Saturday, October 13, 2012

संस्कृत : छंदविज्ञान, सैद्धांतिकी, काव्यशास्त्र और कबीर

संस्कृत : छंदविज्ञान, सैद्धांतिकी और कबीर  :  कविता वाचक्नवी


बहुत बचपन में ही पूरा छन्दशास्त्र पढ़ डालने के अनगिन लाभों की याद बरबस ही बनी रहती है। आज वह सैद्धांतिकी तो भले याद नहीं किन्तु कविता रचते समय उस सैद्धांतिकी का नियमन हर समय कलम की नोक को साधता आ रहा है। 


बचपन के उन दिनों में गुरुजी से निरुक्त पढ़ना कभी-कभी बड़ा कष्टसाध्य और कभी बड़ा रोचक लगा करता था। हजारों प्रसंग आज भी मन में करवट लिया करते हैं और किसी रुष्क विषय को कैसे सरस बनाया जा सकता है, यह स्मरण दिलाए रखते हैं। 


परंतु उसके पश्चात् जैसे ही लौकिक संस्कृत का छन्दशास्त्र पढ़ने लगे तो अलग तरह का आनंद आने लगा। पूरे छंदविज्ञान की आधार गणना को एक श्लोक में पढ़ लेने के बाद छन्दशास्त्र हस्तामलकवत् लगने लगा था। वह श्लोक आज भी कंठस्थ है जिसने सारी गणना साधना सिखा दिया था - 


मस्त्रिगुरुस्त्रिलघुश्च नकारो ।
भादिगुरुः पुनरादिलघुर्यः ।
जो गुरुमध्यगतो रलमध्यः
सोऽन्तगुरुः कथितोऽन्तलघुस्तः ॥


गत दिनों एक सज्जन ने इस बात पर आपत्ति की व तर्क देने लगे और कहने लगे कि 'जो भाषा आम आदमी की समझ में आ सके, उसी में अभिव्यक्ति हो तो मन को सुन्दर लगता है,और बरसों से अब रचनाकार, इसी सरलता की तरफ चल पड़े है। पक्का तो पता नही , लेकिन अमीर खुसरों और तुलसीदास जी आदि ने सरल, आम आदमी की ही भाषा को अपनाया और जनता में प्रसिद्ध भी हुये। कालिदास, भास , आदि कवि महान तो अवश्य है, मगर स्कूल--- कोलिज और पुस्तकालय तक सीमित हैं' । 


अब उन्हें कौन समझाए कि जो जिसे समझता है या समझने के लिए कुछ यत्न करता है, वही उसे समझने लगता है। बिना पढ़े और समझे तो लोगों को अब तुलसी और रसखान तक समझ नहीं आते। कल को वे इसी तर्क से ही उन्हें भी आऊटडेटेड करार दे देंगे और उन्हें भी स्कूल कॉलेज और पुस्तकालय तक सीमित रह जाने वाले घोषित कर देंगे, तब क्या कीजिएगा? किस किस को तज कर 'अपडेटेड' और 'अप टू डेट' बनेंगे हम ? सरलता के नाम पर तो सब से सरल कुछ भी न जानना है, तो फिर सारा ज्ञान विज्ञान भी क्यों पढ़ना ? उसे पढ़ना कोई सरल है क्या ? लोगों को अब हिन्दी भी अंग्रेजी मिलाकर बोली जाने पर समझ आती है। तब तो हिन्दी भी ठंडे बस्ते में डाल दी जाए। कुछ मेरे जैसे बेवकूफ लोगों को हमारे हाल पर  चीजों को जिंदा रखने की अलख जगाने के लिए छोड़ दें। 


इतने पर ही मामला ठंडा नहीं हुआ। उनका साथ देने कुछ और सज्जन फिर कबीर को घसीटने लगे कि 'कबीर तो पढे-लिखे नहीं थे, ये सब बेकार की चीजें हैं, असली चीज अपने मन के भाव होती है, क्या जरूरत है शास्त्र-वास्त्र की, आज के समय में कौन शास्त्र पढ़ता है और बिना शास्त्र जाने भी इतने कवि आदि हैं। कविता के लिए यह सब जरूरी चीजें नहीं हैं। बेकार है यह सब ' आदि आदि। 


उन्हें कैसे समझाया जा सके कि पढ़ा तो आज लाखों कवियों ने काव्यशास्त्र भी नहीं, या अलंकारशास्त्र भी नहीं । हजारों-लाखों लोगों ने आलोचना की प्रविधियाँ नहीं पढीं। इससे क्या आलोचना-शास्त्र को पढ़ने वाले अपराधी हो गए ? या विश्वविद्यालयों में उसका अध्ययन-अध्यापन बंद करवा दिया जाना चाहिए ? या पुस्तकों को आग के हावाले कर देना चाहिए और लिखने-पढ़ने पर प्रतिबंध लगवा देना चाहिए ? लोगों द्वारा किसी विषय के न पढ़ने से किसी ज्ञान की उपादेयता कम हो जाती तो संसार के सारे ज्ञान को तिलांजलि दे देनी चाहिए कि अमुक का जीवन उक्त विषय के ज्ञान के बिना भी मजे से कट गया। किसी ने कुछ नहीं पढ़ा तो उनके न पढ़ने से पढ़ने वाला दोषी कैसे हो गया ? अजब तर्क हैं ऐसे लोगों के ! किसी चीज को न पढ़ कर पढ़ने वालों या ज्ञान को ही धिक्कारा जाए .... क्या यही महानता है !! अहम् की भी पराकाष्ठा होनी  चाहिए और अहम भी कैसा !!  सही कहा गया है कि अज्ञानी का अहम् बहुत बड़ा होता है। 


 अत्याधुनिक पाश्चात्य जगत तक में अभी भी संगीत के शास्त्र से लेकर सब विद्याओं के शास्त्रों का मनोयोगपूर्वक अध्ययन-अध्यापन होता है और यह नया युग तो विधिवत् पारंगतता (स्पेशलाईज़ेशन) प्राप्त करने का है, लोग विषय की पारंगतता (स्पेशलाईज़ेशन) प्राप्त करने के लिए संबन्धित विषय की सैद्धांतिकी पर जीवन लगा देते हैं आजकल। ऐसे में हिन्दी साहित्य के प्रबुद्ध कहे जाने वालों की इस मानसिकता पर क्षोभ ही किया जा सकता है। वस्तुतः कष्ट सारा संस्कृत को लेकर है। इसलिए इनके तर्क से तो नागार्जुन और त्रिलोचन भी निरस्त हो जाएँ। मूलतः यह हिन्दी-साहित्य की एक बड़ी प्रवृत्ति के रूप में समाज में पनप रहा नया रोग है। लोग 'भाषा समझ नहीं आती' के तर्क से हमारी भाषाओं की हत्या कर रहे हैं, 'ग्रन्थ समझ नहीं आते' के तर्क से भारतीय ज्ञान-विज्ञान को खारिज करने की साजिश कर रहे हैं। अपना स्तर बढ़ाने की अपेक्षा चीजों के सरलीकरण के नाम पर हर चीज की हत्या करने को सहन करना उपयुक्त नहीं। 


इससे भी अधिक हास्यास्पद बात यह कि लोग चीजों को बिना पढ़े उन्हें अनावश्यक, घटिया, निरर्थक व महत्वहीन सिद्ध करने में दौड़े रहते हैं और उन्हें खारिज करने में जुट जाते हैं। इस से यही प्रमाणित होता है कि लोग अपने न पढ़े होने को भी अपनी विशिष्टता प्रमाणित करने की जिद्द इसलिए करते हैं क्योंकि मनोविज्ञान के अनुसार वे किसी कुंठा (कॉम्प्लेक्स) से ग्रस्त होते हैं। ऊपर से मजे की बात यह है कि ले-दे कर ऐसे लोगों को कबीर ही याद आते हैं, अर्थात् एक तरह से ये लोग स्वयं को कबीर सिद्ध करना चाहते हैं। लोगों द्वारा इस प्रकार अपनी तुलना कबीर से करते हुए रत्ती-भर भी संकोच नहीं करना मुझे सदा हैरत में डालता रहा है कि क्या खाकर लोग स्वयं को कबीर समझते हैं ? कबीर क्या अपढ़ या कुपढ़ थे जो ज्ञान को निरस्त करने वाले ऐसे लोग कबीर को सदा ज्ञान के विरोध का प्रतीक मान कर अपने स्वार्थ के लिए प्रयोग करते हैं? कबीर की 'मसि-कागद न छूने और कलम न पकड़ने' की बात से इन लोगों ने यह कैसे प्रमाणित कर दिया कि कबीर अज्ञानी थे या ज्ञानविरोधी थे, या अपढ़ थे ? कबीर के काव्य में रत्ती-भर भी छंद- मात्रा का दोष ढूँढ कर दिखाएँ तो सही ! कबीर का ज्ञान का स्रोत भले किताबें नहीं थीं, किन्तु उन्होंने अपने गुरुओं से जो शिक्षा पाई, उसका क्या कोई मोल नहीं है ? क्या कबीर ने उस शिक्षा को गाली दी, नकारा या निरस्त किया ? 

empathy
किसी भी विद्या के शास्त्र और ज्ञान अथवा सैद्धांतिकी को खारिज / निरस्त करने वाले तर्कों और तार्किकों  का दंभ देखकर यह तो निस्संदेह पता चलता ही है कि दंभ का स्रोत कहाँ व क्या होता है। ज्ञान को खारिज करना निस्संदेह सबको दम्भी ही बनाता है।


छंदविज्ञान की उपर्युक्त चार पंक्तियाँ जो उद्धृत की थीं; उन पंक्तियों का हिन्दी में भी अर्थ बताने की इच्छा कुछ मित्रों ने संदेश भेजकर व्यक्त की है। अतः इस बहाने मुझे भी अपनी स्मृतियों को व पाई हुई सीख को इन पंक्तियों के माध्यम से दुहराने का अवसर मिल रहा है। अतः थोड़ा संक्षेप में इन पंक्तियों के बारे में - 

काव्यशास्त्र के अनुसार विविध छंदों में विविध मात्राओं ( जिन्हें वहाँ लघु व दीर्घ कहा जाता है ) का नियोजन होता है। यों तो प्रत्येक काव्यरचना में वही दो प्रकार की मात्राएँ होती हैं, किन्तु संस्कृत में इन दो मात्राओं को तीन-तीन के अलग अलग प्रकार के 'सेट' (वर्गों ) में बाँट दिया गया है (मात्राओं को अलग अलग ढंग से प्रयोग करने के निर्धारित इन वर्गों को गण कहा जाता है) तो कई गण बने हुए हैं, जैसे यगण मगण तगण इत्यादि। ये यगण मगण तगण इत्यादि जिस क्रम से रचना में प्रयोग होते हैं, वही क्रम तय करता है कि उक्त रचना में उक्त उक्त छंद है। संगीत में जैसे राग रागिनियाँ होते हैं कुछ वैसा ही समझ लीजिए। 


अब एक उदाहरण देती हूँ। जैसे, एक छंद है 'इंद्रवज्रा ' । 'इंद्रवज्रा ' छन्द के प्रत्येक चरण में 11 -11 वर्ण होते हैं। ये 11 -11 वर्ण (यगण तगण मगण आदि ) जब, जहाँ, जिस रचना में एक निर्धारित क्रम मे आएँगे, वह रचना इंद्रवज्रा छंद की होगी। इस छंद की परिभाषा है - " स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः " अर्थात् इन्द्रवज्रा के प्रत्येक चरण में दो तगण, एक जगण और दो गुरु के क्रम से वर्ण होते हैं। 


अब छंद के इस लक्षण (परिभाषा) का पता होने के बावजूद किसी को भी 'वर्ण' को पहचानना कठिन हो सकता है कि तगण किसे कहते हैं और जगण आदि क्या होता है। इसलिए पूरे छंदविज्ञान के आधार को ऊपर  उल्लिखित चार पंक्तियों में समाहित कर दिया गया है। ( उन पंक्तियों की व्याख्या लिखने से पहले यह सब भूमिका लिखना अनिवार्य था ताकि बात पूरी स्पष्ट हो सके )। 


अब आते हैं उन चार पंक्तियों के शाब्दिक अर्थ पर। उनका अर्थ यह है कि -

म (मगण ) में तीन गुरु, तीन लघु न (नगण) में, भ (भगण) के आदि में गुरु (अर्थात् बाकी दो लघु), य (यगण) के आदि में लघु (अर्थात् बाकी दो गुरु), ज (जगण) के मध्य में गुरु (अर्थात् बाकी दोनों ओर लघु), र (रगण) के मध्य में ल (लघु) (अर्थात् बाकी दोनों ओर गुरु, स (सगण) के अंत में गुरु (अर्थात् उस से पूर्व दो लघु), त (तगण) के अंत में लघु (अर्थात् उस से पूर्व दो गुरु)। 

( 'ऽ' यह चिह्न गुरु मात्रा का है ) व '।' यह चिह्न लघु मात्रा का है ) 

म ऽऽऽ 
न ॥। 
भ ऽ॥
य ।ऽऽ 
ज । ऽ।
र ऽ। ऽ 
स ॥ ऽ 
त ऽऽ। 

अतः उन चार पंक्तियों में सारे गणों की गणना व परिभाषा अद्भुत ढंग से समझा/कह दी गई है। उसे याद कर लेते ही प्रत्येक छंद की गुत्थी सुलझ जाती है। "यमाताराजभानसलगम्" कह कर इसे और भी संक्षिप्त बना दिया गया किन्तु इस अति संक्षिप्तीकरण में गणना करनी पड़ती है, जबकि उपर्युक्त पंक्तियों में अंकों व गणना को भी साथ-साथ दे दिया गया है। जिसे जो विधि अनुकूल लगे वह उसे अपना सकता है। 

छंद और संगीत का सौंदर्य सृष्टि रहने तक समाप्त नहीं होने वाला। संस्कृत के आचार्यों ने इसके गूढ़ रहस्यों को सरलता से समझ में आने की विधियाँ भी विकसित कीं। यह उनका हम पर अत्यंत उपकार है। 


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