Friday, May 18, 2012

5 कविताएँ तथा `प्रवासी दुनिया'

5 कविताएँ तथा `प्रवासी दुनिया'


16 मई के अंक में  `प्रवासी दुनिया' में "डॉ. कविता वाचक्नवी की कविताएँ" शीर्षक से मेरी 5 कविताएँ  (`रक्त नीला', `अभ्यास', `अश्रू', `जंगल', `रूमालों पर' )  प्रकाशित हुई हैं।

पत्रिका व पत्रिका परिवार को आभार सहित वागर्थ के साथियों, शुभचिंतकों व पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं वे कविताएँ। आशा है सदा की भांति इन कविताओं को भी आपका दुलार मिलेगा। 


मेरी 5 कविताएँ  
(`रक्त नीला', `अभ्यास', `अश्रू', `जंगल', `रूमालों पर' )
- (डॉ.) कविता वाचक्नवी


1)
रक्त नीला 


ऊँगलियों ने अभी-अभी ही तो

बुनी थी

घास की एक अंगूठी

ऊँगली के आस-पास

कि दिन

हवा की हथेली पर

धूप रख गया,

भीड़ अपने रास्ते नापती

अंधेरे की पगडंडियाँ बनाती

चली जाती है ,

मिट्टी के ऊपर आई

पेड़ की जड़ों की नसें

बहुत बूढ़ी हो गई लगती हैं ,

पहाड़ तक

खाली हैं पठार,

पंखों को पीठ के पीछे मिलाती

सर्राती चिड़िया

नदी किनारे लुढ़की गागर पर बैठ

गाती है बार-बार

एक कोई गीत

आकाश दोहराता है उसे

और पोर

समझ जाते हैं

कलम का तो

रक्त तक

नीला होता है ।
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2)
अभ्यास


भोर का

चिड़ियों की चह्-चह् का

जिन्हें अभ्यास हो

रात्रि का निर्जन अकेलापन

उन्हें

कैसे रुचे ?

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3)

अश्रु 
इस चेहरे के अक्षर

गीले हैं, सूरज!

कितना सोखो

सूखे,

और चमकते हैं।


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4)
जंगल


चीख़ को वनवास ही

केवल नहीं

वनचरों से

युद्ध भी तो

शेष हैं।

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5)
रूमालों पर


हम रूमालों पर

कढ़े हैं

प्रीत के अक्षर,

कब तहा कर

रख चलो

किस जेब में

तुम,

कौन  जाने ?

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