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गुरुवार, 12 अक्टूबर 2023

वर्तमान की वह पगडण्डी जो इस देहरी तक आती थी.....

युद्ध : बच्चे और माँ (कविता)

साहित्य अकादमी के वार्षिक राष्ट्रीय बहुभाषीकवि सम्मेलन (2008) की चर्चा मैंने अभी पिछली बार की थी। वहाँ काव्यपाठ में प्रस्तुत अपनी रचनाओं में से एक अभी बाँट रही हूँ।

२५ नव. की रात्रि में इसका पाठ करने से पूर्व मैंने अन्यभाषी श्रोताओं के लिए इसका सार अंग्रेजी में उपलब्ध कराते हुए कहा था कि बच्चे का आतंकवादी में रूपांतरण, आतंक और सृष्टि की निर्मात्री माँ के बीच दो विपरीत ध्रुवों को स्पष्ट करने के साथ साथ यह कविता रेखांकित करती है कि आतंक और युद्ध की स्थितियों की सर्वाधिक पीड़ा स्त्री भोगती है क्योंकि यह संसार उसका रचा हुआ है। तब क्या पता था कि अगले ही दिन २६ नव. को एक बड़ा हादसा भारत की धरती भी घटने की तैयारी कर चुका था। उन अर्थों में इस कविता को उन्नीकृष्णन की माता ( जिसे मैं भारत की वीर माता विद्यावती की प्रतीक मानती हूँ) के चरणों में समर्पित कर रही हूँ व प्रत्येक उस माँ के भी जिनके जाये आतंक या युद्ध का शिकार बने ।




युद्ध : बच्चे और माँ
- कविता वाचक्नवी





निर्मल जल के
बर्फ हुए आतंकी मुख पर
कुँठाओं की भूरी भूसी
लिपटा कर जो
गर्म रक्त मटिया देते हैं
वे,
मेरे आने वाले कल के
कलरव पर
घात लगाए बैठे हैं सब।



वर्तमान की वह पगडंडी
जो इस देहरी तक आती थी
धुर लाशों से अटी पड़ी है,
ओसारे में
मृत देहों पर घात लगाए
हिंसक कुत्तों की भी
भारी
भीड़ लगी है।



मैं पृथ्वी का
आने वाला कल सम्हालती
डटी हुई हूँ
नहीं गिरूँगी....
नहीं गिरूँगी....


पर इस अँधियारे में
ठोकर से बचने की भागदौड़ में
चौबारे पर जाकर
बच्चों को लाना है,
इन थोथे औ’ तुच्छ अहंकारी सर्पों के
फन की विषबाधा का भी
भय
तैर रहा है......।




कोई रोटी के कुछ टुकड़े
छितरा समझे
श्वासों को उसने
प्राणों का दान दिया है
और वहीं दूजा बैठा है
घात लगाए
महिलाओं, बच्चों की देहों को बटोरने

बेच सकेगा शायद जिन्हें
किसी सरहद पर
और खरीदेगा
बदले में
हत्याओं की खुली छूट, वह।



एक ओर विधवाएँ
कौरवदल की होंगी
एक ओर द्रौपदी
पुत्रहीना
सुलोचना
मंदोदरी रहेंगी..........।



किंतु आज तो
कृष्ण नहीं हैं
नहीं वाल्मीकि तापस हैं,
मैं वसुंधरा के भविष्य को
गर्भ लिए
बस, काँप रही हूँ
यहीं छिपी हूँ
विस्फोटों की भीषण थर्राहट से विचलित
भीत, जर्जरित देह उठाए।




त्रासद, व्याकुल बालपने की
उत्कंठा औ' नेह-लालसा
कुंठा बनकर
हिटलर या लादेन जनेगी
और रचेगी
ऐसी कोई खोह
कि जिसमें
हथियारों के युद्धक साथी को
लेकर
छिप
जाने कितना रक्त पिएगी।



असुरक्षित बचपन
मत दो
मेरे बच्चों को,
इन्हें फूल भाते हैं
लेने दो
खिलने दो,
रहने दो मिट्टी को उज्ज्वल
पाने दो सुगंध प्राणों को।



जाओ कृष्ण कहीं से लाओ
यहाँ उत्तरा तड़प रही है !!
वाल्मीकि !
सीता के गर्भ
भविष्य
पल रहा ।
अपनी पुस्तक "मैं चल तो दूँ" (२००५) से


सोमवार, 15 सितंबर 2014

पीढ़ियाँ

पीढ़ियाँ


'नई दुनिया' (इन्दौर) के 7 सितम्बर 2014 के रविवासरीय 'तरंग' में प्रकाशित कविता, 'पीढ़ियाँ'



बुधवार, 9 जुलाई 2014

संकलन हेतु रचनाएँ आमन्त्रित

संकलन हेतु रचनाएँ आमन्त्रित 

An appeal to the writers based outside India / भारत से बाहर के लेखकों से रचनाएँ आमन्त्रित

A book named `Meri Maan' (My Mother) has been planned to be published on the concept, ethos and practices of motherhood in different parts of the world. The nature of the book will be literary, cultural and social only. The object of the book is to present a contemporary scenario as well as traditional aura of motherhood in different societies. 

The project is being supported and sponsored by Shri B. K. Birla, renowned industrialist of India. A committee of Indian scholars has been constituted for compilation of articles related to the subject.

We will be grateful if you kindly spare some time for this noble cause and write an article on the above subject, especially in view of the land to which you belong or the country in which at present you reside. The language of the article should be either Hindi or English. In special cases, we will try to translate valuable articles received in other languages too. 
We shall also welcome some poems related to the subject, composed by you or other prominent poets of your country.

We will also require your photograph (passport size) and your bio data. Please, try your best to mail to me all the press materials at the earliest.

A copy of the printed book along with a memento will be sent to you as a mark of respect.

'मेरी माँ' शीर्षक से एक पुस्तक के लिए विश्वभर के रचनाकारों की रचनाएँ/लेख ( साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक) आमन्त्रित हैं। पुस्तक का उद्देश्य विभिन्न समाजों में मातृत्व और उसकी गरिमा/महिमा के विविध पक्षों को रेखांकित/प्रस्तुत करना है। यह योजना भारत के प्रमुख उद्योगपति श्री बी. के. बिरला द्वारा संपोषित है। 

आप जिस देश में रहते हैं, वहाँ मातृत्व की किसी विशिष्ट छवि को उकेरेते हुए एक लेख हिन्दी अथवा अंग्रेजी में हमें शीघ्रातिशीघ्र भेजें। कुछेक महत्वपूर्ण लेखों के अनुवाद का प्रावधान भी है। कुछ बहुत महत्वपूर्ण कविताओं को भी इसमें सम्मिलित किया जाएगा। अतः आप अपने देश के किसी महत्वपूर्ण रचनाकार की 'माँ' विषयक कोई विशिष्ट कविता भी हमें भेज सकते हैं। प्रयास करें कि शब्दसीमा 1000 के लगभग रहे। शेष जानकारी हेतु टिप्पणी द्वारा सम्पर्क करें। 

रचना के साथ रचनाकार का पासपोर्ट आकार का चित्र व संक्षिप्त औपचारिक परिचय भी शीघ्रातिशीघ्र भेजें।  30 अगस्त के पश्चात् भेजी गई रचनाएँ स्वीकार नहीं की जाएँगी। 

प्रकाशनोपरांत स्मृतिचिह्न के साथ लेखकीय प्रति सादर भिजवाई जाएगी। पुस्तक का लोकार्पण आगामी वर्ष दिल्ली में होगा। 

(यदि आप किसी विदेश में रहने वाले लेखक से परिचित हैं तो कृपया उन तक इस सूचना को भिजवाएँ)



शनिवार, 1 मार्च 2014

राष्ट्रीय साहित्य अकादमी के बहुभाषी कवि सम्मेलन की एक पुरानी कतरन



Report of Sahitya Akademi's Multilingual Poets Meet / Times Of India (26 Jan. 2008

केंद्रीय 'साहित्य अकादमी' द्वारा 'सेंट्रल यूनिवर्सिटी, हैदराबाद'  में आयोजित बहुभाषी कवि सम्मेलन में हिन्दी कविता का प्रतिनिधित्व तीन लोगों ने किया था - स्व. वेणुगोपाल (नन्दकिशोर शर्मा), ऋषभ देव शर्मा व स्वयं मैं। 

उस अवसर की एक 6 वर्ष से अधिक पुरानी कतरन। चित्र पर क्लिक कर व फिर लेंस को + कर इसे स्पष्ट पढ़ा जा सकता है। 

अथवा टाईम्स ऑफ इंडिया की साईट के इस लिंक पर पढ़ सकते हैं - 



शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

क्या पता था एक दिन तुम भी ......

!! कीकर !!    :     कविता वाचक्नवी
वसन्त और वैलेंटाईन दिवस की वेला में विशेष .....
© अपनी पुस्तक 'मैं चल तो दूँ' (2005) से उद्धृत





बीनती हूँ
           कंकरी
औ’ बीनती हूँ
           झाड़ियाँ बस
नाम ले तूफान का
           तुम यह समझते।


थी कँटीली शाख
मेरे हाथ में जब,
एक तीखी
नोंक
उंगली में
गड़ी थी,
चुहचुहाती
बूँद कोई
फिसलती थी
पोर पर
तब
होंठ धर
तुम पी गए थे।



कोई आश्वासन
            नहीं था
प्रेम भी
            वह 
            क्या रहा होगा
            नहीं मैं जानती हूँ
था भला
मन को लगा
बस!
और कुछ भी
क्या कहूँ मैं।



फिर
न जाने कब
चुभन औ’ घाव खाई
सुगबुगाते
 दर्द की
वे दो हथेली
खोल मैंने
सामने कीं
         "चूम लो
          अच्छा लगेगा"
तुम चूम बैठे


घाव थे
सब अनदिखे वे
खोल कर
जो
सामने
मैंने किए थे
          और 
तेरे
चुम्बनों से
तृप्त
सकुचातीं हथेली
भींच ली थीं।


क्या पता था
एक दिन
तुम भी कहोगे
        अनदिखे सब घाव
        झूठी गाथ हैं
        औ’
        कंटकों को बीनने की
        वृत्ति लेकर
        दोषती
        तूफान को हूँ।



आज
आ-रोपित किया है
पेड़ कीकर का
मेरे
मन-मरुस्थल में
       जब तुम्हीं ने,
क्या भला -
अब चूम
चुभती लाल बूँदें
हर सकोगे
पोर की
पीड़ा हमारी?


बुधवार, 22 जनवरी 2014

समाचार व कतरनें

समाचार व कतरनें 

लोकस्वामी, वर्ष 2 अंक 13, नोएडा


'स्रवन्ति', दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद की मासिक पत्रिका 





दैनिक हिन्दी मिलाप, हैदराबाद


'शान्तिधर्मी', हिसार 




आर्य सन्देश (दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा का मुखपत्र )




रविवार, 6 अक्टूबर 2013

नवरात्र तथा THE HAND THAT ROCKS THE CRADLE

नवरात्र तथा THE HAND THAT ROCKS THE CRADLE   :   कविता वाचक्नवी


नवरात्रों की इस अवधि में, जबकि सदा की भांति कल भी मैंने स्त्री के वन्दनीया होने और उसे समाज में वन्दनीया का स्थान देने की बात लिखी थी, आज पुनः एक उक्ति याद आ रही है - 
"माता निर्माता भवति"। 


बहुधा लोग इसका अर्थ यह लगाते हैं कि माँ सन्तान / व्यक्ति की निर्माता होती है। जबकि यह पूरा सत्य नहीं है। पूरा सत्य यह है कि माँ के रूप में स्त्री परिवार, समय, समाज, देश, भविष्य, जीवन, राजशाही और सब कुछ की निर्माता होती है। घर व समाज में जिस अनुपात में स्त्री के साथ अन्याय, निरादर व असमानता बढ़ेगी उसी अनुपात में क्रमशः समाज का विध्वंस व विनाश सुनिश्चित है।

इसी प्रसंग में आज कवि William Ross Wallace (1819 – May 5, 1881) की एक ऐतिहासिक कविता स्मरण आ रही है। आप सब भी इस अमूल्य कविता का आनन्द लें, प्रेरणा लें।



THE HAND THAT ROCKS THE CRADLE IS THE HAND THAT RULES THE WORLD.

      BLESSINGS on the hand of women!
        Angels guard its strength and grace.
      In the palace, cottage, hovel,
          Oh, no matter where the place;
      Would that never storms assailed it,
          Rainbows ever gently curled,
      For the hand that rocks the cradle
          Is the hand that rules the world.

      Infancy's the tender fountain,
          Power may with beauty flow,
      Mothers first to guide the streamlets,
          From them souls unresting grow—
      Grow on for the good or evil,
          Sunshine streamed or evil hurled,
      For the hand that rocks the cradle
          Is the hand that rules the world.

      Woman, how divine your mission,
          Here upon our natal sod;
      Keep—oh, keep the young heart open
          Always to the breath of God!
      All true trophies of the ages
          Are from mother-love impearled,
      For the hand that rocks the cradle
          Is the hand that rules the world.

      Blessings on the hand of women!
          Fathers, sons, and daughters cry,
      And the sacred song is mingled
          With the worship in the sky—
      Mingles where no tempest darkens,
          Rainbows evermore are hurled;
      For the hand that rocks the cradle
          Is the hand that rules the world.


बुधवार, 21 अगस्त 2013

"पीर के कुछ बीज"

"पीर के कुछ बीज" : कविता वाचक्नवी


सोमवार 19 अगस्त के  'दैनिक जागरण' (राष्ट्रीय) के साहित्यिक परिशिष्ट "सप्तरंग : साहित्यिक पुनर्नवा" में मेरी एक लगभग 15 बरस पूर्व लिखी गई कविता "पीर के कुछ बीज" प्रकाशित हुई है, रोचक बात यह थी कि 18 की रात (भारत में तब 19 की भोर हुई ही होगी) से ही इस कविता पर पचासों साहित्यिक लोगों की प्रतिक्रिया फेसबुक के मेरे इनबॉक्स में आ चुकी थी । 

ईमेल से आने वाली प्रतिक्रियाओं का ताँता अभी भी लगा हुआ है। यह पहली बार है जब दूर-दराज के अनजान से अनजान व्यक्तियों तक से इतनी भारी मात्रा में किसी एक रचना पर लगातार सुखद प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। इस से दैनिक जागरण के प्रसार व पाठक-क्षमता का पता भी चलता है। समाचार पत्र के प्रति आभारी हूँ कि उन्होंने मेरे रचना को यों जन-जन तक पहुँचाया।  



जो लोग ऑनलाईन अंक देखना चाहें वे यहाँ 19 अगस्त 2013 का ई-पेपर देख सकते हैं - 

http://epaper.jagran.com/homepage.aspx

कुछ प्रतिक्रियाएँ यहाँ देखी जा सकती हैं -https://www.facebook.com/kvachaknavee/posts/10151770927014523






शनिवार, 17 अगस्त 2013

जाने कब से दहक रहे हैं ......

जाने कब से दहक रहे हैं .... कविता वाचक्नवी


वर्ष 1998 में नागार्जुन की 'हमारा पगलवा' पढ़ते हुए एक अंश पर मन अटक गया था -

"बाप रे बाप, इस कदर भी 
किसी की नाक बजती है ... 
यह तीसरी रात है 
पलकों के कोए जाने कब से दहक रहे हैं 
मर गई मैं तो "

इस अंश की यह पंक्ति "पलकों के कोए जाने कब से दहक रहे हैं" मुझे पंजाबी के अमर कवि शिव कुमार बटालवी के प्रसिद्ध गीत (माए नी मैं इक शिकरा यार बनाया) के पास ले गई, जिसकी एक पंक्ति थी- 

"दुखन मेरे नैना दे कोए,
ते विच हड़ हंजुआँ दा आया

पंजाबी के कवि शिव 'नैनों के कोए दुखने' की बात करते हैं तो नागार्जुन 'पलकों के कोए दहकने' की बात करते हैं। अतः स्मरण स्वाभाविक था। दूसरी ओर "निराला की साहित्य साधना" में मुंशी नवजादिकलाल का निराला के सौंदर्य के एक प्रसंग में कथन आता है कि -

 "एक तो महाकवि बिहारीलाल की नायिका भौंहों से हँसती थी, दूसरे हमारे निराला जी भौंहों में हँसा करते हैं। बल्कि ये तो बिहारी की नायिका के भी कान कुतर चुके है। इनकी पलकें हँसती हैं, बरौनियाँ हँसती हैं, आँखों के कोए हँसते हैं, अजी इनकी नसें और मसें हँसती हैं। " 

कुल मिलाकर यह 'कोए' शब्द तीन तरह से मन में गड़ा हुआ था। तभी नागार्जुन की उपर्युक्त एक पंक्ति को आधार बना कर मैंने उस समय एक नया गीत रचा था (जिसे भाषा व साहित्यिक मासिक "पूर्णकुम्भ" ने 1998 /99 में प्रकाशित भी किया था)। अपने उस पुराने गीत की याद गत कई दिन से रह-रह कर आ रही है। 
वह गीत कुछ यों था - 

जाने कब से ....
- (कविता वाचक्नवी) 

जाने कब से दहक रहे हैं इन पलकों के कोए 
जाने कितनी रातें बीतीं जाने कब थे सोए 


द्रुमदल छायादार न उपजे मीठे अनुरागों के 
स्मृतियों के वन पर न बरसे अमृत कण भादों के 
अब बस केवल भार बना है तन मिट्ठी का ढेला 
आह ! आह को सींचा प्रतिक्षण पुष्कल आँसू बोए 

                             जाने कितनी रातें बीतीं जाने कब थे सोए 


(इसके आगे चार बन्ध और थे, जो फिलहाल स्मरण नहीं आ रहे हैं, जब कभी उस प्रकाशित प्रति की कतरन मिलगी या 15 बरस पुरानी अपनी कोई डायरी मिलेगी तो ही इसे पूरा यहाँ दे पाऊँगी, तब तक इतना ही )


मंगलवार, 6 अगस्त 2013

ऐतिहासिक 'चित्रपट' (साप्ताहिक) की दुर्लभ प्रति और मुखपृष्ठ पर 'हरिऔध'

ऐतिहासिक 'चित्रपट' (साप्ताहिक) की दुर्लभ प्रति और मुखपृष्ठ पर हरिऔध : कविता वाचक्नवी


आज एक दुर्लभ वस्तु हाथ लगी है। ' चित्रपट' पत्रिका का वर्ष 1934 नव-वर्षांक (वर्ष दो)। इसके मुखपृष्ठ पर कवि अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की रचना प्रकाशित है। 


यह अंक सम्पादक श्री ऋषभचरण जैन द्वारा समालोचनार्थ भेंट की गई हस्ताक्षरित प्रति है, जो Tübingen विश्वविद्यालय जर्मनी में संरक्षित है। यह अंक लगभग 310 पृष्ठों का है। 

कई रोचक तथ्य इस अंक को देखने से पता चलते हैं, जिनमें से एक यह कि वर्ष 1934 तक भी अपने देश का नाम विधिवत् 'भारतवर्ष' ही लिखा/कहा जाता था। इसे देख कर मुझे सुखदानुभूति हो रही है :) 


मुखपृष्ठ का चित्र देखें -


रविवार, 4 अगस्त 2013

"भाषा, साहित्य और सर्जनात्मकता" : कविता और दिल्ली विश्वविद्यालय

"भाषा, साहित्य और सर्जनात्मकता" में कविता  : कविता वाचक्नवी



आज आधिकारिक रूप से यह सुखद सूचना आप सब से बाँट सकती हूँ कि - 

दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने नए पाठ्यक्रम में 'अनिवार्य हिन्दी' के 'आधार पाठ्यक्रम' की पुस्तक ("भाषा, साहित्य और सर्जनात्मकता") में मेरी कविता "जल" को सम्मिलित किया है। 

पुस्तक गत दिनों 26 जुलाई 2013 को​ जारी हुई ​व इसी सत्र से पढ़ाई जानी प्रारम्भ हुई है। इस सत्र से सभी विद्यार्थी 'अनिवार्य विषय हिन्दी​' की पुस्तक के रूप में इसे पढ़ेंगे। 


- ध्यातव्य है कि ​ वर्ष 2002 में​ एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा उनकी अन्यभाषा/ हिन्दी की पाठ्यपुस्तक में भी कई वर्ष मेरी​ कविता सम्मिलित रही है व केंद्र सरकार द्वारा संचालित देश भर के विद्यालयों में पढ़ाई जाती रही है।

- साथ ही दिल्ली के पब्लिक स्कूलों के पाठ्यक्रम हेतु 'ओरियंट लाँगमैन' ने भी वर्ष 2003 में अपनी 'नवरंग रीडर' में मेरे दोहे सम्मिलित किए थे।

- इसके अतिरिक्त केरल राज्य की 7वीं व 8वीं की द्वितीय भाषा हिन्दी की पाठ्यपुस्तकों में भी वर्ष 2002 में ही ​मेरी बाल कविताएँ सम्मिलित की गई थीं।

- अब देश के शीर्षस्थ विश्वविद्यालय के मुख्य​ पाठ्यक्रम का हिस्सा​ होने का सौभाग्य मिला है, जो अत्यंत विरलों को संभव है। ​

.... तो इस प्रकार अब दिल्ली विश्वविद्यालय ने भी रचनाकार के रूप में प्रसन्न होने का एक बड़ा कारण उपलब्ध करवा दिया है।


यह गौरव अपने माता-पिता, आचार्यों, शुभचिन्तकों, मित्रों व परिवार को समर्पित करती हूँ।


जल 
===

जल, जल है
पर जल का नाम
बदल जाता है।


हिम नग से
झरने
झरनों से नदियाँ
नदियों से सागर
तक चल कर
कितना भी आकाश उड़े
गिरे
बहे
सूखे
पर भेस बदल कर
रूप बदल कर
नाम बदल कर
पानी, पानी ही रहता है।

श्रम का सीकर
दु:ख का आँसू
हँसती आँखों में सपने, जल!


कितने जाल डाल मछुआरे
पानी से जीवन छीनेंगे ?
कितने सूरज लू बरसा कर
नदियों के तन-मन सोखेंगे ?
उन्हें स्वयम् ही
पिघले हिम के
जल-प्लावन में घिरना होगा
फिर-फिर जल के
घाट-घाट पर
ठाठ-बाट तज
तिरना होगा,


महाप्रलय में
एक नाम ही शेष रहेगा
जल …..
जल......
जल ही जल ।

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यह कविता मेरे काव्यसंकलन “मैं चल तो दूँ” (2005, सुमन प्रकाशन) में संकलित है।

सोमवार, 17 जून 2013

जीवन : Life : कविता वाचक्नवी

जीवन : कविता वाचक्नवी


जीवन तो
यों
स्वप्न नहीं है
आँख मुँदी औ’ खुली
चुक गया।


                     यह तपते अंगारों पर
                     नंगे पाँवों
                     हँस-हँस चलने 
                     बार-बार
                     प्रतिपल जलने का
                     नट-नर्तन है।


Life : by Kavita Vachaknavee

Translation : by Parul Rastogi

Life
Though
Not a dream
That
Washes away
With
Blink of eyes
But;
An act
To walk alone
On smouldering coals
Bare feet
Each second in deep pain
Still smile on curving lips
Life is nothing
But an acrobat's show....


रविवार, 16 जून 2013

तुम्हारे वरद-हस्त : ©-कविता वाचक्नवी

तुम्हारे वरद-हस्त ©-कविता वाचक्नवी 
पितृदिवस पर 15 बरस पुरानी एक कविता, अपने काव्यसंकलन "मैं चल तो दूँ" (2005) से 

पिताजी श्री इंद्रजित देव 










मेरे पिता !
एक दिन
झुलस गए थे तुम्हारे वरद-हस्त,
पिघल गई बोटी-बोटी उँगलियों की।
देखी थी छटपटाहट
सुने थे आर्त्तनाद,
फिर देखा चितकबरे फूलों का खिलना,
साथ-साथ
तुम्हें धधकते
किसी अनजान ज्वाल में
झुलसते
मुरझाते,
नहीं समझी
बुझे घावों में
झुलसता
तुम्हारा अन्तर्मन

आज लगा...
बुझी आग भी
सुलगती
सुलगती है
सुलगती रहती है।
-------------------------
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मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

देह पीड़ा से भले लहरी नहीं ... : कविता वाचक्नवी

देह पीड़ा से भले लहरी नहीं .......  :  कविता वाचक्नवी



वर्ष 2003 के आसपास लिखी अपनी एक ग़ज़ल को अपने ही स्वर में 'डेनमार्क' के रेडियो सबरंग के लिए वर्ष 2008 में चाँद शुक्ला जी के आदेश व माँग पर सस्वर रेकॉर्ड करवाया था। 


यों तो यह गजल उनकी साईट पर मेरी कई अन्य कविताओं के काव्यपाठ सहित वहाँ गत 4-5 वर्ष से उपलब्ध है और वागर्थ हिन्दी-भारत आदि पर साईडबार में भी; किन्तु लिखित पाठ के साथ पहली बार यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ। 

सस्वर पाठ इस लिंक को क्लिक कर सुना जा सकता है -



     देह पीड़ा से .....
 - कविता वाचक्नवी

देह पीड़ा से भले लहरी नहीं 
नाग से तो प्रीत कम ज़हरी नहीं 

राज-मुद्रा ने तपोवन को छला 
जबकि मर्यादा रही प्रहरी नहीं 

मैं उठाए बाँह बटिया पर पड़ी 
जिंदगी मेरे लिए ठहरी नहीं 

डूब पाती मैं भला कैसे यहाँ 
झील तो दिल से अधिक गहरी नहीं 

गाँव, घर, द्वारे इसे प्यारे लगें 
आज भी 'कविता' हुई शहरी नहीं 


सोमवार, 14 जनवरी 2013

साहित्यिक पत्रिका 'वागर्थ' का दिसंबर अंक व मेरी 3 कविताएँ

साहित्यिक पत्रिका 'वागर्थ' का दिसंबर अंक व मेरी 3 कविताएँ  :  कविता वाचक्नवी



'भारतीय भाषा परिषद'  कोलकाता की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'वागर्थ' के  दिसंबर 2012  अंक में मेरी तीन कविताएँ क्रमशः 'राख' , 'व्रतबंध'  व 'औरतें डरती हैं'   प्रकाशित हुई हैं। पत्रिका परिवार व संपादक के प्रति कृतज्ञ हूँ।

 इस बीच जिन अनेकानेक लोगों ने ईमेल से व भारत से यहाँ फोन करके कविताओं पर अपनी-अपनी शुभकामनाएँ व प्रतिक्रियाएँ दी हैं, उन सब के प्रति हृदय से कृतज्ञ हूँ। 

यद्यपि 'व्रतबंध' शीर्षक कविता के अंत में कुछ शब्द बदल दिए गए हैं । इस त्रुटि के चलते कविता का सांस्कृतिक अर्थ व रूपक छिन्न-भिन्न हो गया है। इस कविता की मूल पंक्तियाँ हैं - 


मैं आँखें टिका

दो आँसुओं से
हस्त-प्रक्षालन करवा दूँ।

(कृपया उक्त कविता की पंक्तियों को इसी रूप में पढ़ें) 

पत्रिका के ध्यान में लाने पर अब वे 'वागर्थ'  के आगामी अंक (फरवरी) में इस त्रुटि पर पाठकों का ध्यान दिलाएँगे, ऐसी सूचना मिली है। अस्तु !

 नीचे उक्त अंक के वे पन्ने सम्हाल सहेज रही हूँ । पन्नों पर क्लिक कर बड़े आकार में पढ़ा जा सकता है। 











अपडेट फरवरी 2013

मूल कविता के एक शब्द को बदल कर प्रकाशित किए जाने पर आपत्ति करते हुए  'वागर्थ' को भेजा पत्र उनके अंक फरवरी 2013 में प्रकाशित हुआ -




गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

कबीर का अंग-राग और साबुन : जीवनमूल्य 'आऊटडेटेड'

कबीर का अंग-राग : जीवनमूल्य 'आऊटडेटेड' : कविता वाचक्नवी
============================================



पिछले दिनों निराला की 'मातृवन्दना' को साझा किया तो एक मित्र ने टिप्पणी करते हुए कहा कि कविता तो अच्छी चुनी किन्तु इसमें तो पराधीन भारतमाता का स्मरण किया है। इस पर एक दूसरे मित्र ने तर्क दिया कि भारतमाता अभी भी बेड़ियों में बंद है, इसलिए समीचीन है। 


समय-विशेष या घटना-विशेष बीत जाने से कालजयी कविताओं के अप्रासंगिक अथवा अ-समीचीन हो जाने के तर्कों वाले इस काल में आज मुझे फिर से कबीर का एक दोहा पढ़ने को मिला। आपने भी कई बार पढ़ा सुना होगा - 

निन्दक नियरे राखिए आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना निरमल करे सुभाय॥

इसे पढ़कर बरबस एक हँसी मन में तैर गई। निंदा तो क्या, स्वस्थ आलोचना तक न सहन कर पाने वाले इस काल में [ जब आम आदमी से लेकर हिन्दी के दिग्गज तक अपने अस्तित्व को बनाए रखने की जद्दोजहद में एक दूसरे को गालियों से निरंतर नवाज रहे हैं और उन्हें धड़ाधड़ प्रकाशित भी करवा रहे हैं (देखिए, विष्णु खरे प्रसंग) ] तो यह दोहा उनके संदर्भ में कितना अप्रासंगिक ही कहा जाएगा !! 


हम लोगों ने इसका अवमूल्यन कर भले इसे 'आऊटडेटेड' प्रमाणित कर दिया हो किन्तु इतिहास की दृष्टि से कम से कम एक कारण से तो यह निस्संदेह सदा प्रासंगिक और महत्वपूर्ण रहेगा; यह प्रमाणित करने के लिए, कि कबीर के समय तक साबुन का आविष्कार हो चुका था और भारत में भी कबीर व उनके परिचित लोग साबुन का प्रयोग नियमित किया करते थे। 


संस्कृत साहित्य में तो कदापि नहीं व हिन्दी साहित्य में भी सबसे पहली बार साबुन का प्रयोग कबीर ही ने किया है, अन्यथा संस्कृत में तो "अद्भिर्गात्राणि शुध्यंति... ' (जल से देहशुद्धि) की बात है। पूर्ववर्ती साहित्य में तो केवल चूर्ण, अंगराग और उबटन आदि ही शुद्धि के इस कार्य के लिए प्रयोग होने के उदाहरण व संदर्भ मिलते हैं। 


हो सकता है, आने वाले समय में हिन्दी का कोई वीर शोधार्थी कबीर की सामाजिक चेतना व समाज से आडंबरों की धुलाई सफाई की प्रेरकशक्ति के रूप में इसी साबुन की महती भूमिका को प्रमाणित कर किसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसरशिप ही /भी पा जाए। 


सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

"मैं चल तो दूँ" : 'भाषा' : मूल व अनुवाद सहित सस्वर पाठ

"मैं चल तो दूँ" : 'भाषा' :  मूल व अनुवाद सहित सस्वर पाठ
- कविता वाचक्नवी


"भाषा" (केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, भारत सरकार की हिन्दी पत्रिका ) के नवम्बर-दिसंबर 2011 अंक में मेरी एक कविता "मैं चल तो दूँ" मूल हिन्दी व नेपाली अनुवाद (बैद्यनाथ उपाध्याय द्वारा किए गए ) के साथ प्रकाशित हुई थी । 

 सुखद यह है कि "भाषा" और केंद्रीय हिन्दी निदेशालय की इस पत्रिका में संयोग से वर्ष 2007 से निरन्तर थोड़े-थोड़े अंतराल में मेरी कविताएँ व उनके अनुवाद प्रकाशित होते चले आ रहे हैं, जिसका शत-प्रतिशत श्रेय कविताओं के अनुवादकों को ही जाता है। अन्यथा मुझे तो यकायक सूचना मिलने पर ही पता चल पाता है कि किसी अंक में कोई रचना व अनुवाद प्रकाशित हो रहे है। बस, विदेश में होने के कारण बहुधा स्कैन प्रति तक न देख पाने का मलाल बना रह जाता है.... जब तक कि कोई सहृदय मित्र बढ़िया स्कैन कर के न भेज दें। 

भाषा के उक्त अंक के अंक के मुखपृष्ठ तथा मूल व अनूदित पाठ के पन्नों की स्कैनप्रति उपलब्ध करवाने का आग्रह मैंने फेसबुक पर किया तो वरिष्ठ रचनाकार कवि सुधेश जी ने दिल्ली से उन पन्नों को स्कैन कर के मुझे गत दिनों उपलब्ध करवा दिया। उनके इस सौजन्य के लिए उनके प्रति आभार व्यक्त करती हूँ।


जो मित्र इस कविता का सस्वर पाठ भी सुनना चाहें वे -
  • - इस ब्लॉग के साईडबार में `तृणतुल्य मैं" विजेट में देखें 
  • - डेनमार्क के रेडियो सबरंग की साईट पर `कलामे शायर' अथवा `Poet Recites' पर जाकर सूची को स्क्रॉल कर मेरे नाम के साथ सहेजे संकलन में इसे सुन सकते हैं
  • - अथवा सीधे इस लिंक को क्लिक करें - मैं चल तो दूँ (सस्वर पाठ) 


बड़े आकार में पढ़ने के लिए अलग अलग चित्र पर क्लिक करें - 
  •  





शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

`कविता' के बहाने



वर्ष 1995 /1996 की अवधि में एक बहुत लंबी, गेय व छंदोबद्ध कविता लिखी थी, जिसमें लगभग 50 पद हैं। उसे कभी एक साहित्यिक पत्रिका "पूर्णकुम्भ" (वस्तुतः साहित्यिक जर्नल) ने 1998/1999 में अपने चार बड़े पन्नों पर बहुत स्नेह से प्रकाशित किया था। 


उस कविता का शैली-वैज्ञानिक प्रविधि से विखंडन करने वाले आलोचक / पाठक स्पष्ट देख सकते हैं कि उसमें हिन्दी कविता की अंतर्यात्रा (आदि से लेकर तत्कालीन तक) व इतिहास को समेटने का यत्न तथा क्रमशः गेयता व छंद की समाप्ति को विषय बनाया गया है। उस कविता का शीर्षक था / है  - "कविता की आत्मकथा"। 


संयोग से अपना नाम भी कविता होने के कारण वह प्रकाशित कविता मेरे पास तब से फाईल में बंद पड़ी है; क्योंकि कुछ लोग मेरा नाम कविता होने के कारण उसे मेरी आत्मकथा समझने के कयास लगाते रहे। यह दंड उस कविता को भोगना पड़ेगा, इस चिंता से कभी उस कविता को फिर जगजाहिर ही नहीं किया। 


अब जब मेरी किसी कविता (मेरे चित्र के साथ प्रकाशित) पर कुछ लोगों की असपष्ट-सी या मात्र वाह-वाह नुमा टिप्पणी आती हैं तो यही स्थिति होती है। 


रचना पर टिप्पणी करते समय लोग रचना पर ही केन्द्रित क्यों नहीं रहते ? क्यों रचनाकार की (या चित्र की ) प्रशंसा करने में जुट जाते हैं ?


क्या मेरी कविताओं को मेरे नाम का ऐसा खामियाजा भोगना उचित है? अपनी एक महत्वपूर्ण कविता तो इसी चक्कर में बंद कर पहले सहेज ही दी है। अपने मित्रों से, मुझे इस दुविधा में न डालने का, आग्रह करती हूँ।

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  • Pankaj Mishra pranam mam...
    14 hours ago · Unlike · 1
  • Anirudh Umat ji sahi kaha aapne.

    ye hamare alpvayask man or buddhi ka parichayak h. hum ab bhi kalaa 
    me bahut roodhivadi h.

    14 hours ago via mobile · Unlike · 1
  • DrKavita Vachaknavee Anirudh Umat जी,  सही कहा। महिलाओं के संदर्भ में
     तो स्थिति और भी दूभर हो जाती है कई बार।

    14 hours ago · Like · 1
  • Chandra Gurung रचना पर टिप्पणी करते समय लोग रचना पर ही 
    केन्द्रित क्यों नहीं रहते ? क्यों रचनाकार की (या चित्र की ) प्रशंसा करने में जुट जाते हैं ?

    specially, it is true in case of lady writers...

    14 hours ago · Unlike · 2
  • Deepak Kumar Misra जारी है---------------------------लव जिहाद के खिलाफ एक अभियान------------------------------------पसलियों को तोड़ के भर दिया प्यार मीठा मीठा / बेगम को मिल 
    गया काफिर अपने मिजाज का.
    14 hours ago · Unlike · 2
  • Anirudh Umat kayee baar? aap lihaaj kar rahi h kavitaji.

    mera to manna h ki aqsar hi bahut nimn star samne aata h. hamare bheetr ka 
    mail or kuntha koi aadhunikta ka mukhota chupa nahi sakta. hum pakhandi h...
    ye nagn satya h.

    14 hours ago via mobile · Unlike · 2
  • DrKavita Vachaknavee जी, Chandra Gurung जी। यही पीड़ा मैंने उमट जी 
    को संबोधित टिप्पणी में कही है कि महिलाओं के संदर्भ में तो स्थिति 
    और भी दूभर हो जाती है कई बार"

    14 hours ago · Like · 1
  • DrKavita Vachaknavee Anirudh Umat जी, आपने ठीक फरमाया। मैं इतने कड़े 
    शब्दों में नहीं कह पाई बस ।
    14 hours ago · Like · 1
  • Sarika Thakur DrKavita Vachaknavee jee ... Jo hamari mitra suchi 
    me hain ..wh kavita ki kitni samajh rakhte hain yah bhee vicharneeya
     hai...kuchh log u hee add kr lete hain ...isi tarah u hee comment
     bhee chaspa ho jate hain...unki ruchi kavita me hoti hi nahi hai..
    14 hours ago · Unlike · 1
  • DrKavita Vachaknavee निस्संदेह
  • Anirudh Umat aap mat kahiye...
    jiski deh me ye mawaad bhara h..vh kaise anjan rh sakta h? m 
    usi mard samaaj ka hissa hu jo hr pal apne purusatv ki aad me apna
     amanviya roop nikharta rahta h. khas kr hamare samaaj me pashu 
    se jyada hinsak. 
  • DrKavita Vachaknavee इस सदाशयता के लिए आभारी हूँ।
  • Sarika Thakur Saafgoee kee tareef karungi lekin pata nahi kyon bahut
     se batain umadne lageen hai ...lekhan swaym me stree-purush
     nahi hota ...lekhin mahila lekhikaon ki samasya yah hai ki pathak se lekar
     lekhak samudaay koi bhee rachna ke prati samyak deristi rakhta hi nahi ...
     wh mainstream ki rachna se bahar kr dee jati hain ... I dont know why 
    ...bt ya dohra bartaav pratyek star pr hai
  • Chandra Gurung DrKavita Vachaknavee कमजोर महिला लेखक कवि पर तो 
    शंका उठते ही हैं । अच्छे महिला लेखकको भी इस तरह के सजा भुगतने पड रहे हैं ।
  • Anirudh Umat m lekhan ko lekhan manta hu.
    mahila lekhan...purush lekhan...apripakwata ki bahas h. 
    meri mitr or varisth lekhak jyotsna milan ne apne intervew me saaf ye 
    kaha h. jald hi vh kathadesh me aa rahaa h. 
  • DrKavita Vachaknavee लेखन में वर्गवाद के केवल एक ही पक्ष के आलम पर भी 
    बात करें तो लेखिका होने के कई दंड व रूप और भी बहुत से हैं। जैसे प्रत्येक 
    रचना पर लोग अमूमन यही समझते हैं कि दैनंदिन जीवन में किसी घटना से सुखी 
    या दु:खी होकर यह लिखी गई होगी। मानो, स्त्री में अपने से उबर पाने की औकात ही कहाँ ?
  • Anirudh Umat kavitaji aapne behad saral lahje me gahri or buniyadi
     baat kahi h. ajab aalam h hindi me budhi ka...
  • Sarika Thakur abhe abhi mere inbox me ek sajjan ka sandesh aya ..
    mai vyaktigat anubhawon ka dastawej taiyaar kr rahi hun mujhe 
    kavta lekhan nahi krna chahiye
  • Sarika Thakur aap sahi kh rahi hai DrKavita Vachaknavee jee ...
  • DrKavita Vachaknavee Anirudh Umat जी, मुझे यह बुद्धि के अजीब आलम से अधिक 
    पितृ सत्तात्मक मानसिकता का आलम अधिक लगता है। 
  • DrKavita Vachaknavee Sarika Thakur जी, ऐसे अनेक महानुभावों के भद्दे, अश्लील, 
    अपमानजनक व घिनौने संदेश मेरे पास बहुतायत में हैं....। एक तो फरमाते हैं कि
     मैं पुरुषों की मानसिकता का विरोध करती हूँ, इसलिए सबकी घृणा की पात्र हूँ, घटिया हूँ। 
    आज ही एक महानुभाव ने 8 पैराग्राफ में गालियाँ देते हुए ईमेल लिखा है।
  • Anirudh Umat bilkul us se kaise inkar kiya ja sakta h.
    magr jo hitchintak ban bheeni bheeni baaten karte ve adhik .....hote h.
     hum aqsar unki bhinbhinaht me hi kho jate h...nirmam aanklan nahi kr pate.
     aanklan mitr or virodhi...dono ka nutral or nirmam hona chahiye. 
  • Samarth Shree चित्र और चरित्र एक ही व्यक्तित्व के परिचायक होते हैं,,
    विचित्र चित्त वालों को चित्र भा जाता है ,जबकि पवित्र चरित्र वालों को उत्तम चरित्र,
    ,काव्य कवि का चरित्र भी होता है और व्यक्तित्व भी,,,,,और स्पष्ट कहे तो व्यक्ति का
     आन्तरिक चित्र ही उसका चरित्र है,,,जाकी रही भावना जैसी...
  • DrKavita Vachaknavee एकदम सटीक बात। मीठी छुरी से वार करने
     वाले भोग्या से अधिक की दृष्टि नहीं रखते। Anirudh Umat जी
  • Anirudh Umat ji shukriya..aapne mujhe apne vichar apni
     post pr vyakt karne avsar diya. G.N.
  • Sarika Thakur Samarth Shree jee ...kavya kavi ka charitra bhee hai 
    vyaktitya bhee ....sahi kaha aapne ...lekin kaun pawitra aur kaun 
    apwitra yah kuan tai karai...aur swa ...anubhution se pare kaun hai ...
  • Samarth Shree पवित्र वह जिनका मानसिक चिन्तन शालीनता का अतिक्रमण 
    नहीं करता,,
  • Sarika Thakur DrKavita Vachaknavee jee ..hm pariwartan ke mahatwapurna
     prakriya ki mahatwapurna kadee hain ... sthitiyan niranatar 
    badalti rahi hain ...age bhee badlengi... ise rok pana kisi ke  bus me
     nahi ...kuchh log hain jo aisa krk sochte hain wh wkt ko ulti disha me 
    ghumane me qamyaab ho jayenge ...pr aisa nahi hoga ...
  • Samarth Shree मुगलों की सुतीक्ष्ण सशक्त सार्वत्रिक अधिसत्ता के समय भी

     यही लगता होगा कि परिवर्तन कैसे होगा पर हुआ,,तो नैराश्य क्यों,,,कभी 
    बीज रूप में कभी वृक्ष रूप में सबकुछ रहता है,,रहा है,,रहेगा भी,,यही सृष्टि का नियम है,,

  • Rakesh Yadav Ahir WHA WO !!!!!!!!!!!!!!! ,YOU ARE GREAT
  • Manoj Tiwari कविता जी सबका अपना-अपना नजरिया होता चीजो को देखने का,
    कभी-कभी आपकी (रचनाकार) रचनाओ मे पाठक ऐसे अर्थ निकाल लेते है 
    जिसकी कल्पना रचनाकार ने भी न की होती,ये कलाकार की पेन्टिग्स के साथ भी होता है
  • SP Sudhesh Kavita ki atmkatha shirshak Kavita Ab Kahan milegi.
    koi sutr bataiye .Purn kumbh men kuchh meri kavitayen bhi 
    chhapi thin .Is nayi Jankari ke liye dhanyvad .
  • DrKavita Vachaknavee SP Sudhesh जी, "पूर्णकुम्भ" के नाते हुआ यह परिचय सुखद है। 
    "कविता की आत्मकथा" या तो "पूर्णकुम्भ" का वह अंक जिनके पास होगा, 
    उनमें मिलेगी; अन्यथा मेरे पास तो है ही, कुछ आत्यंतिक मित्रों के पास भी होगी,
     जो कविता की आलोचना की पितृसत्तात्मक प्रविधि से वास्ता नहीं रखते व स्वस्थ 
    दृष्टि अपनाते हैं।
    9 hours ago · Edited · Like · 1
    • Rakesh Yadav Ahir PLEASE NET PAR ISE SHAYR KARE
      6 hours ago · Unlike · 1
    • Dhiraj Chauhan adhbhut hai ji sab kuch
      5 hours ago · Unlike · 1

    • DrKavita Vachaknavee Rakesh Yadav Ahir जी, नेट पर इसे 
      प्रकाशित कर दिया है। यहाँ देखें - 
      5 hours ago · Like · 1

      B
      के लिए आपका धन्यवाद मैं शीघ्र ही इस कविता को डॉ.जी नीरजा जी से 
      प्राप्त कर कविता की आत्मकथा की भीतरी परतो कीजानकारी प्राप्त करने 
      की कोशिश करूँगी.. और आपने सही कहा है कुछ लोगों की प्रवृति होती है 
      कि जहाँ कहीं स्त्री देखी बस उसके कार्य की चर्चा तो नहीं करेंगें बल्कि उसके 
      रूप-रंग को निहारने लगेंगें.. असल में ये समस्या हर स्त्री के साथ है...
      4 hours ago · Unlike · 1


      • DrKavita Vachaknavee अग्रिम धन्यवाद Balvinder Khan जी, आप लोगों के 
        लिए तो उस अंक को पाना अतीव सहज है.... भले ही "पूर्णकुम्भ" के पुराने
        अंकों को तलाश कर या Rishabha Deo जी के माध्यम से अलग से बड़े आकार 
        के चार पन्नों पर प्रकाशित प्रति। उस कविता पर एक लंबी समीक्षा उसके 
        पश्चात् श्री पूर्ण सहगल जी ने लिखी थी। संयोग से इतने वर्षों बाद 
        पूर्ण सहगल जी के समाचार श्री Banshilal Parmar जी के माध्यम 
        से गत दिनों ही मिले हैं।
        3 hours ago · Like
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