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बुधवार, 6 नवंबर 2024

क्या अमेरिकन समाज स्त्रीविरोधी है? : (डॉ.) कविता वाचक्नवी

क्या अमेरिकन समाज स्त्रीविरोधी है? :  (डॉ.) कविता वाचक्नवी

अमेरिका के चुनाव परिणाम की मेरी भविष्यवाणी पुनः सत्य हुई। लोग मुझे पूछते और बहुधा हँसते भी हैं कि मैं फलित ज्योतिष को तो मानती नहीं, फिर किस आधार पर भविष्यवाणियाँ किया करती हूँ और वे कैसे सत्य भी हो जाती हैं। तो ऐसे लोगों के लिए मेरा उत्तर है : समाज के मनोभावों, उस के सुख दुःख, उस की सोच तथा उस के मनोविज्ञान की मेरी कुछ–कुछ समझ के सहारे ही यह सम्भव होता है और शेष ईश्वर की कृपा से।

 अमेरिकन चुनावों पर 2016 से अब तक तीसरी बार जो भविष्यवाणी मैंने की उस की पृष्ठभूमि बताती हूँ। जो बात मैं कहने जा रही हूँ, मेरे उस आकलन / निष्कर्ष को पढ़ लोगों को आश्चर्य होगा और असहमति भी; किन्तु आधुनिक सामाजिक मनोविज्ञान का एक सत्य जानना हो तो इसे ठीक से समझना ही होगा।

 मुझे 90 के दशक से अब तक यूरोप, यूके और अमेरिका के समाज में रहने का अवसर मिला है, या कहें कि अनुभव प्राप्त हैं, अतः इस अत्याधुनिक समाज में रहते हुए इन की सम्वेदना, सोच तथा समझ के अलिखित सत्य का बहुत ठीक आभास भी मुझे प्राप्त है। उसी आधार पर यह तथ्य बताना समीचीन और आवश्यक भी है कि क्यों और कौन स्त्रियाँ / पुरुष / समाज अपना क्या भविष्य बनायेंगे।

जिन लोगों को लगता है कि अमेरिकन जनता महिला राष्ट्रपति को नहीं स्वीकार सकती इसलिए हिलेरी या कमला हारीं ; उन की समझ गलत है। वास्तविकता यह है कि (जैसा कि मैंने लगभग 5–6 वर्ष पूर्व लिखा भी था) यॉरोप तथा अमेरिका आदि देशों में फ़ेमिनिज़्म खोटा सिक्का हो चुका है, जो महिलाएँ, समूह अथवा वर्ग/दल/संगठन या व्यक्ति ऐसी मानसिकता के हों या इस के पक्षधर हों, वे पिछड़े और यहाँ तक कि वे कम आईक्यू के / या थोड़े मूर्ख माने जाते हैं। बहुधा इसलिए; क्यों कि फेमिनिज्म का सत्य फेमिनिस्टों ने उघाड़ कर दिखा दिया है। इन देशों में फेमिनिज्म को समूचे सामाजिक अध: पतन का मूल समझा जाता है अब, और निजी स्वार्थों की इच्छापूर्ति का हिंसक माध्यम भी।

यह तथ्य भले ही कहीं लिखित रूप में या उद्धृत रूप में उपलब्ध नहीं है, किन्तु है यही सत्य। समाज फेमिनिज्म को एक ऐसी प्रवृत्ति मानता है जो राक्षसत्व के तुल्य है और जिस ने समाज, परिवार तथा सम्बन्धों को नष्ट किया है। अतः समाज उन स्त्रियों को तथा उन समूहों को स्वीकार नहीं करता जो फेमिनिज्म की राह पर हों और पुरुषों को अपनी उस सोच के कारण नकारती हों। 

 इस के विपरीत निजी जीवन में जो जितनी स्त्रियोचित हैं, उन की समाज स्वीकार्यता उतनी अधिक है। आप इस के उदाहरण यहाँ के समाज और घरों में तो स्वाभाविक है दूर से नहीं देख सकते, किन्तु अमेरिका तथा यॉरॉप की राजनीति में तो कहीं से भी देख सकते हैं। 

कई अन्य तथ्यों के अतिरिक्त यह बड़ा तथ्य इन परिणामों की पृष्ठभूमि में बहुत बड़ा कारक था। कुछ और कारक भी थे, उन का उल्लेख कभी फिर समयानुसार करुँगी 

यह सत्य बताना इसलिए आवश्यक प्रतीत हुआ ताकि भारतीय समाज में जो स्त्रियाँ फेमिनिज्म का झण्डा उठा स्वयं को आधुनिक समझती हैं, वे अपना आकलन कर सकें और उन्हें अपनी वास्तविकता तथा भविष्य समझ आ सके। 
दूसरा कारण इसे लिखने का यह है कि जो लोग मेरी की भविष्यवाणियों पर प्रश्न करते हैं, उन्हें मेरी सामाजिक तथा मानवीय चित्त की समझ इस के मूल में है, यह पता लग सके।
– ✍️डॉ. कविता वाचक्नवी©

शुक्रवार, 30 जून 2023

पाककला की चुनौती और टमाटर : कविता वाचक्नवी

टमाटर बारहमासी फसल नहीं है। 🍅🍅🍅

जब हम भारत में रहते थे तो लहसुन–प्याज न खाने के चलते हमारे यहाँ टमाटर के अधिक प्रयोग की अनिवार्यता थी। जो लोग प्याज खा लेते हैं, उन्हें वैसे भी टमाटर की अनिवार्यता कुछेक भोज्य पदार्थों के लिए ही होती है। मैंने क्योंकि स्वयं अधिकांश फसलें अपने हाथ से बोई, उगाई काटी हैं अतः एक–एक फल, एक –एक फली, एक–एक कन्द, व एक–एक शाक की प्रत्येक इकाई का महत्व तथा प्रतीक्षा से परिचित हूँ। उन के हमारी इच्छानुसार उग कर तैयार न होने का अर्थ उगाने वाले का दोष नहीं, अपितु प्रकृति व पर्यावरण का चक्र, नियम तथा सन्तुलन है। 

ऐसे में जिन दिनों टमाटर की फसल नहीं होती थी, या मण्डई में नहीं मिलते थे तो गृहणी के रूप में जो–जो उपाय करती थी, उन्हें पाठकों की सहायता के लिए साझा कर रही हूँ। 

(प्याज–लहसुन न खाने–पकाने के चलते मेरी गृहस्थी में प्रतिदिन  बड़े आकार के सात–आठ टमाटर शाक–दाल हेतु बारहों माह चाहिए होते थे)। ऐसे में विकल्प दो–तीन थे। गृहणियों को बिना हाय–तौबा मचाए शान्ति से अभाव को भी भाव से पूर लेने का गुण अनिवार्यतः बनाए रखना चाहिए। यह हमारे ही पारिवारिक सम्मान का कारक बनता है। तो आइए, मेरे अनुभव से आप को कुछ लाभ मिले तो इन्हें अपना सकते हैं –

कोकम
दक्षिण में गहरे लाल रंग का एक बहुत खट्टा फल आता है, जिसे कोकम कहते हैं। उस का खट्टा–सा शरबत भी बाजार में मिलता है।  इस कोकम की सूखी लाल–भूरी फाँकें बिकती हैं। जिस किसी में डाल दें, खटाई और रंग देती हैं। मैं सदा उन्हें घर में रखती थी। जिस किसी दिन टमाटर घर में समाप्त हुए, उस दिन दाल को कोकम तथा अदरक डाल कर उबाला व फिर बघारा करती थी। कोकम आज भी मेरी गृहस्थी में सदा रहता है। यहाँ तो उस की दीर्घावधि तक सुरक्षित रहने वाली गीली फाँकें उपलब्ध हो जाती हैं।

साबुत लाल मिर्च
सूखी साबुत लाल मिर्च भी टमाटर के अभाव में काम आती है। आप को अधिक मिर्च नहीं रुचती तो आप प्रत्येक मिर्च को तोड़, उस के बीज व दाने बाहर निकाल अलग प्रयोग हेतु सहेज लें तथा छिलके को पानी से धो, कुछेक छोटे–छोटे टुकड़े कर लें, जैसे एक लम्बी मिर्च हो तो चार–छह टुकड़े हो सकते हैं। उन्हें अलग से उबाल कर, पानी से निकाल दाल या शाक में ऊपर से मिला दें तो टमाटर के लाल रंग का आभास देंगी। उबालने से बचा हुआ पानी भी स्वादानुसार मिलाया जा सकता है। ऐसे में टमाटर की खटाई की कमी पूरी करने हेतु अमचूर प्रयोग करें।

इमली का अवलेह
बाजार में इमली का बिना गुठली–डण्ठल का तैयार अवलेह उपलब्ध होता है। मेरी गृहस्थी में वह सदा रहता आया है। उसे भी रंगत तथा खटाई हेतु, विशेषतः साम्भर हेतु प्रयोग करती आई हूँ।

इन उपायों से सम्भवतः आप भी अपनी गृहस्थी और चौके को अभाव रहित तथा अनवरत चला सकते हैं।
–✍🏻 कविता वाचक्नवी


मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

ऐतिहासिक ध्वंस और पुनर्निर्माण : (डॉ.) कविता वाचक्नवी

 2-3 सौ वर्ष पूर्व आई औद्यौगिक क्रान्ति के साथ पश्चिम में साईंस और रिलीजन दो हुए, और रिलीजन के फंदे से कुछ लोग बाहर निकले तथा कुछ आधुनिक होने लगे अन्यथा रिलीजन वालों का उस से पूर्व के लगभग 17-अठारह सौ वर्ष कितना भयंकर कुत्सित एवं क्रूर रूप था, इस का अनुमान आज के आतंकी को देख कर भी आप नहीं लगा सकते। एकदम जंगली, नृशंस और हत्यारा समाज था।

केवल स्त्रियों के प्रति सभी प्रकार के आत्यन्तिक अमानुषिक व्यवहार की ही परत खोलें तो उस समाज की पारिवारिक व पंथानुगत संरचना का कलुषित रूप देखा–सोचा न जा सकेगा। साईंस इसीलिए रिलीजन की शत्रु बनी। उन आत्यन्तिक अमानुषिक कदाचारों व नृशंसताओं के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के चलते तुलनात्मक सन्दर्भों में उस क्रूर काल के घटनाक्रम को पितृसत्तात्मकता के रूप में परिभाषित किया गया। वह अपने समाज पर उन के अपनों का दोषारोपण था।

दुर्भाग्यवश भारत के कुपढ़ों ने, जिन्हें इस पश्चिमी समाज की तत्कालीन संरचना, इतिहास व वास्तविकता का रञ्चमात्र भी अनुमान नहीं, पता होना तो दूर; उन्होंने यहाँ के वर्तमान से सारे आरोप अपने समाज पर आरोपित कर लिए, यहाँ पश्चिम के आयातित विमर्शों, चिन्तन, मुद्दों, बहसों को ज्यों-का-त्यों अपना बना-कह-समझ-लिख कर । इस से बड़ा, क्रूर विद्रूप कोई अन्य नहीं हो सकता था।

जिन मूर्खों को यहाँ के घटनाक्रम, इतिहास, संरचना, समाज का आभास तक नहीं था, वे अपने अन्धे दीदों के मारे अपना अभिशाप समूची भारतीय संस्कृति के मत्थे मढ़ झूठे गवेषक बन गए। और कई भारतीय पीढ़ियाँ अभिशप्त रही हैं इस तथाकथित गवेषणा को ढो अपनी पीठ रक्तिम करते। पितृसत्तात्मक क्रूरता पश्चिम के समाज का इतिहास व अभिशाप थी।

यदि भारतीय इतिहास को ठीक से पढ़ा-जाना होता, और पश्चिमी समाज के इतिहास की वास्तविकता का किञ्चित भी आभास होता तब तो कोई समझ पाता कि रजकण की सूर्य किरण से क्या तुलना ? किन्तु भारतीय समाज के साथ अपने अज्ञान और धूर्ततावश किए इस दुराचार को करने वालों ने जो जघन्य अपराध किया है, उस की गम्भीरता का 1% भी अनुमान आज संस्कृति- संस्कृति चिल्लाने वाले तथाकथित पढ़े-लिखों तक को नहीं है।

हतभागी हैं ये सब पीढ़ियाँ और हतभागी है हमारा क्रीत समाज। ऐसा भयंकर पाप किया गया है। और ऐसा करने वाले अभी चुके नहीं हैं, वे निरन्तर अजस्र उन्हीं स्खलनों में स्वयं भी रत हैं और अन्यों को स्खलित करने की कुचेष्टाओं में भी निमग्न।

इधर भारतीय समाज है कि उसे इस लूट व कदाचार का कोई अनुमान ही नहीं, वह जरा-सी राजनैतिक जीत को ही अपनी परम संतुष्टि का माध्यम व ध्येय मान लेता है, या जरा-सी छुटपुट गति बढ़ने को अपनी परम विजय। ऐसे लोगों का यह जानना अत्यावश्यक है कि आप देश व संस्कृति के साथ खड़े हैं तो यह युद्ध तो अभी पूरा शेष है। युद्ध क्षेत्र में अभी तो आप पूरे डटे तक नहीं हैं। युद्ध अभी शेष हैं, विजय तो उस के बहुत बाद होगी और विजय के बहुत पश्चात् फिर ध्वंस का अनुमान लगाया जाना होगा; तब कहीं जा कर पुनर्निर्माण के कार्यों की नींव रखी जा सकेगी।

इतना धैर्य है न ? नहीं है तो सीखिए अन्यथा विश्व में अन्य कोई शक्ति नहीं है जो उस वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर को खोज या बचा सके। वह धरोहर विलुप्ति की सीमा पर है और विश्व इतिहास आप को व हमें कभी क्षमा नहीं करेगा, किञ्चित नहीं, कदापि नहीं।
© - कविता वाचक्नवी

बुधवार, 28 अप्रैल 2021

कोरोना टीके से जुड़ी वह भूल जिस ने आप को आत्महन्ता बनाया : डॉ कविता वाचक्नवी




भारत में कोरोना बहुत विकराल अवस्था में है। वहाँ उस के विकराल होने के चार मुख्य कारण हैं। उनका उल्लेख करना इसलिए अनिवार्य लग रहा है क्योंकि उनमें से तीन अभी भी आम जन हेतु आत्मरक्षा में प्रासङ्गिक हैं।
  1. - अनुशासनहीनता, आत्म-नियन्त्रण का अभाव
  2. - कोरोना को राजनीति का हथियार समझ कर प्रयोग करने वालों द्वारा जन-मानसिकता-निर्माण की कुचाल (इस पर यहाँ सार्वजनिक रूप में लिखना नहीं चाहती। यदि किसी को वास्तव में जनहितकारी भाव में विस्तार से समझना हो तो निजी स्तर पर बतला सकती हूँ)
  3. - नीम-हकीमी वाला दम्भ
  4. - वैक्सीन व वैक्सिनेशन (टीका व टीकाकरण) को ले कर दो स्तर का भ्रम व अज्ञानता
अन्तिम बिन्दु के अतिरिक्त शेष सभी स्वतः स्पष्ट जैसे हैं। चौथे बिन्दु पर कथित पढ़े-लिखों को भी कुछ नहीं पता यह निरन्तर देखने में आ रहा है। अतः टीके से जुड़े तथ्यों को समझ लेना अनिवार्य है -
  • 4 (क) - पहले तो भारत में लोगों ने यह गलती की कि वे टीके को हौव्वा समझते रहे
  • 4 (ख) - विरोध की राजनीति व दुकान करने वालों ने खूब बरगलाया कि सरकार नपुंसक बनाना चाहती है, इसलिए टीका दे रही है। राजनैतिक आकाओं द्वारा यह भी कहा गया कि टीका हानिकारक है, हम तो नहीं लेंगे, न कोई और ले। इस कारण टीकाकरण खुल जाने के बाद भी लोगों ने उचित नहीं समझा कि जा कर टीका लगवा लें। उनके मूर्खतापूर्ण प्रचार ने कितनी हत्याएँ की हैं कि गणना नहीं।
  • 4 (ग) - उपर्युक्त सब कुछ कर चुकने के बाद अन्ततः जैसे-तैसे जब लोगों ने टीका लगवा लिया, तो उसके साथ ही एक अन्य भूल हुई। उसी के स्पष्टीकरण हेतु आज यह सब लिखना आवश्यक लगा क्योंकि आज से 18 वर्ष तक के सभी लोगों के लिए टीके का पञ्जीकरण खुल गया है। कृपया इसे ठीक से समझ लें ताकि टीके के पश्चात् स्थिति निम्नतर न हो।
बचना यह समझने से है कि यह टीका बुखार या अन्य रोगों के टीके की भाँति कार्य करता है। नहीं, कदापि नहीं। वे टीके दवा को टीके के रूप में देकर तुरन्त प्रभावी होते हैं और यह टीका वस्तुतः चेचक व तपेदिक आदि के टीके की भाँति है, जो प्रतिरक्षा प्रणाली में परिवर्तन करता है और 'एण्टीबॉडी' का निर्माण करता है। उन एण्टी बॉडी के निर्माण की प्रक्रिया को सक्रिय करने के लिए टीके के द्वारा उसी रोग के विषाणु/जीवाणु आदि मनुष्य के भीतर सुरक्षित प्रक्रियानुसार प्रविष्ट करवाए जाए हैं ; यह सुनिश्चित करने वाले अवयवों के साथ, कि देह पर रोग का प्रकोप न हो व वह कोरोना के बाहरी प्रक्षेप से बचने के लिए 'एण्टी बॉडीज़' निर्माण करने लगे ताकि समय आने पर प्रतिरक्षा-प्रणाली उनका प्रयोग कर स्वयं को बचा सके। यह कुछ-कुछ विष को विष द्वारा मारने के सिद्धान्त पर कार्य करता है। जैसे तपेदिक और चेचक आदि के टीके में तपेदिक व चेचक के जीवाणुओं का प्रयोग किया जाता है।

अतः जब कोरोना का टीका लगता है, या लगेगा तो उस के पश्चात् हमारा प्रतिरक्षा तन्त्र टीके के माध्यम से सुरक्षित प्रक्रिया द्वारा प्रविष्ट हुए उस वायरस के विरोध में सक्रिय हो जाता है व उस से लड़ने के लिए एण्टीबॉडीज बनाने में लग जाता है ताकि अवसर आने पर वह कोरोना से युद्ध जीत सके। बाह्य स्तर पर प्रथम टीके के पश्चात् प्रारम्भ होने जा रही इस प्रक्रिया का अधिकांश को पता नहीं चलता क्योंकि मेडिकल ने इसे स्वास्थ्य-सुरक्षा मानकों के अनुरूप ही बनाया है। दूसरे टीके के पश्चात् अधिकांश को बुखार आदि आना उसी का परिणाम है। जो यह बताता है कि हमारा प्रतिरक्षा तन्त्र बहुत प्रभावित हुआ है और भीतर काम जारी है।

वस्तुतः टीका लगने के बाद हमारा प्रतिरक्षा तन्त्र (इम्यून सिस्टम) टीके के माध्यम से कोरोना का जो सुरक्षितअंश 'एण्टीबॉडीज़' निर्माण के उद्देश्य से हमारी देह में भेजा गया है, उस के प्रभाव में होता है, एक प्रकार का परिवर्तक युद्ध लड़ रहा होता है। अतः पहले टीके के बाद हमारी इम्यूनिटी (साधारण शब्दों में इसे सुरक्षा-बल कह सकते हैं) अल्प काल के लिए कम हो जाती है। दूसरा टीका लगने के बाद तो हमारी इम्यूनिटी एक प्रकार से और भी कम हो जाती है क्योंकि वह भीतरी परिवर्तनों के लिए युद्दहस्तर पर व्यस्त होती है। इसलिए वह किसी भी बाहरी दबाव या लापरवाही को नहीं झेल सकती। इम्यूनिटी को पूरा सामान्य होने व युद्ध जीत कर वापिस लौटने में (दूसरे टीके के पश्चात् ) कम-से-कम दो माह और लगते हैं। यदि आप को दो टीके नियमानुसार लग गये, आपने अनुशासन आदि का पालन किया तो कोरोना यदि कभी हुआ भी तो रोग की उग्रता व गम्भीरता कम होगी, कम-से-कम आप तब मरेंगे नहीं, ऐसा डॉक्टर बताते हैं।

इसलिए पहले टीके से लेकर दूसरे टीके के दो माह पश्चात् तक विभिन्न अनुपातों में हमारा सुरक्षा-तन्त्र एकदम कमजोर व भीतरी युद्ध में लगा हुआ होता है। ऐसे में किसी भी प्रकार की न्यून-से-न्यून लापरवाही भी बहुत भारी पड़ जाती है। जिन लोगों ने पहला व/या दूसरा टीका लग जाने के उपरान्त अनुशासन नहीं रखा व टीका लगते ही "हुर्रे,चलो अब तो पार्टी करें" वाला आचरण किया वे सब धरे-दबोचे गए और इसीलिए भारत में स्थितियाँ बिगड़ गईं। जब कि बार-बार बताया जा रहा था कि टीकाकरण के पश्चात् भी उन सब नियमों व अनुशासनों को मानना-अपनाना पड़ेगा जो गत वर्ष से कोरोना के सन्दर्भ में बार-बार समझाए जाते रहे हैं। बल्कि पहले से प्रारम्भ कर दूसरे टीके के कम-से-कम दो सप्ताह बाद तक तो आप स्वस्थ मनुष्य से बहुत कमतर स्थिति में होते हैं क्योंकि संक्रमण की आशंका इस समय सामान्य से भी अधिक होती है। तत्पश्चात् वह धीरे-धीरे सामान्य होने लगती है व दो माह उपरान्त एकदम सामान्य हो जाती है। दूसरे टीके के दो सप्ताह उपरान्त और फिर दो महीने बाद आप क्या-क्या कर सकते हैं और क्या-क्या तब भी प्रतिबन्धित रहेगा इसे ठीक से जानना अनिवार्य है। सभी मेडिकल बुलेटिन में इसे बताया जा रहा है। जिन्हें समस्या हो, उनके लिए मैं भी उन बातों को समझने में सहायता कर सकती हूँ ।

पहले से प्रारम्भ कर दूसरे टीके के कम-से-कम दो सप्ताह बाद तक तो आप स्वस्थ मनुष्य से बहुत कमतर स्थिति में होते हैं और संक्रमण की आशङ्का इस समय सामान्य से भी अधिक होती है। क्योंकि देह का इम्यून सिस्टम टीके द्वारा प्रविष्ट हुए अवयवों से होते परिवर्तनों से युद्धस्तर पर जूझ रहा होता है। दो महीने लगते हैं उसे उबरने में। अतः इस अवधि की लापरवाही कष्टकर हो सकती है।              - इसी लेख से 

आपकी देह में स्थिति आपका सुरक्षाबल पहले टीके से ले कर दूसरे टीके के दो माह पश्चात् तक एक भीतरी परिवर्तक युद्ध में स्वयं को झोंके हुए होता है। इसलिए उसे बाहरी शत्रुओं से बचा कर रखना अनिवार्य है। अन्यथा वह इस युद्ध में आपकी देह की रक्षा नहीं कर सकेगा। यह निश्चय आप को करना है कि आप अपनी देह को ध्वस्त होते देखना चाहते हैं अथवा स्वस्थ। निर्णय आपका : लाभ हानि आप की व आप के अपनों की।

रविवार, 14 फ़रवरी 2021

अहिंसा तथा हिंसा : डॉ. कविता वाचक्नवी

अहिंसा तथा हिंसा :   डॉ. कविता वाचक्नवी



अहिंसा क्या है, जानने से पहले जानना होगा कि हिंसा क्या है। क्योंकि, 'अहिंसा' स्वतन्त्र शब्द नहीं, अपितु 'हिंसा' का निषेधात्मक शब्द ही है। आगे बढ़ें, उस से पूर्व बलपूर्वक कहना अनिवार्य है कि समाज में सभी को कम-से कम यह अवश्य समझना चाहिए कि सर्वाधिक हिंसक समाजों को, आतंकवादियों को सर्प्रथम 'अहिंसा' पढ़ाई जानी चाहिए।

जो समाज आत्मरक्षा तक के लिए समर्थ नहीं, या उद्यत नहीं, या उग्र नहीं, या तत्पर नहीं, उसे या उन लोगों को आत्मरक्षा के लिए समर्थ होने या युद्धक होने का निषेध कर, निष्क्रिय करना, अहिंसा नहीं, अपितु हिंसा है ; क्योंकि ऐसा कर हम उन्हें मारे जाने के लिए उकसा रहे होते हैं। और ठीक वही अपराध कर रहे होते हैं, जिस अपराध का दण्ड आत्महत्या के लिए उत्प्रेरित करने के फलस्वरूप दिया जाता है।
वैसे अहिंसा का नाम लेने वालों को अहिंसा का वास्तविक अर्थ नहीं पता होता, वे उसे किसी शारीरिक क्रिया तक सीमित मानते हैं।

वस्तुतः हिंसा का वास्तविक अर्थ है - वैर भाव से प्रेरित हो मन, वचन, या कर्म से कुछ भी करना। और इस से भी बढ़ कर यह जानना आवश्यक है कि हिंसा / अहिंसा केवल मनुष्य के प्रति ही की जा सकने वाली क्रिया नहीं है। पशुओं, प्राणियों, वनस्पतियों, संस्कृतियों, विचारों, सुखों, इतिहास, कलाओं आदि किसी को भी दु:ख, क्षय, या हानि पहुँचना, छीनना आदि हिंसा हैं।

इसलिए अहिंसा की आड़ में अपने मनचाहे लाभ / स्वार्थ की इच्छा की पूर्ति व्यापक हिंसक मनोभाव व व्यवहार है।
अहिंसा शब्द देने वाले ऋषियों की बात के वास्तविक अर्थ को छोड़, अपने मनचाहे अर्थ में उसे बताना-कहना, बड़ा स्वार्थ और विष है, हिंसक व्यवहार व ही सके क्रिया है।

सेना का पराक्रम, राम की शक्ति पूजा या कृष्ण, चाणक्य की कूटनीति की परम्परा आदि हिंसा नहीं हैं।
अहिंसा का नाम लेकर अपनी जीभ के स्वाद के लिए पशुओं का वध करना विश्व की सबसे बड़ी, व्यापक व क्रूर हिंसा है। तत्पश्चात् आतंकवाद व हिंसक प्रजातियों का मज़हबी उन्माद व तलवार का शासन या गैस चैम्बर, और उस से भी बढ़कर हिंसा के उदाहरण जानने हों तो वर्ष 2017 में प्रो. स्टीफन कोटकिन्स द्वारा 'वॉल स्ट्रीट जरनल' में उनका शोध पढ़ें।

साम्राज्य के विस्तार या मज़हबी उन्माद ने विश्वमानव का जो क्षय किया है, उसे कभी स्वीकार न करना अहिंसा ही है क्योंकि स्वीकार न करने वाला ही हिंसक का असमर्थन कर रहा होता है। हमें हिंसक की हिंसा का निषेध करने में सक्षम बनना होगा, ताकि हिंसा समाप्त हो सके।

भारतीय वैदिक समाज ने जिस अहिंसा की संकल्पना दी, वह निर्वैरता व अकारण किसी भी प्राणी या पदार्थ से छल या संघात / संहार न करना है।

अपनी जीभ के स्वाद की सन्तुष्टि हेतु किये गए पशु वध में जो व्यक्ति भागीदार कभी न बना हो, वह आगे आए और अहिंसा का उदाहरण प्रस्तुत कर अगले चरण छल, कपट, वैर, आहत करना आदि की ओर बढ़ने के उपायों पर विचार करे। सब से सरल उपाय है, वैदिक ऋषियों का स्वाध्याय और तदनुरूप क्रियात्मक जीवन शैली।
अलमतिविस्तरेण !

बुधवार, 8 मार्च 2017

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम क्यों ? : कविता वाचक्नवी

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम क्यों ?  : कविता वाचक्नवी 

(८ मार्च २०१७ को महिला दिवस के उपलक्ष्य में फरगुदिया द्वारा आयोजित परिचर्चा  हेतु लिखित विचार)


"प्रथम तो राजनीति एक सार्वजनिक क्षेत्र है, और मध्ययुगीन परम्परा से सार्वजनिक क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी सीमित रही है। यद्यपि 20 के दशक के उत्तरार्द्ध में यह बढ़नी प्रारम्भ हुई किन्तु वह केवल कला और सौन्दर्य के क्षेत्र में, या स्पष्ट कह लें तो फिल्मों में और तत्पश्चात् सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में अर्थात् नर्सिंग एवम् अध्यापन में। 

दूसरा कारण यह कि राजनीति मुख्यतः अनीति की शरणस्थली रहती आई है, जहाँ अपराध और कपट को या तो संरक्षण और प्रश्रय मिलता आया है अथवा उस से संघर्ष और जय-पराजय। स्त्रियों की प्रकृति से यह सार्वजनिक समेकित द्वन्द्व मेल नहीं खाता।

तीसरे, समाज में कार्यों का विभाजन इस प्रकार का रहता आया है कि स्त्री परिवार और गृहस्थी की धुरी होती है, वह परिवार और सन्तान से सम्बन्धित दायित्वों से इतना अवकाश और छूट नहीं पाती कि वह निरपेक्ष भाव से ऐसे किसी अवसर /अध्यवसाय को समय दे सके।

चौथा, कई अर्थों में यह 'महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं' भी माना/कहा जा सकता है। जिन परिवारों की पद-प्रतिष्ठा और सुरक्षाकवच-सा स्त्रियों को मिला उन परिवारों की स्त्रियाँ मुख्यतः राजनीति में आईं भी।

पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्र में स्त्री का स्थान बनाना भी स्वयम् में चुनौती है। तभी तो संसद में आरक्षण का प्रस्ताव तक पुरुष वर्चस्ववादी दलों ने लाने नहीं दिया। राजनीति में अपराधीकरण कम हो तो धीरे-धीरे यह अनुपात बढ़ेगा, या स्त्रियाँ अपराध की अभ्यस्त हो जाएँ तब भी बढ़ेगा। स्त्री-वर्चस्व बढ़ने ओर्र राजनीति के मानवीय पक्ष की अपेक्षा तब की जा सकेगी।"

- कविता वाचक्नवी

वे सम्पादकों व लेखकों के मध्य स्वयं को सुरक्षित नहीं पाती थीं और न समझौते कर सकती थीं

'लमही' द्वारा आयोजित परिचर्चा के प्रश्नोत्तर


जनवरी २०१५ में प्रतिष्ठित पत्रिका 'लमही' के नववर्षांक को महिला कथा-लेखन विशेषांक के रूप प्रकाशित किया गया था। इसमें सम्मिलित एक परिचर्चा हेतु पत्रिका द्वारा १० प्रश्नों की एक प्रश्नावली भेजी गयी थी जिनके उत्तर मुझे देने थे और जिन्हें पत्रिका में सम्मिलित किया गया था। आज 'महिला दिवस' पर उनके वे प्रश्न और अपने वे उत्तर आपके समक्ष -


1 - कहा जाता है कि अभिव्यक्ति की बराबरी से बड़ी कोई बराबरी नहीं हो सकती. दुनिया भर के जनतांत्रिक आंदोलनों का अंतिम आदर्श भी यही अभिव्यक्ति की बराबरी रहा है.हिंदी जगत में स्त्रियों द्वारा रचे जा रहे साहित्य की प्रचुरता और विपुलता के मद्देनज़र क्या आपको लगता है कि आज एक स्त्री के लिए अभिव्यक्ति के समान अवसर हैं और वह निर्द्वंद हो कर मनचाहा रच और अभिव्यक्त कर पा रही है?


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कविता वाचक्नवी - यह ‘समान अवसर’ एक सापेक्ष शब्द है, समान से आपका अभिप्राय, सभी स्त्रियों में परस्पर समान अथवा पुरुषों की तुलना में समान, है , यह असपष्ट है। इसलिए इसके उत्तर भी दो होंगे। जो लेखिकाएँ मुख्यतः आज सक्रिय लिख रही हैं उनके पास कमोबेश परस्पर लगभग समान अवसर हैं। किन्तु यदि प्रश्न का निहितार्थ पुरुषों की तुलना में आँकना है तो कहना होगा कि कदापि नहीं। अभिव्यक्ति के अवसर को यदि आप रचने के अवसर मात्र के अर्थ में देखते हैं तो भी, और यदि रचनात्मकता / लेखन / साहित्य-सृजन आदि को रचे जाने और पाठकों तक पहुँचने की पूरी प्रक्रिया के रूप में देखते हैं तो भी विविध स्तरों पर, विविध विधाओं में, विविध क्षेत्रों, विविध आयुवर्गों व विविध पृष्ठभूमि वाली हिन्दी-जगत की स्त्रियों के सर्वाधिक बहुलता वाले इस कालखण्ड में भी उनके पास पुरुषों की तुलना में न तो रचने के समान अवसर हैं व न ही पाठकों तक पहुँचने के। 



2 - साहित्य को स्त्री, दलित, पिछड़ा जैसे खांचों में रख कर पढना और समझना मुझे उन्हें मुख्यधारा से परे धकेलने का एक षड्यंत्र ज्यादा लगता है. मगर, कुछ लोग अनुभवों और यथार्थ की प्रमाणिकता की दृष्टि से वर्गीकरण और रेखांकन को युक्तिसंगत भी ठहराते हैं. आप अपने लेखन पर चस्पां 'स्त्री लेखन' के लेबल से कितनी सहज या असहज महसूस करती हैं?

कविता वाचक्नवी - वस्तुतः यह पाठक पर निर्भर करता है कि आनुपातिक दृष्टि से अधिक पाठक किसे मुख्यधारा मानते हैं। मेरे तईं गत लगभग पन्द्रह वर्ष से मुख्यधारा का साहित्य बहुधा स्त्रियों द्वारा लिखा जा रहा साहित्य है। रमणिका जी, मृदुला जी, चित्रा जी, मैत्रेयी आदि व इनकी समकालीन अनेक वरिष्ठ लेखिकाओं ने जहाँ केंद्रीय विधा के स्तर पर परिदृश्य को बदला, वहीं मुख्यधारा में पुरुषों के वर्चस्व को तोड़ा और स्त्रीलेखन को मुख्यधारा का साहित्य के रूप में स्थापित किया। स्त्री, दलित और पिछड़ा आदि वर्गीकरण प्रवृत्तियों के आधार पर जब तक होता रहे तब तक यह अध्ययन की सुविधा एवं दृष्टि से आवश्यक व महत्वपूर्ण है किन्तु यदि यह वर्गीकरण व्यक्ति के आधार पर होता है तो यह लेखक के साथ अन्याय से अधिक साहित्य, शिक्षा व पाठक के साथ अन्याय है। इतने पर भी मुझे निजी तौर पर अपने लेखन के 'स्त्री-लेखन' कहने-कहलाने से कोई कष्ट या असहजता अनुभव नहीं होती। इसके दो कारण हो सकते हैं कि 1 - विविध विधाओं में लिखी गई अनेक रचनाओं के पाठकों द्वारा कदापि मुझे ऐसा अनुभव नहीं करवाया गया, 2 - मैं अभी उस स्तर की लेखक नहीं हुई कि आलोचक मुझ पर अपना समय ज़ाया करें और मेरे लेखन को वर्गीकृत करें या किसी खाते में रखें, शायद इसलिए भी। वैसे किसी लेखक को लिखने के बाद अपने लेखन के लिए स्वयं किसी तमगे या वर्ग की तलाश मुझे बहुत गलत और बुरी लगती है। लेखक को आलोचना में कोशिश कर अपने लिए जगह तलाशने-बनाने जैसा लगता है, जो अनुचित है। फिर भी यदि आलोचना स्त्री-लेखन को मुख्यधारा से इतर मानती है तो यह पक्षपात, पूर्वाग्रह व वर्चस्ववादी पितृसत्तात्मक राजनीति ही कहा जाएगा; विशेषत: जब मुख्यधारा में पुरुषों का वर्चस्व लगभग समाप्त हो चुका है।
 

३.आधुनिक स्त्री रचनाधर्मिता में जाहिर तौर पर 'कॉमन थ्रेड' पितृसत्ता के विरुद्ध संघर्ष और प्रतिरोध है. हिंदी साहित्य में लेखिकाओं ने भावनात्मक, शारीरिक, सामाजिक और आर्थिक स्तरों पर पितृसत्ता की जकड़न, उसकी प्रविधियों और उसके पाखंडों का उद्घाटन और उदभेदन बहुत कुशलता से किया है. यहाँ तक की स्त्री यौन शुचिता की खोखली अवधारणाओं की भी धज्जियाँ उड़ाई गई हैं.मगर, कुटिल पितृसत्ता जिस प्रकार आज भी राजनीति और संस्कृति के क्षेत्र में महिलाओं के लिए लक्ष्मण रेखाएं खींच रही है, उससे हिंदी जगत की लेखिकाएं आँखें फेरे क्यों दिखाई देती हैं?

कविता वाचक्नवी - कुछ सीमा तक सहमत हूँ, इन अर्थों में कि कुटिल पितृसत्ता अभी भी जारी है और लेखिकाएँ कुछ अर्थों में आँखें फेरे हैं। इसके उत्तर में दोनों पक्षों के किए पर विचार करना होगा। पहली बात तो यह कि हिन्दी की लेखिकाएँ जिस पृष्ठभूमि से आती हैं, वहाँ स्त्री मूलतः उन स्थितियों के उद्घाटन के लिए भी दीक्षित नहीं होती। अतः उद्घाटन प्रतिकार की पहली सीढ़ी कहा जा सकता है और रोचक यह है कि यह उद्घाटन घटने के बाद होने वाली क्रिया है; जबकि विरोध तो घटने से रोकने की, प्रतिकार की क्रिया होता है। इस तरह आप देख सकते हैं कि भुक्तभोगी होने के बाद स्त्रीवर्ग के भोगे हुए यथार्थ का उद्घाटन और चित्रण तो स्त्रियाँ कर रही हैं किन्तु आनुपातिक दृष्टि से प्रतिकार की प्रविधियों का सन्निवेश होना अभी शेष है। रही क्षेत्र-विशेष की बात तो हिन्दी में अधिकांश लेखक साहित्य को राजनीति से दूर रखते आए हैं, यद्यपि विचारधारा के स्तर पर वे राजनीति-प्रेरित रहे हैं, उनका वर्चस्व भी लम्बे समय तक रहा किन्तु प्रत्यक्षतः वे राजनीति से सीधे नहीं जुड़े रहे, बल्कि कहना न होगा कि वे राजनीति का मोहरा भी बनते चले आए हैं और साहित्य की राजनीति भी इतनी अधिक होती चली आई है कि साहित्य ही लाभ की तुच्छ राजनीति का अखाड़ा, दलदल व पर्याय बन गया है किन्तु राष्ट्रीय राजनीति के लिए जिस प्रकार के प्रशिक्षण व तैयारी की आवश्यकता होती है, उसका नितान्त अभाव प्रत्यक्ष स्त्री व पुरुष लेखकों में देखा जा सकता है। ऐसे में लेखिकाओं की स्वयं क्योंकि राजनैतिक महत्वाकांक्षाएँ और सम्पृक्ति नहीं होती और सम्भवतः इसलिए भी कि वे दैनन्दिन जीवन और स्त्रीपुरुष सम्बन्धों के विविध पक्षों से अधिक जुड़ी हुई होती हैं। यों भी स्त्रियाँ जीवन और सम्बन्धों के अधिक निकट इसलिए होती हैं, कि उनकी संरचना ही ऐसी होती है, इसलिए भी वे शायद राजनीति में महिलाओं की अधिक सक्रिय व सतेज भूमिका के पक्ष में लिखने की अपेक्षा जीवन और सम्बन्धों पर लिखना बेहतर समझती हों। एक बात और जोड़ना चाहूँगी, कुटिलता से पार पाना स्त्री की दैहिक संरचना के अर्थों में सदा से कठिन रहा है और राजनीति का जिस प्रकार व जितना अधिक आपराधीकरण हुआ है उस स्तर के आपराधिक वातावरण की पहचान, उसका उद्घाटन, प्रतिकार या उस पर साधिकार लिखना आदि यह कुछ अधिक ही की अपेक्षा लगता है अभी ....। इसे आप सकारण आँख फेरना नहीं कह सकते।


४.व्यापक स्त्री हित से जुड़े राजनीति और अर्थनीति के ज्वलंत प्रश्न, जैसे विधायिका में महिला आरक्षण, मंत्रिमंडलों, नौकरियों और शैक्षिक संस्थाओं में सानुपातिक प्रतिनिधित्व, इत्यादि महिलाओं के रचनात्मक सरोकारों में अपेक्षित स्थान क्यों हासिल नहीं कर पाते हैं?

कविता वाचक्नवी : इसका उत्तर भी पिछले उत्तर में ही काफी कुछ निहित है। यह जोड़ना यहाँ चाहूँगी कि जो लेखिकाएँ, यथा रमणिका जी, सुधा अरोड़ा जी इत्यादि, लेखिका होने के अतिरिक्त अपने जीवन में एक्टिविस्ट भी हैं, उनके लेखकीय सरोकारों में स्त्री के सामाजिक व संस्थागत जीवन की उपस्थिति उपलब्ध होती है। फिर भी यह कहना आपत्तिजनक नहीं माना जाना चाहिए कि वर्तमान स्त्री-लेखन में सरोकारों की व्यापकता आनी अभी काफी शेष है। उसके बहुत-से कारण हो सकते हैं, जिनके विस्तार में जाने की यहाँ आवश्यकता नहीं है, किन्तु यह तथ्य है।



५. 'मातृत्व' एक ऐसा गुण है, जो स्त्री को श्रेष्ठ कृति बनाता है. सो, स्वाभाविक रूप से दुनिया भर के स्त्री-साहित्य में इसे 'सेलिब्रेट' किया जाता रहा है. मगर कुछ पश्चिमी नारीवादियों(फेमिनिस्ट्स) ने यह महसूस किया है कि मातृत्व के प्रति भावुक सम्मोहन को बढ़ावा देना किसी स्तर पर मर्दवादी राजनीति का एक आयाम भी हो सकता है. आप इस निष्कर्ष से कितनी सहमत हैं?

कविता वाचक्नवी : इसमें कोई राय नहीं कि मातृत्व स्त्री को श्रेष्ठ कृति बनाता है; किन्तु उस से भी बढ़कर स्त्री को ऐसा अपार सुख देता है जो संसार में उसे कोई और नहीं दे सकता, पुरुष भी नहीं, स्त्री को कई मानसिक व्याधियों से निकालता है और उसे अपने ‘कर्ता’ होने के गौरव से भरता है, इसमें कोई दो राय हो ही नहीं सकतीं। दूसरी ओर पश्चिमी नारीवादियों की बात रहने भी दी जाए तो इसी मातृत्व को आधार बनाकर ही पुरुष स्त्री पर सारे दबाव और बन्धन लगाता है। यद्यपि प्राकृतिक व संरचनात्मक दृष्टि से भी मातृत्व के साथ स्त्री पर बहुत से बन्धन और दबाव आ जाते हैं, उन बन्धनों में बँधी स्त्री को कमजोर समझ और उसके मातृत्व को उसकी कमजोरी समझ शासन करने वाली मानसिकता इसे उस अवसर के रूप में प्रयोग करती आई है जिसे स्त्रियों के शोषण के लिए अनुकूल समझा गया। बहुत बचपन में पढ़े अमृता जी के एक उपन्यास (अथवा कहानी) का एक अंश तब से मेरे मन में गड़ा हुआ है, जिसमें एक पुरुष पात्र दूसरे पुरुष पात्र को समझा रहा है कि औरत को यदि मारना है तो बाँध कर मारो। दूसरा पात्र बाँध कर मारने का अर्थ नहीं समझ पाता इसलिए बाँधने का औचित्य भी नहीं, तब पहला पात्र उसे समझाता है कि स्त्री के साथ हिंसा कर बदनाम होने की अपेक्षा उस से एक सन्तान उत्पन्न कर लो और फिर स्त्री आजीवन तुम्हारा सारा शोषण सहती रहेगी, कहीं नहीं भाग सकती। यह उदाहरण मैंने इसलिए दिया कि यह तथ्य आज से लगभग चालीस-पचास वर्ष पहले भी समाज जानता था और पहचानता था। आज पश्चिमी नारीवादी ही यह बात नहीं कह रहे हैं, अपितु यहाँ यॉरोप में तो बड़ी संख्या में एकल मातृत्व वाली स्त्रियाँ सब ओर मिल जाएँगी। यह एकल मातृत्व स्त्रियों ने स्वेच्छा से चुना है। वे किसी शुक्राणु-बैंक से किसी अनजान-अज्ञात व्यक्ति के शुक्राणु प्रत्यारोपित करवा माँ बनती हैं और अपनी सन्तान को जन्म देती हैं। यह पुरुषों द्वारा मातृत्व की आड़ में किए गए शोषण की प्रतिक्रिया भी है और साथ ही पुरुषों से होने वाले बुरे अनुभवों से बचने की जुगत भी। यॉरोप में यह कोई असाधारण घटना नहीं है। मैं कई बार पुरुष व स्त्री के सम्बन्धों के मिटते चले जाने से चिंतित भी होती हूँ कि ये पुरुष अपनी पत्नी ही नहीं अपितु सन्तान की कीमत पर भी अपने शोषण को जारी रखना चाहते हैं ... कैसी मानसिकता है कि वे अपनी पत्नी, अपनी सन्तान सबकी बलि लेकर क्या अर्जित करते हैं, केवल स्त्री पर मालिकाना अधिकार । यह सब कितना शर्मनाक है। क्यों नहीं पुरुष अपनी इस तुच्छ मानसिकता को छोड़ समाज को इस तरह बिखरने और विकृत होने से बच जाने देते ? घरों में स्त्रियों के ही नहीं अपितु बच्चों के भी जीवन बर्बाद होते देखे हैं मैंने, पुरुषों की कुण्ठाओं से उपजी स्थितियों के चलते।




६.समाज में स्त्रियों के संगठित दमन चक्र के कमजोर पड़ने और स्त्री स्वातंत्र्य की सशक्त छवियों के समानांतर इर्ष्या और कुंठा की लहरें भी दिखाई पड़ रही हैं. इस का नतीजा है कि यौन हमलों और हिंसा की बाढ़ सी आ गई है और कार्य स्थलों पर और अन्यत्र स्त्री-पुरुष रिश्ते असहज होते चले जा रहे  हैं..समाज में गहराती लैंगिक कटुता क्या आपको चिंतित करती है?

कविता वाचक्नवी : बहुत अधिक । मुझे स्त्री-पुरुष रिश्तों में आती असहजता जितना चिन्तित करती है, उस से अधिक चिन्तित करता है पूरे समाज में उत्पन्न होता असन्तुलन । समलैंगिकता भी कहीं न कहीं स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में जन्मे विद्रूप की ही परिणति है कि स्त्रियों में पुरुषों के प्रति व पुरुषों में स्त्रियों के प्रति सहज आकर्षण मरने लगा है। एकल मातृत्व भी इसी लैंगिक कटुता का प्रतिफल हैं, सेक्स टॉय्ज़ भी इसी लैंगिक कटुता का ही रूप हैं, बलात्कार और हिंसा तो इसका कारण भी हैं और इसका परिणाम भी। एक स्त्री होने के नाते ही नहीं अपितु एक माँ होने के नाते मुझे परिवार के बच्चों का परिवारों से विमुख होना सर्वाधिक सालता है। बीस वर्ष पहले नॉर्वे में बसने जाने पर जिस प्रकार परिवार टूटे देखे और युवक-युवतियों का मादक पदार्थों की ओर जुड़ाव देखा उन सारे अनुभवों के बाद वर्तमान की लगभग सभी सामाजिक समस्याओं (आर्थिक को छोड़कर) के लिए केवल और केवल इसी लैंगिक कटुता को दोषी पाती हूँ । बिना प्रेम के निभती लाखों-करोड़ों गृहस्थियाँ हम सबने भारत में बखूबी देखी हैं , कितना कष्टप्रद है यह सब... कि इसकी व्याख्या भी नहीं कर सकती, किसी को सहज विश्वास नहीं होगा। उन्हीं का प्रतिफल है भारतीय युवाओं का असंतुलित मनोविज्ञान, आक्रोश और कुण्ठा, माता-पिता दोनों की नकार और उनके प्रति असम्वेदनशीलता।


७.आज पारंपरिक साहित्य की तुलना में सोशल मीडिया  का स्त्री-लेखन ज्यादा चर्चाएँ बटोर रहा है. सोशल मीडिया की अराजकता, उसका औसतपन, उसकी क्षणभंगुरता और उसके आभासी चरित्र की आलोचनाएँ और आक्षेप  अपनी जगह हैं, मगर अब उसे नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन है. साहित्य में सोशल मीडिया के विवादास्पद हस्तक्षेप को गंभीर लेखन और साहित्य में कहाँ देखती हैं आप?

कविता वाचक्नवी : यह बात समझना बहुत आवश्यक है कि सोशल मीडिया एक मंच है, एक माध्यम है और यह हम सब जानते हैं कि मंच व माध्यम का अच्छा-बुरा होना कुछ नहीं होता, जो कुछ होता है वह उसके प्रयोक्ताओं पर निर्भर करता है। यही स्थिति एक पत्रिका की भी हो सकती है कि किसी के हाथ में पत्रिका का माध्यम व अवसर लग गया पर उस पत्रिका में गम्भीर कुछ भी नहीं छपता या किसी पत्रिका में गम्भीर सामग्री छपती है। अनगिनत पत्रिकाएँ ऐसी होंगी जो आपको अपनी रुचि व स्तर की नहीं लगेंगी और आप उन्हें नहीं पढ़ते, कुछ आपको अपनी रुचि व स्तर की लगती हैं इसलिए आप उन्हें पढ़ते हैं। तो इन कारणों से आप हिन्दी की पत्रकारिता को धिक्कार या नकार तो नहीं देते न? न ही उसे कोई बाहर का, अस्पृश्य या विवादास्पद हस्तक्षेप का माध्यम घोषित करते हैं। बिल्कुल यही स्थिति सोशल मीडिया की भी है। बस, यह एक खुला व निश्शुल्क माध्यम है। इसका शुल्क समय व तकनीक की जानकारी है केवल, न कि पारम्परिक माध्यम व पारम्परिक शुल्क। भारत में विशेषतः हिन्दी समाज में तकनीक से परिचय अभी बहुत दूर की कौड़ी है; इसलिए अभी हिन्दी का लेखक वर्ग इसे अराजक, औसत व क्षणभंगुर (?) समझता है। सच तो यह है कि यह माध्यम सर्वाधिक दीर्घजीविता का माध्यम है, सर्वाधिक तेज है और सर्वाधिक व्यापक भी। जिसे कुछ लोग अराजक समझते हैं, उसे मैं सर्वाधिक लोकतान्त्रिक कहती हूँ। मैं अपनी ही कहूँ तो लगभग पन्द्रह वर्ष पूर्व मैंने प्रण किया था कि मैं किसी पत्रिका या किसी सम्पादक को कदापि अपनी पहल पर रचना नहीं भेजूँगी, जब तक कि स्वयं सम्पादक अथवा कोई बहुत सम्मानित व्यक्ति अपनी पहल पर मुझे रचना भेजने को न कहे। और मैंने अपना यह प्रण पूरी तरह निभाया भी (इक्का-दुक्का घटनाएँ इसका अपवाद हो सकती हैं)। आप कल्पना कर सकते हैं कि किसी लेखक के लिए यह आत्महत्या है, जिसे मैंने स्वेच्छा से वरा। किन्तु मेरे लेखक को इस आत्महत्या से बचा कर पाठकों से सीधा जोड़ने वाला माध्यम है इन्टरनेट और सोशल मीडिया। यह सच है कि इस पर हजारों-लाखों-करोड़ों लोग लिख रहे हैं, पर वे तो पहले भी कहीं अपना-अपना लिखते आए हैं, बस तब आपको, हमें या समाज को उनका पता न चलता था क्योंकि अभिव्यक्ति के सभी संस्थानों पर इने-गिने लोगों का आधिपत्य व नियन्त्रण था और शेष तक किसी की पहुँच ही न थी, तो पता कैसे चलता कि उन लाखों लोगों में कौन हल्का लिख रहा है और कौन स्तरीय। आज निस्संदेह लिखने वालों की संख्या भी बढ़ी है तो वह इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति के संस्थानों पर से वर्चस्ववादी शक्तियों के अंकुश को नकार एक वैकल्पिक माध्यम दे दिया है और इस तरह अधिक अवसर होने के चलते लोगों में अभिव्यक्ति के प्रति उत्साह भी है और इसलिए आधिक्य भी। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि सोशल मीडिया पर लिखने वाला हर व्यक्ति लेखक है ही यह माना जाए। अस्सी प्रतिशत से अधिक वहाँ केवल अभिव्यक्ति और सम्वाद की इच्छा से हैं और उनके लिखे को कदापि साहित्यिक लेखन नहीं कहा जा सकता। किन्तु उसे आप साहित्यिक हस्तक्षेप समझते ही क्यों हैं? उस से विचलित या प्रभावित होने की तब तक कोई आवश्यकता ही नहीं जब तक रचना का स्तर और गुणवत्ता स्वयं नहीं बोलते। आपके-हमारे सामने एक अधिक विशद, विस्तृत और व्यापक फलक एवं अवसर हैं अब, कि प्रतिभा को चीन्ह पाएँ, इसमें मुझे कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगता। कष्ट उन्हें अवश्य है और होगा जिन्होंने अभिव्यक्ति के संस्थानों पर नियन्त्रण बना रखा था अब तक और सौगातें बटोरते चले आए हैं, लाभ लेते आए हैं। अब उनका अंकुश टूट रहा है, भले ही वे सम्पादक हों या लेखक। सोशल मीडिया में पाठक और लेखक आमने-सामने हैं और सोशल मीडिया ऐसा टूल है (दुर्भाग्य से हिन्दी लेखक अभी इसकी शक्ति नहीं जानते) कि पाठक को लेखक का पूरा व्यक्तित्व, उसका चरित्र आदि सब बिना बताए भी पता चल जाता है और इस आधार पर वे लेखक को सिरे से खारिज भी कर सकते हैं, कर देते हैं , अब दुराव सम्भव नहीं कि पाठक केवल लेखन से ही लेखक को जानता था और व्यक्तिगत जीवन में कुछ भी, कैसा भी करते हुए आप पाठक को मोह सकते थे। इस माध्यम पर वह सम्भव नहीं। कई बड़े नामधारी हिन्दी लेखकों की ‘मोनोपली’ टूटी है यहाँ। स्त्रियाँ बिना सम्पादक की शर्तें माने भी लिखने व पाठकों तक पहुँचने में सफल हो सकती हैं, नेट पत्रिकाओं व वेबज़ीन्स का अम्बार लगा पड़ा है। कविताओं व साहित्य के कोष निश्शुल्क उपलब्ध हैं पढ़ने-पढ़ाने को, अकूत साहित्य वहाँ सदा के लिए डिजिटल रूप में सुरक्षित हो गया है, विश्व के प्रत्येक कोने से पाठक कुछ भी / कहीं भी / कभी भी पढ़ सकता है । और भी अनेकानेक लाभकारी परिवर्तन हुए हैं, अनुवाद, भाषा व लिपि की दृष्टि से तो क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं, अपने एक लम्बे लेख में विस्तार से इन व ऐसे अन्य अनेक पक्षों पर एक-एक कर कुछ वर्ष पहले लिखा भी था, उन सब को विस्तार से यहाँ नहीं बताया जा सकता। बस यही कि ये सब साहित्य के लिए नकारात्मक हस्तक्षेप कैसे कहे जा सकते हैं? क्या केवल इसलिए कि एकाधिकार व वर्चस्व को चुनौती मिली है या 80- 85 प्रतिशत को देखकर हमें उसके स्तरीय न होने से कष्ट होता है। क्या बीस बरस पहले समाज का 80-85 प्रतिशत वर्ग लेखक था ? नहीं ! तो यह वही वर्ग है। उन्हें उनकी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का लाभ उठाते देख चिन्तित होने की भला क्या आवश्यकता है? और क्यों ?




८.साहित्य के बारे में शुरू से एक मासूमियत भरी स्थापना रही है कि स्तरीय साहित्य अपने बूते जिंदा रहता है. मगर हकीकत यह है कि आज जो रचना साहित्यिक परिचर्चा, गोष्ठी, जलसा, विमोचन, समीक्षा, पुरस्कार के जुगाड़ तंत्र में अपनी जगह नहीं बना पाती, पाठक उस तक पहुँच भी नहीं पाता, चाहे वह जितनी भी उच्च कोटि की हो. एक स्त्री के नजरिये से साहित्य की यह धक्कम-पेल आपको हताशाजनक लगती है या चुनौतीपूर्ण?

कविता वाचक्नवी : हताशाजनक भी और चुनौतीपूर्ण भी; बल्कि स्पष्ट कहूँ तो हताशाजनक कम और चुनौतीपूर्ण अधिक । किन्तु ध्यान देने की बात यह है कि मेरा नजरिया हर स्त्री लेखक का नज़रिया नहीं हो सकता, न होना चाहिए क्योंकि हर किसी का मनोविज्ञान अलग होता है। कुछ स्त्रियाँ ऐसी भी मैं जानती हूँ जिन्होंने लेखन सदा के लिए इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वे सम्पादकों व लेखकों के मध्य स्वयं को सुरक्षित नहीं पाती थीं और न समझौते कर सकती थीं। बहुत-से ऐसे भी लेखक-लेखिकाओं को जानती हूँ जिन्होंने अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए खूब समझौते किए और किसी का भी, कैसा भी प्रयोग करने से नहीं हिचकिचाए, जो सम्पादक समझते थे कि वे उनका इस्तेमाल कर रहे हैं वस्तुतः वे भी प्रयोग होते गए... उनके माध्यम से लेखकों-लेखिकाओं ने वह सब किया, कर रहे हैं जिसका आपने उल्लेख किया है, निजी सम्बन्धों से लेकर जाने कहाँ तक। इसलिए ऐसे में मेरे जैसे व्यक्ति के लिए जिसके पास न कोई पद है, न प्रकाशन, न किसी एक से भी कोई सम्पर्क या मैत्री है कि मेरे लिए कोई कुछ करे, न मैं किसी वर्ग-विशेष, विचार-विशेष या ‘स्कूल’-विशेष की हूँ कि कोई मुझे प्रमोट करे, न मेरा कभी भी साहित्य आदि में कोई गॉड-फादर है, न कोई जान-पहचान, न दिल्ली या हिन्दी क्षेत्र में कभी रहने-बसने का मौका मिला, न मैं किसी को घर आमन्त्रित करती या उपहार आदि दे सकती हूँ, सिवाय उन एकाध लोगों को आदर-सम्मान देने के जिनकी विद्वत्ता और नैतिक शुचिता अभिनन्दनीय हो, न मैं दावतें / सिगरेटें या बोतलें देती-छूती हूँ, बल्कि इन सब से भी बढ़कर परिवार व मूल्यों के प्रति अक्खड़ प्रतिबद्धता व ऐसा न करने वालों का डंके की चोट पर खुला विरोध आदि वे कारण हैं, जो मुझे साहित्य की परिधि से निष्कासित करने और तन्त्र से बहिष्कृत करने के लिए बहुत पर्याप्त हैं, रहे हैं। मुझे साहित्य की चौखट पर पैर भी धरने न देने वालों की चहुंदिशी भीड़ में विरलों के लिए ही यह अनुमति देना वश का है जो निस्संदेह अत्यधिक निष्पक्ष व ईमानदार हों, तभी वे मुझ जैसी नितान्त अ-लाभकारी व्यक्ति को भी अवसर देने से नहीं हिचकिचाए या हिचकिचा सकते। क्या यह सब मुझ जैसी अनाम स्त्री को हताश करने के लिए पर्याप्त नहीं होना चाहिए ? किन्तु है ठीक इस से उलटा, एकाध अवसरों को छोड़ मुझे कभी हताशा नहीं हुई और अपने उपर्युक्त ‘दुर्गुणों व कमियों’ (?) को ही शक्ति समझ आगे बढ़ने व अपनी राह चलते रहने का अपने पिताजी का दिया आदर्श हरदम सामने रहता है और डिगने न देने की शक्ति देता है। यह तो रही व्यक्तिगत हताशा या चुनौती की बात। किन्तु सच कहूँ तो साहित्य के भविष्य व भविष्य के साहित्य की दृष्टि से ये आपकी बताई व हम सब की देखी-समझी स्थितियाँ बहुत निराश करती हैं... इच्छा होती है हिन्दी वालों को पढ़ना-मिलना पूरी तरह छोड़ दूँ.... शोध और शिक्षा तक को बर्बाद कर दिया है इन स्थितियों ने... क्या लाभ है ऐसे लेखन-पठन-पाठन का ? तब ऐसे में उबरने (चुनौती) और डूबने (हताशा) दोनों को ही अनुभव नहीं करती। बस कर्तव्य की भाँति अपना काम किए चले जाने को आधार बना लेती हूँ । सोशल मीडिया और उस माध्यम द्वारा मुझ से सीधे जुड़े पाठक ही वह शक्ति हैं जिन्होंने मेरे अस्तित्व को पूरी तरह बनाए-बचाए रखा है। अन्यथा इन स्थितियों का क्या प्रभाव हुआ होता कह नहीं सकती।




९. एक सवाल जो मुझे हमेशा परेशान करता है कि आखिर हिंदी के स्त्री लेखन से 'हास्य' और 'विनोद' लगभग निष्कासित क्यों है? कटाक्ष और व्यंग अगर है तो उसकी प्रकृति हास्य-मूलक नहीं है. ऐसा क्यों?

कविता वाचक्नवी : साहित्य में विधाओं की दृष्टि से कहानी आज केन्द्रीय विधा है। उसके बाद स्थान आता है उपन्यास का। दोनों क्षेत्रों में महिलाओं की भरपूर उपस्थिति है। कविता तो यों भी हाशिये पर है, आलोचना और सम्पादन में महिलाओं के नाम हैं ही, निबन्ध, ललित निबन्ध आदि तो वैसे भी सभी तरह से सिरे से जैसे लुप्त ही होते जा रहे हैं.... हास्य केवल मंचीय कवियों के पास बचा है (स्तरीयता का प्रश्न उस पर भी मुँह बाए खड़ा है) । व्यंग्य तब तक व्यंग्य है ही नहीं जब तक उसमें मिठास और हास्य का पुट नहीं है, इसलिए जो कुछ वह है उसे व्यंग्य तो नहीं ही कहा जा सकता। रही स्त्रीलेखन में इन विधाओं की बात तो अभी स्त्रीलेखन की उम्र ही कितनी हुई है ... तनिक सब्र करें ... स्त्रियों को भी कुछ हँसने-हँसाने के अवसर दें... वे हास्य भी उत्कृष्ट रच कर दिखाएँगी और तब पुरुषों का रचा भौंडा हास्य हाशिये पर चला जाएगा। आपने कहा कि औरतें केवल कहानी लिखती हैं तो उन्होंने कविता रच कर दिखा दी, आपने कहा कि वे आलोचना नहीं लिखतीं तो उन्होंने वह भी लिख कर दिखा दी; अब आप कह रहे हैं वे राजनीति नहीं लिखतीं तो यह बात अर्धसत्य है क्योंकि राजनैतिक सरोकार स्त्रीलेखन में अपने अलग अन्दाज़ में आने प्रारम्भ हो गए हैं। अब नया यह आक्षेप कि हास्य नहीं रचतीं.... भाई यह आलोचना इतनी डिमांडिंग क्यों है कि बस कुछ न कुछ माँगती ही रहती है ! आप यह कब देखेंगे कि स्त्री क्या लिख रही है; या बस यही संकल्प है कि आँख मूँद कर यही रट लगाते रहेंगे कि स्त्री यह नहीं लिख रही... वह नहीं लिख रही।

१०.अपनी आगामी लेखकीय योजनाओं के बारे में बताएँ

कविता वाचक्नवी : बहुत सारी पाण्डुलिपियाँ बस्तों में बन्द पड़ी हैं, चाहती हूँ उन्हें सलीके से लगाकर प्रकाशित करवाऊँ, अपना एक कहानी संकलन, एक कविता संकलन, एक लेख-संग्रह, एक साक्षात्कारों की पुस्तक (इन सब की सामग्री तैयार है, पर इस तरह तैयार नहीं कि प्रकाशक को थमा सकूँ) तो इन्हें तैयार करना है। ‘भाषा प्रौद्योगिकी और हिन्दी कम्प्यूटिंग’ विषयक एक पुस्तक की योजना दो-तीन वर्ष से अधर में लटकी है, उसकी सामग्री पूरी कर प्रकाशन के लिए देना चाहती हूँ। पत्र-पत्रिकाओं व अपनी वेबसाईट आदि के लिए समय-समय पर लिखना भी होता है, कुछ पत्रिकाओं ने नियमित स्तम्भ लिखने का वादा लिया हुआ है, जिन्हें हाँ कह कर भी प्रारम्भ तक नहीं कर पाई, उन्हें प्रारम्भ करना चाहती हूँ। गत वर्ष रमणिका जी के 'हाशिये उलाँघती औरत' शीर्षक (40 भाषाओं के 25 खण्डीय स्त्री-संकलन) के 'प्रवासी कहानियाँ' खण्ड का सम्पादन किया तो उसी दौरान अपनी एक अन्य योजना पर काम शुरू किया था। वह योजना है कि विश्व के सभी महाद्वीपों के हिन्दी लेखकों के कहानी संकलन को तीन-चार खण्डों में लाने की; बस उसकी शर्त यह है कि जो लेखक जिस देश में रहता है, वहाँ के स्थानीय मुद्दों पर उसे लिखना है, उन कहानियों में स्थानीयता उभर कर आनी चाहिए, अमेरिका में बैठ कर आप भारत या भारतीयों या भारत के मुद्दों व समस्याओं की कहानी न लिखें, जिसके कारण हिन्दी आलोचना अब तक ऐसी-तैसी करती आई है, जो कुछ हद तक सही भी है। इसलिए लेखकों को गत वर्ष भेजे पत्र में यह चुनौती पूरा करने का आह्वान किया था कि वे तत् तत् देशीय शिक्षा, समाज, सम्बन्ध, राजनीति, मेडिकल आदि-आदि किसी भी मुद्दे को आधार बना अपने देश को हिन्दी में अभिव्यक्त करें, कुछ कहानियाँ आईं भी, किन्तु विशद योजना है व अपने पारिवारिक एवं विश्वविद्यालयीय दायित्वों के बीच नियमित लेखादि लिखने के साथ-साथ इन्हें निभाना समयाभाव में दुरूह भी। ऊपर से पैसा देकर कदापि कहीं नहीं छपना का अपना संकल्प भी याद रहता है तो प्रकाशक न मिल पाने की अपनी सीमा भी जानती हूँ। इसलिए इन्हें योजनाओं की अपेक्षा स्वप्न कहना अधिक उचित है। तो इस प्रकार योजनाओं के नाम पर कुछ स्वप्न ही हैं अपने पास ! बस !!
नवम्बर २०१४

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

स्त्रीविमर्श स्त्री को शोषण का अधिकार देने/दिलवाने का अभियान नहीं है : कविता वाचक्नवी

स्त्रीविमर्श स्त्री को शोषण का अधिकार देने/दिलवाने का अभियान नहीं है : कविता वाचक्नवी


कुछ मित्र/पाठकों ने सन्देश भेज पूछा है कि मैं तो सदा से स्त्री व स्त्रीविमर्श सम्बन्धी लेखन व कार्यों के प्रति प्रतिबद्ध/ पैरोकार रही हूँ, फिर १२ फरवरी के अपने लेख में "दूसरों के जीवन में काँटे बोने और टीवी देखने के अतिरिक्त कुछ नहीं करतीं" जैसी स्त्री-विरुद्ध टिप्पणी कैसे लिख गयी।  


Image result for women empowerment paintingsतो प्रिय पाठको / मित्रो ! आपको स्त्री-विमर्श का आशय, अभिप्राय और उद्देश्य इत्यादि समझना बहुत अनिवार्य है। मेरा स्त्री-विमर्श स्त्री को शोषण का अधिकार देने/दिलवाने का अभियान नहीं है; और सिद्धान्ततः भी स्त्रीविमर्श इस अवधारणा पर नहीं टिका। स्त्री-विमर्श और स्त्री-सशक्तीकरण मूलतः शोषित स्त्री को शोषण से मुक्त करवा उसे सबल बनाने व लैंगिक असमानता को दूर कर समानता का अधिकार दिलवाने का अभियान हैं ताकि वे भी समाज की उन्नति में बराबर की सहभागी हो सकें; न कि उसे समाज के किसी अन्य वर्ग के शोषण का अधिकार दिलवाने का। जो लोग स्त्री-विमर्श का उपयोग इसके विपरीत अथवा इतर अर्थों में करते हैं वे मूलतः अपनी स्वार्थसिद्धि और अज्ञानता का ही परिचय देते हैं। यदि स्त्री का सशक्तीकरण दूसरों के शोषण हेतु है तो फिर उनमें और समाज के दूसरों स्त्री-शोषकों में अन्तर ही क्या रह गया। ऐसे में स्त्री-विमर्श के हम जैसे पैरोकारों का दायित्व समाज को ऐसी शोषक स्त्री के शोषण से मुक्ति दिलवाने का भी हो जाता है। 


जिस प्रकार कोई न्यायालय किसी अपराधी को इसलिए क्षमा या दया नहीं दे सकता कि उसके अपराधी बनने के मूल में अमुक-अमुक व्यक्ति और अमुक-अमुक घटना का हाथ है तो परिस्थितिवश वह अपराधी बन गया, अतः उसे क्षमा कर दिया जाए ! न ! कदापि नहीं ! ऐसे में तो उन्हें दोहरा दण्ड मिलना चाहिए कि एक तो स्वयं अपराध किया और साथ ही दूसरों को अपराधी बनाने वाला घटनाक्रम और परिस्थितियाँ रचीं। इसी प्रकार भले ही स्त्री हो या पुरुष, वह भले ही किन परिस्थितियों में शोषण का अपराध करे, उसे उसके अपराध के लिए दोषी ठहराया जाना होगा। किसी को इसलिए क्षमा नहीं किया जा सकता कि वह स्त्री है या पुरुष। अपराध, दण्ड और क्षमा में किसी भी व्यक्ति को रिज़र्वेशन नहीं मिलना चाहिए। अन्यथा समाज का ढाँचा चरमरा जाएगा और असन्तुलन, असमानता व अत्याचार बढ़ेगा। इसलिए स्त्री-सशक्तीकरण स्त्रियों को दूसरों के प्रति दुर्व्यवहार, छल, कपट, प्रपञ्च, शोषण और अत्याचार करने का लाईसेन्स देने / दिलवाने का अभियान नहीं है। जो इसका उपयोग इन अर्थों में करते हैं, वे अपराधी हैं, भर्त्सना-योग्य हैं और स्त्री-मुक्ति के प्रत्येक अभियान को उनकी निन्दा व विरोध करना चाहिए। 


जो पुरुष स्त्री-विमर्श की आड़ में अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं, उनको उठा बाहर फेंकना चाहिए और जो स्त्रियाँ घरों में या बाहर अपने स्त्री होने का लाभ लेते हुए समाज के किसी भी वर्ग के विरुद्ध किसी भी प्रकार की धूर्तता, चालाकी, वितण्डा या लाभ उठाने की मनोवृत्ति दिखाती हैं या कार्य करती हैं, तो उनकी भी खबर ली जानी चाहिए और उनका किसी भी प्रकार समर्थन / सहयोग नहीं किया जाना चाहिए। स्त्री-सशक्तीकरण का अर्थ पुरुष का शोषण करना भी नहीं होता। यह शोषण का हथियार नहीं, अपितु आपकी आत्मरक्षा का उपाय और सामर्थ्य प्रदान करने का अभियान है, ताकि कोई आपकी अस्मिता पर आघात न करे ; किन्तु आप आत्मरक्षा के अतिरिक्त संहार और शोषण में इस हथियार को प्रयोग करने लगेंगी तो आपको भी उसी प्रकार धिक्कार मिलेगा जैसा आपका शोषण करने पर पुरुष को मिलता है ! 
- Kavita Vachaknavee





शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

महिलाओं के दोष

महिलाओं के दोष : कविता वाचक्नवी 


तीन वर्ष पहले (आज ही के दिन जब यह लेख लिखा गया था) एक तथाकथित लेखिका (म.ग.) के लेख में लिखे गए शब्द थे - "मेरे द्रष्टिकोण से "सर्वोतम माँ " वो है जो प्रारम्भ से अपने बेटे को स्त्री जाति का सम्मान करना सिखाती है। जो पुरुष स्त्री जाति को हीन भावना से देखते हैं, उन के विकास में बाधक बनते हैं, उन के प्रति दुर्व्यवहार करते हैं ,हाथ उठाते हैं, बलात्कार करते हैं उन की हत्या करते हैं ,ये सब एक असफल माँ की "अमानुष" संतान होते हैं ". ……


पहले भी अनेक महिलाओं के इस प्रकार के वक्तव्य पढ़ती आई हूँ, कई महिलाएँ तो मेरे यहाँ आकर इस तरह के अपने विचार लेकर मुझसे दूर तक झगड़ती रही हैं, उन्हीं दिनों एक महिला (अ.भा.) लंबा युद्ध छेड़े रही महिलाओं के विरोध में मेरे यहाँ  फेसबुक पर।


Image result for blaming women वस्तुतः महिलाओं को दोष देने की यह प्रवृत्ति पुरुषवादी सोच का परिणाम है। अतः इसीलिए मेरा विरोध पुरुषों से नहीं अपितु पुरुषवादी सोच से है, चाहे वह स्त्रियों में हो या पुरुषों में। अधिकाँश स्त्रियों की कंडीशनिंग ही ऐसी होती है।

उक्त महिला की माओं को कटघरे में खड़ी करने वाली प्रारम्भ में लिखी बात पर, मेरी दो-तीन आपत्तियाँ हैं, वे संक्षेप में इस प्रकार समझी जा सकती हैं।

- पहली बात उनका वह स्टेटस उसी भावना से प्रेरित लगता है जैसे 60-100 साल पहले 'स्त्रियाँ सन्नारी कैसे बनें', 'पत्नी पथ प्रदर्शक' आदि पुस्तकें तमाम लोगों ने लिखीं, जो ये समझते थे कि स्त्रियों को सुधारना चाहिए, हमें स्त्रियों को सुधारना है, हमें स्त्रियों को सही पथ पर चलाना है, स्त्रियाँ मूर्ख, अशिक्षित और असभ्य होती हैं, उन्हें शिक्षित करने और घर गृहस्थी, पति की सेवा, बच्चे पालन, सन्नारी व सु-नारी बनने के उपदेशों की आवश्यकता है और घर चलाने, पति की सेवा करने, बच्चों को पालने, सास ससुर की सेवा करने, पति का आज्ञा पालन करने, पति को परमेश्वर समझने, सिलाई बुनाई करने में अपना समय लगाने, इधर-उधर की बातों में न फँसने की शिक्षा पुरुषों द्वारा दी जानी चाहिए। इसलिए लोगों ने स्त्री को उपदेश देने वाली पुस्तकें लिखीं ताकि स्त्रियाँ सुधरी रह सकें।

- दूसरी बात, बच्चे कभी उपदेशों से नहीं सीखते, न सिखाने से सीखते हैं। बच्चे केवल और केवल आचरण से सीखते हैं। माँ या पिता भले ही उन्हें लाख उपदेश देते रहें, वे इन उपदेशों और आदेशों से कुछ नहीं सीख सकते, क्योंकि बच्चे केवल आचरण से सीखते हैं। उनके घर-परिवार में या फिर समाज में क्या व्यवहार होता है, वे इस से सीखते हैं।

माँ उन्हें लाखों सदुपदेश भली ही दे भी ले, तब भी यदि घर के लोगों या पिता का व्यवहार उन संस्कारों के अनुकूल या मेल न खाता हुआ है, तो बच्चे उन उपदेशों से कभी नहीं सीखेंगे अपितु वही सीखेंगे जो वे अपने घर में देखते हैं।

साथ ही ध्यान रखने की बात यह है कि कितने प्रतिशत भारतीय परिवारों में स्त्री को पारिवारिक निर्णय या संतान के निर्णय लेने का अधिकार होता है ? स्त्रियाँ अपने जीवन के निर्णय लेने तक में स्वतंत्र नहीं होतीं, भला क्या तो वे संतान के जीवन के निर्णय लेंगी ! जो कुछ वे सिखाना-बनाना चाहती होंगी अपने बच्चों को, पूरा परिवार मिलकर एक झटके में उस पर पानी फेर देता है। उदाहरण स्वरूप, स्त्री सिखाए कि शराब पीना गलत है, न पियो, किन्तु यदि पिता ही रोज पीता है और पीटता व झगड़ा करता है तो क्या स्त्री का बस चलता है? संतान वही सीखेगी जो वह देखती है। सारे संस्कार धरे रह जाते हैं। इसलिए ऐसी बातें वे स्त्रियाँ कर सकती हैं जो अपने घरों में बैठी सौभाग्य से अपने अच्छे मिले पति के कारण सारी दुनिया की स्त्रियों को वैसा ही समझती हैं और संसार के सारे दुष्कर्मी पुरुषों की बुराइयों का दोष उनकी माओं के मत्थे मढ़कर उन्हें ही नाकारा और अपराधिनी घोषित करती हैं।


संतान के दुष्कर्मी या बुरे आदि होने का आरोप या तो बराबर सब (समाज, परिवार, पिता व अंत में माँ) पर है, अन्यथा अकेले माँ पर तो कदापि नहीं है, जब तक कि पिता सहित पूरा परिवार माँ का सहयोगी न हो। इसलिए सर्वोत्तम माँ की अपेक्षा सर्वोत्तम पिता की बात लिखनी चाहिए। सर्वोत्तम माँ की बात लिखना नीच संतान या नीच, अमानुष व दुष्ट संतान के अपराधी या अमानुष होने का आरोप माँ पर लगाने जैसा है।


शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

हिन्दी के मरण के वाचाल और मूक साक्षी

 हिन्दी के मरण के वाचाल और मूक साक्षी  : कविता वाचक्नवी 





लन्दन के एक प्रतिष्ठित संस्थान ने उनके यहाँ #हिन्दी अध्यापन के लिए अपनी पहल पर मुझे एक लिखित प्रस्ताव गत दिनों भेजा है। मना करने का इतना दुःख नहीं है जितना उनकी इस बात पर चुप रह जाने का कि कोई और मातृभाषा हिन्दी का, अध्यापन अनुभव वाला तथा न्यूनतम मास्टर्ज़, पीएचडी योग्यता का सुयोग्य पात्र उन्हें सुझाऊँ।

जिन्हें हिन्दी को लेकर बहुत से भ्रम हैं , उनकी जानकारी के लिए बता दूँ कि हिन्दी की स्थिति अब लगभग 'बोली' हो चुकने की हो गयी है। सामान्य व प्रबुद्ध जन तो क्या, इस भाषा के लेखक तक अकादमिक विषयों से अछूते हैं। क्योंकि किसी भी भाषा को जीवित रहने में सहायक होते हैं उसमें व्यक्त-निहित 'विचार', किस्से-कहानी नहीं और उस भाषा में दिए जाने जाने वाले ईनाम-इकराम नहीं और उनकी ओर दौड़ने में सब कुछ तबाह कर देने वाली अन्धी भीड़ नहीं।

आप यदि यूनेस्को द्वारा जारी बची रह जाने वाली भाषाओं की सूची में हिन्दी का नाम देखकर निश्चिन्त हैं अथवा उसकी विश्व की भाषा-सूचियों में आगे-पीछे सरकता हिन्दी का नाम देखकर प्रसन्न हैं, तो आप किसी बहुत बड़े भ्रम, धोखे और नासमझी में हैं। आप गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, या सोशल मिडिया पर हिन्दी के टूल्ज़ और उनकी चर्चा से आह्लादित और कृतकार्य अनुभव करते हैं तो आपसे बड़ा चार्वाकी और कोई नहीं। आप विदेशों में मुट्ठीभर लेखकों द्वारा अपनी अभिव्यक्ति के लिए हिन्दी को प्रयोग होता देख सीना फुलाते अथवा नतमस्तक होते हैं तो आप पर हँसना तक व्यर्थ है। क्योंकि आप को पता होना चाहिए कि लन्दन के संस्कृत स्कूल में कोई भारतीय नहीं जाता, ब्रिटेन में हिन्दी पढ़ने की सारी व्यवस्थाओं में से भारतीय नदारद हैं। अमेरिका के जिस नगर में मैं रहती हूँ उसमें न्यूयॉर्क से इतर सर्वाधिक भारतीय रहते हैं, यह स्वयं में लघु-भारत ही है किन्तु हिन्दी के अकादमिक अध्ययन की विद्यालय और विश्व विद्यालयीय व्यवस्थाओं में से भारतीय लगभग गायब हैं। पूरे अमेरिका की लगभग यही स्थिति है।

विश्वभर का भारतीय और भारतवंशी समाज इस भाषा में अवमिश्रण आदि के साथ बोल सकने की कामचलाऊ योग्यता अर्जित करने की स्थिति से बहुत सन्तुष्ट और निश्चिन्त है। जिस भाषा के उच्चरित भाषा रूपों से उसका अपना समाज सन्तुष्ट हो जाता है और किसी प्रकार के योगदान व श्रम से किनारा कर लेता है और प्रशासन तथा तन्त्र पर सब आरोप मढ़ता है, उस भाषा का अन्त सुनिश्चित है। इसलिए यह तय मानिए कि हिन्दी आगामी सौ वर्ष भी जीवित रह पाई, इसकी सम्भावना अत्यल्प है। #संस्कृत की स्थिति को देखकर किसी भ्रम में न रहें, हिन्दी न तो संस्कृत है, न ही कभी उतनी समृद्ध हो सकी, आगे तो कभी अब हो भी नहीं सकती।


The bottom line is that if there is only one person left who speaks the language as their native tongue and fluently, then the language has died. It doesn’t matter if there are still other members of the community that understand the language or maybe speak a little bit of it. Even if there are elders in the community who refuse to teach their native tongue to the younger generation, the language is doomed as it won’t survive to be passed on to a new generation as a native language.

आइये हम सब 10 जनवरी को मनाए विश्वहिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी के इस मरण के साक्षी बनें और उसकी चिता में कुछ समिधाएँ रख सकने लायक नाता इस से बनाए रख सकें।



शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

अमेरिका में उग्र विरोधप्रदर्शन क्यों

अमेरिका में उग्र विरोधप्रदर्शन क्यों : कविता वाचक्नवी


#अमेरिका के #युवा बच्चे और युवा पीढ़ी राष्ट्रपति ट्रम्प #President #Trump के चुनाव के बाद और #Europe में #Brexit के बाद, दुःख और क्षोभ में सड़कों पर और सब प्रकार के विरोध में जुटी है। यह इसलिए नहीं कि इनकी कोई राजनैतिक विचारधारा है या वे किसी दल के पक्षधर और विरोधी हैं, या इसलिए भी नहीं कि ये हिलेरी या जर्मन नीतियों के समर्थक हैं; अपितु इसलिए क्योंकि ये सरल हृदय, निष्कपट और निष्पाप हैं, इन्हें चालाकी, छल, प्रपञ्च, दुराव, कपट और झूठ आदि का अनुभव नहीं, ये किसी पर भी भरोसा कर लेते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि इन्हें लिबरल्ज़, लेफ्टिस्ट्स, सेक्युलर्ज़, नस्लीय, जाति-वर्गऔर संख्या आदि को देश से बड़े मानने वालों की सच्चाई का कोई अनुभव नहीं, इन्हें उनकी सच्चाई और असली रंग नहीं पता, इन्हें हाथी के अलग-अलग दाँतों वाली बात का पता ही नहीं, इन्हें नहीं पता कि समता, दया, प्रेम, उदारता, ममत्व, सहानुभूति, सह-अस्तित्व, साम्य, सामाजिक न्याय, वर्ग-हीनता, शोषण-मुक्ति जैसे हजारों शब्दों का सहारा केवल चुनाव जीतने और इन्हीं को संकट में डालने के लिए किया जाता है और इन्हें यह भी नहीं पता कि इसके क्या दूरगामी परिणाम हो सकते हैं, कि कैसे लेने और देने की भाषा अलग होती है और कैसे चालाक लोग दो चेहरे वाले होते हैं, कि कैसे इनकी ही सहायता ले इनके विरूद्ध षड्यंत्र रचा जाता है, कि कैसे 'फेसवैल्यू' पर नहीं जाना चाहिए, इन्हें नहीं पता कि इन सब के पीछे कौन-सी और किन की धूर्त चाले काम कर रही हैं । ये इतने सरल हैं कि झट से पिघल जाते हैं, दुष्परिणामों का इन्हें कोई अनुमान नहीं, इन्हें झट से बहकाया जा सकता है, ये किसी पर भी भरोसा कर लेते हैं, इनके निष्कलुष हृदय मानव-मात्र को सरल और सच्चा समझते हैं और इसीलिए इन्हें 'टार्गेट' किया जाता है, लुभावनी और द्रवित कर देने वाली बातों से इन्हें बरगलाया, भड़काया और भावुक किया जाता है और ये पिघल जाते हैं, प्रत्येक पर भरोसा कर लेते हैं। इसीलिए ये आज उन षड्यंत्रकारी शक्तियों के समर्थन में दिखाई देते हैं। यह वैसा ही है जैसे छोटे बच्चों को कम आयु में कभी-कभी अपने माता-पिता अपने शत्रु लगते हैं जब वे बच्चों के दूरगामी हितों के कारण कुछ कड़े और कड़वे निर्णय लेते हैं।


इसलिए, संसारभर के तथाकथित विचारको, साम्यवादियो, वामियो, अल्पसंख्यक तुष्टि-कारको, सेक्युलरो और राष्ट्र-भञ्जको ! हमारे सीधे सरल बच्चों के बहकने को अपनी जीत नहीं, अपितु उनकी सरलता और सिधाई समझिए। आज नहीं तो कल वे आपकी धूर्तता, षड्यन्त्र और चतुराई समझ जाएँगे। ये भारत के पले-बढ़े उन बच्चों जैसे नहीं हैं जो माँ के गर्भ से ही तेरा-मेरा और स्वार्थ या दूसरे के सर पर पैर रख कर आगे बढ़ना सीख कर आए हों ! पुरानी पीढ़ी ने अपने ढंग से नई पीढ़ी को आपके चंगुल में फँसने से बचा लिया है। 


मंगलवार, 6 सितंबर 2016

गगन गिल और अनिल जनविजय विवाद : कीचड़उछाल का खेल

गगन गिल और अनिल जनविजय विवाद  : कीचड़उछाल का खेल     - क. वा.


इधर कुछ दिनों से दो लोगों का एक व्यक्तिगत विवाद हिन्दी साहित्य से जुड़े लोगों की चर्चा के केंद्र में है और उसकी आग लगातार फ़ैल रही है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर #कीचड़ उछालने के खेल में रस ले-ले कर या बदले की भावना से तत्पर हो नित नए प्रहार कर रहे हैं और इस तरह वस्तुतः अपने आप को ही एक्सपोज़ कर रहे हैं और अपना स्तर गिराते-दिखाते जा रहे हैं। 


जो अनिल #जनविजय ने किया, वह गलत था और पहल उन्होंने ही की, जिसकी प्रतिक्रिया में #गगनगिल ने जो किया वह भी गलत ही था। एक व्यक्ति किसी की इज्जत उतारे तो वह गलत होता ही है, किन्तु बदले में हम उसकी इज्जत उतारते समय यह भूल जाएँ कि हमारी प्रतिक्रिया हमारा स्तर भी बताती है, यह तो कोई बात न हुई। 


दो लोगों के निजी संबंधों के चलते साहित्य से जुड़ा प्रत्येक व्यक्ति कटघरे में आ गया है,इसकी परवाह दोनों पक्षों में से किसी को नहीं रही। इक-दूजे के मान-सम्मान की धज्जियाँ उड़ाते समय अपने मान-सम्मान की धज्जियाँ और उड़ रही हैं, यह जब उनकी चिंता का विषय नहीं तो साधारण पाठक और दूसरे लोग क्यों और कब तक चिंतित हों ! 


दो लोग कीचड़ से खेल रहे हैं तो लथपथ होना स्वाभाविक है। जो निकट जाएगा, उस पर भी कीचड़ के कुछ न कुछ छींटे गिरेंगे ही। ऐसे में दोनों पक्षों के आत्मीय अपने पर कीचड़ गिरने का खतरा उठाते हुए भी उन्हें बचाने या साथ देने आगे बढ़ते हैं और कुछ-न-कुछ कीचड़ इस सहानुभूति के चलते वहन करते हैं। किन्तु बाकी बचे हुओं को उस कीचड़ में जाने की आवश्यकता क्यों है ? जो जितना कीचड़ से दूर रहकर बच सके उतना अच्छा है। 
यह कोई बड़ी सामाजिक नैतिकता और सामजिक मूल्यों या समाज-कल्याण की बात तो है नहीं कि हर किसी को लोक-कल्याण के लिए कीचड़ की परवाह न करते हुए भी उसमें कूदना-ही-कूदना है। 


इसलिए आवश्यक है कि किसी भी पक्ष की निंदा करने की अपेक्षा दोनों को शांत करने की और दूर हटाने की चेष्टा की जाए और उन्हें यह सन्मति और सलाह दी जाए कि इस कीचड़-उछाल में आपकी अपनी भी हानि ही हानि है। दूसरे पर कीचड़ उछाल कर आप दूध से धुले हुए निष्कलंक नहीं रह सकते। जितनी जल्दी जिसे समझ आ जाए और जो जितनी जल्दी इस से बचेगा उतना उसी का कल्याण है। 


दूसरे की गरिमा भंग करते समय व्यक्ति अपनी ही गरिमा से च्युत हो रहा होता है। हम तो इससे दूर रहने में ही सबका भला समझते हैं। जितने लोग अधिक जुड़ेंगे वे अपने-अपने पक्ष की हानि ही अधिक करेंगे, लाभ नहीं। सभी का दूर रहना और चुप रहना ही साहित्य और समाज के हित में है अन्यथा इस विकराल कीचड़-उछाल को और-और हवा-पानी मिल रहा है। 
यह कैसा प्रेम है, भई ?
- कविता वाचक्नवी 

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

जूते वर्जित क्यों हैं

जूते वर्जित क्यों हैं :  क. वा.



दक्षिण-भारत में रहने वाले जानते हैं कि वहाँ लोग अपने व दूसरों के घरों के भीतर भी जूते नहीं ले कर जाते हैं। यदि पहनने ही हों तो घर के जूते अलग होते हैं जिन्हें भीतर ही पहना जाता है। इसके पीछे कारण यह है कि बाहर पहने जाने वाले जूतों में मल, मूत्र, थूक और इस बहाने जाने किस किस बीमारी के बैक्टीरिया घर व भवन के भीतर प्रवेश कर जाते हैं और अंदर / भीतर पनपने लगते हैं। खुले वातावरण में धूप आदि रहती है तो कुछ कीटाणु नष्ट भी होते हैं और खुले में अंकुश रखा भी नहीं जा सकता, सिवाय लोगों को यह समझाने के कि जगह जगह थूको / मूतो आदि मत / कूड़ा कबाड़ा न फेंको और न सड़ने दो। किन्तु घरों के भीतर छाया व बंद होने के कारण ऐसे कीटाणु दिन दूनी गति से पनपते हैं और बीमारियाँ फैलाते हैं। ऐसे में घरों की साफ सफाई दिन-भर / बार-बार / हर-बार करते रहना गृहिणी के लिए संभव ही नहीं होता। अतः सभी सामाजिक सदस्य अपने उत्तरदायित्व को समझ कर बाहर की गंदगी के संपर्क में आए जूते बाहर ही छोड़ देते हैं, बहुधा परिवारों में तो शौचालय के जूते भी अलग होते हैं। इसके पीछे बड़ा वैज्ञानिक रहस्य है कोई कठमुल्लापन नहीं। जिन स्थानों को हम शुद्ध देखना चाहते हैं, वहाँ ऐसा करते हैं। जापान में आज भी ऐसा ही होता है।  



मन की बात, तो मन कोई पदार्थ नहीं है जो कक्ष अथवा भवन में कीटाणु ले आएगा। वह तो यदि व्याधि वाले कीटाणुओं / विषाणुओं जैसे दोष से भरा है तो उसकी शुद्धि के तरीके अलग हैं, वह भले बाहर हो या भवन के भीतर बराबर बीमार करेगा। दूसरों को बीमार करने से पहले खुद अपने मालिक को ही। उसे शोध न सकने वाले को दूसरों को शारीरिक रूप से बीमार करने की अनुमति दे दी जाए यह उचित तो नहीं। न उस पर अंकुश लगाना संभव है। परंतु जितना अंकुश संभव है, उतना करना कोई अपराध नहीं।


शायद कुछ ने वह ज़माना देखा होगा जब ऑफिस के कंप्यूटर हॉल में जूते उतार कर जाना पड़ता था, क्योंकि उस समय के सिस्टम धूल आदि में तुरंत ठप्प पड़ जाते थे। आज यद्यपि कंप्यूटर सिस्टम काफी हद्द तक रफ इस्तेमाल करने योग्य हो गए हैं किन्तु अभी भी सेंसेटिव उत्पाद यथा ऑडियो स्टूडिओ, रोगियों के लिए बने विशेष यंत्रादि कक्ष व कई बार रोगी का विशेष (इंटेसिव केयर ) कक्ष आदि इस नियम का अनुपालन करते हैं। आजकल विकसित पाश्चात्य देशों में डिस्पोज़ेबल 'शू-कवर' भी होते हैं। मेरे अपने ही घर में प्रवेशद्वार पर रखे रहते हैं, हैंडीमैन, बिजलीवाला या कामगार आदि जिन्हें सुरक्षा कारणों से जूते पहने हुए ही रहना होता है, वे जब घर के भीतर आते हैं तो अपने जूतों पर उन्हें पहन लेते हैं और फिर शू-कवर को फेंक दिया जाता है। पुरातन समय में दरवाजे पर हल्दी की रंगोली और गोबर से लीपना प्राकृतिक कीटाणुनाशक विधि ही थी। हम परम्परा की वैज्ञानिकता को भूल कर पोंगापंथी मात्र बन गए, जिसका परिणाम यह निकला कि जो कुछ पारम्परिक है,वह सब त्याज्य है और उसे गाली दी जानी चाहिए का अधिकार तथाकथित आधुनिकों को दे दिया। #KavitaVachaknavee
(ये विचार वर्ष २०१२ में किसी प्रसंग में व्यक्त किए थे)

शुक्रवार, 24 जून 2016

ब्रिटेन का भविष्य अब संसद (सांसत) में !

ब्रिटेन का भविष्य अब संसद (सांसत) में : कविता वाचक्नवी



‪#‎ब्रिटेन‬ की अर्थव्यवस्था, समाज और राजनीति में भारी उथल-पुथल मचा हुआ है। जनमत में योरोपीय महासंघ से अलग होने को बहुमत जो मिला है। 


इस वस्तुस्थिति के दो पक्ष हैं। एक तो यह कि वस्तुतः इस जनमत से आज की तिथि में ब्रिटेन महासंघ से न अलग हुआ है , न अलग होने जा रहा है। पहली बात तो यह कि जनमत के पश्चात् अब यह निर्णय देश की संसद में लिया जाना शेष है (यद्यपि संभावना यही है कि सांसद भी अपने अपने क्षेत्रों की जनता के विरोध में नहीं जाएँगे), फिर दूसरी बात यह कि यदि वे भी अलग होने पर मुहर लगा दें तो आधिकारिक रूप से महासंघ से अलग होने में 2 वर्ष का समय लगेगा, प्रक्रिया पूरी होने में।

दूसरा पक्ष यह कि मुद्रा ने डुबकी लगाई है जिससे राष्ट्र का सकल मुद्रा भण्डार निस्संदेह कमतर हुआ है, बृहद व्यापारिक प्रतिष्ठानों ( विशेषतः जो विदेशी मूल वालों द्वारा संचालित हैं) के विदेशी मूल के कर्मचारियों में अनिश्चय है। इस मध्य मात्र गत 2 घण्टे में ब्रिटेन ने 350 बिलियन पाउण्ड के अंतरराष्ट्रीय निवेश खो दिए हैं,  यह राशि योरोपीय महासंघ की चालीस वर्ष  की सदस्यता राशि के बराबर है।  पर ये सब छोटी बातें हैं। 

इन सबके मध्य सबसे भयंकर स्थिति यह है कि देश टूटने की कगार पर आ गया है, विशेषतः स्कॉटलैंड और आयरलैंड राज्य (जिन्होंने महासंघ के साथ रहने के पक्ष में मत दिया) वे अब अब देश से अलग होकर स्वतन्त्र देश के रूप में अपने भविष्य पर पुनर्विचार करने लगे हैं और आगामी 2 वर्ष में यह कभी भी घट सकता है। उत्तरी आयरलैण्ड के लोगों ने तो आज ही से अपनी नागरिकता बदलने की कवायद भी प्रारम्भ कर दी है।

इन सब स्थितियों को देखते हुए ब्रिटिश सांसदों (विशेषतः जो योरोपीय महासंघ से अलग होने का समर्थन करते हैं) पर संसद में अपना मत देते समय यह उत्तरदायित्व (बल्कि दबाव) होगा कि वे महासंघ से अलग होने की पैरवी करते समय देश के भी टुकड़े करने की पैरवी करेंगे।

संसद का निर्णय ही इस देश का इस देश के भौगौलिक रूप में भविष्य को भी तय करने वाला होगा। अन्यथा महासंघ से अलग होना यानि इस देश का दो या तीन भागों में विभक्त होना सिद्ध हो सकता है।

ध्यातव्य है कि यह सारा खेल अति-उदारवादी विचारधारा  के गर्भ से जन्मा और उसी की प्रचण्ड प्रतिक्रिया है। इसका सीधा प्रभाव अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव पर भी पड़ेगा।
 भारत इस से कुछ संकेत ग्रहण कर सके तो हितकर होगा।

  ‪#‎KavitaVachaknavee‬ #‎Brexit‬ ‪#‎UK‬
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