VED SUDHA / MANTRA/ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
VED SUDHA / MANTRA/ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 27 जनवरी 2013

क्या बचाना चाहती हूँ मैं ......

अन्ति सन्तम् न जहाति, अन्ति सन्तम् न पश्यति...


यह लेख 'नई दुनिया' (http://naiduniaepaper.jagran.com/)  के नववर्ष विशेषांक (1 जनवरी 2013) हेतु लेख भेजने के आदेश पर 16 दिसंबर 2012 को लिखा गया व उसमें सम्मिलित था। विशेषांक के लिए विषय देते समय कहा गया था कि 'भारत की कोई एक चीज बचाने के लिए यदि आपसे कहा जाए तो आप क्या बचाना चाहेंगी और क्यों;  इसे आप नई दुनिया के पाठकों के लिए लिख भेजिए" तब जो लिखा वह लेख यथावत् यहाँ प्रस्तुत है। 'नई दुनिया'  से विशेषांक की पीडीएफ प्रति की प्रतीक्षा है,मिलने पर उसे सम्पूर्ण रूप में यहाँ जोड़ दिया जाएगा। 
उन दिनों दिल्ली में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना के कारण उपजे क्षोभ के चलते तब से यह लेख नेट पर अप्रकाशित था। आज अपने पाठकों व मित्रों से इसे बाँटने का सुयोग बन पाया है।    -  (क.वा.)


"अन्ति सन्तम् न जहाति, अन्ति सन्तम् न पश्यति"। 
- (डॉ.) कविता वाचक्नवी 


जब यह लेख लिखा जा रहा है उस समय भाँति-भाँति के कयास लगाए जा रहे हैं और घोषणाएँ की जा रही हैं कि 21 दिसंबर 2012 को प्रलय आने वाली है और यह समूचा जगत् नष्ट होने जा रहा है। दूसरी ओर, जब यह लेख आप पढ़ रहे हैं, तब तक यह प्रमाणित हो चुका है कि ये कयास केवल झूठ थे क्योंकि आप व हम सभी उसी प्रकार व उतने ही सुरक्षित हैं जितने कि सामान्यतः हमें होना चाहिए। 


इन दोनों तिथियों के एकदम सन्निकट खड़े होकर क्यों न कुछ देर को मानो एक ऐसी रोचक काल्पनिक उड़ान ली जाए कि विश्व वास्तव में समाप्त होने जा रहा है और कुछ भी नहीं बचेगा। परंतु जैसा कि मानव स्वभाव है “सामान सौ बरस का, पल की खबर नहीं” के चलते हम सब, कुछ न कुछ सम्हालने, बचाने और सहेजने के लिए अवश्य तत्पर होंगे, होना भी चाहिए। 


भारतीय होने के नाते हम सबको विश्वास है कि प्रलय के बाद भी पुनः नया सृष्टिचक्र चलने ही वाला है। हमारी दार्शनिक स्थापनाओं को काव्य में पिरोकर प्रसाद जी ने लिखा था – “हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह /एक पुरुष, भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह ...... बँधी महावट से नौका थी सूखे में अब पड़ी रही, उतर चला था वह जल-प्लावन, और निकलने लगी मही। " अर्थात् एक नौका और एक पुरुष तो कम से कम बचे ही हुए थे। मान लीजिए, यदि प्रलय आ ही जाता तो वह क्या वस्तु हो सकती थी जिसे मैं बचाना चाहती...इस ‘हायपोथेटिकल’ स्थिति की कल्पना करते ही मुझे मानव-मात्र के लिए बचा कर रखी जाने वाली एकमात्र वस्तु लगती है - भारतीय वाङ्मय ! समूचा भारतीय वाङ्मय तो यद्यपि बहुत विशाल है, वह समूचा यदि सुरक्षित नहीं किया जा सके तो फिर समूचा आर्ष साहित्य (वेद, वेदांग, उपांग, उपनिषद, ब्राह्मण व आरण्यक) बचा लिया जाना चाहिए। परंतु यदि यह भी मैं न बचा पाऊँ तो इनका मूलस्रोत (चारों वेद) बचा रहे तो भी मानवता बची रहेगी और सारा ज्ञान-विज्ञान भी। महर्षि दयानंद सरस्वती ने लिखा भी था – “वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है”। कुछ और भयावह कल्पना की जाए कि यदि इतना भी बचा पाना संभव नहीं हुआ, तो.... ? तो ऐसे में मुझे 19वीं शती के महानतम दार्शनिकों में गिने जाने वाले जर्मन दार्शनिक व लेखक Arthur Schopenhauer (1788-1860) याद आते हैं, जिन्होंने लिखा था कि यदि समूचा विश्व नष्ट हो जाए तो मात्र ईशोपनिषद (यजुर्वेद का चालीसवाँ अध्याय) बचा लिए जाने से समूची मानवता बची रह जाएगी क्योंकि उतने में भी समूची मानवता के लिए समस्त अथाह ज्ञान समाहित है। ध्यातव्य है कि ईशोपनिषद में कुल जमा केवल 18 मंत्र हैं, जो मात्र एक ही पृष्ठ पर दोनों ओर में आ जाते हैं। 



यह ज्ञान वह धरोहर है, जो मानवजीवन की उत्कृष्टता, सात्विकता व परिमार्जन का आधार है। ऋषियों ने मनुष्य के जीवन को उसके मूलरूप में इतनी गहराई से समझा-समझाया है कि उतना वैज्ञानिक, तार्किक व स्वतःसम्पूर्ण चिंतन अन्यत्र दुर्लभ तो क्या, है ही नहीं। जीवन व जगत् के विषय में जो तथ्य और निष्कर्ष भारतीय आर्ष वाङ्मय परंपरा में उपलब्ध होते हैं, आज तक का विज्ञान एक-एक कर उन्हें प्रामाणिक सिद्ध होता देख चकित रह जाता है। विशिष्ट बात यह है कि यह समूचा ज्ञान सार्वभौमिक है, मनुष्यमात्र के लिए। जीवन, मनुष्य व जगत् को उसके सही सही रूप में जानने के कारण उन्होंने इसे सुखमय सात्विक, श्रेष्ठ, उत्कृष्ट एवं परिमार्जित करने-कराने की विधियाँ भी सूत्रबद्ध कर दीं। देखने में एकबार को ऐसा प्रतीत हो सकता है कि ये विचार व सुझाव केवल चिंतन-मनन का विषय हैं, किन्तु ऐसा है नहीं क्योंकि इनका धरातल पूर्णत: व्यावहारिक जीवन है “ Vedic philosophers took a very comprehensive and holistic approach yet that is so simple and natural.” (Harish Chandra, The Inward Journey / Enriching The life / Page 79 ) 


यह मानवी सत्ता जगत् में रहते, गति व संचालन करते हुए अबाध रूप से कैसे ‘स्वयं’ से, संसार से, समाज से, पंचतत्वों व परिवेश से किस प्रकार तादात्म्यपूर्वक समन्वय स्थापित करते हुए उत्तरोत्तर अधिक क्षमतापूर्ण, ज्ञान-विज्ञान-सम्पन्न, भावप्रवण, स्व-स्थ, शुद्ध, सुखी एवं प्रसन्न रहे – यह प्रश्न मानवी सृष्टि के आदि से सुलझाया जाता रहा है। इस क्रम में अध्यात्म, समाज, धर्म, दर्शन मनोशास्त्र व साहित्य ने निरन्तर मीमांसा करते हुए जीवन को प्रकृष्टतर बनाने वाले ऊर्ध्वमुखी तत्व व व्यवहार अपनाने पर बल दिया। सभ्यता के आदिकाल में ही भारतभूमि ने इस दिशा में अत्यंत सफलता प्राप्त कर ली, जिसे भारतीयभूमि व समाज की उपलब्धि माना गया । विविध क्षेत्रों की इसी प्रकार की उपलब्धियाँ मिलकर देश की संस्कृति के रूप में रूपायित हुईं। निर्विवाद रूप से संस्कृति तात्विक ‘दर्शन’ को जीवन के धरातल पर व्यावहारिक रूप से अपनाने वाली सभ्यता की उपलब्धियों का ही दूसरा नाम है। मनुष्य जीवन को निखारने-सँवारने वाले सभी आदर्श व व्यवहार इसमें सम्मिलित हैं। वाङ्मय मानवता को संस्कृति की दीक्षा देता है और संस्कृति मनुष्य का मूल्यबोध बनाए व बचाए रहती है। इसलिए मेरी रुचि इसी के आधार को बचाए रखने में है। 


इस काल्पनिक उड़ान पर जाने से चिंतित होने वालों के लिए यह जानना अनिवार्य है कि वैदिक गणना के अनुसार अभी सृष्टि के नष्ट होने में 2.36 अरब वर्ष का समय शेष है। इसलिए बचाए रखने की यह कल्पना हमें इस सृष्टि के रहते हुए भी सर्वदा बचाए जाने वाले घटकों के रूप में स्मरण रखनी है। अन्यथा प्रलय आने से भले ही सृष्टि नष्ट अभी नहीं होने वाली किन्तु भोग व स्वार्थ की संस्कृति मानवता का समूचा संहार कर देगी तो क्या यह धरती मनुष्य के रहने योग्य बचेगी? उस स्थिति की कल्पना भी नहीं अच्छी। इसलिए मैं तो इस पूरी स्थिति पर अथर्ववेद के मंत्र से बढ़कर सटीक कुछ नहीं समझती - 


"अन्ति सन्तम् न जहाति, अन्ति सन्तम् न पश्यति।
                                    देवस्य पश्य काव्यम्, न ममार न जीर्यति॥"           (अथर्ववेद 10/8/32)

  







सोमवार, 2 अगस्त 2010

"उसकी" बाँहों का सम्बल निर्भय करे

"उसकी" बाँहों का सम्बल : (डॉ.) कविता वाचक्नवी




तथाकथित मैत्रीदिवस के तामझाम देखते मन में दो दिन से अथर्ववेद (१९/१५/६) का मन्त्र प्रार्थना बन उमड़ता रहा है; जो यों है  -

" अभयं मित्रादभयममित्रादभयम् ज्ञातादभयं परोक्षात् |
       अभयं नक्तमभयं दिवा नः सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु || "


वैसे इसका अर्थ बहुत सरल है। 

मन्त्र का शाब्दिक अर्थ है - 

" हे अभय, निर्भय प्रभो! हमें मित्र और अमित्र से तथा ज्ञात और अज्ञात से सर्वथा अभय करें। सभी दिशाओं के निवासी प्राणी मेरे मित्र व हितकर हों |"



लगभग २ माह पूर्व बर्मिंघम में घूमते घूमते अकस्मात् मन में प्रेरणा हुई कि शैशव से आज तक वैदिक थाती व अपने आचार्यों से जो कुछ पाया है, उसका ऋण इतना है कि शेष बचे जीवन की अल्पावधि उसे चुकाने के लिए अपर्याप्त है। न चुका पाने के कारण जितनी अपराधी मैं परम्परा व संस्कृति की हूँ, उतने ही परिमाण में मुझ पर अपनी विद्या व स्नेह सर्वस्व-सा न्यौछावर करने वाले आचार्यों की तथा  उससे कहीं अधिक परिमाण में भावी पीढियों की। जाने यह कोई दैवीय प्रेरणा थी (या इसे मेरी भावुकता का नाम भी दिया जा सकता है)  कि मैंने तत्काल ठाना / संकल्प किया कि मैं नेट पर प्रतिदिन जो लगभग १५ -१५ घन्टे  काम करते बिताती हूँ, उसमें से थोड़ा समय नियमित अपने इस संकल्प की पूर्ति में लगाऊँगी और अपने किसी एक ब्लॉग पर इस उद्देश्य से एक स्तम्भ प्रारम्भ करूँगी, जिसमें उस धरोहर को सहेजने सँजोने का काम करूँगी। तुरन्त मैंने इस विचार से अपने पति को भी अवगत करवा दिया। 



किन्तु जैसा कि मेरे साथ सदा से होता आया है कि जिस भी विषय के संबन्ध में मैंने उसकी जानकारी किसी से भी बाँटी, वह वहीं अधर में अटक जाता है। मैं वहाँ से लौट कर वापिस घर (लन्दन ) आ गई  और दिन रात भूत की भाँति नेट पर काम करने के बीच परिवार की व्यस्तताओं में लग गई। ऊपर से गत ये लगभग २ माह मेरे परिवार की मानो विकराल संकट की घड़ी बन गए। तीनों बच्चों पर कई कई ओर से आपदाएँ आईं, मैं स्वयं दुर्घटनाग्रस्त होकर डेढ़ माह से बिस्तर पर पड़ गई हूँ, दुर्घटना के कारण अमैरिका- कैनेडा के  दो माह के मेरे प्रवास के रिटर्न एयर टिकट (ईबुकिंग होने के कारण, बिना एक भी पैसा रिफ़ण्ड हुए) निरस्त हुए, जिससे  लगभग एक लाख से अधिक की आर्थिक क्षति हुई और यात्रा प्लान बदलने से आगामी कई माह  के लिए तय निर्धारित योजनाएँ सब खटाई में पड़ गईं। एक रास्ता निकालने का मार्ग सूझा तो  उस पर भी कल आपद आ गई और द्वार मानो बन्द हो गया। इतना ही नहीं इस बीच मायके परिवार में २ मृत्यु हो गईं। यहीं बस नहीं हुआ, तीसरी मृत्यु ( परसों प्रात: मुझ से लगभग १०-१५ वर्ष छोटे युवा फुफेरे भाई का ६ वर्ष  की बेटी को अनाथ करके चले जाने ) का सम्वाद पाने  तक यह क्रम थमा नहीं है। 



इन सब के बीच  उत्पन्न विकलता ने इस प्रकार मन व संकल्पशक्ति को जर्जर कर दिया है कि क्षण क्षण मन  डरपाता रहा और कुछ भी कर्तव्य अकर्तव्य की सुध न रही व न ही स्तम्भ प्रारम्भ कर पाई।  इस बीच परसों व कल  की विकल घड़ियों में नेट पर मित्रों से मैत्रीदिवस की शुभकामनाएँ व सूचना भी मिली। तो कल दिनभर जाने अकस्मात् मन में अथर्ववेद का मैत्री विषयक यह मन्त्र कौंधता रहा; जिसे यहाँ प्रारम्भ में ऊपर अंकित किया है। इस मन्त्र के अर्थ व भाव के साथ मन के त्रास की मुक्ति और सर्वत: अभय की प्रार्थना / इच्छा से संचालित मनोगति के चलते स्मरण हो आया कि क्यों न  इस वैदिक चिन्तन व विचार को सब मित्रों से व अधिकाधिक लोगों से बाँटा जाए। फिर लगा कि इस मन्त्र के बहाने क्यों न आज से व इसी से ही अपने संकल्प को पूरा करने का शुभारम्भ किया जाए! 



तो उस कड़ी में आज यह पहला चरण धरा है। जीवन का पहला चरण जब धरा होगा धरती पर, तो मेरे माँ पिताजी की बाँहों के घेरे ने मुझे लड़खड़ाने से बचा कर निर्भय किया था। आज पुन: अभय की  अभिलाषा ले धरती हूँ यह प्रथम चरण। आशा है, "उसकी" अनन्त अज्ञात बाँहों का घेरा लड़खड़ाने  से बचा सर्वत: अभय निर्भय कर सम्बल देगा।


Related Posts with Thumbnails

फ़ॉलोअर