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बुधवार, 6 नवंबर 2024

क्या अमेरिकन समाज स्त्रीविरोधी है? : (डॉ.) कविता वाचक्नवी

क्या अमेरिकन समाज स्त्रीविरोधी है? :  (डॉ.) कविता वाचक्नवी

अमेरिका के चुनाव परिणाम की मेरी भविष्यवाणी पुनः सत्य हुई। लोग मुझे पूछते और बहुधा हँसते भी हैं कि मैं फलित ज्योतिष को तो मानती नहीं, फिर किस आधार पर भविष्यवाणियाँ किया करती हूँ और वे कैसे सत्य भी हो जाती हैं। तो ऐसे लोगों के लिए मेरा उत्तर है : समाज के मनोभावों, उस के सुख दुःख, उस की सोच तथा उस के मनोविज्ञान की मेरी कुछ–कुछ समझ के सहारे ही यह सम्भव होता है और शेष ईश्वर की कृपा से।

 अमेरिकन चुनावों पर 2016 से अब तक तीसरी बार जो भविष्यवाणी मैंने की उस की पृष्ठभूमि बताती हूँ। जो बात मैं कहने जा रही हूँ, मेरे उस आकलन / निष्कर्ष को पढ़ लोगों को आश्चर्य होगा और असहमति भी; किन्तु आधुनिक सामाजिक मनोविज्ञान का एक सत्य जानना हो तो इसे ठीक से समझना ही होगा।

 मुझे 90 के दशक से अब तक यूरोप, यूके और अमेरिका के समाज में रहने का अवसर मिला है, या कहें कि अनुभव प्राप्त हैं, अतः इस अत्याधुनिक समाज में रहते हुए इन की सम्वेदना, सोच तथा समझ के अलिखित सत्य का बहुत ठीक आभास भी मुझे प्राप्त है। उसी आधार पर यह तथ्य बताना समीचीन और आवश्यक भी है कि क्यों और कौन स्त्रियाँ / पुरुष / समाज अपना क्या भविष्य बनायेंगे।

जिन लोगों को लगता है कि अमेरिकन जनता महिला राष्ट्रपति को नहीं स्वीकार सकती इसलिए हिलेरी या कमला हारीं ; उन की समझ गलत है। वास्तविकता यह है कि (जैसा कि मैंने लगभग 5–6 वर्ष पूर्व लिखा भी था) यॉरोप तथा अमेरिका आदि देशों में फ़ेमिनिज़्म खोटा सिक्का हो चुका है, जो महिलाएँ, समूह अथवा वर्ग/दल/संगठन या व्यक्ति ऐसी मानसिकता के हों या इस के पक्षधर हों, वे पिछड़े और यहाँ तक कि वे कम आईक्यू के / या थोड़े मूर्ख माने जाते हैं। बहुधा इसलिए; क्यों कि फेमिनिज्म का सत्य फेमिनिस्टों ने उघाड़ कर दिखा दिया है। इन देशों में फेमिनिज्म को समूचे सामाजिक अध: पतन का मूल समझा जाता है अब, और निजी स्वार्थों की इच्छापूर्ति का हिंसक माध्यम भी।

यह तथ्य भले ही कहीं लिखित रूप में या उद्धृत रूप में उपलब्ध नहीं है, किन्तु है यही सत्य। समाज फेमिनिज्म को एक ऐसी प्रवृत्ति मानता है जो राक्षसत्व के तुल्य है और जिस ने समाज, परिवार तथा सम्बन्धों को नष्ट किया है। अतः समाज उन स्त्रियों को तथा उन समूहों को स्वीकार नहीं करता जो फेमिनिज्म की राह पर हों और पुरुषों को अपनी उस सोच के कारण नकारती हों। 

 इस के विपरीत निजी जीवन में जो जितनी स्त्रियोचित हैं, उन की समाज स्वीकार्यता उतनी अधिक है। आप इस के उदाहरण यहाँ के समाज और घरों में तो स्वाभाविक है दूर से नहीं देख सकते, किन्तु अमेरिका तथा यॉरॉप की राजनीति में तो कहीं से भी देख सकते हैं। 

कई अन्य तथ्यों के अतिरिक्त यह बड़ा तथ्य इन परिणामों की पृष्ठभूमि में बहुत बड़ा कारक था। कुछ और कारक भी थे, उन का उल्लेख कभी फिर समयानुसार करुँगी 

यह सत्य बताना इसलिए आवश्यक प्रतीत हुआ ताकि भारतीय समाज में जो स्त्रियाँ फेमिनिज्म का झण्डा उठा स्वयं को आधुनिक समझती हैं, वे अपना आकलन कर सकें और उन्हें अपनी वास्तविकता तथा भविष्य समझ आ सके। 
दूसरा कारण इसे लिखने का यह है कि जो लोग मेरी की भविष्यवाणियों पर प्रश्न करते हैं, उन्हें मेरी सामाजिक तथा मानवीय चित्त की समझ इस के मूल में है, यह पता लग सके।
– ✍️डॉ. कविता वाचक्नवी©

बुधवार, 28 अप्रैल 2021

कोरोना टीके से जुड़ी वह भूल जिस ने आप को आत्महन्ता बनाया : डॉ कविता वाचक्नवी




भारत में कोरोना बहुत विकराल अवस्था में है। वहाँ उस के विकराल होने के चार मुख्य कारण हैं। उनका उल्लेख करना इसलिए अनिवार्य लग रहा है क्योंकि उनमें से तीन अभी भी आम जन हेतु आत्मरक्षा में प्रासङ्गिक हैं।
  1. - अनुशासनहीनता, आत्म-नियन्त्रण का अभाव
  2. - कोरोना को राजनीति का हथियार समझ कर प्रयोग करने वालों द्वारा जन-मानसिकता-निर्माण की कुचाल (इस पर यहाँ सार्वजनिक रूप में लिखना नहीं चाहती। यदि किसी को वास्तव में जनहितकारी भाव में विस्तार से समझना हो तो निजी स्तर पर बतला सकती हूँ)
  3. - नीम-हकीमी वाला दम्भ
  4. - वैक्सीन व वैक्सिनेशन (टीका व टीकाकरण) को ले कर दो स्तर का भ्रम व अज्ञानता
अन्तिम बिन्दु के अतिरिक्त शेष सभी स्वतः स्पष्ट जैसे हैं। चौथे बिन्दु पर कथित पढ़े-लिखों को भी कुछ नहीं पता यह निरन्तर देखने में आ रहा है। अतः टीके से जुड़े तथ्यों को समझ लेना अनिवार्य है -
  • 4 (क) - पहले तो भारत में लोगों ने यह गलती की कि वे टीके को हौव्वा समझते रहे
  • 4 (ख) - विरोध की राजनीति व दुकान करने वालों ने खूब बरगलाया कि सरकार नपुंसक बनाना चाहती है, इसलिए टीका दे रही है। राजनैतिक आकाओं द्वारा यह भी कहा गया कि टीका हानिकारक है, हम तो नहीं लेंगे, न कोई और ले। इस कारण टीकाकरण खुल जाने के बाद भी लोगों ने उचित नहीं समझा कि जा कर टीका लगवा लें। उनके मूर्खतापूर्ण प्रचार ने कितनी हत्याएँ की हैं कि गणना नहीं।
  • 4 (ग) - उपर्युक्त सब कुछ कर चुकने के बाद अन्ततः जैसे-तैसे जब लोगों ने टीका लगवा लिया, तो उसके साथ ही एक अन्य भूल हुई। उसी के स्पष्टीकरण हेतु आज यह सब लिखना आवश्यक लगा क्योंकि आज से 18 वर्ष तक के सभी लोगों के लिए टीके का पञ्जीकरण खुल गया है। कृपया इसे ठीक से समझ लें ताकि टीके के पश्चात् स्थिति निम्नतर न हो।
बचना यह समझने से है कि यह टीका बुखार या अन्य रोगों के टीके की भाँति कार्य करता है। नहीं, कदापि नहीं। वे टीके दवा को टीके के रूप में देकर तुरन्त प्रभावी होते हैं और यह टीका वस्तुतः चेचक व तपेदिक आदि के टीके की भाँति है, जो प्रतिरक्षा प्रणाली में परिवर्तन करता है और 'एण्टीबॉडी' का निर्माण करता है। उन एण्टी बॉडी के निर्माण की प्रक्रिया को सक्रिय करने के लिए टीके के द्वारा उसी रोग के विषाणु/जीवाणु आदि मनुष्य के भीतर सुरक्षित प्रक्रियानुसार प्रविष्ट करवाए जाए हैं ; यह सुनिश्चित करने वाले अवयवों के साथ, कि देह पर रोग का प्रकोप न हो व वह कोरोना के बाहरी प्रक्षेप से बचने के लिए 'एण्टी बॉडीज़' निर्माण करने लगे ताकि समय आने पर प्रतिरक्षा-प्रणाली उनका प्रयोग कर स्वयं को बचा सके। यह कुछ-कुछ विष को विष द्वारा मारने के सिद्धान्त पर कार्य करता है। जैसे तपेदिक और चेचक आदि के टीके में तपेदिक व चेचक के जीवाणुओं का प्रयोग किया जाता है।

अतः जब कोरोना का टीका लगता है, या लगेगा तो उस के पश्चात् हमारा प्रतिरक्षा तन्त्र टीके के माध्यम से सुरक्षित प्रक्रिया द्वारा प्रविष्ट हुए उस वायरस के विरोध में सक्रिय हो जाता है व उस से लड़ने के लिए एण्टीबॉडीज बनाने में लग जाता है ताकि अवसर आने पर वह कोरोना से युद्ध जीत सके। बाह्य स्तर पर प्रथम टीके के पश्चात् प्रारम्भ होने जा रही इस प्रक्रिया का अधिकांश को पता नहीं चलता क्योंकि मेडिकल ने इसे स्वास्थ्य-सुरक्षा मानकों के अनुरूप ही बनाया है। दूसरे टीके के पश्चात् अधिकांश को बुखार आदि आना उसी का परिणाम है। जो यह बताता है कि हमारा प्रतिरक्षा तन्त्र बहुत प्रभावित हुआ है और भीतर काम जारी है।

वस्तुतः टीका लगने के बाद हमारा प्रतिरक्षा तन्त्र (इम्यून सिस्टम) टीके के माध्यम से कोरोना का जो सुरक्षितअंश 'एण्टीबॉडीज़' निर्माण के उद्देश्य से हमारी देह में भेजा गया है, उस के प्रभाव में होता है, एक प्रकार का परिवर्तक युद्ध लड़ रहा होता है। अतः पहले टीके के बाद हमारी इम्यूनिटी (साधारण शब्दों में इसे सुरक्षा-बल कह सकते हैं) अल्प काल के लिए कम हो जाती है। दूसरा टीका लगने के बाद तो हमारी इम्यूनिटी एक प्रकार से और भी कम हो जाती है क्योंकि वह भीतरी परिवर्तनों के लिए युद्दहस्तर पर व्यस्त होती है। इसलिए वह किसी भी बाहरी दबाव या लापरवाही को नहीं झेल सकती। इम्यूनिटी को पूरा सामान्य होने व युद्ध जीत कर वापिस लौटने में (दूसरे टीके के पश्चात् ) कम-से-कम दो माह और लगते हैं। यदि आप को दो टीके नियमानुसार लग गये, आपने अनुशासन आदि का पालन किया तो कोरोना यदि कभी हुआ भी तो रोग की उग्रता व गम्भीरता कम होगी, कम-से-कम आप तब मरेंगे नहीं, ऐसा डॉक्टर बताते हैं।

इसलिए पहले टीके से लेकर दूसरे टीके के दो माह पश्चात् तक विभिन्न अनुपातों में हमारा सुरक्षा-तन्त्र एकदम कमजोर व भीतरी युद्ध में लगा हुआ होता है। ऐसे में किसी भी प्रकार की न्यून-से-न्यून लापरवाही भी बहुत भारी पड़ जाती है। जिन लोगों ने पहला व/या दूसरा टीका लग जाने के उपरान्त अनुशासन नहीं रखा व टीका लगते ही "हुर्रे,चलो अब तो पार्टी करें" वाला आचरण किया वे सब धरे-दबोचे गए और इसीलिए भारत में स्थितियाँ बिगड़ गईं। जब कि बार-बार बताया जा रहा था कि टीकाकरण के पश्चात् भी उन सब नियमों व अनुशासनों को मानना-अपनाना पड़ेगा जो गत वर्ष से कोरोना के सन्दर्भ में बार-बार समझाए जाते रहे हैं। बल्कि पहले से प्रारम्भ कर दूसरे टीके के कम-से-कम दो सप्ताह बाद तक तो आप स्वस्थ मनुष्य से बहुत कमतर स्थिति में होते हैं क्योंकि संक्रमण की आशंका इस समय सामान्य से भी अधिक होती है। तत्पश्चात् वह धीरे-धीरे सामान्य होने लगती है व दो माह उपरान्त एकदम सामान्य हो जाती है। दूसरे टीके के दो सप्ताह उपरान्त और फिर दो महीने बाद आप क्या-क्या कर सकते हैं और क्या-क्या तब भी प्रतिबन्धित रहेगा इसे ठीक से जानना अनिवार्य है। सभी मेडिकल बुलेटिन में इसे बताया जा रहा है। जिन्हें समस्या हो, उनके लिए मैं भी उन बातों को समझने में सहायता कर सकती हूँ ।

पहले से प्रारम्भ कर दूसरे टीके के कम-से-कम दो सप्ताह बाद तक तो आप स्वस्थ मनुष्य से बहुत कमतर स्थिति में होते हैं और संक्रमण की आशङ्का इस समय सामान्य से भी अधिक होती है। क्योंकि देह का इम्यून सिस्टम टीके द्वारा प्रविष्ट हुए अवयवों से होते परिवर्तनों से युद्धस्तर पर जूझ रहा होता है। दो महीने लगते हैं उसे उबरने में। अतः इस अवधि की लापरवाही कष्टकर हो सकती है।              - इसी लेख से 

आपकी देह में स्थिति आपका सुरक्षाबल पहले टीके से ले कर दूसरे टीके के दो माह पश्चात् तक एक भीतरी परिवर्तक युद्ध में स्वयं को झोंके हुए होता है। इसलिए उसे बाहरी शत्रुओं से बचा कर रखना अनिवार्य है। अन्यथा वह इस युद्ध में आपकी देह की रक्षा नहीं कर सकेगा। यह निश्चय आप को करना है कि आप अपनी देह को ध्वस्त होते देखना चाहते हैं अथवा स्वस्थ। निर्णय आपका : लाभ हानि आप की व आप के अपनों की।

सोमवार, 4 सितंबर 2017

अमेरिका : डूब-उबरने के दिन

अमेरिका में 'हार्वी' : डूब-उबरने के दिन    - कविता वाचक्नवी



यों तो चक्रवात और उसका ताण्डव समाप्त हो चुका है किन्तु किन्तु अभी भी हजारों परिवार बेघर हैं, उनके घर पानी में डूबे हैं और विपदा से उनकी लड़ाई आगामी 6 माह कम-से-कम और चलनी है। हमारे संस्थान के अध्यापक-अध्यापिकाएँ मिलकर अनेक प्रकार के सेवाकार्यों, उन्हें अस्थाई सुरक्षित आवास उपलब्ध करवाना, दैनिक आवश्यकता का सामान पहुँचाना, शाकाहारी भोजन स्वयम् घरों में बना कर प्रतिदिन उन्हें पहुँचाना, उनके पानी में डूबे घरों की मरम्मत की व्यवस्था, उनके घरों के पुनर्निर्माण में सामग्री, फर्नीचर, बिस्तर आदि क्रय कर देना आदि प्रकार की भागदौड़ में लगे हैं। दानदाताओं से $32000 एकत्र भी किए हैं, हमारा लक्ष्य $50000 का है।

जिन्होंने परिजन-घर और बहुत कुछ खोया है, वह तो नहीं लौटाया जा सकता, किन्तु इस विपदा में पूरे देश का एकजुट सहयोग अनुकरणीय है। ध्यातव्य है कि प्रयोग की हुई वस्तुएँ यहाँ दान में नहीं दी जातीं, जिसे जो देना है वह क्रय कर देना है। रेस्टोरेंट्स, संस्थान, स्टोर्ज़, कम्पनियाँ, व्यापारिक घराने, आम जनता, विद्यालय, विश्वविद्यालय, युवा संगठन, छात्र संगठन, अध्यापक संगठन, कर्मचारी संगठन, आवास संगठन आदि लाखों-लाख संस्थाएँ और संगठन, हाथ का काम करने वाले कामगार और आम जन तक अपनी निःशुल्क सेवाएँ और सहयोग जनता और सरकार को दे रहे हैं। 


कहीं कोई चीख-पुकार, शिकायतों का कोई शब्द, दोषारोपण, तेरा-मेरा, पहले आप, छीना-झपटी, या सरकार भरोसे की स्थित अथवा दृश्य नहीं है। सब शान्ति व सद्भाव से सहयोग एवं सेवा में एकजुट हैं, किसी को सेवा के बहाने अपना या अपनी संस्था का नाम चमकाने में रुचि नहीं। डेढ़-दो लाख से भी बहुत अधिक संख्या में स्वयंसेवक जुटे हुए हैं। कई स्वयंसेवक तो ऐसे हैं, जो स्वयं अपना बहुत कुछ इस आपदा में गँवा चुकने के बाद आँसू छिपाए दूसरों की आँसू पोंछ रहे हैं, सरकारी सहायता भी आई है।

देश ऐसे बनते हैं, जनता से बनते हैं, जनता देश को जैसा चाहे बना सकती है, उसे देश में जो व जैसा परिवर्तन चाहिए वैसा व उस दिशा में स्वयं काम करने लगे..... बस उसी दिन से पुनर्निर्माण एवम् परिवर्तन प्रारम्भ जो जाता है। आरोप, शिकायतें, अपेक्षाएँ, उत्पात, छद्म और स्वार्थ भौगोलिक सीमाओं को #देश होने से रोकते हैं।


शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

महिलाओं के दोष

महिलाओं के दोष : कविता वाचक्नवी 


तीन वर्ष पहले (आज ही के दिन जब यह लेख लिखा गया था) एक तथाकथित लेखिका (म.ग.) के लेख में लिखे गए शब्द थे - "मेरे द्रष्टिकोण से "सर्वोतम माँ " वो है जो प्रारम्भ से अपने बेटे को स्त्री जाति का सम्मान करना सिखाती है। जो पुरुष स्त्री जाति को हीन भावना से देखते हैं, उन के विकास में बाधक बनते हैं, उन के प्रति दुर्व्यवहार करते हैं ,हाथ उठाते हैं, बलात्कार करते हैं उन की हत्या करते हैं ,ये सब एक असफल माँ की "अमानुष" संतान होते हैं ". ……


पहले भी अनेक महिलाओं के इस प्रकार के वक्तव्य पढ़ती आई हूँ, कई महिलाएँ तो मेरे यहाँ आकर इस तरह के अपने विचार लेकर मुझसे दूर तक झगड़ती रही हैं, उन्हीं दिनों एक महिला (अ.भा.) लंबा युद्ध छेड़े रही महिलाओं के विरोध में मेरे यहाँ  फेसबुक पर।


Image result for blaming women वस्तुतः महिलाओं को दोष देने की यह प्रवृत्ति पुरुषवादी सोच का परिणाम है। अतः इसीलिए मेरा विरोध पुरुषों से नहीं अपितु पुरुषवादी सोच से है, चाहे वह स्त्रियों में हो या पुरुषों में। अधिकाँश स्त्रियों की कंडीशनिंग ही ऐसी होती है।

उक्त महिला की माओं को कटघरे में खड़ी करने वाली प्रारम्भ में लिखी बात पर, मेरी दो-तीन आपत्तियाँ हैं, वे संक्षेप में इस प्रकार समझी जा सकती हैं।

- पहली बात उनका वह स्टेटस उसी भावना से प्रेरित लगता है जैसे 60-100 साल पहले 'स्त्रियाँ सन्नारी कैसे बनें', 'पत्नी पथ प्रदर्शक' आदि पुस्तकें तमाम लोगों ने लिखीं, जो ये समझते थे कि स्त्रियों को सुधारना चाहिए, हमें स्त्रियों को सुधारना है, हमें स्त्रियों को सही पथ पर चलाना है, स्त्रियाँ मूर्ख, अशिक्षित और असभ्य होती हैं, उन्हें शिक्षित करने और घर गृहस्थी, पति की सेवा, बच्चे पालन, सन्नारी व सु-नारी बनने के उपदेशों की आवश्यकता है और घर चलाने, पति की सेवा करने, बच्चों को पालने, सास ससुर की सेवा करने, पति का आज्ञा पालन करने, पति को परमेश्वर समझने, सिलाई बुनाई करने में अपना समय लगाने, इधर-उधर की बातों में न फँसने की शिक्षा पुरुषों द्वारा दी जानी चाहिए। इसलिए लोगों ने स्त्री को उपदेश देने वाली पुस्तकें लिखीं ताकि स्त्रियाँ सुधरी रह सकें।

- दूसरी बात, बच्चे कभी उपदेशों से नहीं सीखते, न सिखाने से सीखते हैं। बच्चे केवल और केवल आचरण से सीखते हैं। माँ या पिता भले ही उन्हें लाख उपदेश देते रहें, वे इन उपदेशों और आदेशों से कुछ नहीं सीख सकते, क्योंकि बच्चे केवल आचरण से सीखते हैं। उनके घर-परिवार में या फिर समाज में क्या व्यवहार होता है, वे इस से सीखते हैं।

माँ उन्हें लाखों सदुपदेश भली ही दे भी ले, तब भी यदि घर के लोगों या पिता का व्यवहार उन संस्कारों के अनुकूल या मेल न खाता हुआ है, तो बच्चे उन उपदेशों से कभी नहीं सीखेंगे अपितु वही सीखेंगे जो वे अपने घर में देखते हैं।

साथ ही ध्यान रखने की बात यह है कि कितने प्रतिशत भारतीय परिवारों में स्त्री को पारिवारिक निर्णय या संतान के निर्णय लेने का अधिकार होता है ? स्त्रियाँ अपने जीवन के निर्णय लेने तक में स्वतंत्र नहीं होतीं, भला क्या तो वे संतान के जीवन के निर्णय लेंगी ! जो कुछ वे सिखाना-बनाना चाहती होंगी अपने बच्चों को, पूरा परिवार मिलकर एक झटके में उस पर पानी फेर देता है। उदाहरण स्वरूप, स्त्री सिखाए कि शराब पीना गलत है, न पियो, किन्तु यदि पिता ही रोज पीता है और पीटता व झगड़ा करता है तो क्या स्त्री का बस चलता है? संतान वही सीखेगी जो वह देखती है। सारे संस्कार धरे रह जाते हैं। इसलिए ऐसी बातें वे स्त्रियाँ कर सकती हैं जो अपने घरों में बैठी सौभाग्य से अपने अच्छे मिले पति के कारण सारी दुनिया की स्त्रियों को वैसा ही समझती हैं और संसार के सारे दुष्कर्मी पुरुषों की बुराइयों का दोष उनकी माओं के मत्थे मढ़कर उन्हें ही नाकारा और अपराधिनी घोषित करती हैं।


संतान के दुष्कर्मी या बुरे आदि होने का आरोप या तो बराबर सब (समाज, परिवार, पिता व अंत में माँ) पर है, अन्यथा अकेले माँ पर तो कदापि नहीं है, जब तक कि पिता सहित पूरा परिवार माँ का सहयोगी न हो। इसलिए सर्वोत्तम माँ की अपेक्षा सर्वोत्तम पिता की बात लिखनी चाहिए। सर्वोत्तम माँ की बात लिखना नीच संतान या नीच, अमानुष व दुष्ट संतान के अपराधी या अमानुष होने का आरोप माँ पर लगाने जैसा है।


शनिवार, 12 जनवरी 2013

दामिनी के विरुद्ध

दामिनी के विरुद्ध  :    डॉ. कविता वाचक्नवी




इन दिनों नेट पर, पत्र-पत्रिकाओं में लोग भावविह्वलता में दिल्ली में नृशंसता की शिकार हुई दामिनी के नाम पर कविताएँ लिख रहे हैं, गीत, छन्द, मुक्तक लिख रहे हैं ...... और इस भावुकता में उसे 'बलिदानी', कह कर उसका महिमा-मंडन कर रहे हैं, उसके त्याग और बलिदान का गुणानुवाद कर रहे हैं । (जबकि वह नृशंसता की 'शिकार' थी)। 

यह भक्तिभाव के भक्तिगीतों जैसा महिमामंडन इतना हास्यास्पद व अनैतिक है कि मुझे डर है कि कुछ दिन में दामिनी के नाम पर पूजापाठ न शुरू हो जाएँ; क्योंकि भारतीय समाज ऐसा ही करता रहा है। और ऐसा कर के जहाँ वह एक ओर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेगा; दूसरी और यह ठीक वैसी ही मानसिकता व दबाव बनाएगा जैसा सती आदि प्रसंगो में। 

"अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाली स्त्री ही महान होती है' की सामाजिक मानसिकता के चलते हमारे घरों में लड़कियों को अपने सारे सुख-चैन को तिलांजलि देकर सब कुछ बलिदान कर महान बनने व तभी सम्मान अर्जित करने योग्य हो पाने की घुट्टी पिलाई जाती है....... । जो स्त्री अपने सुख, स्वास्थ्य, सम्मान, निर्णय, इच्छा, आवश्यकता, शौक या अपनी किसी भी तरह की परवाह न कर परिवार व दूसरों के लिए घुट-घुट कर मर जाए, त्याग पर त्याग करती रहे या अपने बारे में कदापि न सोचे, उसे ही सदाचारी, महान, सुसंस्कृत, सन्नारी माना जाता है। इस चक्कर में लड़कियाँ और महिलाएँ अपने जीवन को गला-गला कर भी दूसरों की नजर में थोड़े से सम्मान व इज्जत के लिए तरसती अपना आप खोती रहती हैं। 

हम लोग या तो स्त्री को पूजा के आसन पर देवी बना कर प्रतिष्ठित करते हैं या फिर जो देवी के सिंहासन पर न बिठाई जाती हों, उन सब को पायदान या जूती समझ कर जीवन भर प्रताड़ित करते या स्वयं अपने आप में ही उन्हें अपराधबोध से भरते रहते हैं। इन दो पदों के बीच 'मानवी' होने का विकल्प उसके लिए हमारी सामाजिकता में उपलब्ध ही नहीं है, है तो स्वीकार्य ही नहीं है।

इस अस्वीकार्यता के पीछे त्याग का महिमामंडन करने की हमारी मानसिकता का ही हाथ है। त्याग के महिमामंडन की इस प्रवृत्ति ने स्त्रियों का बड़ा अनिष्ट किया है और स्त्री की सामाजिक स्थिति के घोर अमानवीय होने का यह एक बड़ा व महत्वपूर्ण कारक है। लड़कियाँ/स्त्रियाँ दूसरों की नजर में सम्मान पाने के लिए जीवन-भर समझौते करती व त्याग करती चली जाती हैं। 

स्त्री के मानवी होने की स्वीकार्यता के लिए यह नितांत आवश्यक है कि हम सबसे पहले त्याग का महिमामंडन बंद करें और न्यूनतम उनके मनुष्य होने के अधिकारों को पाने का अधिकार उनके लिए सुरक्षित करें। अन्यथा कर्तव्यों और त्याग बलिदान का सारा दायित्व स्त्री के सिर और अधिकार, निर्णय व मालिकाना रौब सारा लड़कों के नाम करते घरों में भेदभाव करते रहेंगे।


इसी भेदभाव के चलते ही समाज में ऐसी नृशंस घटनाएँ अनवरत होती रहेंगी क्योंकि स्त्रियाँ किसी न किसी की जागीर बनी रह कर उनके अधिकार क्षेत्र में आएँगी कि वे चाहे जैसे उन्हें जोतें या चाहे जैसे उन्हें इस्तेमाल करें। वे तो केवल धरती की तरह चुपचाप सब कुछ सहती हुईं सर्वस्व देने को सदा प्रस्तुत रहेंगी। और फिर समाज उनके इस बलिदान ( छीन कर लिए गए ) के बदले उन्हें श्रद्धा के सिंहासन पर बिठाकर देवी की तरह पूजने लगेगा । .......और महिमामंडन के बहाने अपने अपराधों, अन्यायों को उसकी दिव्यता की अनिवार्य शर्त व कसौटी बनाए रखेगा। 

इसलिए दिल्ली में नृशंसता की शिकार हुई बच्ची की मृत्यु तथा अत्याचार की सहनशीलता के महिमामण्डन को बंद कर उसके साथ हुए अनाचार के विरुद्ध कदम उठाने में अपना वैचारिक व क्रियात्मक योगदान करें तो बेहतर होगा। अन्यथा जो ऐसा नहीं कर उसका महिमामण्डन कर रहे हैं वे स्त्री के विरुद्ध होने वाले अपराधों व नृशंसता में बराबर के भागीदार हैं। 

महिलाओं व लड़कियों को जब तक समाज व परिवार में ऊँचा स्थान, मान-सम्मान व विशेष महत्व नहीं दिया जाता, जब तक वाणी, व्यवहार, मानसिकता और दृष्टि से भी उनके प्रति अवमानना, तिरस्कार आदि की भावना लेशमात्र भी शेष है, तब तक यह हवा स्त्रियों के आँसुओं से यों ही तर होती रहेगी.... आने वाली पीढ़ियों की स्त्री भी कभी अभिशाप से मुक्त नहीं हो पाएगी भले ही कितने भी आधुनिक साधन जुटा लें या नए-नए दंड और बढ़िया से बढ़िया अदालतें खड़ी कर लें।

स्त्री को मान देने की अपेक्षा हमारे समाज में उसके गुणों (वे भी उसके शोषण के लिए आरोपित किए हुए) को महत्त्व देने की रूढ़ि चली आती रही है,
  • 'पत्नी पथ-प्रदर्शक' लिखे गए, उसके त्याग को सामाजिक उत्सव व आयोजन बनाया गया 
  • सती की पूजा होती रही और उसके नाम पर देवालय स्थापित हुए 
  • परदे में रहने को उसकी सच्चरित्रता से जोड़ा गया 
  • बचा-खुचा खा लेने को उसके सन्नारी होने का पर्याय माना गया 
  • उसके सर्वस्व लुटा कर बलिदान हो जाने को मातृत्व का पर्याय माना गया 
  • उसके केशमोचन करा रूखा-सूखा खा बिना बिछौने सो जाने को सके वैधव्य की तपस्या के साथ जोड़ा गया 
  • पतियों के व्यभिचार की अनदेखी को उसके बडप्पन व घर को बचाए रखने के औदार्य का नाम दिया गया 
  • ससुराल से अर्थी पर विदा होते समय ही निकलने को उसके सुखी विवाहिता होने 
  • माता-पिता की लाज निभाने के प्रण को जान देकर भी निभा लेने के साहस से जोड़ा गया 
  • पिट-पिट कर नीले हो जाने से लेकर गंभीर घायल तक हो जाने पर भी गिर पड़ने का बहाना कर चुपचाप अगली सुबह समाज को 'सब कुछ बढ़िया है' का भ्रम देने को पति की मान-मर्यादा का सम्मान करने का नाम दिया गया 
  • घरों के भीतर ही भीतर चलने वाले पापाचारों को छिपा-झेल कर दांत में जीभ दबाए जीवनभर निभा ले जाने को सतवंती नार का लक्षण कहा गया 
  • बेमेल विवाह से लेकर सौदा हो जाने तक को परिवार की लाज बचाने के लिए दिया गया बलिदान कहा गया

...... हजार चीजें हैं जहाँ लड़कियों को 
  • अपमान सहना, 
  • बेड़ियों में बंद रहना, 
  • अपने सामान्य से सामान्य अधिकार को परिवार और समाज के लिए तिलांजलि देते चले जाना,
  • गऊ की तरह खूँटे से बंधे रहकर दुहे जाने को तत्पर रहना, 
  • धरती की तरह सब कुछ सह सबको क्षमा करते चले जाना, 
  • अपनी देह को लज्जा की वस्तु समझ उसके लिए शर्मिन्दा होते रह उसे लुकाए-छिपाए रहना और लज्जा का प्रतिमान होना, 
  • कभी भी छोड़ दी जाने को शापित रहना, 
  • घरों, मोहल्लों व बाजारों में किसी के भी द्वारा छेड़छाड़ पर आपत्ति न कर स्वयं पर ही शर्मिन्दा हो रोना-घुटना और सरेआम तमाशा बनना,
  • पुरुषों के 'बिल्ट-इन' गुणों (?) व आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तत्पर रह सब कुछ झेल ले जाना,
  • पंगु से पंगु, क्रूर से क्रूर, महाचरित्रहीन से ले नपुंसक और नालायक से नालायक पति के दुर्दिनों में उसके साथ खड़े होने का 'साहस' दिखा सहनशीलता की देवी बनना
 घुट्टी में पिला कर सिखा-पढ़ा दिया गया है।

 जो स्त्री/ लड़की ऐसा नहीं करती उसे कुलटा, डायन, चरित्रहीन और न जाने क्या-क्या कह कर, क्या-क्या कर कर तिरस्कृत व प्रताड़ित किया जाता है। अपने लिए सोचना व करना उसके लिए जीवन-भर निषिद्ध है। इस निषिद्ध का पालन करने की पल पल पर परीक्षाएँ और सबूत उसे देते रहने पड़ते हैं। इतने सब को निभा ले जाने वाली ही वास्तव में थोड़ा-सा सम्मान और अधिकार पा सकती है।

लडकियाँ/ महिलाएँ इस सम्मान को पाने के लिए जीवनभर जुटी रहती हैं, परस्पर दौड़ मची रहती है उनमें, कि मालिक लोग किसे तमगा देते हैं, कैसे तमगा प्राप्त किया जाए। उसे दबाने कुचलने वाले ही उसे पुरस्कार देने वाली ज्यूरी बनते हैं, क्योंकि उनके पास विधिवत् मारने-पीटने, लज्जित-प्रताड़ित करने, सताने-धमकाने, छल-कपट कर इस्तेमाल करने का आधिकारिक लाईसेंस होता है। स्त्रियाँ इन लाईसेंस धारकों से प्रमाणपत्र लेने के लिए कतार में लगी रहती हैं, जुटी रहती हैं, कभी कभी हाथापाई तक करती हैं, अपनी बेगुनाहियों के सबूत जुटाती देती रहती हैं और इस सारे में मची भागदौड़ के बीच नरपिशाच अपनी कीमत लेते रहते हैं, अपनी शक्ति और अधिकार का प्रदर्शन व प्रयोग कर महिलाओं की महिमा जाँचते (?) रहते हैं। उनके हिंसक से हिंसक और बीभत्स से बीभत्स शक्ति प्रयोग को झेल ले जाने वाली लड़कियों / स्त्रियों को वे बड़े बड़े तमगों से सुशोभित करते हैं।

ऐसा ही तमगा दामिनी को बलिदानी घोषित कर, उसके जीवनदान (?) को उसके त्याग, महानता और महिमामंडन के रूप में दिया जा रहा है। लोग गलदश्रु भावविह्वलता और भक्तिभाव से उस पर तुरता रचनाएँ लिख कर धरती पर लोटपोट हो रहे हैं। ताकि लाईसेंस जारी करने का काम निर्विरोध चलता रहे और लाईसेंस देने वाले संस्थान की मान्यता बनी रहे। स्त्रियों में इस लाईसेंस को लेने की होड़ मची रहे और संसार में मानवता को बचाए रखने का जिम्मा लेकर पैदा हुई महिलाएँ अपनी महानता को याद कर उस महानता के लिए पूर्ववत् कटिबद्ध रहें, प्रतिबद्ध रहें और हाँ .... बद्ध भी रहें।




नोट: इस लेख का संक्षिप्त अंश १३ जनवरी २०१३ के जनसत्ता में प्रकाशित हुआ है


शुक्रवार, 25 जुलाई 2008

परिचय इतना इतिहास यही....

परिचय इतना इतिहास यही...... 
An Author, Poet, Editor, Sociolinguist, Educator, Critic, and Vedic Visionary / Faith Leader (Community, Culture and Education)

शिक्षा :
  • एम.ए.-- हिन्दी (भाषा एवं साहित्य) 
  • प्रभाकर-- हिन्दी साहित्य एवं भाषा 
  • शास्त्री – संस्कृत साहित्य 
  • एम.फिल. -- Sociolinguistics (स्वर्णपदक)​​​​ 
  • पी.एच.डी. -- आधुनिक हिन्दी कविता, इतिहास और आलोचना 
भाषाज्ञान :  पंजाबी, हिंदी, संस्कृत, मराठी, अंग्रेजी

कार्यानुभव 
  • निदेशक - V. S. S. Global® (New York)
  • निदेशक : ऋषिकुलम् (RishiKulam International)
  • Foreign Language Instructor: International Language Institute, DC International Language Institute, DC
  • Asian Studies Expert: Snorkel AI
  • Language Proficiency ILR Tester (ICA, USA)
  • OPI: A US Federal Agency
  • Foreign Language Educator: LT, New York
  • Foreign Language Course Instructor: VL 247 (USA)
  • Lead Instructor: Indian Culture, Heritage, and History: India Center of Westchester, NY
  • Lead Instructor: Hindi: India Center of Westchester, NY
  • Adviser: Center For Inner Sciences, Britain
  • Counselor: Sexual Abuse, Domestic Crime & Violence (USA)
  • Consultant Curriculum Developer, Editor) : Avant Assessments, USA (2019 -2020 & 2023-2024)
  • Chaplain : Houston Methodist, TX, USA (2016 -2021)
  • संस्थापक-महासचिव : 'विश्‍वम्भरा' : भारतीय जीवनमूल्यों के प्रसार की संकल्पना (संस्था) (2002
  • संस्थापक - विश्वम्भरा : विश्वहिन्दी-भाषा-लेखक-संघ एवं विश्वम्भरा हिन्दी लेखिका संघ
  • निदेशक : DAVSS (अमेरिका), (May 2015 - July 2021)
  • सम्पादक : सार्थक (मासिक साहित्यिक पत्रिका) (2015-2020)
  • सलाहकार (भाषा) : इन्टरनेशनल एक्ज़ामिनेशन, केम्ब्रिज विश्वविद्यालय, ब्रिटेन (2014-2023)
  • परीक्षक (हिन्दी) : इन्टरनेशनल एक्ज़ामिनेशन, केम्ब्रिज विश्वविद्यालय, ब्रिटेन (2013-2023)
  • कार्यकारिणी सदस्य : केदार सम्मान समिति (2008-2016)
  • Educator and Board Member : Central School Committee of India (2003 -2006
  • Visiting Faculty Mahatma Gandhi International Hindi University (India) · (2006)
  • Part time Faculty : PG & Research Institute, University Wing, DBHP Sabha (India) (1998 - 2000)

प्रकाशन :

  • "महर्षि दयानन्द और उनकी योगनिष्ठा" (शोध पुस्तक) 1984 / (गोविन्दराम हासानन्द प्रकाशननई दिल्ली)
  • "मैं चल तो दूँ" (कविता पुस्तक) 2005 (सुमन प्रकाशनहैदराबाद)
  • "समाज-भाषाविज्ञान : रंग-शब्दावली : निराला-काव्य" (पुस्तक) जनवरी 2009 / (हिन्दुस्तानी एकेडेमीइलाहाबाद), (रंग-शब्दावली के समाजभाषिक विश्लेषण व सैद्धांतिकी पर हिन्दी में प्रथम व एकमात्र पुस्तक) 
  • "कविता की जातीयता" (आलोचना-ग्रन्थ) मार्च 2009 / हिन्दुस्तानी एकेडेमीइलाहाबाद)
  • “मॉम, डैड और मैं” (उपन्यास) (2016अनामिका प्रकाशन प्रयागराज, ISBN 13, ISBN 10) सहलेखक
  • हाशिएय उलाँघती औरत : प्रवासी कहानियाँ (9383515031/ ISBN-13‏:‎ 978-9383515035, स्वराज प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली) जनवरी 2017
  • कवितागीतकहानीशोध, 50 से अधिक पुस्तकों की समीक्षाएँसंस्मरणललित निबन्धसाक्षात्कार तथा रिपोर्ताज आदि विधाओं में देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर लेखन
  • नेक रचनाओं के नॉष्क, पंजाबीनेपालीअसमियाबोडोतेलुगुतमिल व अंग्रेजी में अनुवाद हुए
  • एन.सी.ई.आर.टी.की अन्यभाषा/ हिन्दी की पाठ्यपुस्तक (कविता सम्मिलित) 2002
  • 'ओरियंट लाँगमैनकी 'नवरंग रीडर' (दोहे सम्मिलित) 2003
  • केरल राज्य की 7वीं व 8वीं की द्वितीय भाषा हिन्दी की पाठ्यपुस्तक (बाल कविताएँ सम्मिलित) 2002
  • टीवी विज्ञापनों के लिए लेखन
  • अनेकानेक प्रतिष्ठित समवेत संकलनों / प्रकाशनों में विविध विधाओं की ढेरों रचनाएँ
  •  दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा अनिवार्य हिन्दी के आधार पाठ्यक्रम की "भाषासाहित्य और सर्जनात्मकता" पाठ्यपुस्तक में कविता सम्मिलित (जुलाई 2013)
  •  "भाषा प्रौद्योगिकी और कम्प्यूटर विज्ञान" (पुस्तक), (प्रकाश्य)
  •  ओस्लो विश्वविद्यालय, नॉर्वे के 'शोध पाठ्यक्रम’ हेतु निर्मित ‘संकलन' में ललित निबन्ध संकलित
  • गत 25 वर्ष में नेट, समाचार पत्रों-पत्रिकाओं, अपनी वेबसाइट, ब्लॉग्स व अनेकानेक वेब पत्रिकाओं पर नियमित प्रभूत लेखन 
सम्पादन :
  • Fostering Vedic Values शीर्षक नैतिक शिक्षा की पुस्तक–शृंखला में सहयोगी सम्पादन
  • "हाशिये उलांघती औरत: प्रवासी कहानियाँ" (पुस्तक) (ISBN-10: 9383515031/ ISBN-13‏:‎ 978-9383515035)  Swaraj Prakashan, 21, Ansari Rd, Central, Daryaganj, Delhi, 110002, India (1 January 2018)
  • Member of Editorial Board:  Research & Review ( A Peer Reviewed Multidisciplinary International Research Journal of Humanities & Science) ISSN 2349-4301) by Indian Institute for Advance Research & Development (IIARD) &  IRJH&S (2016 - Present) 
  • 40 भारतीय भाषाओं की लेखिकाओं के स्त्रीविमर्श विषयक ऐतिहासिक कहानी संकलन "हाशिये उलांघती औरत" (25 खण्ड) (प्रकाशक रमणिका फाऊण्डेशन) के ‘प्रवासी कहानियाँ’ खण्ड की सम्पादक, ( 28 मार्च 2014 को JNU में लोकार्पित) 
  •  "स्त्री सशक्तीकरण के विविध आयाम" (ग्रन्थ) (2004) गीता प्रकाशन, हैदराबाद 
  •  दक्षिण भारत कान्यकुब्ज सभा स्मारिका (2003) 
  •  सम्पादक : 'सार्थक' (भाषा एवं साहित्य की मासिक पत्रिका)
सम्मान :
  •  ‘उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान’ द्वारा 'हिन्दी विदेश-प्रसार सम्मान' (2013) से अलङ्कृत (7 दिसम्बर2014) लखनऊ 
  • भारतीय उच्चायोग, लन्दन द्वारा श्री हरिवंश राय बच्चन के शताब्दी वर्ष पर स्थापित समग्र एवं सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक अवदान हेतु दिया जाने वाला 'डॉ. हरिवंश राय बच्चन लेखन सम्मान, यूके' से ब्रिटेन स्थित भारतीय उच्चायोग में उच्चायुक्त के हाथों अलङ्कृत (5 दिसम्बर 2014, लन्दन) 
  • भारतीय उच्चायोग, लन्दन द्वारा ब्रिटेन में हिन्दी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति हेतु पत्रकारिता के क्षेत्र में दिए गए सर्वश्रेष्ठ अवदान के निमित्त भारतीय उच्चायुक्त डॉ. जैमिनी भगवती के हाथों "आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान" द्वारा अलंकृत (19 मार्च 2013) 
  • हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद द्वारा `भाषा के लब्धप्रतिष्ठित विद्वान' के रूप में सम्मानित (जनवरी 2009) 
  • दिल्ली में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, साहित्य अकादमी तथा अक्षरम् का अलंकरण “सूचना प्रौद्योगिकी सम्मान'” ( `Aksharam IT Award' for contribution to Hindi Language & Lit. through technology ) (2010) 
  • `कर्पूर वसन्त सम्मान' (2003), ( उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, विश्वविद्यालय प्रकल्प, दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद द्वारा प्रदत्त ) 
  •  बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड द्वारा संस्कृत भाषा के उन्नयन हेतु सम्मानित (2008) 
  •  भारत भवन, भारतीय उच्चायोग लन्दन में सम्मान (2008) 
  • `राष्ट्रीय एकता सद्‌भावना पुरस्कार' (2002), (सामाजिक, सांस्कृतिक व राष्ट्रीय मूल्यों के प्रचार प्रसार के क्षेत्र में अवदान हेतु) 
  • `दलित मित्र' (2003), (भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा प्रदत्त) 
  • `विद्यामार्तण्ड' (2004), 
  • `महारानी झाँसी सम्मान' (2001) स्त्री सशक्तीकरण के विविध क्षेत्रों में दी गई सेवाओं हेतु 
  •  ऑथर्ज़ गिल्ड ऑफ इंडिया, द्वारा (हैदराबाद में) सम्मानित (अगस्त 2011) 
  •  ब्रिटेन में भारतीय दूतावास द्वारा "विशिष्ट सम्मान" से सम्मानित (जून 2011 )
अन्य
  • गत दस वर्ष (2015 से) से सर्वात्मना अहर्निश वैदिक, आध्यात्मिक, शैक्षिक, एवं समाजोत्थान (विशेषतः परिवार-निर्माण तथा संस्कृति) के कार्यों में समर्पित
  • अमेरिका में वैदिक संस्कृति सैंक्चुअरी: ग्लोबल, ऋषिकुलम् तथा हिन्दी हेरिटेज इंटरनेशनल की स्थापना
  • काउंसलिंग, ऑनलाइन कार्यशालाओं, विभिन्न सामाजिक/ धार्मिक संस्थाओं आदि के माध्यम से शिक्षा, संस्कृति, भाषा, समाज एवं वाङ्मय विषयक व्याख्यानों एवं कक्षाओं का सञ्चालन
  •  श्रीमद् वाल्मीकि रामायण के त्रिभाषी पारायण के साप्ताहिक व्याख्या-सत्रों द्वारा विशेष ख्याति
  • शिक्षा सलाहकार : HHFA (Hindu Heritage Foundation of America, Inc.)
  • वर्ष 1995, 1996 में नॉर्वे में योग व ध्यान की कक्षाओं का संचालन, संयोजन व नियमन 
  • 'आर्य लेखक कोश' (आर्यसमाज के 119 वर्ष के इतिहास के मुख्य लेखकों का कोश) (सम्पादक डॉ. भवानीलाल भारतीय) में परिचय व उल्लेख (सन् 1989) 
  • केंद्र सरकार (भारत) के विविध उपक्रमों (NFC, NMDC, Banks आदि अनेक) में राजभाषा हिन्दी के क्रियान्वयन विषयक आयोजनों में वक्ता के रूप में भागीदारी 
  • आर्यसमाज बैंकॉक के आमंत्रण पर दिसंबर 1999 से फ़रवरी 2000 तक 'संस्कृत एवं हिन्दी भाषा-साहित्य में भारतीय वैदिक संस्कृति'विषयक व्याख्यान-यात्रा 
  • जीवनमूल्यों-पर केन्द्रित सर्टिफ़िकेट-कोर्स का नियमन व संचालन 
  • केंद्रीय विद्यालय संगठन, नई दिल्ली द्वारा आयोजित 16 राज्यों के स्नातकोत्तर हिन्दी अध्यापकों के 3 सेवाकालीन प्रशिक्षण शिविरों में'रिसोर्स पर्सन' के रूप में साहित्य, भाषा, भारतीयता और मूल्यशिक्षा का दीर्घकालीन अध्यापन 
  • अनगिनत गम्भीर गवेषणापूर्ण शोध आलेख 
  • विविध अखिल भारतीय व अन्तरराष्ट्रीय व विश्वविद्यालयीय संगोष्ठियों में भाषा, स्त्रीविमर्श, समाज, पत्रकारिता, काव्य, आलोचना, लैंग्वेज़ कम्प्यूटिंग (इंडिक), व्यंग्य, संस्मरण, कथासाहित्य, संस्कृतसाहित्य, काव्यशास्त्र, नाटकसाहित्य, दर्शन, तुलनात्मक साहित्य आदि अनेक विषयों पर पत्र-प्रस्तुति, संयोजन, अध्यक्षता एवम् संचालन 
  • डॉ.नामवर सिंह, डॉ.विद्यानिवास मिश्र, डॉ.प्रभाकर श्रोत्रिय, श्री अशोक वाजपेयी प्रभृति कवि, विद्वान् , आलोचकों आदि से समीक्षा-दृष्टियों,काव्य-विमर्श, साहित्य, भाषा, संस्कृति व विविध विधाओं आदि पर केंद्रित 35 से अधिक गहन विचार-विमर्शपूर्ण साक्षात्कार 
  • महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय एवम् उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, विश्वविद्यालय विभाग, दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा में अतिथिअध्यापक के रूप में अंशकालिक अध्यापन (वर्ष 2002)
  • साहित्य अकादमी, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, वैज्ञानिक एवम् तकनीकी शब्दावली आयोग, नैशनल बुक ट्रस्ट प्रभृति संस्थाओं एवं देश विदेश के कई विश्वविद्यालयों एवं प्रतिष्ठित संस्थानों की संगोष्ठियों, सम्मेलनों व कार्यशालाओं में आमन्त्रित, भागीदारी, पत्र प्रस्तुति (1998 प्रभृति)
  • बिहार सरकार द्वारा राज्य में संस्कृत शिक्षा के अध्ययन अध्यापन के स्तर में सुधार हेतु आमन्त्रित संगोष्ठी की अध्यक्षता ( दिसम्बर2008) 
  • 20वीं शती की श्रेष्ठ महिला कथाकार (सं.- श्री सुरेन्द्र तिवारी) में सम्मिलित 
  • हिन्दी व इण्डिक (भारतीय भाषा) कम्यूटिंग की कार्यशालाओं हेतु विविध प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा आमन्त्रित / सम्मानित 
  •  हिन्दी कम्प्यूटिंग में तकनीक / नेट लेखन / प्रौद्योगिकी / पत्रकारिता में सक्रिय / 
  • ‘केन्द्रीय विद्यालय’ मैनेजमेंट कमेटी (एयरफ़ोर्स स्टेशन, हैदराबाद) में संस्कृतिविद् के रूप में मनोनीत (2004 - 2009 ) 
  • भारत, यूके व स्पेन के विश्वविद्यालयों में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में भाषा-प्रोद्यौगिकी, लैंग्वेज़-कम्प्यूटिंग व विविध साहित्यिक शोधपत्र, आलेख व प्रपत्र प्रस्तुत 
  • दूरदर्शन सहित भारत के विविध टीवी चैनल्ज़ पर काव्यपाठ, इन्टरव्यू व लम्बी परिचर्चाओं में भागीदारी 
  • ब्रिटेन में रेडियो पर लम्बी वार्ताएँ व काव्यपाठ प्रस्तुत 
  • वर्ष 2006 से इन्टरनेट एवं कम्प्यूटर पर हिन्दी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के सम्वर्धन हेतु अनेकानेक वेबजीन्स ब्लॉग एवं साईट का सम्पादन व संचालन। 
  • सदस्य - ‘केदार सम्मान समिति’ (बाँदा) (2007-2016) 
  • सलाहकार सम्पादक - `माटी' (प्रगतिशील चेतना की संवाहक त्रैमासिक) (त्यागपत्र 2017)
  • सचिव – स्त्री आर्यसमाज, अन्तरराष्ट्रीय वेद प्रतिष्ठान न्यास (2000-2014) 
  • अध्यक्ष - राष्ट्रीय विचारमंच, आ.प्र.प्रकोष्ठ (1999-2009) 
  • गत दस वर्ष से (2015 से) पूर्णतः समजोत्थन वैदिक, 
  • वेबसाईट, ब्लॉग्ज़ और विविध अन्य ऑनलाईन उपक्रमों की सूची एवं जानकारी नीचे देखी जा सकती है
  • - Organizer and Member of Editorial Board for publication of book - `क्षण के घेरे में घिरा नहीं’ [A tribute to poet Trilochan]
  • - Conducting, editing, writing, and organizing many web portals on the internet for the promotion of Hindi literature, Indic languages, Indian Social and cultural education, and human values.
  • Established a Yahoo group (Hindi-Bharat) of about 300 members in the year 2005, & another on FB (Poetry: Hindi Kavita (हिन्दी-कविता) to inculcate, educate, and encourage work in Hindi, Devnagari. The group is founded, edited, and run by Dr. Kavita Vachaknavee.


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