बुधवार, 19 अगस्त 2009

मैंने दीवारों से पूछा

मैंने दीवारों से पूछा

कविता वाचक्नवी



चिह्नों भरी दीवारों से पूछा मैंनें
किसने तुम्हें छुआ कब – कब
बतलाओ तो
वे बदरंग, छिली – खुरचीं- सी
केवल इतना कह पाईं -
हम तो
पूरी पत्थर- भर हैं
जड़ से
जन से
छिजी हुईं
कौन, कहाँ, कब, कैसे
दे जाता है
अपने दाग हमें
त्यौहारों पर कभी
दिखावों की घड़ियों पर कभी – कभी
पोत- पात, ढक – ढाँप – ढूँप झट
खूब उल्लसित होता है
ऐसे जड़ – पत्थर ढाँचों से
आप सुरक्षा लेता है
और
ठुँकी कीलों पर टाँगे
कैलेंडर की तारीख़ें
बदली – बदली देख समझता
इन पर इतने दिन बदले ।


अपनी पुस्तक "मैं चल तो दूँ " (२००५, सुमन प्रकाशन) से उद्धृत




18 टिप्‍पणियां:

  1. दीवारो का दर्द ..बहुत बखुबी से बया किया है कविता जी..

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  2. वाह...दीवारों ने खूब बताया हाल...हकीक़त यही है...

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  3. बढिया है। सच है...‘कौन कहां दे जाता है दाग’... बहुत सुंदर,मन को छूने वाली पंक्तियां।

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  4. oh; nari tan-man ka satik pratbimb bana diya aapne deevaron ko.....ek utkrisht rachna....

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  5. बहुत सुन्दर कविता दिल को छू गयी ये गहरी अभिव्यक्ति शुभकामनायें

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  6. कविता को जिस साज-संभाल और कुशलता से आपने रचा है, वह अद्भूत है. मेरी बधाई स्‍वीकारें.

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  7. कविता जी बहुत सुन्दर
    शव्दों को चुन चुन कर आप ने पंक्तियों मजबूत पकड़ बनायीं है ..........
    चिह्नों भरी दीवारों से पूछा मैंने
    किसने तुम्हें छुआ कब – कब
    बतलाओ

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  8. कविता जी, दीवारों के भाव भी..रचना पर बधाई.

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  9. सच है, दीवारे भी बहुत कुछ कहती हैं। अंग्रेजी में तो उक्ति ही है- ‘see the writing on the wall'

    अत्यंत भावपूर्ण अभिव्यक्ति।

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  10. मैंने कभी एक कहानी सुनी थी जो इस प्रकार है - किसी घर में जब लड़का पैदा होता है तब उस घर की दीवारें रोया करती हैं यह सोच कर कि यदि लड़का काबिल निकला तो यह मुझे गिरा कर नयी दीवाल खड़ी कर देगा और नालायक निकला तो बिना देख रेख के धीरे- धीरे घुल- घुल के गिर जाना ही मेरी नियति बन जाएगी !दीवारों कि व्यथा तो पुरातन कहानिओं में भी छुपी है ! सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए वधाई !

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  11. देव्वारो कि कहानी तो सदियों से चली आ रही हैं ...बहुत बढिया शब्द रचना ....आभार

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