Friday, March 20, 2009

एक समीक्षा और

एक समीक्षा और

गत दिनों जिस पुस्तक के लोकार्पण की सूचना दी थी व तदुपरांत पुस्तक चर्चा के अंतर्गत (स्वतंत्र वार्ता के लिए फिर साहित्य कुञ्ज के लिए) उसकी मीमांसा डॉ. ऋषभ देव जी ने की थी, उसी पुस्तक पर दैनिक हिन्दी मिलाप के लिखा गया उनका रिव्यू भी निजी रूप में लेखक के लिए संजोने की चीज है। उसी का अविकल पाठ साभार यहाँ सहेज सँजो रही हूँ। -






डॉ. कविता वाचक्नवी (1963) हिंदी की प्रतिष्ठित कवयित्री हैं। उनका कविता संग्रह ‘मैं चल तो दूँ’ अपने विषय वैविध्य और शैली वैशिष्ट्य के लिए काफी चर्चित रहा है। वे भारतीय जीवन मूल्यांे के प्रचार-प्रसार में संलग्न संस्था ‘विश्वम्भरा’ की संस्थापक महासचिव है तथा अनेक सामाजिक और साहित्यिक संस्थाओं से संबद्ध है। हिंदी कंप्यूटिंग क्षेत्र में उन्होंने विशेष पहचान अर्जित की है। हिंदी भारत, अथ, संहिता, वागर्थ, बियांड द सेकण्ड सेक्स : स्त्री विमर्श, बालसभा, पीढ़ियाँ, संदर्शन, विश्वम्भरा, ब्लागर-बस्ती, स्वर-चित्रदीर्घा व नव्या जैसे वेब पोर्टलों के साथ-साथ वे भारतीय भाषाओं, साहित्य व मूल्यों के संवर्धन हेतु नेट-समूह ‘हिंदी भारत’ का भी संचालन कर रही हैं। समीक्षा और शोध के क्षेत्र में भी उनका लेखन विशेष सम्मान का अधिकारी रहा है। उनकी सद्य:प्रकाशित कृति ‘समाज-भाषाविज्ञान : रंग-शब्दावलीः निराला काव्य’ (2009) उनकी गहन शोध दृष्टि और अभिनव आलोचना प्रणाली का जीवंत प्रमाण है।

‘समाज-भाषाविज्ञान : रंग-शब्दावलीः निराला काव्य’ में लेखिका ने समाज-भाषाविज्ञान के सिद्धांत और इतिहास की व्याख्या करते हुए निराला के काव्य में प्रयुक्त रंग शब्दावली का विवेचन किया है और हिंदी भाषा में निहित रंग संसार की शाब्दिकता का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया है। उल्लेखनीय है कि समाज-भाषाविज्ञान भाषा को सामाजिक प्रतीकों की ऐसी व्यवस्था के रूप में देखता है जिसमें निहित समाज और संस्कृति के तत्व उसके प्रयोक्ता की अस्मिता का निर्धारण करते हैं। भाषा का सर्वाधिक सर्जनात्मक और संश्लिष्ट प्रयोग साहित्य में मिलता है, अतः समाज भाषाविज्ञान की दृष्टि से उसके पाठ विश्लेषण द्वारा कृति के संबंध में सर्वाधिक सटीक निष्कर्ष प्राप्त किए जा सकते हैं। हिंदी में इस प्रकार के कार्य अपेक्षाकृत विरल उपलब्ध हैं। डॉ.कविता वाचक्नवी की यह कृति इसी बड़े अभाव की पूर्ति का सार्थक प्रयास है।

यह कृति समाज-भाषाविज्ञान के सैद्धांतिक पहलुओं की हिंदी भाषा समाज के संदर्भ में व्याख्या करते हुए रंग-शब्दावली के सर्जनात्मक प्रयोग के निकष पर निराला के काव्य का विश्लेषण प्रस्तुत करती है। स्मरणीय है कि प्रकृतिचेतस काव्य के रूप में स्वीकृत छायावादी काव्य रंगों के प्रति अत्यंत जागरूक है। इस संदर्भ में यह कृति निराला की भाषाई अद्वितीयता को उनके रंग शब्दों के आधार पर विवेचित करने वाली अपनी तरह की पहली कृति है। रंग शब्दों के प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रयोग, रंगाभास और रंगाक्षेप की स्थिति, सादृश्य विधान में रंगों के संयोजन, रंगाधारित मुहावरों के नियोजन, बिंबों की रंगयोजना तथा कवि की विश्वदृष्टि के प्रस्तुतीकरण में रंगावली के आलंबन के सोदाहरण विवेचन से परिपुष्ट यह कृति हिंदी काव्य समीक्षा के क्षेत्र में समाज भाषाविज्ञान के अनुप्रयोग का अनुपम उदाहरण है।

इस कृति के संबंध में प्रसिद्ध समाज-भाषावैज्ञानिक प्रो. दिलीप सिंह का यह कथन इसके महत्व को रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है कि ‘रंगों का जीवन और शब्दों का जीवन इस अध्ययन में एकरस हो गए हैं। हिंदी भाषा की शब्द संपदा और इस संपदा में आबद्ध लोकजनित, मिथकीय और सांस्कृतिक अर्थवत्ता की पकड़ से यह सिद्ध होता है कि भाषा की व्यंजनाशक्ति का कोई ओर-छोर नहीं है। इस फैलाव को पुस्तक में मानो चिमटी से पकड़कर सही जगह पर रख दिया गया है। भाषा अध्ययन को बदरंग समझने वालों के लिए रंगों की मनोहारी छटा बिखेरने वाला कविता केंद्रित यह अध्ययन किसी चुनौती से कम नहीं।'

इसमें संदेह नहीं कि साहित्य के समाज-भाषिक अध्ययन के क्षेत्र को डॉ. कविता वाचक्नवी की इस कृति ने सुनिश्चित रूप से समृद्ध किया है तथा यह पुस्तक शोधार्थियों और साहित्य रसिकों के लिए समान रूप से पठनीय और संग्रहणीय है।

समाज-भाषाविज्ञान : रंग-शब्दावली : निराला-काव्य / डॉ. कविता वाचक्नवी
हिंदुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद
प्रथम संस्करण, 2009
मूल्य 150 रु.पृष्ठ 232 सजिल्द।



[डेली हिन्दी मिलाप , हैदराबाद : ८/३/२००९]






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