Sunday, February 12, 2012

"... अमर वचन ये विद्यासागर नौटियाल के "

"... अमर वचन ये विद्यासागर नौटियाल के " 




"हरी घास को चर जाएँगे वृषभ काल के 

इक्कीसवीं सदी में 

अमर वचन ये 

विद्यासागर नौटियाल के "



नौटियाल जी नहीं रहे, यह दु:खद समाचार मिला तो मन कष्ट से भर गया। मन में उनकी स्मृतियों को ताज़ा करती अपने ईमेल्ज़ में उनसे हुए संवादों को खोजती रही।


' पहल ' पत्रिका पर केन्द्रित मेरे हिन्दी-भारत पोर्टल पर छपे आलोक श्रीवास्तव जी के लेख (पाखंडी नैतिकता का अश्वमेध जारी है : पहल के बहाने ) के संदर्भ में टिप्पणी करते हुए उन्होंने अपने ईमेल में लिखा था - 



"maine blog dekkha. 2006 ke baad se maine 'kathadesh' se apne rishte tod liye the . usne mujhe bhi kaafi be-izzatkiya tha. lekin mein kisi se aisi chhejon ka zikra tak nahin karta.apna samay kimti hota hai, uska upyog rachnatamak karyon mein hi k iya jana chahiye, aisa mera maana hai.


'kathadesh ' ki' pahal' se tulna nahin ki jani chahiye.

hari ghass ko char jayenge brishabh kaal
ke/ ikkiswin sadi mein/amar bachan ye/vidya sagar nautiyal ke."


इसके उत्तर में (`पल्लव' के सुझाव पर ) मैंने उनसे पूछा था कि क्या आपकी ये पंक्तियाँ वहाँ ब्लॉग पर प्रतिक्रियाओं में लगा दूँ अथवा नहीं। इस पर उनका जो उत्तर आया, उस से उनकी सत्यनिष्ठा, साहस व विवेक का प्रमाण मिलता है। 


आज उन दिवंगत आत्मा को प्रणाम निवेदित करते हुए, स्क्रीनशॉट ( चित्र ) के रूप में उस ईमेल को मैं ज्यों का त्यों दे रही हूँ।










उक्त ईमेलाचार में भविष्यवाणी व चेतावनी-सी देकर हिन्दी समाज को सचेत करती उनकी रोमन में लिखी काव्यपंक्तियों को ( प्रारम्भ में ) देवनागरी में कर दिया है।


क्या इन पंक्तियों में छिपी वेदना का अर्थ हम लगा पाएँगे ? और लगा पाए तो क्या अपने को  इस "हरी घास को चर जाने" वाले छद्म, अनाचार से विलग करने का साहस कर पाएँगे ? 

यदि नहीं, तो हमारी श्रद्धांजलियाँ केवल औपचारिकता-भर नहीं लगतीं आपको ?




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