बुधवार, 28 जुलाई 2010

रोटी कब तक पेट बाँचती? : (डॉ.) कविता वाचक्नवी

रोटी कब तक पेट बाँचती? : (डॉ.) कविता वाचक्नवी 



रोटी कब तक पेट बाँचती?
 [ अपने कविता संकलन "मैं चल दूँ" (२००५) से  उद्धृत ]




सत्ता के संकेत कुटिल हैं
ध्वनियों का संसार विकट
विपदा ने घर देख लिए हैं
नींवों पर आपद आई
वंशी रोते-रोते सोई
पुस्तक लगे हथौड़ों-सी
उलझन के तख़्तों पर जैसे
पढ़े पहाड़े   -    कील ठुँकें,
दरवाजे बड़-बड़ करते हैं
सीढ़ी धड़-धड़ बजती है

रोटी अभी सवारी पर चढ़
धरती अंबर घूमेगी
दुविधाओं के हाथों में बल नहीं बचा
सुविधाएँ मनुहार-मनौवल भिजवाएँ।


रोटी कब तक पेट बाँचती?



***

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत गहरी अभिव्यक्ति!! आनन्द आ गया!

    जवाब देंहटाएं
  2. रोटियाँ लटकी हुई हैं बुर्ज़ के ऊपर;
    प्रश्न 'कैसे पाइए', उत्तर 'गुलेलें हैं!'
    >ऋ.

    जवाब देंहटाएं
  3. बड़े दिन बाद अपनी मन पसंद शैली में आपको पढ़ा ! आनंद आ गया कविता जी !आपकी गीत रचनाएँ चाहिए , कहाँ उपलब्ध होंगी हो सके तो मेल कर बताएं !
    शुभकामनायें

    जवाब देंहटाएं

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