Saturday, December 13, 2008

" या निशा सर्वभूतानाम् तस्यां जागर्ति संयमी"

" या निशा सर्वभूतानाम् तस्यां जागर्ति संयमी"

तालेबंदी,गिरोहबंदी, मंदी और चतुर चतुरानन चोरों की चाँदी







चर्चा के हर मंच पर घणा विमर्श चल रहा है, यह आत्ममन्थन, विवेचना और आत्मपरीक्षण का अवसर जैसा भी हों सकता है ब्लॉग जगत के व्यक्तित्व के लिए| ऐसी स्थितियाँ इतवारी गुफ्तगू के दिन से [ जिसमें लेखकों द्वारा नेट पर अपनी सामग्री को सुरक्षित रखने के उपायों (यथा,कॊपी करने के प्रावधान को अक्षम करना आदि) के कारण मेरी व कुछ अन्य लेखकों की ऐसी तैसी व भर्त्स्ना की गई थी] ऐसे बनीं कि अगले दिन व फिर उस से अगले भी, .... आज तक क्रम चला आ रहा है|

यद्यपि किसी प्रकरण में पता नहीं हम सभी किसी निष्कर्ष पर पहुँचे कि नहीं या यों ही आरोप प्रत्यारोप और स्पष्टीकरण व अपने को सही सिद्ध करने की जद्दोजहद में लगे हैं- सबके अपने-अपने राम जानें।

आज की तारीख में की जा रही इस चर्चा को आप सिरे से नकारना चाहें तो नकार दीजिये प्रभुओ!, आप प्रभुतासम्पन्न हैं....। और वर्चस्व व सत्ता का खेल भारत में, संसार में, किसी भी ईमानदार कोशिश के साथ कुछ भी कर सकता है। देश के पहरुए जब सोते हैं तो जगाने वालों का हश्र क्या होता है, यह इस देश की जागरुक मानी जाने वाली जमात से तो नहीं छिपा, हाँ, लचर व्यवस्था और सोए हुए पहरुओं के कारण देश की क्या दशा होती है, यह हमने एक बार और, एक बार और सही, देखते देखते अभी अभी २६ नव. को फिर से देखा है। हाँ तो जनाब, इस मार के बाद हमें थोड़ा थोड़ा समझ आने लगा जान पड़ता है कि पहरुओं के सचेत होने की कितनी गंभीर आवश्यकता होती है और सुरक्षा के प्रबंधन में खामियाजे के क्या दनादन स्टेन गनों ( गणों) से निकलते-से परिणाम होते हैंपहरुओं का जागना और सुरक्षा की चाक चौबंदी की आवश्यकता अब भी समझाने की आवश्यकता नहीं है देश में किसी को। साथ ही यह भी समझ आ गया है कि हर व्यक्ति को सचेत होकर पहरुए का दायित्व निभाना होगा व सुरक्षा के इंतजाम भी पुख्ता रखने होंगे|


यह जरूरत केवल देश की सीमाओं और पाकिस्तानी कारस्तानी तक ही सीमित नहीं है| आक्रान्ता हर जगह, हर भेस में हर चीज हथियाने की घात लगाए बैठे हैं,... और हम हैं कि अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित या सचेत बेचारे आम आदमी की सौ असुरक्षाओं की दुहाई को भी जैसे नज़रअंदाज़ करते व गलत प्रमाणित करते पाए जाते तथा इस भावना का मखौल उड़ाते हैं या उसकी इस वृत्ति को देश की सेवा में समर्पित न होने के तमगे देते हैं व भले-बुरे और ग़लत-सही के पाठ भी पढाते हैं| अब २६ नव. ने जो तमाचा हमें मारा है व सुरक्षा में खामियों का और पहरुओं के जागरूक न होने का जो प्रमाण दिया है, उसके बाद किसी और प्रमाण की जरूरत नहीं है कि क्या करणीय है व क्या अकरणीय, क्या सही क्या गलत|


आप को ऐसा ही एक और प्रमाण अपने ब्लॉग जगत में देखना हो तो आइये ताज़ा-ताज़ा गरमागरम चाय की चुस्की से जीभ आप भी जलाइये, जैसे मेरी अभी अभी जली है। यह भी आपकी स्वायत्तता, स्वतंत्रता,वर्चस्व और लोकतंत्रवादी होने का अधिकार हो सकता है कि ऊँह कर कर हाथ झाड़ चलते बनें, क्योंकि भई, जैसे देश जाए भाड़ में, तैसे ब्लागजगत और साहित्य जाए भाड़ में, कोई हमारी-आपकी ही जिम्मेदारी है कि अस्मत के लुटेरों से दुश्मनी मोल लें या जगह जगह जाकर ख़ुद रखवाली करते फिरें एक- एक चीज की ? नेता लोग तो देश सेवा का मेवा पाने के लिए होते हैं, जानदेवा का तो नामलेवा भी यहाँ नहीं रहने देने का रिवाज और परम्परा है ना !! तो ऐसे हर देश और साहित्य के नेताओं के श्रीचरणों में भारतीय मिट्टी की गरीब जनता की गुहार है कि माईबाप! कौउनों तो घर लूटे लिए जाता है सरकार! कुछ तो सुरक्षा की गारंटी दीजिए, आप तो देश सेवा का व्रत लिए थे| शपथ भी खाई थी भरी संसद में... और आपकी सेवा-सेवा और भला-भला जैसी शब्दावली पर रीझ कर ही हम गरीब जनता ने आपकी अपने आपको सच्चा सेवक प्रमाणित करने और कहने की बात पर विश्वास किया था हुज़ूर! आपके रहमो करम पर चलने वाला यह देश ( लक्षणा में -साहित्य) कभी भी लोग बाग अपनी झोली में भर चुरा ले जाने लगे हैं| ज़रा नज़रे इनायत कीजिए, आपकी हिन्दी के भले और हिन्दी की सेवा ( ओह, देश के भले और देश की सेवा) वाले व्यक्तित्व में छेद हुए जाते हैं ----


दायर की जाती पटीशन -

आज एक संदेश मुझे मेरे मेल बॉक्स में मिला


main apne swabhav ke viruddh aaj blogvani kee pravishtiyan dekh raha tha. ek sheershak dekhkar kunwar bechain kee gazal padhne oopar diye link par gaya . kinheen aur sajjan ka blog hai vah.par dee gaee gazal dr. kunwar bechain kee hai----meri anek baar kee padhee,sunee aur uddhrit kee gai.mujhe kaheen unka naam naheen dikha.


मैंने तुंरत खोज ख़बर ली व जो हाल हमारे पहरुओं, सुरक्षाप्रबंधों, हिन्दी - सेवकों और हिन्दी की भलाई के नामलेवाओं का देखा उसे आप भी देखिए| कुँवर बेचैन की इतनी प्रसिद्ध इस ग़ज़ल की सरे आम चोरी का यह नज़ारा हमारी पीठ थपथपाने को बहुत है कि नहीं? लोगबाग वाह वाह करते नहीं अघाते! ये हैं हमारी साहित्य-संस्कृति व समाज के भावी व वर्तमान पहरुए !!


आप लम्बी तान कर सोईये, कहीं आपकी नींद (कुछ घंटे की ज़रा-सी नींद के बाद) उचट गई तो आप कितनों को इसका खामियाजा उठाने की सज़ा दे सकते हैं |


मेरा क्या ?? मुझे तो रात आधी में नींद बर्बाद करके लिखने की बीमारी है। अरे अरे, आप क्यों परेशान होते हैं मेरी इस दशा से, असल में मेरी तो ड्यूटी है -- भई, पहरेदार और रखवाली का काम करने वाले तो चौकीदार सदा से कहे जाते हैं| मैंने तो आज तक अपनी पूरी आचार्य परम्परा से यही सीखा है --

" या निशा सर्वभूतानाम् तस्यां जागर्ति संयमी"

और फिर हम अपनी खामियों को ग़लत सिद्ध करते नहीं थकते और इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं| हैं न हम वाकई महान ???

उक्त चौर्यकर्म के लिंक को क्लिक करके शायद कई लोग वहाँ तक अब मेरी तरह न पहुँच पाएँ , मैंने उसी आईडी को ब्लागस्पाट में खोजा तो जो पन्ना खुला उसका लिंक है यह





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