Tuesday, February 5, 2013

देह पीड़ा से भले लहरी नहीं ... : कविता वाचक्नवी

देह पीड़ा से भले लहरी नहीं .......  :  कविता वाचक्नवी



वर्ष 2003 के आसपास लिखी अपनी एक ग़ज़ल को अपने ही स्वर में 'डेनमार्क' के रेडियो सबरंग के लिए वर्ष 2008 में चाँद शुक्ला जी के आदेश व माँग पर सस्वर रेकॉर्ड करवाया था। 


यों तो यह गजल उनकी साईट पर मेरी कई अन्य कविताओं के काव्यपाठ सहित वहाँ गत 4-5 वर्ष से उपलब्ध है और वागर्थ हिन्दी-भारत आदि पर साईडबार में भी; किन्तु लिखित पाठ के साथ पहली बार यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ। 

सस्वर पाठ इस लिंक को क्लिक कर सुना जा सकता है -



     देह पीड़ा से .....
 - कविता वाचक्नवी

देह पीड़ा से भले लहरी नहीं 
नाग से तो प्रीत कम ज़हरी नहीं 

राज-मुद्रा ने तपोवन को छला 
जबकि मर्यादा रही प्रहरी नहीं 

मैं उठाए बाँह बटिया पर पड़ी 
जिंदगी मेरे लिए ठहरी नहीं 

डूब पाती मैं भला कैसे यहाँ 
झील तो दिल से अधिक गहरी नहीं 

गाँव, घर, द्वारे इसे प्यारे लगें 
आज भी 'कविता' हुई शहरी नहीं 


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