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बुधवार, 6 नवंबर 2024

क्या अमेरिकन समाज स्त्रीविरोधी है? : (डॉ.) कविता वाचक्नवी

क्या अमेरिकन समाज स्त्रीविरोधी है? :  (डॉ.) कविता वाचक्नवी

अमेरिका के चुनाव परिणाम की मेरी भविष्यवाणी पुनः सत्य हुई। लोग मुझे पूछते और बहुधा हँसते भी हैं कि मैं फलित ज्योतिष को तो मानती नहीं, फिर किस आधार पर भविष्यवाणियाँ किया करती हूँ और वे कैसे सत्य भी हो जाती हैं। तो ऐसे लोगों के लिए मेरा उत्तर है : समाज के मनोभावों, उस के सुख दुःख, उस की सोच तथा उस के मनोविज्ञान की मेरी कुछ–कुछ समझ के सहारे ही यह सम्भव होता है और शेष ईश्वर की कृपा से।

 अमेरिकन चुनावों पर 2016 से अब तक तीसरी बार जो भविष्यवाणी मैंने की उस की पृष्ठभूमि बताती हूँ। जो बात मैं कहने जा रही हूँ, मेरे उस आकलन / निष्कर्ष को पढ़ लोगों को आश्चर्य होगा और असहमति भी; किन्तु आधुनिक सामाजिक मनोविज्ञान का एक सत्य जानना हो तो इसे ठीक से समझना ही होगा।

 मुझे 90 के दशक से अब तक यूरोप, यूके और अमेरिका के समाज में रहने का अवसर मिला है, या कहें कि अनुभव प्राप्त हैं, अतः इस अत्याधुनिक समाज में रहते हुए इन की सम्वेदना, सोच तथा समझ के अलिखित सत्य का बहुत ठीक आभास भी मुझे प्राप्त है। उसी आधार पर यह तथ्य बताना समीचीन और आवश्यक भी है कि क्यों और कौन स्त्रियाँ / पुरुष / समाज अपना क्या भविष्य बनायेंगे।

जिन लोगों को लगता है कि अमेरिकन जनता महिला राष्ट्रपति को नहीं स्वीकार सकती इसलिए हिलेरी या कमला हारीं ; उन की समझ गलत है। वास्तविकता यह है कि (जैसा कि मैंने लगभग 5–6 वर्ष पूर्व लिखा भी था) यॉरोप तथा अमेरिका आदि देशों में फ़ेमिनिज़्म खोटा सिक्का हो चुका है, जो महिलाएँ, समूह अथवा वर्ग/दल/संगठन या व्यक्ति ऐसी मानसिकता के हों या इस के पक्षधर हों, वे पिछड़े और यहाँ तक कि वे कम आईक्यू के / या थोड़े मूर्ख माने जाते हैं। बहुधा इसलिए; क्यों कि फेमिनिज्म का सत्य फेमिनिस्टों ने उघाड़ कर दिखा दिया है। इन देशों में फेमिनिज्म को समूचे सामाजिक अध: पतन का मूल समझा जाता है अब, और निजी स्वार्थों की इच्छापूर्ति का हिंसक माध्यम भी।

यह तथ्य भले ही कहीं लिखित रूप में या उद्धृत रूप में उपलब्ध नहीं है, किन्तु है यही सत्य। समाज फेमिनिज्म को एक ऐसी प्रवृत्ति मानता है जो राक्षसत्व के तुल्य है और जिस ने समाज, परिवार तथा सम्बन्धों को नष्ट किया है। अतः समाज उन स्त्रियों को तथा उन समूहों को स्वीकार नहीं करता जो फेमिनिज्म की राह पर हों और पुरुषों को अपनी उस सोच के कारण नकारती हों। 

 इस के विपरीत निजी जीवन में जो जितनी स्त्रियोचित हैं, उन की समाज स्वीकार्यता उतनी अधिक है। आप इस के उदाहरण यहाँ के समाज और घरों में तो स्वाभाविक है दूर से नहीं देख सकते, किन्तु अमेरिका तथा यॉरॉप की राजनीति में तो कहीं से भी देख सकते हैं। 

कई अन्य तथ्यों के अतिरिक्त यह बड़ा तथ्य इन परिणामों की पृष्ठभूमि में बहुत बड़ा कारक था। कुछ और कारक भी थे, उन का उल्लेख कभी फिर समयानुसार करुँगी 

यह सत्य बताना इसलिए आवश्यक प्रतीत हुआ ताकि भारतीय समाज में जो स्त्रियाँ फेमिनिज्म का झण्डा उठा स्वयं को आधुनिक समझती हैं, वे अपना आकलन कर सकें और उन्हें अपनी वास्तविकता तथा भविष्य समझ आ सके। 
दूसरा कारण इसे लिखने का यह है कि जो लोग मेरी की भविष्यवाणियों पर प्रश्न करते हैं, उन्हें मेरी सामाजिक तथा मानवीय चित्त की समझ इस के मूल में है, यह पता लग सके।
– ✍️डॉ. कविता वाचक्नवी©

शुक्रवार, 30 जून 2023

पाककला की चुनौती और टमाटर : कविता वाचक्नवी

टमाटर बारहमासी फसल नहीं है। 🍅🍅🍅

जब हम भारत में रहते थे तो लहसुन–प्याज न खाने के चलते हमारे यहाँ टमाटर के अधिक प्रयोग की अनिवार्यता थी। जो लोग प्याज खा लेते हैं, उन्हें वैसे भी टमाटर की अनिवार्यता कुछेक भोज्य पदार्थों के लिए ही होती है। मैंने क्योंकि स्वयं अधिकांश फसलें अपने हाथ से बोई, उगाई काटी हैं अतः एक–एक फल, एक –एक फली, एक–एक कन्द, व एक–एक शाक की प्रत्येक इकाई का महत्व तथा प्रतीक्षा से परिचित हूँ। उन के हमारी इच्छानुसार उग कर तैयार न होने का अर्थ उगाने वाले का दोष नहीं, अपितु प्रकृति व पर्यावरण का चक्र, नियम तथा सन्तुलन है। 

ऐसे में जिन दिनों टमाटर की फसल नहीं होती थी, या मण्डई में नहीं मिलते थे तो गृहणी के रूप में जो–जो उपाय करती थी, उन्हें पाठकों की सहायता के लिए साझा कर रही हूँ। 

(प्याज–लहसुन न खाने–पकाने के चलते मेरी गृहस्थी में प्रतिदिन  बड़े आकार के सात–आठ टमाटर शाक–दाल हेतु बारहों माह चाहिए होते थे)। ऐसे में विकल्प दो–तीन थे। गृहणियों को बिना हाय–तौबा मचाए शान्ति से अभाव को भी भाव से पूर लेने का गुण अनिवार्यतः बनाए रखना चाहिए। यह हमारे ही पारिवारिक सम्मान का कारक बनता है। तो आइए, मेरे अनुभव से आप को कुछ लाभ मिले तो इन्हें अपना सकते हैं –

कोकम
दक्षिण में गहरे लाल रंग का एक बहुत खट्टा फल आता है, जिसे कोकम कहते हैं। उस का खट्टा–सा शरबत भी बाजार में मिलता है।  इस कोकम की सूखी लाल–भूरी फाँकें बिकती हैं। जिस किसी में डाल दें, खटाई और रंग देती हैं। मैं सदा उन्हें घर में रखती थी। जिस किसी दिन टमाटर घर में समाप्त हुए, उस दिन दाल को कोकम तथा अदरक डाल कर उबाला व फिर बघारा करती थी। कोकम आज भी मेरी गृहस्थी में सदा रहता है। यहाँ तो उस की दीर्घावधि तक सुरक्षित रहने वाली गीली फाँकें उपलब्ध हो जाती हैं।

साबुत लाल मिर्च
सूखी साबुत लाल मिर्च भी टमाटर के अभाव में काम आती है। आप को अधिक मिर्च नहीं रुचती तो आप प्रत्येक मिर्च को तोड़, उस के बीज व दाने बाहर निकाल अलग प्रयोग हेतु सहेज लें तथा छिलके को पानी से धो, कुछेक छोटे–छोटे टुकड़े कर लें, जैसे एक लम्बी मिर्च हो तो चार–छह टुकड़े हो सकते हैं। उन्हें अलग से उबाल कर, पानी से निकाल दाल या शाक में ऊपर से मिला दें तो टमाटर के लाल रंग का आभास देंगी। उबालने से बचा हुआ पानी भी स्वादानुसार मिलाया जा सकता है। ऐसे में टमाटर की खटाई की कमी पूरी करने हेतु अमचूर प्रयोग करें।

इमली का अवलेह
बाजार में इमली का बिना गुठली–डण्ठल का तैयार अवलेह उपलब्ध होता है। मेरी गृहस्थी में वह सदा रहता आया है। उसे भी रंगत तथा खटाई हेतु, विशेषतः साम्भर हेतु प्रयोग करती आई हूँ।

इन उपायों से सम्भवतः आप भी अपनी गृहस्थी और चौके को अभाव रहित तथा अनवरत चला सकते हैं।
–✍🏻 कविता वाचक्नवी


मंगलवार, 10 जनवरी 2023

भारत की राजभाषा के चयन का इतिहास

भारत की राजभाषा के चयन का इतिहास : © (डॉ.) कविता वाचक्नवी


आप में से बहुत काम लोग जानते होंगे कि भारत की राजभाषा क्या हो,  इस के लिए संविधान समिति और संसद के समक्ष  जब विचार प्रारम्भ हुआ तो संस्कृत को ही राजभाषा बनाने का प्रस्ताव सब से मुख्य था। यह कोई किंवदन्ती अथवा अपवाद नहीं, अपितु सत्य है। स्वयं मेरे पिता श्री इस का प्रमाण हैं, जिन से हम इसे गत 55 वर्ष से सुनते आए हैं। तत्कालीन रेडियो /समाचारों आदि के द्वारा इस तथ्य से देशवासी भली प्रकार परिचित करवाए गए थे। पूरा प्रकरण यह है कि अधिकांश नेता, संविधान-समिति के सदस्य और सांसद संस्कृत को ही भारत की राजभाषा बनाए जाने के के पक्ष में थे। यहाँ तक कि समाचार पत्रों आदि में घोषणा भी हो गई थी कि भारत की राजभाषा संस्कृत होगी; क्योंकि संस्कृत को राजभाषा बनाने के प्रस्तावकों में स्वयं संविधान समिति से अम्बेडकर भी सम्मिलित थे। 

यदि अम्बेडकर तथा उन सब की बात मान ली गई होती तो आज संस्कृत ही भारत की राजभाषा होती। 

उत्तर भारत के कुछ राज्यों के अतिरिक्त देश के समस्त राज्य संस्कृत ही के पक्ष में थे। उत्तर भारत के कुछ लोग जब संस्कृत के विरोध में उतरे, तो संसद में राजभाषा के निर्णय हेतु मतगणना करवानी पड़ी, जिस में संस्कृत तथा हिन्दी को एक समान मत पड़े। भाषा के प्रश्न पर जब संसद दो फोड़ होती दिखी तो उबारने के लिए ऐसी स्थिति में केवल एक मत से हिन्दी को जिताया गया, और वह एक निर्णायक मत था राष्ट्रपति स्व. राजेन्द्र प्रसाद जी का। 

 इस घटना ने दक्षिण भारतीयों के मन में हिन्दी विरोध का बीज बोने का काम किया.. जिस का परिणाम हम सब अब तक देखते आ रहे हैं। दो भारतीय भाषाओं की लड़ाई दो बिल्लियों की लड़ाई हो चुकी है; जिस में लाभ बन्दर को ही हुआ था। दो भारतीय भाषाओं की लड़ाई का लाभ अंग्रेजी को मिला, मिलता आया है।

संलग्न चित्र में समेकित तत्कालीन समाचार-पत्रों की कतरनों के माध्यम से इस तथ्य के प्रमाण देखे जा सकते हैं - 

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रविवार, 14 फ़रवरी 2021

अहिंसा तथा हिंसा : डॉ. कविता वाचक्नवी

अहिंसा तथा हिंसा :   डॉ. कविता वाचक्नवी



अहिंसा क्या है, जानने से पहले जानना होगा कि हिंसा क्या है। क्योंकि, 'अहिंसा' स्वतन्त्र शब्द नहीं, अपितु 'हिंसा' का निषेधात्मक शब्द ही है। आगे बढ़ें, उस से पूर्व बलपूर्वक कहना अनिवार्य है कि समाज में सभी को कम-से कम यह अवश्य समझना चाहिए कि सर्वाधिक हिंसक समाजों को, आतंकवादियों को सर्प्रथम 'अहिंसा' पढ़ाई जानी चाहिए।

जो समाज आत्मरक्षा तक के लिए समर्थ नहीं, या उद्यत नहीं, या उग्र नहीं, या तत्पर नहीं, उसे या उन लोगों को आत्मरक्षा के लिए समर्थ होने या युद्धक होने का निषेध कर, निष्क्रिय करना, अहिंसा नहीं, अपितु हिंसा है ; क्योंकि ऐसा कर हम उन्हें मारे जाने के लिए उकसा रहे होते हैं। और ठीक वही अपराध कर रहे होते हैं, जिस अपराध का दण्ड आत्महत्या के लिए उत्प्रेरित करने के फलस्वरूप दिया जाता है।
वैसे अहिंसा का नाम लेने वालों को अहिंसा का वास्तविक अर्थ नहीं पता होता, वे उसे किसी शारीरिक क्रिया तक सीमित मानते हैं।

वस्तुतः हिंसा का वास्तविक अर्थ है - वैर भाव से प्रेरित हो मन, वचन, या कर्म से कुछ भी करना। और इस से भी बढ़ कर यह जानना आवश्यक है कि हिंसा / अहिंसा केवल मनुष्य के प्रति ही की जा सकने वाली क्रिया नहीं है। पशुओं, प्राणियों, वनस्पतियों, संस्कृतियों, विचारों, सुखों, इतिहास, कलाओं आदि किसी को भी दु:ख, क्षय, या हानि पहुँचना, छीनना आदि हिंसा हैं।

इसलिए अहिंसा की आड़ में अपने मनचाहे लाभ / स्वार्थ की इच्छा की पूर्ति व्यापक हिंसक मनोभाव व व्यवहार है।
अहिंसा शब्द देने वाले ऋषियों की बात के वास्तविक अर्थ को छोड़, अपने मनचाहे अर्थ में उसे बताना-कहना, बड़ा स्वार्थ और विष है, हिंसक व्यवहार व ही सके क्रिया है।

सेना का पराक्रम, राम की शक्ति पूजा या कृष्ण, चाणक्य की कूटनीति की परम्परा आदि हिंसा नहीं हैं।
अहिंसा का नाम लेकर अपनी जीभ के स्वाद के लिए पशुओं का वध करना विश्व की सबसे बड़ी, व्यापक व क्रूर हिंसा है। तत्पश्चात् आतंकवाद व हिंसक प्रजातियों का मज़हबी उन्माद व तलवार का शासन या गैस चैम्बर, और उस से भी बढ़कर हिंसा के उदाहरण जानने हों तो वर्ष 2017 में प्रो. स्टीफन कोटकिन्स द्वारा 'वॉल स्ट्रीट जरनल' में उनका शोध पढ़ें।

साम्राज्य के विस्तार या मज़हबी उन्माद ने विश्वमानव का जो क्षय किया है, उसे कभी स्वीकार न करना अहिंसा ही है क्योंकि स्वीकार न करने वाला ही हिंसक का असमर्थन कर रहा होता है। हमें हिंसक की हिंसा का निषेध करने में सक्षम बनना होगा, ताकि हिंसा समाप्त हो सके।

भारतीय वैदिक समाज ने जिस अहिंसा की संकल्पना दी, वह निर्वैरता व अकारण किसी भी प्राणी या पदार्थ से छल या संघात / संहार न करना है।

अपनी जीभ के स्वाद की सन्तुष्टि हेतु किये गए पशु वध में जो व्यक्ति भागीदार कभी न बना हो, वह आगे आए और अहिंसा का उदाहरण प्रस्तुत कर अगले चरण छल, कपट, वैर, आहत करना आदि की ओर बढ़ने के उपायों पर विचार करे। सब से सरल उपाय है, वैदिक ऋषियों का स्वाध्याय और तदनुरूप क्रियात्मक जीवन शैली।
अलमतिविस्तरेण !

बुधवार, 8 मार्च 2017

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम क्यों ? : कविता वाचक्नवी

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम क्यों ?  : कविता वाचक्नवी 

(८ मार्च २०१७ को महिला दिवस के उपलक्ष्य में फरगुदिया द्वारा आयोजित परिचर्चा  हेतु लिखित विचार)


"प्रथम तो राजनीति एक सार्वजनिक क्षेत्र है, और मध्ययुगीन परम्परा से सार्वजनिक क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी सीमित रही है। यद्यपि 20 के दशक के उत्तरार्द्ध में यह बढ़नी प्रारम्भ हुई किन्तु वह केवल कला और सौन्दर्य के क्षेत्र में, या स्पष्ट कह लें तो फिल्मों में और तत्पश्चात् सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में अर्थात् नर्सिंग एवम् अध्यापन में। 

दूसरा कारण यह कि राजनीति मुख्यतः अनीति की शरणस्थली रहती आई है, जहाँ अपराध और कपट को या तो संरक्षण और प्रश्रय मिलता आया है अथवा उस से संघर्ष और जय-पराजय। स्त्रियों की प्रकृति से यह सार्वजनिक समेकित द्वन्द्व मेल नहीं खाता।

तीसरे, समाज में कार्यों का विभाजन इस प्रकार का रहता आया है कि स्त्री परिवार और गृहस्थी की धुरी होती है, वह परिवार और सन्तान से सम्बन्धित दायित्वों से इतना अवकाश और छूट नहीं पाती कि वह निरपेक्ष भाव से ऐसे किसी अवसर /अध्यवसाय को समय दे सके।

चौथा, कई अर्थों में यह 'महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं' भी माना/कहा जा सकता है। जिन परिवारों की पद-प्रतिष्ठा और सुरक्षाकवच-सा स्त्रियों को मिला उन परिवारों की स्त्रियाँ मुख्यतः राजनीति में आईं भी।

पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्र में स्त्री का स्थान बनाना भी स्वयम् में चुनौती है। तभी तो संसद में आरक्षण का प्रस्ताव तक पुरुष वर्चस्ववादी दलों ने लाने नहीं दिया। राजनीति में अपराधीकरण कम हो तो धीरे-धीरे यह अनुपात बढ़ेगा, या स्त्रियाँ अपराध की अभ्यस्त हो जाएँ तब भी बढ़ेगा। स्त्री-वर्चस्व बढ़ने ओर्र राजनीति के मानवीय पक्ष की अपेक्षा तब की जा सकेगी।"

- कविता वाचक्नवी

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

स्त्रीविमर्श स्त्री को शोषण का अधिकार देने/दिलवाने का अभियान नहीं है : कविता वाचक्नवी

स्त्रीविमर्श स्त्री को शोषण का अधिकार देने/दिलवाने का अभियान नहीं है : कविता वाचक्नवी


कुछ मित्र/पाठकों ने सन्देश भेज पूछा है कि मैं तो सदा से स्त्री व स्त्रीविमर्श सम्बन्धी लेखन व कार्यों के प्रति प्रतिबद्ध/ पैरोकार रही हूँ, फिर १२ फरवरी के अपने लेख में "दूसरों के जीवन में काँटे बोने और टीवी देखने के अतिरिक्त कुछ नहीं करतीं" जैसी स्त्री-विरुद्ध टिप्पणी कैसे लिख गयी।  


Image result for women empowerment paintingsतो प्रिय पाठको / मित्रो ! आपको स्त्री-विमर्श का आशय, अभिप्राय और उद्देश्य इत्यादि समझना बहुत अनिवार्य है। मेरा स्त्री-विमर्श स्त्री को शोषण का अधिकार देने/दिलवाने का अभियान नहीं है; और सिद्धान्ततः भी स्त्रीविमर्श इस अवधारणा पर नहीं टिका। स्त्री-विमर्श और स्त्री-सशक्तीकरण मूलतः शोषित स्त्री को शोषण से मुक्त करवा उसे सबल बनाने व लैंगिक असमानता को दूर कर समानता का अधिकार दिलवाने का अभियान हैं ताकि वे भी समाज की उन्नति में बराबर की सहभागी हो सकें; न कि उसे समाज के किसी अन्य वर्ग के शोषण का अधिकार दिलवाने का। जो लोग स्त्री-विमर्श का उपयोग इसके विपरीत अथवा इतर अर्थों में करते हैं वे मूलतः अपनी स्वार्थसिद्धि और अज्ञानता का ही परिचय देते हैं। यदि स्त्री का सशक्तीकरण दूसरों के शोषण हेतु है तो फिर उनमें और समाज के दूसरों स्त्री-शोषकों में अन्तर ही क्या रह गया। ऐसे में स्त्री-विमर्श के हम जैसे पैरोकारों का दायित्व समाज को ऐसी शोषक स्त्री के शोषण से मुक्ति दिलवाने का भी हो जाता है। 


जिस प्रकार कोई न्यायालय किसी अपराधी को इसलिए क्षमा या दया नहीं दे सकता कि उसके अपराधी बनने के मूल में अमुक-अमुक व्यक्ति और अमुक-अमुक घटना का हाथ है तो परिस्थितिवश वह अपराधी बन गया, अतः उसे क्षमा कर दिया जाए ! न ! कदापि नहीं ! ऐसे में तो उन्हें दोहरा दण्ड मिलना चाहिए कि एक तो स्वयं अपराध किया और साथ ही दूसरों को अपराधी बनाने वाला घटनाक्रम और परिस्थितियाँ रचीं। इसी प्रकार भले ही स्त्री हो या पुरुष, वह भले ही किन परिस्थितियों में शोषण का अपराध करे, उसे उसके अपराध के लिए दोषी ठहराया जाना होगा। किसी को इसलिए क्षमा नहीं किया जा सकता कि वह स्त्री है या पुरुष। अपराध, दण्ड और क्षमा में किसी भी व्यक्ति को रिज़र्वेशन नहीं मिलना चाहिए। अन्यथा समाज का ढाँचा चरमरा जाएगा और असन्तुलन, असमानता व अत्याचार बढ़ेगा। इसलिए स्त्री-सशक्तीकरण स्त्रियों को दूसरों के प्रति दुर्व्यवहार, छल, कपट, प्रपञ्च, शोषण और अत्याचार करने का लाईसेन्स देने / दिलवाने का अभियान नहीं है। जो इसका उपयोग इन अर्थों में करते हैं, वे अपराधी हैं, भर्त्सना-योग्य हैं और स्त्री-मुक्ति के प्रत्येक अभियान को उनकी निन्दा व विरोध करना चाहिए। 


जो पुरुष स्त्री-विमर्श की आड़ में अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं, उनको उठा बाहर फेंकना चाहिए और जो स्त्रियाँ घरों में या बाहर अपने स्त्री होने का लाभ लेते हुए समाज के किसी भी वर्ग के विरुद्ध किसी भी प्रकार की धूर्तता, चालाकी, वितण्डा या लाभ उठाने की मनोवृत्ति दिखाती हैं या कार्य करती हैं, तो उनकी भी खबर ली जानी चाहिए और उनका किसी भी प्रकार समर्थन / सहयोग नहीं किया जाना चाहिए। स्त्री-सशक्तीकरण का अर्थ पुरुष का शोषण करना भी नहीं होता। यह शोषण का हथियार नहीं, अपितु आपकी आत्मरक्षा का उपाय और सामर्थ्य प्रदान करने का अभियान है, ताकि कोई आपकी अस्मिता पर आघात न करे ; किन्तु आप आत्मरक्षा के अतिरिक्त संहार और शोषण में इस हथियार को प्रयोग करने लगेंगी तो आपको भी उसी प्रकार धिक्कार मिलेगा जैसा आपका शोषण करने पर पुरुष को मिलता है ! 
- Kavita Vachaknavee





शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

महिलाओं के दोष

महिलाओं के दोष : कविता वाचक्नवी 


तीन वर्ष पहले (आज ही के दिन जब यह लेख लिखा गया था) एक तथाकथित लेखिका (म.ग.) के लेख में लिखे गए शब्द थे - "मेरे द्रष्टिकोण से "सर्वोतम माँ " वो है जो प्रारम्भ से अपने बेटे को स्त्री जाति का सम्मान करना सिखाती है। जो पुरुष स्त्री जाति को हीन भावना से देखते हैं, उन के विकास में बाधक बनते हैं, उन के प्रति दुर्व्यवहार करते हैं ,हाथ उठाते हैं, बलात्कार करते हैं उन की हत्या करते हैं ,ये सब एक असफल माँ की "अमानुष" संतान होते हैं ". ……


पहले भी अनेक महिलाओं के इस प्रकार के वक्तव्य पढ़ती आई हूँ, कई महिलाएँ तो मेरे यहाँ आकर इस तरह के अपने विचार लेकर मुझसे दूर तक झगड़ती रही हैं, उन्हीं दिनों एक महिला (अ.भा.) लंबा युद्ध छेड़े रही महिलाओं के विरोध में मेरे यहाँ  फेसबुक पर।


Image result for blaming women वस्तुतः महिलाओं को दोष देने की यह प्रवृत्ति पुरुषवादी सोच का परिणाम है। अतः इसीलिए मेरा विरोध पुरुषों से नहीं अपितु पुरुषवादी सोच से है, चाहे वह स्त्रियों में हो या पुरुषों में। अधिकाँश स्त्रियों की कंडीशनिंग ही ऐसी होती है।

उक्त महिला की माओं को कटघरे में खड़ी करने वाली प्रारम्भ में लिखी बात पर, मेरी दो-तीन आपत्तियाँ हैं, वे संक्षेप में इस प्रकार समझी जा सकती हैं।

- पहली बात उनका वह स्टेटस उसी भावना से प्रेरित लगता है जैसे 60-100 साल पहले 'स्त्रियाँ सन्नारी कैसे बनें', 'पत्नी पथ प्रदर्शक' आदि पुस्तकें तमाम लोगों ने लिखीं, जो ये समझते थे कि स्त्रियों को सुधारना चाहिए, हमें स्त्रियों को सुधारना है, हमें स्त्रियों को सही पथ पर चलाना है, स्त्रियाँ मूर्ख, अशिक्षित और असभ्य होती हैं, उन्हें शिक्षित करने और घर गृहस्थी, पति की सेवा, बच्चे पालन, सन्नारी व सु-नारी बनने के उपदेशों की आवश्यकता है और घर चलाने, पति की सेवा करने, बच्चों को पालने, सास ससुर की सेवा करने, पति का आज्ञा पालन करने, पति को परमेश्वर समझने, सिलाई बुनाई करने में अपना समय लगाने, इधर-उधर की बातों में न फँसने की शिक्षा पुरुषों द्वारा दी जानी चाहिए। इसलिए लोगों ने स्त्री को उपदेश देने वाली पुस्तकें लिखीं ताकि स्त्रियाँ सुधरी रह सकें।

- दूसरी बात, बच्चे कभी उपदेशों से नहीं सीखते, न सिखाने से सीखते हैं। बच्चे केवल और केवल आचरण से सीखते हैं। माँ या पिता भले ही उन्हें लाख उपदेश देते रहें, वे इन उपदेशों और आदेशों से कुछ नहीं सीख सकते, क्योंकि बच्चे केवल आचरण से सीखते हैं। उनके घर-परिवार में या फिर समाज में क्या व्यवहार होता है, वे इस से सीखते हैं।

माँ उन्हें लाखों सदुपदेश भली ही दे भी ले, तब भी यदि घर के लोगों या पिता का व्यवहार उन संस्कारों के अनुकूल या मेल न खाता हुआ है, तो बच्चे उन उपदेशों से कभी नहीं सीखेंगे अपितु वही सीखेंगे जो वे अपने घर में देखते हैं।

साथ ही ध्यान रखने की बात यह है कि कितने प्रतिशत भारतीय परिवारों में स्त्री को पारिवारिक निर्णय या संतान के निर्णय लेने का अधिकार होता है ? स्त्रियाँ अपने जीवन के निर्णय लेने तक में स्वतंत्र नहीं होतीं, भला क्या तो वे संतान के जीवन के निर्णय लेंगी ! जो कुछ वे सिखाना-बनाना चाहती होंगी अपने बच्चों को, पूरा परिवार मिलकर एक झटके में उस पर पानी फेर देता है। उदाहरण स्वरूप, स्त्री सिखाए कि शराब पीना गलत है, न पियो, किन्तु यदि पिता ही रोज पीता है और पीटता व झगड़ा करता है तो क्या स्त्री का बस चलता है? संतान वही सीखेगी जो वह देखती है। सारे संस्कार धरे रह जाते हैं। इसलिए ऐसी बातें वे स्त्रियाँ कर सकती हैं जो अपने घरों में बैठी सौभाग्य से अपने अच्छे मिले पति के कारण सारी दुनिया की स्त्रियों को वैसा ही समझती हैं और संसार के सारे दुष्कर्मी पुरुषों की बुराइयों का दोष उनकी माओं के मत्थे मढ़कर उन्हें ही नाकारा और अपराधिनी घोषित करती हैं।


संतान के दुष्कर्मी या बुरे आदि होने का आरोप या तो बराबर सब (समाज, परिवार, पिता व अंत में माँ) पर है, अन्यथा अकेले माँ पर तो कदापि नहीं है, जब तक कि पिता सहित पूरा परिवार माँ का सहयोगी न हो। इसलिए सर्वोत्तम माँ की अपेक्षा सर्वोत्तम पिता की बात लिखनी चाहिए। सर्वोत्तम माँ की बात लिखना नीच संतान या नीच, अमानुष व दुष्ट संतान के अपराधी या अमानुष होने का आरोप माँ पर लगाने जैसा है।


शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

हिन्दी के मरण के वाचाल और मूक साक्षी

 हिन्दी के मरण के वाचाल और मूक साक्षी  : कविता वाचक्नवी 





लन्दन के एक प्रतिष्ठित संस्थान ने उनके यहाँ #हिन्दी अध्यापन के लिए अपनी पहल पर मुझे एक लिखित प्रस्ताव गत दिनों भेजा है। मना करने का इतना दुःख नहीं है जितना उनकी इस बात पर चुप रह जाने का कि कोई और मातृभाषा हिन्दी का, अध्यापन अनुभव वाला तथा न्यूनतम मास्टर्ज़, पीएचडी योग्यता का सुयोग्य पात्र उन्हें सुझाऊँ।

जिन्हें हिन्दी को लेकर बहुत से भ्रम हैं , उनकी जानकारी के लिए बता दूँ कि हिन्दी की स्थिति अब लगभग 'बोली' हो चुकने की हो गयी है। सामान्य व प्रबुद्ध जन तो क्या, इस भाषा के लेखक तक अकादमिक विषयों से अछूते हैं। क्योंकि किसी भी भाषा को जीवित रहने में सहायक होते हैं उसमें व्यक्त-निहित 'विचार', किस्से-कहानी नहीं और उस भाषा में दिए जाने जाने वाले ईनाम-इकराम नहीं और उनकी ओर दौड़ने में सब कुछ तबाह कर देने वाली अन्धी भीड़ नहीं।

आप यदि यूनेस्को द्वारा जारी बची रह जाने वाली भाषाओं की सूची में हिन्दी का नाम देखकर निश्चिन्त हैं अथवा उसकी विश्व की भाषा-सूचियों में आगे-पीछे सरकता हिन्दी का नाम देखकर प्रसन्न हैं, तो आप किसी बहुत बड़े भ्रम, धोखे और नासमझी में हैं। आप गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, या सोशल मिडिया पर हिन्दी के टूल्ज़ और उनकी चर्चा से आह्लादित और कृतकार्य अनुभव करते हैं तो आपसे बड़ा चार्वाकी और कोई नहीं। आप विदेशों में मुट्ठीभर लेखकों द्वारा अपनी अभिव्यक्ति के लिए हिन्दी को प्रयोग होता देख सीना फुलाते अथवा नतमस्तक होते हैं तो आप पर हँसना तक व्यर्थ है। क्योंकि आप को पता होना चाहिए कि लन्दन के संस्कृत स्कूल में कोई भारतीय नहीं जाता, ब्रिटेन में हिन्दी पढ़ने की सारी व्यवस्थाओं में से भारतीय नदारद हैं। अमेरिका के जिस नगर में मैं रहती हूँ उसमें न्यूयॉर्क से इतर सर्वाधिक भारतीय रहते हैं, यह स्वयं में लघु-भारत ही है किन्तु हिन्दी के अकादमिक अध्ययन की विद्यालय और विश्व विद्यालयीय व्यवस्थाओं में से भारतीय लगभग गायब हैं। पूरे अमेरिका की लगभग यही स्थिति है।

विश्वभर का भारतीय और भारतवंशी समाज इस भाषा में अवमिश्रण आदि के साथ बोल सकने की कामचलाऊ योग्यता अर्जित करने की स्थिति से बहुत सन्तुष्ट और निश्चिन्त है। जिस भाषा के उच्चरित भाषा रूपों से उसका अपना समाज सन्तुष्ट हो जाता है और किसी प्रकार के योगदान व श्रम से किनारा कर लेता है और प्रशासन तथा तन्त्र पर सब आरोप मढ़ता है, उस भाषा का अन्त सुनिश्चित है। इसलिए यह तय मानिए कि हिन्दी आगामी सौ वर्ष भी जीवित रह पाई, इसकी सम्भावना अत्यल्प है। #संस्कृत की स्थिति को देखकर किसी भ्रम में न रहें, हिन्दी न तो संस्कृत है, न ही कभी उतनी समृद्ध हो सकी, आगे तो कभी अब हो भी नहीं सकती।


The bottom line is that if there is only one person left who speaks the language as their native tongue and fluently, then the language has died. It doesn’t matter if there are still other members of the community that understand the language or maybe speak a little bit of it. Even if there are elders in the community who refuse to teach their native tongue to the younger generation, the language is doomed as it won’t survive to be passed on to a new generation as a native language.

आइये हम सब 10 जनवरी को मनाए विश्वहिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी के इस मरण के साक्षी बनें और उसकी चिता में कुछ समिधाएँ रख सकने लायक नाता इस से बनाए रख सकें।



शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

अमेरिका में उग्र विरोधप्रदर्शन क्यों

अमेरिका में उग्र विरोधप्रदर्शन क्यों : कविता वाचक्नवी


#अमेरिका के #युवा बच्चे और युवा पीढ़ी राष्ट्रपति ट्रम्प #President #Trump के चुनाव के बाद और #Europe में #Brexit के बाद, दुःख और क्षोभ में सड़कों पर और सब प्रकार के विरोध में जुटी है। यह इसलिए नहीं कि इनकी कोई राजनैतिक विचारधारा है या वे किसी दल के पक्षधर और विरोधी हैं, या इसलिए भी नहीं कि ये हिलेरी या जर्मन नीतियों के समर्थक हैं; अपितु इसलिए क्योंकि ये सरल हृदय, निष्कपट और निष्पाप हैं, इन्हें चालाकी, छल, प्रपञ्च, दुराव, कपट और झूठ आदि का अनुभव नहीं, ये किसी पर भी भरोसा कर लेते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि इन्हें लिबरल्ज़, लेफ्टिस्ट्स, सेक्युलर्ज़, नस्लीय, जाति-वर्गऔर संख्या आदि को देश से बड़े मानने वालों की सच्चाई का कोई अनुभव नहीं, इन्हें उनकी सच्चाई और असली रंग नहीं पता, इन्हें हाथी के अलग-अलग दाँतों वाली बात का पता ही नहीं, इन्हें नहीं पता कि समता, दया, प्रेम, उदारता, ममत्व, सहानुभूति, सह-अस्तित्व, साम्य, सामाजिक न्याय, वर्ग-हीनता, शोषण-मुक्ति जैसे हजारों शब्दों का सहारा केवल चुनाव जीतने और इन्हीं को संकट में डालने के लिए किया जाता है और इन्हें यह भी नहीं पता कि इसके क्या दूरगामी परिणाम हो सकते हैं, कि कैसे लेने और देने की भाषा अलग होती है और कैसे चालाक लोग दो चेहरे वाले होते हैं, कि कैसे इनकी ही सहायता ले इनके विरूद्ध षड्यंत्र रचा जाता है, कि कैसे 'फेसवैल्यू' पर नहीं जाना चाहिए, इन्हें नहीं पता कि इन सब के पीछे कौन-सी और किन की धूर्त चाले काम कर रही हैं । ये इतने सरल हैं कि झट से पिघल जाते हैं, दुष्परिणामों का इन्हें कोई अनुमान नहीं, इन्हें झट से बहकाया जा सकता है, ये किसी पर भी भरोसा कर लेते हैं, इनके निष्कलुष हृदय मानव-मात्र को सरल और सच्चा समझते हैं और इसीलिए इन्हें 'टार्गेट' किया जाता है, लुभावनी और द्रवित कर देने वाली बातों से इन्हें बरगलाया, भड़काया और भावुक किया जाता है और ये पिघल जाते हैं, प्रत्येक पर भरोसा कर लेते हैं। इसीलिए ये आज उन षड्यंत्रकारी शक्तियों के समर्थन में दिखाई देते हैं। यह वैसा ही है जैसे छोटे बच्चों को कम आयु में कभी-कभी अपने माता-पिता अपने शत्रु लगते हैं जब वे बच्चों के दूरगामी हितों के कारण कुछ कड़े और कड़वे निर्णय लेते हैं।


इसलिए, संसारभर के तथाकथित विचारको, साम्यवादियो, वामियो, अल्पसंख्यक तुष्टि-कारको, सेक्युलरो और राष्ट्र-भञ्जको ! हमारे सीधे सरल बच्चों के बहकने को अपनी जीत नहीं, अपितु उनकी सरलता और सिधाई समझिए। आज नहीं तो कल वे आपकी धूर्तता, षड्यन्त्र और चतुराई समझ जाएँगे। ये भारत के पले-बढ़े उन बच्चों जैसे नहीं हैं जो माँ के गर्भ से ही तेरा-मेरा और स्वार्थ या दूसरे के सर पर पैर रख कर आगे बढ़ना सीख कर आए हों ! पुरानी पीढ़ी ने अपने ढंग से नई पीढ़ी को आपके चंगुल में फँसने से बचा लिया है। 


गुरुवार, 1 सितंबर 2016

जूते वर्जित क्यों हैं

जूते वर्जित क्यों हैं :  क. वा.



दक्षिण-भारत में रहने वाले जानते हैं कि वहाँ लोग अपने व दूसरों के घरों के भीतर भी जूते नहीं ले कर जाते हैं। यदि पहनने ही हों तो घर के जूते अलग होते हैं जिन्हें भीतर ही पहना जाता है। इसके पीछे कारण यह है कि बाहर पहने जाने वाले जूतों में मल, मूत्र, थूक और इस बहाने जाने किस किस बीमारी के बैक्टीरिया घर व भवन के भीतर प्रवेश कर जाते हैं और अंदर / भीतर पनपने लगते हैं। खुले वातावरण में धूप आदि रहती है तो कुछ कीटाणु नष्ट भी होते हैं और खुले में अंकुश रखा भी नहीं जा सकता, सिवाय लोगों को यह समझाने के कि जगह जगह थूको / मूतो आदि मत / कूड़ा कबाड़ा न फेंको और न सड़ने दो। किन्तु घरों के भीतर छाया व बंद होने के कारण ऐसे कीटाणु दिन दूनी गति से पनपते हैं और बीमारियाँ फैलाते हैं। ऐसे में घरों की साफ सफाई दिन-भर / बार-बार / हर-बार करते रहना गृहिणी के लिए संभव ही नहीं होता। अतः सभी सामाजिक सदस्य अपने उत्तरदायित्व को समझ कर बाहर की गंदगी के संपर्क में आए जूते बाहर ही छोड़ देते हैं, बहुधा परिवारों में तो शौचालय के जूते भी अलग होते हैं। इसके पीछे बड़ा वैज्ञानिक रहस्य है कोई कठमुल्लापन नहीं। जिन स्थानों को हम शुद्ध देखना चाहते हैं, वहाँ ऐसा करते हैं। जापान में आज भी ऐसा ही होता है।  



मन की बात, तो मन कोई पदार्थ नहीं है जो कक्ष अथवा भवन में कीटाणु ले आएगा। वह तो यदि व्याधि वाले कीटाणुओं / विषाणुओं जैसे दोष से भरा है तो उसकी शुद्धि के तरीके अलग हैं, वह भले बाहर हो या भवन के भीतर बराबर बीमार करेगा। दूसरों को बीमार करने से पहले खुद अपने मालिक को ही। उसे शोध न सकने वाले को दूसरों को शारीरिक रूप से बीमार करने की अनुमति दे दी जाए यह उचित तो नहीं। न उस पर अंकुश लगाना संभव है। परंतु जितना अंकुश संभव है, उतना करना कोई अपराध नहीं।


शायद कुछ ने वह ज़माना देखा होगा जब ऑफिस के कंप्यूटर हॉल में जूते उतार कर जाना पड़ता था, क्योंकि उस समय के सिस्टम धूल आदि में तुरंत ठप्प पड़ जाते थे। आज यद्यपि कंप्यूटर सिस्टम काफी हद्द तक रफ इस्तेमाल करने योग्य हो गए हैं किन्तु अभी भी सेंसेटिव उत्पाद यथा ऑडियो स्टूडिओ, रोगियों के लिए बने विशेष यंत्रादि कक्ष व कई बार रोगी का विशेष (इंटेसिव केयर ) कक्ष आदि इस नियम का अनुपालन करते हैं। आजकल विकसित पाश्चात्य देशों में डिस्पोज़ेबल 'शू-कवर' भी होते हैं। मेरे अपने ही घर में प्रवेशद्वार पर रखे रहते हैं, हैंडीमैन, बिजलीवाला या कामगार आदि जिन्हें सुरक्षा कारणों से जूते पहने हुए ही रहना होता है, वे जब घर के भीतर आते हैं तो अपने जूतों पर उन्हें पहन लेते हैं और फिर शू-कवर को फेंक दिया जाता है। पुरातन समय में दरवाजे पर हल्दी की रंगोली और गोबर से लीपना प्राकृतिक कीटाणुनाशक विधि ही थी। हम परम्परा की वैज्ञानिकता को भूल कर पोंगापंथी मात्र बन गए, जिसका परिणाम यह निकला कि जो कुछ पारम्परिक है,वह सब त्याज्य है और उसे गाली दी जानी चाहिए का अधिकार तथाकथित आधुनिकों को दे दिया। #KavitaVachaknavee
(ये विचार वर्ष २०१२ में किसी प्रसंग में व्यक्त किए थे)

शुक्रवार, 24 जून 2016

ब्रिटेन का भविष्य अब संसद (सांसत) में !

ब्रिटेन का भविष्य अब संसद (सांसत) में : कविता वाचक्नवी



‪#‎ब्रिटेन‬ की अर्थव्यवस्था, समाज और राजनीति में भारी उथल-पुथल मचा हुआ है। जनमत में योरोपीय महासंघ से अलग होने को बहुमत जो मिला है। 


इस वस्तुस्थिति के दो पक्ष हैं। एक तो यह कि वस्तुतः इस जनमत से आज की तिथि में ब्रिटेन महासंघ से न अलग हुआ है , न अलग होने जा रहा है। पहली बात तो यह कि जनमत के पश्चात् अब यह निर्णय देश की संसद में लिया जाना शेष है (यद्यपि संभावना यही है कि सांसद भी अपने अपने क्षेत्रों की जनता के विरोध में नहीं जाएँगे), फिर दूसरी बात यह कि यदि वे भी अलग होने पर मुहर लगा दें तो आधिकारिक रूप से महासंघ से अलग होने में 2 वर्ष का समय लगेगा, प्रक्रिया पूरी होने में।

दूसरा पक्ष यह कि मुद्रा ने डुबकी लगाई है जिससे राष्ट्र का सकल मुद्रा भण्डार निस्संदेह कमतर हुआ है, बृहद व्यापारिक प्रतिष्ठानों ( विशेषतः जो विदेशी मूल वालों द्वारा संचालित हैं) के विदेशी मूल के कर्मचारियों में अनिश्चय है। इस मध्य मात्र गत 2 घण्टे में ब्रिटेन ने 350 बिलियन पाउण्ड के अंतरराष्ट्रीय निवेश खो दिए हैं,  यह राशि योरोपीय महासंघ की चालीस वर्ष  की सदस्यता राशि के बराबर है।  पर ये सब छोटी बातें हैं। 

इन सबके मध्य सबसे भयंकर स्थिति यह है कि देश टूटने की कगार पर आ गया है, विशेषतः स्कॉटलैंड और आयरलैंड राज्य (जिन्होंने महासंघ के साथ रहने के पक्ष में मत दिया) वे अब अब देश से अलग होकर स्वतन्त्र देश के रूप में अपने भविष्य पर पुनर्विचार करने लगे हैं और आगामी 2 वर्ष में यह कभी भी घट सकता है। उत्तरी आयरलैण्ड के लोगों ने तो आज ही से अपनी नागरिकता बदलने की कवायद भी प्रारम्भ कर दी है।

इन सब स्थितियों को देखते हुए ब्रिटिश सांसदों (विशेषतः जो योरोपीय महासंघ से अलग होने का समर्थन करते हैं) पर संसद में अपना मत देते समय यह उत्तरदायित्व (बल्कि दबाव) होगा कि वे महासंघ से अलग होने की पैरवी करते समय देश के भी टुकड़े करने की पैरवी करेंगे।

संसद का निर्णय ही इस देश का इस देश के भौगौलिक रूप में भविष्य को भी तय करने वाला होगा। अन्यथा महासंघ से अलग होना यानि इस देश का दो या तीन भागों में विभक्त होना सिद्ध हो सकता है।

ध्यातव्य है कि यह सारा खेल अति-उदारवादी विचारधारा  के गर्भ से जन्मा और उसी की प्रचण्ड प्रतिक्रिया है। इसका सीधा प्रभाव अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव पर भी पड़ेगा।
 भारत इस से कुछ संकेत ग्रहण कर सके तो हितकर होगा।

  ‪#‎KavitaVachaknavee‬ #‎Brexit‬ ‪#‎UK‬

गुरुवार, 19 मई 2016

चुनाव-परिणामों के बाद कुछ बातें भाजपा से

चुनाव-परिणामों  के बाद कुछ बातें भाजपा से : कविता वाचक्नवी 


#भाजपा #BJP यद्यपि असम में जीत गयी है, यह अच्छी बात है, यह केवल @PMO India #Narendra Modi जी के चलते सम्भव हुआ है। भाजपा नेताओं को इस से खुशी मनाने की आवश्यकता नहीं। 


राष्ट्रीय स्तर पर अभी खतरे बहुत हैं और उन खतरों के सामने भाजपा ने चुनौती प्रस्तुत नहीं की। केरल और बंगाल में उसे जो व जैसा करना चाहिए था, वह वैसा नहीं किया। राष्ट्रीय ऐक्य व सुरक्षा की दृष्टि से यह लापरवाही घातक है। कई घातक संकेत इसमें छिपे हैं। जिन कार्यकर्त्ताओं ने स्वयं को अधिक महत्त्व न मिलने के बाद शिकायतों के अम्बार लगा दिए, उनका नकारात्मक योगदान भी इसमें कम नहीं, भले ही वे लोग दल या #मोदी जी के प्रति अपनी निष्ठा के चिट्ठे दिखाते रहें या कसमें खाते रहें। आप यदि सच में निस्स्वार्थ स्वयंसेवक हैं तो बदले में आपको किसी भी प्रकार की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। आपका प्रतिदान केवल राष्ट्र की सुरक्षा सुनिश्चित होना है; जब तक वह नहीं होती तब तक आपको बिना किसी अपेक्षा के अथक काम करना है और उसके बाद भी करना है। 


ऐसा नहीं है कि भाजपा में गलत या स्वार्थी लोग / नेता नहीं हैं; वे भरपूर हैं। पर उनके चलते आप राष्ट्र को तिलाञ्जलि नहीं दे सकते, न उनके भरोसे देश को छोड़ सकते। मेरे जैसे लाखों लोग भाजपा के पक्षधर इसलिए हैं , क्योंकि हम राष्ट्र के साथ हैं। मैं तो भाजपा की सदस्य या मतदाता भी नहीं हूँ। फिर भी हम लोग भाजपा के साथ हैं तो इसलिए कि हमें #मोदी जी की दूरदर्शिता, देशभक्ति, ईमानदारी और कर्मठता पर अथाह विश्वास है। हमारी वरीयता भारत और भारतीय हैं (केवल वे भारतीय जो भारत को राष्ट्र के रूप में पूजनीय मानते हैं)। हम मोदी जी के साथ उनकी इस निष्ठा और उन पर अथाह विश्वास के चलते हैं ; भाजपा के प्रति अंध आस्था के चलते नहीं। 


इसलिए यदि भाजपा के कार्यकर्त्ता और स्वयंसेवक लड़खड़ाते या अपेक्षा करते या तज्जन्य शिकायतें करते हैं तो वे मूलतः भाजपा को कमज़ोर करते हैं। दूसरी ओर उन्हें समझना चाहिए कि दो चार नेताओं को छोड़ कर भाजपा के किसी नेता को जनता ने नहीं चुना अपितु जनता ने मोदी प्रशासन को चुना है। हमें किसी नेता से कोई बड़ी आशा भी नहीं, वे भी मोदी जी को कमजोर करने वाले कारकों में सम्मिलित हैं। अतः उन नेताओं के भरोसे देश को नहीं छोड़ा जा सकता। केरल और बंगाल की विफलता उसी का फल है। यह विफलता भाजपा की विफलता नहीं अपितु राष्ट्र की सुरक्षा में विफलता है ; कार्यकर्त्ताओं की विफलता है, उनके जीवनव्यवहार और सेवाभाव की कमी की द्योतक है। 


इस विफलता में छिपे घातक संकेतों को पकड़ने की #दूरदर्शिता लाइए और फूँक-फूँक कर कदम उठाइए। मेरे लिए इन दो राज्यों के परिणाम विशेषतः चिन्तादायक और सतर्क करने वाले हैं। ध्यान रखिए कि राष्ट्र अभी सुरक्षित नहीं है। इस असुरक्षा की जिम्मेदारी हम सब की है। स्थानीय भाषाओं में काम करने वाले निष्ठावान कार्यकर्त्ताओं की आवश्यकता है, सोशल मीडिया पर उन भाषाओं के कार्यकर्त्ताओं का सहयोग करने की आवश्यकता है, अंग्रेज़ी में भी विचार को विस्तार देने और सबसे बढ़कर निरपेक्ष भाव से स्वयंसेवक होने की, सेवा को अपना जीवनदर्शन बनाने की, राष्ट को प्रथम रखने की, न कि स्वयं को या कुछ और को। 


चुनाव-क्षेत्र को ही अपना कर्मस्थल न समझिए, समूचा भारतीय व वैश्विक मानव-मन आपका कर्मक्षेत्र होना चाहिए। #KavitaVachaknavee

शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

हिन्दी वॉयस टायपिंग व हिन्दी वॉयस सर्च/ हिन्दी-श्रुतलेखन अर्थात् जादू का पिटारा : कविता वाचक्नवी

हिन्दी वॉयस टायपिंग व हिन्दी वॉयस सर्च/ हिन्दी-श्रुतलेखन अर्थात् जादू का पिटारा  : कविता वाचक्नवी 




कल मैंने गूगल द्वारा हिन्दी में जारी श्रुतलेखन सुविधा की सूचना दी थी। यह सुविधा ने गूगल ने कई माह से उपलब्ध करवा रखी है। मैंने फ़ोन पर इसे स्थापित/सक्रिय भी किया हुआ था किन्तु प्रयोग नहीं किया था। इसी बीच मध्य अगस्त में जब गूगल ने वॉयस सर्च के लिए भी हिन्दी उच्चारण की सुविधा जारी की तो मित्रों से बातचीत करते हुए लम्बे लेख आदि लिखने के लिए पूर्व में ही जारी व अपने मोबाईल पर स्थापित की हुई इस सुविधा को सक्रिय करने का प्रसंग भी आ गया और कल उसका तुरन्त प्रयोग कर पहला ईमेल व फेसबुक आदि पर इसकी सार्वजनिक सूचना भी जारी की। 

उत्तर में कल से अब तक कई सौ लोगों ने इसके प्रयोग की विधि पूछी है। क्रमवार दोनों सुविधाओं का प्रयोग करने की विधि यों है - 


गूगल हिन्दी वॉयस सर्च 

सिस्टम पर हिन्दी वायस-सर्च 

गूगल ने ऍण्ड्रॉइड पर मध्य अगस्त में हिन्दी में वॉयस सर्च की सुविधा जारी की। वॉयस सर्च का नया अपडेट हिन्दी का विकल्प साथ ले कर आया है 


यदि आप हिन्दी को वाचिक 'सर्च' की भाषा के रूप में प्रयोग करना चाहते हैं तो ऐसा करें - 

Google Settings >> select Search and Now >> Voice >> Language >> select हिन्दी (भारत)

  • यह सुविधा सक्रिय करने के बाद आप गूगल सर्च पर जाने पर पाएँगे कि सर्च बॉक्स में एक माईक्रोफ़ोन का चिह्न बना हुआ है। 
  • उस पर कर्सर ले जाने पर 'ध्वनि द्वारा खोजें' लिखा हुआ दिखाई देगा। इसे आप क्लिक कीजिए। 
  • क्लिक करते ही लाल रंग का माईक दिखाई देगा और लिखा होगा 'अब बोलें'। 
  • आपको जो खोजना है उसे बोलिए। मैंने तो मन्त्रों का उच्चारण कर भी देखा। किसी आश्चर्य की भाँति आपके बोले जाने वाले शब्द स्वतः 'सर्च बार' में लिखे जाते हुए दिखाई देंगे व तुरन्त उन शब्दों के सर्च परिणाम आपके सामने प्रकट हो जाएँगे। सर्च परिणाम इस बात पर निर्भर करते हैं कि आपका उच्चारण कितना शुद्ध व स्पष्ट था, आसपास शोर व ध्वनियों का स्तर कितना था आदि। 
क्योंकि यह वाचिक सर्च है अतः माईक में जाने वाली अन्य कोई भी ध्वनि इसे प्रभावित कर सकती है। सर्च में 'हूँ' इत्यादि के लिए कभी-कभी आपको परिणाम सन्तोषप्रद नहीं भी लग सकते हैं। वस्तुतः मशीन अक्षर व ध्वनि का अन्तर नहीं समझ पाती। हिन्दी का कोई शब्द/ अक्षर यदि किसी ध्वनि से साम्यता रखता है, जैसे 'हूँ', तो सर्चपरिणाम कुछ बेमेल आ सकते हैं। 

यह सुविधा आप लैपटॉप (क्रोम ब्राऊज़र) व ऍण्ड्रॉइड फोन दोनों पर पा सकते हैं।


गूगल हिन्दी श्रुतलेखन / वॉयस टायपिंग / डिक्टेशन

मोबाईल पर आप अब बोलकर कितना भी बड़े आकार का लेख लिख सकते हैं। गूगल की इस सुविधा द्वारा आप मोबाईल से मैसेज, फेसबुक अपडेट, वाट्सएप पर चैट, ब्लॉग में लेख, वर्ड फाईल में सामग्री आदि अर्थात जहाँ-जहाँ आप मोबाईल से टाईप कर करते हैं, वहाँ-वहाँ केवल बोलकर देवनागरी में टाईप किया हुआ पा सकते हैं। 

यह सुविधा ऍण्ड्रॉइड वाले फ़ोन पर ही उपलब्ध है, अर्थात जहाँ-जहाँ गूगल लैंग्वेज़ इनपुट टूल लगाया हो। लैपटॉप अथवा सिस्टम पर यह सुविधा उपलब्ध नहीं। हाँ, आप लंबे आकार का लेख आदि लिखने के बाद उसे गूगल ड्राईव पर 'सेव' कर सकते हैं और फिर जब समय व सुविधा हो उसे लैपटॉप या सिस्टम पर बैठ सम्पादित कर सकते हैं। 
  मोबाईल पर हिन्दी श्रुतलेखन 

अतः इस सुविधा का प्रयोग करने के लिए आवश्यक है कि आप अपने गूगल खाते से गूगल के 'प्ले स्टोर' पर जाकर 'गूगल हिन्दी इनपुट टूल' को अपने फोन में स्थापित (इन्स्टाल) कर लें व भाषा सेटिंग्स में जाकर इसे सक्रिय कर लें। 


अब फोन पर श्रुत लेखन करने के लिए आपको इस प्रकार करना होगा - 

  • Settings >>Language & Input >>Google Voice Typing (आप इसे सलेक्ट करें व इसके सामने बने 'स्टार' के चिह्न को क्लिक कर खोलें) तो भाषाओं की सूची दिखाई देगी।
  • इस सूची के लगभग एकदम अन्त में 'हिन्दी (भारत)' लिखा हुआ पाएँगे। इसे सलेक्ट करें और फिर सबसे नीचे लिखा हुआ Save दबा दें।
  • सेव होते ही वापिस 'गूगल वॉयस' पर आ जाएँगे। यहाँ Languages के बाद Speech output को क्लिक करें तो तीन विकल्प खुलेंगे। उसमें आपको On चुन कर उसे चिह्नित करना है। 
  • इसके पश्चात् पुनः मुख्य सूची में थोड़ा नीचे जाने पर Block offensive words लिखा दिखाई देगा, उसे भी चिह्नित रहने दें, ताकि हिन्दी के वे शब्द जिन्हें संभवतः ध्वनियाँ मान कर सर्च में रोक दिया जाता हो, वे भी प्रकट हो सकें। 
  • अब लौट कर पुनः language & Input में आइये, Google Hindi Input के पश्चात् सूची में Google voice typing का विकल्प सलेक्ट किया हुआ दीखेगा। आपका काम हो गया है। 

चाहें तो, भाषाओं की सूची से जब हिन्दी (भारत) चुन रहे थे उस समय अंग्रेजी को सलेक्ट करना हटा दें और केवल हिन्दी को ही रखें। ऐसा करने से हिन्दी श्रुतलेखन के परिणाम अधिक स्पष्ट व अच्छे/उत्तम होंगे।

जिन लोगों के पास ऍण्ड्रॉइड फोन की सुविधा न हो, उनके लिए लैपटॉप या सिस्टम पर प्रयोग करने का केवल एक ही विकल्प गूगल ने अभी दिया है। गूगल क्रोम के ब्राऊज़र में गूगल ट्रान्सलेट को खोल कर अपने बाएँ बने विभाग में भाषाओं में 'हिन्दी' को चुनें और वहीं नीचे बने स्पीकर को क्लिक करें। जब वह लाल रंग में दीखने लगे तो बोलना प्रारम्भ करें। वहाँ स्वतः टाईप होता चला जाएगा। टाईप हो चुकी सामग्री को आप जहां चाहें प्रयोग कर सकते हैं। आशा है आगामी दिनों में गूगल इसे ब्लॉगर और ईमेल इत्यादि में भी सक्रिय कर देगा और उस से भी बढ़कर सिस्टम में गूगल इनपुट टूल के साथ ही इसे जोड़ देगा ताकि आप जहाँ चाहे सीधे वहीं जाकर हिन्दी बोलकर बोल कर देवनागरी में लिखवा सकें।
 लैपटॉप पर श्रुतलेखन 


तो इस प्रकार अब आप फेसबुक, ब्लॉग, ईमेल, वाट्सएप, मैसेज आदि पर कहीं भी देवनागरी श्रुतलेखन के लिए तैयार हैं। टाईप करने के लिए कीबोर्ड खुलते ही स्पेस बार को थोड़ी अधिक देर तक दबाए रखने पर या तो स्वतः माईक का चिह्न आ जाएगा अथवा एक पॉपअप विंडो खुलेगी जिसमें आपको Google voice typing को सलेक्ट करना होगा। ऐसा करते ही एक माईक प्रकट होगा जिस के साथ अब बोलें अथवा Speak Now लिखा होगा। आप एक एक शब्द को ठहर ठहर कर शुद्ध रूप में बोलते जाइए, जैसे डिक्टेशन देते हुए बोलते हैं, वे शब्द स्वतः टाईप होते जाएँगे। 

बस इस सुविधा का प्रयोग करते समय आपको विराम चिन्ह इत्यादि स्वयं हाथो से प्रयोग करने होंगे। मैंने बोलकर चिह्न लगवाना चाहा तो पाया कि यदि मैं पूर्णविराम का उच्चारण करुँ तो गूगल 'पूर्णविराम' शब्द लिखकर टाइप कर देता है। अभी इस सुविधा मेँ कुछ ओर सुझाव सुधार भविष्य मेँ होते रहेंगे ऐसी आशा है। कल भेजी श्रुतलेखन वाली मेरी सूचना व ईमेल में इस तथ्य का उल्लेख पढ़कर मित्र श्रीश बेंजवाल ने इसका निदान करने का उपयोगी सुझाव यों दिया है - 

"अगर लम्बा डॉक्यूमेंट है तो विरामचिह्नों का एक जुगाड़ कर सकती हैं। पहले बोलते समय उन्हें शब्द रूप में ही आ जाने दें यानि जहाँ-जहाँ पू्र्णविराम हो 'पूर्णविराम' ही बोलें। दस्तावेज पूरा हो जाने पर वर्ड या किसी अन्य एडीटर में Find and Replace में "पूर्णविराम" को "।" से रिप्लेस कर दें।"


श्रुत लेखन की इस सुविधा का उपयोग करते समय ध्यान रखें कि आप शोर-शराबे में न बैठे हों व आसपास लोगों के बोलने आदि की आवाजें न आ रही हों। 
कल क्योंकि मैं दिन भर हीथ्रो एयरपोर्ट पर थी, लोगों के ईमेल लगातार आ रहे थे कि इसकी विधि बताऊँ तो मैंने बोलकर उत्तर देने का प्रयोग करने की सोची, यत्न भी किया किन्तु आसपास निरन्तर लोगों के बोलने-चालने की ध्वनियों के बीच शुद्ध परिणाम आ ही नहीं पा रहे थे। 


आशा है, आप लोग लोग इस निश्शुल्क सुविधा का उपयोग करते समय गूगल व उसकी टीम को धन्यवाद अवश्य देंगे और हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग नेट पर करने के लिए लोगों को प्रेरित व उत्साहित अवश्य करेंगे। 

हिन्दी-दिवस (14 सितम्बर) वाले माह में ये दोनों सुविधाएँ प्रयोग में लाना प्रारम्भ कर सही अर्थों में हिन्दी-दिवस मनाएँ। 




मंगलवार, 2 सितंबर 2014

बच्चे : प्रधानमन्त्री की वरीयता

बच्चे और प्रधानमन्त्री :  साधारण से असाधारण तक  : कविता वाचक्नवी


आजकल प्रत्येक समझदार व्यक्ति इस बात से चिन्तित है कि समाज की भावी पीढ़ी सही मार्ग पर कैसे चले, उसका सही निर्माण कैसे हो, उसे अच्छे संस्कार कैसे मिलें, वह अधिक सामाजिक कैसे हो, वह अधिक मानवीय व अधिक योग्य कैसे हो। जो लोग स्वयं माता-पिता बन चुके हैं वे तो और भी अधिक चिन्तित रहते हैं और पैसा खर्च कर-कर कर जाने सुबह से रात तक अपने बच्चों को क्या-क्या सिखाने के लिए यहाँ से वहाँ भेजते हैं या ले जाते हैं। प्रत्येक सचेत ही नहीं, बल्कि बुरे-से-बुरे व्यक्ति भी माता-पिता बनने पर अपनी सन्तान को एक अच्छा, बेहतर व भला नागरिक बनाना चाहते हैं (यह बात दीगर है कि वे इसमें अपनी कमियों या अपनी असमर्थताओं के कारण कई बार सफल नहीं होते)। 


हमारे समय में भी, जब हम छोटे-छोटे थे तो हमारे व हमारे साथियों के माता-पिता हमें ऐसी प्रत्येक जगह ले जाते थे, दिखाते थे, समझाते थे, पढ़ाते थे, जहाँ/जिस से कुछ भी अच्छा हो रहा हो और कोई भी अच्छा संस्कार मिलता हो, या जिस से हम में योग्यता, आत्मविश्वास, सद्गुण, गौरव की भावना अथवा प्रेरणा मिलती हो /बढ़ती हो। उस समय भले हमें अच्छा लगता हो या न लगता हो, किन्तु अब बड़े होने पर उनका मूल्य पता चला है कि उन घटनाओं ने हमारे निर्माण में कितनी महती भूमिका निभाई है और आज यदि हम साधारण से थोड़ा भी कुछ विशेष हैं तो उन्हीं सब के कारण। 


फिर धीरे-धीरे जैसे-जैसे टीवी आया, बच्चों और परिवार का समाज से व सत् + संग (अच्छे लोगों की संगत) आदि सब से नाता टूट गया। रही-सही कसर कंप्यूटर ने पूरी कर दी कि बच्चे अपने माता-पिता तक की नहीं सुनते जब वे कंप्यूटर पर किसी खेल में लगे होते हों। बच्चों पर उनके माता-पिता का ही बस नहीं चलता। भारतीय भाषा समाजों की स्थिति तो और भी खराब है क्योंकि हमने नेट पर उनके लिए कोई विकल्प ही उपलब्ध नहीं करवाए। अतः ले-दे कर बच्चे नेट पर गलत-सलत चीजों में समय बर्बाद करते रहते हैं और माता-पिता अवश से इस प्रतीक्षा में रहते हैं कि काश कोई हमारे बच्चों को ऐसा मिल जाए जो उन्हें कुछ समझा सके, सिखा सके या जिस से वे कोई सही बात समझ-सीख सकें। 


ऐसे में देश के प्रधानमन्त्री बच्चों से एक सम्वाद स्थापित करना चाहते हैं, तो यह प्रत्येक माता-पिता के लिए एक अवसर है कि इस घटना से उनके बच्चे को किसी प्रेरक अनुभव की संभावना है। राष्ट्रपति अब्दुल कलाम आज़ाद ने भी युवा पीढ़ी से संवाद स्थापित किया था, वे स्वयं उन्हें पढ़ाने का उदाहरण बने। मोदी आज युवा से भी आगे जाकर बालकों और किशोरों को कुछ उद्बोधन देना चाहते हैं तो यह माता-पिता के लिए एक हितकारी अवसर है, किसी भी माता-पिता को इसमें आपत्ति नहीं हो सकती। पर देश को बर्बाद करने वाले राजनीति के खिलाड़ियों की तो असली रुचि सदा से इस देश की भावी पीढ़ी का विनाश करने में रही है। इसलिए उन्हें डर लग रहा है कि देश की भावी पीढ़ी कहीं देशभक्त प्रधानमन्त्री से देशभक्ति का पाठ न पढ़ ले। अगर देशभक्ति का पाठ पढ़ लिया तो गंदी राजनीति करने वालों की दाल नहीं गलने देंगे ये बच्चे युवा होने पर। वैसे भी जिसने अपनी ही सन्तान पर कभी ध्यान नहीं दिया और मतिमन्द सन्तान बनाई, उस से देश के बच्चों का यह हित देखा नहीं जा रहा। इसलिए इसमें भी राजनीति के पाँसे फेंक रहे हैं। माता-पिता से चाहते हैं कि वे अपनी ही सन्तान के दुश्मन हो जाएँ। एक सुअवसर को खो दें। कैसे-कैसे प्रपंची लोग भरे पड़े हैं !!

सच तो यह है कि कोई भी समझदार और जिम्मेदार माता-पिता इस अवसर का लाभ लेने से अपनी सन्तान को वंचित नहीं करना चाहेगा व न ही वंचित रहना चाहिए। 

शनिवार, 9 अगस्त 2014

'श्रावणी उपाकर्म', 'नारियली पूर्णिमा' व 'रक्षा-बन्धन' : डॉ. कविता वाचक्नवी

'श्रावणी उपाकर्म', 'नारियली पूर्णिमा' व 'रक्षा-बन्धन'  :  कविता वाचक्नवी


श्रावणी पूर्णिमा के पर्व रक्षा-बन्धन की ढेरों मंगलकामनाएँ ! 



इस अवसर की सार्थकता केवल कलाई पर रेशमी डोरे बाँधने में नहीं है, न सज-धज कर माथे पर तिलक करवा लेने में। इस पर्व की सार्थकता अपने जीवनऔर परिवेश में आने वाली स्त्रियों की समूल सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध होने में है। जब बहनें कलाई पर डोर बाँधती हैं तो केवल अपनी रक्षा का वचन लेने के लिए नहीं, अपितु अपने भाइयों को यह स्मरण दिलाने के लिए भी कि स्त्रियों के सम्मान की सुरक्षा करना तुम्हारा कर्तव्य है अर्थात् असुरक्षा का निषेध। 

कुछ लोग रक्षाबन्धन को स्त्री के सामर्थ्य का विरोधी बताने का अभियान प्रतिवर्ष की भाँति इस बार भी चलाएँगे, यह कहकर कि स्त्री क्या कमजोर है जो उसे सुरक्षा चाहिए। वस्तुतः यह पर्व स्त्री को कमजोर होने या सुरक्षा की अपेक्षा करने का नहीं अपितु भाइयों/पुरुषों को यह स्मरण दिलाने और कर्तव्यबोध करवाने का है कि वे अपनी दृष्टि और अपना शक्ति-सामर्थ्य स्त्री-मात्र के सम्मान के लिए प्रतिबद्ध होने और उस सम्मान की रक्षा में लगाने का संकल्प लें।


सुरक्षा करने के दो ढंग होते हैं। एक तो असुरक्षा होने पर सुरक्षा करना और दूसरा असुरक्षित अनुभव करवाने वाला कोई कार्य स्वयं भी न करना, न दूसरों को करने देना। यह पर्व सुरक्षा करने से अधिक असुरक्षित न करवाने का व्रत भी दिलवाता है। बहन-भाइयों के स्नेह का प्रतीक तो है ही। अतः बहनें अपने भाइयों से अपनी रक्षा का नहीं अपितु अपने मान-सम्मान सहित सभी स्त्रियों के मान-सम्मान की रक्षा का व्रत लेती हैं और साथ ही भाई-बहन के रिश्ते को उसी स्नेह-प्यार के साथ बनाए-बचाए रखने का संकल्प भी देती-दिलवाती हैं। 


रक्षा-बन्धन पर वस्तुतः मन की मलीनताओं का परिमार्जन करने के साथ-साथ उसे श्रेष्ठतर स्तरों पर ले जाने का संकल्प करना चाहिए। रक्षा बन्धन आत्मोन्नति व मानवीय मूल्यों के श्रेष्ठ संकल्पों को पूरा करने के भाव से किया-कराया जाता है। ऐसा करने वाले ही मातृशक्ति के उच्च अनुदानों के महत्व को समझ सकते हैं और तभी मातृशक्ति से स्नेह-सम्मान प्राप्त करने की पात्रता अर्जित कर सकते हैं। समाज व राष्ट्र के सदस्यों को यह पात्रता मिलती रहे इस योग्य बनाने के लिए ही इस पर्व का विधान किया गया। 


यही श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को ही 'श्रावणी उपाकर्म' का दिन भी होता है। उपाकर्म का अभिप्राय होता है प्रारम्भ करना। अतः उपाकरण का अर्थ है प्रारम्भ करने के लिए पास लाना या आमन्त्रित करना। मूलतः वैदिक काल में वेदाध्ययन के लिए विद्यार्थियों का आचार्य के पास एकत्रित होने का काल था। गुरुकुलों में उपनयन व वेदारम्भ संस्कार किए जाते हैं, इस यज्ञ के बाद वेद-वेदांग का अध्ययन आरंभ होता है। यज्ञोपवीत बदल कर नए धारण किए जाते हैं। श्रावणी पूर्णिमा को ही 'संस्कृत दिवस' भी मनाया जाता है।


गत वर्ष भी मैंने लिखा था कि श्रावणी पूर्णिमा को 'नारियली पूर्णिमा' भी कहा जाता है क्योंकि समुद्र किनारे बसने वाले वेदपाठी लोग श्रावणी उपाकर्म के विधानानुसार कर, इस दिन केवल नारियल का फलाहार करते हैं। साथ ही संभवतः इसलिए भी क्योंकि सावन में वर्षा का आधिक्य होने के कारण समुद्र किनारे बसने वालों के लिए जल-थल और वर्षा आदि के तूफान में समुद्र में उतरने से आपदा की आशंका रहती थी तो वे समुद्र को नारियल अर्पित करके श्रावणी पूर्णिमा की पूजा आदि करते आए हैं। कोंकण व महाराष्ट्र में नारली पूर्णिमा शब्द का खूब प्रचलन है। प्रकृति एवं पर्यावरण के अनुदानों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के साथ उसके ऋण से यथाशक्ति उऋण होने के भाव से वृक्षारोपण करने का विधान भी है । 


हैदराबाद के निज़ाम द्वारा औरंगज़ेबी फ़रमान जारी कर राज्य में हिन्दू विधि-विधानों (पूजा, यज्ञ, मंदिरों पर झण्डा, यज्ञोपवीत, संस्कार, घंटे-घडि़याल बजाना, कीर्तन, जागरण करना, रामायण, गीता, महाभारत की कथा आदि समस्त कार्यों) पर प्रतिबंध लगा देने के विरोध में वहाँ के नागरिकों को उनके मौलिक अधिकार दिलाने के लिए निज़ाम के विरुद्ध आर्यसमाज ने सत्याग्रह किया था, जिसका संयोजन महात्मा नारायण स्वामी जी ने किया था। आर्यों द्वारा प्रारम्भ किए इस आंदोलन में बलिदान देने के लिए देश भर से आर्यों के जत्थे हैदराबाद पहुँच रहे थे। तब वीर सावरकर भी साथ देने के लिए शोलापुर पहुँचे और कहा 'आर्यसमाज हैदराबाद आन्दोलन में अपने आपको अकेला न समझे'। सावरकर की प्रेरणा पर सनातन धर्मी विचारधारा के भी अनेक व्यक्ति हैदराबाद आन्दोलन में जेल गए और भीषण यातनाएँ सहन कीं। वीर सावरकर ने पुणे जाकर हिन्दू महासभा का विशाल जत्था हैदराबाद भिजवाया। इस प्रकार आर्यसमाज के इस सत्याग्रह आन्दोलन में हिन्दू महासभा ने भी सावरकर की प्रेरणा से पूर्ण सहयोग दिया। 


'हैदराबाद सत्याग्रह स्मारक व्याख्यान-माला' के अनुसार - "खेद है कि गांधीजी एवं अन्य कांग्रेसी नेताओं ने कुसंस्कारों के अनुसार, मुस्लिम तुष्टीकरण नीति के अनुसार ही आर्य समाज के इस असाम्प्रदायिक आर्य सत्याग्रह को साम्प्रदायिक आर्य सत्याग्रह बताया। इतना ही नहीं, गांधी जी ने अपने ‘हरिजन’ पत्र में इसकी कटु आलोचना की। पूर्व मध्य प्रदेश तथा बरार विधान सभा के अध्यक्ष श्री धनश्याम सिंह जी गुप्त ने गांधी जी को निजाम के अत्याचार तथा नागरिक अधिकारों का विशेषकर धार्मिक अधिकारों का हनन करने का सम्पूर्ण विवरण बताया, तब कहीं गांधी जी ने अपने अधखुले मुंह से इस सत्याग्रह की सफलता के लिए कुछ शब्द कहें। गांधी जी के असहयोग रवैये की देशभर में कटु आलोचना हुई। तब सामाजिक अपयश से बचने के लिए उन्होंने कहा- “धार्मिक स्वतन्त्रता के लिए चलाए गए आन्दोलन से तो मुझे सहानुभूति है, किन्तु हिन्दू महासभा द्वारा आन्दोलन में कूद पड़ने से यह साम्प्रदायिक हो गया है।" ऐसी कड़वी बात हिन्दू महासभा के तत्कालीन कर्णधार कैसे सहन कर सकते थे ? उन्होंने तत्काल नहला पर दहला मारा। वीर सावरकर तथा डॉ. मुंजे ने गांधी जी के वक्तव्य का उत्तर देते हुए कहा - "गांधीजी बताएँ, कि वन्देमातरम् को सहन न करने वालों, हिन्दी भाषा का विरोध करने वालों एवं स्वाधीनता संग्राम में सहयोग न देने की धमकी देने वालों की चापलूसी करना, उन्हें सिर पर चढ़ाना क्या बड़ा भारी धर्म निष्पक्षता व न्याय है? क्या वह साम्प्रदायिकता का पोषण करना नहीं है?" उल्लेखनीय है कि गांधी जी के इस निराशा भरे वक्तव्य से आर्य सत्याग्रह को और भी बल मिला और उसमें तेजी आ गई।" 

अन्ततः रक्षा बंधन के दिन ही आर्यसमाज को अपने इस सत्याग्रह में विजय मिली और निज़ाम को झुकना पड़ा। 

आज उपाकर्म, वेदपाठ, अपने भाई-बान्धव, रक्षाबन्धन के सुनहले धागे, संस्कृत दिवस के हजारों संस्मरण और महाराष्ट्र खूब याद आ रहे हैं। 


...तो इस इस बार पुनः इस श्रावणी पूर्णमा के दिन अपनी बेटी, अपनी ननद व अपनी ओर से संयुक्त रूप में नारियल के लड्डू व सेवइयाँ बनाऊँगी ताकि बेटी के भाइयों (अपने सुपुत्रों) ननद के भाई (अपने पति) व साथ ही अपने भाइयों को खिला सकूँ। बेटा व उनके पिताश्री को तो अपनी-अपनी बहन की ओर से प्रत्यक्ष खिला दिया जाएगा; रह जाएँगे तो बस मेरा छोटा बेटा और मेरे भाई ! 


सुपुत्र और अपने भाइयों को बार-बार असीसती हुई ढेरों मंगल कामनाएँ भेज रही हूँ। वे जहाँ भी हैं सदा सुखी रहें और अपने मन-वचन या कर्म से कभी किसी स्त्री के सम्मान व सुरक्षा को आघात न पहुँचाएँ। सभी प्रकार का सुख-सौभाग्य उन पर बना रहे। चिरायु-शतायु हों! 

इन आधुनिक माध्यमों से जुड़े अपने भाइयों के लिए भी यही मंगल कामना है। 

सस्नेह ...
क. वा.


बुधवार, 9 जुलाई 2014

संकलन हेतु रचनाएँ आमन्त्रित

संकलन हेतु रचनाएँ आमन्त्रित 

An appeal to the writers based outside India / भारत से बाहर के लेखकों से रचनाएँ आमन्त्रित

A book named `Meri Maan' (My Mother) has been planned to be published on the concept, ethos and practices of motherhood in different parts of the world. The nature of the book will be literary, cultural and social only. The object of the book is to present a contemporary scenario as well as traditional aura of motherhood in different societies. 

The project is being supported and sponsored by Shri B. K. Birla, renowned industrialist of India. A committee of Indian scholars has been constituted for compilation of articles related to the subject.

We will be grateful if you kindly spare some time for this noble cause and write an article on the above subject, especially in view of the land to which you belong or the country in which at present you reside. The language of the article should be either Hindi or English. In special cases, we will try to translate valuable articles received in other languages too. 
We shall also welcome some poems related to the subject, composed by you or other prominent poets of your country.

We will also require your photograph (passport size) and your bio data. Please, try your best to mail to me all the press materials at the earliest.

A copy of the printed book along with a memento will be sent to you as a mark of respect.

'मेरी माँ' शीर्षक से एक पुस्तक के लिए विश्वभर के रचनाकारों की रचनाएँ/लेख ( साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक) आमन्त्रित हैं। पुस्तक का उद्देश्य विभिन्न समाजों में मातृत्व और उसकी गरिमा/महिमा के विविध पक्षों को रेखांकित/प्रस्तुत करना है। यह योजना भारत के प्रमुख उद्योगपति श्री बी. के. बिरला द्वारा संपोषित है। 

आप जिस देश में रहते हैं, वहाँ मातृत्व की किसी विशिष्ट छवि को उकेरेते हुए एक लेख हिन्दी अथवा अंग्रेजी में हमें शीघ्रातिशीघ्र भेजें। कुछेक महत्वपूर्ण लेखों के अनुवाद का प्रावधान भी है। कुछ बहुत महत्वपूर्ण कविताओं को भी इसमें सम्मिलित किया जाएगा। अतः आप अपने देश के किसी महत्वपूर्ण रचनाकार की 'माँ' विषयक कोई विशिष्ट कविता भी हमें भेज सकते हैं। प्रयास करें कि शब्दसीमा 1000 के लगभग रहे। शेष जानकारी हेतु टिप्पणी द्वारा सम्पर्क करें। 

रचना के साथ रचनाकार का पासपोर्ट आकार का चित्र व संक्षिप्त औपचारिक परिचय भी शीघ्रातिशीघ्र भेजें।  30 अगस्त के पश्चात् भेजी गई रचनाएँ स्वीकार नहीं की जाएँगी। 

प्रकाशनोपरांत स्मृतिचिह्न के साथ लेखकीय प्रति सादर भिजवाई जाएगी। पुस्तक का लोकार्पण आगामी वर्ष दिल्ली में होगा। 

(यदि आप किसी विदेश में रहने वाले लेखक से परिचित हैं तो कृपया उन तक इस सूचना को भिजवाएँ)



गुरुवार, 22 मई 2014

मोदी के कर्तव्य-अकर्तव्य

मोदी के कर्तव्य-अकर्तव्य  :  (डॉ.) कविता वाचक्नवी


मोदी प्रधानमन्त्री पद सम्हालने के लिए विजयी और फिर राष्ट्रपति द्वारा आमन्त्रित क्या हुए, लोगों ने अपनी अपनी पसन्द नापसन्द की सूचियाँ बनानी शुरू कर दीं। मोदी समर्थकों ने ही एक हस्ताक्षर अभियान शुरू किया कि वे संस्कृत में शपथ लें, गंगा से पहले यमुना की सफाई योजना उन्हें शुरू करनी चाहिए, पाकिस्तान को बुलाने से दु:खी हैं मोदी समर्थक और भी इसी तरह की कई कर्तव्य-सूचियाँ (माँग-सूचियाँ) और जाने क्या-क्या। 


लोगों को समझना चाहिए कि मोदी अब भाजपा कार्यकर्ता-मात्र नहीं है, वे भारत के प्रधानमन्त्री हैं, उन्हें मात्र पार्टी के एजेण्डे के अनुसार नहीं अपितु देश और कूटनीति के अनुसार निर्णय लेने हैं। प्रोटोकॉल, अंतरराष्ट्रीय संबंध, विदेश नीति जैसे हजारों मुद्दे इस से जुड़े हैं। प्रधानमंत्री को अपने एजेण्डे पर चलाने की जिदों के चलते ही मोरारजी सरकार जैसी सशक्त रूप से आई सरकार दूसरे लिप्सा और अधिकार की इच्छा वालों द्वारा धराशायी कर दी गई थी। इसलिए प्रधानमन्त्री यह करें, वह न करें, यह करना चाहिए, वह नहीं करना चाहिए आदि उंगली पकड़ कर चलाने की कोशिश जैसे हैं, थोपने जैसा है, इनमें दूरगामी सोच व राष्ट्रीयचिन्तन का अभाव है। भगवान के लिए उन्हें अपने तरीके से काम कर लेने दें। उनका तरीका कितना सही है, यह गुजरात में प्रमाणित हो चुका है। इसलिए बच्चों की तरह नेशनल ओब्जेक्टिव्स का अभाव न दिखाएँ और न ही विवाद खड़े करने वाले मुद्दों को हवा दें, देश बहुत बड़े परिवर्तन के मुहाने पर खड़ा है, जनता की असीम आकांक्षाएँ अब किच-किच की राजनीति से उकता कर नयी कार्यप्रणाली के लिए एकजुट हुई हैं, उनका मान करें। 


देश अपनी पसन्द नापसन्द से बड़ी चीज होती है, यह समझने की जरूरत है। राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी पसंद नापसन्द न थोपें। जैसे प्रणव मुखर्जी भले ही कॉंग्रेस के व्यक्ति हैं किन्तु उस से पहले वे भारत के राष्ट्रपति हैं और उन्होने विचारधारा को भूल कर अपने राष्ट्रीय कर्तव्य को निभाते हुए नए प्रधानमंत्री का सहर्ष स्वागत सम्मान किया, क्योंकि जब आप पद पर होते हैं तो उसकी गरिमा और कर्तव्य आपकी निजी इच्छा-अनिच्छा व पसन्द-नापसन्द से बड़े होते हैं। मोदी जी भी पार्टी- विरोध को लेकर राष्ट्रपति की अवमानना नहीं कर सकते, वे सादर उनसे मिलने गए क्योंकि यही राज/राष्ट्र नीति है। बहुमत वाले दल के संसदीय नेता को राष्ट्रपति के पास जाना ही होता है। इसलिए इन सब मामलों में निजी इच्छा-अनिच्छा या निजी प्रेम-बैर / पसन्द -नापसन्द घुसाना बंद करें। 


यह बँटवारे की राजनीति है । इसलिए अपनी इच्छा-अनिच्छा को करणीय-अकरणीय का नाम देकर देश को चलाने में हस्तक्षेप की कोशिश न करें। जब सभी सार्क देशों को आमन्त्रित किया गया है तो किसी एक देश को आमन्त्रण न देना, उसका घोषित बहिष्कार व उसे स्थायी रूप से शत्रुश्रेणी में डालना है, जो देशहित में कदापि नहीं। यह क्रिकेट मैच नहीं है कि क्रिकेट टीम को आमन्त्रण का मुद्दा हो, यह राष्ट्राध्यक्ष के सम्मान का मामला है और कोई भी कभी देश दूसरे राष्ट्राध्यक्ष का अपमान नहीं कर सकता, जब तक कि प्रकट रूप में पूरी तरह युद्ध की स्थिति न हो। अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों, कूटनीति, विदेश नीति, राष्ट्रीय प्रोटोकॉल, औपचारिकताएँ आदि ढेरों चीजें इसमें संयुत हैं, उन्हें समझे बिना स्वयं को सर्वनिर्णयसम्पन्न समझना बंद करना चाहिए और जनता को विवाद में धकेलने का खेल नहीं खेलना चाहिए। राजनैतिक पूर्वाग्रहों को लेकर पार्टी की राजनीति हो सकती हैं, राष्ट्रनीति नहीं चल सकती। कॉंग्रेस ने यही सब कर तो देश को बर्बाद किया कि अपने राजनैतिक पूर्वाग्रहों और अपनी पसन्द-नापसन्द को पूरे देश पर थोपा। अब देश उस से ऊब चुका है। नई सरकार को नई तरह से और बड़प्पनपूर्वक निर्णय लेते हुए अपनी कार्यप्रणाली तय कर लेने दीजिए। अभी तो सरकार सत्ता में आई भी नहीं। 



और हाँ, जो लोग यह आशा लगाए बैठे हैं कि नई सरकार के पास कोई जादू की छड़ी है कि घुमाई और कायाकल्प हो जाएगा देश का, वे भ्रम में हैं। 60 वर्ष से अधिक तक ध्वस्त, बर्बाद व नष्ट किए गए देश को अधिक नष्ट होने से तो इस क्षण से रोका जा सकता है पर जो लुट और बर्बाद हो चुका है उसे लौटाना कभी संभव हो सकता है क्या ? वैसे भी तोड़ना और नष्ट करना किसी भी चीज को बहुत सरल होता है, निर्माण करना बहुत कठिन व समयसाध्य / श्रमसाध्य होता है ;  एक मकान को बनाने और तोड़ने का उदाहरण देख लिया जाए। इसलिए यदि आप निर्माण में सहयोग देना चाहते हैं तो देश के इस कायाकल्प में नई सरकार का सहयोग करना चाहिए और सब से बढ़कर अपने दैनन्दिन जीवन में राष्ट्रनिर्माण के कर्तव्यों और अपने आचरण में राष्ट्रीय कर्तव्यों, मर्यादा और उच्चादर्शों का समावेश करना होगा यही हम सब का सहयोग होगा।

बुधवार, 21 मई 2014

देश, जनादेश, आप तथा केजरीवाल

देश,जनादेश और केजरीवाल - कविता वाचक्नवी 


जो व्यक्ति काश्मीर पाकिस्तान को देना चाहता है, जो देश के संविधान को पैर की जूती समझता है (कि विधानसभा भंग करने का आवेदन सौंपने के बाद अब पलटी मार रहा है), जो पदलोभ में अंधा है कि त्यागपत्र देने के बाद पुनः गद्दी की लालच में कल कॉंग्रेस से समर्थन माँगने गया था और संविधान व जनता के निर्णय को कुचल कर मुख्यमंत्री दुबारा होने की जुगत करता रहा, जो जनता द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने के बाद छल से पुनः जनता पर शासन करना चाहता है, जिसके देशद्रोहिता के प्रमाण वीडियो में इसके साथियों ने स्वयं दिए हैं, उस व्यक्ति के प्रति अपनी आस्था रखने वाले अपने मित्रों से मैं खेद पूर्वक कहना चाहूँगी कि मुझे उनकी समझ व निष्पक्षता और विवेक पर संदेह होने लगे हैं।


इस व्यक्ति ने देश और संविधान के साथ तो भीषण गद्दारियाँ की ही हैं, जनता के साथ भी भयंकर छल किया है। मुझे सुदर्शन जी की 'हार की जीत' कहानी बार बार याद आती है। जनता के मन से भ्रष्टाचार हटाओ का विश्वास ही इस धूर्त ने समाप्त कर दिया।कानून को, जनता को और देश को और ईमान को अपनी जेब में रखी इकन्नी समझ रखा है इस व्यक्ति ने। प्रधानमंत्री तक को कानून के डायरे में लाने की बात करने वाले ने कानून का मज़ाक उड़ा रखा है। आज यदि वह जेल गया है तो यह कोई महानता या बलिदान नहीं अपितु देश की संवैधानिक प्रक्रिया है। संविधान के साथ खेलने का अधिकार किसी को नहीं। .... और कौन नहीं जानता कि जमानत को स्वयं ठुकरा कर इसने कोर्ट को जेल भेजे जाने को बाध्य किया है। जिसका परिवार दुबई में छुट्टियाँ मनाने जाता है, जो चुनाव सम्पन्न हो जाने के बाद वाराणसी से फ्लाईट लेकर दिल्ली आता है, जो प्रायोजित धन से भाड़े के कार्यकर्ता 25000 प्रतिमाह का भुगतान कर खरीदता है, उसके पास मामूली जमानतराशि भी नहीं है भला? यह नीतीश कुमार की तरह जनता की सहानुभूति लेने की नौटंकी है जो यह समझता है कि जनता इसे उसका बलिदान व त्याग समझेगी और उसके पक्ष में हो जाएगी। यदि यह इतना ही ईमानदार व जनता के प्रति प्रतिबद्ध होता तो स्वयं कहता कि जनता ने इस बार दिल्ली से एक भी आप प्रतिनिधि को न जिता कर जो जनादेश दिया है मैं उसका सम्मान करता हूँ। और स्वयं को इस कुर्सी की दौड़ से अलग ही रखूँगा। पर वह यह कभी नहीं कर सकता। यह एक तरह से जनादेश द्वारा बाहर का रास्ता दिखा दिए जाने के बावजूद जनता पर छल कपट और तिकड़म से शासन करने की मंशा के चलते अब खेला जा रहा नाटक है इसका कि संविधान का दुरुपयोग कर पुनः मुख्यमंत्री बन जाए।   


मुझे आश्चर्य होता है उन बुद्धिजीवी मित्रों पर जो कॉंग्रेस से मोह भंग हो जाने पर अब भाजपा विरोधी होने की कारण मोदी जी का समर्थन न कर पाने की अपनी विवशता में इतना बंधे हैं कि उन्हें कजरी बाबू के काले कारनामों नजर ही नहीं आते। कजरी के अपने सभी साथी, यहाँ तक कि किरण बेदी और अन्ना जी जैसों ने उसे निष्कासित कर उसका साथ छोड़ दिया, उन पर तो भरोसा रखिए। या कजरीभक्ति में सच भी देखना नहीं चाहते ! वस्तुतः यह आप लोगों की आस्था के संकट की घड़ी है, कॉंग्रेस के बाद अब कजरी के अतिरिक्त कोई आधार ही नहीं बचा इसलिए कजरी को महान सिद्ध करना आपकी मजबूरी है। यही समझ आता है।


60 बरस से अधिक समय से साहित्य, पत्रकारिता, अध्यापन, राजनीति शिक्षा और अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों पर कब्जा कर जनता और देश विदेश को छला गया, सच्चाई के गले घोंटे गए, जिसे चाहा हत्यारा, बर्बर और जाने शब्दकोश की किन किन गालियों से नवाजा गया, केवल और केवल कॉंग्रेस और देशद्रोहिता की राजनीति हुई है, हो रही है, भीषण और गंदी से गंदी राजनीति। हम चुप रहे। अब देश के ऐसे संक्रमण काल में भी यदि चुप रहेंगे और जनाधार का निर्माण करने में सहयोगी न बनेंगे तो अपने देशधर्म का निर्वाह न करने का अपराध करूँगी। इसलिए जनता को जिस भाषा और जिस लहजे में समझ आता है उसी भाषा और लहजे में अपना देशधर्म निभाना अनिवार्य है। निभाना चाहिए। निभा रही हूँ।


जिनकी विचारधारा चीन से और अरब देशों के पैसों द्वारा पोषित विचारधारा के हाथों गिरवी है, उन्हें मेरे देशधर्म के निर्वाह पर आपत्ति होना स्वाभाविक है क्योंकि उनकी आस्थाओं की जड़ें कहीं अन्यत्र हैं। मैंने कभी उनके यहाँ जाकर उनकी विचारधारा का गला घोटने का काम नहीं किया, ऐसी ही अपेक्षा मैं भी उनसे करती हूँ।

 जिनकी आँखें न खुली हों, उनकी सहायतार्थ ये दो वीडियो - 

रविवार, 27 अप्रैल 2014

भारत, चुनाव और नरेन्द्र मोदी

 भारत, चुनाव और नरेन्द्र मोदी : कविता वाचक्नवी


जो लोग ऐसा समझ रहे हैं कि अमुक व्यक्ति शासन में आ जाए तो देश का तुरंत आमूलचूल कायाकल्प हो जाएगा या हो जाना चाहिए वे भ्रम में हैं क्योंकि भले ही कोई भी नेता आ जाए, भारत में सकारात्मक बदलाव नहीं आने वाला। वह इसलिए क्योंकि राजनीति का यह लोकतन्त्र उसे कुछ करने के अधिकार नहीं देता; क्योंकि लोक तो महा अनुशासनहीन, मूढ़, अल्पज्ञ बल्कि कहना चाहिए बड़ी संख्या में देशद्रोही और बिकाऊ तक हो चुका है। और जब तक यह लोक नहीं सुधरता, आत्मानुशासन नहीं आता, दैनंदिन जीवन से भ्रष्टाचरण नहीं जाता तब तक देश का सुधार बड़ी दूर की कौड़ी है और देश को बर्बाद होने से कोई नेता नहीं बचा सकता। इसीलिए मोदी आ भी जाएँ तो यह लोक जब तक स्वतः सुधार की राह पर नहीं चलेगा तब तक देश का भला नहीं होगा क्योंकि उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है कि फेर दी तो राम राज्य आ जाएगा।

 फिर भी मोदी को ही मैं समर्थन देती हूँ क्योंकि उनके न आने से एक परिवार की बपौती बना हुआ है देश, आआपा वाले राष्ट्रविरोधी शक्तियों के साथ हैं और बेहद बचकाने और मूढ़ हैं। वे साल-भर देश नहीं सम्हाल सकते जो कुछ ही दिन में कई-कई नौटंकियाँ कर गए। आज भी वे 2-4 साल के बच्चे की तरह नित नई रूठ मनौव्वल की नौटंकी में लीन हैं। यदि वे आए तो साल भर बाद ही देश पर पुनः चुनाव, अविश्वास प्रस्ताव और खरीद फरोख्त का खेल व नई सरकार की विपत्तियाँ आ जाएँगी। यों भी उनका देशद्रोही पक्ष जग जाहीर हो चुका है। 


मोदी के विरोध में देश विदेश की शक्तियाँ जिस तरह एक जुट होकर घबराई विरोध में लगी हैं वह प्रमाणित करता है कि देश पर जिन जिन की नजर है, मोदी उनकी मनमानी के लिए खतरा हैं। यह खतरा बनना भारत की इस समय सबसे बड़ी आवश्यकता है। यह हमारे सबल होने की दिशा में बड़ा कदम होगा। मोदी का जितना भीषण विरोध होता है अर्थात मोदी का आना उतना देश का सशक्त होना है। इसलिए मैं मोदी के खुले पक्ष में हूँ।


रही कॉंग्रेस की बात तो कॉंग्रेस देश को कभी भी उबरने नहीं देना चाहती क्योंकि देश का स्वाभिमान टूटना, लोगों का अशिक्षित व स्वार्थी रहना, परस्पर घृणा करना, धर्मांध बने रहना, अनुशासनहीन होना आदि सब नकारात्मक चीजें कॉंग्रेस के मंतव्यों के पक्ष में जाती हैं। देश के लोग जितने अधिक बिना रीढ़ के हों, जितने अधिक मनासिक गुलाम हों, कॉंग्रेस के लिए उतना अच्छा है। क्योंकि वे कॉंग्रेस को खुली लूट से रोकने की हिमाकत नहीं कर सकते, देश को बेचने से रोकने के लिए आवाज नहीं उठा सकते, वे अपनी भुखमरी व अशिक्षा से ही उबर नहीं सकते तो कॉंग्रेस का तो इसी में हित है।

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

क्यों न हो समलैंगिकता प्रतिबन्धित

क्यों न हो समलैंगिकता प्रतिबन्धित : कविता वाचक्नवी



उच्चतम न्यायालय के समलैंगिक सम्बन्धों के विपक्ष में आए निर्णय पर जिस तरह से देश में स्यापा मचा है उसे देख कर सिर पीटने का मन होता है। जिस देश में HIV के आंकड़ों का अनुपात देख कर पैरों तले धरती सरक जाए, उस देश को आधुनिक बनाने के नाम पर और कितने जीवनों का बलिदान लेने की मुहिम में लगे हैं लोग ! 

चिदम्बरम फरमाते हैं कि "इस निर्णय के कारण अब भारत किवापस 1860 के दौर में चला गया है"। हद्द है भाई ! जिस देश में साफ शौचालय तो क्या, घरों में शौचालय तक नहीं है, जिस देश में दैनंदिन रूप से हजारों बलात्कार होते हैं, जिस देश में स्त्रियाँ आज भी अपने मौलिक अधिकारों के लिए नियमित घुटती/मरती व मार दी जाती हैं, जिस देश में लाखों बच्चे अपने शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित हैं, जिस देश में भूख से मरने वालों की सुनने वाला कोई नहीं, जो देश सर्वाधिक भ्रष्ट देशों की सूची में है, वह देश अपने इन कारणों से पिछड़ा नहीं दीखता आपको ? उस देश में समलैंगिकता को वैध बनाना ही सबसे बड़ी आवश्यकता दीखता है, ताकि अपने को आधुनिक कहलाया जा सके ? कितना हास्यास्पद है ! 


एड्स से मरने वाले और ग्रस्त परिवार के करोड़ों सदस्यों की राय माँग कर देखिए, आपको पता चल जाएगा कि कितने देशवासी इन सम्बन्धों की माँग करते हैं। बस अन्तर यह है कि वे लोग अपनी आवाज़ लेकर मीडिया के सामने प्रदर्शन करने नहीं जुट सकते जिनके पास जीवन और मृत्यु के संघर्ष से बाहर आने का न तो अवसर है और न सुध ! जिनके पास ये अवसर, यह सुविधा और यह मौका उपलब्ध है वे निस्संदेह वह वंचित वर्ग नहीं हैं, जिसके लिए जीवन और मृत्यु प्राथमिकताएँ हैं। 


ऐसे यौन-सम्बन्धों के अधिकारों के लिए लड़ने से पहले दूसरे मूलभूत अधिकारों की किसी को नहीं पड़ी। बिना मूलभूत अधिकारों की दिशा में आगे बढ़े कोई देश यौन-अधिकारों के लिए लड़ रहा है, यह बेहद डरावना है और निन्दनीय भी। आज तो ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने भी इन सम्बन्धों को अवैधानिक करार दे दिया... ! मिस्टर चिदम्बरम ! कितना पिछड़ा हुआ है ना ऑस्ट्रेलिया ? 


क्या आप जानते हैं ये इन सम्बन्धों को वैध करार देने से खाए पिए अघाए लोग जो शोषण में पूर्व संलिप्त हैं, उन्हें इस यौन शोषण का लाईसेन्स भी यह कानून उपलब्ध करवा देगा। वे अपने अधीन्स्थों का यौन शोषण धड़ल्ले से यह सिद्ध कर कर पाएँगे कि ये स्वेच्छा से बने सम्बन्ध हैं। 
कुछ तो आँख खोलना सीखिए अब भारतवासियो! 

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