Sunday, August 4, 2013

"भाषा, साहित्य और सर्जनात्मकता" : कविता और दिल्ली विश्वविद्यालय

"भाषा, साहित्य और सर्जनात्मकता" में कविता  : कविता वाचक्नवी



आज आधिकारिक रूप से यह सुखद सूचना आप सब से बाँट सकती हूँ कि - 

दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने नए पाठ्यक्रम में 'अनिवार्य हिन्दी' के 'आधार पाठ्यक्रम' की पुस्तक ("भाषा, साहित्य और सर्जनात्मकता") में मेरी कविता "जल" को सम्मिलित किया है। 

पुस्तक गत दिनों 26 जुलाई 2013 को​ जारी हुई ​व इसी सत्र से पढ़ाई जानी प्रारम्भ हुई है। इस सत्र से सभी विद्यार्थी 'अनिवार्य विषय हिन्दी​' की पुस्तक के रूप में इसे पढ़ेंगे। 


- ध्यातव्य है कि ​ वर्ष 2002 में​ एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा उनकी अन्यभाषा/ हिन्दी की पाठ्यपुस्तक में भी कई वर्ष मेरी​ कविता सम्मिलित रही है व केंद्र सरकार द्वारा संचालित देश भर के विद्यालयों में पढ़ाई जाती रही है।

- साथ ही दिल्ली के पब्लिक स्कूलों के पाठ्यक्रम हेतु 'ओरियंट लाँगमैन' ने भी वर्ष 2003 में अपनी 'नवरंग रीडर' में मेरे दोहे सम्मिलित किए थे।

- इसके अतिरिक्त केरल राज्य की 7वीं व 8वीं की द्वितीय भाषा हिन्दी की पाठ्यपुस्तकों में भी वर्ष 2002 में ही ​मेरी बाल कविताएँ सम्मिलित की गई थीं।

- अब देश के शीर्षस्थ विश्वविद्यालय के मुख्य​ पाठ्यक्रम का हिस्सा​ होने का सौभाग्य मिला है, जो अत्यंत विरलों को संभव है। ​

.... तो इस प्रकार अब दिल्ली विश्वविद्यालय ने भी रचनाकार के रूप में प्रसन्न होने का एक बड़ा कारण उपलब्ध करवा दिया है।


यह गौरव अपने माता-पिता, आचार्यों, शुभचिन्तकों, मित्रों व परिवार को समर्पित करती हूँ।


जल 
===

जल, जल है
पर जल का नाम
बदल जाता है।


हिम नग से
झरने
झरनों से नदियाँ
नदियों से सागर
तक चल कर
कितना भी आकाश उड़े
गिरे
बहे
सूखे
पर भेस बदल कर
रूप बदल कर
नाम बदल कर
पानी, पानी ही रहता है।

श्रम का सीकर
दु:ख का आँसू
हँसती आँखों में सपने, जल!


कितने जाल डाल मछुआरे
पानी से जीवन छीनेंगे ?
कितने सूरज लू बरसा कर
नदियों के तन-मन सोखेंगे ?
उन्हें स्वयम् ही
पिघले हिम के
जल-प्लावन में घिरना होगा
फिर-फिर जल के
घाट-घाट पर
ठाठ-बाट तज
तिरना होगा,


महाप्रलय में
एक नाम ही शेष रहेगा
जल …..
जल......
जल ही जल ।

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यह कविता मेरे काव्यसंकलन “मैं चल तो दूँ” (2005, सुमन प्रकाशन) में संकलित है।

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