Thursday, May 10, 2012

मेरी कुछ कविताएँ

मेरी कुछ कविताएँ

वर्ष 2010 में   आखर कलश  पर मेरी पाँच कविताएँ प्रकाशित की गई थीं। यहाँ अपने मित्रों, साथियों  व पाठकों के लिए वे कविताएँ  व उन पर  व्यक्त प्रतिक्रियाएँ (उस पन्ने को ज्यों का त्यों देते हुए ) यहाँ सँजो रही हूँ । आशा है, रुचिकर लगेंगी। 
- क. वा.
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24 comments:

'अदा' said...
kavita ji ko padhna hamesha hi sukhad raha hai, jitni prabhavshaali vyaktitv ki wo maalkin hain unti bhi prabhavshaali uki lekhni hai...
unka smariddh anubhav spasht drishtigat hai unki lekhni mein...
aapka aabhar..
Sunil Kumar said...
स्वप्न ने
कुछ पास खींचा,
आँख का
अंजन नहीं हूँ
स्वप्न हूँ
मत आँख खोलो
कविता जी आप की सभी रचनाएँ एक से बढ कर एक है | आप की एक रचना" काल जल्लाद है " आज भी याद आती है | सुंदर अतिसुन्दर बधाई
ऋषभ Rishabha said...
sabhi prastutiyaan ek se ek behtareen hain.

abhinandan!
Meena Chopra said...
मेरी ओर से कविता जी को इन सुन्दर और प्रेरणा देने वली अनुभुती से भरी रचनओं के लिये बहुत बधाईे।

नरेन्द्र जी आपका सहित्य को बढ़ावा देने क यह प्रयास वास्तव मे बहुत महत्वपूर्ण और प्रशंसनीय है।
सुभाष नीरव said...
कविता जी की इन सुन्दर और बेहद भावपूर्ण कविताओं को पढ़वाने के लिए धन्यवाद।
अविनाश वाचस्पति said...
1. और इसी से बनेगा स्‍त्री की मजबूती का किला।

2. यह भी तो हो सकता है पिछली बार जब वे जमे हों तो सूर्य नमस्‍कार में ही खड़े हों

3. बहुत खूब, छाया को घेरता है

4. विचार खूब बहो

5. हो हो कीचड़ को धो धो।
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...
mujhko kavitayen rucheen

man ko chhoota kathya.

kavita ji kee kalam se

nisrat hota satya..
अविनाश वाचस्पति said...
कविता जी का स्‍वास्‍थ्‍य अब कैसा है

क्‍या उसी काल की कविताएं हैं
girish pankaj said...
kavita ji ko parhana sukhad hi lagataa hai. is baar ki bhi kavitayen arthvaan hai. har kavitaa par lambi baten ho sakati hai.
nilesh mathur said...
बहुत सुन्दर कविताएँ है !
KAILASH CHAND CHAUHAN said...
डॉ.कविता वाचक्नवी जी की सभी कविताएं एक दम सरल, सहज हैं. बहुत की सुन्दरता की प्रस्तुति के साथ अपना एक संदेश छोड़ जाती है. सभी कविताएं एक ही सांस में पढ़ जाती हैं और कविता जब खत्म होती है तो सोचने पर मजबूर कर देती है. सशक्त अभिव्यक्ति के लिए बधाई!
मनोज कुमार said...
जीवन की सच्चाई को सच साबित करती एक बेहतरीन रचनाओं के लिए बधाई।
बेचैन आत्मा said...
हड्डियों तक
बर्फ़ जमे लोग
कैसे करें
सूर्य-नमस्कार ?
...सभी कविताएँ अच्छी हैं लेकिन इन पंक्तियों में जिस दर्द की अभिव्यक्ति है वह दिल को छू लेती है. जनवादी चिंतन से ओतप्रोत सभी कविताओं के लिए बधाई.
रचना दीक्षित said...
kavita ji ki sabhi kaviyayen ek se badh kr ek lagi itni sunder prastuti pr badhaii
Navin C. Chaturvedi said...
[१]
इतनी सीधी और सपाट अभिव्यक्ति कम ही देखने को मिलती है कविता जी:-

"पानी लगातार तुम्हारे डूबने की
साजिशों में लगा है"

[२]
शायद आप धर्म परिवर्तन पर कुछ कहना चाह रही हैं:-

"हड्डियों तक
बर्फ़ जमे लोग
कैसे करें
सूर्य-नमस्कार ?"

अगर मेरा सोचना ग़लत है, तो कृपया बताएँ ज़रूर|
प्रवीण पाण्डेय said...
सुन्दर रचना, भावमयी प्रस्तुति ।
प्रवीण पाण्डेय said...
सुन्दर रचना, भावमयी प्रस्तुति ।
संजय पुरोहित said...
भावपूर्ण शब्‍दाभिव्‍यक्ति
शायर कहते हैं औरत से
कि

तेरे माथे पे ये चुनरी क्‍या खूब लगे है,
मगर इसका परचम बना लेती तो क्‍या बात होती
pravesh soni said...
achha laga pad ker .........kavita ji se parichit nahi hu per unki rachnaye unka parichay de rahi hai ,,behad bhavpurn ..aabhar
vashini sharma said...
बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी
कभी आग उगलती कविताएँ
तो कभी कंप्यूटर की यांत्रिकता
और कितने सारे सामाजिक सरोकार
हर बार कविता नई लगती है
अगला रूप क्या होगा
हम सब दम साधे बैठे हैं

वशिनी
कुमार आशीष said...
कविता जी काव्‍य-अभिव्‍यक्तियाँ मर्मस्‍पर्शी होती हैं। सधी हुई शब्‍दावली के साथ भाव-बिम्‍बों का सहज प्रवाह बरबस पाठक की सॉंसें साध देता है। कहो, खिलाड़ी !... वाह क्‍या मिठास है.. चीनी में छान कर जीवन-सत्‍यों का कुनैन पिलाती हैं कविता जी की कवितायें। ...साधुवाद।
डॉ. अश्विनीकुमार शुक्ल said...
डॉ. कविता जी,
आपके कृतित्व से परिचित करवाने का श्रेय बड़े भाई प्रोफेसर ऋषभदेव जी शर्मा को जाता है। मैं उनकी उदारता और आपकी प्रतिभा को नमन करता हूँ।
अश्विनीकुमार शुक्ल, संपादक "नूतनवाग्धारा" बाँदा (उ.प्र.)।
Suman Dubey said...
कविता जी नमस्कार, भावपूर्ण शब्दों के साथ यर्थाथ की अभिव्यक्ति है कविता मे कीच -कीच धो कहो खिलाड़ी-----बहुत खूब पढ कर आप को अच्छा लगा ।
pandey dc said...
सुंदर सुंदर अति सुंदर ..................
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