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बुधवार, 8 मार्च 2017

वे सम्पादकों व लेखकों के मध्य स्वयं को सुरक्षित नहीं पाती थीं और न समझौते कर सकती थीं

'लमही' द्वारा आयोजित परिचर्चा के प्रश्नोत्तर


जनवरी २०१५ में प्रतिष्ठित पत्रिका 'लमही' के नववर्षांक को महिला कथा-लेखन विशेषांक के रूप प्रकाशित किया गया था। इसमें सम्मिलित एक परिचर्चा हेतु पत्रिका द्वारा १० प्रश्नों की एक प्रश्नावली भेजी गयी थी जिनके उत्तर मुझे देने थे और जिन्हें पत्रिका में सम्मिलित किया गया था। आज 'महिला दिवस' पर उनके वे प्रश्न और अपने वे उत्तर आपके समक्ष -


1 - कहा जाता है कि अभिव्यक्ति की बराबरी से बड़ी कोई बराबरी नहीं हो सकती. दुनिया भर के जनतांत्रिक आंदोलनों का अंतिम आदर्श भी यही अभिव्यक्ति की बराबरी रहा है.हिंदी जगत में स्त्रियों द्वारा रचे जा रहे साहित्य की प्रचुरता और विपुलता के मद्देनज़र क्या आपको लगता है कि आज एक स्त्री के लिए अभिव्यक्ति के समान अवसर हैं और वह निर्द्वंद हो कर मनचाहा रच और अभिव्यक्त कर पा रही है?


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कविता वाचक्नवी - यह ‘समान अवसर’ एक सापेक्ष शब्द है, समान से आपका अभिप्राय, सभी स्त्रियों में परस्पर समान अथवा पुरुषों की तुलना में समान, है , यह असपष्ट है। इसलिए इसके उत्तर भी दो होंगे। जो लेखिकाएँ मुख्यतः आज सक्रिय लिख रही हैं उनके पास कमोबेश परस्पर लगभग समान अवसर हैं। किन्तु यदि प्रश्न का निहितार्थ पुरुषों की तुलना में आँकना है तो कहना होगा कि कदापि नहीं। अभिव्यक्ति के अवसर को यदि आप रचने के अवसर मात्र के अर्थ में देखते हैं तो भी, और यदि रचनात्मकता / लेखन / साहित्य-सृजन आदि को रचे जाने और पाठकों तक पहुँचने की पूरी प्रक्रिया के रूप में देखते हैं तो भी विविध स्तरों पर, विविध विधाओं में, विविध क्षेत्रों, विविध आयुवर्गों व विविध पृष्ठभूमि वाली हिन्दी-जगत की स्त्रियों के सर्वाधिक बहुलता वाले इस कालखण्ड में भी उनके पास पुरुषों की तुलना में न तो रचने के समान अवसर हैं व न ही पाठकों तक पहुँचने के। 



2 - साहित्य को स्त्री, दलित, पिछड़ा जैसे खांचों में रख कर पढना और समझना मुझे उन्हें मुख्यधारा से परे धकेलने का एक षड्यंत्र ज्यादा लगता है. मगर, कुछ लोग अनुभवों और यथार्थ की प्रमाणिकता की दृष्टि से वर्गीकरण और रेखांकन को युक्तिसंगत भी ठहराते हैं. आप अपने लेखन पर चस्पां 'स्त्री लेखन' के लेबल से कितनी सहज या असहज महसूस करती हैं?

कविता वाचक्नवी - वस्तुतः यह पाठक पर निर्भर करता है कि आनुपातिक दृष्टि से अधिक पाठक किसे मुख्यधारा मानते हैं। मेरे तईं गत लगभग पन्द्रह वर्ष से मुख्यधारा का साहित्य बहुधा स्त्रियों द्वारा लिखा जा रहा साहित्य है। रमणिका जी, मृदुला जी, चित्रा जी, मैत्रेयी आदि व इनकी समकालीन अनेक वरिष्ठ लेखिकाओं ने जहाँ केंद्रीय विधा के स्तर पर परिदृश्य को बदला, वहीं मुख्यधारा में पुरुषों के वर्चस्व को तोड़ा और स्त्रीलेखन को मुख्यधारा का साहित्य के रूप में स्थापित किया। स्त्री, दलित और पिछड़ा आदि वर्गीकरण प्रवृत्तियों के आधार पर जब तक होता रहे तब तक यह अध्ययन की सुविधा एवं दृष्टि से आवश्यक व महत्वपूर्ण है किन्तु यदि यह वर्गीकरण व्यक्ति के आधार पर होता है तो यह लेखक के साथ अन्याय से अधिक साहित्य, शिक्षा व पाठक के साथ अन्याय है। इतने पर भी मुझे निजी तौर पर अपने लेखन के 'स्त्री-लेखन' कहने-कहलाने से कोई कष्ट या असहजता अनुभव नहीं होती। इसके दो कारण हो सकते हैं कि 1 - विविध विधाओं में लिखी गई अनेक रचनाओं के पाठकों द्वारा कदापि मुझे ऐसा अनुभव नहीं करवाया गया, 2 - मैं अभी उस स्तर की लेखक नहीं हुई कि आलोचक मुझ पर अपना समय ज़ाया करें और मेरे लेखन को वर्गीकृत करें या किसी खाते में रखें, शायद इसलिए भी। वैसे किसी लेखक को लिखने के बाद अपने लेखन के लिए स्वयं किसी तमगे या वर्ग की तलाश मुझे बहुत गलत और बुरी लगती है। लेखक को आलोचना में कोशिश कर अपने लिए जगह तलाशने-बनाने जैसा लगता है, जो अनुचित है। फिर भी यदि आलोचना स्त्री-लेखन को मुख्यधारा से इतर मानती है तो यह पक्षपात, पूर्वाग्रह व वर्चस्ववादी पितृसत्तात्मक राजनीति ही कहा जाएगा; विशेषत: जब मुख्यधारा में पुरुषों का वर्चस्व लगभग समाप्त हो चुका है।
 

३.आधुनिक स्त्री रचनाधर्मिता में जाहिर तौर पर 'कॉमन थ्रेड' पितृसत्ता के विरुद्ध संघर्ष और प्रतिरोध है. हिंदी साहित्य में लेखिकाओं ने भावनात्मक, शारीरिक, सामाजिक और आर्थिक स्तरों पर पितृसत्ता की जकड़न, उसकी प्रविधियों और उसके पाखंडों का उद्घाटन और उदभेदन बहुत कुशलता से किया है. यहाँ तक की स्त्री यौन शुचिता की खोखली अवधारणाओं की भी धज्जियाँ उड़ाई गई हैं.मगर, कुटिल पितृसत्ता जिस प्रकार आज भी राजनीति और संस्कृति के क्षेत्र में महिलाओं के लिए लक्ष्मण रेखाएं खींच रही है, उससे हिंदी जगत की लेखिकाएं आँखें फेरे क्यों दिखाई देती हैं?

कविता वाचक्नवी - कुछ सीमा तक सहमत हूँ, इन अर्थों में कि कुटिल पितृसत्ता अभी भी जारी है और लेखिकाएँ कुछ अर्थों में आँखें फेरे हैं। इसके उत्तर में दोनों पक्षों के किए पर विचार करना होगा। पहली बात तो यह कि हिन्दी की लेखिकाएँ जिस पृष्ठभूमि से आती हैं, वहाँ स्त्री मूलतः उन स्थितियों के उद्घाटन के लिए भी दीक्षित नहीं होती। अतः उद्घाटन प्रतिकार की पहली सीढ़ी कहा जा सकता है और रोचक यह है कि यह उद्घाटन घटने के बाद होने वाली क्रिया है; जबकि विरोध तो घटने से रोकने की, प्रतिकार की क्रिया होता है। इस तरह आप देख सकते हैं कि भुक्तभोगी होने के बाद स्त्रीवर्ग के भोगे हुए यथार्थ का उद्घाटन और चित्रण तो स्त्रियाँ कर रही हैं किन्तु आनुपातिक दृष्टि से प्रतिकार की प्रविधियों का सन्निवेश होना अभी शेष है। रही क्षेत्र-विशेष की बात तो हिन्दी में अधिकांश लेखक साहित्य को राजनीति से दूर रखते आए हैं, यद्यपि विचारधारा के स्तर पर वे राजनीति-प्रेरित रहे हैं, उनका वर्चस्व भी लम्बे समय तक रहा किन्तु प्रत्यक्षतः वे राजनीति से सीधे नहीं जुड़े रहे, बल्कि कहना न होगा कि वे राजनीति का मोहरा भी बनते चले आए हैं और साहित्य की राजनीति भी इतनी अधिक होती चली आई है कि साहित्य ही लाभ की तुच्छ राजनीति का अखाड़ा, दलदल व पर्याय बन गया है किन्तु राष्ट्रीय राजनीति के लिए जिस प्रकार के प्रशिक्षण व तैयारी की आवश्यकता होती है, उसका नितान्त अभाव प्रत्यक्ष स्त्री व पुरुष लेखकों में देखा जा सकता है। ऐसे में लेखिकाओं की स्वयं क्योंकि राजनैतिक महत्वाकांक्षाएँ और सम्पृक्ति नहीं होती और सम्भवतः इसलिए भी कि वे दैनन्दिन जीवन और स्त्रीपुरुष सम्बन्धों के विविध पक्षों से अधिक जुड़ी हुई होती हैं। यों भी स्त्रियाँ जीवन और सम्बन्धों के अधिक निकट इसलिए होती हैं, कि उनकी संरचना ही ऐसी होती है, इसलिए भी वे शायद राजनीति में महिलाओं की अधिक सक्रिय व सतेज भूमिका के पक्ष में लिखने की अपेक्षा जीवन और सम्बन्धों पर लिखना बेहतर समझती हों। एक बात और जोड़ना चाहूँगी, कुटिलता से पार पाना स्त्री की दैहिक संरचना के अर्थों में सदा से कठिन रहा है और राजनीति का जिस प्रकार व जितना अधिक आपराधीकरण हुआ है उस स्तर के आपराधिक वातावरण की पहचान, उसका उद्घाटन, प्रतिकार या उस पर साधिकार लिखना आदि यह कुछ अधिक ही की अपेक्षा लगता है अभी ....। इसे आप सकारण आँख फेरना नहीं कह सकते।


४.व्यापक स्त्री हित से जुड़े राजनीति और अर्थनीति के ज्वलंत प्रश्न, जैसे विधायिका में महिला आरक्षण, मंत्रिमंडलों, नौकरियों और शैक्षिक संस्थाओं में सानुपातिक प्रतिनिधित्व, इत्यादि महिलाओं के रचनात्मक सरोकारों में अपेक्षित स्थान क्यों हासिल नहीं कर पाते हैं?

कविता वाचक्नवी : इसका उत्तर भी पिछले उत्तर में ही काफी कुछ निहित है। यह जोड़ना यहाँ चाहूँगी कि जो लेखिकाएँ, यथा रमणिका जी, सुधा अरोड़ा जी इत्यादि, लेखिका होने के अतिरिक्त अपने जीवन में एक्टिविस्ट भी हैं, उनके लेखकीय सरोकारों में स्त्री के सामाजिक व संस्थागत जीवन की उपस्थिति उपलब्ध होती है। फिर भी यह कहना आपत्तिजनक नहीं माना जाना चाहिए कि वर्तमान स्त्री-लेखन में सरोकारों की व्यापकता आनी अभी काफी शेष है। उसके बहुत-से कारण हो सकते हैं, जिनके विस्तार में जाने की यहाँ आवश्यकता नहीं है, किन्तु यह तथ्य है।



५. 'मातृत्व' एक ऐसा गुण है, जो स्त्री को श्रेष्ठ कृति बनाता है. सो, स्वाभाविक रूप से दुनिया भर के स्त्री-साहित्य में इसे 'सेलिब्रेट' किया जाता रहा है. मगर कुछ पश्चिमी नारीवादियों(फेमिनिस्ट्स) ने यह महसूस किया है कि मातृत्व के प्रति भावुक सम्मोहन को बढ़ावा देना किसी स्तर पर मर्दवादी राजनीति का एक आयाम भी हो सकता है. आप इस निष्कर्ष से कितनी सहमत हैं?

कविता वाचक्नवी : इसमें कोई राय नहीं कि मातृत्व स्त्री को श्रेष्ठ कृति बनाता है; किन्तु उस से भी बढ़कर स्त्री को ऐसा अपार सुख देता है जो संसार में उसे कोई और नहीं दे सकता, पुरुष भी नहीं, स्त्री को कई मानसिक व्याधियों से निकालता है और उसे अपने ‘कर्ता’ होने के गौरव से भरता है, इसमें कोई दो राय हो ही नहीं सकतीं। दूसरी ओर पश्चिमी नारीवादियों की बात रहने भी दी जाए तो इसी मातृत्व को आधार बनाकर ही पुरुष स्त्री पर सारे दबाव और बन्धन लगाता है। यद्यपि प्राकृतिक व संरचनात्मक दृष्टि से भी मातृत्व के साथ स्त्री पर बहुत से बन्धन और दबाव आ जाते हैं, उन बन्धनों में बँधी स्त्री को कमजोर समझ और उसके मातृत्व को उसकी कमजोरी समझ शासन करने वाली मानसिकता इसे उस अवसर के रूप में प्रयोग करती आई है जिसे स्त्रियों के शोषण के लिए अनुकूल समझा गया। बहुत बचपन में पढ़े अमृता जी के एक उपन्यास (अथवा कहानी) का एक अंश तब से मेरे मन में गड़ा हुआ है, जिसमें एक पुरुष पात्र दूसरे पुरुष पात्र को समझा रहा है कि औरत को यदि मारना है तो बाँध कर मारो। दूसरा पात्र बाँध कर मारने का अर्थ नहीं समझ पाता इसलिए बाँधने का औचित्य भी नहीं, तब पहला पात्र उसे समझाता है कि स्त्री के साथ हिंसा कर बदनाम होने की अपेक्षा उस से एक सन्तान उत्पन्न कर लो और फिर स्त्री आजीवन तुम्हारा सारा शोषण सहती रहेगी, कहीं नहीं भाग सकती। यह उदाहरण मैंने इसलिए दिया कि यह तथ्य आज से लगभग चालीस-पचास वर्ष पहले भी समाज जानता था और पहचानता था। आज पश्चिमी नारीवादी ही यह बात नहीं कह रहे हैं, अपितु यहाँ यॉरोप में तो बड़ी संख्या में एकल मातृत्व वाली स्त्रियाँ सब ओर मिल जाएँगी। यह एकल मातृत्व स्त्रियों ने स्वेच्छा से चुना है। वे किसी शुक्राणु-बैंक से किसी अनजान-अज्ञात व्यक्ति के शुक्राणु प्रत्यारोपित करवा माँ बनती हैं और अपनी सन्तान को जन्म देती हैं। यह पुरुषों द्वारा मातृत्व की आड़ में किए गए शोषण की प्रतिक्रिया भी है और साथ ही पुरुषों से होने वाले बुरे अनुभवों से बचने की जुगत भी। यॉरोप में यह कोई असाधारण घटना नहीं है। मैं कई बार पुरुष व स्त्री के सम्बन्धों के मिटते चले जाने से चिंतित भी होती हूँ कि ये पुरुष अपनी पत्नी ही नहीं अपितु सन्तान की कीमत पर भी अपने शोषण को जारी रखना चाहते हैं ... कैसी मानसिकता है कि वे अपनी पत्नी, अपनी सन्तान सबकी बलि लेकर क्या अर्जित करते हैं, केवल स्त्री पर मालिकाना अधिकार । यह सब कितना शर्मनाक है। क्यों नहीं पुरुष अपनी इस तुच्छ मानसिकता को छोड़ समाज को इस तरह बिखरने और विकृत होने से बच जाने देते ? घरों में स्त्रियों के ही नहीं अपितु बच्चों के भी जीवन बर्बाद होते देखे हैं मैंने, पुरुषों की कुण्ठाओं से उपजी स्थितियों के चलते।




६.समाज में स्त्रियों के संगठित दमन चक्र के कमजोर पड़ने और स्त्री स्वातंत्र्य की सशक्त छवियों के समानांतर इर्ष्या और कुंठा की लहरें भी दिखाई पड़ रही हैं. इस का नतीजा है कि यौन हमलों और हिंसा की बाढ़ सी आ गई है और कार्य स्थलों पर और अन्यत्र स्त्री-पुरुष रिश्ते असहज होते चले जा रहे  हैं..समाज में गहराती लैंगिक कटुता क्या आपको चिंतित करती है?

कविता वाचक्नवी : बहुत अधिक । मुझे स्त्री-पुरुष रिश्तों में आती असहजता जितना चिन्तित करती है, उस से अधिक चिन्तित करता है पूरे समाज में उत्पन्न होता असन्तुलन । समलैंगिकता भी कहीं न कहीं स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में जन्मे विद्रूप की ही परिणति है कि स्त्रियों में पुरुषों के प्रति व पुरुषों में स्त्रियों के प्रति सहज आकर्षण मरने लगा है। एकल मातृत्व भी इसी लैंगिक कटुता का प्रतिफल हैं, सेक्स टॉय्ज़ भी इसी लैंगिक कटुता का ही रूप हैं, बलात्कार और हिंसा तो इसका कारण भी हैं और इसका परिणाम भी। एक स्त्री होने के नाते ही नहीं अपितु एक माँ होने के नाते मुझे परिवार के बच्चों का परिवारों से विमुख होना सर्वाधिक सालता है। बीस वर्ष पहले नॉर्वे में बसने जाने पर जिस प्रकार परिवार टूटे देखे और युवक-युवतियों का मादक पदार्थों की ओर जुड़ाव देखा उन सारे अनुभवों के बाद वर्तमान की लगभग सभी सामाजिक समस्याओं (आर्थिक को छोड़कर) के लिए केवल और केवल इसी लैंगिक कटुता को दोषी पाती हूँ । बिना प्रेम के निभती लाखों-करोड़ों गृहस्थियाँ हम सबने भारत में बखूबी देखी हैं , कितना कष्टप्रद है यह सब... कि इसकी व्याख्या भी नहीं कर सकती, किसी को सहज विश्वास नहीं होगा। उन्हीं का प्रतिफल है भारतीय युवाओं का असंतुलित मनोविज्ञान, आक्रोश और कुण्ठा, माता-पिता दोनों की नकार और उनके प्रति असम्वेदनशीलता।


७.आज पारंपरिक साहित्य की तुलना में सोशल मीडिया  का स्त्री-लेखन ज्यादा चर्चाएँ बटोर रहा है. सोशल मीडिया की अराजकता, उसका औसतपन, उसकी क्षणभंगुरता और उसके आभासी चरित्र की आलोचनाएँ और आक्षेप  अपनी जगह हैं, मगर अब उसे नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन है. साहित्य में सोशल मीडिया के विवादास्पद हस्तक्षेप को गंभीर लेखन और साहित्य में कहाँ देखती हैं आप?

कविता वाचक्नवी : यह बात समझना बहुत आवश्यक है कि सोशल मीडिया एक मंच है, एक माध्यम है और यह हम सब जानते हैं कि मंच व माध्यम का अच्छा-बुरा होना कुछ नहीं होता, जो कुछ होता है वह उसके प्रयोक्ताओं पर निर्भर करता है। यही स्थिति एक पत्रिका की भी हो सकती है कि किसी के हाथ में पत्रिका का माध्यम व अवसर लग गया पर उस पत्रिका में गम्भीर कुछ भी नहीं छपता या किसी पत्रिका में गम्भीर सामग्री छपती है। अनगिनत पत्रिकाएँ ऐसी होंगी जो आपको अपनी रुचि व स्तर की नहीं लगेंगी और आप उन्हें नहीं पढ़ते, कुछ आपको अपनी रुचि व स्तर की लगती हैं इसलिए आप उन्हें पढ़ते हैं। तो इन कारणों से आप हिन्दी की पत्रकारिता को धिक्कार या नकार तो नहीं देते न? न ही उसे कोई बाहर का, अस्पृश्य या विवादास्पद हस्तक्षेप का माध्यम घोषित करते हैं। बिल्कुल यही स्थिति सोशल मीडिया की भी है। बस, यह एक खुला व निश्शुल्क माध्यम है। इसका शुल्क समय व तकनीक की जानकारी है केवल, न कि पारम्परिक माध्यम व पारम्परिक शुल्क। भारत में विशेषतः हिन्दी समाज में तकनीक से परिचय अभी बहुत दूर की कौड़ी है; इसलिए अभी हिन्दी का लेखक वर्ग इसे अराजक, औसत व क्षणभंगुर (?) समझता है। सच तो यह है कि यह माध्यम सर्वाधिक दीर्घजीविता का माध्यम है, सर्वाधिक तेज है और सर्वाधिक व्यापक भी। जिसे कुछ लोग अराजक समझते हैं, उसे मैं सर्वाधिक लोकतान्त्रिक कहती हूँ। मैं अपनी ही कहूँ तो लगभग पन्द्रह वर्ष पूर्व मैंने प्रण किया था कि मैं किसी पत्रिका या किसी सम्पादक को कदापि अपनी पहल पर रचना नहीं भेजूँगी, जब तक कि स्वयं सम्पादक अथवा कोई बहुत सम्मानित व्यक्ति अपनी पहल पर मुझे रचना भेजने को न कहे। और मैंने अपना यह प्रण पूरी तरह निभाया भी (इक्का-दुक्का घटनाएँ इसका अपवाद हो सकती हैं)। आप कल्पना कर सकते हैं कि किसी लेखक के लिए यह आत्महत्या है, जिसे मैंने स्वेच्छा से वरा। किन्तु मेरे लेखक को इस आत्महत्या से बचा कर पाठकों से सीधा जोड़ने वाला माध्यम है इन्टरनेट और सोशल मीडिया। यह सच है कि इस पर हजारों-लाखों-करोड़ों लोग लिख रहे हैं, पर वे तो पहले भी कहीं अपना-अपना लिखते आए हैं, बस तब आपको, हमें या समाज को उनका पता न चलता था क्योंकि अभिव्यक्ति के सभी संस्थानों पर इने-गिने लोगों का आधिपत्य व नियन्त्रण था और शेष तक किसी की पहुँच ही न थी, तो पता कैसे चलता कि उन लाखों लोगों में कौन हल्का लिख रहा है और कौन स्तरीय। आज निस्संदेह लिखने वालों की संख्या भी बढ़ी है तो वह इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति के संस्थानों पर से वर्चस्ववादी शक्तियों के अंकुश को नकार एक वैकल्पिक माध्यम दे दिया है और इस तरह अधिक अवसर होने के चलते लोगों में अभिव्यक्ति के प्रति उत्साह भी है और इसलिए आधिक्य भी। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि सोशल मीडिया पर लिखने वाला हर व्यक्ति लेखक है ही यह माना जाए। अस्सी प्रतिशत से अधिक वहाँ केवल अभिव्यक्ति और सम्वाद की इच्छा से हैं और उनके लिखे को कदापि साहित्यिक लेखन नहीं कहा जा सकता। किन्तु उसे आप साहित्यिक हस्तक्षेप समझते ही क्यों हैं? उस से विचलित या प्रभावित होने की तब तक कोई आवश्यकता ही नहीं जब तक रचना का स्तर और गुणवत्ता स्वयं नहीं बोलते। आपके-हमारे सामने एक अधिक विशद, विस्तृत और व्यापक फलक एवं अवसर हैं अब, कि प्रतिभा को चीन्ह पाएँ, इसमें मुझे कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगता। कष्ट उन्हें अवश्य है और होगा जिन्होंने अभिव्यक्ति के संस्थानों पर नियन्त्रण बना रखा था अब तक और सौगातें बटोरते चले आए हैं, लाभ लेते आए हैं। अब उनका अंकुश टूट रहा है, भले ही वे सम्पादक हों या लेखक। सोशल मीडिया में पाठक और लेखक आमने-सामने हैं और सोशल मीडिया ऐसा टूल है (दुर्भाग्य से हिन्दी लेखक अभी इसकी शक्ति नहीं जानते) कि पाठक को लेखक का पूरा व्यक्तित्व, उसका चरित्र आदि सब बिना बताए भी पता चल जाता है और इस आधार पर वे लेखक को सिरे से खारिज भी कर सकते हैं, कर देते हैं , अब दुराव सम्भव नहीं कि पाठक केवल लेखन से ही लेखक को जानता था और व्यक्तिगत जीवन में कुछ भी, कैसा भी करते हुए आप पाठक को मोह सकते थे। इस माध्यम पर वह सम्भव नहीं। कई बड़े नामधारी हिन्दी लेखकों की ‘मोनोपली’ टूटी है यहाँ। स्त्रियाँ बिना सम्पादक की शर्तें माने भी लिखने व पाठकों तक पहुँचने में सफल हो सकती हैं, नेट पत्रिकाओं व वेबज़ीन्स का अम्बार लगा पड़ा है। कविताओं व साहित्य के कोष निश्शुल्क उपलब्ध हैं पढ़ने-पढ़ाने को, अकूत साहित्य वहाँ सदा के लिए डिजिटल रूप में सुरक्षित हो गया है, विश्व के प्रत्येक कोने से पाठक कुछ भी / कहीं भी / कभी भी पढ़ सकता है । और भी अनेकानेक लाभकारी परिवर्तन हुए हैं, अनुवाद, भाषा व लिपि की दृष्टि से तो क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं, अपने एक लम्बे लेख में विस्तार से इन व ऐसे अन्य अनेक पक्षों पर एक-एक कर कुछ वर्ष पहले लिखा भी था, उन सब को विस्तार से यहाँ नहीं बताया जा सकता। बस यही कि ये सब साहित्य के लिए नकारात्मक हस्तक्षेप कैसे कहे जा सकते हैं? क्या केवल इसलिए कि एकाधिकार व वर्चस्व को चुनौती मिली है या 80- 85 प्रतिशत को देखकर हमें उसके स्तरीय न होने से कष्ट होता है। क्या बीस बरस पहले समाज का 80-85 प्रतिशत वर्ग लेखक था ? नहीं ! तो यह वही वर्ग है। उन्हें उनकी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का लाभ उठाते देख चिन्तित होने की भला क्या आवश्यकता है? और क्यों ?




८.साहित्य के बारे में शुरू से एक मासूमियत भरी स्थापना रही है कि स्तरीय साहित्य अपने बूते जिंदा रहता है. मगर हकीकत यह है कि आज जो रचना साहित्यिक परिचर्चा, गोष्ठी, जलसा, विमोचन, समीक्षा, पुरस्कार के जुगाड़ तंत्र में अपनी जगह नहीं बना पाती, पाठक उस तक पहुँच भी नहीं पाता, चाहे वह जितनी भी उच्च कोटि की हो. एक स्त्री के नजरिये से साहित्य की यह धक्कम-पेल आपको हताशाजनक लगती है या चुनौतीपूर्ण?

कविता वाचक्नवी : हताशाजनक भी और चुनौतीपूर्ण भी; बल्कि स्पष्ट कहूँ तो हताशाजनक कम और चुनौतीपूर्ण अधिक । किन्तु ध्यान देने की बात यह है कि मेरा नजरिया हर स्त्री लेखक का नज़रिया नहीं हो सकता, न होना चाहिए क्योंकि हर किसी का मनोविज्ञान अलग होता है। कुछ स्त्रियाँ ऐसी भी मैं जानती हूँ जिन्होंने लेखन सदा के लिए इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वे सम्पादकों व लेखकों के मध्य स्वयं को सुरक्षित नहीं पाती थीं और न समझौते कर सकती थीं। बहुत-से ऐसे भी लेखक-लेखिकाओं को जानती हूँ जिन्होंने अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए खूब समझौते किए और किसी का भी, कैसा भी प्रयोग करने से नहीं हिचकिचाए, जो सम्पादक समझते थे कि वे उनका इस्तेमाल कर रहे हैं वस्तुतः वे भी प्रयोग होते गए... उनके माध्यम से लेखकों-लेखिकाओं ने वह सब किया, कर रहे हैं जिसका आपने उल्लेख किया है, निजी सम्बन्धों से लेकर जाने कहाँ तक। इसलिए ऐसे में मेरे जैसे व्यक्ति के लिए जिसके पास न कोई पद है, न प्रकाशन, न किसी एक से भी कोई सम्पर्क या मैत्री है कि मेरे लिए कोई कुछ करे, न मैं किसी वर्ग-विशेष, विचार-विशेष या ‘स्कूल’-विशेष की हूँ कि कोई मुझे प्रमोट करे, न मेरा कभी भी साहित्य आदि में कोई गॉड-फादर है, न कोई जान-पहचान, न दिल्ली या हिन्दी क्षेत्र में कभी रहने-बसने का मौका मिला, न मैं किसी को घर आमन्त्रित करती या उपहार आदि दे सकती हूँ, सिवाय उन एकाध लोगों को आदर-सम्मान देने के जिनकी विद्वत्ता और नैतिक शुचिता अभिनन्दनीय हो, न मैं दावतें / सिगरेटें या बोतलें देती-छूती हूँ, बल्कि इन सब से भी बढ़कर परिवार व मूल्यों के प्रति अक्खड़ प्रतिबद्धता व ऐसा न करने वालों का डंके की चोट पर खुला विरोध आदि वे कारण हैं, जो मुझे साहित्य की परिधि से निष्कासित करने और तन्त्र से बहिष्कृत करने के लिए बहुत पर्याप्त हैं, रहे हैं। मुझे साहित्य की चौखट पर पैर भी धरने न देने वालों की चहुंदिशी भीड़ में विरलों के लिए ही यह अनुमति देना वश का है जो निस्संदेह अत्यधिक निष्पक्ष व ईमानदार हों, तभी वे मुझ जैसी नितान्त अ-लाभकारी व्यक्ति को भी अवसर देने से नहीं हिचकिचाए या हिचकिचा सकते। क्या यह सब मुझ जैसी अनाम स्त्री को हताश करने के लिए पर्याप्त नहीं होना चाहिए ? किन्तु है ठीक इस से उलटा, एकाध अवसरों को छोड़ मुझे कभी हताशा नहीं हुई और अपने उपर्युक्त ‘दुर्गुणों व कमियों’ (?) को ही शक्ति समझ आगे बढ़ने व अपनी राह चलते रहने का अपने पिताजी का दिया आदर्श हरदम सामने रहता है और डिगने न देने की शक्ति देता है। यह तो रही व्यक्तिगत हताशा या चुनौती की बात। किन्तु सच कहूँ तो साहित्य के भविष्य व भविष्य के साहित्य की दृष्टि से ये आपकी बताई व हम सब की देखी-समझी स्थितियाँ बहुत निराश करती हैं... इच्छा होती है हिन्दी वालों को पढ़ना-मिलना पूरी तरह छोड़ दूँ.... शोध और शिक्षा तक को बर्बाद कर दिया है इन स्थितियों ने... क्या लाभ है ऐसे लेखन-पठन-पाठन का ? तब ऐसे में उबरने (चुनौती) और डूबने (हताशा) दोनों को ही अनुभव नहीं करती। बस कर्तव्य की भाँति अपना काम किए चले जाने को आधार बना लेती हूँ । सोशल मीडिया और उस माध्यम द्वारा मुझ से सीधे जुड़े पाठक ही वह शक्ति हैं जिन्होंने मेरे अस्तित्व को पूरी तरह बनाए-बचाए रखा है। अन्यथा इन स्थितियों का क्या प्रभाव हुआ होता कह नहीं सकती।




९. एक सवाल जो मुझे हमेशा परेशान करता है कि आखिर हिंदी के स्त्री लेखन से 'हास्य' और 'विनोद' लगभग निष्कासित क्यों है? कटाक्ष और व्यंग अगर है तो उसकी प्रकृति हास्य-मूलक नहीं है. ऐसा क्यों?

कविता वाचक्नवी : साहित्य में विधाओं की दृष्टि से कहानी आज केन्द्रीय विधा है। उसके बाद स्थान आता है उपन्यास का। दोनों क्षेत्रों में महिलाओं की भरपूर उपस्थिति है। कविता तो यों भी हाशिये पर है, आलोचना और सम्पादन में महिलाओं के नाम हैं ही, निबन्ध, ललित निबन्ध आदि तो वैसे भी सभी तरह से सिरे से जैसे लुप्त ही होते जा रहे हैं.... हास्य केवल मंचीय कवियों के पास बचा है (स्तरीयता का प्रश्न उस पर भी मुँह बाए खड़ा है) । व्यंग्य तब तक व्यंग्य है ही नहीं जब तक उसमें मिठास और हास्य का पुट नहीं है, इसलिए जो कुछ वह है उसे व्यंग्य तो नहीं ही कहा जा सकता। रही स्त्रीलेखन में इन विधाओं की बात तो अभी स्त्रीलेखन की उम्र ही कितनी हुई है ... तनिक सब्र करें ... स्त्रियों को भी कुछ हँसने-हँसाने के अवसर दें... वे हास्य भी उत्कृष्ट रच कर दिखाएँगी और तब पुरुषों का रचा भौंडा हास्य हाशिये पर चला जाएगा। आपने कहा कि औरतें केवल कहानी लिखती हैं तो उन्होंने कविता रच कर दिखा दी, आपने कहा कि वे आलोचना नहीं लिखतीं तो उन्होंने वह भी लिख कर दिखा दी; अब आप कह रहे हैं वे राजनीति नहीं लिखतीं तो यह बात अर्धसत्य है क्योंकि राजनैतिक सरोकार स्त्रीलेखन में अपने अलग अन्दाज़ में आने प्रारम्भ हो गए हैं। अब नया यह आक्षेप कि हास्य नहीं रचतीं.... भाई यह आलोचना इतनी डिमांडिंग क्यों है कि बस कुछ न कुछ माँगती ही रहती है ! आप यह कब देखेंगे कि स्त्री क्या लिख रही है; या बस यही संकल्प है कि आँख मूँद कर यही रट लगाते रहेंगे कि स्त्री यह नहीं लिख रही... वह नहीं लिख रही।

१०.अपनी आगामी लेखकीय योजनाओं के बारे में बताएँ

कविता वाचक्नवी : बहुत सारी पाण्डुलिपियाँ बस्तों में बन्द पड़ी हैं, चाहती हूँ उन्हें सलीके से लगाकर प्रकाशित करवाऊँ, अपना एक कहानी संकलन, एक कविता संकलन, एक लेख-संग्रह, एक साक्षात्कारों की पुस्तक (इन सब की सामग्री तैयार है, पर इस तरह तैयार नहीं कि प्रकाशक को थमा सकूँ) तो इन्हें तैयार करना है। ‘भाषा प्रौद्योगिकी और हिन्दी कम्प्यूटिंग’ विषयक एक पुस्तक की योजना दो-तीन वर्ष से अधर में लटकी है, उसकी सामग्री पूरी कर प्रकाशन के लिए देना चाहती हूँ। पत्र-पत्रिकाओं व अपनी वेबसाईट आदि के लिए समय-समय पर लिखना भी होता है, कुछ पत्रिकाओं ने नियमित स्तम्भ लिखने का वादा लिया हुआ है, जिन्हें हाँ कह कर भी प्रारम्भ तक नहीं कर पाई, उन्हें प्रारम्भ करना चाहती हूँ। गत वर्ष रमणिका जी के 'हाशिये उलाँघती औरत' शीर्षक (40 भाषाओं के 25 खण्डीय स्त्री-संकलन) के 'प्रवासी कहानियाँ' खण्ड का सम्पादन किया तो उसी दौरान अपनी एक अन्य योजना पर काम शुरू किया था। वह योजना है कि विश्व के सभी महाद्वीपों के हिन्दी लेखकों के कहानी संकलन को तीन-चार खण्डों में लाने की; बस उसकी शर्त यह है कि जो लेखक जिस देश में रहता है, वहाँ के स्थानीय मुद्दों पर उसे लिखना है, उन कहानियों में स्थानीयता उभर कर आनी चाहिए, अमेरिका में बैठ कर आप भारत या भारतीयों या भारत के मुद्दों व समस्याओं की कहानी न लिखें, जिसके कारण हिन्दी आलोचना अब तक ऐसी-तैसी करती आई है, जो कुछ हद तक सही भी है। इसलिए लेखकों को गत वर्ष भेजे पत्र में यह चुनौती पूरा करने का आह्वान किया था कि वे तत् तत् देशीय शिक्षा, समाज, सम्बन्ध, राजनीति, मेडिकल आदि-आदि किसी भी मुद्दे को आधार बना अपने देश को हिन्दी में अभिव्यक्त करें, कुछ कहानियाँ आईं भी, किन्तु विशद योजना है व अपने पारिवारिक एवं विश्वविद्यालयीय दायित्वों के बीच नियमित लेखादि लिखने के साथ-साथ इन्हें निभाना समयाभाव में दुरूह भी। ऊपर से पैसा देकर कदापि कहीं नहीं छपना का अपना संकल्प भी याद रहता है तो प्रकाशक न मिल पाने की अपनी सीमा भी जानती हूँ। इसलिए इन्हें योजनाओं की अपेक्षा स्वप्न कहना अधिक उचित है। तो इस प्रकार योजनाओं के नाम पर कुछ स्वप्न ही हैं अपने पास ! बस !!
नवम्बर २०१४

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

'हाशिये उलाँघती स्त्री' .... व आप और मैं

'हाशिये उलाँघती स्त्री' .... व आप और मैं 
http://vaagartha.blogspot.com/2013/09/Indian-women-fiction-writers-and-a-historical-collection-of-their-stories-in-25-volumes.html


वर्ष 2008 में रमणिका गुप्ता जी ने 'युद्धरत आम आदमी' के "हाशिये उलाँघती स्त्री" विशेषांक की योजना का सूत्रपात किया था। जिसके अन्तर्गत सभी भारतीय भाषाओं की महिला रचनाकारों की स्त्रीविमर्श विषयक रचनाओं के संकलन की योजना थी, जिसे 'रमणिका फाऊण्डेशन' द्वारा काव्य-संकलन और कहानी-संकलन के रूप में छपना था। काव्य संकलन तो दो भागों में 26 मार्च 2011 को लोकार्पित हो गया था (यहाँ विस्तार से देखें - http://vaagartha.blogspot.co.uk/2011/12/blog-post_9899.html


... किन्तु कहानी संकलन का काम अब पूरा हुआ है।
यह कहानी संकलन कुल लगभग 25 खण्डों में आएगा व इसमें कुल 23 भाषाओं की महिला कथाकारों की कहानियाँ सम्मिलित हैं।  इसके प्रारम्भिक (भारत की हिन्दी कहानी) के तीन खण्डों का प्रकाशन हो चुका है और इनका लोकार्पण 11 सितम्बर को साहित्य अकादमी, दिल्ली में हो रहा है। शेष लगभग 20-22 खण्ड भी धीरे-धीरे एक-एक कर शीघ्र ही पाठकों के हाथ में होंगे। अच्छी बात यह भी है कि काव्य की तरह इस कहानी अंक में भी रचनाओं का क्रम रचनाकारों की जन्मतिथि के क्रम से रखा गया है। यथा भारत की हिन्दी कहानी के इन 3 खण्डों को 'कोठी में धान' नामक पहले खण्ड में 8 दिवंगत रचनाकार और तथा 1947 से पहले जन्मी रचनाकार सम्मिलित हैं। दूसरे खण्ड 'खड़ी फसल' में 1948 से लेकर 1964 तक जन्मी (36)  कथाकार सम्मिलित हैं व  तीसरे खण्ड 'नयी पौध' में 1965 वर्ष से लेकर 1984 तक जन्मी (33) युवा कथाकारों की कहानियाँ सम्मिलित हैं।


इस ऐतिहासिक महायोजना की मुख्य सम्पादक रमणिका दीदी है व सह संपादक हैं अर्चना वर्मा जी। कविता व कहानी वाले दोनों संकलनों में रचनाकार के रूप में तो मैं यद्यपि हूँ ही किन्तु मेरे लिए और सुखद बात यह भी है कि इसके विदेश / प्रवासी वाले खण्ड की सम्पादक के रूप में भी मुझे इस से जुड़ने का सौभाग्य मिला है; यह अवसर मेरे लिए एक ऐतिहासिक अनुभव व घटना है। यह अवसर उपलब्ध करवाने के लिए मैं रमणिका दीदी के प्रति कृतज्ञ हूँ; यद्यपि उनका आत्मीय स्नेह तो मैं लंबे अरसे से लेती आ ही रही हूँ । 


प्रवासी / विदेश वाले खण्ड के लोकार्पण में यद्यपि मुझे निस्संदेह उपस्थित रहना था, तदनुसार ही जनवरी 2014 में प्रवासी सम्मेलन में उसके लोकार्पण की योजना भी बना ली थी, किन्तु किन्हीं अपरिहार्य स्थितियों के कारण मेरा भारत जाना गत वर्ष से सम्भव ही नहीं हो पा रहा है। फिलहाल शायद जनवरी 2014 में लोकार्पण पर भी मैं उपस्थित न हो पाऊँ। ... इसका मलाल मन पर हावी है। 


जिन-जिन लेखिकाओं की रचनाएँ इसमें सम्मिलित हैं वे अपनी लेखकीय प्रति लोकार्पण के समय स-सम्मान प्राप्त करना चाहें व लोकार्पण के ऐतिहासिक अवसर पर सम्मिलित होना चाहें तो जनवरी में भारत जाने का कार्यक्रम बनाएँ। तिथियों की सूचना अलग से दूँगी। यदि भाग लेने के / की इच्छुक हैं तो सम्पर्क बनाए रखें
 जो लेखिकाएँ भाग नहीं ले सकेंगी वे भी कृपया सूचित करें ताकि उनकी लेखकीय प्रति भिजवाने की व्यवस्था तब की जा सके। ​


  



गुरुवार, 1 अगस्त 2013

मॉर्निंग न्यूज़, जयपुर में ललित निबन्ध

मॉर्निंग न्यूज़, जयपुर में ललित निबन्ध


28 जुलाई, 2013 को जयपुर से प्रकाशित दैनिक हिन्दी समाचारपत्र 'मॉर्निंग न्यूज़' के रविवारीय साहित्यिक परिशिष्ट के मुखपृष्ठ (संख्या10) पर प्रकाशित मेरा ललित निबन्ध - "रंगों का पंचांग"


जिन्हें पढ़ने में असुविधा हो वे इस लिंक पर जाकर 28 जुलाई चुन कर उस दिन का ई-पेपर देख सकते हैं । http://www.morningnewsindia.com/epaper/news.php?city=Jaipur


नेट पर इसे अन्यत्र यहाँ पढ़ सकते हैं -



बड़े आकार में पढ़ने के लिए चित्र पर क्लिक करें -


शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

"पाप"

"पाप"  :  कविता वाचक्नवी  ('पाखी' , फरवरी 2013 )

वर्ष 2008 में विख्यात लेखिका रमणिका गुप्ता जी को हृदयाघात हुआ था। वे अस्पताल में भरती थीं। अस्पताल से ही संभवतः 8वें 9वें दिन मेरे पास नरेंद्र पुण्डरीक जी का फोन आया और उन्होंने कहा कि रमणिका जी बात करना चाहती हैं। यह सुन मैं अवसन्न रह गई कि अभी तो वे अस्वस्थ हैं, ऐसे में वे क्या बात कर सकेंगी। दूसरी ओर रमणिका दी' थीं। उन्होंने मुझे सभी भारतीय भाषाओं की महिला कथाकारों की कहानियों के एक समेकित संकलन की योजना के विषय में बताया और कहा कि मैं भी इस संकलन के लिए अपनी कोई कहानी भेजूँ। मैंने उन्हें निश्चिन्त किया। तभी अगले कुछ दिन बैठकर उस संकलन के लिए यह "पाप" शीर्षक कहानी लिखी थी। रमणिका दी' की योजना बहुत बड़ी थी, सामग्री संकलित होती रही व किसी न किसी कारण से वह संकलन विस्तार पाता चला गया। अभी प्रकाशनाधीन है। 

इस बीच वर्ष 2010 में भारत जाने व उन्हीं के आवास पर कुछ दिन ठहरने के समय बातचीत में जब उन्हें पता चला कि मैंने वह कहानी कहीं अन्यत्र न तो भेजी है, न ही प्रकाशित हुई है तो उन्होंने बताया कि संकलन के लिए अप्रकाशित रचना की बाध्यता नहीं है व यों भी विलंब हो रहा है अतः उसे शीघ्र  कहीं प्रकाशित करवाओ। मैं तब भी प्रकाशन के प्रति अपनी अरुचि, आलस्य आदि के कारण टालती रही व कुछ न किया। वर्ष 2011 के अंत अथवा 2012 के प्रारम्भ में हेमलता माहीश्वर जी से उक्त संकलन सम्बन्धी प्राप्त एक ईमेल के पश्चात् वरिष्ठ कथाकार सुधा अरोड़ा जी से जब इस सम्बन्ध में खुल कर चर्चा हुई तो उन्होंने भी कहानी पढ़ी व एक महत्वपूर्ण सुझाव देते हुए कहानी को तुरंत कहीं भेजने की बात दोहराई तथा  'कथादेश' अथवा 'पाखी' को भेजने के लिए कहा। अतः मैंने इसे 'पाखी' को भेज दिया। अंततः वर्ष 2008 में लिखी हुई यह कहानी वर्ष 2013 में "पाखी"  के नवीनतम फरवरी अंक में प्रकाशित हुई है। 

इस बीच गत 10 दिनों में अनेकानेक ईमेल व संदेश मुझे व्यक्तिगत स्तर पर पाठकों व मित्रों ने भेजे हैं। 'पाखी' की ओर से उसके संपादक प्रेम भारद्वाज जी द्वारा अंक की पीडीएफ फाईल भी मिली है। उन्हें धन्यवाद कि उन्होंने इसे सम्मिलित कर स्थान दिया। 

नेट के साथियों, मित्रों व पाठकों के लिए प्रस्तुत है इस कहानी का अविकल पाठ।
नीचे टंकित पाठ के पश्चात् पाखी' के पन्नों को भी दे दिया है। पन्नों को पढ़ने के इच्छुक उन पर क्लिक करें।  





कहानी
 पाप
- (डॉ.) कविता वाचक्नवी


‘‘सोलह बरस की उम्र क्या होती है ? ….. अब वह सब किताबी-बातें आप मत उछालने लगिएगा जो सपनों के संसार में खोए नवयौवन की उनींदी पलकों में केवल सपने ही सपने भरे देखती हैं, या जिनकी कही मानें तो, देह अलसायी रहती और आसपास फूल-ही-फूल चटखते दीखते हैं। ये सब बड़ी काल्पनिक और सपनीली दुनिया के झूठ होंगे। अस्सल जीवन इससे एकदम उलटा और व्यावहारिक होता है। इसमें सपनों के आने-जाने पर पहरे हो सकते हैं, होते ही हैं। और यदि कहीं आप लड़की हुए तो आँख मींचने न देंगे लोग आपको, कि कहीं पलक पीछे से सपना पुतली पर आ बिराजा तो …. ? ….. खुली आँख के आगे का संसार इतना कसैला कर देंगे कि आँख में बस तिरे तो पानी-ही-पानी, कहीं कुछ और बस-बच न जाए। ’’


क्या दबंग स्त्री है !
मुझे एन.जी.ओ. के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में जाँच के लिए वहाँ जाना पड़ा था। तभी एक हॉल में कानूनी सहायता दिलवाने वाले समूह की ओर से उसे नीचे दरी पर बैठे बोलते पाया था। उसके तीन ओर 10-20 स्त्रियों का जमघट-सा बैठा था। जब तक मुझे दरवाजे से लग खड़े उसने नहीं देखा, तब तक अनवरत इतना वह बोल चुकी थी। धड़े की शेष स्त्रियों ने मुझे भी सहायता के क्रम में कोई नई आई स्त्री मान, देखकर भी कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं की थी, इसलिए उसका वक्तव्य बाधित होने का प्रश्न नहीं था। संस्था की मुखिया को मैंने पहले ही अपने साथ भीतर चलने से रोक दिया था, ताकि जो जैसा है - उसे उसी ढर्रे पर देखा जा सके। मेरी ओर दृष्टि जाने पर उसने प्रश्नवाचक-सी अपनी दाहिनी भौंह उठाई व बाईं ओर को गर्दन तनिक झुकाकर पूछा - ‘कहिए’ !


यह थी उससे पहली बार की मिला-जुली। बाद में संस्था के बजट आदि जमा कराने के लिए उसके आने पर व ऐसी ही कुछ अन्य औपचारिकताओं के कारण हम लोग मिले और मित्र बन बैठे। वह अक्सर अपने कठोर अनुशासन में बीते बचपन के संस्मरण सुनाती। मेरे लिए वे सब-के-सब एक अलग प्रकार के संसार की आप-बीती जैसे थे। मैं जिस सामान्य जीवनशैली में पले परिवार से हूँ, वहाँ बेटियाँ माँ का पल्ला पकड़ कर पलती-बढ़ती हैं और पति को हाथ पकड़ा कर बाहर कर दी जाती हैं। हमारे घरों में पिता का बेटियों से वास्ता ही नहीं पड़ता, न बेटियों का पिता से। बस, अम्मा ही से कह-सुन कर दिन बिता दिए जाते हैं। बाबा भी, अधिक-से-अधिक हुआ तो पास आकर कभी सिर पर हाथ रख चुप खड़े दुलार देते थे। न उनका दबदबा बना, न रौब, न माँ का रौब। सब, जैसे चुप्पी-सी में दिन बिताती जिंदगी में अपने-अपने हिस्से के काम किए जिए जाते थे। हम लड़कियाँ ने न कभी लड़ाई देखी, न डपटी गईं। इसीलिए अपनी इस नई परिचिता से मिलने से पूर्व तक मेरे लिए यह समझ पाना सरल नहीं था कि कोई स्त्री ललकारने, तर्क करने, विरोध करने, यहाँ तक कि सामना करने, अधिकार के लिए साहस करने की आवश्यकता क्यों अनुभव करती है।


अपने लड़की होने के दिनों और संध्या (इस मित्र) के लड़की होने के दिनों का अंतर तो जैसे दो दूर-दूर बसी सभ्यताओं के अंतर जैसा था। उससे न मिलती तो असली जीवन का असल पता ही न पड़ता, कई बार ऐसा लगता।

*** 


वह कड़े अनुशासन वाले पिता की एकमात्र बेटी थी। पिता क्रूर तो न थे, हाँ कठोर अवश्य थे। यह कठोरता ऐसी थी, जिसमें उनकी प्रबल भावुकता बेटी के हित की चिंता में, जिद्दी व निर्मम हो चुकी थी। बेटी के भविष्य को सुखी और उसे सर्वगुणसंपन्न बनाने के लिए पिता उसे कठोरतम जीवन की सीख व अनुभव अपने कड़े-से-कड़े निर्देशन में दे -दिला रहे थे। जन्मते ही माँ का तज चले जाना बेटी का इतना जी न दुःखाता था, जितना कि वात्सल्यमय पिता का निरंतर कर्कश होते चले जाना । सादा-जीवन उच्च विचार, गांधी जी के उपदेशों की पग-पग व्यावहारिक जीवन में परिणति के परिणाम उसने 10 वर्ष का होने के बाद से जो देखने-झेलने के उदाहरण सुनाए - वे मेरे लिए कल्पनातीत थे। पिता ने घरेलू सुविधाओं का नितांत अभाव बनाए रखा ताकि बेटी कहीं आराम-तलब न बन जाए, भरी दुपहरी में घर के दूसरे सिरे पर लगे नल पर बर्तन माँजने जाने व नल को रसोई तक न लाने के पीछे परिश्रम व कड़े जीवन-संघर्ष के अभ्यास की इच्छा थी। पिता के प्यार और प्यार के कारण भविष्य की सुरक्षा व ससुराल - सुख की चिंता व कामना में पिता का अपनी ही बेटी के मिलने, उठने, बोलने, जाने, खाने, सोने, पीने, हँसने, बरतने, कहने जैसी हर प्रकार की क्रिया और व्यवहार पर प्रतिबंध और सारे-के-सारे अनुभवों को निरंतर तिक्त बनाने पर बल रहता, ताकि बेटी कठोर जीवन की अभ्यस्त हो सके। वे, मानो बेटी को एक `परफेक्ट सुपर वूमन’ या कहें कि सर्वगुणसंपन्न युवती के रूप में गढ़ना चाहते थे। लड़कों से परिचय होना तो दूर की बात है, वहाँ तो लड़कियों तक से बतियाने की आजादी न थी। देखने-सोचने और कल्पना तक की आजादी न थी, न फुर्सत थी। अपनी इस इकलौती बेटी को प्रखर मेधावी और तर्कपूर्वक निर्णय लेने में सक्षम बनाना भी पिता की जिद का हिस्सा था। घर में नियमित गहन व गंभीर शास्त्रीय चर्चाओं वाले दार्शनिक ग्रंथों का पढ़ना और चर्चा करना अनिवार्य चर्या का बड़ा हिस्सा थे।


वह बताती कि 18-19 वर्ष की आयु तक भी उसे किसी आयुजन्य काल्पनिक संसार का आभास तक न था। वह जीवन और जगत् के दार्शनिक रहस्यों के साथ-साथ दिन-भर घर से जूझती व पिता द्वारा जीवन की कठोरताओं के वर्णन सुनती। अपनी 18-20 की वय तक उसे न देह में, न मन में किसी सुर-ताल के बजने का आभास तक मिला। परिवार के शादी-विवाह तक में खादी-चप्पल व सफेद खादी के सलवार कुर्ते में लिपटी उस निराभूषण, शृंगार-विहीन विचारमग्न लड़की से न कोई मित्रता करता, न काम की बात से अधिक बात।


एक दिन अचानक पिता के किसी पुराने मित्र ने उन्हें युवा हुई बेटी के साथ घर में अकेले रहने के अनौचित्य की बात समझाई कि “ देखो शान्तनु ! या तो तुम बेटी के हाथ पीले कर दो या इस कहीं भेज दो, जहाँ यह लड़कियों के बीच में रहे। इस आयु की (17 साल की) जवान बेटी यों पिता के साथ अकेले में सोती-उठती है - सो अच्छी बात नहीं है "।


बस, सप्ताह-भर के भीतर-ही-भीतर संध्या को वहाँ से किसी उचित सुरक्षित जगह पर भेजने की भाग-दौड़ में जुटे पिता ने बताया – “ देखो बेटे ! इस साल की पढ़ाई के लिए तुम्हें एक आश्रम में भेज रहे हैं। वहाँ तुम्हारी तरह की छह आठ सौ छोटी-बड़ी लड़कियाँ ही लड़कियाँ रहती हैं। तुम्हें वहाँ जाने से खूब अच्छा लगेगा और अब तुम्हारी पढ़ाई भी पहले से काफी बढ़ गई है। यहाँ घर सम्हालने से पढ़ाई में बाधा आती है, पर वहाँ आराम से पूरा दिन पढ़ना। वहाँ आचार्य जी आदि लोग बड़े-बड़े पारंगत विद्वान हैं। पढ़ाई के बाद के घंटे व्यायाम, पूजा, ध्यान और वैसी ही दूसरी चीजों के लिए सब नियमानुसार तय हैं वहाँ, तो तुम्हारा संपूर्ण विकास वहीं संभव है। 15-20 दिन की तैयारी में लड़की ने डाक से आई नियमावली को 25-30 बार पढ़ा। एक लोहे के सन्दूक में सामान बाँध व बिस्तर और थाली-कटोरी का `सेट’ लेकर पिता उसे आश्रम पहुँचाने गए। विदा के समय से कई घंटे पहले से ही उसने पिता को बिलखते देखा। पर चुपचाप रही। न चुप कराया, न रोई।


दोपहर को उसे आश्रम के बाहरी परिसर के भीतर बने एक और बड़े से दो पल्ले के फ़ाटक के एक पल्ले में बने छोटे-से दरवाजे के अंदर अपना सामान लेकर चले जाना था। यह फाटक सदा बंद ही रहता था और इसमें बाहर के किसी भी व्यक्ति का प्रवेश निषिद्ध था। संध्या के पिता ने साल-भर की रहने-पढ़ने-खाने की राशि दफ्तर के बाबू के पास ज़मा कर रसीद ली और खाने-पीने में बेटी को कोई कमी न हो इसके लिए कई बार प्रार्थना की। सुबह के दूध के अतिरिक्त रात के दूध की अलग व्यवस्था के लिए हर महीने अलग से पैसा देने की रस्म पूरी की और ` दोनों समय एक-एक चम्मच शुद्ध घी भी खाने में ऊपर से दिया जाए ’ इसका भी शुल्क ज़मा करा दिया । दफ्तर से बाहर निकल पिता ने बेटी के सिर पर हाथ रख कर बाई बाँह में घेर उसे गले लगा लिया। दाहिने हाथ से लगातार सिर थपकाते वे 10-15 मिनट यों ही खड़े चुपचाप अपने आँसू पोंछते उसे दुलराते रहे और फिर दोनों कंधों से पकड़ कर बोले – “ सन्धि बेटा ! प्यार का अर्थ होता है अपनों के हित की चिंता, न कि पास-पास या साथ-साथ रहना। बेटियाँ तो वैसे भी साथ नहीं रहती हैं, एक दिन जाना ही है तुम्हें अपने इस पिता को छोड़ कर। तो तुम्हारा हित इसी में है कि जो कुछ तुम मुझसे नहीं सीख सकी, वह यहाँ ये लोग सिखाएँगे और तुम पूरी तरह अपनी पढ़ाई में ही जुट सकोगी ’’।



***

संध्या ये सब बताते हुए बहुत भावुक हो गई थी उस दिन। अपने पिता की इतनी कड़ाइयों के बाद भी उसके मन में अपने पिता के प्यार की इतनी आस्था देख मुझे आश्चर्य हुआ। मेरे पिता ने हमसे न कभी कड़ाई की, न डाँटा-डपटा। पर फिर भी मेरे पास ऐसा कोई संस्मरण नहीं, जिसे याद कर या बाँटते समय मैं उनके अपने प्रति किसी भावुक क्षण को याद कर आज आँख भिगो सकूँ। एक बार को लगा कि किस मिट्टी की बनी है यह, जिस लड़की को उसकी युवावस्था तक में अनुशासनहीनता देख कर पिता पीट तक देते हों, वह कैसे पिता के लाड़ की स्मृति में गद्-गद् हो सकती है ?


इसी तरह के अनेक रोमांचकारी व अविश्वसनीय-से लगते उसके संस्मरण मेरे लिए जीवन की लाल-किताब जैसे सिद्ध हुए, जिन्होंने मेरे आज पर मानो कोई तंत्र कर दिया हो, या मुझे मानो कोई सिद्धि मिल गई हो। आज तुम्हें यह पत्र लिखते हुए मुझे उसकी बेहद याद आ रही है। तुमने अगर अपनी फिल्म के लिए कहानी की खोज में मुझे मेरे स्त्री-जीवन की कोई सनसनीखेज याद ताजा करने या जानने की हठ उस समय न की होती तो शायद मैं उसका यह संस्मरण सुनने से चूक गई होती। तुम्हारे प्रोजेक्ट के विषय में उससे बाँटते समय मैंने यों तो अपने सपाट जीवन की एकरस कथा पर उचाट-सी बतकही की थी, कि भला है क्या टटोलने खोजने को ! कुछ याद न पड़ता हो ऐसा नहीं, अपितु कुछ है ही नहीं ऐसा इस नई व यकायक तेजी से कायाकल्प हो गई दुनिया के खुलेपन में लोगों के आश्चर्य का कारण बन सकने योग्य। गत 30-40 वर्ष के परिवर्तन का अनुपात देखें तो 500 वर्ष के अनुपात से भी अधिक है। ऐसे में चौंकाने वाली घटना हमारे समय के लोगों के पास कुछ हो नहीं सकती। इस खीझ में मेरे मुँह से निकला कि “ सन्धि ! तुम कितनी भाग्यशाली हो, मेरी तुलना में तुम्हारे पास तो अकूत खजाना है ’’। 


वह अपने उजले रूप के ललौंहें होते ऐसे क्षणों में और भी सिमट जाया करती थी। साक्षात् वाग्देवी-सी जिसकी वाणी पर विराजती थी, उसका यों मौन में कुहुक तक न भरना उसके व्यक्तित्व का अत्यंत गोपन पथ था। मुझे ऐसे क्षणों में उसकी भंगिमाओं में, गोते खाती झरने की धारा के बजने की प्रतीति ही सदा हुआ करती थी, मानो मैं किसी अनंत सूनेपन और एकांत में झरने के इस पार किसी शिला पर बैठी लहरों के गिरने के क्रंदन पर ध्यान लगाऊँ। पर मेरी भाषा की ध्वनियों और धारा की ध्वनियों का अंतर मेरे लिए सदा अबूझ रहा। वह भाषा मेरे संसार के लिए कभी न संप्रेषित होने वाली स्वर-ध्वनियों का विकट संसार थी। अपनी लाचारी और संध्या के डूबने के क्षणों में मैं अवश कसमसाती-भर रह रह जाती। ऐसे में किसी पहले सुनी घटना के क्रम के किसी एक बिंदु पर प्रश्न उठा कर उसके मौन में एक कंकर फेंकने का यत्न किया करती।


हाँ, एक बात जो तुम्हें लिखनी रह गयी, वह यह कि वह अपने पूर्व जीवन की उस बच्ची, लड़की और युवती को मानो अपने से अलग किसी व्यक्ति के रूप में ही संबोधित करती, अलगाए-सी देखती–दिखाती थी। लगता है, इसे मैं ठीक से समझा नहीं पा रही। एक उदाहरण से शायद स्पष्ट हो, जैसे - उसका कहन ऐसा होता ‘‘ वह लड़की जिसने सप्ताह-भर दिन-रात बिना चीनी-नमक का फीका-उबला दलिया खा-खा बिताया हो, उसे तो घर से बेहतर वह आश्रम लगता था, जहाँ दो समय रोटी-सब्जी-दाल तो सलीके की मिल जाया करती थी। वह लड़की चार-चार, पाँच-पाँच दिन भुनी हुई गर्म गेहूँ में गुड़ डाल तैयार किया, पोटली में रखा अनाज एक गिलास दूध के साथ चबेने की तरह खाती दिन बिताती थी, उस लड़की का मन तो कब का मर चुका था। ’’


मेरे लिए दो जीवनों की समानांतर कथाएँ एकदम विपरीत परिस्थितियों में एक देह में उतरी हुई होतीं। इसी प्रकार, दो पार एक साथ चलते उसके मन को टोहते क्षणों में, वह आश्रम पहुँचने के बाद के दिनों के कई अनुभव बाँट चुकी थी। 

***


भीतरी फाटक के अंदर का संसार सफेद धोतियों में लिपटी युवा, पर म्लानमुख, लड़कियों का संसार था। जहाँ बीचोंबीच एक बड़े ही विस्तृत आँगन, बगीचों, चबूतरों व स्थान-स्थान पर बनी पत्थर की पाटियों से खुलेपन में जीने की चाहत का मोह जगता । उस चौकोर मैदानाकार आँगन के चारों ओर कतार में कमरे ही कमरे थे । अनंत छोटे-बड़े कमरे। उनके आगे दुलवाँ छत का बरामदा चारों ओर एक-सा न था। फाटक में प्रवेश कर दाहिनी ओर बढ़ते ही पहला कमरा वार्डन का था। `लड़की’ का सारा सामान वहाँ उलीचा गया, जिसमें सूची की चीजों के अतिरिक्त लड़की की खाली डायरियाँ और कई जीवनियाँ तथा दार्शनिक विषयों की पुस्तकें थीं ; जिनकी अनुमति की वहाँ व्यवस्था यद्यपि नहीं थी, पर कुछ भी आपत्तिजनक न होने के कारण व लड़की के गरिमापूर्ण, उजले व्यक्तित्व के दबदबे के कारण वॉर्डन ने आश्रम की आचार्या के आदेश से सब सामान रखने की व्यवस्था देते हुए एक कमरे में एक तख्त और अलमारी के आधे निचले भाग का अधिकार लड़की के नाम कर दिया। उसने संदूक का सामान निकाल अलमारी में जमाया, बिस्तर बिछाया और संदूक को तख्त के नीचे ठेल दिया। पुस्तकों के रखने जितनी जगह अलमारी में थी नहीं। वॉर्डन एक 28-30 बरस की अविवाहित, वाचाल, कालेपन की सीमा तक साँवली, लगभग छह फीट लंबी, पर चारों ओर थुलथुल झूलते चमड़े में अटी, चोहरे बदन की महिला थी, जो अपनी उम्र के गणित से लड़कियों से बराबरी की-सी मैत्री दिखाती-बतियाती थी, किंतु अपनी विराटता और वाचालता में नितांत वक्री थी।


आश्रम में कड़ा अनुशासन व सोने से लेकर उठने तक, फिर उठने से सोने तक घंटी बजाए जाने पर सधे कदमों से काम करते चले जाने का नियम था। हर कमरे का द्वार आँगन की ओर ही खुलता था, तो किसी भी कोने में खड़े हो कर हर कमरे की चौकसी बड़ी आसानी से की जा सकती थी। कुछ सबसे बडे़ आयु वर्ग की 23-24 वर्षीय छात्राओं को मिडिल स्कूल की लड़कियों की डॉरमेट्री के संरक्षण की जिम्मेदारी थी। जो बहुत छोटी लड़कियाँ थीं, उनके लिए कुछ बुढ़िया-सी आयाएँ थीं। प्राइमरी वर्ग की लड़कियों के लिए 35-40 वर्षीय पुरानी अध्यापिकाओं के द्वारा संरक्षण की व्यवस्था डॉरमेट्री के साथ वाले कमरे में आवास के रूप में थी।


शुरू में वार्डन से लेकर सभी छोटी-बड़ी लड़कियों के प्यार का केंद्र संधि ही संधि बनी रही। उजले रूप व मीठे बोल की धनी संध्या मानो आत्मीयता के लिए सदा से ही वंचित रही हो। सभी के प्रति उसकी सहज निश्छल आत्मीयता, मुस्कुराते रहने की अथक आदत व सुलझ स्पष्ट विचार, अपनी बात को रोचक शैली में सौम्यता से प्रस्तुत करने का उसका अंदाज हर किसी को लुभा लेता, लुभाए ही रखता। जहाँ एक ओर छोटी कक्षाओं की लड़कियाँ उसे छूकर चहक उठतीं, उसकी गोद में लिपटी जाने में सार्थकता अनुभव करतीं, वहीं दूसरी ओर संधि से बड़ी सभी लड़कियों के लिए वही उनके सहज स्नेह व आत्मीयता की अधिकारी बन गई।


बिन्दु दी’ के साथ पहले-पहल उसे कमरा दिया गया था। वे बेहद प्यारी व संधि से साल-भर बड़ी होंगी। बड़ी उद्दाम-सी हँसी वाली बिन्दु का बेलागपन संधि को बहुत भाता। दोनों में अच्छी पटती। बिन्दु दी’ की और दो बहने भी वहाँ रहा करती थीं, एक बड़ी और एक छोटी। तीनों शायद आश्रम की सर्वाधिक मोहक और शालीन लड़कियाँ थीं। सबसे बड़ी मन्जुला दी’ तो अनुशासन के मामले में काफी कड़ाई भी बरतती थीं, पर सबसे बड़ी होने का परिणाम था कि उनके व्यक्तित्व में एक अजब मातृत्व की छाया का स्पर्श-सा बसता था। वे 8वीं और 9वीं कक्षा की लड़कियों की डॉरमेट्री के साथ सटे कमरे में एक और अन्य इंचार्ज युवती के साथ रहती थीं। उनके उस कमरे का एक दरवाजा लड़कियों के हॉल में खुलता और दूसरा बाहर बरामदे में। मुख्य दरवाजे के एकदम सामने कमरे की पिछली दीवार पर एक बड़ी खिड़की थी। मुख्य द्वार आगे की दीवार के एकदम मध्य में होने के कारण प्रवेश करते ही दरवाजे के दोनों ओर एक-एक तख्त लगा था और तीसरा तख्त पीछे की दीवार वाली खिड़की के एकदम आगे चौड़ाई में।



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संधि जब इन यादों में उतरी थी तो कई दिन इन संस्मरणों के मोह में लबालब मीठे अमृतपान-सा भाव उसके तीखे चेहरे-माहरे वाले दिप-दिप करते रूप पर व्याप्ता रहा। उसने सारे आश्रम वालों के द्वारा उसे विशिष्ट व अतिरिक्त महत्व और लाड़ दिए जाने की बात जाने कितनी तरह व कितने उदाहरणों से बताई थी।


उसके कमरे में बिन्दु के कारण शालिनी (छोटी बहन) और मंजुला आ जाया करतीं और अक्सर गोला बाँध गप्पगोष्ठी का अवसर भी निकाल लिया जाता। मंजुला क्योंकि अध्यापिका थीं, अतः वॉर्डन का उनके वर्ग की 4-6 अध्यापिकाओं के साथ सहलापा-सा लगा करता था। गप्पगोष्ठी में अक्सर थोड़े-बहुत समय के लिए वॉर्डन भी आ जाया करती। इस प्रकार संधि, आश्रम के आवासीय परिसर की लगभग मुखिया-टोली के साथ उठने-बैठने लगी। मंजुला में अपनी बहनों के लिए जो मातृत्व (स्नेह) व पितृत्व (संरक्षण व सुरक्षा) का सम्मिश्रण था, वह उसे और भी आत्मीय बना देता था। 


धीरे-धीरे मंजुला ने संधि को भी अपने संरक्षण में ले लिया। संधि के लिए आश्रम में समाज से दूर रहना कतई कष्टप्रद न लग रहा था किंतु धीरे-धीरे कुछ बुदबुदाहटें उसे प्रश्नों में घेर लेतीं ; वॉर्डन की अतिरिक्त वाचालता, आश्रम के कॉलेज की प्राचार्या व उपप्राचार्या, दोनों का 45-50 की वय तक भी अविवाहित होना ; आश्रम के चारों ओर के कमरों से लड़कियों का फाटक पर नजर गड़ाए रखना कि कौन कब फाटक से बाहर बने कुलपति दंपति (स्वामित्व) के आवास पर कब गया, कब लौटा, कुछ पुराने किस्से.... कि कौन लड़की कब और किन परिस्थितियों में छोड़ कर गई...... आदि-आदि। 


4 बजे सुबह उठकर एक बड़े हॉल जैसे बने स्नानघर में सबको एक साथ नहाना होता था तथा वहीं कपड़े भी धोने का काम तभी निपटाना होता। पशुओं के रहने और चारा खाने वाले बड़े हॉल जैसा यह था, जिसमें दीवारों के आगे 2-3 फीट की चौड़ाई छोड़ कर एक डेढ़ फीट ऊँची मेढ़-सी बनी थी। दीवारों में जगह-जगह (4-6 जगह, हर दिशा में) नल के स्थान पर मोटे पाईप से बाहर की ओर निकले थे, बालिश्त-भर घेरे वाले। यही पानी आने की नालियाँ थीं, जिनसे पानी आगे के मेढ़ वाले चौड़े नाले में आता भरता रहता और लड़कियाँ अंधेरे में चारों ओर तीन-तीन किलोमीटर तक खेतों की ही परिधि से घिरे उस सामूहिक स्नानागार के हॉल में झुंड के झुंड एक साथ अध-ढँपी नहाने का कार्यक्रम निपटा लेतीं। संधि शायद दो या तीन बार ही वहाँ नहाने का साहस जुटा पाई। फिर जाने क्यों उसे अक्सर तेज बुखार रहने लगा था। 4-6 महीने पाली के बुखार में मंजुला का उसकी माँ - सा बन कर दिया दुलार, उसके जीवन की शायद सबसे मीठी घटना थी। 


शाम को घंटी बजने पर सबको आँगन में इकट्ठा होना पड़ता। उससे पहले नाश्ते की घंटी बजने पर मंजुला या कभी-कभी बिन्दु ही उसके लिए खाने वाले हॉल में बँटते नाश्ते को कभी गिलास या कभी कटोरी में ला दिया करतीं। एक अजब बात, जिस पर संधि खूब चकित होती, बताती थी, वह यह कि कमरों में रहते-बैठते हुए कभी दरवाजा बंद न करने का कड़ा आदेश था।


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तुम्हें, 1998 में फिल्म की कहानी की खोज करने पर संधि की 35 वर्ष पुरानी यह कहानी, “ पुराने जमाने में यही सब होता था ” - जैसी लगी थी, यहाँ तक सुनकर। इसके आगे का किस्सा सुनकर तुमने सीधे-सीधे मुझे इसी को फिल्माने का अपना निर्णय सुना दिया था।


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हॉस्टल (आश्रम) में वॉर्डन का पेड़ की हरी शाख से बनी लचीली देह वाली छड़ लिए, जिस-तिस लड़की पर बरसाते आगे बढ़ना, संधि को अक्सर सहमा दिया करता। वॉर्डन के कमरे से एक कमरा छोड़ कर संधि का कमरा था । वॉर्डन शाम से रात तक दो चक्कर बरामदे-बरामदे चलती हुई चारों छोर मापती थी। हर कमरे में घुस आदेश देना, डाँटना, छड़ लहराना और थुलथुल झूलते हुए आगे बढ़ना, रोज का यही नियम होता। शाम को व रात को पढ़ाई के घंटों में लड़कियाँ अपने कमरों में गुपचुप बतियातीं या लेटीं या कई बार तो मोमबत्ती के ऊपर कटोरी में तेल गर्म कर उसमें पोर-पोर-भर माप की पूरी तक सेंकती पकड़ी जातीं और झमाझम गर्दन के नीचे पीछे की ओर वॉर्डन के भारी हाथ का तड़ाका छूटता। पर इसके बाद भी ऐसे पराक्रम न तो बंद होते, न ठहरते। किसी एक लड़की के तख्त पर दूसरी लड़की का पाया जाना जघन्यतम अपराध की श्रेणी में आता था। संधि को कभी रहस्य समझ न आया कि इसमें क्या पाप कर दिया किसी ने। अंत में उसने निष्कर्ष निकाला कि पास बैठ कर गपियाने के अवसर से बचाने की ही यह जुगत होगी शायद कोई।


समय-समय पर, बिना पूर्वसूचना के, यकायक चारों ओर से दरवाजे बंद करते हुए लड़कियों के सामान की तलाशी का अभियान भी चलाया जाता था। जिनके परिवार वाले मिलने आने पर पैसा, मिठाई या नियमेतर कोई वस्तु दे जाते थे, वे सब पिंजरे में गर्दन मरोड़ दिए जाने की घड़ी भाँप कर पंख फड़फड़ाते पंछी की तरह थर-थर काँप रही होतीं। कोई कोई तो चाबी खो जाने का बहाना कर देती, ऐसे में पत्थर से ताले तोड़ कर तलाशी ली जाती। वह आतंकवादियों का बस्ती में घुसकर घरों को खंगाल व बर्बाद कर देने जैसा दिन होता था। सब लड़कियों को आँगन में रहना होता था और अपने-अपने लोहे के संदूक सार्वजनिक उघाड़ने होते थे। 

संधि का चेहरा इस घटना को सुनाते समय भी उन त्रस्त घड़ियों के तनाव से खिंच गया था।


इस तलाशी के बाद और कई बार तो यों ही लड़कियों को उनका कमरा छोड़, किसी ओर कमरे में रहने की व्यवस्था सुना दी जाती। कई बार तो 11वीं की लड़की को 75-80 वर्ष की आया वाले कमरे में उसके साथ रहने का आदेश दे दिया जाता। किसी भी लड़की का किसी की सहेली होना, उसकी अकाल मृत्यु की घड़ी की घोषणा होने जैसा होता। 24-25 बरस की चंचल, हँसती व सभी को प्रिय लगने वाली अध्यापिकाओं (वहीं की पूर्व छात्राओं) तथा बूढ़ी आयाओं के बीच एक वर्ग और भी था। वह था 35 से 55 के आसपास की खुफिया निगाह वाली, पाँच मिनट में सामने खड़े-खड़े सिर, ऊंगली, चप्पल, धोती की किनारी व हँसने की मात्रा तक का दोष पकड़ती, कौन लड़की किसके साथ कितनी बार हँसी, किस कमरे से निकली, किस में कितनी देर के लिए गई, चार बार होने वाली हाजिरी में कितना पहले व कितना पीछे पहुँची, आँगन में कितनी देर बिताई ....... जैसी चीजों पर पैनी पकड़ रखने वाली अविवाहित अध्यापिकाओं का। जो पल-पल की सूचना बाहर कुलपति आवास तक दिया करतीं। कुछ चतुर लड़कियों ने इन्हें अपनी सेवा-से इतना प्रसन्न किया हुआ था कि स्वयं को सदा के लिए सभी तरह से दोषमुक्त कर चुकी थीं और उनके लिए खुफिया-तंत्र का काम करती थीं ; ताकि बदले में वे सारी सुविधाएँ ले सकें जो अन्यों को लेने का नियम नहीं था। 


24-25 बरस की आयु के आसपास वाली स्नातिकाएँ, सभी, जीवन से भरपूर, हँसी में डूबी और एक-एक कर विवाह तय होने की घड़ी की प्रतीक्षा करतीं अपने घर लौटे जाने की आशा में निश्चिंत थीं। कुछेक तो बीच में इसी तरह चली भी गईं। उनके परिवार के साथ वरपक्ष उन्हें यहीं मिलने आया, पसंद किया, तय हुआ और विवाह के महीना-भर पहले वे सदा के लिए चली गईं। सभी छोटी व किशोर लड़कियाँ इन स्नातिकाओं के स्नेह व हँसमुख भाव पर लुभी रहतीं। अक्सर रविवार की शाम लड़कियाँ गुट बनाकर बतियातीं। अनायास ही संधि स्नातिकाओं वाले गुट का हिस्सा बन गई। यों भी अपने व्यवहार की गंभीरता के चलते वह अपनी आयु की लड़कियों में बाहरी जैसी और बहुत बड़ी जैसी मान ली गई थी। 


स्नातिकाएँ कभी हाजिरी लगाने, देने कोठी (कुलपति निवास) नहीं जाती थीं। यदि संदेश आता कि कोठी पर बुलाया गया है, तो न वे सहमतीं, न भागी चली जातीं, न खुश होतीं। मंजुला तो उलटे, ऐसे समय अजब-गजब तेवर से भर कर्कशपन की प्रतिमूर्ति हो जाती। उसके लिए दरबार में हाजिरी देना, बड़ा अपमान था। ऐसे समय में कई नई-पुरानी दबी-पड़ी घटनाएँ और बातें उलझे सूत-सी गुंजल बन हाथ आतीं, जिनका न ओर संधि को पता होता, न छोर। अपने इस बुलावे पर मंजुला दी’ उन्हें कोसती और संधि को दुलारती कोठी जातीं। जहाँ से 10 मिनट में लौटकर रिपोर्ट माँगे जाने की खीझ से भरी होतीं। वॉर्डन अक्सर ही इस जमावड़े में आ बैठा करती थी।


मंजुला दी’ संधि के लिए बुखार में खाने को दाल में रोटी सान कर, गिलास में, सबसे छिपाकर लाया करतीं। धीरे-धीरे यह आत्मीयता ऐसी बढ़ी कि पल-भर भी दोनों एक दूसरे को न पाएँ तो चैन न पड़ता था। 


एक दिन संधि से कहा गया कि उसे सबसे बूढ़ी आया (ताई जी) के साथ अब से रहना होगा। जहाँ से इस कमरे का अंतर आग्नेय और वायव्य का होता अर्थात् आँगन और बगीची के बाईं ओर की पंक्ति का अंतिम कमरा। संधि के लिए समझना कठिन था कि ऐसा क्यों किया गया। फिर 75-80 बरस की किसी महिला के साथ 17 बरस की किशोरी ! ऊपर से आँगन से आर-पार जाते भी, देखने वाली पल-पल की कड़ी निगरानी। वह एक आँगन में रहते हुए भी बढ़ने जा रही दूरी व अपनी मित्रों से दूर चले जाने की चिंता में रो पड़ी । मंजुला, बिन्दु और मंजुला की साथी स्नातिकाओं ने प्रशासन को जी भर गालियाँ दीं। प्रभा, पुष्पा, सरिता, विभा और विमलेश सभी का यही कहना था कि कोठी के किसी ने कान भरे होंगे कि मंजुला और संधि सहेली हैं। ‘सहेली’ होने का पाप संधि की समझ से परे था और मंजुला की सहनशक्ति से परे। वह प्रश्नवाचक वाक्यों में कोठी वालों को कोस रही थी। इस बीच बिन्दु का ऐसे प्रभावों में न आना यह भी बता रहा था कि अपनी बहन का स्नेह अपने अलावा किसी से बँटता देखना उसे बुरा लगता आया था, इस कारण आज वह राहत में थी।


संधि ताई के कमरे में चली तो गई पर अपने विशिष्टपन का लाभ लेते हुए वह शाम को अक्सर मंजुला और विमलेश के कमरे में आ जाती। बिन्दु वाले कमरे में उसकी जगह किसी और कन्नड़ लड़की को ठहरा दिया गया था। वहाँ बैठके बंद हो गईं। अब टोली का केंद्र या तो मंजुला वाला कमरा या पुष्पा और प्रभा वाला कमरा होता। आश्रम में हर छोटा-बड़ा संधि को समझाता कि तू मंजुला दी’ के साथ मत रहा कर वरना तुम लोग ‘सहेली’ मानी / कही जाओगी। संधि का एक ही उत्तर होता – “ सहेली भी तो बहन जैसी ही होती है, बस रिश्तेदारी नहीं है, प्यार तो उतना ही है, शायद उससे बढ़कर ही होगा ’’। साथी या जरा छोटी लड़कियाँ जो सदा उसके बड़प्पन और प्रचंड मेधावीपन से आक्रांत रहती थीं, वे आपस में एक दूसरे को समझातीं कि “ छोड़ो इस संधि को कुछ कहना, इसे अक्ल-वक्ल तो है नहीं, कोरी है ’’। 35 से 55 वय वाली अध्यापिकाओं का गैंग यदा-कदा उसे बुला कर समझाता कि “ मंजुला और तुम क्यों मरने पर तुली हो ! यहाँ सहेली होना बड़ी गंदी बात है, गंदा काम है, जैसे लड़का-लड़की होना ’’। संधि खीझती - ‘‘अरे तो दीदी लड़का थोड़े है। न मैं लड़का हूँ। सबको पता नहीं क्या? दिखता नहीं क्या ?’’ 


पर इस तनाव व अपने प्रति निरंतर कड़े होते नियमों के कारण वह भयभीत व घर जाने को उतावली हो उठी थी। ऐसे अनुत्तरित प्रश्नों के तनाव ने उसे कभी व्याकुल नहीं किया था, जिनका कोई तार्किक समाधान न हो सकता हो। अपनी वैचारिक प्रखरता, स्वाध्याय और बौद्धिक क्षमता ने उसे दार्शनिक प्रश्नों के समाधान की कुंजी और विधि सिखा दी थी। किंतु ये नए प्रश्न हल नहीं होते थे, न कोई विधि और कुंजी काम करती थी। वह अक्सर ऐसी प्रश्नाकुलता से घबरा कर अवश और लाचार हो जाती। यकायक 1000-1200 की भीड़ में दिन रात रहते हुए भी अकेलेपन से भर गई। पिता के पास लौट जाने की व्यग्रता या मंजुला का आँचल पकड़ लाड़-मनुहार की लालसा उसे बाँध लेती।



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घटना के इस क्षण पर आकर संधि ने भरी आँखों से गर्दन उठा मेरी ओर ताका था और पूछा था - ‘‘उस बच्ची का मन समझ सकोगी ? क्या कसूर था उस लड़की का ? कोई अपराध नहीं किया था उसने जिसकी सज़ा दी जातीं ’’। यह कह सिर नीचे झुकाया। कुछ क्षण मौन रही, फिर धीरे से आप-ही बोली थी – “ मुझे आज भी वह रोती सुनाई देती है, पुकारती है ’’। उसकी नाक का अगला सिरा काँप रहा था, आवाज़ रुँधी हुई और ओंठ फड़फड़ा रहे थे। हम लोग उस पूरी दोपहर धूप से बचते-बचाते यहाँ-तहाँ बैठते बातें करते रहे। उसे तेज बुखार था। 


असल में मैंने फोन किया तो पता चलने पर छुट्टी लेकर उससे मिलने जाने का सोचा था। वह ऐसे में भी कहीं के लिए निकलने की तैयारी में थी। रोकने पर भी न मानती थी। अंत में मैंने कौलि भर कर उसके साथ चलने को उसे मना लिया था। गाड़ी वही चलाती थी। उसके बुखार से ही बात शुरू हुई थी जिस पर उसने कहा था – “ चार साल लगातार बुखार झेल चुकी हूँ। ये तो कुछ भी नहीं ’’। 

यहीं से फिर क्रम चल निकला था, कुछ इस प्रकार कि ........



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........ संधि का बुखार 106 डिग्री से ऊपर ही रहने लगा। डॉ. सप्ताह में एक बार आता था। वॉर्डन के कमरे व उपस्थिति में एक-एक बीमार लड़की वहाँ लाई जाती अंदर।

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संधि सड़क के एक ओर कार पार्क कर कुछ देर बैठी रही थी मेरे साथ ; और बड़ी उत्तेजना से बोलते हुए बताया कि जब उस लड़की ने सहेली होने को गंदी बात और लड़का-लड़की होना बताया था तो संधि ने अबोध भाव, किंतु तर्क से दो टूक इसे गलत कहा था। उस गलत कहने का कारण “ संबंध में कुछ गलत है ’’ का विरोध नहीं बल्कि प्रत्यक्ष दीख रही दो लड़कियों को लड़का-लड़की घोषित करने जैसे झूठ का विरोध था। संधि को तो दो लड़कियाँ क्या, लड़का-लड़की तक के संबंध में किसी ‘गंदी बात’ का लेश-भर आभास न था। उसकी शास्त्रीय बुद्धि की पहुँच से बहुत परे की बातें थीं वे। उसके तब तक के जीवन में इन बातों, ऐसे अनुभवों व ऐसे संबंधों का कल्पना में भी आना या पता लगना तक संभव नहीं हुआ था। सो, ऐसी बातें उसकी समझ की पकड़ से बहुत परे की थीं। 



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केवल आवाज़ और होंठों से हँसती-हुई-सी हुई वॉर्डन दोस्ताने में बतियाते हुए, जीजी (मंजुला) और अन्य स्नातिकाओं से कोठी वालों के दिमागी कीड़े और फितूर पर ताने कसती। पर ऐसा कभी नहीं हुआ कि संधि के सम्मुख या संधि को सीधे-सीधे किसी ने एक शब्द भी कड़ा कहा हो। इसलिए वह पूर्ववत् बिना किसी पूर्वाग्रह या कुंठा के स्नातिकाओं वाले धड़े के साथ उठती-बैठती। उसके भावुक व कोमल किंतु स-तर्क और स्वाभिमानी मन में आशंका और विरक्ति ने भी घर बनाना शुरू कर दिया। उसके बुखार के कारण उसे आश्रम के कई नियमों से छूट मिली हुई थी और निरंतर पूर्ववत् वह विशेषभाव सबके व्यवहार में पाती रही। चहकती तो वह यों भी कम थी, उस पर कई अनसुलझे प्रश्नों व तनावों से वह व्यग्रमन और उदास-सी हो गई। इसी बीच मंजुला के विवाह संबंध के लिए उसके परिवार वाले एक दिन सेना के एक उच्चाधिकारी और उसकी बहन व परिवार के साथ आए।


कोठी में ही मंजुला और उनका औपचारिक मिलना होना था। स्नातिकाएँ और मंजुला की बहनें उस दिन खूब चहकती दिख रही थीं। मंजुला को उस दिन रंगीन साड़ी में सादगी से बदली-बदली देख छोटी लड़कियाँ कमरे के बाहर दरवाजे पर झुंड बना झाँकने का अवसर नहीं खोना चाहती थीं। वार्डन वाले कमरे में ये सब तैयारी चल रही थीं। संधि के लिए इस अवसर का अर्थ था, मंजुला का सदा के लिए उसे छोड़ कर चले जाना। वह कातर-सी न हँसती, न बोलती, दीवार पर बाईं कनपटी टिकाए बस उस अंतर को रेखांकित होते कल्पना में देख रही थी, जिसमें जीजी और उसके बीच बातों, विषयों, स्थान, व्यक्ति आदि-आदि के अंतराल खड़े होने जा रहे थे। जहाँ मंजुला के भविष्य में उसकी कोई भूमिका न शेष रहने वाली थी। मंजुला ने दो-तीन बार उसकी उदासी को अपने भीतर भर लेने वाली निगाह से उसे देखा भी।


मंजुला का विवाह तय हो गया। दो महीने बाद की तिथि निकली। अर्थात् मंजुला को महीना-भर ही अब यहाँ और रहना था। शाम को संधि के कमरे में आकर मंजुला उसे अपने साथ लिवा ले गई। उसके लिए छिपाकर नाश्ता भी वहीं लाई। विमलेश ने भी कमरे में बैठी संधि को ढाँढस दी, गाल थपथपाया और हँसाने के लिए गुद्गुदी-सी की। जीजी ने भी गले लगाकर थपकियाँ दीं। हल्के गाजरी रंग की साड़ी में उनका साफ रंग गमक रहा था। पैर लटकाए बैठी जीजी संधि का सिर अपनी गोद में रखते हुए तख्त के एक सिरे पर सरक गईं ताकि वह लेटी रह सके। बहुत-सी उनकी साथिनें बाईं ओर पड़ते खिड़की के नीचे रखे और सामने वाले तख्त पर बैठी हुईं पता करने में लगी रहीं कि उसके होने वाले साहब कैसे हैं, क्या पूछा, क्या कहा, किसने क्या-क्या किया, क्या लिया-दिया गया, सास कैसी लग रही थी, ननद तेज तो नहीं लगी ? वॉर्डन भी राउंड के क्रम को वहाँ समाप्त करती हुई, छड़ हाथ में लिए जगह बनाकर वहीं पड़ गई। मंजुला का हाथ कई घंटे तक की इस पूरी बैठक में अनायास और अनजाने में भी संधि के बालों में सिर पर फिरता रहा।


अचानक तेज शोर-शराबे और दरवाजे के पीटे जाने की आवाजें आने लगीं। संधि हड़बड़ा कर जग गई। इस घबराहट में तेज बुखार से उस तरह उठने में वह पसीने से तर-बतर हो गई। अंधेरे में तेजी से आस-पास टटोलते समय तक भी उसकी तन्द्रा ने विचार का रूप न लिया था कि वह इस पर सोच पाती कि कहाँ है वह। अंधेरे में ही वह दोनों ओर की दीवार पर टिकी, टूटते और तपते शरीर को निढाल-सा डाल, बैठी-सी हो गई। ‘ रात के कितने बजे हैं और वह कहाँ है ’ तक की अभी उसकी सुध नहीं लौटी थी। दो-चार मिनट में उसे समझ लगा कि उसी का दरवाजा पीटा जा रहा है और बाहर कालेज की प्राचार्या (बड़ी जी’) सहित कोठी का कुछ स्टाफ और वॉर्डन के साथ कुछ भीड़ जुटी है और डंडे से ‘डॉरमेट्री’ में खुलने वाले कमरे के दरवाजे को पीटा जा रहा है। इसके साथ ही उसे यकायक सारी घटनाएँ याद आ गईं कि शाम को वहीं जीजी की गोद में शायद वह सो गई थी। उसके बाद का उसे कुछ पता न था। अब उसका विमलेश और मंजुला के कमरे में रात में पाया जाना, उसकी खाल उधेड़ने को पर्याप्त पाप की तरह था। काँपते हाथों से तख्त का किनारा पकड़ वह अंधेरे में नीचे उतर खड़ी हुई। पैर कँप-कँपा रहे थे, बुखार और डर से पसीने के फव्वारे छूट रहे थे, खड़ा होने की सामर्थ्य तक उसमें न थी। अब वह क्या करे - यही उसे सता रहा था। बाहर से बड़ी-जी’ और वॉर्डन के चिल्लाने व दरवाजा खोलने की दहाड़ों के बीच उसने अंततः बदहवास हो बहुत देर से हॉल में खुलने वाला दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खुलते ही चटाक-चटाक चार-छह हाथ उसके सिर, गालों और यहाँ-वहाँ जोर–ज़ोर से बरसे। वह गचका खाकर पीछे की ओर गिरी। हॉल के प्रकाश में उसने देखा कि वॉर्डन ने तुरंत आगे बढ़ कर पेड़ की मोटी टहनी वाली अपनी छड़ उस पर बरसाने को हाथ उठाया है और .....। जाने गिरती संधि में इतनी शक्ति कहाँ से आ गई कि गिरे-गिरे ही उसकी काँपती, तपती, मुर्दा बाँहों ने बाँए हाथ से वॉर्डन की साड़ी नीचे से खींच कर निकाल दी और सिर की मार से वॉर्डन को परे धकेलते हुए वह तख्त से पीठ सटाती ऊपर बैठ गई। इस औचक हमले के लिए कोई तैयार न था। सब उस ओर लपके। इतने में बरामदे की ओर के दरवाजे के खुलने की आहट के साथ ही मंजुला दी’, विमलेश और अन्य कई स्नातिकाओं ने एक साथ झुंड की तरह कमरे में प्रवेश किया और छत से लंबी तार में नीचे तक लटका बल्ब जला दिया। 


मंजुला का चेहरा तमतमा रहा था। वह अपनी छाती की ओर उंगली करते हुए लगातार सब की परवाह किए बिना चीख-चीख कर प्राचार्या, वॉर्डन और कोठी के स्टाफ के सामने ललकार रही थी। संधि की हिचकियाँ बंधी थीं, उसे कुछ पता नहीं कि मंजुला ने क्या कहा ; सिवाय इसके कि बोलते-बोलते वह संधि के पास आ खड़ी हुईं और संधि का सिर अपने से सटा लिया। संधि पर फिर बेहोशी छाने लगी थी..... कुछ आवाजें उसके कान में लगातार पड़ रही थीं या अवचेतन में से कोई स्वप्न-सा रूपाकार ले रहा हो.... जैसे। उसे अपने से चिपकाए मंजुला उस दिन इतना गरजीं कि सब चुपचाप सरक गए....। बाद में दो-तीन घंटे बाद होश आने पर देखा तो पाया कि तब तक अपने सब वहीं जमा थे । संधि समझ नहीं पाई कि मामला शांत हुआ तो कैसे? उसे बिना उस कमरे से निकाले सब चले कैसे गए ! मंजुला दी’ ने आखिर कैसे व क्या डपटा होगा उन्हें। उद्विग्नता से उठ वह बाहर जाना चाहती रही किन्तु सब ने रोक लिया। बस इतना पता चला कि अब कोई कुछ न कहेगा उसे। पर वह शाम संधि के भीतर आतंक की घोर छाया बन कहाँ-कहाँ से कौन-कौन-सा उजाला छीन ले गई .... इसका पता जीवन की किसी किताब में दर्ज न हुआ। 


हुआ यों था, कि शाम को संधि मंजुला दी’ की गोद ही में सो गई। जब खाने की घंटी बजी तो उसे वहीं सोता छोड़कर सब खाना खाने चले गए। सदा की तरह जाते समय बाहर से ताला भी लगा दिया गया, जैसा कि हर कमरे वाले सदा से करते आए थे। अब किसी ने कोठी तक खबर पहुँचा दी कि अंधेरे में मंजुला वाले कमरे के अंदर संधि है। कमरे के दो दरवाजे होने के कारण खुद को बाहर ताला लगाकर भी अंदर बंद कर लेना बहुत आसान था कि बरामदे वाले दरवाजे को बाहर से ताला लगाकर कोई हॉल वाले दरवाजे से अंदर आ जाए और फिर उस दरवाजे को अंदर से बंद कर ले। देखने वालों को पहली नजर में कमरे में किसी के न होने का ही प्रमाण मिलेगा। दूसरी तरफ डायनिंग में रोज की तरह बाकी स्नातिकाओं के साथ मंजुला को खान-पान व्यवस्था का निरीक्षण करते न पाने पर वॉर्डन ने संधि के साथ अंधेरे में मंजुला का कमरे में बंद होकर छिपे होने का अनुमान लगा लिया था। जबकि मंजुला अपनी उदासी के कारण उस दिन व्यवस्था देखने वालों में खड़ी ही नहीं थी, वह जमीन पर बिछी जूट की पट्टियों में लड़कियों की भीड़ के साथ ही बैठी रही थी। वॉर्डन की किसी ईर्ष्या ने तुरंत बदला लेने की योजना बना डाली थी। बातों-बातों में प्रसंग छिड़ने पर, 35 से 55 वर्षीय अध्यापिकाओं में से एक ने, बाद में बताया था, कि उसकी उपस्थिति में ही वॉर्डन ने कोठी में कहा था - ‘‘ हम तो एक तख्त पर भी आराम से नींद नहीं निकाल पाते, पर पता नहीं मंजुला और संधि एक तख्त को कैसे साँझा करती हैं, जैसे अभी ’’ और यह कह वह खिलखिला पड़ी थी।



***

संधि ने मुझे हॉस्टल की इस घटना के बाद अपने निरंतर दुःख और चिंता में डूबते जाने की कई बातें सुनाईं। सबसे अधिक डर उसे अपने अकेले हो जाने वाली संभावना से लगने लगा था। साथ ही मंजुला के चले जाने पर सहारा छिन जाने की पीड़ा से भी वह भरती चली जा रही थी। इन आशंकाओं, तनाव, भय, पीड़ा जैसी अलग-अलग कई तरह की मनःस्थितियों से त्रस्त वह केवल आँसू बहाया करती और छटपटाती।


***


अंततः मंजुला के जाने का दिन भी आ गया। उसका भाई उसे लिवाने आ पहुँचा था। अगले दिन मंजुला दी’ को लेकर उसे लौटना था। मंजुला ने संधि को ढाँढस बँधाती चली आने वाली बातों के अपने क्रम में दोपहर में उसे फाटक के बाहर (पर आश्रम के परिसर में ही बने) कॉलेज में बुला लिया। दोपहर की दो कक्षाओं के बाद, जब सब लड़कियाँ फाटक के अंदर लौट गईं, तब मंजुला और संधि वहीं बगीचे में पेड़ की ओट में बैठ गईं। आज सखियों की विदाई का दिन था। संधि को जीवन में अब कभी इस तरह साथ न रह पाने का दुःख साल रहा था, उसके लिए उसके जीवन के एक चरण का अंत था वह दिन। दोनों गले लगी घंटों रोती रहीं। 


उनका भाई 4 बजे के आसपास एक बार बहन से मिलने पता करता वहाँ तक आया तो उसके बाद जीजी ने संधि को सावधान होकर एक बात सुनने को तैयार किया। जो कुछ जीजी ने संधि को अपना ध्यान रखने का निर्देश देते हुए बताना चाहा वह संधि की समझ से ऊपर की चीज थी। तब उन्होंने साफ-साफ शब्दों में एक घटना का उदाहरण दिया। वॉर्डन अक्सर उनके कमरे में सामने वाली खिड़की के नीचे पड़े तख्त पर सो जाया करती थी, अक्सर यह कहती हुई कि ‘‘चलो, अब 4-5 घंटे की तो बात है, तड़के उठकर 4 बजे घंटी बजवानी है, तो अब क्या अपने कमरे में बोर होने जाया जाए, यहीं सो जाती हूँ, बिस्तर तो खाली पड़ा ही है यहाँ ’’। सप्ताह में दो-तीन बार से भी ज्यादा ऐसा होता रहता अक्सर। विमलेश के छुट्टी लेकर घर चले जाने वाले 15 दिन तो लगातार वॉर्डन वहीं सोती रही। एक दिन नींद में दम घुटने जैसा लगने पर मंजुला की अपने बिस्तर पर वॉर्डन को पा, नींद टूटी। वह बड़े पागलपन में मंजुला के होंठ अपने होंठों में जोर से दबाए उसकी देह से लिपटी, लगातार उसे भींच रही थी। एक टाँग, सोती मंजुला की उघाड़ दी गई टाँगों पर और दूसरी, टाँगों के नीचे फँसाने की बेचैन जिद में उसने तुरंत अपना बाँया हाथ मंजुला के होंठों पर रख कर मुँह दबा दिया। ऐसा करते हुए वॉर्डन ने अपनी गर्दन उठाई व कुहनी पर टिक, सारा हाथ का जोर मुँह दबाने में लगा दिया ; उस पर उसकी देह के बोझ से भी साँस लेने तक को तड़फड़ाती मंजुला न डरी, न काँपी, बस आग-बबूला होकर घुटने को तेजी से मोड़ उसने वॉर्डन की पकड़ को टाँगों से ढीला किया तो वॉर्डन ने झटके से मंजुला की कुरती (ढीला कुरतेनुमा ब्लाउज़) में दाहिना हाथ डाल दिया। यही वह क्षण था जब उसकी कोहनी की टेक कमजोर हुई और मंजुला ने उसे परे धकेल दिया तथा स्वयं दरवाजा खोल बाहर की ओर भाग ली। आँगन में पत्थर के बिछे पाट पर हाँफती आकर बैठ गई। तभी कुछ देर बाद पीछे से वॉर्डन ने आकर सामने खड़े हो, हाथ-जोड़ कहा - ‘‘माफ कर देना, पता नहीं कैसे मुझे होश नहीं रहा। किसी से कहना मत, पैर पड़ती हूँ, मारी जाऊँगी, कोई नहीं है बाहर संसार में मेरा, निकाल दी गई तो कहीं जाने की जगह नहीं, माफी दे दे ’’। यह कह तत्क्षण वहाँ से चली गई।


संधि ने मुझे बताया कि मंजुला से इस घटना को जान कर भी उसके अर्थ से वह एकदम अनजान और कोरी रही। हाँ, मंजुला के, किसी को पास न फटकने देने के, आदेश के प्रति संधि ने उसे निश्चिंत कर दिया। इस घटना को सुनने-सुनाने के बाद मंजुला और संधि दोनों अपने आँसू भूल गईं। मंजुला का मन एक रूखेपन व कड़ाई से भर चुका था और संधि का तो वहाँ से तुरंत भाग जाने की जुगत लगाती स्तब्धता में। अंत में मंजुला ने उसके बाबा को तुरंत पत्र लिखकर उसे आश्रम से वापिस बुला लेने के अपने निश्चय की बात बताई और संधि से वादा लिया कि बाबा या किसी और को कभी मत कुछ बताना। ‘‘ मैं तुम्हारे बुखार के कारण वहाँ से ले जाने को उन्हें कहूँगी और कोठी वालों से भी ऐसा पत्र अपनी उसी धमकी के जोर पर लिखवाने की बात करती हूँ ’’। दोनों फिर गले मिलीं और हाथ थामे आश्रम के अंदर लौट आईं। 


रात-भर जीजी का सामान बाँधे जाता देखती संधि की विस्फारित आँखे सूखी पड़ी थीं, वह निरंतर मानो अपने ऊपर होने वाले किसी शिकारी के आक्रमण की आशंका में बचाव के तरीके सोचने में जुटी थी। तड़के जीजी उसका माथा चूम और गले मिल सदा के लिए छोड़ चली गईं। महीने-भर बाद उनके विवाह के आसपास की तिथियों में संधि अपने तेज बुखार में तपती वॉर्डन के कमरे में बैठे डॉक्टर को दिखाने ले जाई गई। थर्मामीटर में बुखार 107 डिग्री से ऊपर निकला। उसे थामकर लड़कियों ने बिस्तर पर लिटाया, तो आठवें दिन उसने होश आने पर आँखें खोलीं। बाबा तीन दिन से, उसके होश में आने पर उसे सदा के लिए साथ ले जाने, आए पहुँचे थे। उन्हें संधि के बेसुध हो जाने पर तार देकर बुलवा लिया गया था और मंजुला का पत्र भी उससे कुछ दिन पहले उन्हें मिल गया था।


***

संध्या (संधि) के जीवन का यह प्रकरण यहीं पूरा हुआ। इतना-भर तुम्हारी फिल्म की कथा के लिए फिल्माया जाना तय हुआ था। मुझे तो क्योंकि आश्रम के पहरावे आदि का कोई अनुमान तक नहीं था, इसलिए संधि को ही उसके अपने निरीक्षण में तैयार करवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, जिसे उसने बड़े यत्न से पूरा भी किया। .......... लेकिन इसी बीच बुखार में कार चलाते हुए हुई दुर्घटना में उसका न रहना, शायद उस वचन का पूरा होना था, कि `वह किसी को कभी कुछ नहीं बताएगी ’।



तुम्हारे पिछले पत्र से पता चला था कि फिल्म की शूटिंग पूरी हो गई है और स्टूडियो में एडिटिंग, डबिंग और ऑडियो आदि के काम अपने अंतिम चरण में है। तुमने मुझसे संधि का चित्र भी माँगा था, ताकि फिल्म उसकी स्मृति को समर्पित की जा सके। उसका चित्र डाक से भेज रही हूँ। और ‘इंट्रो’ में संधि पर पाँच मिनट कुछ कहने के लिए मैं अपनी आवाज भी देने की तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूँगी। लिखना, कि मुझे कब लंदन पहुँचना होगा ?

 - कविता वाचक्नवी
लंदन 






























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