऽ॥
य ।ऽऽ 
ज । ऽ।
र ऽ। ऽ 
स ॥ ऽ 
त ऽऽ। 

अतः उन चार पंक्तियों में सारे गणों की गणना व परिभाषा अद्भुत ढंग से समझा/कह दी गई है। उसे याद कर लेते ही प्रत्येक छन्द की गुत्थी सुलझ जाती है। "यमाताराजभानसलगम्" कह कर इसे और भी संक्षिप्त बना दिया गया किन्तु इस अति संक्षिप्तीकरण में गणना करनी पड़ती है, जबकि उपर्युक्त पंक्तियों में अंकों व गणना को भी साथ-साथ दे दिया गया है। जिसे जो विधि अनुकूल लगे वह उसे अपना सकता है। 

छन्द और संगीत का सौन्दर्य सृष्टि रहने तक समाप्त नहीं होने वाला। संस्कृत के आचार्यों ने इसके गूढ़ रहस्यों को सरलता से समझ में आने की विधियाँ भी विकसित कीं। यह उनका हम पर अत्यंत उपकार है। 


सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

"मैं चल तो दूँ" : 'भाषा' : मूल व अनुवाद सहित सस्वर पाठ

"मैं चल तो दूँ" : 'भाषा' :  मूल व अनुवाद सहित सस्वर पाठ
- कविता वाचक्नवी


"भाषा" (केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, भारत सरकार की हिन्दी पत्रिका ) के नवम्बर-दिसंबर 2011 अंक में मेरी एक कविता "मैं चल तो दूँ" मूल हिन्दी व नेपाली अनुवाद (बैद्यनाथ उपाध्याय द्वारा किए गए ) के साथ प्रकाशित हुई थी । 

 सुखद यह है कि "भाषा" और केंद्रीय हिन्दी निदेशालय की इस पत्रिका में संयोग से वर्ष 2007 से निरन्तर थोड़े-थोड़े अंतराल में मेरी कविताएँ व उनके अनुवाद प्रकाशित होते चले आ रहे हैं, जिसका शत-प्रतिशत श्रेय कविताओं के अनुवादकों को ही जाता है। अन्यथा मुझे तो यकायक सूचना मिलने पर ही पता चल पाता है कि किसी अंक में कोई रचना व अनुवाद प्रकाशित हो रहे है। बस, विदेश में होने के कारण बहुधा स्कैन प्रति तक न देख पाने का मलाल बना रह जाता है.... जब तक कि कोई सहृदय मित्र बढ़िया स्कैन कर के न भेज दें। 

भाषा के उक्त अंक के अंक के मुखपृष्ठ तथा मूल व अनूदित पाठ के पन्नों की स्कैनप्रति उपलब्ध करवाने का आग्रह मैंने फेसबुक पर किया तो वरिष्ठ रचनाकार कवि सुधेश जी ने दिल्ली से उन पन्नों को स्कैन कर के मुझे गत दिनों उपलब्ध करवा दिया। उनके इस सौजन्य के लिए उनके प्रति आभार व्यक्त करती हूँ।


जो मित्र इस कविता का सस्वर पाठ भी सुनना चाहें वे -
  • - इस ब्लॉग के साईडबार में `तृणतुल्य मैं" विजेट में देखें 
  • - डेनमार्क के रेडियो सबरंग की साईट पर `कलामे शायर' अथवा `Poet Recites' पर जाकर सूची को स्क्रॉल कर मेरे नाम के साथ सहेजे संकलन में इसे सुन सकते हैं
  • - अथवा सीधे इस लिंक को क्लिक करें - मैं चल तो दूँ (सस्वर पाठ) 


बड़े आकार में पढ़ने के लिए अलग अलग चित्र पर क्लिक करें - 
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बुधवार, 3 सितंबर 2008

विदेशी भाषाओं से हिन्दी में साहित्यिक अनुवादक संपर्क करें

एक प्रतिष्ठित स्थापित प्रकाशन के लिए, विदेशी साहित्य के अनुवादक संपर्क करें। अनुवाद के लिए सम्मानजनक भुगतान किया जाएगा.








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एक प्रतिष्ठित व स्थापित साहित्यिक प्रकाशन को विदेशी भाषाओं से हिन्दी में साहित्यिक अनुवाद करने का अनुभव रखने वाले एवं साहित्य में गति रखने वाले ऐसे अनुवादकों की आवश्यकता है। अनुवाद के लिए ग्रन्थ सीधे अनुवादक के पते पर भेजे जाएँगे। साथ ही संतोषजनक एवं स्तरीय साहित्यिक अनुवादों के लिए अनुवादक को सम्मानजनक एवं समुचित धनराशि भी देने की व्यवस्था रहेगी। आवश्यक होगा की अनुवादक को पूर्व में साहित्यिक कृतियों (गद्य व पद्य) के अनुवाद का प्रयाप्त अनुभव हो.प्रमाण के लिए स्वयं द्वारा किए गए ऐसे अनुवादों की प्रति या /और प्रकाशक आदि के प्रमाण अपेक्षित होंगे.

जो भी इस सन्दर्भ में रूचि रखते हों, वे कृपया मुझसे संपर्क करें।

विदेशी भाषाओं से हिन्दी में साहित्यिक अनुवादक संपर्क करें

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यदि आप किसी विदेशी भाषा में साहित्यिक अनुवाद का अनुभव रखते हैं व साहित्यिक कृतियों के अनुवाद कार्य को करना चाहते हैं तो आप के लिए एक अच्छा अवसर हो सकता है।

एक प्रतिष्ठित व स्थापित साहित्यिक प्रकाशन को विदेशी भाषाओं से हिन्दी में साहित्यिक अनुवाद करने का अनुभव रखने वाले एवं साहित्य में गति रखने वाले ऐसे अनुवादकों की आवश्यकता है। अनुवाद के लिए ग्रन्थ सीधे अनुवादक के पते पर भेजे जाएँगे। साथ ही संतोषजनक एवं स्तरीय साहित्यिक अनुवादों के लिए अनुवादक को सम्मानजनक एवं समुचित धनराशि भी देने की व्यवस्था रहेगी। आवश्यक होगा की अनुवादक को पूर्व में साहित्यिक कृतियों (गद्य व पद्य) के अनुवाद का प्रयाप्त अनुभव हो.प्रमाण के लिए स्वयं द्वारा किए गए ऐसे अनुवादों की प्रति या /और प्रकाशक आदि के प्रमाण अपेक्षित होंगे.

जो भी इस सन्दर्भ में रूचि रखते हों, वे कृपया मुझसे संपर्क करें।
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