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सोमवार, 4 सितंबर 2017

अमेरिका : डूब-उबरने के दिन

अमेरिका में 'हार्वी' : डूब-उबरने के दिन    - कविता वाचक्नवी



यों तो चक्रवात और उसका ताण्डव समाप्त हो चुका है किन्तु किन्तु अभी भी हजारों परिवार बेघर हैं, उनके घर पानी में डूबे हैं और विपदा से उनकी लड़ाई आगामी 6 माह कम-से-कम और चलनी है। हमारे संस्थान के अध्यापक-अध्यापिकाएँ मिलकर अनेक प्रकार के सेवाकार्यों, उन्हें अस्थाई सुरक्षित आवास उपलब्ध करवाना, दैनिक आवश्यकता का सामान पहुँचाना, शाकाहारी भोजन स्वयम् घरों में बना कर प्रतिदिन उन्हें पहुँचाना, उनके पानी में डूबे घरों की मरम्मत की व्यवस्था, उनके घरों के पुनर्निर्माण में सामग्री, फर्नीचर, बिस्तर आदि क्रय कर देना आदि प्रकार की भागदौड़ में लगे हैं। दानदाताओं से $32000 एकत्र भी किए हैं, हमारा लक्ष्य $50000 का है।

जिन्होंने परिजन-घर और बहुत कुछ खोया है, वह तो नहीं लौटाया जा सकता, किन्तु इस विपदा में पूरे देश का एकजुट सहयोग अनुकरणीय है। ध्यातव्य है कि प्रयोग की हुई वस्तुएँ यहाँ दान में नहीं दी जातीं, जिसे जो देना है वह क्रय कर देना है। रेस्टोरेंट्स, संस्थान, स्टोर्ज़, कम्पनियाँ, व्यापारिक घराने, आम जनता, विद्यालय, विश्वविद्यालय, युवा संगठन, छात्र संगठन, अध्यापक संगठन, कर्मचारी संगठन, आवास संगठन आदि लाखों-लाख संस्थाएँ और संगठन, हाथ का काम करने वाले कामगार और आम जन तक अपनी निःशुल्क सेवाएँ और सहयोग जनता और सरकार को दे रहे हैं। 


कहीं कोई चीख-पुकार, शिकायतों का कोई शब्द, दोषारोपण, तेरा-मेरा, पहले आप, छीना-झपटी, या सरकार भरोसे की स्थित अथवा दृश्य नहीं है। सब शान्ति व सद्भाव से सहयोग एवं सेवा में एकजुट हैं, किसी को सेवा के बहाने अपना या अपनी संस्था का नाम चमकाने में रुचि नहीं। डेढ़-दो लाख से भी बहुत अधिक संख्या में स्वयंसेवक जुटे हुए हैं। कई स्वयंसेवक तो ऐसे हैं, जो स्वयं अपना बहुत कुछ इस आपदा में गँवा चुकने के बाद आँसू छिपाए दूसरों की आँसू पोंछ रहे हैं, सरकारी सहायता भी आई है।

देश ऐसे बनते हैं, जनता से बनते हैं, जनता देश को जैसा चाहे बना सकती है, उसे देश में जो व जैसा परिवर्तन चाहिए वैसा व उस दिशा में स्वयं काम करने लगे..... बस उसी दिन से पुनर्निर्माण एवम् परिवर्तन प्रारम्भ जो जाता है। आरोप, शिकायतें, अपेक्षाएँ, उत्पात, छद्म और स्वार्थ भौगोलिक सीमाओं को #देश होने से रोकते हैं।


गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

वैदिक नववर्ष मंगलमय व शुभकारी हो : कविता वाचक्नवी



सृष्टिसम्वत्सर (युगादि पर्व), नव विक्रमीसंवत्सर तथा आर्यसमाज स्थापना-दिवस की अनेकानेक शुभकामनाएँ !

हमारी सृष्टि की आयु एक अरब, छियानवें करोड़, आठ लाख, तिरपन हजार, एक सौ सोलह वर्ष व्यतीत हो चुकी है और आज एक अरब, छियानवे करोड़, आठ लाख, तिरपन हजार, एक सौ सत्तरहवाँ वर्ष प्रारम्भ हुआ है। दक्षिण भारत में सृष्टि सम्वत के दिन ही विक्रमी सम्वत मनाया जाता है, किन्तु भारत के कुछ भागों में विक्रमी सम्वत अलग दिन मनाया जाता है, यथा, गुजरात में दीपावली के अगले दिन नया विक्रमी सम्वत (नव वर्ष) मनाने का चलन है। 

वस्तुतः नव वर्ष विक्रमी सम्वत का सम्बद्ध राजा विक्रमादित्य की विजयों से सम्बंधित है, अतः विक्रमी सम्वत कुछ भागों में अलग-अलग दिनों को प्रारम्भ होता है; और दूसरी बात, उत्तर भारत तथा दक्षिण भारत में माह का अन्त भिन्न भिंन्न होता है, उत्तरभारत में पूर्णिमा पर माह समाप्त होता है और दक्षिण भारत में अमावस्या को माह समाप्त होता है, इन सब कारणों बिहार में होली के अगले दिन नव वर्ष समझा जाता है और दक्षिण में आज के दिन। 

यह तो रही विक्रमी सम्वत की बात। परन्तु सृष्टि सम्वत सदा से, एक साथ, आज ही के दिन मनाया जाता है। 

आज ही के दिन अर्थात् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (तदनुसार 7 अप्रैल 1875) ही के दिन महर्षि दयानन्द सरस्वती ने मुम्बई के काकड़वाड़ी में आर्यसमाज की स्थापना की थी। अतः आज आर्यसमाज का स्थापना दिवस भी है। 

तीनों अति विशिष्ट व महत्वपूर्ण शुभ पर्वों की ढेर सारी हार्दिक शुभ कामनाएँ। परस्पर सभी प्रकार के मतभेद व ईर्ष्या-द्वेष मिटाकर सब एक दुसरे के सुख और उन्नति में सहायक बनें, सन्मार्ग पर चलें तथा विश्वशान्ति हेतु मिलकर समूचे मानव समाज की उन्नति में सहयोग दें। इन्हीं समस्त शुभ कामनाओं सहित !


शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

यौवन ऐसा भी ....

यौवन ऐसा भी हो सकता है : कविता वाचक्नवी


एक स्त्री के रूप में, एक मनुष्य के रूप में और विशेषतः एक माँ के रूप में कल का दिन भावविह्वल कर देने वाला दिन रहा। एक ऐसी घटना घटी जिसने मातृत्व को सार्थक कर दिया। कनिष्ठ पुत्र इन दिनों पाँच वर्ष बाद भारत गया हुआ है और उसके पिताजी भी।

कल वह वहाँ अपने पिताजी को किसी यात्रा के लिए गाड़ी में बिठाकर स्टेशन से बाहर आया तो कुछ दूर तक चलकर एक ऐसे स्थान पर पहुँचा जहाँ से उसे अपने इंगित स्थान के लिए ऑटो लेना था। वहाँ ऑटो की प्रतीक्षा करते करते समीप ही उसे एक 60 वर्ष से अधिक की महिला एक छोटे बच्चे के साथ दिखाई दी। बच्चा बहुत दुबला व कठिनाई से चल पा रहा था, क्योंकि नंगे पाँव था। वह महिला भी एकदम ठीक-ठाक तो नहीं किन्तु ऐसी लग रही थी कि अपने बच्चे को जूता दिलवाने में समर्थ है।

मेरे बेटा उन दोनों को कुछ देर देखता रहा और फिर अन्तत: उनके पास जाकर सीधा उस से पूछने का मन बनाया कि बच्चा नंगे पाँव क्यों है। जाकर उस महिला से पूछा तो उस महिला ने अपनी रामकहानी सुनानी शुरू की कि बच्चा उसका पोता है और बच्चे की माँ मर चुकी है व पिता (महिला का बेटा) अस्पताल में है उसे कुछ लीवर का रोग है आदि।

मेरे बेटे को उसकी कहानी में कोई रुचि नहीं हुई क्योंकि तब तक उसने देख लिया था कि महिला गहने आदि पहने हुई थी, अच्छी साड़ी और सैन्डिल आदि भी पहने थी ; जबकि दुर्बल-सा छोटा बच्चा एकदम नंगे पाँव था। महिला ने मेरे बेटे को यह भी बताया कि वह चर्च जा रही है (जो वहाँ समीप ही था) । मेरे बेटे को महिला के हाव-भाव आदि से सन्देह हो रहा था और लग रहा था कि महिला उस बेचारे बच्चे का इस्तेमाल लोगों को ठगने या पैसा आदि वसूलने के लिए करती है। बच्चा मानसिक रुग्ण भी प्रतीत हो रहा था।

तो मेरे सुपुत्र ने बच्चे को जूता दिलवाने की भावना के बावजूद महिला को नकद कुछ भी नहीं देने का मन बनाया, क्योंकि इसे पक्का लग रहा था कि महिला उस राशि से कुछ और कर लेगी और बच्चा जैसे-का-तैसा ही रह जाएगा। इसलिए सुपुत्र ने एक ऑटो लिया और महिला व बच्चे को भी अपने साथ ऑटो में बैठने को कहा और उन्हें ऑटो में अपने साथ लेकर एक स्थान पर गया जहाँ जूते की दुकान थी । वहाँ स्वयं उतर कर उस बच्चे को जूते खरीद कर दिए और उस ऑटो वाले को पैसे दे कर कहा कि महिला व बच्चे को वहीं छोड़ आओ जहाँ से ऑटो में चढ़े थे।

वह बच्चा जूते पहनते समय बहुत प्रसन्न था और हँस भी रहा था तो मेरे बेटे ने उसके दो चित्र भी लिए और वहाँ से अपने कक्ष पर लौट कर फिर यह सारी घटना तुरन्त वाट्सएप पर हमें लिख कर बताई व चित्र भी भेजे।

























                                                               





















और हाँ, चलते-चलते अन्तिम बात सुपुत्र ने ज़ोर देकर महिला से कही -
"चर्च में जाने से कुछ नहीं होगा"  :) 


यह जोड़ना चाहूँगी कि सबसे कनिष्ठ मेरा बेटा लगभग 24 वर्ष का है और यह वही बेटा है जो दिसम्बर में मध्य रात्रि को एक अनजान युवती की सुरक्षा की भावना से उसे नगर सीमा से भी 20 किलोमीटर बाहर उसके घर तक पहुँचाने गया था, जिसे मैंने 22 दिसम्बर को विस्तार लिखा भी था, वह घटना तो काफी रोमांचक भी थी क्योंकि उसमें बड़ा खतरा भी था। उसे यहाँ पढ़ा जा सकता है-https://www.facebook.com/kvachaknavee/posts/10153151019579523

अपने पुत्र पर गौरवान्वित तो हूँ ही पर यह घटना इसलिए बाँट रही हूँ कि यदि आप हम कुछ करना चाहें तो हमारे आसपास ही बहुत कुछ करने को है, बस देखने वाली आँख होनी चाहिए और संस्कार भी। दूसरी बात यह कि सन्तान को बनाना आपके-हमारे हाथ में है बशर्ते हमें यह पता हो कि सन्तान / बच्चे उपदेशों से नहीं अपितु आपके आचरण से सीखते हैं। तीसरा कारण इसे लिखने का अपने सुपुत्र के अच्छे कार्य का सम्मान व प्रशंसा करना क्योंकि इस प्रकार उसके नेक कार्य को सम्मानित कर उसे भविष्य में मनुष्यता के कार्यों के लिए प्रोत्साहित करना भी उद्देश्य है।



शनिवार, 9 अगस्त 2014

'श्रावणी उपाकर्म', 'नारियली पूर्णिमा' व 'रक्षा-बन्धन' : डॉ. कविता वाचक्नवी

'श्रावणी उपाकर्म', 'नारियली पूर्णिमा' व 'रक्षा-बन्धन'  :  कविता वाचक्नवी


श्रावणी पूर्णिमा के पर्व रक्षा-बन्धन की ढेरों मंगलकामनाएँ ! 



इस अवसर की सार्थकता केवल कलाई पर रेशमी डोरे बाँधने में नहीं है, न सज-धज कर माथे पर तिलक करवा लेने में। इस पर्व की सार्थकता अपने जीवनऔर परिवेश में आने वाली स्त्रियों की समूल सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध होने में है। जब बहनें कलाई पर डोर बाँधती हैं तो केवल अपनी रक्षा का वचन लेने के लिए नहीं, अपितु अपने भाइयों को यह स्मरण दिलाने के लिए भी कि स्त्रियों के सम्मान की सुरक्षा करना तुम्हारा कर्तव्य है अर्थात् असुरक्षा का निषेध। 

कुछ लोग रक्षाबन्धन को स्त्री के सामर्थ्य का विरोधी बताने का अभियान प्रतिवर्ष की भाँति इस बार भी चलाएँगे, यह कहकर कि स्त्री क्या कमजोर है जो उसे सुरक्षा चाहिए। वस्तुतः यह पर्व स्त्री को कमजोर होने या सुरक्षा की अपेक्षा करने का नहीं अपितु भाइयों/पुरुषों को यह स्मरण दिलाने और कर्तव्यबोध करवाने का है कि वे अपनी दृष्टि और अपना शक्ति-सामर्थ्य स्त्री-मात्र के सम्मान के लिए प्रतिबद्ध होने और उस सम्मान की रक्षा में लगाने का संकल्प लें।


सुरक्षा करने के दो ढंग होते हैं। एक तो असुरक्षा होने पर सुरक्षा करना और दूसरा असुरक्षित अनुभव करवाने वाला कोई कार्य स्वयं भी न करना, न दूसरों को करने देना। यह पर्व सुरक्षा करने से अधिक असुरक्षित न करवाने का व्रत भी दिलवाता है। बहन-भाइयों के स्नेह का प्रतीक तो है ही। अतः बहनें अपने भाइयों से अपनी रक्षा का नहीं अपितु अपने मान-सम्मान सहित सभी स्त्रियों के मान-सम्मान की रक्षा का व्रत लेती हैं और साथ ही भाई-बहन के रिश्ते को उसी स्नेह-प्यार के साथ बनाए-बचाए रखने का संकल्प भी देती-दिलवाती हैं। 


रक्षा-बन्धन पर वस्तुतः मन की मलीनताओं का परिमार्जन करने के साथ-साथ उसे श्रेष्ठतर स्तरों पर ले जाने का संकल्प करना चाहिए। रक्षा बन्धन आत्मोन्नति व मानवीय मूल्यों के श्रेष्ठ संकल्पों को पूरा करने के भाव से किया-कराया जाता है। ऐसा करने वाले ही मातृशक्ति के उच्च अनुदानों के महत्व को समझ सकते हैं और तभी मातृशक्ति से स्नेह-सम्मान प्राप्त करने की पात्रता अर्जित कर सकते हैं। समाज व राष्ट्र के सदस्यों को यह पात्रता मिलती रहे इस योग्य बनाने के लिए ही इस पर्व का विधान किया गया। 


यही श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को ही 'श्रावणी उपाकर्म' का दिन भी होता है। उपाकर्म का अभिप्राय होता है प्रारम्भ करना। अतः उपाकरण का अर्थ है प्रारम्भ करने के लिए पास लाना या आमन्त्रित करना। मूलतः वैदिक काल में वेदाध्ययन के लिए विद्यार्थियों का आचार्य के पास एकत्रित होने का काल था। गुरुकुलों में उपनयन व वेदारम्भ संस्कार किए जाते हैं, इस यज्ञ के बाद वेद-वेदांग का अध्ययन आरंभ होता है। यज्ञोपवीत बदल कर नए धारण किए जाते हैं। श्रावणी पूर्णिमा को ही 'संस्कृत दिवस' भी मनाया जाता है।


गत वर्ष भी मैंने लिखा था कि श्रावणी पूर्णिमा को 'नारियली पूर्णिमा' भी कहा जाता है क्योंकि समुद्र किनारे बसने वाले वेदपाठी लोग श्रावणी उपाकर्म के विधानानुसार कर, इस दिन केवल नारियल का फलाहार करते हैं। साथ ही संभवतः इसलिए भी क्योंकि सावन में वर्षा का आधिक्य होने के कारण समुद्र किनारे बसने वालों के लिए जल-थल और वर्षा आदि के तूफान में समुद्र में उतरने से आपदा की आशंका रहती थी तो वे समुद्र को नारियल अर्पित करके श्रावणी पूर्णिमा की पूजा आदि करते आए हैं। कोंकण व महाराष्ट्र में नारली पूर्णिमा शब्द का खूब प्रचलन है। प्रकृति एवं पर्यावरण के अनुदानों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के साथ उसके ऋण से यथाशक्ति उऋण होने के भाव से वृक्षारोपण करने का विधान भी है । 


हैदराबाद के निज़ाम द्वारा औरंगज़ेबी फ़रमान जारी कर राज्य में हिन्दू विधि-विधानों (पूजा, यज्ञ, मंदिरों पर झण्डा, यज्ञोपवीत, संस्कार, घंटे-घडि़याल बजाना, कीर्तन, जागरण करना, रामायण, गीता, महाभारत की कथा आदि समस्त कार्यों) पर प्रतिबंध लगा देने के विरोध में वहाँ के नागरिकों को उनके मौलिक अधिकार दिलाने के लिए निज़ाम के विरुद्ध आर्यसमाज ने सत्याग्रह किया था, जिसका संयोजन महात्मा नारायण स्वामी जी ने किया था। आर्यों द्वारा प्रारम्भ किए इस आंदोलन में बलिदान देने के लिए देश भर से आर्यों के जत्थे हैदराबाद पहुँच रहे थे। तब वीर सावरकर भी साथ देने के लिए शोलापुर पहुँचे और कहा 'आर्यसमाज हैदराबाद आन्दोलन में अपने आपको अकेला न समझे'। सावरकर की प्रेरणा पर सनातन धर्मी विचारधारा के भी अनेक व्यक्ति हैदराबाद आन्दोलन में जेल गए और भीषण यातनाएँ सहन कीं। वीर सावरकर ने पुणे जाकर हिन्दू महासभा का विशाल जत्था हैदराबाद भिजवाया। इस प्रकार आर्यसमाज के इस सत्याग्रह आन्दोलन में हिन्दू महासभा ने भी सावरकर की प्रेरणा से पूर्ण सहयोग दिया। 


'हैदराबाद सत्याग्रह स्मारक व्याख्यान-माला' के अनुसार - "खेद है कि गांधीजी एवं अन्य कांग्रेसी नेताओं ने कुसंस्कारों के अनुसार, मुस्लिम तुष्टीकरण नीति के अनुसार ही आर्य समाज के इस असाम्प्रदायिक आर्य सत्याग्रह को साम्प्रदायिक आर्य सत्याग्रह बताया। इतना ही नहीं, गांधी जी ने अपने ‘हरिजन’ पत्र में इसकी कटु आलोचना की। पूर्व मध्य प्रदेश तथा बरार विधान सभा के अध्यक्ष श्री धनश्याम सिंह जी गुप्त ने गांधी जी को निजाम के अत्याचार तथा नागरिक अधिकारों का विशेषकर धार्मिक अधिकारों का हनन करने का सम्पूर्ण विवरण बताया, तब कहीं गांधी जी ने अपने अधखुले मुंह से इस सत्याग्रह की सफलता के लिए कुछ शब्द कहें। गांधी जी के असहयोग रवैये की देशभर में कटु आलोचना हुई। तब सामाजिक अपयश से बचने के लिए उन्होंने कहा- “धार्मिक स्वतन्त्रता के लिए चलाए गए आन्दोलन से तो मुझे सहानुभूति है, किन्तु हिन्दू महासभा द्वारा आन्दोलन में कूद पड़ने से यह साम्प्रदायिक हो गया है।" ऐसी कड़वी बात हिन्दू महासभा के तत्कालीन कर्णधार कैसे सहन कर सकते थे ? उन्होंने तत्काल नहला पर दहला मारा। वीर सावरकर तथा डॉ. मुंजे ने गांधी जी के वक्तव्य का उत्तर देते हुए कहा - "गांधीजी बताएँ, कि वन्देमातरम् को सहन न करने वालों, हिन्दी भाषा का विरोध करने वालों एवं स्वाधीनता संग्राम में सहयोग न देने की धमकी देने वालों की चापलूसी करना, उन्हें सिर पर चढ़ाना क्या बड़ा भारी धर्म निष्पक्षता व न्याय है? क्या वह साम्प्रदायिकता का पोषण करना नहीं है?" उल्लेखनीय है कि गांधी जी के इस निराशा भरे वक्तव्य से आर्य सत्याग्रह को और भी बल मिला और उसमें तेजी आ गई।" 

अन्ततः रक्षा बंधन के दिन ही आर्यसमाज को अपने इस सत्याग्रह में विजय मिली और निज़ाम को झुकना पड़ा। 

आज उपाकर्म, वेदपाठ, अपने भाई-बान्धव, रक्षाबन्धन के सुनहले धागे, संस्कृत दिवस के हजारों संस्मरण और महाराष्ट्र खूब याद आ रहे हैं। 


...तो इस इस बार पुनः इस श्रावणी पूर्णमा के दिन अपनी बेटी, अपनी ननद व अपनी ओर से संयुक्त रूप में नारियल के लड्डू व सेवइयाँ बनाऊँगी ताकि बेटी के भाइयों (अपने सुपुत्रों) ननद के भाई (अपने पति) व साथ ही अपने भाइयों को खिला सकूँ। बेटा व उनके पिताश्री को तो अपनी-अपनी बहन की ओर से प्रत्यक्ष खिला दिया जाएगा; रह जाएँगे तो बस मेरा छोटा बेटा और मेरे भाई ! 


सुपुत्र और अपने भाइयों को बार-बार असीसती हुई ढेरों मंगल कामनाएँ भेज रही हूँ। वे जहाँ भी हैं सदा सुखी रहें और अपने मन-वचन या कर्म से कभी किसी स्त्री के सम्मान व सुरक्षा को आघात न पहुँचाएँ। सभी प्रकार का सुख-सौभाग्य उन पर बना रहे। चिरायु-शतायु हों! 

इन आधुनिक माध्यमों से जुड़े अपने भाइयों के लिए भी यही मंगल कामना है। 

सस्नेह ...
क. वा.


रविवार, 9 फ़रवरी 2014

आज एक भावुक संस्मरण

आज एक भावुक संस्मरण मेरा  :  कविता वाचक्नवी


मुझे हिन्दी को नेट पर प्रयोग करते 8 वर्ष हो गए हैं। इन आठ वर्षों में विश्व-भर के पाठकों का जो कल्पनातीत स्नेह आदर व प्यार मुझे मिला है, उसके अनूठे किस्से हैं। लोगों ने ऐसे-ऐसे शब्दों और ऐसे ढंग से अपना स्नेह व्यक्त किया है कि यदि मैंने उनका लेखा-जोखा बनाया होता तो स्वयं मुझे व पढ़ने वालों को विश्वास न होता कि सच में लोगों ने ऐसे शब्द लिखे-कहे होंगे। गिनती के कुछ कड़वे अनुभव भी हैं किन्तु कइयों हजार लोगों के अपार स्नेह के सामने इन 8-10 कटु अनुभवों का कोई मोल नहीं। 


शायद ही किसी के 'सम्मान-पत्र' या 'प्रशस्ति पत्र' में वे शब्द लिखे जाते होंगे जो शब्द मुझे मेरे पाठकों ने 2006 से नेट पर व उस से पूर्व 1998 से 2006 तक पत्रिकाओं में या व्यक्तिगत पत्रादि लिख कर भेजे हैं। अपने 10-15 पुरस्कार और दो-चार सौ बार हुए अपने अभिनन्दन आदि के अवसरों पर भी कभी ऐसा आह्लाद या रोमाञ्च मुझे नहीं हुआ जैसा पाठकों से मित्र बने और मित्र से आत्मीय बने अनगिनित अनजान लोगों के प्रेम से सुख मिला और आह्लाद हुआ है। मेरा रोम-रोम इन लोगों के प्रति स्नेह के भार से दबा हुआ है। उसे बखाना भी नहीं जा सकता। यद्यपि मैंने उनके लिए व्यक्तिगत रूप से कभी भी कुछ विशेष नहीं किया। मैं अपने इन शब्दों द्वारा आपको या किसी को भी उस कल्पनातीत प्रेम, सम्मान व आदर का एक हजारवाँ हिस्सा भी नहीं बता पा रही जो इन लोगों ने मुझे दिया है। संसार-भर में फैले ये लोग मेरी आत्मा का अंश जैसे बन गए हैं। पल-पल इनकी ऋणी हूँ। 


यों तो लाखों घटनाएँ हैं किन्तु आज यह सब लिखने का एक विशेष कारण है। एक सज्जन हैं, जो यहीं फेसबुक पर मुझसे जुड़े। कभी अधिक संवाद नहीं हुआ। वर्ष में संभवतः एक बार का अनुपात होगा जब दो-चार वाक्यों का आदान प्रदान हुआ होगा। किन्तु गत दिनों उन्होने मुझे बताया कि उनके यहाँ संतान का जन्म होने वाला है और मुझे कहा कि - "मेरी प्रार्थना है कि आप ही कोई नाम रख दें ..परिवार में बड़े के नाम पर मेरी माँ ही जीवित है, कहती है तू ही कोई नाम रख दे....."। 


ईश्वर कृपा से उन्हें स्वस्थ सुंदर पुत्र प्राप्त हुआ। बालक का नाम रखा गया। उन्होने मुझे लिखा " thank u so much ! i will never forget u in my entire life." मैंने पूछा ऐसा क्या कर दिया मैंने तो बोले - " nothing special madam! it's happen because of blessings of persons like u. Sudha murthy, APJ Kalam , M.M Malviye , Vinoba Bhave are my role model, now u are my role model too. Regards ....." । 


उनके बड़प्पन ने दिल छू लिया मेरा। और आज वे बोले - "एक अनुरोध है, न मत कहियेगा ! ... अपने ख़ुशी के मौके पर अपनी माँ के साथ -साथ आपको भी कुछ भेंट देना चाहता हूँ ........कोई हिंदुस्तानी चीज जो आपको वहाँ न मिलती हो ....ये मेरी श्रद्धा है, जब भी कोई धर्म संकट आता है , आपकी शरण ही आता हूँ ..आप ऐसा मत सोचियेगा कि कोई आर्थिक या व्यवसायिक लाभ के लिए आप से जुड़ना चाहता हूँ ......आभार" 


मैं उनके संस्कार, भावना और इस सरल आत्मीयता से आकण्ठ भावुक हो उठी। कोई इतनी दूर बैठा व्यक्ति अपने ऐसे अनमोल अवसर पर अपनी माँ के समतुल्य आदर मान देने के लिए तत्पर है, यह प्रेम क्या कुछ भी देकर पाया जा सकता है ? मैं तब से भावुक हूँ। उनके व उनके परिवार के प्रति मन से जाने कितने प्रेम व स्नेह के भाव उमड़ रहे हैं।

यह है 5 दिन का नवजात 'अगस्त्य' 
ऐसे पिता की संतान को श्रेष्ठ व्यक्ति होने से संसार की कोई शक्ति रोक नहीं सकती। वह बेटा धन्य है जिसने ऐसे पिता के घर जन्म लिया और वह माँ धन्य है जिसने ऐसे संस्कारवान पुत्र को जन्मा। मैं इन सज्जन का नाम जानबूझ कर नहीं दे रही ताकि उनकी प्राईवेसी भंग न हो। किन्तु सच है कि मैं बहुत छोटी हूँ इस स्नेह व आदर के समक्ष ! 'अगस्त्य' के लिए मेरा रोम-रोम असीस भेजता है आपको ! 


हम प्रतिदिन दिन से रात तक सब ओर नकारात्मक व मनुष्य की बुराई के समाचार सुनते हैं, ऐसे में अच्छाई कैसे आगे बढ़ेगी। अच्छाई को हमें ही लिख कर आगे बढ़ाना होगा। इसलिए इस घटना को लिखना आवश्यक समझा। पाठकों से निवेदन है कि उनके सुपुत्र अगस्त्य के लिए अपने आशीष दें और उनकी खुशी में सहभागी बनें।

शनिवार, 23 नवंबर 2013

बना रहे प्रेम

 बना रहे प्रेम  :  कविता वाचक्नवी


मैंने कभी प्रेम जैसे विषय पर सार्वजनिक रूप में व अभिधा में लिखा नहीं है। किन्तु कल एक लेखक मित्र का एक वाक्य पढ़ने में आया कि प्रेम क्षणिक आवेग होता है।  मेरे विचार ठीक इस से भिन्न हैं। प्रेम को क्षणिक कहने की वह बात पढ़कर कुछ विचार मन में आए। 

लोग प्रेम को क्षणिक आवेग कहते हैं। मेरा मानना है कि प्रेम में पड़े दो लोगों के कारणों के चलते प्रेम को ही क्षणिक कह देना उचित नहीं। यदि प्रेम अस्थायी व क्षणिक है तो इसका कारण प्रेम करने वालों के अपने गुण-दोष हैं।

वह स्वयं में क्षणिक आवेग होने के कारण नहीं मरता, अपितु कोई हमें प्यार करता रहे इसके योग्य बने रहना पड़ता है। ज़रा-सा योग्यता से चूके तो कर्त्तव्य समझ कर कोई प्यार नहीं कर सकता।

जैसे किसी को भी किसी के भी भोलेपन पर बरबस प्यार आता है.... मान लें हमारे उस भोलेपन पर रीझ कोई हमें प्रेम करने लग जाए, किन्तु निकट आने पर पाए कि हमारा वह भोलापन तो दिखावा मात्र था और वस्तुतः हम भोलेपन से एकदम उलट कर्कश और क्रूर हैं, तो प्यार के अयोग्य तो हो ही जाएँगे। किस बूते तब अपने को प्यार करने की योग्यता सिद्ध कर सकते हैं ? .... और किस बूते उस विरत हुए/हुई व्यक्ति को दोष दे सकते हैं ? योग्यता हमारी हमें ही प्रमाणित करनी होती है कि हमारे गुणों, व्यवहार आदि पर कोई रीझ जाए और रीझा रहे। 

रीझ जाना कठिन नहीं, वह क्षणिक आवेग में होता है, किन्तु रीझे रहना कठिन है उसके लिए स्थायी गुण चाहिए होते हैं। योग्यता यहीं से तय होती हैं।

प्रेम के क्षणिक होने का दूसरा पक्ष भी है, वह प्रेम में पड़े किसी भी एक साथी के छली होने से जुड़ा है जो किसी भी भोले-भाले व्यक्ति को प्रेम के नाम पर भ्रम में रखता है और अपना मन्तव्य/स्वार्थ सिद्ध कर पलायन कर जाता है। ऐसे में भी दोषी व्यक्ति ही है। 

प्रत्येक प्रेम सम्बन्ध में जब तक दोनों पक्ष निश्छल, परस्पर प्रतिबद्ध, ईमानदार व खरे न हों तब तक बात बनती नहीं और निरर्थक ही दोष प्रेम के अस्तित्व को क्षणिक कहकर प्रेम को दे दिया जाता है।

प्रेम को केवल दैहिक आकर्षण या देहाधृत मान कर चलेंगे तो क्षणिकता का आरोप उस पर लगाना पड़ेगा क्योंकि देह तो पल पल बदलती है और इसीलिए उस से जुड़ा आकर्षण विकर्षण भी।  

इसी बहाने प्रेम विषयक मेरी एक कविता पढ़ें, इसका शीर्षक ही है 'प्रेम' और स्त्री-पुरुष के प्रेम पर ही केन्द्रित भी है । इस लिंक को क्लिक कर उसे पढ़ा जा सकता है। 



रविवार, 6 अक्टूबर 2013

नवरात्र तथा THE HAND THAT ROCKS THE CRADLE

नवरात्र तथा THE HAND THAT ROCKS THE CRADLE   :   कविता वाचक्नवी


नवरात्रों की इस अवधि में, जबकि सदा की भांति कल भी मैंने स्त्री के वन्दनीया होने और उसे समाज में वन्दनीया का स्थान देने की बात लिखी थी, आज पुनः एक उक्ति याद आ रही है - 
"माता निर्माता भवति"। 


बहुधा लोग इसका अर्थ यह लगाते हैं कि माँ सन्तान / व्यक्ति की निर्माता होती है। जबकि यह पूरा सत्य नहीं है। पूरा सत्य यह है कि माँ के रूप में स्त्री परिवार, समय, समाज, देश, भविष्य, जीवन, राजशाही और सब कुछ की निर्माता होती है। घर व समाज में जिस अनुपात में स्त्री के साथ अन्याय, निरादर व असमानता बढ़ेगी उसी अनुपात में क्रमशः समाज का विध्वंस व विनाश सुनिश्चित है।

इसी प्रसंग में आज कवि William Ross Wallace (1819 – May 5, 1881) की एक ऐतिहासिक कविता स्मरण आ रही है। आप सब भी इस अमूल्य कविता का आनन्द लें, प्रेरणा लें।



THE HAND THAT ROCKS THE CRADLE IS THE HAND THAT RULES THE WORLD.

      BLESSINGS on the hand of women!
        Angels guard its strength and grace.
      In the palace, cottage, hovel,
          Oh, no matter where the place;
      Would that never storms assailed it,
          Rainbows ever gently curled,
      For the hand that rocks the cradle
          Is the hand that rules the world.

      Infancy's the tender fountain,
          Power may with beauty flow,
      Mothers first to guide the streamlets,
          From them souls unresting grow—
      Grow on for the good or evil,
          Sunshine streamed or evil hurled,
      For the hand that rocks the cradle
          Is the hand that rules the world.

      Woman, how divine your mission,
          Here upon our natal sod;
      Keep—oh, keep the young heart open
          Always to the breath of God!
      All true trophies of the ages
          Are from mother-love impearled,
      For the hand that rocks the cradle
          Is the hand that rules the world.

      Blessings on the hand of women!
          Fathers, sons, and daughters cry,
      And the sacred song is mingled
          With the worship in the sky—
      Mingles where no tempest darkens,
          Rainbows evermore are hurled;
      For the hand that rocks the cradle
          Is the hand that rules the world.


गुरुवार, 26 सितंबर 2013

पितर, श्राद्ध और विधि

पितर, श्राद्ध और विधि  :   कविता वाचक्नवी


'श्राद्ध' शब्द बना है 'श्रद्धा' से। 'श्रद्धा' शब्द की व्युत्पत्ति 'श्रत्' या 'श्रद्' शब्द से 'अङ्' प्रत्यय की युति होने पर होती है, जिसका अर्थ है- 'आस्तिक बुद्धि। ‘सत्य धीयते यस्याम्’ अर्थात् जिसमें सत्य प्रतिष्ठित है। 
छान्दोग्योपनिषद् 7/19 व 20 में श्रद्धा की दो प्रमुख विशेषताएँ बताई गई हैं - मनुष्य के हृदय में निष्ठा / आस्तिक बुद्धि जागृत कराना व मनन कराना।


मनुष्य समाज की समस्या यह है कि वह दिनों-दिन विचार और बुद्धि के खेल खेलने में तो निष्णात होता जा रहा है, किन्तु श्रद्धा का अभाव उसके जीवन को दु:ख और पीड़ा से भरने का बड़ा कारक है। विचार के बिना श्रद्धा पंगु है व श्रद्धा तथा भावना के बिना विचार । वह अंध-श्रद्धा हो जाती है क्योंकि विवेक के अभाव में यही पता नहीं कि श्रद्धा किस पर व क्यों लानी है या कि उसका अभिप्राय क्या है। इसीलिए ध्यान देने की आवश्यकता है कि मूलतः श्रद्धा का शाब्दिक अर्थ हृदय में निष्ठा व आस्तिक बुद्धि है..... बुद्धि के साथ श्रद्धा। 


यह तो रही 'श्राद्ध' के अर्थ की बात। पितरों से जोड़ कर इस शब्द की बात करें तो उनके प्रति श्रद्धा, कुल- परिवार व अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, अपनी जातीय-परम्परा के प्रति श्रद्धा, माता-पिता-आचार्यों के प्रति श्रद्धा की भावना से प्रेरित होकर किए जाने वाले कार्यों को 'श्राद्ध' कहा जाता है। यदि हमने अपने घर-परिवार व समाज के जीवित पितरों व माता-पिता के शारीरिक-मानसिक-आत्मिक सुख की भावना से कुछ नहीं किया तो मृतक पितरों के नाम पर भोजन करवाने मात्र से हमारे पितरों की आत्मा शान्ति नहीं पाएगी। न ही पितर केवल भोजन के भूखे होते हैं। वे अपने कुल व सन्तानों में वे मूलभूत आदर्श देखने में अधिक सुख पाते हैं जिसकी कामना कोई भी अपनी सन्तान से करता है । इसलिए यदि हम में वे गुण नहीं हैं व हम अपने जीवित माता-पिता या बुजुर्गों को सुख नहीं दे सकते तो निश्चय जानिए कि तब श्राद्ध के नाम किया जाना वाला सारा कर्मकाण्ड तमाशा-मात्र है। 


संस्कृत न जानने वालों को बता दूँ कि 'पितर' शब्द संस्कृत के 'पितृ' से बना है जो पिता का वाचक है, किन्तु माता व पिता (पेरेंट्स) के लिए संस्कृत में 'पितरौ' शब्द है। इसी से हिन्दी में 'पिता' व जर्मन में 'Vater' (जर्मन में 'V' का उच्चारण 'फ' होने से उच्चारण है 'फाटर' ) शब्द बना है व उसी से अङ्ग्रेज़ी में 'फादर' शब्द बना। संस्कृत में 'पितरौ" क्योंकि माता व पिता (अर्थात् 'पेरेंट्स' ) का वाचक है तो जर्मनी में इसीलिए 'पितर' शब्द के लिए 'Manes' (उच्चारण कुछ-कुछ मानस शब्द जैसा) शब्द कहा जाता है जबकि इसी से अङ्ग्रेज़ी में शब्द बना Manes (उच्चारण मैनेस् )। 'माँ' से इसकी उच्चारण व वर्तनी साम्यता देखी-समझी जा सकती है।


समस्या यह है कि श्राद्ध को लोग कर्मकाण्ड समझते व करते हैं और वैसा कर वे अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। जबकि मृतक पितरों के नाम पर पूजा करवा कर यह समझना कि किसी को खाना खिलाने से उन तक पहुँच जाएगा, यह बड़ी भूल है। जीवित पितरों को सुख नहीं दो व मृतक पितरों के नाम पर कर्मकाण्ड करना ही गड़बड़ है। कर्मकाण्ड श्राद्ध नहीं है। कोई भी कर्मकाण्ड मात्र प्रतीक-भर है मूल जीवन में अपनाने योग्य किसी भी संस्कार का। यदि जीवन में उस संस्कार को आचरण में नहीं लाए तो कर्मकाण्ड केवल तमाशा है। घरों परिवारों में बुजुर्ग और बड़े-बूढ़े दु:ख पाते रहें, उनके प्रति श्रद्धा का वातवरण घर में लेशमात्र भी न हो और हम मृतक पितरों को जल चढ़ाते रहें, तर्पण करते रहें या उनके नाम पर श्राद्ध का आयोजन कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझते रहें, इस से बड़ा क्रूर व हास्यास्पद पाखण्ड और क्या होगा।


वस्तुतः मूल अर्थों में श्राद्ध, श्रावणी उपाकर्म के पश्चात् अपने-अपने कार्यक्षेत्र में लौटते समय वरिष्ठों आदि के अभिनंदन सत्कार के लिए होने वाले आयोजन के निमित्त समाज द्वारा प्रचलित परम्परा थी, जिसका मूल अर्थ व भावना लुप्त होकर यह केवल प्रदर्शन-मात्र रह गई है। मूल अर्थों में यह 'पितृयज्ञ' का वाचक है व उसी भावना से इसका विनियोग समाज ने किया था, इसीलिए इसे पितृपक्ष भी कहा जाता है; किन्तु अब इसे नेष्ट, कणातें, अशुभ, नकारात्मक दिन, शुभकार्य प्रारम्भ करने के लिए अपशकुन आदि मान लिया गया है। हमारे पूर्वजों से जुड़ा कोई दिन अशुभ कैसे हो सकता है, नकारात्मक प्रभाव कैसे दे सकता है, अपशकुन कैसे कर सकता है ? क्या हमारे पूर्वज हमारे लिए अनिष्ट चाह सकते हैं ? क्या किसी के भी पूर्वज उनके लिए अशुभकारी हो सकते हैं? माता-पिता के अतिरिक्त संसार में कोई भी अन्य सम्बन्ध केवल और केवल हितकारी व निस्स्वार्थ नहीं होता। सन्तान भी माता-पिता का वैसा हित कदापि नहीं चाह सकती जैसा माता-पिता अपनी संतान के लिए स्वयं हानि, दु:ख व निस्स्वार्थ बलिदान कर लेते हैं, उसे अपने से आगे बढ़ाना चाहते हैं, उसे अपने से अधिक पाता हुआ देखना चाहते हैं और ऐसा होता देख ईर्ष्या नहीं अपितु सुख पाते हैं। ऐसे में 'पितृपक्ष' (पितृयज्ञ की विशेष अवधि) को नकारात्मक प्रभाव देने वाला मानना कितना अनुचित व अतार्किक है। 


आज समाज में सबसे निर्बल व तिरस्कृत कोई हैं, तो वे हैं हमारे बुजुर्ग। वृद्धाश्रमों की बढ़ती कतारों वाला समाज श्राद्ध के नाम पर कर्मकाण्ड कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ले तो यह भीषण विडम्बना ही है। यदि हम घर परिवारों में उन्हें उचित आदर-सत्कार, मान-सम्मान व स्नेह के दो बोल भी नहीं दे सकते तो श्राद्ध के नाम पर किया गया हमारा सब कुछ केवल तमाशा व ढोंग है। यों भी वह अतार्किक व श्राद्ध का गलत अभिप्राय लगा कर किया जाने वाला कार्य तो है ही। जब तक इसका सही अर्थ समझ कर इसे सही ढंग से नहीं किया जाएगा तब तक यह करने वाले को कोई फल नहीं दे सकता (यदि आप किसी फल की आशा में इसे करते हैं तो)। वैसे प्रत्येक कर्म अपना फल तो देता ही है और उसे अच्छा किया जाए तो अच्छा फल भी मिलता ही है। 


मृतकों तक कोई सन्देश या किसी का खाया भोजन नहीं पहुँचता और न ही आपके-हमारे दिवंगत पूर्वज मात्र खाने-पीने से संतुष्ट और सुखी हो जाने वाले हैं। भूख देह को लगती है, आत्मा को यह आहार नहीं चाहिए। मृतक पूर्वजों को भोजन पहुँचाने ( जिसकी उन्हें आवश्यकता ही नहीं) से अधिक बढ़कर आवश्यक है कि भूखों को भोजन मिले, अपने जीवित माता पिता व बुजुर्गों को आदर सम्मान से हमारे घरों में स्थान, प्रतिष्ठा व अपनापन मिले, उन्हें कभी कोई दुख सन्ताप हमारे कारण न हो। उनके आशीर्वादों के हम सदा भागी बनें और उनकी सेवा में सुख पाएँ। किसी दिन वृद्धाश्रम में जाकर उन सबको आदर सत्कार पूर्वक अपने हाथ से भोजन करवा उनके साथ समय बिताकर देखिए... कितने आशीष मिलेंगे। परिवार के वरिष्ठों व अपने माता-पिता आदि की सेवा सम्मान में जरा-सा जुट कर देखिए, कैसे घर पर सुख सौभाग्य बरसता है। 


श्राद्ध के माध्यम से मृतकों से तार जोड़ने या आत्माओं से संबंध जोड़ने वाले अज्ञानियों को कौन बताए कि पुनर्जन्म तो होता है, विज्ञान भी मानता है; किन्तु यदि इन्हें आत्मा के स्वरूप और कर्मफल सिद्धान्त का सही-सही पता होता तो ये ऐसी बात नहीं करते। आत्मा का किसी से कोई रिश्ता नहीं होता, न आप हम उसे यहाँ से संचालित कर सकते हैं। प्रत्येक आत्मा अपने देह के माध्यम द्वारा किए कर्मों के अनुसार फल भोगता है और तदनुसार ही अगला जीवन पाता है । आत्मा को 'रिमोट ऑपरेशन' से 'कंट्रोल' करने की उनकी थ्योरी बचकानी, अतार्किक व भारतीय दर्शन तथा वैदिक वाङ्मय के विरुद्ध है।


अभिप्राय यह नहीं कि श्राद्ध गलत है या उसे नहीं करना चाहिए। वस्तुतः तो जीवन ही श्राद्धमय हो जाए तब भी गलत नहीं, अपितु बढ़िया ही है। वस्तुत: इस लेख का मूल अभिप्राय यह है कि श्राद्ध क्या है, क्यों इसका विधान किया गया, इसके करने का अर्थ क्या है, भावना क्या है आदि को जान कर इसे करें। श्राद्ध के नाम पर पाखण्ड व ढकोसला नहीं करें अपितु सच्ची श्रद्धा से कुल- परिवार व अपने पूर्वजों के प्रति, अपनी जातीय-परम्परा के प्रति, माता-पिता-आचार्यों के प्रति, समाज के बुजुर्गों व वृद्धों के प्रति श्रद्धा की भावना से प्रेरित होकर अपने तन, मन, धन से तथा निस्स्वार्थ व कृतज्ञ भाव से जीवन जीना व उनके ऋण को अनुभव करते हुए पितृयज्ञ की भावना बनाए रखना ही सच्चा श्राद्ध है। 




गुरुवार, 15 अगस्त 2013

भारत माता : अभिनय से संस्कार तक






indian_flag.htmlअपने जीवन के प्रारम्भिक दौर में मैंने मंचों पर खूब अभिनय आदि किया है। मेरे द्वारा अभिनीत नाटकों व भूमिकाओं के बाद स्थिति यह होती थी कि महीनों-सालों तक लोगों की भीड़ मुझे दैनिक जीवन में आते-जाते भी मेरी किसी न किसी अभिनीत भूमिका के पात्र के रूप में पहचानती थी और यह भी याद है कि अपने जीवन की अन्तिम अभिनय-भूमिका  मैंने वर्ष 1978 -79 में की थी, जिसके परिणाम स्वरूप मुझे राज्य का 'बेस्ट एक्टिंग अवार्ड' मिला था। यह भूमिका दहेज विरोधी एक नाटक में दुल्हन की थी। इसका श्वेत-श्याम एक चित्र अभी पिताजी की एल्बम में भी पड़ा हुआ है। इस भूमिका के साल भर बाद तक कॉलेज से बाहर आते हुए लोगों की भीड़ रास्ता रोक लिया करती थी और राह चलते लोग उंगली से 'दुल्हन' कह कर इशारा किया करते थे, स्कूल कॉलेज की लड़कियों में तो धक्का मुक्की हो जाया करती थी मुझे आते-जाते आगे बढ़ कर देखने वालों के बीच। उस जमाने व उस उम्र में वैसी लोकप्रियता किन्हीं विरलों को ही मिला करती थी। खैर ! 


यह तो रही अन्तिम भूमिका की बात, किन्तु आज इसका स्मरण इसलिए आया क्योंकि अपने जीवन में प्रथम भूमिका मैंने कक्षा प्रथम से ही निभानी शुरू कर दी थी, जब प्रत्येक वर्ष स्वतन्त्रता दिवस व गणतन्त्र दिवस के अवसर पर हर बार विद्यालय के प्रिंसिपल (उस समय के मेरे हीरो अध्यापक नरेश शर्मा जी) पूरे कार्यक्रम व ध्वजारोहण के समय मुझे "भारत माता" के रूप में ध्वज के पास 2-3 घण्टों के लिए ( हाथ से मुख्य ध्वजा के स्तम्भ को छूते हुए ) खड़ा करवा देते थे, वासन्ती साड़ी व तीन रंगों की कई सारी पुष्पमालाएँ मेरे गले में पहनाई जाती थीं व माथे पर बड़ा-सा टीका किया जाता था। स्कूल की मेरी अध्यापिकाएँ ही मुझे तैयार भी किया करती थीं।  


कार्यक्रम के उपरांत उस सार्वजनिक मैदान में उपस्थित विद्यालय के छात्रों के परिवार वाले व सभी अन्य लोग आ आकर चरण छुआ करते थे। बाँटे जाने वाले लड्डुओं का थाल मेरे आगे एक पटिया पर रखा जाता था, जिसे कार्यक्रम के पश्चात् सभा विसर्जित होने से पूर्व सभी को बाँटा जाता था। किसी विद्यालय का यह ध्वजारोहण कार्यक्रम, उस नगर के उस क्षेत्र का आधिकारिक ध्वजारोहण कार्यक्रम होता था जिसमें दूर दूर के मोहल्ले वाले बड़े-छोटे सभी भाग लेते थे, तम्बू-कनातें लगते थे, छिड़काव होता था, लाऊडस्पीकर पर बहुत भोर से ही ज़ोर ज़ोर से देशभक्ति के गीत बजाए जाने लगते थे और विद्यालय के एक कमरे में सुई की नोक पर बजने वाले रेकॉर्ड लिए लाऊडस्पीकर वालों की तरफ से एक व्यक्ति हर समय डटा रहता अदला-बदली करता रहता था। 


आज स्वतन्त्रता दिवस पर लगभग पैंतालीस-अड़तालीस बरस बाद उन दृश्यों का अनायास स्मरण हो आया है। भारतमाता के प्रति जन-जन की उस आस्था के चलते लोगों ने उस बालक कविता को भारतमाता का प्रतीक मान चरण छू छू कर मन में राष्ट्रीयता व देशभक्ति के प्रथम संस्कार विकसित किए होंगे। आज उनमें से कोई विरला ही उन दृश्यों व घटनाओं को याद करने वाला होगा किन्तु मैं अपने इन शब्दों के माध्यम से उन की उस भावना को प्रणाम निवेदित करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही हूँ।


वह बच्ची आज मन में पुनः सिर उठाकर ध्वज थामे उसी ठसक से आ मूर्ति की तरह स्थापित हो गई है। तब भले ही वह अभिनय मात्र था, किन्तु था शुद्ध व सात्विक ! संस्कार ऐसे ही बनते होंगे शायद। आज जब नन्हे नन्हें बच्चों को भौण्डे फिल्मी गीतों पर कूल्हे मटकाते मंचों पर अभिनय करते देखती हूँ तो लगता है कि कैसे यह पीढ़ी देशप्रेमी पीढ़ी में रूपांतरित हो सकती है या संस्कारित हो सकती है भला ! 


पता नहीं, अब भारत में जन जन का सैलाब भारत माता के ऐसे प्रतीकों के प्रति उसी आवेश और उसी निष्ठाभाव से उमड़ता भी है या नहीं ... या वे लोग सच में पूरी तरह कहीं खो गए ....


आज यद्यपि सब ओर इतना कुछ भयावह, दु:खद व कलुषित है कि राष्ट्र की मुक्ति के संघर्ष में जी-जान लागकर उसे अर्जित करने वाले लाखों-लाख बलिदानियों का वह अनुपम त्याग और बदले में देशवासियों को मुक्ति का आकाश देने की भावना का मूल्य तिरोहित हो चुका है। किन्तु मेरे लिए तो स्वातन्त्र्यपर्व और गणतन्त्रदिवस का अर्थ राष्ट्रीयमुक्ति-संघर्ष में स्वेच्छा से प्राण दे देने वाले लक्षाधिक वीरों के ऋण से स्वयं को उऋण न होने देने के स्मरण की वार्षिकी ही होता है। हमारी व हमारी आगामी पीढ़ियों की जिस शुभ-कामना से उन्होंने अपना, अपने परिवारों व अपनी पीढ़ियों का जीवन दाँव पर लगाया, यह राष्ट्र उसका सदा ऋणी रहेगा। इस वातावरण व राष्ट्रीय नैतिक मूल्यों के पतन के गर्त में देश को देखकर विचार यह भी आता है कि जिन मूल्यों की प्रतिष्ठा में उन्होंने प्राण दिए उनके पुनर्जागरण  का अंकुर कब व कहाँ पनपेगा .... !यह भी अभी मानो काल के गर्भ ही में है।



भारत माता की भूमिका से शुरू हुआ वह अभिनय तो कब का तभी समाप्त हो गया, किन्तु भारतमाता संस्कार के रूप में मन के भीतर आकर तभी से विराज गई हैं। उन्हें शत-शत वन्दन और उसके अमर बलिदानी सपूतों को भी शत शत वन्दन, अभिनन्दन, प्रणाम !! 




सोमवार, 22 जुलाई 2013

अविश्वसनीय अनुभव का एक दिन

अविश्वसनीय अनुभव का एक दिन /  कविता वाचक्नवी


कल मैं लन्दन में बसे हुए एक अद्भुत परिवार से मिली। बड़े भाई 82 वर्ष के हैं और छोटे भाई उनसे कुछ वर्ष कम, दोनों की बहुपठ पत्नियाँ हैं, दोनों भाई कल्पनातीत ढंग से एक दूसरे पर न्यौछावर रहते हैं व दोनों भाई व परिवार एक साथ रहते हैं, दोनों के तीन बच्चे हैं, परंतु कौन किसकी संतान है यह पता किसी तरह कदापि नहीं चल पाता क्योंकि दोनों ही भाई व दोनों की पत्नियाँ उन बच्चों को 'मेरा बेटा', 'मेरी बेटी' कहते हैं। प्रतिदिन हर बार छोटे भाई सबसे पहले अपने हाथ से परस कर अपने बड़े भाई को भोजन खिलाते हैं और तब बड़ी भाभी खाने बैठती हैं, जब वे खा चुकती हैं तब छोटा भाई व भाभी खाने बैठते हैं। 


मैं इस दुर्लभ व अविश्वसनीय परिवार के साथ कल लगभग 3 घण्टे रही और बार-बार धन्यता अनुभव कर मेरी आँखें आह्लाद से भीगती रहीं। बड़े भाई के बड़प्पन व विशिष्टता को सराहें तो हर बार कहते हैं कि असल में मैं कुछ नहीं हूँ सब कुछ इस छोटे के कारण समझा जाता हूँ और छोटे भाई के 'लक्ष्मणत्व' पर एक शब्द भी कहें तो वे कहते कि मैं तो जड़मति सेवक हूँ और बड़े भाई के कारण मुझे 'क्रेडिट' मिलता है व विशेष समझ लिया जाता है। 


परिवार सदा से एक साथ रहता आया है और एक साथ रहते हैं। जाने कितनी संस्थाओं के पोषण का दायित्व उन्होंने ले रखा है, एक भारतीय भाषा की पत्रिका का सम्पादन/ संचालन आदि सब भी बड़े भाई करते हैं। निर्धनों के लिए एक कैंसर अस्पताल भारत में स्थापित किया है। उनका निजी पुस्तकालय है, जिसकी एक-एक पुस्तक पर सफ़ेद आर्ट पेपर से उन्होने अपने हाथ से जिल्द चढ़ाई हुई हैं व अपने हाथ से उस पर पुस्तक का नाम आदि लिखा करीने से सजा है, पूरा पुस्तकालय सफ़ेद रंग के सौम्य अनुशासन में मानो सरस्वती का स्वरूप धारे है। पुस्तकालय में संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती व कुछ अन्य भाषाओं की पुस्तकें भरी पड़ी हैं। दोनों पूरी तरह सक्रिय व सचेत हैं और दोनों के मुखमण्डल पर एक ऐसी दिव्य आभा, सौम्यता व शिष्टता है कि उसे बखाना नहीं जा सकता। दोनों की पत्नियाँ अविश्वसनीय ढंग से एक दूसरे पर मरने मिटने को तैयार रहने वाली बहनों से भी कई गुणा बढ़कर हैं। हम सब लोगों को खाना आदि देकर छोटे भाई रसोई में बर्तन साफ करते रहे जब तक बड़े भाई खा नहीं चुके, बड़ी भाभी हमें परसती रहीं और छोटी भाभी रसोई में पकाने आदि का काम करती रहीं। हम सब के खा चुकने के बाद बड़ी भाभी जब खाने बैठीं तो तब छोटी भाभी रसोई साफ कर बर्तन साफ करने लगीं 


...... क्या क्या कहा जाए ..... जीवन में ऐसा परिवार, ऐसा प्रेम, ऐसा बड़प्पन म्यूजियम में संरक्षित कर आश्चर्य से देखी जाने की वस्तु जैसा है... रिश्तों का ऐसा दुर्लभ रूप कि शब्द मेरे किसी काम नहीं आ रहे हैं कि उसे बखान सकूँ.... बस हृदय को आकण्ठ रसानुभूति से लबालब पा रही हूँ । सौजन्यता के ऐसे मूर्तिमान रूप कि जो देखा अनुभव किया है, ये शब्द उसका हजारवाँ अंश भी नहीं हैं। कितने गंभीर विषयों पर कितनी बातें उनसे हुईं उसका लेखा जोखा भी अलग ही चीज है। संसार में मनुष्य ऐसे प्रेम और ऐसे रिश्ते आचरण में जीने लगें तो संसार स्वर्ग बन जाए। मुझे उनके यहाँ वास्तव में स्वर्गिक सुख की अनुभूति हुई। और वे अपनी बेटी से भी कम आयु की मुझ तक को दीदी कह कर संबोधित करते और विदाई के समय 'बहन का भाइयों पर आशीष बना रहे' जैसे शब्द का कर उन क्षणों को दुर्लभ बना रहे थे... ! जिन पारिवारिक व जीवन मूल्यों को पुस्तकों में पढ़ा-पढ़ाया जाता है, यह परिवार उन मूल्यों को सुखपूर्वक पूरी तरह जी रहा है ! क्या कहूँ ..... कल के उस अनुभव की कोई तुलना नहीं .... बस दुर्लभ !!!


बुधवार, 5 जून 2013

जब दुल्हन आने पर घर में नाचे मोर

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           (विश्व पर्यावरणदिवस पर विशेष )


राजस्थान, 26 दिसंबर की कड़कड़ाती शीत मेरे विवाह के बाद पहली सुबह थी और लगभग 7 बजे हमें आवाज देकर उठाया गया क्योंकि आँगन में कई सारे मोर-मोरनियाँ आ गए थे। बाद में इन मोरों से ऐसा रिश्ता बना कि मेरे आँगन में 4-5 मोर तक एक साथ नाचा करते थे... जीवन में शायद ही किसी ने इतने रोमांचक अनुभव पाए हों। मेरे परिवार के लोग कहा करते थे कि ब्याह वाले घर बहू आने पर हीजड़े (शब्द के लिए क्षमा) तो घर-घर में नाचते/नचवाते हैं लोग, पर तुम्हारे ब्याह के बाद तो अपने आप ही मोर नाचने आ जाने की गाथा विरल ही के भाग्य में होती है :) । उस पहली मोर-नाच वाली सुबह की एक 'मूवी' भी हमने लगभग 31 वर्ष पहले घर पर तभी बनाई थी। 


घरों में बिस्तर पर कुत्तों और बिल्लियों की कहानी तो बहुतों ने सुनी होगी पर बिस्तर पर मोर की अलबेली गाथा केवल मेरे ही साथ हुई। एक मोर हमारा पालतू ही हो गया था और वह शीत की दुपहरी में आँगन में फोल्डिंग चारपाई बिछा कर धूप सेंकने के लिए मेरे सोए होने पर चारपाई पर चढ़ आता और वहीं अपने पैकेट को खींच कर ला उढ़ेलता दाने खाता या मेरे हाथ से खाता .... । हम लोग नियमित दैनिक अग्निहोत्र करते तो वह नियम से पूरा समय निश्शब्द साथ में वहीं बैठा रहता। मेरे इधर उधर होने पर स्वयं भण्डार में घुस जाता और अपने लिए रखे अनाज के डिब्बे को गिराकर या पैकेट को उढ़ेल कर दाने खाया करता। मैं न दीखती तो घर के सब कमरों को पार करता एक ओर से दूसरी ओर पूरा घर चहलकदमी करते हुए फलाँग आ जाता। घर में चोर घुस आने की आशंका में उसने एक दिन ऐसा कोहराम मचाया कि जब तक मुझे अपने कदमों के पीछे चलाता हुआ लेकर दूसरी ओर दीवार खोदते कर्मचारियों तक नहीं ले गया तब तक डेढ़ घण्टा चीखता रहा। उसके साथ मेरे पचासों चित्र हैं, चारपाई पर, हाथ से खाते हुए, नाचते हुए आदि आदि। वे सब चित्र भारत के सामान में बंद पड़े हैं अन्यथा आज उन्हें अवश्य लगाती। 


राजस्थान छोड़ते समय उसके छूट जाने की पीड़ा से मन बहुत व्यथित था। अपनी गोदावरी बाई को दस-बीस किलो अनाज के पैसे देकर आई थी कि वह रोज नियत समय पर आकर उसे दाना देती रहे। गोदावरी ने कहा कि उसे पहचानेगी कैसी, तो चलते चलते मैंने उस नीलकण्ठ की गर्दन पर सफ़ेद पेंट के कुछ चिह्न बना दिए थे ताकि पहचाना जा सके। वह कैसा विकल हुआ होगा कई दिन तक ! कोई छोटा-मोटा जीव होता तो उसे साथ ही ले आती पर इतने बड़े मोर को छोड़कर ही जाना संभव था। 


बाद में तोता (मधुरम्), खरगोशों का जोड़ा, मछलियाँ और अब हमारी मौलि (बिल्ली) हमारे प्रेम के ऐसे पात्र बने कि इनके स्नेह और लगाव से मन द्रवित हो जाया करता है ... पर मोर के पालतू जो जाने का संस्मरण संसार में शायद ही किसी के पास हो.... मैं इकलौती वैसी भाग्यशाली हूँ । 


विवाह से पूर्व घर में पलती गाय-बछड़ों आदि से चल विवाह के बाद मोरों के साथ शुरू हुई यह जीवनयात्रा आज 'राजहंसों', बतखों, मौलि (हमारी बिल्ली) और जाने कितने पंछियों के सान्निध्य में आ पहुँची है। ये जीव हमारा जीवन कितना स्निग्ध बना डालते हैं... हमारा अस्तित्व इनके सामीप्य में और सँवर उठता है। विश्व पर्यावरण दिवस पर इन अपने चहेतों के लायक सृष्टि बचाई रख पाने की कामना से बड़ी कामना और क्या हो ! 

(हंसों के कई चित्र गत दिनों लगाए थे कुछ और चित्र दो चार दिन में लगाऊँगी। तब तक एक चित्र गोद में सवारी करती मौलि का )
कुछ चित्रों को यहाँ देखा जा सकता है - क्लिक करें यहाँ  / यहाँ

और लोमड़ी के साथ हमारा एक वीडियो भी गत दिनों मैंने साझा किया था -


मंगलवार, 28 मई 2013

आधी रात के असमय कष्ट

आधी रात के असमय कष्ट  : कविता वाचक्नवी


भारत व ब्रिटेन के समय में मुख्यतः साढ़े पाँच घण्टे का अन्तर है। प्रतिदिन होता यह है कि मैं रात्रि 2-3 बजे तक काम करती रहती हूँ। और इस बीच यदि 'फेसबुक' पर सोने से पूर्व कोई नया 'स्टेटस' लिख दूँ या कहीं टिप्पणी कर दूँ तो फेसबुक खोले जाग रहे दूसरे व्यक्तियों को पता चल जाता है कि मैं अभी जाग रही हूँ। ....बस लोग आधी रात में ही ( मेरी 'चैट' लगभग स्थायी रूप से बंद होने के बावजूद) 'इनबॉक्स' में बातचीत करने और संदेश भेजने में जुट जाते हैं। मैं समय देखती हूँ तो बहुधा यहाँ रात्रि 7 से 1 बजे का समय होता है, अर्थात् उस समय भारत में रात 12 से तड़के 6 बजे तक की अवधि। मुझे जबर्दस्ती उन्हें विदा कहना पड़ता है और त्रस्त जो होती हूँ, वह अलग। 


उन्हें यह सामान्य-सी समझ नहीं है कि मध्य रात्रि में यदि कोई परिवार वाली महिला जाग रही है तो उसके पास कार्यों का कितना दबाव होगा कि वह आधी रात को काम कर रही है। दूसरे, उन्हें यह साधारण शिष्टाचार भी नहीं पता कि मध्य रात्रि को किसी महिला से 'चैट' नहीं की जानी चाहिए। यदि आपको यहाँ का समय न भी पता हो, तो भी अपने यहाँ का समय तो पता ही होता है कि अभी रात 7-8 से तड़के 8-9 बजे का समय किसी से संपर्क करने का समय नहीं होता।


आधी रात को लोग अपनी कविताएँ भेजना चालू हो जाते हैं, कहानियों के लिंक भजते हैं कि 'कृपादृष्टि' (?) डालूँ, अपनी 'स्टेटस' पर आकर एक टिप्पणी करने के लिए आमंत्रण देते हैं। या यों ही फालतू की बातें करते हैं कि कैसी हैं, परिवार कैसा है, आजकल क्या कर रही हैं, वहाँ मौसम कैसा है, लंदन तो बहुत सुन्दर होगा, भारत कब आ रही हैं, मैं यह करता हूँ, मैं वह करता हूँ, मेरे बेटे को ईनाम मिला, आपकी पोस्ट बहुत अच्छी थी, आपकी फोटो बहुत सुन्दर है, आपके घर में कौन-कौन हैं, आपके पति क्या करते हैं, बच्चे कितने हैं (वैसे घर में कौन-कौन आदि जैसे व्यक्तिगत प्रश्नों के उत्तर में मैं एक ही बात कहती हूँ कि "भई, अभी मुझे अपना बेटा नहीं ब्याहना, जब ब्याहना होगा तब लड़की वालों के सवालों का सब उत्तर दूँगी, अभी से तहक़ीक़ात क्यों ?" ) 


.... परन्तु मैं उस अविवेक, अशिष्टता, आत्म मुग्धता, छपास, दुर्व्यवहार व अभद्रता आदि पर चकित हूँ कि जिन लोगों में इतनी-सी सामान्य सामाजिक शिष्टाचार तक की समझ तक नहीं है, वे कैसे स्वयं को लेखक समझ कर भ्रम में जीने लगते हैं। हम लोग अपने घनघोर परिचितों को कॉल करते समय भी बीस बार सोचते हैं कि यह खाने का समय होगा, यह आराम का और यह अमुक-अमुक दिनचर्या का, अतः उन घंटों में अत्यावश्यक होने पर भी फोन तक नहीं करते जब तक कि कोई आपत्ति या समस्या न हो।


समझ के इतने अभाव में जीने वालों से सम्पर्क, सम्वाद, मित्रता, परिचय आदि में मुझ कोई रुचि नहीं है। मैं ऐसे लोगों से कोई वास्ता नहीं रखना चाहती। हो सकता है ऐसी घटना के बाद मैं अपने कई मित्रों से कन्नी काट लूँ (करती ही हूँ )। ऐसे में उन्हें समझ जाना चाहिए कि उनका व्यवहार मुझे नागवार गुजरा है। कम से कम ऐसी अशिष्टता भविष्य में वे दूसरों के साथ करके अपनी मूर्खता सहित दसियों अशोभन मनोवृत्तियों का प्रदर्शन न करें, तो उनके हित में होगा। 


सोमवार, 27 मई 2013

बार-बार दिन यह आए ......

बार-बार दिन यह आए  : कविता वाचक्नवी

कुछ दिन बहुत विशिष्ट व विचित्र होते हैं... जैसे आज ही का दिन ! 

आज मेरे बच्चों की दादी जी (हमारी 'अम्मा') की पुण्यतिथि है और साथ ही आज मेरे पिताश्री का जन्मदिवस। मेरी सास बहुत मजबूत व सशक्त स्त्री थीं, जाने कितनी स्त्रियों में जागृति के लिए उन्होंने कारी किए और किसी भी प्रकार की अन्ध आस्था, परम्परा व रूढ़ि आदि को अपने व परिवार में आने नहीं दिया, जाने कितने सामाजिक कार्य किए और जीवन में किसी अवैज्ञानिक अतार्किक रीति रिवाज को न तो अपनाया व न परिवार में आने दिया। उनकी अगली दो पीढ़ी की कई स्त्रियाँ भी उतनी सशक्त नहीं हो सकीं, जितनी सतर्क सचेत, जागरूक, शिक्षित व सामाजिक कार्यकर्ता वे थीं। कोलकाता की बस्तियों में उन्होंने बहुत शिक्षा व समाज सुधार के अनेक सामाजिक कार्य किए, आर्यसमाज की सक्रिय नेत्री रहीं। उन्हें शत शत वन्दन ! 

 मेरे बच्चों के पास अपनी दादी जी की बहुत महीन-सी स्मृतियाँ हैं, जब वे सिधारीं तो बच्चे बहुत छोटे-छोटे थे, दादा जी तो बच्चों के जन्म से पूर्व ही सिधार चुके थे।

दूसरी ओर नानी को सिधारे भी युग बीत गए।


बच्चों के लिए अपने दादा-दादी व नाना-नानी आदि के प्रेम का केवल एक ही स्रोत रहा - उनके नाना जी... मेरे पिताजी ! 

आज पिताजी ने जीवन का एक बड़ा पड़ाव पार किया है....संसार में कोई पिता अपनी सन्तान के लिए इतनी तपस्या नहीं कर सकता जितनी मेरे पिताजी ने हमारे लिए हमारी माँ के महाप्रयाण के बाद की। उस तपस्या का उल्लेख करने या उसे शब्द-शब्द लिखने का सामर्थ्य भी मेरी इस कलम में नहीं। पिताजी के अस्तित्व में ही मेरा अस्तित्व निहित है। उनके बिना बिना मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं। पिताजी ने जीवन में जितने सामाजिक कल्याण के कार्य, भाषा के लिए जितने बलिदान व संघर्ष, लेखन (साहित्य व दर्शन) में जो अपार गुणवत्ता, मुझे व भाई को गढ़ने में जो संघर्ष व तप, जनान्दोलनों में जो भूमिकाएँ निभाई हैं, उनका इतिहास दो-चार-दस पन्नों में लिखने-समाने की वस्तु नहीं है। उनके जैसा पिता किसी अत्यन्त भाग्यशाली को ही मिल सकता है। मैं पिताजी के प्रति हजार बार नतमस्तक होना चाहती हूँ तो भी कम है..... वे मेरी जीवनीशक्ति का उद्गम हैं, विचार की प्रेरणा, लेखन के प्राण, संघर्ष, शक्ति व ऊर्जा के स्रोतपुंज आधार हैं। वे क्या हैं, इसे बताया बखाना नहीं जा सकता ..... ! आज उनके जीवन की इस विशेष जन्मदिवस-वेला में उन्हें शत शत अभिनन्दन ! वे स्वस्थ व सक्रिय रहें, शतायु हों व उनका आशीर्वाद हम पर सदा सुरक्षाकवच की भाँति बना रहे, यही एक कामना मन में इस घड़ी बार बार जगती है। पिताजी को बार-बार प्रणाम व अभिनन्दन !

Swansea (स्वाञ्ज़ी), ब्रिटेन में सड़क पर लगे एक पट्ट पर कुछ पढ़ते हुए , 24 मार्च 2011 



बुधवार, 8 मई 2013

जीवन की व्यक्तिगत गाथा ....

जीवन की व्यक्तिगत गाथा ....  :  कविता वाचक्नवी



पिताश्री इंद्रजित देव 


विगत एक माह से पिताजी की भीषण अस्वस्थता व जीवन के साथ संघर्ष में उनके, मेरे व हमारे मित्रों, परिचितों, परिवारिजनों व शुभचिंतकों तक कम से कम समय में एक साथ सूचना पहुँचाने के माध्यम के रूप में इन्टरनेट और विशेषतः फेसबुक ने बड़ा सहयोग दिया। 

ऐसे समय में जब परिवार बार-बार एकाधिक लोगों के फोनकॉल्ज़ आदि का उत्तर देकर उन्हें विस्तार से जानकारी, सूचना आदि नहीं दे सकता या निश्चिन्त नहीं कर सकता ऐसे में ये माध्यम बड़े कारगर होते हैं, हुए।

विदेशों में लोगों के आकस्मिक संकट की स्थितियों में फंसे होने पर अपने ट्वीटर खातों से एक संदेश दे कर जीवन रक्षक सहायता लेने के कई उदाहरण हैं। कभी कोई घर में फँस गया या सड़क में हिमपात में अटक गया तो इन नवीनतम संसाधनों ने उसे जीवनदान दिया क्योंकि उसके एक सन्देश से उसके सब जगह फैले सहयोगी मित्रों ने अपने अपने तईं सहायता दिलवाने के यत्न शुरू किए। कई बार तो दूसरे देश में कोई सहायता की आवश्यकता पड़ने पर लोगों ने फेसबुक, ट्वीटर के माध्यम से जुड़े अपने मित्रों का सहयोग दिया/लिया। कई बरसों से बिछड़े परिवार इस माध्यम से मिले और कइयों ने अपने खोए बच्चों को इस माध्यम से ढूँढ निकाला। इस तरह ये संसाधन केवल ज्ञान और जानकारी के लिए ही नहीं अपितु जीवनरक्षक और सम्बन्धियों तक पहुँच बनाने के बड़े माध्यम भी बने, व्यक्तिगत से व्यक्तिगत और सामाजिक से सामाजिक, राष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय अवसरों, कार्यों व उद्देश्यों के लिए इनका उपयोग मानव-समाज के लिए अतीव महत्व का है। जो लोग इस महत्व को नहीं जानते वे दूसरों को उनकी निजी आवश्यकताओं से जुड़े मुद्दों पर लिखने के लिए हास्यास्पद ढंग से शिक्षा देते दिखाई देते हैं या आलोचना करते पाए जाते हैं। जैसा कि गत दिनों से आज तक यहाँ मुझे भी देखने/झेलने को मिला। 

मेरे लिए फेसबुक की दुनिया एक आत्मीय परिवार और सामाजिक परिवेश की भाँति है, जिसमें लोग परस्पर एक दूसरे के सुख दु:ख में सहायक बनते हैं और सहायक न बन सकें तो कम से कम सुख दु:ख में साथ खड़े होते हैं, सुख दु:ख बाँटते हैं। किसी का जन्मदिवस और वर्षगाँठ है तो बधाइयाँ देते हैं, कष्ट है तो सान्त्वना देते हैं, सहयोग का प्रस्ताव देते हैं। इसीलिए 'सोशल नेटवर्किंग साईट्स' कहा जाता है इन्हें। 

पिताजी के स्वास्थ्य को लेकर हमारे मित्रों ने हमारी संकट की घड़ी में जिस प्रकार अपने शब्दों, आशीर्वचनों, कइयों ने स्वयं जाकर, कुछ ने मेडिकल क्षेत्र के लोगों से जान-पहचान की जानकारी आदि दे कर जिस प्रकार हमारा मनोबल बढ़ाया वह अविस्मरणीय है। उन के प्रति कृतज्ञ हूँ। लोग बारम्बार अपनी ओर से सन्देश भेज कर आज, अभी तक उनके विषय में चिन्तित हैं। इसलिए मुझे उपयुक्त लगता है कि आज सब को एक साथ निश्चिन्त किया जाना अनिवार्य हो गया है। क्योंकि अभी कुछ घंटे पूर्व ही अस्पताल ने उन्हें कल छुट्टी देने के कागज तैयार कर दिए हैं। अभी यद्यपि आगामी 6 माह उनका उपचार चलेगा और 10-12 दिन में ऑपरेशन से जुड़ी अंतिम कार्यवाही पूरी होगी किन्तु अब वे घर जा सकते हैं। 

पिताजी के स्वास्थ्य में सुधार से मानो मेरा जीवन लौट आया हो और मेरी ही आयु बढ़ गई हो। मैंने कभी अपने पिताजी को सिर दर्द होते भी नहीं देखा। वे मेरे जीवन का उत्स केवल दैहिक रूप में ही नहीं, अपितु मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक आदि सभी प्रकार से भी हैं। पिताजी ने जितनी तपस्या मुझे गढ़ने में की है, संसार में शायद ही कोई पिता अपनी संतान के लिए उतनी और वैसी तपस्या कर सकता होगा... लगभग असंभव ! उसे बताया बखाना भी नहीं जा सकता। 
मेरे लिए अपने पिताश्री का अस्तित्व मेरे होने की अनिवार्य शर्त है। यह कल्पना भी दुष्कर है कि मैं हूँ और वे नहीं हैं। उनके प्राण मुझ में और मेरे उनमें अटके हैं...... । 
आज मेरा मन, उन्हें रोग से उबरते देख, पुनः जीवन की ओर अग्रसर होता जान पड़ता है। यद्यपि आगामी 6 माह अभी उन्हें डॉक्टरी निर्देशों व परिचर्या में रहना होगा ईश्वर का लाख-लाख धन्यवाद। 

मुझे मानो अपने मन में उत्सव की अनुभूति जैसा लग रहा है। प्रभु की अपार कृपा, पिताजी की तपस्या, भाई-भाभी व परिवार की सेवा तथा हजारों लाखों लोगों की शुभकामनाओं व प्रार्थनाओं ने यह सुखद दिन दिखाया है। मैं किस किस को धन्यवाद दूँ और कैसे समझ नहीं पा रही। जो मित्र आत्मीय सम्बल बन इन घड़ियों में साथ रहे उन सब को व्यक्तिगत संदेश भेजना संभव नहीं अतः इस माध्यम के द्वारा आप सभी के प्रति आभार व्यक्त करना चाहती हूँ। स्वीकारें ! पिताजी के शतायु होने की कामना व उनका वरद हस्त हम पर सदा बने रहने की अशेष कामना है। शुभचिंतकों, मित्रों व हितैषियों का पुनः धन्यवाद। इस आड़े समय में जिन जिन ने जो सहयोग दिया उनके प्रति आभारी हूँ।



शनिवार, 3 नवंबर 2012

उत्सवों पर एक टीप : कविता वाचक्नवी

उत्सवों पर एक टीप  :  कविता वाचक्नवी


Holi - Dancersमूलतः प्रत्येक देश के सभी उत्सव और त्यौहार तत् तत् स्थानीय प्रकृति और कृषि से प्रारम्भ हुए और उन्हीं से जुड़े हैं। कालांतर में ये सामाजिकता का पर्याय बन गए और समाज के चित्त की अभिव्यक्ति का माध्यम भी। 


समाज के चित्त में पारस्परिकता में आई स्वाभाविक खरोंचों के चलते कुछ और आगे आने पर क्रमश: लोगों ने जैसे जैसे इन्हें विभाजित किया तैसे तैसे इन्हें पूजा-पद्धतियों के नाम पर नियोजित आयोजित करना प्रारम्भ कर लिया और ऐसा करने का फल यह हुआ कि उत्सवों को ही बाँट दिया गया। इसी बँटवारे के बीच कुछ नए उत्सव और त्यौहार भी जोड़ दिए गए ताकि बँटवारे की रेखा स्पष्ट की जा सके या आयोजनों को संख्या  अधिक की जा सके । 


प्रकृति, ऋतुएँ, कृषि और स्थानीयता से मानवमन के विलय की मूल भावना से जुड़ कर प्रारम्भ हुए उत्सवों की संरचना और विधान बदल लिए गए। 


इस से और भी आगे आने पर, अब, उत्सव न तो कृषि आधारित रहे हैं, न सामाजिकता व लोकचित्त की पारस्परिकता और न ही उतना पूजा पद्धति और धर्म (?) के अधिकार में । 


धीरे-धीरे उत्सव अब बाजार की शक्तियों या बाजार की मानसिकता से संचालित व आयोजित होने लगे हैं। मानव-मन की उत्सवप्रियता ने इस सहसंबंध को और बल दिया है पर साथ ही इससे यह भी रेखांकित हुआ है कि मानव-मन और लोकचित्त से धीरे-धीरे जैसे कभी कृषि व पारस्परिकता की भूमिका क्रमश: कम होने लगी थी, उसी प्रकार वर्तमान समय में पंथों व पूजापद्धतियों का अंकुश भी कम होने लगा है.... कम से कम बाजार ने तो उसे पछाड़ ही दिया है। क्योंकि उत्सव अब सीधे-सीधे मनोरंजन पर केन्द्रित होने लगे हैं। 


उत्सवों व त्यौहारों का बाजार से धीरे धीरे अधिकाधिक संचालित होते चले जाने वाला यह परिवर्तन कितना सकारात्मक है अथवा कितना नकारात्मक यह तो नहीं कह सकती किन्तु यह बहुत थोड़े अर्थों में अंतराल को पाटने का काम करता अवश्य दीखता है। पर साथ ही यह कहीं एक नए वर्ग अन्तराल को भी जन्म दे रहा है जो भले धर्म या पूजापद्धति से अलग न हो किन्तु आर्थिक स्तर पर अलग अवश्य होगा / है। धर्म का नाम लेकर बंटे हुए या अर्थ के आधार पर बंटे हुए किसी भी समाज में कोई अंतर नहीं।


किन्हीं अर्थों में ये स्वाभाविक प्रक्रियाएँ प्रतीत होती हैं क्योंकि सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति की क्षमताएँ भिन्न हैं, विशेषताएँ व कमजोरियाँ भी भिन्न हैं, इच्छाएँ व आकांक्षाएँ भी भिन्न। इसी मनोविज्ञान को समझ कर इन सब अंतरालों को पाटने के काम आने वाले उत्सव और त्यौहार कभी समाज ने मूलतः इसी उद्देश्य से प्रारम्भ किए होंगे कि चलो एक समय तो ऐसा हो जब लोग परस्पर मिल कर हँसे और खुशी मनाएँ। इसीलिए जैसे-जैसे स्थानीय ऋतुएँ और प्रकृति तत् तत् स्थानीय समाज को खुले में मिलने जुलने की भरपूर अनुमति नहीं देतीं, उन्हीं दिनों त्यौहार अधिकाधिक आते हैं ताकि उस बहाने पारस्परिकता बनी रहे और मांनवमन का उल्लास व ऊर्जा भी। हमारे मनोभेदों ने उस उल्लास का भी क्या से क्या कर दिया ! 


इस बरस उत्सवों की इस बेला में उल्लास का यह बंटवारा कम से कम करें, यह हमारा उद्देश्य होना चाहिए। तभी आपका और हमारा त्यौहार मानना सार्थक है। स्थानीयता व स्थानीय समाज से कट कर या उन्हें काटकर, त्यौहार मनाना या उनके त्यौहारों से अलग रहना, दोनों सामाजिक अपराध हैं और त्यौहारों की मूल भावना के विरुद्ध भी। ऐसा कदापि न किया जाए। जो-जो जिस भौगोलिक स्थान पर है, वहाँ के स्थानीय समाज को उत्सव में सम्मिलित करें और उनके उत्सवों को स्वयं भी मनाएँ; तभी उत्सव मनाना कुछ अर्थों में सार्थक होगा। धीरे-धीरे समाज से जुड़ने की यह प्रक्रिया जब हमारे मनों के भीतर तक बस जाएगी, उस दिन पूरे अर्थों में सार्थक। 


रविवार, 23 अक्टूबर 2011

दीपपर्व अति मंगलमय हो !

दीपपर्व अति मंगलमय हो !


दीपपर्व अति मंगलमय हो !

" असतो मा सद् गमय 
   तमसो मा ज्योतिर्गमय 
      मृत्योर्मा अमृतम् गमय "







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