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गुरुवार, 1 अगस्त 2013

मॉर्निंग न्यूज़, जयपुर में ललित निबन्ध

मॉर्निंग न्यूज़, जयपुर में ललित निबन्ध


28 जुलाई, 2013 को जयपुर से प्रकाशित दैनिक हिन्दी समाचारपत्र 'मॉर्निंग न्यूज़' के रविवारीय साहित्यिक परिशिष्ट के मुखपृष्ठ (संख्या10) पर प्रकाशित मेरा ललित निबन्ध - "रंगों का पंचांग"


जिन्हें पढ़ने में असुविधा हो वे इस लिंक पर जाकर 28 जुलाई चुन कर उस दिन का ई-पेपर देख सकते हैं । http://www.morningnewsindia.com/epaper/news.php?city=Jaipur


नेट पर इसे अन्यत्र यहाँ पढ़ सकते हैं -



बड़े आकार में पढ़ने के लिए चित्र पर क्लिक करें -


गुरुवार, 24 नवंबर 2011

`पुरवाई' में रम्य-रचना : "रंगों का पंचांग"

`पुरवाई' में रम्य-रचना : "रंगों का पंचांग" 



यू.के. हिन्दी समिति की त्रैमासिक पत्रिका `पुरवाई' के अप्रैल - जून 2011 अंक में मेरी एक बहुत पुरानी (वर्ष 2000 में लिखी) रम्य-रचना ( कहानी + ललित निबंध ) "रंगों का पंचांग" प्रकाशित हुई है।


मुझे आज अगले अंक अर्थात् (जुलाई - सितंबर 2011) में प्रकाशित पत्रों को पढ़ने के बाद इस बात का पता चला। सो सहेज रही हूँ।


रचना का मूल पाठ आप यहाँ क्लिक कर पढ़ें 






सोमवार, 13 अप्रैल 2009

वैशाखी : यमुना और बच्चे



वैशाखी, यमुना और बच्चे
डॉ. कविता वाचक्नवी



गर्मी अभी जलाने वाली नहीं हुई थी। आँगन में सोना शुरू हो चुका था। आँगन इतना बड़ा कि आज के अच्छे समृद्ध घर के दस-ग्यारह कमरे उसमें समा जाएँ। एक ओर छोटी-सी बगीची थी। बगीची के आगे आँगन और बगीची की सीमारेखा तय करती, तीन अँगुल चौड़ी और आधा बालिश्त गहरी, एक खुली नाली थी, जिसे महरी सींक के झाड़ू से,  आदि से अंत तक एक ही `स्ट्रोक'  में साफ़ करती आँगन की दो दिशाएँ नाप जाती थी। नीचे हरी-हरी काई की कोमलता, ऊपर से बहता साफ़ पानी....। मैं कल्पना किया करती कि चींटियों के लिए तो यह एक नदी होगा....| ....और मैं चींटी बन जाती अपनी कल्पना में। फिर उस नन्हें आकार की तुलना में इस तीन अंगुल चौड़ी नाली के बड़प्पन की गंभीरता में, एक फ़रलाँग की दूरी पर बहती यमुना याद आती। ....याद  आता उसके पुल पर खड़े होकर नीचे गर्जन-तर्जन, भँवर, पुल के खंभों का दोनों दिशाओं में काफी बाहर की ओर निकला भाग, उनसे टकराती, बँटकर बहती धाराएँ। पुल पर खड़े-खड़े मैं इतना डूब जाती थी कि लगता पुल बह रहा है और मैं निरंतर आगे-आगे बहे जा रही हूँ......जंगला थामे खड़ी।


आज भी डर लगता है। मैं जिसे भी यह समझाने की कोशिश करती, सब हँसते। इसीलिए जब कभी वहाँ से गुज़रती, एकदम बीचोंबीच होकर। पुल के किनारों की ओर चलने में मुझे हर समय भय लगता। आज भी वैसा ही है। सड़क के बीच `डिवाईडर' पर खड़े होकर `ट्रैफिक' रुकने की प्रतीक्षा करनी पड़े तो चक्कर आ जाता है....गिर ही जाऊँ, ... इसलिए उस से सटकर नीचे सड़क पर ही खड़े होना बेहतर लगता है।


नाली को नदी और स्वयं को चींटी बनाकर जाने कितनी बार मैंने नाली सूखने की प्रतीक्षा की होगी। .... और यह वह ऋतु थी, जब दोपहर दो बजे तक के रसोई के कामकाज निपटने के बाद पाँच बजे तक नाली आराम करती-करती ऐंठना शुरू हो जाती। अप्रैल से ज्यों-ज्यों धूप बढ़ने के दिन आने लगते, दोपहर बाद ही से नाली का हरित-सौंदर्य बुढ़ापे की खाल-सा सूखा व बेजान होकर दीवारों से अंदर की ओर मुड़ने लगता। पपड़ियाँ बनकर तुड़ते-मुड़ते मुझे विचलित करता रहता। उधर मुझे पानी के नीचे काई के लंबे-लंबे हरे तंतु कोमलता से बहते ऐसे लगा करते थे, जैसे नदी की धार के विपरीत मुँह करके सिर का पिछला भाग पानी में ढीला छोड़ देने पर लंबे-लंबे बाल सुलझे-से होकर धार में लहराते-तिरते हैं। पर अप्रैल आते-आते नाली कुरूप हो जाती।



नदी और नाली! कोई संयोग नहीं। कोई मेल नहीं। बिल्कुल ही बेमतलब बात हो गई।



होली में नाली रंग-बिरंगी हो जाती, उस पर स्वच्छ पानी बहता तो उसमें होली के छींटें देख मुझे हरी घास पर गिरे, बिखरे फूलों की रंगीन पाँखुरियाँ याद आतीं।


.......पर आज यह सब क्यों याद आ रहा है?



तो यों होली व बैसाखी आकर नाली के रंग-ढंग बदल जातीं। जब कभी घर में पुताई होती, नाली उसमें भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती, बिना हील-हुज्जत के।


इस नाली को नदी का रूप तब और भी मिलता, जब आती वैसाखी। हमारे यमुना की रेत में पगे कपड़े पछारकर, पानी सारी रेत नाली के छोर पर छोड़ देता; तो और भी असली रूप लगता उसका। किताबों में `डेल्टा' पढ़ा-ही-पढ़ा होगा उन दिनों, क्योंकि `डेल्टा'  का रूप भी मैंने नाली के उल्टे बहाव की कल्पना करके वहीं समझने की कोशिशें की थीं -  हमारे बीस लोगों के परिवार के कपड़ों की रेत खाई बैसाखी की दुपहरी की नाली में।



आज फिर बैसाखी है। पर वे दिन अतीत बन गए हैं। 


`केबल' का एक चैनल दरबार-साहब'  (स्वर्ण-मंदिर) से गुरुबाणी का सीधा प्रसारण फ़ेंक रहा है। मन में बैसाखी उमगती ही नहीं अब। उमगती हैं -  केवल यादें, ... जिनसे जोड़-जोड़ कर मैं आज के बच्चों के लिए पश्चाताप से उमड़ती-तड़पती रहती हूँ। कितनी चीज़ों से वंचित हैं ये। न ये खुली नाली वाले आँगन जानते हैं, न छतों पर सोना, न आँगन में देर रात तक चारपाइयाँ सटाए खुसर-पुसर बतियाना, न गर्मी में बान की चारपाई पर केवल गीली चादर बिछा कर सोने का मज़ा,  न सत्तू का स्वाद,  न कच्ची लस्सी,  न कड़े के गिलास, न चूल्हे की लकड़ियों के अंगार पर फुलाई गरमागरम पतली छोटी चपातियाँ, न भूसी में लिपटी बर्फ़ की सिल्ली से तुड़वाकर झोले में टपकाते लाई बर्फ़, जिसे झोले सहित गालों से छुआया जा सकता है ... और ज़्यादा ही शैतानी की नौबत आ जाए तो चुपके से, घर पहुँचने से पहले,  चूसा भी जा सकता है, न गर्मियों में सूर्यास्त के बाद ईंटों-जड़े आँगन में बाल्टियों से पानी फेंकना, ताकि खाना खाने और सोने के लिए आँगन में चारपाइयाँ डाली जाने से पूर्व `हवाड़' निकल जाए और ठंडा हो जाए,  न इस प्रक्रिया में जहाँ-तहाँ खड़े होकर अपने ऊपर  बाल्टी भर-भर पानी उड़ेलने, भीगने व भागने की आज़ादी का रोमांच व मज़ा।


ये तो बंद बाथरूम में नहाते हैं-  शयनकक्ष के भी भीतर।


कभी-कभी मौका लगता तो ४०-४५ फुट लंबे चिकने बरामदे में खूब पानी फैलाकर फिसला-फिसली का खेल या `खुरे' की नाली में कपड़ा ठूँस कर डेढ़ बालिश्त गहरी तलैया का मज़ा, जिसमें एक-दूसरों पर खूब पानी फेंकने, धक्का-मुक्की करने और हाथों की छपाकियों से पानी उड़ाने......हो-हल्ला करने से बाज़ नहीं आते थे हम।


मैं अपने बच्चों के लिए कलपती हूँ कि कितना कुछ नहीं देखा इन्होंने। हमारा बचपन भी इन बच्चों की विरासत में न आया।



 इन सारी कारगुज़ारियों में हैंडपंप और टोंटी, दोनों ही पानी का अवदान देते न अघाते। दोनों `खुरे' के भीतर मुख किए आमने-सामने डटे थे। इतना सब होते-हवाते `हैंडपंप' का पानी इतना ठंडा हो जाता कि एक गिलास पीने में दाँत `ठिर' (ठिठुर) जाते। आज `बोर-वेल' के पानी के `टैस्ट'  करवाने के बावजूद हाथ के नल्के की गुंजाइश नहीं मिलती, मोटर से चलाते हैं और पीने में घबराते हैं।



हमारे लिए वैसाखी कमरों से शाम की मुक्ति के पर्व मनाने आती थी। दादी जी,  जिन्हें हम `भाब्बी जी' कहकर बुलाते थे, पिछली ही रात ताकीद कर देतीं, " कुड़ियों! जे सवेरे जमना जी जाणा होए ते रातीं छेत्ती सो जाणा,  गल्लां नाँ करदियाँ रहणा। छड्ड जाणै नईं ते आप्पाँ.... जे नाँ उठ्ठियाँ ते"। ( अर्थात- " लड़कियो! यदि सुबह  यमुना जी जाना हो तो सुबह जल्दी उठ जाना,  न उठीं तो हम घर में ही छोड़ जाएँगे)|  दादी जी दुल्हन बनकर नन्हीं-सी बालिका के रूप में ही इस घर आई थीं। परिवार की सबसे बड़ी वधू। सास थी नहीं। तीन-तीन गबरू-गँवार और पेंडू देवर! पहला संबोधन इस खानदान में आते ही दादी को `भाब्बी'  का मिला। उन्हीं की देखा-देखी अपने बच्चे भी `भाब्बी' कहते। हमें झाई जी ने "भाब्बी जी" कहना जीभ पर चढ़वाया|



सुवख्ते मुँह-अंधेरे उठ जाती थीं भाब्बी जी, वड्ढे झाई जी, विजय,  दीदी (बुआ) , पम्मी, चाची जी, मैं,  कद्दू (छोटे भाई का प्यार का नाम),  और चाचा लोग। हालाँकि बिस्तर से उठने की ज़रा इच्छा नहीं होती थी। हम हर बार कहते - "असीं नईं जाणाँ" (हमें नहीं जाना)। दीदी कहतीं  - " फ़ेर रोवोगियाँ..."  (बाद में रोती रह जाओगी) .... और अपनी पतली-पतली नाज़ुक उँगलियों वाले नन्हें-नन्हें हाथों से हमें गुदगुदी करके उठा देतीं। झोलों में पिछली रात ही कपड़े वगैरह भर लिए जाते थे। हम तीनों बच्चे अधमुँदी आँखों से खीझे-खीझे नाक और गालों को ऊपर चढ़ाए ऊँह-ऊँह,  डुस-डुस करते,  हाथ पकड़े हुए, लगभग लाद-लूदकर ले जाए जाते।




 तारे अभी आकाश में होते थे। हम में से कोई पूछता - "जमना किन्नी दूर हैगी अजे" (यमुना अभी कितनी दूर और है)। भाब्बी जी डपटतीं-   "सौ वारी सखाया ए, जमना ‘जी’ आक्खी दै। चज्ज नल नाँ वी लित्ता नईं जांद्दा, ते चल्ले ने वसाखी न्हाणं" (सौ बार सिखाया है,  जमुना ‘जी’ कहते हैं,  ठीक से नाम भी नहीं लिया जाता और चले हैं वैसाखी नहाने)।




 वहाँ पहुँच डुबकियाँ लगाती भीड़, दूर दूसरी ओर नहाते पुरुष, महिलाओं-बच्चों का शोरगुल... सारी नींद उड़ा देता। धीरे-धीरे,  सहमते-सहमते हाथ पकड़कर `जमना जी'  में उतरना, पैर रखते ही रेत का दरक जाना, या पैर का धीरे-धीरे और-और अंदर गड़ना,  डराने के लिए काफी होता। ठंडा पानी छू-छू कर हमारे दुस्साहस को उकसाता। हमें तो कपड़े पहने ही पानी में उतरना होता था। ब्याहता स्त्रियाँ कंधों के नीचे बगलों में पेटीकोट बाँध लेतीं। ढँकने योग्य भाग ढँक जाता, लगभग घुटनों तक का। हम सभी घेरा बनाकर एक-दूसरे के हाथ पकड़ लेते। एक साथ पानी के भीतर जाते एक साथ उठ खड़े होते। कूल्हों तक के पानी में उतरना निरापद माना जाता था। वैसे आसपास भीड़ के कारण यों भी डर कम रहता। इतने पानी के माप में पहुँचना यानि यमुना के मध्य भाग के एक ओर का तीसरा भाग। हम लोग, यानि बच्चे, तो फिर पानी से निकलने का नाम ही नहीं लेते थे। पौ फटने को होती तो सब लोग जल्दी मचाते और हम बच्चों में से कोई तर्क देता कि अभी तो उँगलियाँ भी बूढ़ी नहीं हुई हैं। पेल-पाल कर हमें निकाला जाता। घर से फर्लांग-भर ही दूरी थी, अतः हमें वहाँ खुले में कपड़े नहीं बदलने दिए जाते थे| हम चाहते भी यही थे। उन्हीं भीगे टपकते कपड़ों में चमकीली, हल्के हरे-नीले रंग की रेत आँज कर, रेत सनी चप्पलें पहने घर लौटते।



वैसाखी के सारे आयोजनों में इतना-भर मतलब का लगता। बाकी दिन क्या पका, क्या हुआ, वह कुछ भी नहीं लगता। या याद हैं तो "जट्टा आई वसाखी"  का गीत और पंजाबी भंगडे-गिद्दे, `वारणे'  के छोटे-छोटे फ्लैश।



अब घर जाते हुए दिल्ली में बस की खिड़की से झाँकने पर यमुना का पराई-सी लगना तो दूर,  `यमुना रही ही नहीं'  दीखती है। नीचे नदी में किसी खड्डे में मैले पानी का ज़रा-सा जमाव है बस। यमुना का अपना पानी कहीं नहीं सूझता है। नगर के लिए वह `सीवर-लाइन'  फेंकने का गड्ढा-भर है। अभी कुछ साल पहले दिल्ली में एक स्कूल-बस के यमुना में गिरने से बच्चों की मौत का भयानक समाचार कई दिन की दहशत भर गया था। देश में यमुना से इतनी दूर के हिस्से में बैठे, न अपनी स्मृतियों की यमुना से यह मेल खाया, न दुर्घटना से पहले देखी यमुना के उस रूप से, जिसमें पानी नदारद था और ट्रकों से रेत लादने के लिए उन्हें सूखी नदी में उतारा गया था।



वैसाखी अब फिर आई है। मुझे अपने पैतृक नगर अमृतसर के सरोवर और जलियाँवाला बाग़ के लाश-भरे कुएँ के साथ-साथ अपनी यमुना की यादें ही आती हैं।


..... और लो, इन्हीं के सहारे वैसाखी बीत भी गई है।



यमुना का एक रूप टोकरी में कृष्ण के साथ जुड़ा है..... बालक कृष्ण को बचाने वाली यमुना।
रंग-स्थली यमुना का एक दूसरा रूप है, `
निराला'  की `यमुना के प्रति'  की यमुना का भी एक अपना रूप है
और एक रूप मेरी यादों में बसी यमुना का है।

पर मेरे बच्चों के पास यमुना की कोई याद नहीं।

 इनमें से कोई कान्हा के गीतों वाली यमुना को कैसे तलाशे?
 कैसे लिखेगा कोई ‘यमुना के प्रति’ ?


 वैसाखी की असली संजोने लायक स्मृतियाँ बनी ही नहीं इनकी। हाँ! इस युग में स्कूल-बस यमुना में गिरने से पूरी बस के बच्चे मारे अवश्य गए थे -  इतना तो अख़बार और इतिहास याद रखेंगे।




मैं नहीं जानती मरा कौन है। 
क्या यमुना? 
 क्या बच्चे? 
 क्या स्मृतियाँ? 
 क्या भविष्य?
 या बचपन?




 स्मृतिविहीन भविष्य के लिए कौन कान्हा गुँजा सकता है बंसी की धुन?  या कैसे बजेंगी झाँझरें रुनझुन?


 हमारी पाँचवी कक्षा की पाठ्य.पुस्तक वाली वह कविता तो पच्चीस वर्ष पहले से ही हटा दी गई है।


 सुनाऊँ?


" यह  कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे
  मैं भी इस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे- धीरे


 ले देती यदि मुझे बाँसुरी तुम दो पैसे वाली,
 किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली......"




....  औरों को भी याद आती होगी ना शायद ........!!


१३ अप्रैल २०००





सोमवार, 9 मार्च 2009

रंगों का पंचांग

रंगों का पंचांग


रंगों का पंचांग
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फोन के पास रखी घड़ी का समय नहीं बदला मैंने, और न ही अपनी कलाई घड़ी का। ये दोनों अब तक यहाँ साढ़े चार घंटे के अंतर पर चल रही हैं। घड़ी में दिखते समय का अर्थ सिर्फ समय नहीं होता, उससे बँध कर चलता जीवन भी होता है। एक साल हो गया पर अब भी भारत की दिनचर्या, भारत के दिवस और रात्रि की जीवनचर्या मुझे अपने साथ चलाती-उठाती हैं।


त्रोंदहाइम, यहाँ राजधानी के बाद सबसे बड़ा नगर है। शिक्षा और शोध का गढ़ भी। एक वर्ष और कुछ दिन हो गए हमें नॉर्वे आए। मार्च का महीना था वह। 5 मार्च। पिछले वर्ष भारत छोड़कर यहाँ आने से पहले के चार महीनों में जूझ-जूझ कर समेटी, या कहूँ - कुछ बेची, कुछ बाँधी अपनी गृहस्थी के व्यस्त दिनों की याद इस माह आती ही रहती है। कभी कहती - "बस, एक महीने बाद हमें साल पूरा हो जाएगा यहाँ।" या "केवल चार दिन रह गए 5 मार्च में", "आज पूरा एक साल हो गया, बस इसी समय चले थे हम" आदि आदि। और इस "इसी समय" का हिसाब फोन के पास रखी 'नॉर्डमेंडे' की घड़ी से चलता। मेरे लिए सुबह से शाम के चार, पाँच, आठ, दस उस समय बजते जब उस घड़ी पर बजते। मार्च पूरा 5 तारीख का मुख और फिर 5 तारीख की पीठ देखते, ओझल होते देखते बीत रहा है।


तापमान माइनस बाईस डिग्री सेल्सियस या माइनस चौबीस डिग्री सेल्सियस के आसपास चल रहा है। बिना ग्रिल-सुरक्षा की, बीच में से खोखली, दो दीवारों वाली मोटे पारदर्शी काँच की निर्मल खिड़कियों से दिखाई देता प्रत्येक दृश्य ऐसा है जैसे दीवार टँका चित्र। `स्नो` तो दिसंबर में ही 'आइस' बन गई थी। एक रात में तीन-चार बार बुलडोज़र आकर दरवाजों के आगे, रास्तों पर पड़ी हिम का बिछौना तहा कर सड़क के पैताने रख जाता और पंद्रह-बीस दिन में ही सड़कों के पैताने सफेद तकियों का ढेर-सा जम जाता - बर्फ के पहाड़ ! बच्चे ठंड और बर्फ के प्रभाव से बचने वाली अत्याधुनिक विशेष वेशभूषा वाले वस्त्र पहने निश्चिंत इसमें खेलते। घंटों बर्फ के पहाड़ में गुफा बनाकर घुसे रहते और उसमें बैठे खेलते। गुफा के द्वार पर 'स्नो-मैन' को विधिवत् टोपी, मफलर पहना कर दरबान-सा खड़ा किया जाता। छोटे बच्चे आमतौर पर `स्नो बोर्ड` पर बैठकर पहाड़ी से नीचे फिसलने के खेल खेलते हैं और बड़े बच्चे 'आइस-स्केटिंग' करते दिखाई देते।


छह महीने दिन और छह महीने रात वाला यह देश अभी घड़ी देखकर ही दिन-रात की चर्या करता है। दिवस-मध्य में आकाश के एक ओर थोड़ा प्रकाश उभरता और कुछ देर बाद ही लुप्त हो जाता। ये सूर्यदेव के दर्शन हैं। चारों ओर सफेदी की चादर चढ़ी रहती। मकानों की ढालू लाल छतें, पेड़, झाड़ियाँ, पौधे, सड़कें, बगीचे, भवन, ........... सब - सब ओर। केवल अंधमहासागर की काले पानी की कँटीली लहरें युवा विधवा के काले केशों की तरह लहरातीं। भारतीय परिदृश्य से जोड़कर मेरे मन में कोई कहता - "एक सफेदी की चादर ने सारे रंगों को निगला"। मार्च महीना आते-आते यह चादर थोड़ी मैली होने लगी, छीजने लगी और पाँवों में धूल दीखने लगी सफेद पहाड़ियों के।


बच्चों ने जिद करके विशेष चैनल देखने की व्यवस्था करवाई थी। यों, मन तो मेरा भी था। यहाँ टी.वी. सरकारी नियंत्रण में है। लाइसेंस लेकर भुगतान करना पड़ता है। अतिरिक्त चैनलों के लिए एक काले-से बडे़ तवे के आकार वाले यंत्र को छत पर लगवाना पड़ता है।


मैंने 'ऊब्स' से लाई डिब्बा-बंद मशरूम को तल कर शाम को कॉफी बनाई। बच्चों को बादाम-टुकड़ा वाली आइस्क्रीम से पहले आधा-आधा लीटर वाले गत्ते के लंबे डिब्बों में बंद दूध अलग-अलग दिया ही था। फ़्रीजर में से और आइस्क्रीम की मशक्कत करते बच्चों को मना करते-करते कॉफीमेकर के स्टैंड से जार उठा कर बड़े मग में कॉफी उढ़ेलनी शुरू कर ही रही थी कि फोन की अलग धुन वाली घंटी दनदना उठी और उसी से समझ लग गई कि या तो भारत में कोई याद कर रहा है या जर्मनी में। जार को तुरंत वापिस मशीन के स्टैंड पर लगा कर मैं लॉबी की ओर लपकी। यहीं पर चोंगा उठाते-उठाते बगल की सुर्ख सीट वाली आरामकुर्सी पर बैठ गई और तुरंत आदतन "हैय" कह दिया। उधर से "शुभ-शुभ बोलो जी, हाय-वाय न करो, अज्ज ते होली दियाँ वधाइयाँ लओ " सुनते ही खुशी, दु:ख, पछतावा, आश्चर्य, सदमा, झटका - जैसा कई कुछ मुझ पर एक साथ गुजर गया। दीदी ! दीदी बोल रही थीं उधर से - "ओए सोणयो ! पछाणया जे, के भुल्ल गए ओ सानूँ? गोरयाँ नाल रैह्-रैह् के ?" (पहचाना या भूल ही गए हो हमें, गोरों के साथ रह-रह कर?) मेरा तो जैसे रक्त जम गया था, या चलना भूल गया था - "हाय, अज्ज होली हैगी ? सानूँ पता ई नइँ...." (आज होली है ? हाय हमें पता भी नहीं) । दीदी बोलीं - "देस्सी त्यौहार तुहाणूँ क्यों याद रैह्ण्गे? हुण तुसी नवाँ साल, क्रिसमस ते ईस्टर वेखो" (देसी त्यौहार तुम लोगों को क्यों याद रहेंगे ? अब तुम नया साल, क्रिसमस और ईस्टर देखो") ।


बच्चे अब तक मेरे पास आ गए थे। कलाई के ऊपर हथेली को अंदर की ओर घुमाते हुए, गर्दन व भवें ऊपर उठाते हुए वे संकेत में पूछ रहे थे कि किसका फोन है ? मैंने तुरंत बिटिया को फोन दे दिया - "लो, मौसी से बात करो।" पंजाबी नहीं बोलते बच्चे। इसीलिए सब इनसे हिंदी में ही बात करते हैं। बेटी बात कर रही थी। मैंने स्पीकर फोन का बटन दबा दिया और स्वयं को जरा सम्हालने की कोशिश की। दीदी ने पूछा "आज होली खेली भइया के साथ?" बेटी ने कहा - "माँ ने हमें बताया ही नहीं कि आज होली है। मौसी! आपने भी पहले क्यों नहीं बताया ?" मैंने फोन ले लिया और पूछती रही - "बुआ जी के घर से सब लोग आए थे ? आँगन की ईंटों पर तो बाल्टियों से उढ़ेले और पिचकारियों से खींचे रंग की बौछारें कितनी सुंदर लग रही होंगी ? आँगन में दीवार-सहारे खड़ी-चारपाइयों की रस्सियाँ कई दिन तक लाल-हरी रहेंगी ?" पता नहीं किस-किस बीती घटना की फिल्म गुजरती जा रही थी मेरी आँखों के परदे के पीछे। अंत में मैंने (शायद पश्चाताप और ग्लानि के भाव से बचने के लिए भी) शिकायत की - "पिछले पार्सल में भी तुम लोगों ने पंचांग वाला कैलेंडर नहीं भेजा। मैं दिसंबर से लगातार माँग रही हूँ। दीदी ने कहा - "बहाने छड्ड। ऐत्थे कलंडर तक्क के होली खेड्दी सी ? अपणी पुन्नों ते मस्या तक दा पता नईं तैनूँ, ते घड़ी वेखदी रैह् साड्डे ऐत्थे दी। जल्दी मैनूँ होली दी वधाई दे ते सारयाँ नूँ साड्डा प्यार कैह् दईं। तेरे जीजा जी सुणण गे, ते मत्था तरेड़नगे के ओणाँ दी साली रंग लाण ताँ आ नईं सक्कदी, होली तक भुल्ल गई ए। रख रही हाँ हुण फोन, ध्यान रक्खीं बच्चयाँ दा ते अपणा" (बहाने छोड़! यहाँ कैलेंडर देख कर होली खेलती थी? अपनी पूनों और मावस तक का पता नहीं तुझे और घड़ी देखती रहती हो हमारे यहाँ की। जल्दी से अब मुझे होली की बधाई बोल और सबको हमारा प्यार कहना। तेरे जीजा जी सुनेंगे तो माथा सिकोड़कर गुस्सा होंगे कि उनकी साली रंग लगाने तो आ नहीं सकी, होली तक भूल गई। रख रही हूँ अब फोन, ध्यान रखना बच्चों का और अपना )।


बस! यह फोन क्या था, पूरा का पूरा वज्रपात था। पिछले वर्ष होली से कुछ दिन पहले ही हम यहाँ पहुँचे थे। वहाँ से बच्चे पिचकारियाँ तक पैक करवा कर यहाँ लाए थे, पर बदले हुए संसार और बदले हुए वातावरण के कौतुक में इतने निमग्न थे कि होली बीत गई । .... और इस बार भी ???


कॉफीमेकर का स्विच ऑफ करके मैंने थर्मोस्टेट वाले एयरहीटर के पास आरामकुर्सी खींच कर उस पर धम्म से अपने को गिरा दिया। मेरे होंठ खिंचे हुए थे और साँस तेज चलने लगी थी। सच ही तो बात है, क्या होली कभी कैलेंडर देख कर मनाई जाती थी ? वहाँ तो खुली आँखों, बंद आँखों, सब तरह से होली की चहल-कदमी सुनाई पड़ने लगती थी। सचमुच, यह देश बेगाना है! यहाँ के पेड़-पौधे तक बेगाने हैं! कोई मुझे नहीं बताता कि लो सुनो, सूँघो और देखो, ... फिर बताओ कि कौन आ रहा है। और वहाँ ? वहाँ घर पर तो मेरा अम्बड़ा, मेरा जामुन, शहतूत सब बौराए झूमने लगते थे। और तो और, आँगन का नीम तक मिठा जाता था, छोटी-छोटी मधुमिक्खयाँ उसे घेर कर चूमने लगती थीं, सफेद बौर से लद जाता था नीम। कच्चे, हरे, छोटे-छोटे शहतूत झूला झूलते। कोयल तो इतनी बावरी हो जाती अमराई में कि पंचम गाते न अघाती। चीख-चीख कर, मतवाली हो इतना-इतना कूकती कि कई बार खीझ हो उठती थी। टेसू के तन-बदन में अंगारे दहकने को होते, उसकी डालियों की कलाइयाँ लाल चूड़ियों से भर जातीं। पीपल पर लालिमा लिए हरे पारदर्शी पत्ते छूने पर भी शरमा जाते। अशोक की एक-से-एक अटी-सटी टहनियों के जमावड़े में कुछ नन्हीं शाखें छिप-छिपकर बातें सुनने रातों-रात प्रकट हो जातीं। गन्ने, "फिर मिलेंगे" कहकर, जा चुके होते और सरसों के लचीले बूटे सारी देह पर अलंकार धारे मेरे खेतों में स्वर्णिम आभा बिखेरते। कनकों से भरे खेत-खलिहानों में मानो स्वर्ण के अंबार भर जाते, ढेरों-ढेर गेहूँ ! ढेरों-ढेर सोना! इक्का-दुक्का बादाम के पेड़ नंगे बदन पर हरे-धुले वस्त्र धारे अपनी छत तान लेने की वृत्ति से बाज नहीं आते थे।


शहर जाने पर ताँगा रुकवा, कड़े के गिलास में मलाई मारकर लस्सी पीने का जगता लोभ तब किसी की नहीं सुनता था। सिर पर खड़ी परीक्षाएँ भला क्या चीज थीं - फाग मचने पर? बचपन में इन दिनों हम दंगल देखने जाया करते थे। लड़कियों की वहाँ जाने की मनाही को नकारने के कई गुर आजमाए जाते। लौटते हुए हर किसी की जुबान पर एक ही धुन होती - "मेरा रंग दे बसंती चोला, माए, रंग दे, ....." । थोड़ा बड़े होने पर `साहित्य-दर्पण` पढ़ाते, खाँसते- खूँसते गुरुजी ने किसी दिन - "नवपलाश पलाशवनं पुर: , मृदुलतान्तलतान्त मनोहरम् ......" जो उद्धृत किया तो कई दिन तक पलाशवन की मृदुल आग की बात करती बड़ी लड़कियों के हँसने का अर्थ ही समझ नहीं आता था। पर बड़े होने पर हम सहेलियाँ हरियाई लताओं को सींचने वाली शकुंतला का बिंब निर्माण, फाग की अमराई में कच्ची अमियों के फूटने की प्रतीक्षा में मुख ऊपर कर ताकती किसी सुंदरी सखी को देख कर, करतीं। इधर सड़कों के किनारे कच्ची पटरी पर खरबूजे और तरबूजों वाले अपनी-अपनी ढेरियों के पास रात गुजारना शुरू कर रहे होते। कुम्हार के यहाँ से खूब धुआँ उठता, और बाहर वह घुटनों तक अपनी टाँगे साने मिट्टी को रौंदता मिल जाता या चाक पर कुहनियों तक बाँहें चढ़ाए। उसकी लाठी लुकाने की शैतानी भी हमारी दिनचर्या का हिस्सा थी। जलजीरे वालों के लाल कपड़े से ढँके घड़ों वाले ठेले, सड़कों के किनारे लग जाते। बन्टे वाली सोडा बोतल का जमाना आया तो इन दिनों छिप-छिप कर उसकी आजमाईश भी शुरू कर ली जाती। यमुना में पानी बढ़ जाता था। क्यों बढ़ता था, यह बड़े होने पर ही पता लगा। बचपन में तो हम समझते थे कि होली या वैसाखी पर खूब नहाने के लिए अधिक पानी की आवश्यकता पड़ती है, इसलिए बढ़ता होगा। तब नहीं पता था कि पहाड़ की सफेद बर्फ, ठंडी बर्फ, जमी बर्फ, सूरज के प्यार भरे स्पर्श पा खुशी के मारे रो पड़ी होगी।


कटाइयाँ शुरू हो जातीं। तब थ्रेशर नहीं थे। टीले के टीले गेहूँ खेतों में खड़ा हो जाता। सिर, नाक, मुँह पर कपड़ा बाँधे औरतें छाज लेकर दोनों बाहें ऊपर उठाए गेहूँ के दानों की चादर जमीन से सिर तक तान देतीं। सोने के मोती गिरते दिखाई पड़ते। सब ओर रंग ही रंग, खुशी ही खुशी, उत्साह ही उत्साह, काम ही काम, मस्ती ही मस्ती। बैलों के गलों की घंटियों में रंगीन धागे नए सिर से पिरो कर पहनाए जाते। सफेद बैलों की देह पर कई लोग गुलाबी हथेलियों की छाप लगा देते। कितना मनोहर लगता था। हम लोग तो छोटे हो गए कपड़ों को होली की तैयारी में बाहर निकालने की गुहार गाए रहते..... और होली भी तो दस दिन, पंद्रह दिन, पहले ही से नाचना शुरू हो जाती।


हर दुकान वाला अपनी दुकान के चबूतरे पर थालियों में नुकीली रंगीन ढेरियाँ सजा कर बैठ जाता। लोहे के पत्तरे वाला गोल गहरा चम्मच एक ओर पड़ा होता। अबीर की टुकिड़याँ चाँदी-सी चमकतीं। छोटी से लेकर बड़ी तक अनेक चटक रंगों की पिचकारियाँ दुकान में ऊपर टँगी होतीं। शादी के बाद, बच्चों ने भी कमोबेश ऐसा ही फागुन देखा। ये नहीं देख पाए तो केवल खेत और बैल। दीदी ब्याह कर मथुरा गईं तो हमारे लिए कौतूहल बरपा गया, जब उन्होंने आकर बताया कि किस तरह उनके ननदोई को पहली होली पर मथुरा में इनकी सखियों-साथिनों ने लाठियों से घेर कर पर्व मनाया था।


मैं ब्याह कर बंबई आई। जब तक बच्चे छोटे थे, तब तक होली में भीगने की मनाही रही कि दूध पीने वाले बच्चे को ठंड लग जाएगी। बच्चे बड़े हो गए तो बाल्टी भर-भर कर रंग बनाकर उन्हें देती रहती। वे 'पार्किंग एरिया' के आगे आपस ही में खेल लेते, हम फोटोग्राफी कर किलकते। बंबई में रंगपंचमी को रंग खेलने का जोर होता है। वहाँ पास-पड़ोस के साथ मिलकर खेलने का अवसर न हमें मिला, न बच्चों को। एक बार सामने की बाल्कनी वाले फ्लैट में एक सिंधी परिवार रहने आया। उन्हें होली वाले दिन रंग में पुते देखा था तो अपने अकेले पड़ जाने के मलाल को थोड़ी राहत मिली थी, पर जब बच्चों ने जोर से आवाज देकर सामने उंगली करके दिखाया तो बड़ी भाभी के ब्लाउज़ में आगे की ओर शराब की बोतल उढ़ेलते देवर और सारे हँसते रिश्तेदारों को देख घिन भर आई थी।


आज होली से जुड़ी कोई अच्छी-बुरी घटना नहीं घट रही मेरे आस-पास। यहाँ के पेड़-पौधे, लोग, वातावरण ......... कोई भी उन होलियों का साक्षी नहीं है। ये तो उनकी नकल भरना चाहें, तो भी नहीं भर सकते। मैं याद करूँ तो क्या-क्या ? और भूलँ तो क्या-क्या ?


बच्चों को क्या कहकर, कैसे, और कितने दिन, कितने वर्ष बहलाना पड़ेगा- कुछ पता नहीं। मेरी होलियों की यादें बहलाने के लिए और उस बहाने बच्चों को बहलाने के लिए, ठीक यही रहेगा कि आज फिर से वे सारे दृश्य शब्द-शब्द कर इनसे बाँटे जाएँ, जो वर्षों तक हमने जिए हैं। 


और हाँ, जाकर 'क्षॉपमैन्सगाटे' में देखते हैं, कहीं विदेशी पिचकारियाँ और रंग मिल जाएँ ......... तो। 


यहाँ नॉर्वे में भारत से साढ़े पाँच घंटे बाद होली बीतेगी। 

अभी भी समय है ! बहुत देर तो नहीं हुई ..............




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गुरुवार, 12 जून 2008

रंगों का पंचांग (कहानी)




रंगों का पंचांग






फोन के पास रखी घड़ी का समय नहीं बदला मैंने, और न ही अपनी कलाई घड़ी का। ये दोनों अब तक यहाँ साढ़े पाँच घंटे के अंतर पर चल रही हैं। घड़ी में दिखते समय का अर्थ सिर्फ समय नहीं होता, उससे बँध कर चलता जीवन भी होता है। एक साल हो गया पर अब भी भारत की दिनचर्या, भारत के दिवस और रात्रि की जीवनचर्या मुझे अपने साथ चलाती-उठाती हैं।

त्रोंदहाइम, यहाँ राजधानी के बाद सबसे बड़ा नगर है। शिक्षा और शोध का गढ़ भी। एक वर्ष और कुछ दिन हो गए हमें नॉर्वे आए। मार्च का महीना था वह। 5 मार्च। पिछले वर्ष भारत छोड़कर यहाँ आने से पहले के चार महीनों में जूझ-जूझ कर समेटी, या कहूँ - कुछ बेची, कुछ बाँधी अपनी गृहस्थी के व्यस्त दिनों की याद इस माह आती ही रहती है। कभी कहती - "बस, एक महीने बाद हमें साल पूरा हो जाएगा यहाँ।" या "केवल चार दिन रह गए 5 मार्च में", "आज पूरा एक साल हो गया, बस इसी समय चले थे हम" आदि आदि। और इस "इसी समय" का हिसाब फोन के पास रखी 'नॉर्डमेंडे' की घड़ी से चलता। मेरे लिए सुबह से शाम के चार, पाँच, आठ, दस उस समय बजते जब उस घड़ी पर बजते। मार्च पूरा 5 तारीख का मुख और फिर 5 तारीख की पीठ देखते, ओझल होते देखते बीत रहा है।

तापमान माइनस बाईस डिग्री सेल्सियस या माइनस चौबीस डिग्री सेल्सियस के आसपास चल रहा है। बिना ग्रिल-सुरक्षा की, बीच में से खोखली, दो दीवारों वाली मोटे पारदर्शी काँच की निर्मल खिड़कियों से दिखाई देता प्रत्येक दृश्य ऐसा है जैसे दीवार टँका चित्र। `स्नो` तो दिसंबर में ही 'आइस' बन गई थी। एक रात में तीन-चार बार बुलडोज़र आकर दरवाजों के आगे, रास्तों पर पड़ी हिम का बिछौना तहा कर सड़क के पैताने रख जाता और पंद्रह-बीस दिन में ही सड़कों के पैताने सफेद तकियों का ढेर-सा जम जाता - बर्फ के पहाड़ ! बच्चे ठंड और बर्फ के प्रभाव से बचने वाली अत्याधुनिक विशेष वेशभूषा वाले वस्त्र पहने निश्चिंत इसमें खेलते। घंटों बर्फ के पहाड़ में गुफा बनाकर घुसे रहते और उसमें बैठे खेलते। गुफा के द्वार पर 'स्नो-मैन' को विधिवत् टोपी, मफलर पहना कर दरबान-सा खड़ा किया जाता। छोटे बच्चे आमतौर पर `स्नो बोर्ड` पर बैठकर पहाड़ी से नीचे फिसलने के खेल खेलते हैं और बड़े बच्चे 'आइस-स्केटिंग' करते दिखाई देते।

छह महीने दिन और छह महीने रात वाला यह देश अभी घड़ी देखकर ही दिन-रात की चर्या करता है। दिवस-मध्य में आकाश के एक ओर थोड़ा प्रकाश उभरता और कुछ देर बाद ही लुप्त हो जाता। ये सूर्यदेव के दर्शन हैं। चारों ओर सफेदी की चादर चढ़ी रहती। मकानों की ढालू लाल छतें, पेड़, झाड़ियाँ, पौधे, सड़कें, बगीचे, भवन, ........... सब - सब ओर। केवल अंधमहासागर की काले पानी की कँटीली लहरें युवा विधवा के काले केशों की तरह लहरातीं। भारतीय परिदृश्य से जोड़कर मेरे मन में कोई कहता - "एक सफेदी की चादर ने सारे रंगों को निगला"। मार्च महीना आते-आते यह चादर थोड़ी मैली होने लगी, छीजने लगी और पाँवों में धूल दीखने लगी सफेद पहाड़ियों के।

बच्चों ने जिद करके विशेष चैनल देखने की व्यवस्था करवाई थी। यों, मन तो मेरा भी था। यहाँ टी।वी. सरकारी नियंत्रण में है। लाइसेंस लेकर भुगतान करना पड़ता है। अतिरिक्त चैनलों के लिए एक काले-से बडे़ तवे के आकार वाले यंत्र को छत पर लगवाना पड़ता है।

मैंने 'ऊब्स' से लाई डिब्बा-बंद मशरूम को तल कर शाम को कॉफी बनाई। बच्चों को बादाम-टुकड़ा वाली आइस्क्रीम से पहले आधा-आधा लीटर वाले गत्ते के लंबे डिब्बों में बंद दूध अलग-अलग दिया ही था। फ़्रीजर में से और आइस्क्रीम की मशक्कत करते बच्चों को मना करते-करते कॉफीमेकर के स्टैंड से जार उठा कर बड़े मग में कॉफी उढ़ेलनी शुरू कर ही रही थी कि फोन की अलग धुन वाली घंटी दनदना उठी और उसी से समझ लग गई कि या तो भारत में कोई याद कर रहा है या जर्मनी में। जार को तुरंत वापिस मशीन के स्टैंड पर लगा कर मैं लॉबी की ओर लपकी। यहीं पर चोंगा उठाते-उठाते बगल की सुर्ख सीट वाली आरामकुर्सी पर बैठ गई और तुरंत आदतन "हैय" कह दिया। उधर से "शुभ-शुभ बोलो जी, हाय-वाय न करो, अज्ज ते होली दियाँ वधाइयाँ लओ " सुनते ही खुशी, दु:ख, पछतावा, आश्चर्य, सदमा, झटका - जैसा कई कुछ मुझ पर एक साथ गुजर गया। दीदी ! दीदी बोल रही थीं उधर से - "ओए सोणयो ! पछाणया जे, के भुल्ल गए ओ सानूँ? गोरयाँ नाल रैह्-रैह् के ?" (पहचाना या भूल ही गए हो हमें, गोरों के साथ रह-रह कर?) मेरा तो जैसे रक्त जम गया था, या चलना भूल गया था - "हाय, अज्ज होली हैगी ? सानूँ पता ई नइँ...." (आज होली है ? हाय हमें पता भी नहीं) । दीदी बोलीं - "देस्सी त्यौहार तुहाणूँ क्यों याद रैह्ण्गे? हुण तुसी नवाँ साल, क्रिसमस ते ईस्टर वेखो" (देसी त्यौहार तुम लोगों को क्यों याद रहेंगे ? अब तुम नया साल, क्रिसमस और ईस्टर देखो") ।

बच्चे अब तक मेरे पास आ गए थे। कलाई के ऊपर हथेली को अंदर की ओर घुमाते हुए, गर्दन व भवें ऊपर उठाते हुए वे संकेत में पूछ रहे थे कि किसका फोन है ? मैंने तुरंत बिटिया को फोन दे दिया - "लो, मौसी से बात करो।" पंजाबी नहीं बोलते बच्चे। इसीलिए सब इनसे हिंदी में ही बात करते हैं। बेटी बात कर रही थी। मैंने स्पीकर फोन का बटन दबा दिया और स्वयं को जरा सम्हालने की कोशिश की। दीदी ने पूछा "आज होली खेली भइया के साथ?" बेटी ने कहा - "माँ ने हमें बताया ही नहीं कि आज होली है। मौसी! आपने भी पहले क्यों नहीं बताया ?" मैंने फोन ले लिया और पूछती रही - "बुआ जी के घर से सब लोग आए थे ? आँगन की ईंटों पर तो बाल्टियों से उढ़ेले और पिचकारियों से खींचे रंग की बौछारें कितनी सुंदर लग रही होंगी ? आँगन में दीवार-सहारे खड़ी-चारपाइयों की रस्सियाँ कई दिन तक लाल-हरी रहेंगी ?" पता नहीं किस-किस बीती घटना की फिल्म गुजरती जा रही थी मेरी आँखों के परदे के पीछे। अंत में मैंने (शायद पश्चाताप और ग्लानि के भाव से बचने के लिए भी) शिकायत की - "पिछले पार्सल में भी तुम लोगों ने पंचांग वाला कैलेंडर नहीं भेजा। मैं दिसंबर से लगातार माँग रही हूँ। दीदी ने कहा - "बहाने छड्ड। ऐत्थे कलंडर तक्क के होली खेड्दी सी ? अपणी पुन्नों ते मस्या तक दा पता नईं तैनूँ, ते घड़ी वेखदी रैह् साड्डे ऐत्थे दी। जल्दी मैनूँ होली दी वधाई दे ते सारयाँ नूँ साड्डा प्यार कैह् दईं। तेरे जीजा जी सुणण गे, ते मत्था तरेड़नगे के ओणाँ दी साली रंग लाण ताँ आ नईं सक्कदी, होली तक भुल्ल गई ए। रख रही हाँ हुण फोन, ध्यान रक्खीं बच्चयाँ दा ते अपणा" (बहाने छोड़! यहाँ कैलेंडर देख कर होली खेलती थी? अपनी पूनों और मावस तक का पता नहीं तुझे और घड़ी देखती रहती हो हमारे यहाँ की। जल्दी से अब मुझे होली की बधाई बोल और सबको हमारा प्यार कहना। तेरे जीजा जी सुनेंगे तो माथा सिकोड़कर गुस्सा होंगे कि उनकी साली रंग लगाने तो आ नहीं सकी, होली तक भूल गई। रख रही हूँ अब फोन, ध्यान रखना बच्चों का और अपना )।

बस! यह फोन क्या था, पूरा का पूरा वज्रपात था। पिछले वर्ष होली से कुछ दिन पहले ही हम यहाँ पहुँचे थे। वहाँ से बच्चे पिचकारियाँ तक पैक करवा कर यहाँ लाए थे, पर बदले हुए संसार और बदले हुए वातावरण के कौतुक में इतने निमग्न थे कि होली बीत गई । .... और इस बार भी???

कॉफीमेकर का स्विच ऑफ करके मैंने थर्मोस्टेट वाले एयरहीटर के पास आरामकुर्सी खींच कर उस पर धम्म से अपने को गिरा दिया। मेरे होंठ खिंचे हुए थे और साँस तेज चलने लगी थी। सच ही तो बात है, क्या होली कभी कैलेंडर देख कर मनाई जाती थी ? वहाँ तो खुली आँखों, बंद आँखों, सब तरह से होली की चहल-कदमी सुनाई पड़ने लगती थी। सचमुच, यह देश बेगाना है! यहाँ के पेड़-पौधे तक बेगाने हैं! कोई मुझे नहीं बताता कि लो सुनो, सूँघो और देखो, ... फिर बताओ कि कौन आ रहा है। और वहाँ ? वहाँ घर पर तो मेरा अम्बड़ा, मेरा जामुन, शहतूत सब बौराए झूमने लगते थे। और तो और, आँगन का नीम तक मिठा जाता था, छोटी-छोटी मधुमिक्खयाँ उसे घेर कर चूमने लगती थीं, सफेद बौर से लद जाता था नीम। कच्चे, हरे, छोटे-छोटे शहतूत झूला झूलते। कोयल तो इतनी बावरी हो जाती अमराई में कि पंचम गाते न अघाती। चीख-चीख कर, मतवाली हो इतना-इतना कूकती कि कई बार खीझ हो उठती थी। टेसू के तन-बदन में अंगारे दहकने को होते, उसकी डालियों की कलाइयाँ लाल चूड़ियों से भर जातीं। पीपल पर लालिमा लिए हरे पारदर्शी पत्ते छूने पर भी शरमा जाते। अशोक की एक-से-एक अटी-सटी टहनियों के जमावड़े में कुछ नन्हीं शाखें छिप-छिपकर बातें सुनने रातों-रात प्रकट हो जातीं। गन्ने, "फिर मिलेंगे" कहकर, जा चुके होते और सरसों के लचीले बूटे सारी देह पर अलंकार धारे मेरे खेतों में स्वर्णिम आभा बिखेरते। कनकों से भरे खेत-खलिहानों में मानो स्वर्ण के अंबार भर जाते, ढेरों-ढेर गेहूँ ! ढेरों-ढेर सोना! इक्का-दुक्का बादाम के पेड़ नंगे बदन पर हरे-धुले वस्त्र धारे अपनी छत तान लेने की वृत्ति से बाज नहीं आते थे।

शहर जाने पर ताँगा रुकवा, कड़े के गिलास में मलाई मारकर लस्सी पीने का जगता लोभ तब किसी की नहीं सुनता था। सिर पर खड़ी परीक्षाएँ भला क्या चीज थीं - फाग मचने पर? बचपन में इन दिनों हम दंगल देखने जाया करते थे। लड़कियों की वहाँ जाने की मनाही को नकारने के कई गुर आजमाए जाते। लौटते हुए हर किसी की जुबान पर एक ही धुन होती - "मेरा रंग दे बसंती चोला, माए, रंग दे, ....." । थोड़ा बड़े होने पर `साहित्य-दर्पण` पढ़ाते, खाँसते- खूँसते गुरुजी ने किसी दिन - "नवपलाश पलाशवनं पुर: , मृदुलतान्तलतान्त मनोहरम् ......" जो उद्धृत किया तो कई दिन तक पलाशवन की मृदुल आग की बात करती बड़ी लड़कियों के हँसने का अर्थ ही समझ नहीं आता था। पर बड़े होने पर हम सहेलियाँ हरियाई लताओं को सींचने वाली शकुंतला का बिंब निर्माण, फाग की अमराई में कच्ची अमियों के फूटने की प्रतीक्षा में मुख ऊपर कर ताकती किसी सुंदरी सखी को देख कर, करतीं। इधर सड़कों के किनारे कच्ची पटरी पर खरबूजे और तरबूजों वाले अपनी-अपनी ढेरियों के पास रात गुजारना शुरू कर रहे होते। कुम्हार के यहाँ से खूब धुआँ उठता, और बाहर वह घुटनों तक अपनी टाँगे साने मिट्टी को रौंदता मिल जाता या चाक पर कुहनियों तक बाँहें चढ़ाए। उसकी लाठी लुकाने की शैतानी भी हमारी दिनचर्या का हिस्सा थी। जलजीरे वालों के लाल कपड़े से ढँके घड़ों वाले ठेले, सड़कों के किनारे लग जाते। बन्टे वाली सोडा बोतल का जमाना आया तो इन दिनों छिप-छिप कर उसकी आजमाईश भी शुरू कर ली जाती। यमुना में पानी बढ़ जाता था। क्यों बढ़ता था, यह बड़े होने पर ही पता लगा। बचपन में तो हम समझते थे कि होली या वैसाखी पर खूब नहाने के लिए अधिक पानी की आवश्यकता पड़ती है, इसलिए बढ़ता होगा। तब नहीं पता था कि पहाड़ की सफेद बर्फ, ठंडी बर्फ, जमी बर्फ, सूरज के प्यार भरे स्पर्श पा खुशी के मारे रो पड़ी होगी।

कटाइयाँ शुरू हो जातीं। तब थ्रेशर नहीं थे। टीले के टीले गेहूँ खेतों में खड़ा हो जाता। सिर, नाक, मुँह पर कपड़ा बाँधे औरतें छाज लेकर दोनों बाहें ऊपर उठाए गेहूँ के दानों की चादर जमीन से सिर तक तान देतीं। सोने के मोती गिरते दिखाई पड़ते। सब ओर रंग ही रंग, खुशी ही खुशी, उत्साह ही उत्साह, काम ही काम, मस्ती ही मस्ती। बैलों के गलों की घंटियों में रंगीन धागे नए सिर से पिरो कर पहनाए जाते। सफेद बैलों की देह पर कई लोग गुलाबी हथेलियों की छाप लगा देते। कितना मनोहर लगता था। हम लोग तो छोटे हो गए कपड़ों को होली की तैयारी में बाहर निकालने की गुहार गाए रहते ( और होली भी तो दस दिन, पंद्रह दिन, पहले ही से नाचना शुरू हो जाती।

हर दुकान वाला अपनी दुकान के चबूतरे पर थालियों में नुकीली रंगीन ढेरियाँ सजा कर बैठ जाता। लोहे के पत्तरे वाला गोल गहरा चम्मच एक ओर पड़ा होता। अबीर की टुकिड़याँ चाँदी-सी चमकतीं। छोटी से लेकर बड़ी तक अनेक चटक रंगों की पिचकारियाँ दुकान में ऊपर टँगी होतीं। शादी के बाद, बच्चों ने भी कमोबेश ऐसा ही फागुन देखा। ये नहीं देख पाए तो केवल खेत और बैल। दीदी ब्याह कर मथुरा गईं तो हमारे लिए कौतूहल बरपा गया, जब उन्होंने आकर बताया कि किस तरह उनके ननदोई को पहली होली पर मथुरा में इनकी सखियों-साथिनों ने लाठियों से घेर कर पर्व मनाया था।

मैं ब्याह कर बंबई आई। जब तक बच्चे छोटे थे, तब तक होली में भीगने की मनाही रही कि दूध पीने वाले बच्चे को ठंड लग जाएगी। बच्चे बड़े हो गए तो बाल्टी भर-भर कर रंग बनाकर उन्हें देती रहती। वे 'पार्किंग एरिया' के आगे आपस ही में खेल लेते, हम फोटोग्राफी कर किलकते। बंबई में रंगपंचमी को रंग खेलने का जोर होता है। वहाँ पास-पड़ोस के साथ मिलकर खेलने का अवसर न हमें मिला, न बच्चों को। एक बार सामने की बाल्कनी वाले फ्लैट में एक सिंधी परिवार रहने आया। उन्हें होली वाले दिन रंग में पुते देखा था तो अपने अकेले पड़ जाने के मलाल को थोड़ी राहत मिली थी, पर जब बच्चों ने जोर से आवाज देकर सामने उंगली करके दिखाया तो बड़ी भाभी के ब्लाउज़ में आगे की ओर शराब की बोतल उढ़ेलते देवर और सारे हँसते रिश्तेदारों को देख घिन भर आई थी।

आज होली से जुड़ी कोई अच्छी-बुरी घटना नहीं घट रही मेरे आस-पास। यहाँ के पेड़-पौधे, लोग, वातावरण ......... कोई भी उन होलियों का साक्षी नहीं है। ये तो उनकी नकल भरना चाहें, तो भी नहीं भर सकते। मैं याद करूँ तो क्या-क्या ? और भूलँ तो क्या-क्या ?

बच्चों को क्या कहकर, कैसे, और कितने दिन, कितने वर्ष बहलाना पड़ेगा- कुछ पता नहीं। मेरी होलियों की यादें बहलाने के लिए और उस बहाने बच्चों को बहलाने के लिए, ठीक यही रहेगा कि आज फिर से वे सारे दृश्य शब्द-शब्द कर इनसे बाँटे जाएँ, जो वर्षों तक हमने जिए हैं। और हाँ, जाकर 'क्षॉपमैन्सगाटे' में देखते हैं, कहीं विदेशी पिचकारियाँ और रंग मिल जाएँ ......... तो। यहाँ नॉर्वे में भारत से साढ़े पाँच घंटे बाद होली बीतेगी। अभी भी समय है !!..............
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