Sunday, December 9, 2012

समय, स्थिति और स्त्री

समय, स्थिति और स्त्री  : कविता वाचक्नवी
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जो लोग जमाना बदल चुकने या समाज और समय बदल गया की बात करते हैं, वे जीवन की वास्तविकताओं के प्रति अत्यन्त अगंभीर और परे होते हैं। 80% वाले भारत की बात तो दूर 20% शहरों वाले भारत में ही पूरा समय, ज़माना और समाज नहीं बदला है। जितने अर्थों में जीवन का दिखावा बढ़ा है, उस से भी अधिक बड़े अर्थों में समाज-मानसिकता में बदलाव का दिखावा भी बढ़ा है।


इसी दिखावे को देख कर या इस से प्रभावित हो, इसके आधार पर निर्णय लेना या परिवर्तन की स्थापना देना जीवन को उसके किनारे बैठ कर देखने जैसा है। स्त्रियों की स्थिति के प्रति ऐसे निर्णय सुनाने या निर्णय पर पहुँचने से पहले हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का 'बाणभट्ट की आत्मकथा' का सूत्र वाक्य सदैव स्मरण रखना चाहिए कि “स्त्री के दुःख इतने गंभीर होते हैं कि उसके शब्द उसका दशमांश भी नहीं बता सकते। सहानुभूति के द्वारा ही उस मर्म-वेदना का किंचित आभास पाया जा सकता है।”


'किंचित' के साथ वे पता, समझ, अनुभव, जानकारी इत्यादि शब्द नहीं अपितु केवल 'आभास' ही जोड़ते हैं, यह विशेष ध्यान देने की बात है।


यह वाक्य कक्षा 9वीं -10 वीं के बाद की छुट्टियों में 'बाणभट्ट की आत्मकथा' पढ़ते हुए सबसे पहली बार पढ़ा था और तभी अपनी डायरी में लिख लिया था। यह एक वाक्य मुझे (1) जीवन में मिली लाखों स्त्रियों में से किसी के भी बारे में निर्णय लेने या विचार बनाने से पूर्व चेताता रहा है तो साथ ही साथ (2) मेरी संवेदना को जागृत रखने वाले किसी 'टूल' की भांति 'अलार्म' का काम भी करता है। और तीसरा काम यह वाक्य यह करता आया है कि (3) तट पर बैठ कर समय बदलने और सामाजिक परिवर्तन की घंटी बजाने वालों की समझ को परखने का अवसर देता रहा है। 


स्त्री के लिए समय और समाज सही अर्थों में नाममात्र का बदला है। वह पहले भी दैनिक उपयोग व उपभोग की वस्तु थी.... आज भी दैनिक उपयोग की वस्तु ही है। नियंत्रक शक्तियाँ भले कुछ बदल गई हैं या अब शातिर बाजारू शक्तियों ने उपयोग व उपभोग की वस्तु बनने को स्त्री की स्वेच्छा व चयन की स्वतंत्रता के लुभावने आवरण में परिवर्तित कर दिया गया है। स्त्री समाज व जीवन की पूरी विकटता से झूझने की अपनी शक्ति और जीवन के प्रति अपनी आस्था के चलते कोई अन्य उपाय न पा इस कारा के पाश में बंधती चली जाती है। समाज में क्या कोई ऐसी भी वेश्या हैं जो मौज मस्ती के लिए उस दारुण जीवन को अपने लिए स्वीकारती या चुनती हैं ? 


कुछ गिने चुने उदाहरण देकर / दिखाकर बहुधा लोग समय व समाज को देखने की तमीज सिखाया करते हैं। परंतु वे नहीं जानते कि समय और समाज को देखने के अचूक यन्त्र (द्विवेदी जी वाले ) से बढ़कर कोई दूसरा यन्त्र हो ही नहीं सकता।..... और इस यन्त्र से दुनिया देखने वालों को कुछ साफ दीखा करता है। कई प्रबुद्ध शिक्षित आधुनिक महिलाएँ तक भी कुछ गिने चुने या अपने इर्दगिर्द के ऐसे उदाहरण और प्रमाण एकत्रित कर व फिर उन्हें दिखा कर घोषणा करना चाहती/चाहते हैं कि समय बदल गया। वस्तुतः आधुनिक नारीसमाज की कुछ स्त्रियों सहित ऐसे तर्क व उदाहरण देने वालों का यह व्यवहार उसी श्रेणी का होता है जिस श्रेणी की असंवेदना को केंद्र में रख द्विवेदी जी 'इतने गंभीर..." की बात कहते हैं। यह उस गंभीरता पर आवरण चढ़ाने और चढ़े हुए आवरण को न हटा पाने की असहानुभूतिजन्य मानसिकता का ही फल है। प्रभा खेतान जी की 'अन्या से अनन्या' पढ़ने के बाद मन में सबसे पहला व आज तक यही प्रश्न आया कि उस स्त्री के दु:ख का क्या, जिसका पति दो दो स्त्रियों से घात /प्रयोग कर रहा है और उसे विवाहिता के बंधन में बाँध एक दूसरी स्त्री के साथ मनोरंजन में लगा है। एक ही कालावधि / समय अन्या से अनन्या बनी स्त्री के लिए बदल गया होगा पर उसी कालावधि में जी रही उस स्त्री का क्या जो अन्या न थी, और कभी अनन्या भी न बनी और त्यक्ता रही जीवन-भर। ऐसे में वस्तुतः अनन्या वह है जो जीवन-भर एक स्त्रीविमर्श की पैरोकार के सामने पत्नी का आडंबर निभा ले गई और स्वयं स्त्रीविमर्श की झंडाबरदार तक उसकी वेदना के प्रति कटूक्त ही रहीं।


इसलिए समाज में सुखी,खुशहाल, आदि आदि दीखने वाली स्त्री भी बहुधा इसलिए ऐसी दीखती है क्योंकि यदि वह ऐसी न दीखे तो समाज उसे जीने न दे। ये तरकीबें और दिखावे उसके मजबूती से स्वयं को एक रूपविशेष में प्रस्तुत करने की विवशताएँ-भर हैं, न कि बदले हुए समय व वातावरण के उदाहरण। जिस दिन समाज का जो व्यक्ति इतना संवेदनशील होगा की वह स्त्री के कष्टों की मर्मवेदना का किंचित आभास पा सके, उस दिन वह जान पाएगा कि वे दु:ख वास्तव में कितने गंभीर होते हैं। आधुनिक समय की भागदौड़, आधुनिकीकरण से उपजी निर्मम क्रूरता ने मनुष्य को जिस अनुपात में असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में स्त्री के प्रति निर्ममता और असहानुभूति भी बढ़ी है। उसी का स्पष्ट भयावह परिणाम कि स्त्री के रूप में जन्मते ही नहीं अपितु जन्मने से पूर्व ही उसकी हत्या कर दी जाती है। 


इस निर्मम समय और समाज से उसकी क्रूरता जब व जैसे छूटेगी तब व तैसे ही कोई समाज अपने स्त्रीवर्ग के प्रति समय बदलने की बात को कहने का अधिकारी होगा।

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