Thursday, May 22, 2014

मोदी के कर्तव्य-अकर्तव्य

मोदी के कर्तव्य-अकर्तव्य  :  (डॉ.) कविता वाचक्नवी


मोदी प्रधानमन्त्री पद सम्हालने के लिए विजयी और फिर राष्ट्रपति द्वारा आमन्त्रित क्या हुए, लोगों ने अपनी अपनी पसन्द नापसन्द की सूचियाँ बनानी शुरू कर दीं। मोदी समर्थकों ने ही एक हस्ताक्षर अभियान शुरू किया कि वे संस्कृत में शपथ लें, गंगा से पहले यमुना की सफाई योजना उन्हें शुरू करनी चाहिए, पाकिस्तान को बुलाने से दु:खी हैं मोदी समर्थक और भी इसी तरह की कई कर्तव्य-सूचियाँ (माँग-सूचियाँ) और जाने क्या-क्या। 


लोगों को समझना चाहिए कि मोदी अब भाजपा कार्यकर्ता-मात्र नहीं है, वे भारत के प्रधानमन्त्री हैं, उन्हें मात्र पार्टी के एजेण्डे के अनुसार नहीं अपितु देश और कूटनीति के अनुसार निर्णय लेने हैं। प्रोटोकॉल, अंतरराष्ट्रीय संबंध, विदेश नीति जैसे हजारों मुद्दे इस से जुड़े हैं। प्रधानमंत्री को अपने एजेण्डे पर चलाने की जिदों के चलते ही मोरारजी सरकार जैसी सशक्त रूप से आई सरकार दूसरे लिप्सा और अधिकार की इच्छा वालों द्वारा धराशायी कर दी गई थी। इसलिए प्रधानमन्त्री यह करें, वह न करें, यह करना चाहिए, वह नहीं करना चाहिए आदि उंगली पकड़ कर चलाने की कोशिश जैसे हैं, थोपने जैसा है, इनमें दूरगामी सोच व राष्ट्रीयचिन्तन का अभाव है। भगवान के लिए उन्हें अपने तरीके से काम कर लेने दें। उनका तरीका कितना सही है, यह गुजरात में प्रमाणित हो चुका है। इसलिए बच्चों की तरह नेशनल ओब्जेक्टिव्स का अभाव न दिखाएँ और न ही विवाद खड़े करने वाले मुद्दों को हवा दें, देश बहुत बड़े परिवर्तन के मुहाने पर खड़ा है, जनता की असीम आकांक्षाएँ अब किच-किच की राजनीति से उकता कर नयी कार्यप्रणाली के लिए एकजुट हुई हैं, उनका मान करें। 


देश अपनी पसन्द नापसन्द से बड़ी चीज होती है, यह समझने की जरूरत है। राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी पसंद नापसन्द न थोपें। जैसे प्रणव मुखर्जी भले ही कॉंग्रेस के व्यक्ति हैं किन्तु उस से पहले वे भारत के राष्ट्रपति हैं और उन्होने विचारधारा को भूल कर अपने राष्ट्रीय कर्तव्य को निभाते हुए नए प्रधानमंत्री का सहर्ष स्वागत सम्मान किया, क्योंकि जब आप पद पर होते हैं तो उसकी गरिमा और कर्तव्य आपकी निजी इच्छा-अनिच्छा व पसन्द-नापसन्द से बड़े होते हैं। मोदी जी भी पार्टी- विरोध को लेकर राष्ट्रपति की अवमानना नहीं कर सकते, वे सादर उनसे मिलने गए क्योंकि यही राज/राष्ट्र नीति है। बहुमत वाले दल के संसदीय नेता को राष्ट्रपति के पास जाना ही होता है। इसलिए इन सब मामलों में निजी इच्छा-अनिच्छा या निजी प्रेम-बैर / पसन्द -नापसन्द घुसाना बंद करें। 


यह बँटवारे की राजनीति है । इसलिए अपनी इच्छा-अनिच्छा को करणीय-अकरणीय का नाम देकर देश को चलाने में हस्तक्षेप की कोशिश न करें। जब सभी सार्क देशों को आमन्त्रित किया गया है तो किसी एक देश को आमन्त्रण न देना, उसका घोषित बहिष्कार व उसे स्थायी रूप से शत्रुश्रेणी में डालना है, जो देशहित में कदापि नहीं। यह क्रिकेट मैच नहीं है कि क्रिकेट टीम को आमन्त्रण का मुद्दा हो, यह राष्ट्राध्यक्ष के सम्मान का मामला है और कोई भी कभी देश दूसरे राष्ट्राध्यक्ष का अपमान नहीं कर सकता, जब तक कि प्रकट रूप में पूरी तरह युद्ध की स्थिति न हो। अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों, कूटनीति, विदेश नीति, राष्ट्रीय प्रोटोकॉल, औपचारिकताएँ आदि ढेरों चीजें इसमें संयुत हैं, उन्हें समझे बिना स्वयं को सर्वनिर्णयसम्पन्न समझना बंद करना चाहिए और जनता को विवाद में धकेलने का खेल नहीं खेलना चाहिए। राजनैतिक पूर्वाग्रहों को लेकर पार्टी की राजनीति हो सकती हैं, राष्ट्रनीति नहीं चल सकती। कॉंग्रेस ने यही सब कर तो देश को बर्बाद किया कि अपने राजनैतिक पूर्वाग्रहों और अपनी पसन्द-नापसन्द को पूरे देश पर थोपा। अब देश उस से ऊब चुका है। नई सरकार को नई तरह से और बड़प्पनपूर्वक निर्णय लेते हुए अपनी कार्यप्रणाली तय कर लेने दीजिए। अभी तो सरकार सत्ता में आई भी नहीं। 



और हाँ, जो लोग यह आशा लगाए बैठे हैं कि नई सरकार के पास कोई जादू की छड़ी है कि घुमाई और कायाकल्प हो जाएगा देश का, वे भ्रम में हैं। 60 वर्ष से अधिक तक ध्वस्त, बर्बाद व नष्ट किए गए देश को अधिक नष्ट होने से तो इस क्षण से रोका जा सकता है पर जो लुट और बर्बाद हो चुका है उसे लौटाना कभी संभव हो सकता है क्या ? वैसे भी तोड़ना और नष्ट करना किसी भी चीज को बहुत सरल होता है, निर्माण करना बहुत कठिन व समयसाध्य / श्रमसाध्य होता है ;  एक मकान को बनाने और तोड़ने का उदाहरण देख लिया जाए। इसलिए यदि आप निर्माण में सहयोग देना चाहते हैं तो देश के इस कायाकल्प में नई सरकार का सहयोग करना चाहिए और सब से बढ़कर अपने दैनन्दिन जीवन में राष्ट्रनिर्माण के कर्तव्यों और अपने आचरण में राष्ट्रीय कर्तव्यों, मर्यादा और उच्चादर्शों का समावेश करना होगा यही हम सब का सहयोग होगा।

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