Wednesday, May 8, 2013

जीवन की व्यक्तिगत गाथा ....

जीवन की व्यक्तिगत गाथा ....  :  कविता वाचक्नवी



पिताश्री इंद्रजित देव 


विगत एक माह से पिताजी की भीषण अस्वस्थता व जीवन के साथ संघर्ष में उनके, मेरे व हमारे मित्रों, परिचितों, परिवारिजनों व शुभचिंतकों तक कम से कम समय में एक साथ सूचना पहुँचाने के माध्यम के रूप में इन्टरनेट और विशेषतः फेसबुक ने बड़ा सहयोग दिया। 

ऐसे समय में जब परिवार बार-बार एकाधिक लोगों के फोनकॉल्ज़ आदि का उत्तर देकर उन्हें विस्तार से जानकारी, सूचना आदि नहीं दे सकता या निश्चिन्त नहीं कर सकता ऐसे में ये माध्यम बड़े कारगर होते हैं, हुए।

विदेशों में लोगों के आकस्मिक संकट की स्थितियों में फंसे होने पर अपने ट्वीटर खातों से एक संदेश दे कर जीवन रक्षक सहायता लेने के कई उदाहरण हैं। कभी कोई घर में फँस गया या सड़क में हिमपात में अटक गया तो इन नवीनतम संसाधनों ने उसे जीवनदान दिया क्योंकि उसके एक सन्देश से उसके सब जगह फैले सहयोगी मित्रों ने अपने अपने तईं सहायता दिलवाने के यत्न शुरू किए। कई बार तो दूसरे देश में कोई सहायता की आवश्यकता पड़ने पर लोगों ने फेसबुक, ट्वीटर के माध्यम से जुड़े अपने मित्रों का सहयोग दिया/लिया। कई बरसों से बिछड़े परिवार इस माध्यम से मिले और कइयों ने अपने खोए बच्चों को इस माध्यम से ढूँढ निकाला। इस तरह ये संसाधन केवल ज्ञान और जानकारी के लिए ही नहीं अपितु जीवनरक्षक और सम्बन्धियों तक पहुँच बनाने के बड़े माध्यम भी बने, व्यक्तिगत से व्यक्तिगत और सामाजिक से सामाजिक, राष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय अवसरों, कार्यों व उद्देश्यों के लिए इनका उपयोग मानव-समाज के लिए अतीव महत्व का है। जो लोग इस महत्व को नहीं जानते वे दूसरों को उनकी निजी आवश्यकताओं से जुड़े मुद्दों पर लिखने के लिए हास्यास्पद ढंग से शिक्षा देते दिखाई देते हैं या आलोचना करते पाए जाते हैं। जैसा कि गत दिनों से आज तक यहाँ मुझे भी देखने/झेलने को मिला। 

मेरे लिए फेसबुक की दुनिया एक आत्मीय परिवार और सामाजिक परिवेश की भाँति है, जिसमें लोग परस्पर एक दूसरे के सुख दु:ख में सहायक बनते हैं और सहायक न बन सकें तो कम से कम सुख दु:ख में साथ खड़े होते हैं, सुख दु:ख बाँटते हैं। किसी का जन्मदिवस और वर्षगाँठ है तो बधाइयाँ देते हैं, कष्ट है तो सान्त्वना देते हैं, सहयोग का प्रस्ताव देते हैं। इसीलिए 'सोशल नेटवर्किंग साईट्स' कहा जाता है इन्हें। 

पिताजी के स्वास्थ्य को लेकर हमारे मित्रों ने हमारी संकट की घड़ी में जिस प्रकार अपने शब्दों, आशीर्वचनों, कइयों ने स्वयं जाकर, कुछ ने मेडिकल क्षेत्र के लोगों से जान-पहचान की जानकारी आदि दे कर जिस प्रकार हमारा मनोबल बढ़ाया वह अविस्मरणीय है। उन के प्रति कृतज्ञ हूँ। लोग बारम्बार अपनी ओर से सन्देश भेज कर आज, अभी तक उनके विषय में चिन्तित हैं। इसलिए मुझे उपयुक्त लगता है कि आज सब को एक साथ निश्चिन्त किया जाना अनिवार्य हो गया है। क्योंकि अभी कुछ घंटे पूर्व ही अस्पताल ने उन्हें कल छुट्टी देने के कागज तैयार कर दिए हैं। अभी यद्यपि आगामी 6 माह उनका उपचार चलेगा और 10-12 दिन में ऑपरेशन से जुड़ी अंतिम कार्यवाही पूरी होगी किन्तु अब वे घर जा सकते हैं। 

पिताजी के स्वास्थ्य में सुधार से मानो मेरा जीवन लौट आया हो और मेरी ही आयु बढ़ गई हो। मैंने कभी अपने पिताजी को सिर दर्द होते भी नहीं देखा। वे मेरे जीवन का उत्स केवल दैहिक रूप में ही नहीं, अपितु मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक आदि सभी प्रकार से भी हैं। पिताजी ने जितनी तपस्या मुझे गढ़ने में की है, संसार में शायद ही कोई पिता अपनी संतान के लिए उतनी और वैसी तपस्या कर सकता होगा... लगभग असंभव ! उसे बताया बखाना भी नहीं जा सकता। 
मेरे लिए अपने पिताश्री का अस्तित्व मेरे होने की अनिवार्य शर्त है। यह कल्पना भी दुष्कर है कि मैं हूँ और वे नहीं हैं। उनके प्राण मुझ में और मेरे उनमें अटके हैं...... । 
आज मेरा मन, उन्हें रोग से उबरते देख, पुनः जीवन की ओर अग्रसर होता जान पड़ता है। यद्यपि आगामी 6 माह अभी उन्हें डॉक्टरी निर्देशों व परिचर्या में रहना होगा ईश्वर का लाख-लाख धन्यवाद। 

मुझे मानो अपने मन में उत्सव की अनुभूति जैसा लग रहा है। प्रभु की अपार कृपा, पिताजी की तपस्या, भाई-भाभी व परिवार की सेवा तथा हजारों लाखों लोगों की शुभकामनाओं व प्रार्थनाओं ने यह सुखद दिन दिखाया है। मैं किस किस को धन्यवाद दूँ और कैसे समझ नहीं पा रही। जो मित्र आत्मीय सम्बल बन इन घड़ियों में साथ रहे उन सब को व्यक्तिगत संदेश भेजना संभव नहीं अतः इस माध्यम के द्वारा आप सभी के प्रति आभार व्यक्त करना चाहती हूँ। स्वीकारें ! पिताजी के शतायु होने की कामना व उनका वरद हस्त हम पर सदा बने रहने की अशेष कामना है। शुभचिंतकों, मित्रों व हितैषियों का पुनः धन्यवाद। इस आड़े समय में जिन जिन ने जो सहयोग दिया उनके प्रति आभारी हूँ।



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