Saturday, November 3, 2012

उत्सवों पर एक टीप : कविता वाचक्नवी

उत्सवों पर एक टीप  :  कविता वाचक्नवी


Holi - Dancersमूलतः प्रत्येक देश के सभी उत्सव और त्यौहार तत् तत् स्थानीय प्रकृति और कृषि से प्रारम्भ हुए और उन्हीं से जुड़े हैं। कालांतर में ये सामाजिकता का पर्याय बन गए और समाज के चित्त की अभिव्यक्ति का माध्यम भी। 


समाज के चित्त में पारस्परिकता में आई स्वाभाविक खरोंचों के चलते कुछ और आगे आने पर क्रमश: लोगों ने जैसे जैसे इन्हें विभाजित किया तैसे तैसे इन्हें पूजा-पद्धतियों के नाम पर नियोजित आयोजित करना प्रारम्भ कर लिया और ऐसा करने का फल यह हुआ कि उत्सवों को ही बाँट दिया गया। इसी बँटवारे के बीच कुछ नए उत्सव और त्यौहार भी जोड़ दिए गए ताकि बँटवारे की रेखा स्पष्ट की जा सके या आयोजनों को संख्या  अधिक की जा सके । 


प्रकृति, ऋतुएँ, कृषि और स्थानीयता से मानवमन के विलय की मूल भावना से जुड़ कर प्रारम्भ हुए उत्सवों की संरचना और विधान बदल लिए गए। 


इस से और भी आगे आने पर, अब, उत्सव न तो कृषि आधारित रहे हैं, न सामाजिकता व लोकचित्त की पारस्परिकता और न ही उतना पूजा पद्धति और धर्म (?) के अधिकार में । 


धीरे-धीरे उत्सव अब बाजार की शक्तियों या बाजार की मानसिकता से संचालित व आयोजित होने लगे हैं। मानव-मन की उत्सवप्रियता ने इस सहसंबंध को और बल दिया है पर साथ ही इससे यह भी रेखांकित हुआ है कि मानव-मन और लोकचित्त से धीरे-धीरे जैसे कभी कृषि व पारस्परिकता की भूमिका क्रमश: कम होने लगी थी, उसी प्रकार वर्तमान समय में पंथों व पूजापद्धतियों का अंकुश भी कम होने लगा है.... कम से कम बाजार ने तो उसे पछाड़ ही दिया है। क्योंकि उत्सव अब सीधे-सीधे मनोरंजन पर केन्द्रित होने लगे हैं। 


उत्सवों व त्यौहारों का बाजार से धीरे धीरे अधिकाधिक संचालित होते चले जाने वाला यह परिवर्तन कितना सकारात्मक है अथवा कितना नकारात्मक यह तो नहीं कह सकती किन्तु यह बहुत थोड़े अर्थों में अंतराल को पाटने का काम करता अवश्य दीखता है। पर साथ ही यह कहीं एक नए वर्ग अन्तराल को भी जन्म दे रहा है जो भले धर्म या पूजापद्धति से अलग न हो किन्तु आर्थिक स्तर पर अलग अवश्य होगा / है। धर्म का नाम लेकर बंटे हुए या अर्थ के आधार पर बंटे हुए किसी भी समाज में कोई अंतर नहीं।


किन्हीं अर्थों में ये स्वाभाविक प्रक्रियाएँ प्रतीत होती हैं क्योंकि सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति की क्षमताएँ भिन्न हैं, विशेषताएँ व कमजोरियाँ भी भिन्न हैं, इच्छाएँ व आकांक्षाएँ भी भिन्न। इसी मनोविज्ञान को समझ कर इन सब अंतरालों को पाटने के काम आने वाले उत्सव और त्यौहार कभी समाज ने मूलतः इसी उद्देश्य से प्रारम्भ किए होंगे कि चलो एक समय तो ऐसा हो जब लोग परस्पर मिल कर हँसे और खुशी मनाएँ। इसीलिए जैसे-जैसे स्थानीय ऋतुएँ और प्रकृति तत् तत् स्थानीय समाज को खुले में मिलने जुलने की भरपूर अनुमति नहीं देतीं, उन्हीं दिनों त्यौहार अधिकाधिक आते हैं ताकि उस बहाने पारस्परिकता बनी रहे और मांनवमन का उल्लास व ऊर्जा भी। हमारे मनोभेदों ने उस उल्लास का भी क्या से क्या कर दिया ! 


इस बरस उत्सवों की इस बेला में उल्लास का यह बंटवारा कम से कम करें, यह हमारा उद्देश्य होना चाहिए। तभी आपका और हमारा त्यौहार मानना सार्थक है। स्थानीयता व स्थानीय समाज से कट कर या उन्हें काटकर, त्यौहार मनाना या उनके त्यौहारों से अलग रहना, दोनों सामाजिक अपराध हैं और त्यौहारों की मूल भावना के विरुद्ध भी। ऐसा कदापि न किया जाए। जो-जो जिस भौगोलिक स्थान पर है, वहाँ के स्थानीय समाज को उत्सव में सम्मिलित करें और उनके उत्सवों को स्वयं भी मनाएँ; तभी उत्सव मनाना कुछ अर्थों में सार्थक होगा। धीरे-धीरे समाज से जुड़ने की यह प्रक्रिया जब हमारे मनों के भीतर तक बस जाएगी, उस दिन पूरे अर्थों में सार्थक। 


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