बुधवार, 6 नवंबर 2024
क्या अमेरिकन समाज स्त्रीविरोधी है? : (डॉ.) कविता वाचक्नवी
मंगलवार, 4 अप्रैल 2023
ऐतिहासिक ध्वंस और पुनर्निर्माण : (डॉ.) कविता वाचक्नवी
2-3 सौ वर्ष पूर्व आई औद्यौगिक क्रान्ति के साथ पश्चिम में साईंस और रिलीजन दो हुए, और रिलीजन के फंदे से कुछ लोग बाहर निकले तथा कुछ आधुनिक होने लगे अन्यथा रिलीजन वालों का उस से पूर्व के लगभग 17-अठारह सौ वर्ष कितना भयंकर कुत्सित एवं क्रूर रूप था, इस का अनुमान आज के आतंकी को देख कर भी आप नहीं लगा सकते। एकदम जंगली, नृशंस और हत्यारा समाज था।
केवल स्त्रियों के प्रति सभी प्रकार के आत्यन्तिक अमानुषिक व्यवहार की ही परत खोलें तो उस समाज की पारिवारिक व पंथानुगत संरचना का कलुषित रूप देखा–सोचा न जा सकेगा। साईंस इसीलिए रिलीजन की शत्रु बनी। उन आत्यन्तिक अमानुषिक कदाचारों व नृशंसताओं के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के चलते तुलनात्मक सन्दर्भों में उस क्रूर काल के घटनाक्रम को पितृसत्तात्मकता के रूप में परिभाषित किया गया। वह अपने समाज पर उन के अपनों का दोषारोपण था।
दुर्भाग्यवश भारत के कुपढ़ों ने, जिन्हें इस पश्चिमी समाज की तत्कालीन संरचना, इतिहास व वास्तविकता का रञ्चमात्र भी अनुमान नहीं, पता होना तो दूर; उन्होंने यहाँ के वर्तमान से सारे आरोप अपने समाज पर आरोपित कर लिए, यहाँ पश्चिम के आयातित विमर्शों, चिन्तन, मुद्दों, बहसों को ज्यों-का-त्यों अपना बना-कह-समझ-लिख कर । इस से बड़ा, क्रूर विद्रूप कोई अन्य नहीं हो सकता था।
जिन मूर्खों को यहाँ के घटनाक्रम, इतिहास, संरचना, समाज का आभास तक नहीं था, वे अपने अन्धे दीदों के मारे अपना अभिशाप समूची भारतीय संस्कृति के मत्थे मढ़ झूठे गवेषक बन गए। और कई भारतीय पीढ़ियाँ अभिशप्त रही हैं इस तथाकथित गवेषणा को ढो अपनी पीठ रक्तिम करते। पितृसत्तात्मक क्रूरता पश्चिम के समाज का इतिहास व अभिशाप थी।
यदि भारतीय इतिहास को ठीक से पढ़ा-जाना होता, और पश्चिमी समाज के इतिहास की वास्तविकता का किञ्चित भी आभास होता तब तो कोई समझ पाता कि रजकण की सूर्य किरण से क्या तुलना ? किन्तु भारतीय समाज के साथ अपने अज्ञान और धूर्ततावश किए इस दुराचार को करने वालों ने जो जघन्य अपराध किया है, उस की गम्भीरता का 1% भी अनुमान आज संस्कृति- संस्कृति चिल्लाने वाले तथाकथित पढ़े-लिखों तक को नहीं है।
हतभागी हैं ये सब पीढ़ियाँ और हतभागी है हमारा क्रीत समाज। ऐसा भयंकर पाप किया गया है। और ऐसा करने वाले अभी चुके नहीं हैं, वे निरन्तर अजस्र उन्हीं स्खलनों में स्वयं भी रत हैं और अन्यों को स्खलित करने की कुचेष्टाओं में भी निमग्न।
इधर भारतीय समाज है कि उसे इस लूट व कदाचार का कोई अनुमान ही नहीं, वह जरा-सी राजनैतिक जीत को ही अपनी परम संतुष्टि का माध्यम व ध्येय मान लेता है, या जरा-सी छुटपुट गति बढ़ने को अपनी परम विजय। ऐसे लोगों का यह जानना अत्यावश्यक है कि आप देश व संस्कृति के साथ खड़े हैं तो यह युद्ध तो अभी पूरा शेष है। युद्ध क्षेत्र में अभी तो आप पूरे डटे तक नहीं हैं। युद्ध अभी शेष हैं, विजय तो उस के बहुत बाद होगी और विजय के बहुत पश्चात् फिर ध्वंस का अनुमान लगाया जाना होगा; तब कहीं जा कर पुनर्निर्माण के कार्यों की नींव रखी जा सकेगी।
इतना धैर्य है न ? नहीं है तो सीखिए अन्यथा विश्व में अन्य कोई शक्ति नहीं है जो उस वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर को खोज या बचा सके। वह धरोहर विलुप्ति की सीमा पर है और विश्व इतिहास आप को व हमें कभी क्षमा नहीं करेगा, किञ्चित नहीं, कदापि नहीं।
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कविता वाचक्नवी
सोमवार, 4 सितंबर 2017
अमेरिका : डूब-उबरने के दिन
बुधवार, 8 मार्च 2017
राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम क्यों ? : कविता वाचक्नवी
(८ मार्च २०१७ को महिला दिवस के उपलक्ष्य में फरगुदिया द्वारा आयोजित परिचर्चा हेतु लिखित विचार)
शुक्रवार, 11 नवंबर 2016
अमेरिका में उग्र विरोधप्रदर्शन क्यों
शुक्रवार, 24 जून 2016
ब्रिटेन का भविष्य अब संसद (सांसत) में !
ध्यातव्य है कि यह सारा खेल अति-उदारवादी विचारधारा के गर्भ से जन्मा और उसी की प्रचण्ड प्रतिक्रिया है। इसका सीधा प्रभाव अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव पर भी पड़ेगा।
भारत इस से कुछ संकेत ग्रहण कर सके तो हितकर होगा।
#KavitaVachaknavee #Brexit #UK
गुरुवार, 7 अप्रैल 2016
वैदिक नववर्ष मंगलमय व शुभकारी हो : कविता वाचक्नवी
शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015
यौवन ऐसा भी ....
वह बच्चा जूते पहनते समय बहुत प्रसन्न था और हँस भी रहा था तो मेरे बेटे ने उसके दो चित्र भी लिए और वहाँ से अपने कक्ष पर लौट कर फिर यह सारी घटना तुरन्त वाट्सएप पर हमें लिख कर बताई व चित्र भी भेजे।
और हाँ, चलते-चलते अन्तिम बात सुपुत्र ने ज़ोर देकर महिला से कही -
यह जोड़ना चाहूँगी कि सबसे कनिष्ठ मेरा बेटा लगभग 24 वर्ष का है और यह वही बेटा है जो दिसम्बर में मध्य रात्रि को एक अनजान युवती की सुरक्षा की भावना से उसे नगर सीमा से भी 20 किलोमीटर बाहर उसके घर तक पहुँचाने गया था, जिसे मैंने 22 दिसम्बर को विस्तार लिखा भी था, वह घटना तो काफी रोमांचक भी थी क्योंकि उसमें बड़ा खतरा भी था। उसे यहाँ पढ़ा जा सकता है-https://www.facebook.com/kvachaknavee/posts/10153151019579523
गुरुवार, 27 नवंबर 2014
जसोदाबेन का पत्नीत्व
मैं स्त्रियों व उनके अधिकारों की समर्थक हूँ किन्तु स्त्रियों को आगे कर उनके नाम पर अपना मंतव्य सीधा करने वालों व उनकी महत्वाकांक्षाओं की नहीं और उन स्त्रियों की भी नहीं जो ऐसा करती या माध्यम बनती हैं।
एक मनुष्य होने के नाते जसोदाबेन के प्रति पूरा सम्मान है और उनके मौलिक अधिकारों के प्रति भी। वे एक साधारण स्त्री हैं और शांति से जी रही थीं, किन्तु बदमाश मीडिया और विरोधी पार्टियों के हाथ एक अस्त्र लग गया है और इस तरह वे उन्हें इस्तेमाल करते हुए उनकी शांति भंग कर रहे हैं। एक साधारण सामान्य ढंग से जीने वाली स्त्री को शांति से जीने दे लेना चाहिए। भगवान के लिए उन्हें शांति से जीने दो।
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जिन्हें पति पत्नी सम्बन्धों के चलते सहानुभूति हैं, वे डॉ दीप्ति की 24 मई की निम्नलिखित स्टेटस व वहाँ चली परिचर्चा को ध्यान से पढ़ें। यहाँ पर अपनी टिप्पणियों में मैंने कुतर्कों के उत्तर दे ही दिए हैं।
पहले दीप्ति जी की यह प्रतिक्रिया व स्टेटस -
डॉ. दीप्ति भारद्वाज says
May 24 ·मोदी जी , ये कैसी महत्वाकांक्षा -------
क्यों हर बार रामराज्य की स्थापना के लिए सीता की ही अग्नि परीक्षा होती है ? क्यो सीता ही वनवास भोगे ? क्यों पुरुष की अतिशय महत्वाकांक्षा स्त्री के अस्तित्व को नकारती है ? क्यों हर बार स्त्री का ही बलिदान क्यों ? कृष्ण को द्वारिका बसाने के लिए रुक्मिणी को साथ लेना पड़ा था।
मोदी जी ये जीत तब तक अधूरी है जब तक आप अपनी अर्धागिनी को उचित सम्मान नही देते ? मोदी जी हर माँ आप जैसे पुत्र की कामना करेगी पर हर स्त्री आपसे डरेगी। आपने भारत के लिये जो साधना की वो तब तक बेमानी है जब तक उस साधना की मौन साधिका जसोदाबेन को उनका मान न मिले। आपने जो किया वह दुनिया ने देखा लेकिन. उसके लिए किसी स्त्री ने अपने सपनों और आकाँक्षाओ की बलि दी। भरी जवानी में खण्डित दाम्पत्य को जिया। फिर भी आपके लिए मंगलकामनाए कीं ।
क्या माँ की तरह ही उस मौन साधिका को प्रधानमंत्री बने पति से मिलना नही चाहिये ।
मोदी जी आपकी ये जीत स्त्री की एकान्तिक साधना के सहयोग से सम्भव हो सकी । कितनी पीड़ा झेली है जसोदाबेन ने जब लोग उन्हें दयाभाव से देखते रहे होंगे । कितना कष्ट रहा होगा उन्हें जब सब होते हुए भी कुछ नही के दंश को पीया होगा।
मोदी जी कभी बचपन में ये भजन सुना था आज आपको सुनाती हूँ -
कान्हा रे तू राधा बन जा भूल पुरुष का मान
तब होगा तुझको राधा की पीड़ा का अनुमान ।
मैं तो पूरी खुशी नही मना पा रही ।
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