Sunday, March 1, 2009

`प्रेम' और `तटस्थ' : `समकालीन भारतीय साहित्य'

`प्रेम' और `तटस्थ' : `समकालीन भारतीय साहित्य' में



साहित्य अकादमी, (३५,रवींद्र भवन, नई दिल्ली) की प्रतिष्ठित द्वैमासिक हिन्दी पत्रिका `समकालीन भारतीय साहित्य' के नववर्षांक (जनवरी-फरवरी २००९ ) के हिन्दी कविता स्तम्भ में मेरी २ कविताएँ ( `प्रेम' तथा `तटस्थ') प्रकाशित हुई हैं। अंक तो यद्यपि काफी पहले ही आ गया था, किंतु ऐसा सूझा ही नहीं कि उन्हें अपने नेट के मित्रों से बाँटा जाए। इसका मूल कारण अपने लिखे को संकोचवश प्रसारित प्रचारित न करने की वृत्ति का रहा। आत्मश्लाघा जैसा लगता है। अब कुछ सहृदय मित्रों की इच्छा का मान रखते हुए ( विशेषत: अनूप भार्गव जी के पत्र ) इन्हें नेट पर प्रस्तुत करने का मन बनाया है|

तो इन दोनों को अविकल प्रस्तुत कर रही हूँ।


----प्रेम----
- कविता वाचक्नवी
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बात दरअसल इतनी -सी है
कि बच्चे हो गए हैं बड़े


आँगन में सूखे पत्ते बुहारती
माँ की कमर
अब कभी सीधी नहीं होती
झल्लाती है पत्तों पर
कुछ कम गिरा करें वे
अपने न रहने पर
दरवाजे के आगे जमे ढेर में
एकाकी भविष्य वाले
पिता की लाचारी पर
गुपचुप आँख पोंछती है
कि पानी दूर से लाएगा कौन?
अपने रहते सहेजी चीजें
सही हाथों तक
बाँट दी हैं उसने
पोती के पदवीदान का चित्र
लोहे के संदूक से निकाल
देखते
नहीं भरता जी
भरती हैं आँखें।


घुटनों के विश्वासघात से बेहाल
बूढ़ा पिता
खाँसता है लगातार,
धर्मकाँटे पर
रातपाली और बुढ़िया की चिंता करता
कमा लाता है कुछ सौ रुपये
माँ की हथेली
खुली रह जाए
उस से पहले तक सौंपने के लिए
कहीं बच्चों के न पूछने की चोट में
उदास न हो जाए माँ |

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----तटस्थ----
- कविता वाचक्नवी
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बर्फ की आँधी बार- बार आती है
दरककर लुढ़कते उड़ने लगते हैं पहाड़
ढलान पर
सफेदी में खड़े जंगलों से मिल
जमे बर्फीले पत्त्थर
कूद जाते हैं खाईयों में
सूखने लगते हैं रक्त के उबाल
ऊँचाई छूने को उठा कोई हाथ
लुढ़क कर लगातार फिसल जाए
दिग्भ्रम बवंडर की उठान में,
कुछ सामान
अकड़ी हड्डियों वाली ऐंठी देह
जीवाश्म होती रहे निरंतर,


संसार सारे कोहराम के बीच भी
सो लेता है आराम से
क्योंकि उसकी देहरी तक
पहुँचते नहीं तूफ़ान
और घर में
उजाला, आग और रोटी
भरपूर हैं अभी ।

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(पृष्ठ ३४-३५, वर्ष २९,अंक १४१, जनवरी-फरवरी २००९, समकालीन भारतीय साहित्य (साहित्य अकादमी की द्वैमासिक पत्रिका), सम्पादकमंडल : सुनील गंगोपाध्याय, सुतिंदर सिंह नूर, . कृष्णमूर्ति
सम्पादक : ब्रजेन्द्र त्रिपाठी


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