Monday, October 5, 2009

जब भीतर बरसात न हो तो इन की लिपटन सुहाती ही है

......पर जब भीतर बरसात न हो तो इन की लिपटन सुहाती ही है.......

कल रात सोते सोते में लन्दन का मौसम एकदम बदल गया | लगता है, रात-भर बरखा हुई......
पर रात को तो लिखते हुए  मैं  देर तक जग ही रही थी, बिना आहट टिम टिम बुदकी-सी फुहार गिरी जान पड़ती है | 



इसी ठण्ड और बूँदाबांदी  में  जूते - जैकेट चढ़ा कर सुबह के नियमित भ्रमण  पर निकले | घर से सटी  झील का चक्कर लगाया | चश्मे के कांच पर बाहर बूँदें लिपट लिपट गईं |

.... पर जब भीतर बरसात न हो तो इन की लिपटन सुहाती ही है | ....सो सुहाती रही |  सारस, बतखें, बगुले अपनी धमाचौकड़ी छोड़ जाने कहाँ गुम  थे आज | 

फिशिंग वालों ने भी आज बहुधा अपने टेंट समेट लिए दिखाई पड़े | आधा घंटा तेज टहल कर लौटे तो जैकेट और जूते भीगे हैं | 


सुई की नोक-सी अदृश्य बूँदे अभी भी  गिर रही हैं |

संसार का जीवन विकट से विकट वातावरण में भी रुकता नहीं, फिर यह तो अभी शुरुआत है | ठण्ड अभी तो शुरू भी नहीं हुई | इसी महीने घड़ियाँ एक घंटा पीछे कर दी जाएँगी |  तब ठण्ड की घोषित शुरुआत होगी |

समय हमारी पकड़ से दूर होते हुए भी हमारी मुट्ठी में कैसे कैद रहता है न ....







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