Tuesday, September 11, 2012

सामाजिक न्याय और वेब मीडिया : (डॉ.) कविता वाचक्नवी

 सामाजिक न्याय और वेब मीडिया : एक छोटी टीप    - (डॉ.) कविता वाचक्नवी



सामाजिक न्याय में वेब मीडिया की भूमिका के संदर्भ में हमें मीडिया के सभी आधुनिक स्वरूपों से व उसकी शक्ति से परिचित होना अनिवार्य है। इस आधुनिक स्वरूप में उसकी जनांदोलनकारी भूमिका के साथ साथ सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर उपस्थित आम आदमी की सामाजिक न्याय के प्रति आस्था व आवश्यकता भी कोई कम महत्व की नहीं है। वह आम आदमी अपने छोटे छोटे सरोकारों से लेकर व्यापक अंतरराष्ट्रीय सरोकारों तक से अपने को प्रभावित पाता है व उन पर अपनी राय देता है। ऐसे अनेकानेक छोटे बड़े मुद्दों पर वह अपने मित्रों, परिचितों व साथियों तक को विचार विमर्श के लिए साथ ले लेता है और एक संवाद स्थापित करता चलता है। आधुनिक तकनीक का कमाल यह है कि जितने अधिक लोग जिस कथ्य को अधिक देखते हैं वह कथ्य उतना ऊपर व आगे आता जाता है और इस अनुपात में व इस तकनीक से और- और लोगों के सम्मुख वह स्वतः ही उपस्थित हो जाता है और उनकी सोच को प्रभावित करने के साथ साथ उन्हें राय देने या राय बनाने को विवश कर देता है। कथ्य, तथ्य अथवा विचार की नकारात्मकता अथवा सकारात्मकता इसमें मायने नहीं रखती। इसलिए और भी आवश्यक हो जाता है कि सकारात्मक व जनोपयोगी लोकहितकारी प्रसंगों के साथ अधिकाधिक लोग खड़े हों ताकि वे ही चीजें वेबपन्नों पर क्रम से आगे आती जाएँ। यह एक प्रकार से समाज-मानसिकता के निर्माण की तकनीक भी है।


वेब ने सामाजिक न्याय के प्रति आस्था व उसकी इच्छा रखने वाले विश्वभर के व्यक्तियों व समूहों को परस्पर निकट लाने व संवाद स्थापित करने, सूचनाएँ, जानकारियाँ व विचारों के आदान-प्रदान के साथ साथ विमर्श को सरल व संभव कर दिया है। ये मुद्दे स्थानीय राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर तक के होते हैं। 


वेब पर मीडिया से अभिप्राय मात्र पत्र-पत्रिकाओं तक ही सीमित नहीं है।  ईमेल, ब्लॉग, माईक्रोब्लॉग्ज, पॉडकास्ट, कंटेन्ट शेयरिंग साईट्स (यूट्यूब, फ्लिकर, विमिओ आदि ) सोशल नेटवर्किंग साईट्स, भांति भांति के गूगल व याहू समूह, ऑनलाईन पटीशन, ईमेल कैम्पेन्स (email campaigns),  दूरस्थ वीडियो अदालतें आदि वेब के माध्यम से संभव हुई हैं और जनमत तैयार करने से लेकर न्यायप्रणाली पर दबाव बनाने तक में अपनी कारगर भूमिका निभा रही हैं। `विकीलीक्स' से बड़ा उदाहरण शायद ही कोई हो, जिसके कर्ता धर्ता जूलियन असांजे को लंदन स्थित किसी दूसरे देश (Ecuador) के दूतावास में जीवन बिताने को बाध्य होना पड़ रहा है क्योंकि उसने वेब मीडिया की न्यायपक्षीय ऐसी शक्ति व हथियार का उपयोग किया जिससे कई देशों की सरकारें सांसत में पड़ गईं। 


वेब मीडिया की सामाजिक न्याय में बढ़ती इसी भूमिका के चलते सरकारें इन्टरनेट और वेब पर पर तरह तरह के प्रतिबंधों पर उतर आई हैं। ऐसे प्रतिबंधों का सीधा-सा अर्थ यही है कि सामाजिक न्यायप्रणाली में कोई खोट है, जिसके प्रतिकार के लिए उठी आवाजों की शक्ति के आगे सत्ता का भूगोल डोलने लगा है।  


भारत में अभी-अभी असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी ने वेब की शक्ति व सामाजिक न्याय के प्रति उसकी भूमिका  को भारतीय मानस के सम्मुख फिर से प्रमाणित कर दिया है। इस समय वेब पर असीम के बनाए कार्टूनों को एक दूसरे के साथ बाँटने की बाढ़ आई हुई है और इन्टरनेट पर छोटे बड़े पोर्टल से लेकर आम आदमी तक इस घटना का विरोध करता दीख रहा है। बीबीसी की साईट की पहली पंक्तियाँ थीं - "जिस तरह से असीम त्रिवेदी को गिरफ्तार किया गया है उससे लगता है कि इस सरकार का आम जनता के साथ, भारत के लोकतंत्र के साथ रिश्ता खत्म हो चुका गया है।"   एक तरह से पूरा वेब मीडिया असीम के पक्ष में जनमत जुटाने व तैयार करने में कमर कस कर लगा है। वेब मीडिया की ऐसी भूमिका उन बड़े सामाजिक परिवर्तनों की सूत्रधार निस्संदेह बन रही है जिनकी आवाश्यकता आम आदमी को न्याय जुटाने के लिए अक्सर होती है।

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