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शनिवार, 29 नवंबर 2014

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा सम्मान-समारोह एवं आमन्त्रण

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा सम्मान-समारोह एवं आमन्त्रण


उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा प्रदत्त अपने जीवन के इस अमोल अवसर पर मैं तो उपस्थित नहीं हो सकूँगी (मेरी ओर से मेरा कनिष्ठ पुत्र यह सम्मान ग्रहण करेगा), किन्तु मित्रों को आग्रहपूर्वक निमन्त्रण है कि वे अधिकाधिक उपस्थित होकर शोभा बढ़ाएँ। 

बड़े आकार में देखने के लिए एक-एक कर चित्रों पर क्लिक करें  -






मंगलवार, 4 नवंबर 2014

लन्दन में भारतीय इतिहास का यह पृष्ठ



गत दिनों एक दूर के सम्बन्धी के देहावसान पर लन्दन के गोल्डर्स ग्रीन शवदाह गृह (क्रेमेटोरियम) जाना हुआ। इस के विशाल प्रार्थना सभाकक्ष की मुख्य दीवार में लगभग 15 फीट की ऊँचाई पर सोने की तारों और मीनाकारी से सजी तीन संगमरमर की शिलाएँ गड़ी हुई हैं, जिन्हें अपनी खोजबीन वाली आदत के चलते ध्यान से पढ़ा तो पता चला कि एक ही परिवार के तीन व्यक्तियों (पिता व दो पुत्र) के निधन पर उनकी सूचना देने के लिए लगाई गई हैं और वे तीनों भारतीय थे। मुख्य शिला 21 अगस्त 1911 को दिवंगत हुए महाराजा नृपेन्द्र नारायण भूप बहादुर की स्मृति में है और उसकी एक ओर लगी छोटी शिला उनके बड़े बेटे महाराजा राज राजेन्द्र नारायण भूप बहादुर (11 अप्रैल 1882 - 1 सितम्बर 1913 ) की स्मृति में तथा दूसरी ओर लगी छोटी शिला नृपेन्द्र नारायण जी के द्वितीय पुत्र महाराजा जितेन्द्र नारायण भूप बहादुर (20 दिसम्बर 1886 - 20 दिसम्बर 1922) की। इनका एक चित्र भी वहाँ लगा है। 

अन्त्येष्टि व श्रद्धांजलि सभा में चित्र लेने का अवसर न होते हुए भी निकलते-निकलते भारतीय इतिहास से जुड़ी इन शिलाओं के जो चित्र मैंने अपने मोबाईल कैमरा से लिए वे नीचे देखे जा सकते हैं - 

बड़े आकार में देखने के लिए चित्र पर क्लिक करें। 
सभी चित्रों का स्वत्वाधिकार © सुरक्षित है। 









बुधवार, 22 जनवरी 2014

समाचार व कतरनें

समाचार व कतरनें 

लोकस्वामी, वर्ष 2 अंक 13, नोएडा


'स्रवन्ति', दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद की मासिक पत्रिका 





दैनिक हिन्दी मिलाप, हैदराबाद


'शान्तिधर्मी', हिसार 




आर्य सन्देश (दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा का मुखपत्र )




मंगलवार, 6 अगस्त 2013

ऐतिहासिक 'चित्रपट' (साप्ताहिक) की दुर्लभ प्रति और मुखपृष्ठ पर 'हरिऔध'

ऐतिहासिक 'चित्रपट' (साप्ताहिक) की दुर्लभ प्रति और मुखपृष्ठ पर हरिऔध : कविता वाचक्नवी


आज एक दुर्लभ वस्तु हाथ लगी है। ' चित्रपट' पत्रिका का वर्ष 1934 नव-वर्षांक (वर्ष दो)। इसके मुखपृष्ठ पर कवि अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की रचना प्रकाशित है। 


यह अंक सम्पादक श्री ऋषभचरण जैन द्वारा समालोचनार्थ भेंट की गई हस्ताक्षरित प्रति है, जो Tübingen विश्वविद्यालय जर्मनी में संरक्षित है। यह अंक लगभग 310 पृष्ठों का है। 

कई रोचक तथ्य इस अंक को देखने से पता चलते हैं, जिनमें से एक यह कि वर्ष 1934 तक भी अपने देश का नाम विधिवत् 'भारतवर्ष' ही लिखा/कहा जाता था। इसे देख कर मुझे सुखदानुभूति हो रही है :) 


मुखपृष्ठ का चित्र देखें -


गुरुवार, 4 जुलाई 2013

लन्दन : राजहंसों का जोड़ा, झील व हम

लन्दन : राजहंसों का जोड़ा, झील व हम / कविता वाचक्नवी

अपने जीवन व घर में गाय, मोर, तोता, खरगोश, मछलियाँ आदि पालने व उनका स्नेह सान्निध्य लेने के जाने कितने दुर्लभ संस्मरण हैं। इन प्राणियों में गाय, कुत्ता आदि जीव ऐसे हैं कि कइयों ने उन्हें पाला होगा और उनके संस्मरण होंगे। कुछ कम अन्य लोगों के तोता, मछलियों आदि के पालने की संस्मरण भी होंगे किन्तु बहुत कम लोगों के खरगोशों के शावक-जोड़े के संस्मरण होंगे और किन्हीं बेहद विरले लोगों के मोर के साथ। कुछ दिन पूर्व मैंने अपने पालतू मोर के संस्मरण लिखे थे। 
फेसबुक पर यहाँ -
https://www.facebook.com/kvachaknavee/posts/10151614001859523

व 'वागर्थ' पर "जब दुल्हन आने पर घर में नाचे मोर" के रूप में देखे जा सकते हैं। (यहाँ क्लिक कर देखें)

"मंजरी और हंस : लन्दन आज"  (यहाँ क्लिक कर देखें)
में व अन्य भी अलग-अलग संस्मरणों के रूप में कई बार अपने घर से सटी झील और अपार शान्त प्राकृतिक सुषमा वाले वातावरण का उल्लेख करते हुए मैंने राजहंसों के जोड़ों व बतखों आदि के साथ अपने दैनिक नैकट्य का उल्लेख किया है, जिनकी जाने कई सौ रूपों में विविध छवियाँ मैंने अपने कैमरे में सुरक्षित की हैं और नेट पर भी डाली हैं। 

इतना ही नहीं अपनी पालतू 'मौलि' तथा बगीचे में दिन-रात आ कर घूमने वाली लोमड़ी (कई बार दल-बल सहित भी) की छवियाँ और वीडियो भी बनाए - यहाँ क्लिक कर देखें 


"लन्दन का हिमपात व मेरा कैमरा" तथा उसमें दिए लिंक्स व चित्रों में जिस झील के श्वेत सौन्दर्य व पक्षियों आदि की रूपरेखा सहेजी है, उस झील में रहने वाली बतखों व हंसों की ढेर सारी छवियाँ हृदय पटल पर भी अंकित हैं - यहाँ । 

सबसे विशेष बात यह है कि इस झील में दो-तीन प्रकार के हंसों के जोड़े हैं, जिनमें से सबसे विशेष हैं राजहंसों के दो जोड़े; जिनके विषय में गत दिनों मैंने लिखा था कि हंसिनी नवप्रसूता है और अपने नन्हें बाल-हंसों के साथ जोड़ा पानी में घूमता है। दो वर्ष पहले हंसिनी के आसन्न-प्रसवा और फिर बाल-हंसों के साथ जोड़े के कई चित्र लिए थे किन्तु वे सब पुराने चित्र बहुत ढूँढने पर भी अभी खोज नहीं पाई क्योंकि वे सब पुराने मोबाईल कैमरा में थे। 

भारत में मैंने हंस देखना तो क्या, उसका उल्लेख-मात्र पढ़ा है, वह भी संस्कृत साहित्य में। नल-दमयन्ती कथा में राज-हंस की कुछ विशद भूमिका से परिचय भी वहीं हुआ था। किन्तु जीवन में कभी राजहंस मेरे नियमित साथी बन जाएँगे, इसकी कल्पना व अनुमान भी असंभव था। किन्तु इधर वर्ष-भर से राज-हंसों का यह जोड़ा मेरा प्रतिदिन का साथी है। मैं जैसे ही प्रतिदिन झील पर जा कर इनकी प्रतीक्षा में बैठती हूँ, यह जोड़ा मुझे देखते ही जाने कैसे बहुत दूर से पहचान कर तैरते-तैरते मेरे पास आ बैठता है। 


बड़ी बहन सरीखी शन्नो दी' लंदन में लगभग 42 वर्ष से रह रही हैं और इस बीच उन्होंने भी जीवन में जाने कई सौ राजहंस यहाँ देखे हैं; किन्तु उनके लिए भी मेरे द्वारा बार-बार अपने वाले इन राजहंसों का यह उल्लेख अविश्वसनीय था। तो पहली बार मेरे यहाँ उनके आने का एक बड़ा उद्देश्य इन दृश्यों व अनुभूतियों को साक्षात् करना भी था।परसों ( 2 जुलाई को प्रातः वे यहाँ आईं तो उन्हें साथ लेकर लगभग अढ़ाई घंटे मैंने उन्हें निसर्ग के वे दृश्य भी दिखाए जिनके सान्निध्य में मेरा दिन-रात व्यतीत होता है।


प्रारम्भ में झील पर केवल ढेर सारी अलग-अलग नस्ल की बतख़ें ही थीं, किन्तु जब हम थोड़ा घूम कर फिर से झील के निकट आए तो बहुत दूरी पर झील के मध्य भाग में राज-हंसों का जोड़ा भी तैरता दीख गया। तब तो शन्नो दी' के आश्चर्य का पारावर न रहा, जब वह जोड़ा मुझे देखते ही मेरे संकेत पर तुरन्त ही हमारी ओर बढ़ने लगा और एकदम से किनारे पर हमारे हाथ से छू लेने की पहुँच में एकदम आ कर हमसे सट गया। शन्नो दी' तो एकदम किलक उठीं कि उन्होंने जीवन में पहली बार इतनी निकट से हंसों को देखा है। मैंने झटपट उनके कई चित्र लिए। इस बीच वे भी अपने कैमरे में मुझे व निसर्ग को कैद करती रहीं। उस पूरी परिक्रमा और वातावरण के कई सारे चित्र सहेजे गए । 


फिर वहाँ से हम लोग घर आए तो हमारी 'मौलि' भी शन्नो दी' के स्वागत के लिए तत्पर थी। हमने अपने बगीचे में गुलाबों की तीखी मीठी सुगन्ध, स्ट्राबरी, चेरी व पुदीने आदि के बूटों में भी देर तक सुखद समय बिताया। वह पूरा दिन हम लोगों का बतियाते और हँसते कैसे बीत गया पता ही न चला। शन्नो दी' को यों देर तक हँसते मुसकाते देखना अच्छा लगा। और हाँ, वे आते समय अपने साथ गुलाबजामुन ले कर आई थीं.... जिनकी मिठास ने उस दिन की मिठास को और बढ़ा दिया। अस्तु ! वह अविस्मरणीय दिन जाने कितने बरसों तक मन पर अंकित रहेगा। 


झील पर लिए चित्र यहाँ संकलित हैं। ये कई अर्थों में दुर्लभ हैं, अविश्वसनीय व संग्रहणीय हैं। इन दृश्यों को देखने से बार-बार जीवनीशक्ति मिलती है। और लोग भी इन दुर्लभ क्षणों का आनंद ले सकें इसलिए वे सब चित्र यहाँ सहेज दिए हैं। 


(©): सभी चित्रों का सर्वाधिकार (कॉपीराईट) सुरक्षित है। कृपया कदापि उसका उल्लंघन न करें।


























































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