Monday, May 20, 2013

स्मृतियों के द्वार पर मैं .....

स्मृतियों के द्वार पर मैं ..... : कविता वाचक्नवी



कुछ वर्ष मुझे भारत (हैदराबाद) में रहकर साहित्यिक व अत्यन्त वैचारिक हिन्दी गोष्ठियों में सक्रिय भागीदारी करने का खूब अवसर मिला है। हिन्दी साहित्य व भाषा सम्बन्धी गोष्ठियों की जितनी भरमार हैदराबाद में रही उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। सैंकड़ों नहीं, हजारों अत्यन्त विचारोत्तेजक गोष्ठियाँ मानो वहाँ सामान्य जीवनचर्या का अंग बन गई थीं। उतनी सक्रियता व वैसी वैचारिकता मैंने हिन्दी क्षेत्र तक में नहीं देखी है, जिसका मैं अंग रही हूँ। यह बात अलग है कि हैदराबाद में भी अन्य नगरों की भाँति साहित्य का एक खास माफ़िया भी साथ साथ सक्रिय है और वर्ष 98 में शुरु शुरु में वहाँ पहुँचने पर दूसरे अनेक लोगों की भाँति मैं स्वयं उनके चकमे में आ गई थी। पर डेढ़ ही वर्ष बाद जैसे जैसे लोगों को उनके असली रंग पता चले तो सबने उनसे पल्ला झाड़ा, उस माफ़िया के चार पाँच लोगों के अतिरिक्त हैदराबाद के कम से कम डेढ़ सौ लोगों में से ऐसा कोई न होगा जो उनके कारनामों से परिचित न हो , भुक्त भोगी न हो और उनके साथ हो। उस माफ़िया के विवरण फिर कभी सही... 


फिलहाल तो यह कि जब से हैदराबाद के मेरे साहित्यिक मित्रों का संग छूटा जिसमें हम तीन का एक मुख्य गैंग था - ऋषभ देव जी, गोपाल शर्मा जी और मैं। इस गैंग में इजाफा हुआ चन्द्रमौलेश्वर जी के जुड़ने से। ... और ये वे दिन थे जब कई बरस हमने एक दम बाल-सखाओं की भाँति अति आत्मीयता, कोई दुराव नहीं, एक दूसरे के लिए जान तक दे सकने की भावना के साथ उन्मुक्त भाव व प्राईमरी के बच्चों जैसी निश्छल आत्मीयता के साथ बिताए ..... सड़क चलते लोग हमें ठहाके लगाते देख चौंक कर ठहर जाया करते थे और हम प्रतिदिन नियम से एक दूसरे से रात को सोने से पहल एक-एक घंटा फोन पर बतियाते थे या प्रति सप्ताह 3-4 घंटों की एक गप्प गोष्ठी किया करते थे जिसमें एक दूसरे की रचनाएँ सुनते सुनाते थे। हमारे परिवार तक हम लोगों के इस मित्रभाव से परिचित ही नहीं, परस्पर जुड़े भी थे...  मानो एक ही बृहद परिवार का हम चारों अंग थे। 


गोपाल शर्मा अङ्ग्रेज़ी के प्रोफेसर हो लीबिया चले गए, मैं ब्रिटेन आ गई और अति दुर्भाग्य से गत वर्ष चंद्र मौलेश्वर जी भी यकायक कैंसर की मार से हमें अकेला कर परलोकगामी हो गए..... उनके जाने का दर्द आज भी हर एक दिन उठ खड़ा होता है और अकेले में खूब रुलाया करता है, .... वह सम्बन्ध क्या व कैसा था इसे बताया समझाया भी नहीं जा सकता। शायद ही जीवन में किसी को ऐसे मित्र मिले होंगे जो किसी भी प्रकार के सहयोग के लिए दौड़ कर आ खड़े होते हों और बिना बताए दूसरे के लिए क्या से क्या कर जाते हों। 


पारिवारिक नातों में बदल चुकी यह साहित्यिक मित्रता मेरे ही नहीं, हम चारों के रचनाकर्म का स्रोत थी .... इतने सुखद दृश्यों की एक फिल्म है जो रोज मन के प्रोजेक्टर पर आवाज करती चला करती है पर पर्दे पर उसे दिखाया नहीं जा सकता। 


प्रख्यात भाषाविद् प्रोफेसर दिलीप सिंह जी से लेकर स्वतंत्रवार्ता के तत्कालीन संपादक राधेश्याम शुक्ला जी, द्वारका प्रसाद मायछ और अहिल्या जी व लक्ष्मीनारायण अग्रवाल जी तक इस बृहत् आत्मीय परिवार का कैसा हिस्सा थे, हैं, रहेंगे यह अनिर्वचनीय सुख की बातें हैं। कई बार लगातार लगता है मानो जड़ों से अलग होने का सन्त्रास भुगत रही हूँ ...लेखन का अजस्र स्रोत ही मुझ से छूट गया है। शायद अलग होने के उसी दिन से मेरी कविता मुझसे रूठ ही गई है। ऋषभ जी, गोपाल जी व मैं ... हम तीनों मानो अपना अपना निर्वासन भोगने को अभिशप्त हों .... क्योंकि परस्पर रचनात्मक पूरक भी हैं। कई बार ये पंक्तियाँ मन आती हैं ... कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन .... ।


आज एक काव्य गोष्ठी में औपचारिक उपस्थिति लगाई तो मन अपने मित्रों के पास तब से भटक रहा है । उस जीवन्तता, प्रेम , आत्मीयता, निश्छलता व भरपूर रचनात्मकता का कोई जोड़ नहीं हो सकता। वह किसी दूसरे युग की बात हो गई लगती हैं... वैसे सच्चे निश्छल आत्मीय मित्र जीवन में कभी न मिलेंगे व इसीलिए न वैसी साहित्यिक गोष्ठियाँ ! हर बार और रीतते चले जाने का क्रम है ! सुख मुट्ठी से छिटक गया है ! 

“Tears, idle tears, I know not what they mean, 
Tears from the depths of some devine despair
Rise in the heart, and gather to the eyes, 
In looking on the happy autumn fields, 
And thinking of the days that are no more.” 
― Alfred Tennyson


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