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बुधवार, 6 नवंबर 2024

क्या अमेरिकन समाज स्त्रीविरोधी है? : (डॉ.) कविता वाचक्नवी

क्या अमेरिकन समाज स्त्रीविरोधी है? :  (डॉ.) कविता वाचक्नवी

अमेरिका के चुनाव परिणाम की मेरी भविष्यवाणी पुनः सत्य हुई। लोग मुझे पूछते और बहुधा हँसते भी हैं कि मैं फलित ज्योतिष को तो मानती नहीं, फिर किस आधार पर भविष्यवाणियाँ किया करती हूँ और वे कैसे सत्य भी हो जाती हैं। तो ऐसे लोगों के लिए मेरा उत्तर है : समाज के मनोभावों, उस के सुख दुःख, उस की सोच तथा उस के मनोविज्ञान की मेरी कुछ–कुछ समझ के सहारे ही यह सम्भव होता है और शेष ईश्वर की कृपा से।

 अमेरिकन चुनावों पर 2016 से अब तक तीसरी बार जो भविष्यवाणी मैंने की उस की पृष्ठभूमि बताती हूँ। जो बात मैं कहने जा रही हूँ, मेरे उस आकलन / निष्कर्ष को पढ़ लोगों को आश्चर्य होगा और असहमति भी; किन्तु आधुनिक सामाजिक मनोविज्ञान का एक सत्य जानना हो तो इसे ठीक से समझना ही होगा।

 मुझे 90 के दशक से अब तक यूरोप, यूके और अमेरिका के समाज में रहने का अवसर मिला है, या कहें कि अनुभव प्राप्त हैं, अतः इस अत्याधुनिक समाज में रहते हुए इन की सम्वेदना, सोच तथा समझ के अलिखित सत्य का बहुत ठीक आभास भी मुझे प्राप्त है। उसी आधार पर यह तथ्य बताना समीचीन और आवश्यक भी है कि क्यों और कौन स्त्रियाँ / पुरुष / समाज अपना क्या भविष्य बनायेंगे।

जिन लोगों को लगता है कि अमेरिकन जनता महिला राष्ट्रपति को नहीं स्वीकार सकती इसलिए हिलेरी या कमला हारीं ; उन की समझ गलत है। वास्तविकता यह है कि (जैसा कि मैंने लगभग 5–6 वर्ष पूर्व लिखा भी था) यॉरोप तथा अमेरिका आदि देशों में फ़ेमिनिज़्म खोटा सिक्का हो चुका है, जो महिलाएँ, समूह अथवा वर्ग/दल/संगठन या व्यक्ति ऐसी मानसिकता के हों या इस के पक्षधर हों, वे पिछड़े और यहाँ तक कि वे कम आईक्यू के / या थोड़े मूर्ख माने जाते हैं। बहुधा इसलिए; क्यों कि फेमिनिज्म का सत्य फेमिनिस्टों ने उघाड़ कर दिखा दिया है। इन देशों में फेमिनिज्म को समूचे सामाजिक अध: पतन का मूल समझा जाता है अब, और निजी स्वार्थों की इच्छापूर्ति का हिंसक माध्यम भी।

यह तथ्य भले ही कहीं लिखित रूप में या उद्धृत रूप में उपलब्ध नहीं है, किन्तु है यही सत्य। समाज फेमिनिज्म को एक ऐसी प्रवृत्ति मानता है जो राक्षसत्व के तुल्य है और जिस ने समाज, परिवार तथा सम्बन्धों को नष्ट किया है। अतः समाज उन स्त्रियों को तथा उन समूहों को स्वीकार नहीं करता जो फेमिनिज्म की राह पर हों और पुरुषों को अपनी उस सोच के कारण नकारती हों। 

 इस के विपरीत निजी जीवन में जो जितनी स्त्रियोचित हैं, उन की समाज स्वीकार्यता उतनी अधिक है। आप इस के उदाहरण यहाँ के समाज और घरों में तो स्वाभाविक है दूर से नहीं देख सकते, किन्तु अमेरिका तथा यॉरॉप की राजनीति में तो कहीं से भी देख सकते हैं। 

कई अन्य तथ्यों के अतिरिक्त यह बड़ा तथ्य इन परिणामों की पृष्ठभूमि में बहुत बड़ा कारक था। कुछ और कारक भी थे, उन का उल्लेख कभी फिर समयानुसार करुँगी 

यह सत्य बताना इसलिए आवश्यक प्रतीत हुआ ताकि भारतीय समाज में जो स्त्रियाँ फेमिनिज्म का झण्डा उठा स्वयं को आधुनिक समझती हैं, वे अपना आकलन कर सकें और उन्हें अपनी वास्तविकता तथा भविष्य समझ आ सके। 
दूसरा कारण इसे लिखने का यह है कि जो लोग मेरी की भविष्यवाणियों पर प्रश्न करते हैं, उन्हें मेरी सामाजिक तथा मानवीय चित्त की समझ इस के मूल में है, यह पता लग सके।
– ✍️डॉ. कविता वाचक्नवी©

मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

ऐतिहासिक ध्वंस और पुनर्निर्माण : (डॉ.) कविता वाचक्नवी

 2-3 सौ वर्ष पूर्व आई औद्यौगिक क्रान्ति के साथ पश्चिम में साईंस और रिलीजन दो हुए, और रिलीजन के फंदे से कुछ लोग बाहर निकले तथा कुछ आधुनिक होने लगे अन्यथा रिलीजन वालों का उस से पूर्व के लगभग 17-अठारह सौ वर्ष कितना भयंकर कुत्सित एवं क्रूर रूप था, इस का अनुमान आज के आतंकी को देख कर भी आप नहीं लगा सकते। एकदम जंगली, नृशंस और हत्यारा समाज था।

केवल स्त्रियों के प्रति सभी प्रकार के आत्यन्तिक अमानुषिक व्यवहार की ही परत खोलें तो उस समाज की पारिवारिक व पंथानुगत संरचना का कलुषित रूप देखा–सोचा न जा सकेगा। साईंस इसीलिए रिलीजन की शत्रु बनी। उन आत्यन्तिक अमानुषिक कदाचारों व नृशंसताओं के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के चलते तुलनात्मक सन्दर्भों में उस क्रूर काल के घटनाक्रम को पितृसत्तात्मकता के रूप में परिभाषित किया गया। वह अपने समाज पर उन के अपनों का दोषारोपण था।

दुर्भाग्यवश भारत के कुपढ़ों ने, जिन्हें इस पश्चिमी समाज की तत्कालीन संरचना, इतिहास व वास्तविकता का रञ्चमात्र भी अनुमान नहीं, पता होना तो दूर; उन्होंने यहाँ के वर्तमान से सारे आरोप अपने समाज पर आरोपित कर लिए, यहाँ पश्चिम के आयातित विमर्शों, चिन्तन, मुद्दों, बहसों को ज्यों-का-त्यों अपना बना-कह-समझ-लिख कर । इस से बड़ा, क्रूर विद्रूप कोई अन्य नहीं हो सकता था।

जिन मूर्खों को यहाँ के घटनाक्रम, इतिहास, संरचना, समाज का आभास तक नहीं था, वे अपने अन्धे दीदों के मारे अपना अभिशाप समूची भारतीय संस्कृति के मत्थे मढ़ झूठे गवेषक बन गए। और कई भारतीय पीढ़ियाँ अभिशप्त रही हैं इस तथाकथित गवेषणा को ढो अपनी पीठ रक्तिम करते। पितृसत्तात्मक क्रूरता पश्चिम के समाज का इतिहास व अभिशाप थी।

यदि भारतीय इतिहास को ठीक से पढ़ा-जाना होता, और पश्चिमी समाज के इतिहास की वास्तविकता का किञ्चित भी आभास होता तब तो कोई समझ पाता कि रजकण की सूर्य किरण से क्या तुलना ? किन्तु भारतीय समाज के साथ अपने अज्ञान और धूर्ततावश किए इस दुराचार को करने वालों ने जो जघन्य अपराध किया है, उस की गम्भीरता का 1% भी अनुमान आज संस्कृति- संस्कृति चिल्लाने वाले तथाकथित पढ़े-लिखों तक को नहीं है।

हतभागी हैं ये सब पीढ़ियाँ और हतभागी है हमारा क्रीत समाज। ऐसा भयंकर पाप किया गया है। और ऐसा करने वाले अभी चुके नहीं हैं, वे निरन्तर अजस्र उन्हीं स्खलनों में स्वयं भी रत हैं और अन्यों को स्खलित करने की कुचेष्टाओं में भी निमग्न।

इधर भारतीय समाज है कि उसे इस लूट व कदाचार का कोई अनुमान ही नहीं, वह जरा-सी राजनैतिक जीत को ही अपनी परम संतुष्टि का माध्यम व ध्येय मान लेता है, या जरा-सी छुटपुट गति बढ़ने को अपनी परम विजय। ऐसे लोगों का यह जानना अत्यावश्यक है कि आप देश व संस्कृति के साथ खड़े हैं तो यह युद्ध तो अभी पूरा शेष है। युद्ध क्षेत्र में अभी तो आप पूरे डटे तक नहीं हैं। युद्ध अभी शेष हैं, विजय तो उस के बहुत बाद होगी और विजय के बहुत पश्चात् फिर ध्वंस का अनुमान लगाया जाना होगा; तब कहीं जा कर पुनर्निर्माण के कार्यों की नींव रखी जा सकेगी।

इतना धैर्य है न ? नहीं है तो सीखिए अन्यथा विश्व में अन्य कोई शक्ति नहीं है जो उस वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर को खोज या बचा सके। वह धरोहर विलुप्ति की सीमा पर है और विश्व इतिहास आप को व हमें कभी क्षमा नहीं करेगा, किञ्चित नहीं, कदापि नहीं।
© - कविता वाचक्नवी

बुधवार, 8 मार्च 2017

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम क्यों ? : कविता वाचक्नवी

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम क्यों ?  : कविता वाचक्नवी 

(८ मार्च २०१७ को महिला दिवस के उपलक्ष्य में फरगुदिया द्वारा आयोजित परिचर्चा  हेतु लिखित विचार)


"प्रथम तो राजनीति एक सार्वजनिक क्षेत्र है, और मध्ययुगीन परम्परा से सार्वजनिक क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी सीमित रही है। यद्यपि 20 के दशक के उत्तरार्द्ध में यह बढ़नी प्रारम्भ हुई किन्तु वह केवल कला और सौन्दर्य के क्षेत्र में, या स्पष्ट कह लें तो फिल्मों में और तत्पश्चात् सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में अर्थात् नर्सिंग एवम् अध्यापन में। 

दूसरा कारण यह कि राजनीति मुख्यतः अनीति की शरणस्थली रहती आई है, जहाँ अपराध और कपट को या तो संरक्षण और प्रश्रय मिलता आया है अथवा उस से संघर्ष और जय-पराजय। स्त्रियों की प्रकृति से यह सार्वजनिक समेकित द्वन्द्व मेल नहीं खाता।

तीसरे, समाज में कार्यों का विभाजन इस प्रकार का रहता आया है कि स्त्री परिवार और गृहस्थी की धुरी होती है, वह परिवार और सन्तान से सम्बन्धित दायित्वों से इतना अवकाश और छूट नहीं पाती कि वह निरपेक्ष भाव से ऐसे किसी अवसर /अध्यवसाय को समय दे सके।

चौथा, कई अर्थों में यह 'महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं' भी माना/कहा जा सकता है। जिन परिवारों की पद-प्रतिष्ठा और सुरक्षाकवच-सा स्त्रियों को मिला उन परिवारों की स्त्रियाँ मुख्यतः राजनीति में आईं भी।

पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्र में स्त्री का स्थान बनाना भी स्वयम् में चुनौती है। तभी तो संसद में आरक्षण का प्रस्ताव तक पुरुष वर्चस्ववादी दलों ने लाने नहीं दिया। राजनीति में अपराधीकरण कम हो तो धीरे-धीरे यह अनुपात बढ़ेगा, या स्त्रियाँ अपराध की अभ्यस्त हो जाएँ तब भी बढ़ेगा। स्त्री-वर्चस्व बढ़ने ओर्र राजनीति के मानवीय पक्ष की अपेक्षा तब की जा सकेगी।"

- कविता वाचक्नवी

वे सम्पादकों व लेखकों के मध्य स्वयं को सुरक्षित नहीं पाती थीं और न समझौते कर सकती थीं

'लमही' द्वारा आयोजित परिचर्चा के प्रश्नोत्तर


जनवरी २०१५ में प्रतिष्ठित पत्रिका 'लमही' के नववर्षांक को महिला कथा-लेखन विशेषांक के रूप प्रकाशित किया गया था। इसमें सम्मिलित एक परिचर्चा हेतु पत्रिका द्वारा १० प्रश्नों की एक प्रश्नावली भेजी गयी थी जिनके उत्तर मुझे देने थे और जिन्हें पत्रिका में सम्मिलित किया गया था। आज 'महिला दिवस' पर उनके वे प्रश्न और अपने वे उत्तर आपके समक्ष -


1 - कहा जाता है कि अभिव्यक्ति की बराबरी से बड़ी कोई बराबरी नहीं हो सकती. दुनिया भर के जनतांत्रिक आंदोलनों का अंतिम आदर्श भी यही अभिव्यक्ति की बराबरी रहा है.हिंदी जगत में स्त्रियों द्वारा रचे जा रहे साहित्य की प्रचुरता और विपुलता के मद्देनज़र क्या आपको लगता है कि आज एक स्त्री के लिए अभिव्यक्ति के समान अवसर हैं और वह निर्द्वंद हो कर मनचाहा रच और अभिव्यक्त कर पा रही है?


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कविता वाचक्नवी - यह ‘समान अवसर’ एक सापेक्ष शब्द है, समान से आपका अभिप्राय, सभी स्त्रियों में परस्पर समान अथवा पुरुषों की तुलना में समान, है , यह असपष्ट है। इसलिए इसके उत्तर भी दो होंगे। जो लेखिकाएँ मुख्यतः आज सक्रिय लिख रही हैं उनके पास कमोबेश परस्पर लगभग समान अवसर हैं। किन्तु यदि प्रश्न का निहितार्थ पुरुषों की तुलना में आँकना है तो कहना होगा कि कदापि नहीं। अभिव्यक्ति के अवसर को यदि आप रचने के अवसर मात्र के अर्थ में देखते हैं तो भी, और यदि रचनात्मकता / लेखन / साहित्य-सृजन आदि को रचे जाने और पाठकों तक पहुँचने की पूरी प्रक्रिया के रूप में देखते हैं तो भी विविध स्तरों पर, विविध विधाओं में, विविध क्षेत्रों, विविध आयुवर्गों व विविध पृष्ठभूमि वाली हिन्दी-जगत की स्त्रियों के सर्वाधिक बहुलता वाले इस कालखण्ड में भी उनके पास पुरुषों की तुलना में न तो रचने के समान अवसर हैं व न ही पाठकों तक पहुँचने के। 



2 - साहित्य को स्त्री, दलित, पिछड़ा जैसे खांचों में रख कर पढना और समझना मुझे उन्हें मुख्यधारा से परे धकेलने का एक षड्यंत्र ज्यादा लगता है. मगर, कुछ लोग अनुभवों और यथार्थ की प्रमाणिकता की दृष्टि से वर्गीकरण और रेखांकन को युक्तिसंगत भी ठहराते हैं. आप अपने लेखन पर चस्पां 'स्त्री लेखन' के लेबल से कितनी सहज या असहज महसूस करती हैं?

कविता वाचक्नवी - वस्तुतः यह पाठक पर निर्भर करता है कि आनुपातिक दृष्टि से अधिक पाठक किसे मुख्यधारा मानते हैं। मेरे तईं गत लगभग पन्द्रह वर्ष से मुख्यधारा का साहित्य बहुधा स्त्रियों द्वारा लिखा जा रहा साहित्य है। रमणिका जी, मृदुला जी, चित्रा जी, मैत्रेयी आदि व इनकी समकालीन अनेक वरिष्ठ लेखिकाओं ने जहाँ केंद्रीय विधा के स्तर पर परिदृश्य को बदला, वहीं मुख्यधारा में पुरुषों के वर्चस्व को तोड़ा और स्त्रीलेखन को मुख्यधारा का साहित्य के रूप में स्थापित किया। स्त्री, दलित और पिछड़ा आदि वर्गीकरण प्रवृत्तियों के आधार पर जब तक होता रहे तब तक यह अध्ययन की सुविधा एवं दृष्टि से आवश्यक व महत्वपूर्ण है किन्तु यदि यह वर्गीकरण व्यक्ति के आधार पर होता है तो यह लेखक के साथ अन्याय से अधिक साहित्य, शिक्षा व पाठक के साथ अन्याय है। इतने पर भी मुझे निजी तौर पर अपने लेखन के 'स्त्री-लेखन' कहने-कहलाने से कोई कष्ट या असहजता अनुभव नहीं होती। इसके दो कारण हो सकते हैं कि 1 - विविध विधाओं में लिखी गई अनेक रचनाओं के पाठकों द्वारा कदापि मुझे ऐसा अनुभव नहीं करवाया गया, 2 - मैं अभी उस स्तर की लेखक नहीं हुई कि आलोचक मुझ पर अपना समय ज़ाया करें और मेरे लेखन को वर्गीकृत करें या किसी खाते में रखें, शायद इसलिए भी। वैसे किसी लेखक को लिखने के बाद अपने लेखन के लिए स्वयं किसी तमगे या वर्ग की तलाश मुझे बहुत गलत और बुरी लगती है। लेखक को आलोचना में कोशिश कर अपने लिए जगह तलाशने-बनाने जैसा लगता है, जो अनुचित है। फिर भी यदि आलोचना स्त्री-लेखन को मुख्यधारा से इतर मानती है तो यह पक्षपात, पूर्वाग्रह व वर्चस्ववादी पितृसत्तात्मक राजनीति ही कहा जाएगा; विशेषत: जब मुख्यधारा में पुरुषों का वर्चस्व लगभग समाप्त हो चुका है।
 

३.आधुनिक स्त्री रचनाधर्मिता में जाहिर तौर पर 'कॉमन थ्रेड' पितृसत्ता के विरुद्ध संघर्ष और प्रतिरोध है. हिंदी साहित्य में लेखिकाओं ने भावनात्मक, शारीरिक, सामाजिक और आर्थिक स्तरों पर पितृसत्ता की जकड़न, उसकी प्रविधियों और उसके पाखंडों का उद्घाटन और उदभेदन बहुत कुशलता से किया है. यहाँ तक की स्त्री यौन शुचिता की खोखली अवधारणाओं की भी धज्जियाँ उड़ाई गई हैं.मगर, कुटिल पितृसत्ता जिस प्रकार आज भी राजनीति और संस्कृति के क्षेत्र में महिलाओं के लिए लक्ष्मण रेखाएं खींच रही है, उससे हिंदी जगत की लेखिकाएं आँखें फेरे क्यों दिखाई देती हैं?

कविता वाचक्नवी - कुछ सीमा तक सहमत हूँ, इन अर्थों में कि कुटिल पितृसत्ता अभी भी जारी है और लेखिकाएँ कुछ अर्थों में आँखें फेरे हैं। इसके उत्तर में दोनों पक्षों के किए पर विचार करना होगा। पहली बात तो यह कि हिन्दी की लेखिकाएँ जिस पृष्ठभूमि से आती हैं, वहाँ स्त्री मूलतः उन स्थितियों के उद्घाटन के लिए भी दीक्षित नहीं होती। अतः उद्घाटन प्रतिकार की पहली सीढ़ी कहा जा सकता है और रोचक यह है कि यह उद्घाटन घटने के बाद होने वाली क्रिया है; जबकि विरोध तो घटने से रोकने की, प्रतिकार की क्रिया होता है। इस तरह आप देख सकते हैं कि भुक्तभोगी होने के बाद स्त्रीवर्ग के भोगे हुए यथार्थ का उद्घाटन और चित्रण तो स्त्रियाँ कर रही हैं किन्तु आनुपातिक दृष्टि से प्रतिकार की प्रविधियों का सन्निवेश होना अभी शेष है। रही क्षेत्र-विशेष की बात तो हिन्दी में अधिकांश लेखक साहित्य को राजनीति से दूर रखते आए हैं, यद्यपि विचारधारा के स्तर पर वे राजनीति-प्रेरित रहे हैं, उनका वर्चस्व भी लम्बे समय तक रहा किन्तु प्रत्यक्षतः वे राजनीति से सीधे नहीं जुड़े रहे, बल्कि कहना न होगा कि वे राजनीति का मोहरा भी बनते चले आए हैं और साहित्य की राजनीति भी इतनी अधिक होती चली आई है कि साहित्य ही लाभ की तुच्छ राजनीति का अखाड़ा, दलदल व पर्याय बन गया है किन्तु राष्ट्रीय राजनीति के लिए जिस प्रकार के प्रशिक्षण व तैयारी की आवश्यकता होती है, उसका नितान्त अभाव प्रत्यक्ष स्त्री व पुरुष लेखकों में देखा जा सकता है। ऐसे में लेखिकाओं की स्वयं क्योंकि राजनैतिक महत्वाकांक्षाएँ और सम्पृक्ति नहीं होती और सम्भवतः इसलिए भी कि वे दैनन्दिन जीवन और स्त्रीपुरुष सम्बन्धों के विविध पक्षों से अधिक जुड़ी हुई होती हैं। यों भी स्त्रियाँ जीवन और सम्बन्धों के अधिक निकट इसलिए होती हैं, कि उनकी संरचना ही ऐसी होती है, इसलिए भी वे शायद राजनीति में महिलाओं की अधिक सक्रिय व सतेज भूमिका के पक्ष में लिखने की अपेक्षा जीवन और सम्बन्धों पर लिखना बेहतर समझती हों। एक बात और जोड़ना चाहूँगी, कुटिलता से पार पाना स्त्री की दैहिक संरचना के अर्थों में सदा से कठिन रहा है और राजनीति का जिस प्रकार व जितना अधिक आपराधीकरण हुआ है उस स्तर के आपराधिक वातावरण की पहचान, उसका उद्घाटन, प्रतिकार या उस पर साधिकार लिखना आदि यह कुछ अधिक ही की अपेक्षा लगता है अभी ....। इसे आप सकारण आँख फेरना नहीं कह सकते।


४.व्यापक स्त्री हित से जुड़े राजनीति और अर्थनीति के ज्वलंत प्रश्न, जैसे विधायिका में महिला आरक्षण, मंत्रिमंडलों, नौकरियों और शैक्षिक संस्थाओं में सानुपातिक प्रतिनिधित्व, इत्यादि महिलाओं के रचनात्मक सरोकारों में अपेक्षित स्थान क्यों हासिल नहीं कर पाते हैं?

कविता वाचक्नवी : इसका उत्तर भी पिछले उत्तर में ही काफी कुछ निहित है। यह जोड़ना यहाँ चाहूँगी कि जो लेखिकाएँ, यथा रमणिका जी, सुधा अरोड़ा जी इत्यादि, लेखिका होने के अतिरिक्त अपने जीवन में एक्टिविस्ट भी हैं, उनके लेखकीय सरोकारों में स्त्री के सामाजिक व संस्थागत जीवन की उपस्थिति उपलब्ध होती है। फिर भी यह कहना आपत्तिजनक नहीं माना जाना चाहिए कि वर्तमान स्त्री-लेखन में सरोकारों की व्यापकता आनी अभी काफी शेष है। उसके बहुत-से कारण हो सकते हैं, जिनके विस्तार में जाने की यहाँ आवश्यकता नहीं है, किन्तु यह तथ्य है।



५. 'मातृत्व' एक ऐसा गुण है, जो स्त्री को श्रेष्ठ कृति बनाता है. सो, स्वाभाविक रूप से दुनिया भर के स्त्री-साहित्य में इसे 'सेलिब्रेट' किया जाता रहा है. मगर कुछ पश्चिमी नारीवादियों(फेमिनिस्ट्स) ने यह महसूस किया है कि मातृत्व के प्रति भावुक सम्मोहन को बढ़ावा देना किसी स्तर पर मर्दवादी राजनीति का एक आयाम भी हो सकता है. आप इस निष्कर्ष से कितनी सहमत हैं?

कविता वाचक्नवी : इसमें कोई राय नहीं कि मातृत्व स्त्री को श्रेष्ठ कृति बनाता है; किन्तु उस से भी बढ़कर स्त्री को ऐसा अपार सुख देता है जो संसार में उसे कोई और नहीं दे सकता, पुरुष भी नहीं, स्त्री को कई मानसिक व्याधियों से निकालता है और उसे अपने ‘कर्ता’ होने के गौरव से भरता है, इसमें कोई दो राय हो ही नहीं सकतीं। दूसरी ओर पश्चिमी नारीवादियों की बात रहने भी दी जाए तो इसी मातृत्व को आधार बनाकर ही पुरुष स्त्री पर सारे दबाव और बन्धन लगाता है। यद्यपि प्राकृतिक व संरचनात्मक दृष्टि से भी मातृत्व के साथ स्त्री पर बहुत से बन्धन और दबाव आ जाते हैं, उन बन्धनों में बँधी स्त्री को कमजोर समझ और उसके मातृत्व को उसकी कमजोरी समझ शासन करने वाली मानसिकता इसे उस अवसर के रूप में प्रयोग करती आई है जिसे स्त्रियों के शोषण के लिए अनुकूल समझा गया। बहुत बचपन में पढ़े अमृता जी के एक उपन्यास (अथवा कहानी) का एक अंश तब से मेरे मन में गड़ा हुआ है, जिसमें एक पुरुष पात्र दूसरे पुरुष पात्र को समझा रहा है कि औरत को यदि मारना है तो बाँध कर मारो। दूसरा पात्र बाँध कर मारने का अर्थ नहीं समझ पाता इसलिए बाँधने का औचित्य भी नहीं, तब पहला पात्र उसे समझाता है कि स्त्री के साथ हिंसा कर बदनाम होने की अपेक्षा उस से एक सन्तान उत्पन्न कर लो और फिर स्त्री आजीवन तुम्हारा सारा शोषण सहती रहेगी, कहीं नहीं भाग सकती। यह उदाहरण मैंने इसलिए दिया कि यह तथ्य आज से लगभग चालीस-पचास वर्ष पहले भी समाज जानता था और पहचानता था। आज पश्चिमी नारीवादी ही यह बात नहीं कह रहे हैं, अपितु यहाँ यॉरोप में तो बड़ी संख्या में एकल मातृत्व वाली स्त्रियाँ सब ओर मिल जाएँगी। यह एकल मातृत्व स्त्रियों ने स्वेच्छा से चुना है। वे किसी शुक्राणु-बैंक से किसी अनजान-अज्ञात व्यक्ति के शुक्राणु प्रत्यारोपित करवा माँ बनती हैं और अपनी सन्तान को जन्म देती हैं। यह पुरुषों द्वारा मातृत्व की आड़ में किए गए शोषण की प्रतिक्रिया भी है और साथ ही पुरुषों से होने वाले बुरे अनुभवों से बचने की जुगत भी। यॉरोप में यह कोई असाधारण घटना नहीं है। मैं कई बार पुरुष व स्त्री के सम्बन्धों के मिटते चले जाने से चिंतित भी होती हूँ कि ये पुरुष अपनी पत्नी ही नहीं अपितु सन्तान की कीमत पर भी अपने शोषण को जारी रखना चाहते हैं ... कैसी मानसिकता है कि वे अपनी पत्नी, अपनी सन्तान सबकी बलि लेकर क्या अर्जित करते हैं, केवल स्त्री पर मालिकाना अधिकार । यह सब कितना शर्मनाक है। क्यों नहीं पुरुष अपनी इस तुच्छ मानसिकता को छोड़ समाज को इस तरह बिखरने और विकृत होने से बच जाने देते ? घरों में स्त्रियों के ही नहीं अपितु बच्चों के भी जीवन बर्बाद होते देखे हैं मैंने, पुरुषों की कुण्ठाओं से उपजी स्थितियों के चलते।




६.समाज में स्त्रियों के संगठित दमन चक्र के कमजोर पड़ने और स्त्री स्वातंत्र्य की सशक्त छवियों के समानांतर इर्ष्या और कुंठा की लहरें भी दिखाई पड़ रही हैं. इस का नतीजा है कि यौन हमलों और हिंसा की बाढ़ सी आ गई है और कार्य स्थलों पर और अन्यत्र स्त्री-पुरुष रिश्ते असहज होते चले जा रहे  हैं..समाज में गहराती लैंगिक कटुता क्या आपको चिंतित करती है?

कविता वाचक्नवी : बहुत अधिक । मुझे स्त्री-पुरुष रिश्तों में आती असहजता जितना चिन्तित करती है, उस से अधिक चिन्तित करता है पूरे समाज में उत्पन्न होता असन्तुलन । समलैंगिकता भी कहीं न कहीं स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में जन्मे विद्रूप की ही परिणति है कि स्त्रियों में पुरुषों के प्रति व पुरुषों में स्त्रियों के प्रति सहज आकर्षण मरने लगा है। एकल मातृत्व भी इसी लैंगिक कटुता का प्रतिफल हैं, सेक्स टॉय्ज़ भी इसी लैंगिक कटुता का ही रूप हैं, बलात्कार और हिंसा तो इसका कारण भी हैं और इसका परिणाम भी। एक स्त्री होने के नाते ही नहीं अपितु एक माँ होने के नाते मुझे परिवार के बच्चों का परिवारों से विमुख होना सर्वाधिक सालता है। बीस वर्ष पहले नॉर्वे में बसने जाने पर जिस प्रकार परिवार टूटे देखे और युवक-युवतियों का मादक पदार्थों की ओर जुड़ाव देखा उन सारे अनुभवों के बाद वर्तमान की लगभग सभी सामाजिक समस्याओं (आर्थिक को छोड़कर) के लिए केवल और केवल इसी लैंगिक कटुता को दोषी पाती हूँ । बिना प्रेम के निभती लाखों-करोड़ों गृहस्थियाँ हम सबने भारत में बखूबी देखी हैं , कितना कष्टप्रद है यह सब... कि इसकी व्याख्या भी नहीं कर सकती, किसी को सहज विश्वास नहीं होगा। उन्हीं का प्रतिफल है भारतीय युवाओं का असंतुलित मनोविज्ञान, आक्रोश और कुण्ठा, माता-पिता दोनों की नकार और उनके प्रति असम्वेदनशीलता।


७.आज पारंपरिक साहित्य की तुलना में सोशल मीडिया  का स्त्री-लेखन ज्यादा चर्चाएँ बटोर रहा है. सोशल मीडिया की अराजकता, उसका औसतपन, उसकी क्षणभंगुरता और उसके आभासी चरित्र की आलोचनाएँ और आक्षेप  अपनी जगह हैं, मगर अब उसे नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन है. साहित्य में सोशल मीडिया के विवादास्पद हस्तक्षेप को गंभीर लेखन और साहित्य में कहाँ देखती हैं आप?

कविता वाचक्नवी : यह बात समझना बहुत आवश्यक है कि सोशल मीडिया एक मंच है, एक माध्यम है और यह हम सब जानते हैं कि मंच व माध्यम का अच्छा-बुरा होना कुछ नहीं होता, जो कुछ होता है वह उसके प्रयोक्ताओं पर निर्भर करता है। यही स्थिति एक पत्रिका की भी हो सकती है कि किसी के हाथ में पत्रिका का माध्यम व अवसर लग गया पर उस पत्रिका में गम्भीर कुछ भी नहीं छपता या किसी पत्रिका में गम्भीर सामग्री छपती है। अनगिनत पत्रिकाएँ ऐसी होंगी जो आपको अपनी रुचि व स्तर की नहीं लगेंगी और आप उन्हें नहीं पढ़ते, कुछ आपको अपनी रुचि व स्तर की लगती हैं इसलिए आप उन्हें पढ़ते हैं। तो इन कारणों से आप हिन्दी की पत्रकारिता को धिक्कार या नकार तो नहीं देते न? न ही उसे कोई बाहर का, अस्पृश्य या विवादास्पद हस्तक्षेप का माध्यम घोषित करते हैं। बिल्कुल यही स्थिति सोशल मीडिया की भी है। बस, यह एक खुला व निश्शुल्क माध्यम है। इसका शुल्क समय व तकनीक की जानकारी है केवल, न कि पारम्परिक माध्यम व पारम्परिक शुल्क। भारत में विशेषतः हिन्दी समाज में तकनीक से परिचय अभी बहुत दूर की कौड़ी है; इसलिए अभी हिन्दी का लेखक वर्ग इसे अराजक, औसत व क्षणभंगुर (?) समझता है। सच तो यह है कि यह माध्यम सर्वाधिक दीर्घजीविता का माध्यम है, सर्वाधिक तेज है और सर्वाधिक व्यापक भी। जिसे कुछ लोग अराजक समझते हैं, उसे मैं सर्वाधिक लोकतान्त्रिक कहती हूँ। मैं अपनी ही कहूँ तो लगभग पन्द्रह वर्ष पूर्व मैंने प्रण किया था कि मैं किसी पत्रिका या किसी सम्पादक को कदापि अपनी पहल पर रचना नहीं भेजूँगी, जब तक कि स्वयं सम्पादक अथवा कोई बहुत सम्मानित व्यक्ति अपनी पहल पर मुझे रचना भेजने को न कहे। और मैंने अपना यह प्रण पूरी तरह निभाया भी (इक्का-दुक्का घटनाएँ इसका अपवाद हो सकती हैं)। आप कल्पना कर सकते हैं कि किसी लेखक के लिए यह आत्महत्या है, जिसे मैंने स्वेच्छा से वरा। किन्तु मेरे लेखक को इस आत्महत्या से बचा कर पाठकों से सीधा जोड़ने वाला माध्यम है इन्टरनेट और सोशल मीडिया। यह सच है कि इस पर हजारों-लाखों-करोड़ों लोग लिख रहे हैं, पर वे तो पहले भी कहीं अपना-अपना लिखते आए हैं, बस तब आपको, हमें या समाज को उनका पता न चलता था क्योंकि अभिव्यक्ति के सभी संस्थानों पर इने-गिने लोगों का आधिपत्य व नियन्त्रण था और शेष तक किसी की पहुँच ही न थी, तो पता कैसे चलता कि उन लाखों लोगों में कौन हल्का लिख रहा है और कौन स्तरीय। आज निस्संदेह लिखने वालों की संख्या भी बढ़ी है तो वह इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति के संस्थानों पर से वर्चस्ववादी शक्तियों के अंकुश को नकार एक वैकल्पिक माध्यम दे दिया है और इस तरह अधिक अवसर होने के चलते लोगों में अभिव्यक्ति के प्रति उत्साह भी है और इसलिए आधिक्य भी। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि सोशल मीडिया पर लिखने वाला हर व्यक्ति लेखक है ही यह माना जाए। अस्सी प्रतिशत से अधिक वहाँ केवल अभिव्यक्ति और सम्वाद की इच्छा से हैं और उनके लिखे को कदापि साहित्यिक लेखन नहीं कहा जा सकता। किन्तु उसे आप साहित्यिक हस्तक्षेप समझते ही क्यों हैं? उस से विचलित या प्रभावित होने की तब तक कोई आवश्यकता ही नहीं जब तक रचना का स्तर और गुणवत्ता स्वयं नहीं बोलते। आपके-हमारे सामने एक अधिक विशद, विस्तृत और व्यापक फलक एवं अवसर हैं अब, कि प्रतिभा को चीन्ह पाएँ, इसमें मुझे कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगता। कष्ट उन्हें अवश्य है और होगा जिन्होंने अभिव्यक्ति के संस्थानों पर नियन्त्रण बना रखा था अब तक और सौगातें बटोरते चले आए हैं, लाभ लेते आए हैं। अब उनका अंकुश टूट रहा है, भले ही वे सम्पादक हों या लेखक। सोशल मीडिया में पाठक और लेखक आमने-सामने हैं और सोशल मीडिया ऐसा टूल है (दुर्भाग्य से हिन्दी लेखक अभी इसकी शक्ति नहीं जानते) कि पाठक को लेखक का पूरा व्यक्तित्व, उसका चरित्र आदि सब बिना बताए भी पता चल जाता है और इस आधार पर वे लेखक को सिरे से खारिज भी कर सकते हैं, कर देते हैं , अब दुराव सम्भव नहीं कि पाठक केवल लेखन से ही लेखक को जानता था और व्यक्तिगत जीवन में कुछ भी, कैसा भी करते हुए आप पाठक को मोह सकते थे। इस माध्यम पर वह सम्भव नहीं। कई बड़े नामधारी हिन्दी लेखकों की ‘मोनोपली’ टूटी है यहाँ। स्त्रियाँ बिना सम्पादक की शर्तें माने भी लिखने व पाठकों तक पहुँचने में सफल हो सकती हैं, नेट पत्रिकाओं व वेबज़ीन्स का अम्बार लगा पड़ा है। कविताओं व साहित्य के कोष निश्शुल्क उपलब्ध हैं पढ़ने-पढ़ाने को, अकूत साहित्य वहाँ सदा के लिए डिजिटल रूप में सुरक्षित हो गया है, विश्व के प्रत्येक कोने से पाठक कुछ भी / कहीं भी / कभी भी पढ़ सकता है । और भी अनेकानेक लाभकारी परिवर्तन हुए हैं, अनुवाद, भाषा व लिपि की दृष्टि से तो क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं, अपने एक लम्बे लेख में विस्तार से इन व ऐसे अन्य अनेक पक्षों पर एक-एक कर कुछ वर्ष पहले लिखा भी था, उन सब को विस्तार से यहाँ नहीं बताया जा सकता। बस यही कि ये सब साहित्य के लिए नकारात्मक हस्तक्षेप कैसे कहे जा सकते हैं? क्या केवल इसलिए कि एकाधिकार व वर्चस्व को चुनौती मिली है या 80- 85 प्रतिशत को देखकर हमें उसके स्तरीय न होने से कष्ट होता है। क्या बीस बरस पहले समाज का 80-85 प्रतिशत वर्ग लेखक था ? नहीं ! तो यह वही वर्ग है। उन्हें उनकी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का लाभ उठाते देख चिन्तित होने की भला क्या आवश्यकता है? और क्यों ?




८.साहित्य के बारे में शुरू से एक मासूमियत भरी स्थापना रही है कि स्तरीय साहित्य अपने बूते जिंदा रहता है. मगर हकीकत यह है कि आज जो रचना साहित्यिक परिचर्चा, गोष्ठी, जलसा, विमोचन, समीक्षा, पुरस्कार के जुगाड़ तंत्र में अपनी जगह नहीं बना पाती, पाठक उस तक पहुँच भी नहीं पाता, चाहे वह जितनी भी उच्च कोटि की हो. एक स्त्री के नजरिये से साहित्य की यह धक्कम-पेल आपको हताशाजनक लगती है या चुनौतीपूर्ण?

कविता वाचक्नवी : हताशाजनक भी और चुनौतीपूर्ण भी; बल्कि स्पष्ट कहूँ तो हताशाजनक कम और चुनौतीपूर्ण अधिक । किन्तु ध्यान देने की बात यह है कि मेरा नजरिया हर स्त्री लेखक का नज़रिया नहीं हो सकता, न होना चाहिए क्योंकि हर किसी का मनोविज्ञान अलग होता है। कुछ स्त्रियाँ ऐसी भी मैं जानती हूँ जिन्होंने लेखन सदा के लिए इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वे सम्पादकों व लेखकों के मध्य स्वयं को सुरक्षित नहीं पाती थीं और न समझौते कर सकती थीं। बहुत-से ऐसे भी लेखक-लेखिकाओं को जानती हूँ जिन्होंने अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए खूब समझौते किए और किसी का भी, कैसा भी प्रयोग करने से नहीं हिचकिचाए, जो सम्पादक समझते थे कि वे उनका इस्तेमाल कर रहे हैं वस्तुतः वे भी प्रयोग होते गए... उनके माध्यम से लेखकों-लेखिकाओं ने वह सब किया, कर रहे हैं जिसका आपने उल्लेख किया है, निजी सम्बन्धों से लेकर जाने कहाँ तक। इसलिए ऐसे में मेरे जैसे व्यक्ति के लिए जिसके पास न कोई पद है, न प्रकाशन, न किसी एक से भी कोई सम्पर्क या मैत्री है कि मेरे लिए कोई कुछ करे, न मैं किसी वर्ग-विशेष, विचार-विशेष या ‘स्कूल’-विशेष की हूँ कि कोई मुझे प्रमोट करे, न मेरा कभी भी साहित्य आदि में कोई गॉड-फादर है, न कोई जान-पहचान, न दिल्ली या हिन्दी क्षेत्र में कभी रहने-बसने का मौका मिला, न मैं किसी को घर आमन्त्रित करती या उपहार आदि दे सकती हूँ, सिवाय उन एकाध लोगों को आदर-सम्मान देने के जिनकी विद्वत्ता और नैतिक शुचिता अभिनन्दनीय हो, न मैं दावतें / सिगरेटें या बोतलें देती-छूती हूँ, बल्कि इन सब से भी बढ़कर परिवार व मूल्यों के प्रति अक्खड़ प्रतिबद्धता व ऐसा न करने वालों का डंके की चोट पर खुला विरोध आदि वे कारण हैं, जो मुझे साहित्य की परिधि से निष्कासित करने और तन्त्र से बहिष्कृत करने के लिए बहुत पर्याप्त हैं, रहे हैं। मुझे साहित्य की चौखट पर पैर भी धरने न देने वालों की चहुंदिशी भीड़ में विरलों के लिए ही यह अनुमति देना वश का है जो निस्संदेह अत्यधिक निष्पक्ष व ईमानदार हों, तभी वे मुझ जैसी नितान्त अ-लाभकारी व्यक्ति को भी अवसर देने से नहीं हिचकिचाए या हिचकिचा सकते। क्या यह सब मुझ जैसी अनाम स्त्री को हताश करने के लिए पर्याप्त नहीं होना चाहिए ? किन्तु है ठीक इस से उलटा, एकाध अवसरों को छोड़ मुझे कभी हताशा नहीं हुई और अपने उपर्युक्त ‘दुर्गुणों व कमियों’ (?) को ही शक्ति समझ आगे बढ़ने व अपनी राह चलते रहने का अपने पिताजी का दिया आदर्श हरदम सामने रहता है और डिगने न देने की शक्ति देता है। यह तो रही व्यक्तिगत हताशा या चुनौती की बात। किन्तु सच कहूँ तो साहित्य के भविष्य व भविष्य के साहित्य की दृष्टि से ये आपकी बताई व हम सब की देखी-समझी स्थितियाँ बहुत निराश करती हैं... इच्छा होती है हिन्दी वालों को पढ़ना-मिलना पूरी तरह छोड़ दूँ.... शोध और शिक्षा तक को बर्बाद कर दिया है इन स्थितियों ने... क्या लाभ है ऐसे लेखन-पठन-पाठन का ? तब ऐसे में उबरने (चुनौती) और डूबने (हताशा) दोनों को ही अनुभव नहीं करती। बस कर्तव्य की भाँति अपना काम किए चले जाने को आधार बना लेती हूँ । सोशल मीडिया और उस माध्यम द्वारा मुझ से सीधे जुड़े पाठक ही वह शक्ति हैं जिन्होंने मेरे अस्तित्व को पूरी तरह बनाए-बचाए रखा है। अन्यथा इन स्थितियों का क्या प्रभाव हुआ होता कह नहीं सकती।




९. एक सवाल जो मुझे हमेशा परेशान करता है कि आखिर हिंदी के स्त्री लेखन से 'हास्य' और 'विनोद' लगभग निष्कासित क्यों है? कटाक्ष और व्यंग अगर है तो उसकी प्रकृति हास्य-मूलक नहीं है. ऐसा क्यों?

कविता वाचक्नवी : साहित्य में विधाओं की दृष्टि से कहानी आज केन्द्रीय विधा है। उसके बाद स्थान आता है उपन्यास का। दोनों क्षेत्रों में महिलाओं की भरपूर उपस्थिति है। कविता तो यों भी हाशिये पर है, आलोचना और सम्पादन में महिलाओं के नाम हैं ही, निबन्ध, ललित निबन्ध आदि तो वैसे भी सभी तरह से सिरे से जैसे लुप्त ही होते जा रहे हैं.... हास्य केवल मंचीय कवियों के पास बचा है (स्तरीयता का प्रश्न उस पर भी मुँह बाए खड़ा है) । व्यंग्य तब तक व्यंग्य है ही नहीं जब तक उसमें मिठास और हास्य का पुट नहीं है, इसलिए जो कुछ वह है उसे व्यंग्य तो नहीं ही कहा जा सकता। रही स्त्रीलेखन में इन विधाओं की बात तो अभी स्त्रीलेखन की उम्र ही कितनी हुई है ... तनिक सब्र करें ... स्त्रियों को भी कुछ हँसने-हँसाने के अवसर दें... वे हास्य भी उत्कृष्ट रच कर दिखाएँगी और तब पुरुषों का रचा भौंडा हास्य हाशिये पर चला जाएगा। आपने कहा कि औरतें केवल कहानी लिखती हैं तो उन्होंने कविता रच कर दिखा दी, आपने कहा कि वे आलोचना नहीं लिखतीं तो उन्होंने वह भी लिख कर दिखा दी; अब आप कह रहे हैं वे राजनीति नहीं लिखतीं तो यह बात अर्धसत्य है क्योंकि राजनैतिक सरोकार स्त्रीलेखन में अपने अलग अन्दाज़ में आने प्रारम्भ हो गए हैं। अब नया यह आक्षेप कि हास्य नहीं रचतीं.... भाई यह आलोचना इतनी डिमांडिंग क्यों है कि बस कुछ न कुछ माँगती ही रहती है ! आप यह कब देखेंगे कि स्त्री क्या लिख रही है; या बस यही संकल्प है कि आँख मूँद कर यही रट लगाते रहेंगे कि स्त्री यह नहीं लिख रही... वह नहीं लिख रही।

१०.अपनी आगामी लेखकीय योजनाओं के बारे में बताएँ

कविता वाचक्नवी : बहुत सारी पाण्डुलिपियाँ बस्तों में बन्द पड़ी हैं, चाहती हूँ उन्हें सलीके से लगाकर प्रकाशित करवाऊँ, अपना एक कहानी संकलन, एक कविता संकलन, एक लेख-संग्रह, एक साक्षात्कारों की पुस्तक (इन सब की सामग्री तैयार है, पर इस तरह तैयार नहीं कि प्रकाशक को थमा सकूँ) तो इन्हें तैयार करना है। ‘भाषा प्रौद्योगिकी और हिन्दी कम्प्यूटिंग’ विषयक एक पुस्तक की योजना दो-तीन वर्ष से अधर में लटकी है, उसकी सामग्री पूरी कर प्रकाशन के लिए देना चाहती हूँ। पत्र-पत्रिकाओं व अपनी वेबसाईट आदि के लिए समय-समय पर लिखना भी होता है, कुछ पत्रिकाओं ने नियमित स्तम्भ लिखने का वादा लिया हुआ है, जिन्हें हाँ कह कर भी प्रारम्भ तक नहीं कर पाई, उन्हें प्रारम्भ करना चाहती हूँ। गत वर्ष रमणिका जी के 'हाशिये उलाँघती औरत' शीर्षक (40 भाषाओं के 25 खण्डीय स्त्री-संकलन) के 'प्रवासी कहानियाँ' खण्ड का सम्पादन किया तो उसी दौरान अपनी एक अन्य योजना पर काम शुरू किया था। वह योजना है कि विश्व के सभी महाद्वीपों के हिन्दी लेखकों के कहानी संकलन को तीन-चार खण्डों में लाने की; बस उसकी शर्त यह है कि जो लेखक जिस देश में रहता है, वहाँ के स्थानीय मुद्दों पर उसे लिखना है, उन कहानियों में स्थानीयता उभर कर आनी चाहिए, अमेरिका में बैठ कर आप भारत या भारतीयों या भारत के मुद्दों व समस्याओं की कहानी न लिखें, जिसके कारण हिन्दी आलोचना अब तक ऐसी-तैसी करती आई है, जो कुछ हद तक सही भी है। इसलिए लेखकों को गत वर्ष भेजे पत्र में यह चुनौती पूरा करने का आह्वान किया था कि वे तत् तत् देशीय शिक्षा, समाज, सम्बन्ध, राजनीति, मेडिकल आदि-आदि किसी भी मुद्दे को आधार बना अपने देश को हिन्दी में अभिव्यक्त करें, कुछ कहानियाँ आईं भी, किन्तु विशद योजना है व अपने पारिवारिक एवं विश्वविद्यालयीय दायित्वों के बीच नियमित लेखादि लिखने के साथ-साथ इन्हें निभाना समयाभाव में दुरूह भी। ऊपर से पैसा देकर कदापि कहीं नहीं छपना का अपना संकल्प भी याद रहता है तो प्रकाशक न मिल पाने की अपनी सीमा भी जानती हूँ। इसलिए इन्हें योजनाओं की अपेक्षा स्वप्न कहना अधिक उचित है। तो इस प्रकार योजनाओं के नाम पर कुछ स्वप्न ही हैं अपने पास ! बस !!
नवम्बर २०१४

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

स्त्रीविमर्श स्त्री को शोषण का अधिकार देने/दिलवाने का अभियान नहीं है : कविता वाचक्नवी

स्त्रीविमर्श स्त्री को शोषण का अधिकार देने/दिलवाने का अभियान नहीं है : कविता वाचक्नवी


कुछ मित्र/पाठकों ने सन्देश भेज पूछा है कि मैं तो सदा से स्त्री व स्त्रीविमर्श सम्बन्धी लेखन व कार्यों के प्रति प्रतिबद्ध/ पैरोकार रही हूँ, फिर १२ फरवरी के अपने लेख में "दूसरों के जीवन में काँटे बोने और टीवी देखने के अतिरिक्त कुछ नहीं करतीं" जैसी स्त्री-विरुद्ध टिप्पणी कैसे लिख गयी।  


Image result for women empowerment paintingsतो प्रिय पाठको / मित्रो ! आपको स्त्री-विमर्श का आशय, अभिप्राय और उद्देश्य इत्यादि समझना बहुत अनिवार्य है। मेरा स्त्री-विमर्श स्त्री को शोषण का अधिकार देने/दिलवाने का अभियान नहीं है; और सिद्धान्ततः भी स्त्रीविमर्श इस अवधारणा पर नहीं टिका। स्त्री-विमर्श और स्त्री-सशक्तीकरण मूलतः शोषित स्त्री को शोषण से मुक्त करवा उसे सबल बनाने व लैंगिक असमानता को दूर कर समानता का अधिकार दिलवाने का अभियान हैं ताकि वे भी समाज की उन्नति में बराबर की सहभागी हो सकें; न कि उसे समाज के किसी अन्य वर्ग के शोषण का अधिकार दिलवाने का। जो लोग स्त्री-विमर्श का उपयोग इसके विपरीत अथवा इतर अर्थों में करते हैं वे मूलतः अपनी स्वार्थसिद्धि और अज्ञानता का ही परिचय देते हैं। यदि स्त्री का सशक्तीकरण दूसरों के शोषण हेतु है तो फिर उनमें और समाज के दूसरों स्त्री-शोषकों में अन्तर ही क्या रह गया। ऐसे में स्त्री-विमर्श के हम जैसे पैरोकारों का दायित्व समाज को ऐसी शोषक स्त्री के शोषण से मुक्ति दिलवाने का भी हो जाता है। 


जिस प्रकार कोई न्यायालय किसी अपराधी को इसलिए क्षमा या दया नहीं दे सकता कि उसके अपराधी बनने के मूल में अमुक-अमुक व्यक्ति और अमुक-अमुक घटना का हाथ है तो परिस्थितिवश वह अपराधी बन गया, अतः उसे क्षमा कर दिया जाए ! न ! कदापि नहीं ! ऐसे में तो उन्हें दोहरा दण्ड मिलना चाहिए कि एक तो स्वयं अपराध किया और साथ ही दूसरों को अपराधी बनाने वाला घटनाक्रम और परिस्थितियाँ रचीं। इसी प्रकार भले ही स्त्री हो या पुरुष, वह भले ही किन परिस्थितियों में शोषण का अपराध करे, उसे उसके अपराध के लिए दोषी ठहराया जाना होगा। किसी को इसलिए क्षमा नहीं किया जा सकता कि वह स्त्री है या पुरुष। अपराध, दण्ड और क्षमा में किसी भी व्यक्ति को रिज़र्वेशन नहीं मिलना चाहिए। अन्यथा समाज का ढाँचा चरमरा जाएगा और असन्तुलन, असमानता व अत्याचार बढ़ेगा। इसलिए स्त्री-सशक्तीकरण स्त्रियों को दूसरों के प्रति दुर्व्यवहार, छल, कपट, प्रपञ्च, शोषण और अत्याचार करने का लाईसेन्स देने / दिलवाने का अभियान नहीं है। जो इसका उपयोग इन अर्थों में करते हैं, वे अपराधी हैं, भर्त्सना-योग्य हैं और स्त्री-मुक्ति के प्रत्येक अभियान को उनकी निन्दा व विरोध करना चाहिए। 


जो पुरुष स्त्री-विमर्श की आड़ में अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं, उनको उठा बाहर फेंकना चाहिए और जो स्त्रियाँ घरों में या बाहर अपने स्त्री होने का लाभ लेते हुए समाज के किसी भी वर्ग के विरुद्ध किसी भी प्रकार की धूर्तता, चालाकी, वितण्डा या लाभ उठाने की मनोवृत्ति दिखाती हैं या कार्य करती हैं, तो उनकी भी खबर ली जानी चाहिए और उनका किसी भी प्रकार समर्थन / सहयोग नहीं किया जाना चाहिए। स्त्री-सशक्तीकरण का अर्थ पुरुष का शोषण करना भी नहीं होता। यह शोषण का हथियार नहीं, अपितु आपकी आत्मरक्षा का उपाय और सामर्थ्य प्रदान करने का अभियान है, ताकि कोई आपकी अस्मिता पर आघात न करे ; किन्तु आप आत्मरक्षा के अतिरिक्त संहार और शोषण में इस हथियार को प्रयोग करने लगेंगी तो आपको भी उसी प्रकार धिक्कार मिलेगा जैसा आपका शोषण करने पर पुरुष को मिलता है ! 
- Kavita Vachaknavee





शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

महिलाओं के दोष

महिलाओं के दोष : कविता वाचक्नवी 


तीन वर्ष पहले (आज ही के दिन जब यह लेख लिखा गया था) एक तथाकथित लेखिका (म.ग.) के लेख में लिखे गए शब्द थे - "मेरे द्रष्टिकोण से "सर्वोतम माँ " वो है जो प्रारम्भ से अपने बेटे को स्त्री जाति का सम्मान करना सिखाती है। जो पुरुष स्त्री जाति को हीन भावना से देखते हैं, उन के विकास में बाधक बनते हैं, उन के प्रति दुर्व्यवहार करते हैं ,हाथ उठाते हैं, बलात्कार करते हैं उन की हत्या करते हैं ,ये सब एक असफल माँ की "अमानुष" संतान होते हैं ". ……


पहले भी अनेक महिलाओं के इस प्रकार के वक्तव्य पढ़ती आई हूँ, कई महिलाएँ तो मेरे यहाँ आकर इस तरह के अपने विचार लेकर मुझसे दूर तक झगड़ती रही हैं, उन्हीं दिनों एक महिला (अ.भा.) लंबा युद्ध छेड़े रही महिलाओं के विरोध में मेरे यहाँ  फेसबुक पर।


Image result for blaming women वस्तुतः महिलाओं को दोष देने की यह प्रवृत्ति पुरुषवादी सोच का परिणाम है। अतः इसीलिए मेरा विरोध पुरुषों से नहीं अपितु पुरुषवादी सोच से है, चाहे वह स्त्रियों में हो या पुरुषों में। अधिकाँश स्त्रियों की कंडीशनिंग ही ऐसी होती है।

उक्त महिला की माओं को कटघरे में खड़ी करने वाली प्रारम्भ में लिखी बात पर, मेरी दो-तीन आपत्तियाँ हैं, वे संक्षेप में इस प्रकार समझी जा सकती हैं।

- पहली बात उनका वह स्टेटस उसी भावना से प्रेरित लगता है जैसे 60-100 साल पहले 'स्त्रियाँ सन्नारी कैसे बनें', 'पत्नी पथ प्रदर्शक' आदि पुस्तकें तमाम लोगों ने लिखीं, जो ये समझते थे कि स्त्रियों को सुधारना चाहिए, हमें स्त्रियों को सुधारना है, हमें स्त्रियों को सही पथ पर चलाना है, स्त्रियाँ मूर्ख, अशिक्षित और असभ्य होती हैं, उन्हें शिक्षित करने और घर गृहस्थी, पति की सेवा, बच्चे पालन, सन्नारी व सु-नारी बनने के उपदेशों की आवश्यकता है और घर चलाने, पति की सेवा करने, बच्चों को पालने, सास ससुर की सेवा करने, पति का आज्ञा पालन करने, पति को परमेश्वर समझने, सिलाई बुनाई करने में अपना समय लगाने, इधर-उधर की बातों में न फँसने की शिक्षा पुरुषों द्वारा दी जानी चाहिए। इसलिए लोगों ने स्त्री को उपदेश देने वाली पुस्तकें लिखीं ताकि स्त्रियाँ सुधरी रह सकें।

- दूसरी बात, बच्चे कभी उपदेशों से नहीं सीखते, न सिखाने से सीखते हैं। बच्चे केवल और केवल आचरण से सीखते हैं। माँ या पिता भले ही उन्हें लाख उपदेश देते रहें, वे इन उपदेशों और आदेशों से कुछ नहीं सीख सकते, क्योंकि बच्चे केवल आचरण से सीखते हैं। उनके घर-परिवार में या फिर समाज में क्या व्यवहार होता है, वे इस से सीखते हैं।

माँ उन्हें लाखों सदुपदेश भली ही दे भी ले, तब भी यदि घर के लोगों या पिता का व्यवहार उन संस्कारों के अनुकूल या मेल न खाता हुआ है, तो बच्चे उन उपदेशों से कभी नहीं सीखेंगे अपितु वही सीखेंगे जो वे अपने घर में देखते हैं।

साथ ही ध्यान रखने की बात यह है कि कितने प्रतिशत भारतीय परिवारों में स्त्री को पारिवारिक निर्णय या संतान के निर्णय लेने का अधिकार होता है ? स्त्रियाँ अपने जीवन के निर्णय लेने तक में स्वतंत्र नहीं होतीं, भला क्या तो वे संतान के जीवन के निर्णय लेंगी ! जो कुछ वे सिखाना-बनाना चाहती होंगी अपने बच्चों को, पूरा परिवार मिलकर एक झटके में उस पर पानी फेर देता है। उदाहरण स्वरूप, स्त्री सिखाए कि शराब पीना गलत है, न पियो, किन्तु यदि पिता ही रोज पीता है और पीटता व झगड़ा करता है तो क्या स्त्री का बस चलता है? संतान वही सीखेगी जो वह देखती है। सारे संस्कार धरे रह जाते हैं। इसलिए ऐसी बातें वे स्त्रियाँ कर सकती हैं जो अपने घरों में बैठी सौभाग्य से अपने अच्छे मिले पति के कारण सारी दुनिया की स्त्रियों को वैसा ही समझती हैं और संसार के सारे दुष्कर्मी पुरुषों की बुराइयों का दोष उनकी माओं के मत्थे मढ़कर उन्हें ही नाकारा और अपराधिनी घोषित करती हैं।


संतान के दुष्कर्मी या बुरे आदि होने का आरोप या तो बराबर सब (समाज, परिवार, पिता व अंत में माँ) पर है, अन्यथा अकेले माँ पर तो कदापि नहीं है, जब तक कि पिता सहित पूरा परिवार माँ का सहयोगी न हो। इसलिए सर्वोत्तम माँ की अपेक्षा सर्वोत्तम पिता की बात लिखनी चाहिए। सर्वोत्तम माँ की बात लिखना नीच संतान या नीच, अमानुष व दुष्ट संतान के अपराधी या अमानुष होने का आरोप माँ पर लगाने जैसा है।


मंगलवार, 6 सितंबर 2016

गगन गिल और अनिल जनविजय विवाद : कीचड़उछाल का खेल

गगन गिल और अनिल जनविजय विवाद  : कीचड़उछाल का खेल     - क. वा.


इधर कुछ दिनों से दो लोगों का एक व्यक्तिगत विवाद हिन्दी साहित्य से जुड़े लोगों की चर्चा के केंद्र में है और उसकी आग लगातार फ़ैल रही है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर #कीचड़ उछालने के खेल में रस ले-ले कर या बदले की भावना से तत्पर हो नित नए प्रहार कर रहे हैं और इस तरह वस्तुतः अपने आप को ही एक्सपोज़ कर रहे हैं और अपना स्तर गिराते-दिखाते जा रहे हैं। 


जो अनिल #जनविजय ने किया, वह गलत था और पहल उन्होंने ही की, जिसकी प्रतिक्रिया में #गगनगिल ने जो किया वह भी गलत ही था। एक व्यक्ति किसी की इज्जत उतारे तो वह गलत होता ही है, किन्तु बदले में हम उसकी इज्जत उतारते समय यह भूल जाएँ कि हमारी प्रतिक्रिया हमारा स्तर भी बताती है, यह तो कोई बात न हुई। 


दो लोगों के निजी संबंधों के चलते साहित्य से जुड़ा प्रत्येक व्यक्ति कटघरे में आ गया है,इसकी परवाह दोनों पक्षों में से किसी को नहीं रही। इक-दूजे के मान-सम्मान की धज्जियाँ उड़ाते समय अपने मान-सम्मान की धज्जियाँ और उड़ रही हैं, यह जब उनकी चिंता का विषय नहीं तो साधारण पाठक और दूसरे लोग क्यों और कब तक चिंतित हों ! 


दो लोग कीचड़ से खेल रहे हैं तो लथपथ होना स्वाभाविक है। जो निकट जाएगा, उस पर भी कीचड़ के कुछ न कुछ छींटे गिरेंगे ही। ऐसे में दोनों पक्षों के आत्मीय अपने पर कीचड़ गिरने का खतरा उठाते हुए भी उन्हें बचाने या साथ देने आगे बढ़ते हैं और कुछ-न-कुछ कीचड़ इस सहानुभूति के चलते वहन करते हैं। किन्तु बाकी बचे हुओं को उस कीचड़ में जाने की आवश्यकता क्यों है ? जो जितना कीचड़ से दूर रहकर बच सके उतना अच्छा है। 
यह कोई बड़ी सामाजिक नैतिकता और सामजिक मूल्यों या समाज-कल्याण की बात तो है नहीं कि हर किसी को लोक-कल्याण के लिए कीचड़ की परवाह न करते हुए भी उसमें कूदना-ही-कूदना है। 


इसलिए आवश्यक है कि किसी भी पक्ष की निंदा करने की अपेक्षा दोनों को शांत करने की और दूर हटाने की चेष्टा की जाए और उन्हें यह सन्मति और सलाह दी जाए कि इस कीचड़-उछाल में आपकी अपनी भी हानि ही हानि है। दूसरे पर कीचड़ उछाल कर आप दूध से धुले हुए निष्कलंक नहीं रह सकते। जितनी जल्दी जिसे समझ आ जाए और जो जितनी जल्दी इस से बचेगा उतना उसी का कल्याण है। 


दूसरे की गरिमा भंग करते समय व्यक्ति अपनी ही गरिमा से च्युत हो रहा होता है। हम तो इससे दूर रहने में ही सबका भला समझते हैं। जितने लोग अधिक जुड़ेंगे वे अपने-अपने पक्ष की हानि ही अधिक करेंगे, लाभ नहीं। सभी का दूर रहना और चुप रहना ही साहित्य और समाज के हित में है अन्यथा इस विकराल कीचड़-उछाल को और-और हवा-पानी मिल रहा है। 
यह कैसा प्रेम है, भई ?
- कविता वाचक्नवी 

बुधवार, 4 मई 2016

वे यदि ये न करें तो क्या करें

वे यदि ये न करें तो क्या करें : कविता वाचक्नवी 

मुझे नहीं लगता कि किसी लेखिका को लेकर नजरिया उसके लेखक होने, न होने, से ताल्लुक रखता है। वस्तुतः यह वह दृष्टि है जो उसके स्त्री होने के सत्य के साथ जुड़ी है; वह लेखक है, या कोई अन्य स्त्री; इस से उसके प्रति दृष्टि बदलने की अपेक्षा करना दूर की कौड़ी है। हिन्दी समाज में महिला लेखकों को इसका दंश जो झेलना पड़ता है उसकी जड़ें स्त्री के लेखक होने की अपेक्षा, वह जिस संसार और जिस वर्ग (हिन्दी लेखकों) में कार्यरत है, उसमें जमी हैं। क्योंकि दुर्भाग्यपूर्ण कड़वी बात यह है कि हिन्दी लेखक जिस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, वह पिछड़ा (कई अर्थों में), बचा खुचा, हीनभावना से त्रस्त, चरित्र से दोगला, मूल्यों से बेवास्ता, और बहुधा अपढ़, सामन्तवादी, दोहरा और दोगला है। हिन्दी के इने गिने लेखक ऐसे होंगे, जो यदि लेखक न होते तो और भी बहुत कुछ होते। या लेखक होने के अतिरिक्त और भी कुछ हैं। अन्यथा अधिकांश हिन्दी बिरादरी लेखक होने की धन्यता पा-भर गई है; वास्तव में हो न हो। ऐसे किसी भी समाज अथवा वर्ग में स्त्री के प्रति बर्ताव की अन्य आशाएँ ही निरर्थक हैं। वह स्त्री के पक्ष में लिख रहा है तो इसलिए नहीं कि वह स्त्री का पक्षधर है अपितु इसलिए कि यह उसके लेखक बने रहने की चुनौती है , डिमांड है। और जिस हिन्दी लेखक समाज की बात लोग करते हैं उसमें कितने ऐसे हैं, जो दोगले नहीं है ? अलग-अलग प्रसंगों में लगभग 80 प्रतिशत बिरादरी दोगली निकलेगी; क्या महिलाएँ और क्या पुरुष !



स्त्री होने के नाते मान कर चलना चाहिए कि यहाँ ऐसे ही विरोध, तिरस्कार, चरित्र हनन, सबक, बॉयकॉट, लेखक के रूप में निष्कासन किन्तु स्त्री के रूप में बगलगिरी, आदि आदि ही हैं। यह इसलिए नहीं कि आप, वह या मैं स्त्री हैं; अपितु इसलिए कि वे पुरुष हैं, उनकी दृष्टि कुत्सित है, वे दोगले हैं, वे लेखक न होते तो और किसी लायक नहीं हैं, उनका असली चरित्र यही है, वे जाने कैसी जोड़ तोड़ के कारण लेखक बने हैं, वे (अस्तित्व की एकमात्र पहचान) लेखक बने रहने की बाध्यता के चलते कुछ भी लिखते हैं, उनके संस्कार उनके व्यवहार को बाध्य करते हैं, उनका चरित्र उन्हें उकसाता है, वे जिस भी पद या स्थान पर हैं - हैं तो एक ही बिरादरी के, और वे यदि ये न करें तो क्या करें !! (जून 2011)

शनिवार, 27 दिसंबर 2014

असंयमी लोगों को चाहिए कि अपने लिए बुर्के तलाश लें

"असंयमी लोगों को चाहिए कि अपने लिए बुर्के तलाश लें"  


बघारतीय स्टेट बैंक की राजभाषा अधिकारी अर्पिता शर्मा द्वारा बैंक की पत्रिका के महिला विशेषांक हेतु लिए गए साक्षात्कार का अविकल पाठ जिसे फरगुदिया ने अपने ब्लॉग पर लगाया है  



"भारतीय स्टेट बैंक की त्रैमासिक पत्रिका हेतु बैंक की राजभाषा अधिकारी अर्पिता शर्मा द्वारा 28 मार्च 2014 को लिए गए साक्षात्कार में उन्होंने 16 दिसंबर ( दामिनी, निर्भया प्रकरण ) की घटना के सन्दर्भ में महिलाओं-लड़कियों के प्रति समाज के नजरिये पर सार्थक प्रतिक्रिया दी है ! आदरणीय लेखिका का बहुत आभार अपने सार्थक विचारों को फरगुदिया पाठकों से साझा करने के लिए !

हाल ही में साहित्यकार डॉ कविता वाचक्नवी को विदेश में हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु समर्पित तथा उत्कृष्ट साहित्य सृजन के लिए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा "हिंदी विदेश प्रसार सम्मान" (2013 ) तथा इंडियन हाईकमीशन,ब्रिटेन द्वारा समग्र एवं सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक अवदान हेतु हरिवंश राय बच्चन के शताब्दी वर्ष पर स्थापित "हरिवंश राय बच्चन लेखन सम्मान एवं पुरस्कार" (2014) से सम्मानित किया गया ! "






अर्पिता शर्मा - सबसे पहला प्रश्न सिर्फ एक महिला से, ( न माँ, न बेटी, न पत्नी, न साहित्यकार, सिर्फ एक महिला), कैसा महसूस होता है महिला होकर। क्या कोई पछतावा है? 

कविता वाचक्नवी – महिला होने के अपने सुख दु:ख हैं । कुछ इतने भीषण दु:ख कि उनका उल्लेख भी संसार से नहीं किया जा सकता। इसलिए नहीं कि छिपाना है, बल्कि इसलिए कि संसार के पास उस संवेदनशीलता का अभाव है कि वह उन दुखों के मर्म तक पहुँच सके। 

कुछ ऐसे सुख भी हैं जो बहुत बड़े हैं.... ! 

परन्तु कई बार मुझे लगता है कि पुरुष होने के भी अपने सुख-दु:ख हैं। मनुष्य-मात्र और प्राणिमात्र के अपने दु:ख हैं । अतः जब सुख दु:ख सभी के साथ हैं तो फिर अपने ही दु:खों पर पछताना-रोना कैसा ? 

अर्पिता : स्त्री होने के ?

कविता वाचक्नवी : जिन्हें हम स्त्री होने के दु:ख समझते हैं, वस्तुतः वे स्त्री होने के दु:ख न होकर समाज की स्त्रियों के प्रति दृष्टि और व्यवहार के दु:ख हैं, समाज की स्त्री के प्रति सोच और बर्ताव के दु:ख हैं । इसलिए मुझे अपने स्त्री होने पर कोई पछतावा नहीं अपितु समाज के निर्मम और क्रूर होने पर क्षोभ है। 

अर्पिता : तो स्त्री होना कैसा अनुभव लगता है ?

कविता वाचक्नवी : ऐसे हजारों क्षण क्या, हजारों घंटे व हजारों अवसर हैं, जब मुझे अपने स्त्री होने पर गर्व हुआ है। जब-जब मैंने पुरुष द्वारा स्त्री के प्रति बरती गई बर्बरता व दूसरों के प्रति फूहड़ता, असभ्यता, अशालीनता, अभद्रता, लोलुपता, भाषिकपतन, सार्वजनिक व्यभिचार के दृश्य, मूर्खतापूर्ण अहं, नशे में गंदगी पर गिरे हुए दृश्य और गलत निर्णयों के लट्ठमार हठ आदि को देखा-सुना-समझा​-​झेला, तब-तब गर्व हुआ कि आह, स्त्री-रूप में मेरा जन्म लेना कितना सुखद है। 

रही इसके विपरीत अनुभव की बात, तो गर्व का विपरीत तो लज्जा ही होती है। आप इसे मेरा मनोबल समझ सकती हैं कि मुझे अपने स्त्री होने पर कभी लज्जा नहीं आई। बहुधा भीड़ में या सार्वजनिक स्थलों आदि पर बचपन से लेकर प्रौढ़ होने तक भारतीय परिवेश में महिलाओं को जाने कैसी-कैसी स्थितियों से गुजरना पड़ता है, मैं कोई अपवाद नहीं हूँ; किन्तु ऐसे प्रत्येक भयावह अनुभव के समय भी /बावजूद मुझे अपने स्त्री होने के चलते लज्जा कभी नहीं आई या कमतरी का अनुभव नहीं हुआ, सिवाय इस भावना के कि कई बार यह अवश्य लगा कि अमुक-अमुक मौके पर, मैं स्त्री न होती तो, धुन देती अलाने-फलाने को। 

यदि मेरा अगला जन्म मनुष्य के रूप में ही होता है, तो निस्संदेह मैं स्त्री होना ही चुनूँगी / चाहूँगी। कामना है यह संसार तब तक कुछ अधिक सुसभ्य व मानवीय हो चुका हो। 

अर्पिता शर्मा - आज के दिन में महिलाओं को किस स्थिति में पाती हैं, विशेषकर भारत में महिलाओं को, सामाजिक, आर्थिक परिप्रेक्ष्य में ? 

कविता वाचक्नवी – महिलाओं की स्थिति में यद्यपि दृश्यरूप में कुछ सुधार हुआ है। स्वतन्त्रता आंदोलन के काल या उससे पूर्व के साथ तुलना करें तो कई अर्थों में सुधार हुआ है, बालविवाह, सतीप्रथा आदि अब लुके-छिपे घटते हैं या न के बराबर हैं, स्त्रीशिक्षा का प्रचलन बढ़ा है, पर्दा काफी कम हुआ है, स्त्रियाँ लगभग प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ी हैं। वे अपनी बात कह सकती हैं, जो स्त्री 'विवाह के कारण सार्वजनिक जीवन से निर्वासित' (महादेवी वर्मा के शब्द) जैसी हो जाती है, सोशल नेटवर्किंग ने उस स्त्री को भी घर बैठे ही समाज से जुडने का अवसर दे दिया है, नगर की स्त्री के जीवन में परिवर्तन अधिक हुए हैं। आश्चर्य यह है कि इन सामाजिक परिवर्तनों और सुधारों के चलते भी समाज का रवैया स्त्रियों के प्रति बहुत नहीं सुधरा, अधिक भयावह ही हुआ है। इन सब सुधारों का प्रतिशत भी बहुत कम है, उन भयावहताओं की तुलना में जिन्होंने स्त्री को घेर लिया है। पितृसत्तात्मक ढाँचा कमजोर नहीं हुआ। बस उसके रूप बदल गए हैं। बलात्कार, भ्रूण-हत्याएँ, छेड़छाड़ और जाने क्या-क्या ! अब तो स्त्री अपनी माँ के गर्भ तक में सुरक्षित नहीं है, जो प्राणिमात्र के लिए संसार का सबसे सुरक्षित स्थान होता है। पितृसत्ता के हाथ माँ के गर्भ तक से उसे खींच बाहर निकाल ला मारते हैं। ऐसे समाज को आप व हम कैसे मानवीय व उदार कह-मान सकते हैं ? भ्रूण की हत्या इसलिए नहीं होतीं कि लड़कियाँ नापसंद हैं, अपितु इसलिए होती हैं क्योंकि यह समाज लड़कियों के लिए मानवीय नहीं है। उस अमानवीयता से बचने / बचाने के लिए उन्हें धरती पर साँस लेने से पहले ही समाप्त कर दिया जाता है। ऐसे भारतीय समाज को कैसे मैं मान लूँ कि स्त्रियों के लिए बेहतर हुआ है ? बलात्कारों का अनुपात और बलात्कार से जुड़ी भयावहताएँ इतनी कारुणिक हैं कि वे सुधार के सब आँकड़ों को अंगूठा दिखाती हैं।

अर्पिता : और आर्थिक सुधारों व स्त्री की आर्थिक निर्भरता ? 

कविता वाचक्नवी : रही आर्थिक स्थिति की बात, तो महिलाओं की आर्थिक स्थिति/ निर्भरता में सुधार यद्यपि हुआ है और वह इन मायनों में कि स्त्रियाँ अब कमाने लगी हैं, किन्तु इस से उनकी अपनी आर्थिक स्थिति सुधरने का प्रतिशत बहुत कम है क्योंकि वे जो कमाती हैं उस पर उनके अधिकार का प्रतिशत बहुत न्यून है। वे अपने घरों/परिवारों के लिए कमाती हैं और जिन परिवारों का वे अंग होती हैं, उन घरों का स्वामित्व व अधिकार उनके हाथ में लगभग न के बराबर है। समाज में जब तक स्त्री को कर्तव्यों का हिस्सा और पुरुष को अधिकार का हिस्सा मान बँट​वारे की मानसिकता बनी रहेगी,​ तब तक यह विभाजन बना रहेगा। स्त्री के भी परिवार में समान अधिकार व समान कर्तव्य हों, यह निर्धारित किए/अपनाए बिना कोई भी समाज, अर्थोपार्जन में स्त्री की सक्षमता-मात्र से उसके प्रति अपनी संकीर्णता नहीं त्याग सकता। स्त्री की शारीरिक बनावट में आक्रामकशक्ति पुरुष की तुलना में न के बराबर होना, उसे अशक्त मानने का कारण बन जाता है। तीसरी बात यह, कि महिलाओं की पारिवारिक, सामाजिक निर्णयों में भूमिका हमारे पारम्परिक परिवारों में नहीं होती है और यदि शिक्षित स्त्रियाँ अपनी वैचारिक सहमति असहमति व्यक्त करती भी हैं तो इसे हस्तक्षेप के रूप में समाज ग्रहण करता है, जिसकी समाजस्वीकार्यता न के बराबर है। अतः महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए मात्र उनकी आर्थिक सक्षमता ही पर्याप्त नहीं है, अपितु अन्य भी कई कारक हैं। 

अर्पिता शर्मा – फिर थोड़ा लौटते हैं; महिला होने की क्या चुनौतियाँ​, उपलब्धियाँ​ रही हैं, या भविष्य में किन-किन की संभावना / आशंका देखती हैं ?


कविता वाचक्नवी – सामाजिक, शैक्षिक या पारिवारिक जीवन में महिला होने के नाते सदा ही असंख्य भीषण चुनौतियाँ रहीं। संयुक्त परिवार में पलते हुए, कुलीन उच्चकुल की बेटी होने के कारण​ एक ऐसा समय भी था जब हमें चारदीवारी के भीतर रहने की कड़ी हिदायतें थीं। आवश्यकता के समय बाहर जाने पर अकेले जाना हमारे कार्यों व हमें संदिग्ध बनाने को पर्याप्त था। किसी का साथ होना अनिवार्य होता था; भले ही डेढ़, दो, चार वर्ष के चचेरे भाई की उंगली पकड़ कर उसे साथ लिया जाए। मैं बरसों तक अपनी एक अध्यापिका के घर उनसे मिलने जाते समय हाई स्कूल के बाद अपने चलना सीखे चचेरे भाई को साथ ले कर जाती रही। लड़कियों के साथ ही खेली। यह उल्लेख अनिवार्य है कि मेरे पिताजी ने यह भेदभाव कदापि नहीं किया। जब-जब मैं उनके साथ रही, तब-तब उन्होने सहशिक्षा वाले विद्यालयों में पढ़ाया, लड़कों के साथ खूब खेलने भेजा, उनसे कुश्ती तक करवाया करते थे, आर्यसमाज के मंचों पर ले जाते थे, वक्तृता, अध्ययन, लेखन, सामाजिक कुरीतियों व गलत का जी-जान से खुला विरोध आदि करने का कौशल उन्होने ही विकसित किया, किन्तु पिताजी के स्थानांतरण की स्थिति में जैसे ही कक्षा 8वीं के बाद संयुक्त परिवार में आई, तैसे ही रहन-रहन बिलकुल उलटा हो गया। इसीलिए मैं आवश्यकता से अधिक दुस्साहसी बनी क्योंकि पिताजी के स्वतन्त्रचेता होने के संस्कार भीतर थे, उन्हीं का अभ्यास भी था, किन्तु जब उन से अलग वातावरण में रहना पड़ा तो मस्तिष्क और मन को यह स्वीकार्य नहीं हुआ। माँ-पिताजी के यहाँ दूध-दही आदि सब श्रेष्ठ वस्तुओं पर पहला अधिकार मेरा रहता था और संयुक्त परिवार में मक्खन आदि केवल घर के कमाऊ पुत्रों को मिलता था, जबकि घर में गाय थीं और घर में बिलोया जाता था, कोई किसी प्रकार की कमी न थी। ये तो वे अनुभव हैं जो इतने सामान्य हैं कि इन्होंने मन पर कोई खरोंच तक नहीं छोड़ी, किन्तु कुछ दृश्य, अवसर और संस्मरण बड़े कसैले हैं ..... हजारों अनुभव हैं, उन्हें स्मरण तक करने की इच्छा नहीं है क्योंकि उनकी पीड़ा सहन करने का सामर्थ्य आज भी नहीं है, उनके विवरण देने का औचित्य भी नहीं, वे सारे क्लेद हृदय की अतल गहराइयों में हैं, टीसते हैं, रुलाते और तड़पाते हैं, उन्हें कभी किसी कागज पर लिखा-कहा नहीं जाएगा, नहीं जा सकता, आवश्यकता भी नहीं। कह-लिख दूँगी तो शायद चुक जाऊँगी, क्योंकि वे ही तो आग भरते हैं स्त्रियों के लिए लड़ने की। 

अर्पिता : और विवाह के बाद ? 

कविता वाचक्नवी : विवाह जब हुआ उस समय जो कुछ पढ़ रही थी, वह पढ़ाई बीच ही में छोड़ देनी पड़ी। उस समय (लगभग तीस बरस पहले)​ संस्कृत लेक्चररशिप / नियुक्ति लगभग पुष्ट​ (क​न्फ़र्म​) हो चुकी थी किन्तु सब कुछ को तुरन्त अलविदा कहना पड़ा। पर किसी ने दबाव नहीं डाला; यह तो स्वेच्छा से ही तय की गई वरीयता थी। मेरी सन्तान को मेरी आवश्यकता थी। कई ​बरस बाद​ अपने से भी छोटी आयु की लड़कियों / लोगों को प्रोफेसर या रीडर होने के दम्भ में इतराते देखती तो कभी-कभी वे दिन याद आते कि यदि वह न होता तो क्या होता। वर्ष ​ 82’ की छोड़ी पढ़ाई वर्ष 98’ के अन्त में पुनः शुरू की और परिवार चलाते हुए गृहस्थी के साथ ​हिन्दी में एम ए किया, एम फिल (स्वर्णपदक) किया और पीएच डी की। जो कुछ पुस्तक-लेखन, अध्ययन, प्रकाशन, सम्पादन, अध्यापन, संगोष्ठियाँ या उपलब्धियाँ मेरे बायोडेटा या खाते में दर्ज़ हैं वे सब 1998 के बाद की हैं। तो जीवन के लगभग 16 वर्ष केवल गृहिणी, माँ व पत्नी हो कर रही। इन सोलह वर्ष में कुछ न करने का मलाल भी होता है किन्तु स्वयं पर गर्व भी कि अपने बूते, बिना किसी के कन्धों का सहारा लिए, बिना किसी रिश्तेदार, सम्बन्धी के हाथ पकड़ कर आगे बढ़ाए, बिना रत्तीभर भी समझौता किए, बिना किसी गॉडफादर के, बिना महत्वाकांक्षाओं या उनकी पूर्ति के लिए रत्तीभर भी समझौते किए, अपनी शर्तों पर, अपने बूते, कर्तव्य अकर्तव्य के पिताजी के दिए विवेक के बूते यहाँ पहुँची हूँ, जहाँ आज हूँ। 

अर्पिता : आज तो आपके मायके व ससुराल को आप पर गर्व होता होगा... इतनी योग्यता व उपलब्धियाँ आपके नाम हैं ! 

कविता वाचक्नवी : मैं जिस संयुक्त परिवार से हूँ, वहाँ बेटियाँ नहीं होतीं, पिताजी सात भाई और दो बहन। इन सात भाइयों के घर केवल तीन बेटियाँ, बुआओं के सात पुत्र। तब भी बेटी होने का कोई विशेषाधिकार किसी के पास नहीं। अपने पूरे मायका-कुल में (ददिहाल व नहिहाल में) मैं सर्वाधिक पढ़ी हूँ, सर्वाधिक एकेदेमिक छवि व कार्यक्षेत्र है। मुझसे बाद की पीढ़ी में भी मास्टर्ज़ डिग्री से आगे अब तक कोई नहीं गया। यों यह कोई बड़ी बात नहीं है, किन्तु जब अपने को वहाँ ले जाकर देखती हूँ या कभी-कभार आयोजनों में समूचे परिवार के साथ मिलती-जुलती हूँ तो चुभने वाले कई बीते प्रसंग याद आते हैं और तब दूसरों को भले हो न हो किन्तु अपने पर गर्व होता है। कई बार लगता है कि पिताजी की व उनके माध्यम से आर्यसमाज की रोपी स्वातंत्र्यचेतना और परिस्थितियों द्वारा उस पर लगा अंकुश ही चैलेंज के रूप में रहा हो कि उसने मुझे जुझारु बना दिया। 

अर्पिता : स्त्री होने के नाते बहुत कुछ खोना भी पड़ता ही है भारतीय समाज में, अधिकांश महिलाएँ उस व्यूह में टूट जाती हैं। कोई विशेष अनुभव ? 

कविता वाचक्नवी : स्त्री होने के नाते ​बहुत कुछ खोया भी है। सामाजिक जीवन के कई अनुभव भी बड़े कुरूप हैं। भारतीय समाज में स्त्री का स्त्री होना उसका बड़ा अपराध है। जिसकी सजा हर राह चलता व्यक्ति उसे देने का अधिकार रखता है। मैं सोचती हूँ यदि मुझ जैसी निडर, साहसी और दो टूक स्त्री के प्रति समाज निर्मम हो सकता है तो चुपचाप सब कुछ सहन करने वाली स्त्रियों की क्या दशा होती होगी। जीवन के कुछ अनुभव तो एकदम कभी न मिटने वाली पत्थर पर खोद कर बनाई लकीरों की तरह मन में खुद-खुभ गए हैं। परन्तु विकट से विकट अनुभव ने मुझे और-और साहसी ही बनाया, और-और जुझारु ही बनाया, थकना, टूटना या हार मानना तो कभी सीखा ही नहीं। एक तरह से आप यों कल्पना कर सकती हैं कि जो भारतीय समाज आज्ञाकारी और सहनशील स्त्री तक को सुख से जीने नहीं देता उस भारतीय समाज ने एक विद्रोही, न झुकने वाली और जुझारु स्त्री को भला कैसे सहन किया होगा ? अपने इस विद्रोही, साहसी आदि होने के कई मीठे-कड़वे प्रसंग हैं। अधिकांश तो कड़वे ही हैं । कुछ को मैंने संस्मरणबद्ध भी किया है, जिनमें से एक अत्यन्त लोकप्रिय भी हुआ था "जब मैं छुरा लेकर परीक्षा देने गई" शीर्षक से। शायद आपने देखा-पढ़ा हो | 

अर्पिता : और भविष्य की चुनौतियों का प्रसंग तो छूट ही गया ...

कविता वाचक्नवी : रहा भ​विष्य की चुनौतियों की आशंका का आपका प्रश्न, तो उसके बारे में अभी से क्या कहा जा सकता है। हाँ इतना अवश्य कहूँगी कि भारत में रहते हुए जिन साधारण से साधारण इच्छाओं का गला घोंटना पड़ता था, आज ब्रिटेन में रहते हुए मैं उन सब को पूरा करने में लगी रहती हूँ। जैसे, स्कूल-कॉलेज के समय से मेरी बहुत इच्छा हुआ करती थी कि मैं चारों ओर से खुले में धरती पर आकाश के नीचे लेट जाऊँ और घण्टों आकाश को देखूँ सब ओर से बेपरवाह होकर..... । वहाँ वह इच्छा कभी पूरी नहीं हो पाई क्योंकि भारत में खुले में सार्वजनिक रूप से एक स्त्री के लेटे होने की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। किन्तु अब लन्दन में मैं इसे पूरा कर पाती हूँ। जब-जब धूप निकलती है, तो मैं झील के किनारे वाले बहुत बड़े मैदान में अकेली जाकर धरती पर घण्टों लेटी रहती हूँ, कई बार सो भी जाती हूँ । यहाँ कोई इसे अन्यथा नहीं लेता व न इसे मेरी अनधिकार चेष्टा समझता है। कुछ पुरुषों की टीम थोड़ी दूरी पर सदा ही वहाँ फुटबाल खेल रही होती हैं। वे भी मुझे लेटा जानकर थोड़ा आदर करते हुए कुछ दूर चले जाते हैं। यहाँ मुझे कोई अनुभव ही नहीं करवाता कि मैं स्त्री हूँ तो कुछ दोयम हूँ, कुछ दर्शनीय वस्तु हूँ, कुछ कमतर हूँ, कुछ खाद्य हूँ, कुछ छू कर देखने की वस्तु हूँ, कुछ छेड़छाड़ की छूट मेरे प्रति ली जा सकती है, कुछ मुझे धकेला, बरगलाया जा सकता है, मेरे वस्त्रों के पार देखने की चेष्टा की जा सकती है, मेरी देह कोई लज्जा की वस्तु है कि उसे लेकर मुझे सदा अपराधबोध से ग्रस्त रहना चाहिए और उसे संसार की नजरों से बचाए-छिपाए रखना चाहिए, या मैंने स्त्री होकर कोई अपराध कर दिया है, या मेरा बौद्धिक स्तर स्त्री होने के नाते निस्सन्देह कमतर होगा, या मुझे स्वयं को शक्तिहीन समझना चाहिए और पुरुष के पशुबल से आक्रान्त रहना चाहिए। अर्थात् स्त्री होने के नाते मुझे अपनी सुरक्षा के लिए कुछ भी नहीं करना पड़ता। ऐसी निश्चिंतता मैंने भारत में कभी नहीं पाई। हाँ, स्त्री होने के नाते जो बुरा अनुभव मुझे यहाँ होता है वह यह कि अधिकांश लोग भारतीय समाज की स्त्री होने के कारण बलात्कार वाले वातावरण से जोड़ कर देखते हैं कि इनके देश में तो स्त्री से जब चाहे, जो चाहे, जहाँ, जैसे चाहे बलात्कार कर सकता है। 
अर्पिता : और वहाँ पुरुषों का आपसे व्यवहार कैसा है ? 

कविता वाचक्नवी : इस देश में लोग (पुरुष भी) हमें छूते हैं, गले लगाते हैं, सार्वजनिक रूप से चूमते हैं (वह अभिवादन का तरीका है) किन्तु उनके स्पर्श में कभी रत्ती भर भी लैंगिक आकर्षण का अंश नहीं होता। यह अनुभव आत्मविश्वास और सुरक्षा लौटाता है। पुरुष डॉक्टर तक मनोबल बढ़ाने के लिए आकर गाल सहलाते हैं, कई बार दोनों हाथों में चेहरा लेकर सहला देते हैं, ये अनुभव मुझे विशेष राहत और सुख देते हैं। यहाँ की स्त्री के लिए भले विशेष न हों किन्तु हम भारतीय परिवेश की पली-बढ़ी स्त्रियों के लिए ये स्वस्थ स्पर्श पुराने घावों पर मरहम-से प्रतीत होते हैं, जो कई घाव भर देते हैं। हमने अपरिचित पुरुष का यह रूप नहीं देखा हुआ होता, इस वातावरण व सहज सम्पर्क से हमारा परिचय हमें अकुण्ठ करता जाता है मानो। 

अर्पिता शर्मा - बहुचर्चित दामिनी प्रकरण (16 दिसम्बर, दिल्ली में बस में हुए जघन्य बलात्कार) के भारतीय समाज में क्या मायने पाती हैं? क्या परिवर्तन होगा या फिर शांति? 

कविता वाचक्नवी – दामिनी के साथ हुए जघन्य काण्ड से देशभर में एक लहर-सी आ गई थी। किन्तु वह आक्रोश का बुलबुला जिस तेजी से फूला था, उसी तरह फूट भी गया। भारतीय समाज के साथ विडम्बना यह है कि वहाँ सब के सब ओर की परिस्थितियाँ बहुत आक्रोशपूर्ण हैं। व्यक्ति किस-किस के विरुद्ध आक्रोशित हुआ रहे और कब तक ? व्यक्ति की मानसिकता कितने दिन इसे सहन और वहन किए रख सकती है ? ऊपर से जीवन जीने की विवशताएँ और दबाव भी हैं जिनमें उन्हें जुटना है, उनके पास इतनी सुविधा नहीं कि वे हर एक बात और घटना पर अपने आक्रोश को सिरे तक पहुँचाएँ और कोई हल निकालें। उन्हें उन्हीं के साथ जीना मरना है। इसलिए दामिनी प्रकरण हो या गोहाटी का प्रकरण, ये तो वे प्रकरण हैं जो प्रकाश में आ गए किन्तु इनके समानान्तर ठीक उसी दिन, उसी नगर में अन्य कई लड़कियों के साथ निरन्तर अमानवीय क्रूरताएँ होती रहीं किन्तु उनका देश ने नोटिस ही नहीं लिया। प्रति २० मिनट पर एक स्त्री बलात्कार की शिकार होती है भारत में। ​यह केवल दर्ज अपराधों का आंकड़ा है। अतः वास्तव में यह दर क्या होगी, इसकी कल्पना से रोंगटे खड़े हो जाएँगे ३, ५ व ८ वर्ष की बच्ची से तो आगामी दिन ही बलात्कार की सूचना समाचारपत्रों में थी​। ​ इसी बीच इम्फाल में १८ दिसम्बर २०१३ को ही एक २२ वर्ष की अभिनेत्री व मॉडल Momoko को भरी भीड़ में से खींच कर उसके साथ यौनिक व्यभिचार के लिए ले जाया गया। इसके विरुद्ध सड़कों पर विरोध के लिए उतरी भीड़ पर पुलिस द्वारा चलाई गयी गोली से दूरदर्शन के एक पत्रकार मारे गए। इस प्रकार स्त्री के प्रति जघन्यतम अमानवीयताएँ वहाँ दैनन्दिन जीवन का हिस्सा हैं। 

भविष्य में दामिनी प्रकरण का क्या परिणाम होगा उसके अनुमान के लिए थोड़ा पीछे जाएँ। वर्ष 78’ में गीता और संजय चोपड़ा भाई-बहन के साथ हुई क्रूरता भी तत्कालीन समाज में बड़ी घटना थी, पर फिर धीरे-धीरे समाज उसका अभ्यस्त होता चला गया। कुछ भी नहीं बदला, अपराध उल्टा तब से अब अधिक बढ़े ही हैं। इसलिए शान्ति का तो निकट भविष्य में प्रश्न ही नहीं। कोई सरकार इस पर पूर्ण अंकुश नहीं लगा सकती क्योंकि जब तक जन-जन में स्वानुशासन और मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था नहीं, संस्कार नहीं, तब तक डण्डे के ज़ोर पर समाज को बदलना सम्भव नहीं। हम भारत के लिए पिछड़े देशों जैसी न्याय-व्यवस्था की कामना नहीं कर सकते । 

अर्पिता : लोगों ने दण्ड कड़े करने, स्त्रियों को नियन्त्रण में रहने और वस्त्रों आदि की हिदायतें दी हैं। क्या वे ठीक हैं ? 

कविता वाचक्नवी : हैवानियत से बचाव का उपाय सुझाना, संस्कारों के नाम पर पर्दे की वकालत, दण्ड-व्यवस्था के रूप में अरब आदि देशों के उदाहरण, कोई न कोई हल सुझाने की हड़बड़ी व अदूरदर्शिता आदि की बातें भारत को नष्ट करने के लिए बहुत काफी हैं । कोई हल न निकाल पाने की मजबूरी के चलते भारत को भी लीबिया या सीरिया जैसा देश नहीं ​बना दिया जा सकता । सब लोग मानो एक साजिश के तहत भारत को और हजार साल पीछे धकेलने वाले अमानवीय तरीकों को सुझावों और हल के रूप में देख रहे हैं। ​ऐ​से लोगों की ​आँखें ही नहीं खुलतीं कि यही सब जारी रहा और यही सब हल व तरीके ​यदि स्त्री-सुरक्षा के​ समाधान रहे तो भारत जल्दी ही बुर्के और घूँघटों ​वालियों का ऐसा देश बन जाएगा जहाँ ​पिछड़े​ देशों की तरह ​की दण्डप्रणाली लागू की जाए। समाधान के तरीकों पर बात करते समय इन खतरों से वाकिफ रहना बेहद जरूरी है। कोई समाधान या उदाहरण हजार साल पीछे व पिछड़े हुए देशों का नहीं अपनाया जा सकता....​। दूसरी ओर देश में बलात्कारों ​के लिए लड़कियों के रहन-सहन और वस्त्रों को लेकर हर बार की तरह बहस करने वाले लोग लड़कियों को ही दोष देने लग गए, मानो वे स्वयं बलात्कारियों को आमन्त्रित करती हैं। 

जिन लोगों को स्त्री के वस्त्र और उसका खुले में घूमना या साँस लेना स्वीकार्य नहीं, वे वही लोग हैं जिन्हें अपने पर संयम नहीं। ऐसे असंयमी लोगों को चाहिए कि अपने लिए बुर्के तलाश लें और ऐसे समय बाहर निकला करें जब संसार की हर औरत सो चुकी हो। या फिर बाहर निकला ही न करें। ऐसे असंयमी पशुओं को अपने असंयम के चलते मनुष्यों को दड़बे में बंद करने का कोई अधिकार नहीं। जंगली पशु को दड़बे/पिंजरे/सलाखों में बंद किया जाता है, न कि जंगली पशुओं से बचाए जाने वालों को। 

लड़कियों के वस्त्रों और शाम के बाद बाहर घूमने या पुरुष मित्र के साथ फिल्म देखने की आड़ में स्त्री को दोषी ठहराने व बंदी बनाने वाले कुतर्क करते हुए यह याद रखना अनिवार्य है कि दुनिया के सारे सभ्य देशों में महिलाएँ कई-कई बार पूरी रात भी बाहर रहती हैं, घूमती हैं, पार्टी करती हैं.... और तो और योरोपीय देशों में तो पुरुष मित्रों के साथ प्रगाढ़ चुम्बन लेती हैं, सार्वजनिक स्थलों पर लेटी भी मिलती हैं, कपड़े भी अत्याधुनिक व कई बार तो न्यूनतम पहनती हैं; अर्थात वह सब करती हैं, जो पुरुष या पूरा समाज सार्वजनिक रूप से करता / कर सकता है। परन्तु क्या उन सबके साथ इन कारणों और इन कुतर्कों का बहाना बना कर हरदम बलात्कार हुआ करते हैं ? 

वस्तुतः यह स्त्रियों पर शासन करने की प्रवृत्ति ही तो बलात्कारी मानसिकता की जनक है। जो ऐसे दुष्कर्म करते हैं वे भी किसी के भाई और बेटे तो होते ही हैं, भले ही वे अपनी सगी बहनों से शारीरिक बलात्कार न करते हों, पर मानसिक, वैचारिक व भावनात्मक बलात्कार (बलपूर्वक किया गया कार्य)​ तो घरों में अपनी बहनों, पत्नी व माँ के साथ भी होते हैं। अपने घर की स्त्रियों से शुरू हुई इसी शासन की आदत से दूसरों की बेटियाँ इन्हीं भाइयों और बापों द्वारा मारी गई हैं... इन्हीं भाइयों और बापों की आधिपत्य लिप्सा और स्त्री को अपने सुख की वस्तु और लिप्सापूर्ति का साधन समझने की आदत के कारण स्त्रियों की दुर्दशा है। 

और जब तक स्त्री पर शासन करने का संस्कार और मानसिकता आमूलचूल समाज से नहीं जाती तब तक स्त्री की सुरक्षा या बलात्कारों पर अंकुश या शान्ति जैसी कल्पनाएँ केवल कल्पनाएँ हैं, यथार्थ नहीं।


अर्पिता शर्मा – आपकी आभारी हूँ कि साधारण से प्रश्नों में निहित भावों को भाँप कर आपने उनका समाधान करते हुए मुझे इतना समय दिया। अपनी ओर से व पत्रिका की ओर से आपका आभार व्यक्त करती हूँ।


गुरुवार, 27 नवंबर 2014

जसोदाबेन का पत्नीत्व

जसोदाबेन का पत्नीत्व  :  कविता वाचक्नवी




मैं स्त्रियों व उनके अधिकारों की समर्थक हूँ किन्तु स्त्रियों को आगे कर उनके नाम पर अपना मंतव्य सीधा करने वालों व उनकी महत्वाकांक्षाओं की नहीं और उन स्त्रियों की भी नहीं जो ऐसा करती या माध्यम बनती हैं।
जसोदाबेन लगभग 50 बरस से अलग रह रही हैं और वे कोई अनपढ़ या दूसरों पर निर्भर हो कर नहीं बल्कि पढ़ी लिखी हैं, जॉब करते हुए। इन पचास बरसों में उन्हें अपने पति से अधिकार लेने और उनके साथ बसने का ख्याल और अदालत को बीच में डाल कर अपने अधिकारों की जानकारी लेने का ख्याल नहीं आया ? इतनी लम्बी अवधि तक उनके पति गुजरात के मुख्यमन्त्री थे तब भी उनकी महत्वाकांक्षाएँ या अधिकारभावना या जानकारी प्राप्त करने की कभी सुध नहीं जागी। अब पूर्व पति के प्रधानमन्त्री बनते ही अधिकारों की याद आ गई, पति के साथ रहने की इच्छा का सार्वजनिक उद्घोष और प्रचार होने लगा। अब वे ऐसे व्यवहार कर रही हैं जैसे वे एकदम मूढ़ और अपढ़ हैं और यह भी जानतीं कि मीडिया को क्या कहना है, क्या नहीं कहना या क्या करना है क्या नहीं करना।

50 बरस के बाद अब पत्नी के अधिकारों और साथ बसने की याद आ गयी और समाज व् मीडिया के सामने एकदम वंचित और पीड़ित होने का प्रदर्शन होने लगा जबकि अध्यापिका रही पढ़ी लिखी हैं और आत्मनिर्भर रही हैं।

अब पति प्रधानमन्त्री बन गए तो सारे अधिकारों की याद आ गयी। इसे ही कहते हैं कि जब व्यक्ति शिखर पर पहुँच जाता है तो सबको अपने युगों से ख़त्म हुए रिश्ते याद आने लगते हैं।


जसोदाबेन के इस व्यवहार के पीछे उनके मायके परिवार की लालसाओं की बड़ी भूमिका प्रतीत हो रही है। वे जसोदाबेन को आगे कर अपने इरादे पूरे करने, प्रधानमन्त्री के रिश्तेदार होने का लाभ लालच पूरा करना चाहते हैं, यही साफ़ दिखाई देता है और सम्भव है कि उस परिवार को ऐसा करने के लिए उकसाने और अपनी बहन जसोदाबेन पर दबाव बनाने के लिए उकसाया जा रहा हो। मीडिया को दबी कुचली शोषित स्त्रियों के अधिकारों की चिंता से अधिक आत्मनिर्भर और लालसाओं वाले रिश्तेदारों के ईशारों व चर्चा में आने के लिए 50 साल बाद पत्नी के अधिकारों का ढिंढोरा पीटना शुरु करने वाली एक आत्मनिर्भर रही स्त्री के अधिकारों की स्वार्थी चिन्ता ज्यादा है।

 आज अब यकायक क्या बदल गया ? जो लोग इस अवसर पर त्याग को मुद्दा बना कर सहानुभूति का खेल खेल रहे हैं वे जान लें कि यहाँ मुद्दा त्याग का नहीं है। त्याग क्या मोदी जी ने नहीं किया ? क्या मोदी जी ने पुनर्विवाह किया ? फिर इस तरह के मुद्दे उठाने का क्या मतलब है त्याग आदि के ? या जिन पर पहले बात हो चुकी है, पति पत्नी सम्बन्धों आदि के। उन पर बहुत अधिक बहुत पहले लिख चुकी हूँ। उनकी चर्चा करने के इच्छुक लोग यहाँ अपना व मेरा समाय व ऊर्जा बर्बाद न करें अगर उन्होने वे सब चीजें यहाँ पढ़ी या समझी नहीं हैं, जब लिखी गई थीं।

यदि असुविधा के अतिरिक्त कोई मुद्दा ही नहीं है तो मीडिया के सामने अन्य चीजों पर बयान देने से बचा तो जा सकता है, किसी ने हलक में हाथ डाल कर नहीं कहा कि कैमरे के आगे दूसरे मुद्दों पर बोलो। यह सरासर सहानुभूति के नाम पर  द्रवित हो उठने वाली जनता से सहानुभूति बटोरने का प्रयास है।


रही अलग रहने के कारण उनसे सहानुभूति करने वालों की बात, तो उन लोगों को पता होना चाहिए कि इस देश दुनिया में प्रतिदिन कई लाख पति पत्नी अलग होते हैं, तलाक लेते हैं, उनकी नहीं बनती। यदि आप लोगों को सहानुभूति और अन्याय दिखाई देता है तो जाकर उनके लिए लड़िए। जिस दुनिया में तीन बार तलाक बोलकर छोड़ दिया जाता है, उनके लिए लड़िए और संसार में में सभी जगह तलाक या सेपेरेशन बंद करवाइए। जिस पति या पत्नी को अपने साथी में रुचि ही न हो उसके साथ जीवन बिताना उस से अलग जीवन बिताने से कई सौ गुना बुरा है। पति पत्नी किसी कारण से अलग हो गए, इसमें कुछ भी अनूठा नहीं है, न संसार में पहली बार हुआ है। मैं कई माह पूर्व भी विस्तार से लिख चुकी हूँ कि इसका अधिकार जोड़े को है कि वह साथ रहना चाहता है या नहीं। हमारे यहाँ महादेवी वर्मा स्वयं इसका उदाहरण हैं कि वे अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती थीं अतः उन्होने उस विवाह को नहीं माना और अलग रहीं। न उन्होने पुनर्विवाह किया न कोई अपराध। इसी तरह मोदी जी ने न पुनर्विवाह किया और न ही कुछ और। मोदी जी ने भी यह सारा जीवन भीषण संकटों में काटा है, दर दर भटके हैं। इसलिए आज वे प्रधानमंत्री बन गए तो आप लोगों को मौका मिल गया उनके जीवन के नियामक बन फैसले सुनाने का ?


असल में राजनैतिक शत्रुओं को और कोई मौका नहीं मिल रहा लांछन लगाने का तो यही एक मुद्दा सही। और ये सब वे लोग हैं जिन्होंने व्यभिचारी मंत्रियों और नेताओं की घरों पर सड़ रही पत्नियों के दु:खो और पीड़ाओं पर कभी कोई घड़ियाली आँसू तक भी नहीं बहाया । और इनमें से अधिकांश जिस वर्ग के हैं उस वर्ग के लोगों की बीवियाँ गाँवों में इनके बच्चे पालती सड़ती रहती हैं और ये दूसरी औरतों के साथ खुलेआम पत्नी की तरह शहरों में रहते गुलछर्रे उड़ाते हैं, यह मटुकनाथ को जायज सिद्ध करने वाली जमात है, ये हिन्दी साहित्य के उस वर्ग के प्रतिनिधि हैं, जहाँ प्रत्येक विवाहित पत्रकार, अध्यापक, संपादक, लेखक अपनी छात्राओं, पाठिकाओं व प्रशंसिकाओं के शोषण और प्रेम में सरेआम संलिप्त होता है। इसलिए इनका चरित्र हम जानते हैं, उस पर हमारा मुँह न ही खुलवाया जाए तो अपनी इज्जत बचाए रख सकते हैं ये ।


स्त्रियॉं के साथ सहानुभूति रखने वाले ऐसे स्त्रीशोषकों को उन स्त्रियों के शोषण की याद नहीं आती, जहाँ वास्तव में शोषण हुआ है। दिग्विजय से लेकर एक एक आदमी नंगा है और स्त्री शोषण में संलिप्त। जसोदाबेन के कितने हमदर्दों ने जाकर दिग्गी सहित एक एक शोषक से शोषित होने वाली किसी महिला के पक्ष में आवाज़ उठाई ?


कमलेश जी, भारत की मूल समस्या ही यही है कि वहाँ कोई व्यक्ति अपनी तरफ से किसी चीज में कुछ भी सार्थक योगदान नहीं देता न देना चाहता है, उल्टे बिगाड़ने में सब एक से बढ़कर एक आगे रहते हैं। भारत की बरबादी का मूल कारण ही यही है कि योगदान की बजाय सबको केवल शिकायतें शिकायतें शिकायतें ही करना आता है। किसी को कुछ काम धंधा नहीं है सिवाय दुनिया जहान से दुनिया जहान भर की शिकायतें करने के। केवल मुंह चलाना और यह बताना की फलाने ने ऐसा गलत किया ठिकाने ने यह क्यों किया, यह ऐसा होना चाहिए यह वैसा होना चाहिए आदि अनादि। जो व्यक्ति स्वयं कुछ सार्थक योगदान नहीं देता उसकी शिकायतें सबसे ज्यादा .... वाह कमाल है !

एक मनुष्य होने के नाते जसोदाबेन के प्रति पूरा सम्मान है और उनके मौलिक अधिकारों के प्रति भी। वे एक साधारण स्त्री हैं और शांति से जी रही थीं, किन्तु बदमाश मीडिया और विरोधी पार्टियों के हाथ एक अस्त्र लग गया है और इस तरह वे उन्हें इस्तेमाल करते हुए उनकी शांति भंग कर रहे हैं। एक साधारण सामान्य ढंग से जीने वाली स्त्री को शांति से जीने दे लेना चाहिए। भगवान के लिए उन्हें शांति से जीने दो।

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 जिन्हें पति पत्नी सम्बन्धों के चलते सहानुभूति हैं, वे डॉ दीप्ति की 24 मई की निम्नलिखित स्टेटस व वहाँ चली परिचर्चा को ध्यान से पढ़ें। यहाँ पर अपनी टिप्पणियों में मैंने कुतर्कों के उत्तर दे ही दिए हैं।
पहले दीप्ति जी की यह प्रतिक्रिया व स्टेटस -

डॉ. दीप्ति भारद्वाज says
May 24 ·मोदी जी , ये कैसी महत्वाकांक्षा -------
क्यों हर बार रामराज्य की स्थापना के लिए सीता की ही अग्नि परीक्षा होती है ? क्यो सीता ही वनवास भोगे ? क्यों पुरुष की अतिशय महत्वाकांक्षा स्त्री के अस्तित्व को नकारती है ? क्यों हर बार स्त्री का ही बलिदान क्यों ? कृष्ण को द्वारिका बसाने के लिए रुक्मिणी को साथ लेना पड़ा था।
मोदी जी ये जीत तब तक अधूरी है जब तक आप अपनी अर्धागिनी को उचित सम्मान नही देते ? मोदी जी हर माँ आप जैसे पुत्र की कामना करेगी पर हर स्त्री आपसे डरेगी। आपने भारत के लिये जो साधना की वो तब तक बेमानी है जब तक उस साधना की मौन साधिका जसोदाबेन को उनका मान न मिले। आपने जो किया वह दुनिया ने देखा लेकिन. उसके लिए किसी स्त्री ने अपने सपनों और आकाँक्षाओ की बलि दी। भरी जवानी में खण्डित दाम्पत्य को जिया। फिर भी आपके लिए मंगलकामनाए कीं ।
क्या माँ की तरह ही उस मौन साधिका को प्रधानमंत्री बने पति से मिलना नही चाहिये ।
मोदी जी आपकी ये जीत स्त्री की एकान्तिक साधना के सहयोग से सम्भव हो सकी । कितनी पीड़ा झेली है जसोदाबेन ने जब लोग उन्हें दयाभाव से देखते रहे होंगे । कितना कष्ट रहा होगा उन्हें जब सब होते हुए भी कुछ नही के दंश को पीया होगा।
मोदी जी कभी बचपन में ये भजन सुना था आज आपको सुनाती हूँ -
कान्हा रे तू राधा बन जा भूल पुरुष का मान
तब होगा तुझको राधा की पीड़ा का अनुमान ।
मैं तो पूरी खुशी नही मना पा रही ।

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  • Malik Rajkumar nic complaint
  • Mahendra Tiwari "बिलकुल ...."

    "सहमत होना ही पड़ेगा आपकी बात से ...
  • Subodh Agrawal mujhe lagta hai, mujhe aapse milna hi padega.
  • Sushil Mishra डॉ. दीप्ति जी आपकी बात से शायद ही कोई असहमत हो....लेकिन शायद इस समय अगर मोदी जी ये पारिवारिक मामलों में उलझ गए तो संभवतः उनका और जशोदाबेन दोनों का इतने वर्षों का तप देश के किसी काम न आ सकेगा....इस देश की तुच्छ और स्वार्थी राजनीति को इस नितान्त व्यक्तिगत मामले में राजनीति की असीम संभावनाएं दिखने लगेंगी और जिस संकल्प और स्वप्न को लेकर इस देश की जनता ने इतना अदम्य समर्थन दिया है वह कही खो जाने की भी संभावना बन जायेगी. इस विषय में बिलकुल सटीक गजेन्द्र सोलंकी जी की पंक्तियाँ याद आ रही हैं............................... दिलों के बीच दूरी से बड़ी दूरी नहीं होती, गरीबी से बड़ी कोई भी मज़बूरी नहीं होती. यहाँ कोई सिकंदर हो या अफलातून हो यारों ,तमन्ना हर किसी की हर समय पूरी नहीं होती.
  • DrArvind Mishra Delicate issue indeed!
  • Pramendra Maheshwari ये विचारों का झंझावात कहीं किसी और जगह की पीड़ा तो नहीं...प्रेम तो अद्र्श्य ही है निरंतर निस्वार्थ बिना किसी चाह के...न भौतिक न दैहिक 
    और असंभव सी मंजिल पाने के लिए सबसे पहले परिवार की बेड़ियाँ ही तो काटनी पड़ी हैं वरना पति पत्नी परिवार और समाज ने तो असंख्य संभावनाओ वालों को सिर्फ धरातल पर ही समेट लिया...घर गृहस्थी के और त्रिया चरित्र के लग लपेट में न जाने कितने जीवन शून्य पर ही सिमट गए...चिंता न करो जिस मोदी ने पूरे समाज का ध्यान रखा वो निश्चित ही अपनी तपस्या की इस मौन साधिका का सम्मान अवश्य करेंगे...
  • Girish Pandey Misra g ,,,आपकी सौ फिसदी सदी सही है,,,,
  • DrKavita Vachaknavee जब दो लोग किसी रिश्ते से अलग हो जाते हैं, इच्छा से, अनिच्छा से, जबर्दस्ती, कागजी तलाक लेकर या मन से अलग होकर तो संसार के दूसरों लोगों को उन्हें जबर्दस्ती रिश्ते में सिद्ध करने का अधिकार नहीं होता है। संविधान के अनुसार यदि तीन वर्ष ( अवधि घट-बढ़ हो सकती है) तक पति पत्नी के संबंध न रहें तो उसे भी कानूनी दृष्टि से तलाक माना जाता है। तलाक लेने का अधिकार तब तक सबका है जब तक संसार में बहस चलाकर पूरे विश्व में इसे प्रतिबंधित न करवा दिया जाए। लोग तो फोन पर तीन बार तलाक ! तलाक! तलाक! कह कर तलाक ले लेते हैं। उन सब के तलाक लेने के अधिकारों को जिस दिन विश्व की सहमति से प्रतिबंधित कर दिया जाएगा उस दिन ही मोदी या किसी भी अन्य का अपनी पत्नी या पति से अलग होना जैसे विषय चर्चा का विषय बने तो अच्छा है। मैं बहुत पहले इस विषय पर लंबी परिचर्चा कर चुकी हूँ फेसबुक पर, इसलिए उसे दोहराने की आवश्यकता नहीं समझती। जिन पुरुषों की स्त्री में रुचि न हो (किसी भी कारण, भले ही इसलिए कि वे दूसरी स्त्री में रुचि रखते हैं, भले ही इसलिए कि वे समलैंगिक हैं, भले ही इसलिए कि वे वीतराग हैं या भले ही इसलिए कि वे नपुंसक आदि हैं) इनमें से किसी भी प्रकार के पुरुष के साथ स्त्री को बांधना स्त्री का जीवन नर्क करना है, वह न ब्याहता होती है, न पति का प्रेम पाती है, न मुक्त और स्वतंत्र। मैं ऐसी हजारों नहीं उस से अधिक स्त्रियों से व्यक्तिगत परिचित हूँ और कई लोमहर्षक किस्से सुन-देख चुकी हूँ। कई यहाँ विदेश में भी। और आपको शायद पता नहीं कि इनका बालविवाह हुआ था, परिवार वालों ने जबर्दस्ती किया था क्योंकि ये सन्यासी होना चाहते थे और घर छोड़ कर जा रहे थे। 50 वर्ष पहले की दुनिया में 17 साल और 15 साल के लोग अपने माता पिता और बड़ों के प्रति विद्रोह नहीं कर सकते थे। पर विवाह भी इन्हें बांध न सका और इसलिए ये जसोदाबेन को पढ़ने व अपने जीवन से इन्हें अलग करने की बात कहकर सहमति से अलग हो गए थे। उसके बाद मोदी जी ने सन्यास ले लिया था। आपने शायद बेल्लूर मठ में इन्हें सन्यासी के भेस में रहते हुए वाले चित्र नहीं देखे हैं। और भारत में भी यह कोई नई बात नहीं है। यह अधिकार महिला को भी रहा है कि वह यदि पुरुष में अनुरक्त नहीं तो अलग हो जाए। दूर क्यों जाना, महादेवी वर्मा इसका हमारे सामने का उदाहरण हैं। इसलिए इस तरह की बातें करना लोगों को चटखारे लेने का अवसर देना है। फेसबुक पर घूमने वाले लाखों करोड़ों में से कोई दो चार ही होंगे जो विषयवासना से विरक्ति का अर्थ भी समझते हों। उनके लिए विवाह भी भोग का ही माध्यम है, कामक्रीड़ा के लिए रचा गया खेल। ऐसे लोगों के बीच दो सम्मानित व्यक्तियों के व्यक्तिगत सम्बन्धों पर चर्चा करना सम्मानजनक नहीं। कोई आज का तलाक़शुदा आधुनिक सामान्य दंपत्ति भी हमें या आपको इसकी अनुमति नहीं देगा कि उनके पूर्व पति या उनकी पूर्व पत्नी को टार्गेट कर जबर्दस्ती एकदूसरे के साथ जोड़ा जाए। ऐसा कर हम जसोदाबेन के एकाकी जीवन का अपमान कर रहे हैं। क्या दुनिया के लोगों में तलाक नहीं होते? लम्पट और व्यभिचारियों को धिक्कारने की बजाय ( हजारों प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी हमारे आपके देखने और परिचय में हैं जिनकी बीबियाँ इनके नाम पर गाँव में सड़ रही हैं और ये शहरों में दूसरी औरतों के साथ खुल्लमखुल्ला रहते हैं, जीवन भर) धिक्कारना है तो उन व्यभिचारियों को धिक्कारा जाना चाहिए। पति पत्नी संबंध से सदा के लिए अलग हो चुके दो लोगों को जबर्दस्ती एक दूसरे के गले बांधना कदापि उचित नहीं,
    May 24 at 5:37pm · Edited · Like · 3
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज अजीब बात है जब हम अपने लिए सोचते हैं तो संवेदना के धरातल पर सोचते हैं । और जब अन्य के लिए, तो आदर्श वादी हो जाते हैं ।
  • Raghvendra Awasthi सिद्धार्थ के परिवार को त्यागने पर बुद्ध को समाज ने किस तरह देखा ? 

    फोकस स्त्री की अवहेलना पर है या किसी ईमानदार व्यक्ति के चुनाव पर ...जो जब वह समर्थ हुआ उसने वही चुना जो उसका मार्ग था ....

    गलत और सही सब सापेक्षिक ...समझ और दृष्टि के अनुपात में
  • DrKavita Vachaknavee मैं अपने लिए भी सोचूँ तो मैं कभी ऐसे पुरुष के साथ रहना नहीं चाहूंगी, जिसकी मुझ में अनुरक्ति न हो।
    May 24 at 5:30pm · Edited · Like · 2
  • Raghvendra Awasthi दुरुस्त बात ........चुनाव अनुरक्ति ही कराती है .......और अनुरक्ति अपनी-अपनी
  • DrKavita Vachaknavee रही आदर्श की बात , तो इसमें कौन सा आदर्शवाद है। दो तलाक़शुदा लोगों को उनका जीवन जी लेने दिया जाए , इसमें आदर्शवाद नहीं व्यावहारिकता है। संसार भर में माँ बेटे का रिश्ता किसी भी नियम से अलग नहीं हो सकता क्योंकि वह हमारे हाथ में नहीं है, पर संसार में पति पत्नी अलग होते हैं, सो ये भी हो गए।
  • DrKavita Vachaknavee दीप्ति जी, आपके इस नियम से चलें तो महादेवी वर्मा भी अत्याचारी, क्रूर शोषक और अमानवीय राक्षसी ठहरा दी जाएँगी क्योंकि उन्होने अपने पति को स्वीकार नहीं किया था और उन्हें छोड़ दिया था जबकि उनके पति ने जीवनभर विवाह नहीं किया।
    May 24 at 5:32pm · Edited · Like · 3
  • Raghvendra Awasthi समाज जब अति कर देता है तब संवेदनशील नहीं क्रूर हो जाता है ....
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज मेरी पोस्ट तो सहज थी । इतनी असहजता कैसे आ गयी। मैंने उस स्त्री की पीड़ा को अनुभव करने की कोशिश की जिसका जिक्र पत्नी के रूप में किया गया है। यदि कोई सम्बनध नही रहा तो पहले की तरह मौन साधना चाहिये था।
  • Raghvendra Awasthi दीप्ति .....कोई अफेंस नहीं किया तुमने ....सहज अभिव्यक्ति है तुम्हारी ...ईमानदार भी
  • Raghvendra Awasthi प्रारब्ध एक बहुत गंभीर और रहस्यमय शब्द ही नहीं ....अर्थ भी है
  • DrKavita Vachaknavee इसका उत्तर हजारों लोग मीडिया और सोशल मीडिया पर दे चुके। पहले ऐसा नियम नहीं था कि यदि कभी आपका विवाह हुआ है तो उसकी जानकारी भरनी अनिवार्य है , इसलिए पहले नहीं उल्लेख किया। जिस दिन संविधान ने इसे अनिवार्य कर दिया उस दिन उल्लेख करना पड़ा , न करते तो झूठ बोलते।
    May 24 at 5:41pm · Edited · Like · 2
  • Raghvendra Awasthi सहमत
  • Raghvendra Awasthi अब मैं गंभीर चर्चा का आह्वाहन करता हूँ .....करिए मित्रो
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज तुम भूल गये पुरुषत्व मोह में 
    कुछ सत्ता है नारी की
    समरसता ही सम्बन्ध बनी 
    अधिकार और अधिकारी की।
  • Raghvendra Awasthi मोह को विसर्जन करने के बाद चर्चा के लिए उत्सुक और उन्मुख हूँ दीप्ति
  • DrKavita Vachaknavee पुरुष के साथ बंधने मात्र में ही प्रत्येक स्त्री की सार्थकता और उपलब्धि नहीं है।
  • Raghvendra Awasthi सहमत
  • DrKavita Vachaknavee इतना लंबा लेख दिया मैंने तीन चार टिप्पणियों में, अभी और क्या गंभीर करें? इस से गंभीर कर सकने की अब शक्ति नहीं
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज मैंने भी ये जानकारी मीडिया से ही पायी कि मोदी जी विवाहित है। उनके अभियान के लिए ये जरूरी था। पर एक स्त्री जिसने पूरे जीवन उनके नाम के साथ जिया , बात तो वहाँ की है। हाँ , अब कह सकती हूँ कि मैंने स्त्री को विसर्जित होते देखा है। भारतीय स्त्री का पारम्परिक शास्त्रीय चेहरा हैं जसोदाबेन
  • Raghvendra Awasthi स्त्री द्वारा बड़ी लाल बिंदी लगाने और टेपुये तक सिंदूरी मांग भरना उसकी पीटीआई के प्रति या प्रारब्ध के प्रति सहज स्वीकार्यता भी नहीं है
  • Manika Mohini कविता जी, आपकी बात बहुत सारगर्भित, अर्थपूर्ण एवं तर्कसंगत है लेकिन एक जानकारी का अभाव है, वह यह कि जसोदाबेन का वक्तव्य अखबार में छपा है कि वे स्वयं चाहती हैं कि उनके पति उन्हें शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित करें। यह जगजाहिर बात है कि मोदी जी ने पत्नी को किसी अन्य महिला के लिए नहीं छोड़ा था. आज मोदी और जसोदाबेन के व्यक्तिगत जीवन को खंगाला जा रहा है तो भी दोनों के अन्यत्र सम्बन्ध की जानकारी नहीं मिलती। उम्र के इस आखिरी पड़ाव पर अनुरक्ति होना, न होना बराबर है, सम्मान होना पर्याप्त है जो जसोदाबेन में दिख रहा है. इस मामले में मैं मोदी जी को दोषी नहीं मानती क्योंकि जिसके मन में ही वैराग्य है, उसके लिए किसी भी रिश्ते की अहमियत नहीं रहती। वैरागी व्यक्ति बीतर से कोई बहुत शांत नहीं होता, वह अपनी मानसिक उलझनों में जकड़ा होता है. जसोदाबेन पढ़-लिख कर नौकरी करती थीं, लेकिन उन्होंने पुनर्विवाह के बारे में सोचा हो, इस बात के सबूत नहीं मिलते। तो उम्र के इस पड़ाव पर यदि दोनों मिलना भी चाहते हैं या Sirf पत्नी मिलना चाहती हैं और लोग उनकी मदद करने के लिए सद्भाव रखते हैं तो कविता जी, इसे आपको सहज भाव से लेना चाहिए, इतना उत्पीड़ित नहीं होना चाहिए।
    May 24 at 5:50pm · Edited · Like · 2
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज वो दोनों जिस वय में हैं वहाँ न कामेच्छा है न भोगेच्छा।
  • Raghvendra Awasthi वैराग्य युग्म का विषय नहीं .......यह एक में हो सकता है ....दूसरे में अनुराग सो सकता है ...किन्तु जीवित रह सकता है ......हर जीवित व्यक्ति एक स्वतंत्र इकाई है
  • Anju Shalini jab dono ne alag reh ker yeh sweekar kiya hai barsoo pehle .....itna adbhut rishta nibhaya hai to ab yeh charcha kyu ,,,yeh nirnay bhi un dono ka hona chahiye samaj ka nahi ....
  • Raghvendra Awasthi हम खामखाँ हलाक हो रहे है अब तो ......
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज जसोदाबेन ने पति के स्वप्न को स्वीकार किया है। माँ सारदा ने भी पूरे जीवन ठाकुर को साधना में सहायता दी। पर ठाकुर ने उनका मान रखा। मोदी जी स्वेच्छा से गये
  • Anju Shalini ha ha awasthi ji yeh kham kha hi to bade kaam ki cheej hai .....baal ki khaal nilal deti hai
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज नहीं राघवेन्द्र जी
  • DrKavita Vachaknavee मैं कहाँ से किसको उत्पीड़ित लगी? मूझे तो ऐसी कोई पीड़ा नहीं। मणिका जी ! आपने भी कहा वैराग्य वाली बात को। तो वैराग्य वाले व्यक्ति के साथ यह हमारी आपकी ज़बरदस्ती नहीं कि उसका जीवनभर का वैराग्य यों तमाम कर दिया जाए? और वैसे कोई तीसरा होता कौन है दो लोगों के व्यक्तिगत सम्बन्धों को अपनी इच्छा या अपनी सोच से निर्णायक बन चलाने वाला ?कोई स्त्री अपने दाम्पत्य जीवन में पति से अलग हो जाए और पति की किसी दिन बुढ़ापे में उसके जीवन में आ खड़े होने की इच्छा हो जाए तो क्या वह स्त्री बड़ी सहजता से 50 बरस पहले से अलग हो चुके पति को अपने जीवन में घुसने देगी ? यह कहाँ का न्याय है ? संबन्ध इस तरह इकतरफा होते हैं ? या बच्चों का मेला देखने की ललक की तरह कि मेरी गुब्बारा खरीदने की इच्छा है तो सारी दुनिया गुब्बारा न दिलवाने को अन्याय और अत्याचार कहे। कमाल है।
  • DrKavita Vachaknavee कामेच्छा नहीं है तो कोई भी किसी के साथ रहने लगेगा ? कमाल है दीप्ति !
  • DrKavita Vachaknavee अजीब बात नहीं लग रही कि हम दो लोगों को अपना चाबी वाला खिलौना समझ कर उनके जीवन में उन्हें क्या और कैसे अपने संबंध को चलाना चाहिए इस पर निर्णय दे रहे हैं । मैं तो मेरे व्यक्तिगत जीवन पर निर्णय देने वाले तो क्या बोलने वाले तक को कभी क्षमा न करूँ।
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज जिस समाज से जसोदाबेन या मोदी जी आते हैं वहाँ तलाक अभी भी सहज स्वीकार्य तो नही। स्त्री पूरा जीवन पति के नाम पर काट देती थी। ये जसोदाबेन का पति की साधना में सहयोग ही है। उसकी कद्र होनी चाहिये ।
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज कविता जी ये निर्णय नही सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति से अपेक्षा है।
  • DrKavita Vachaknavee उसकी कद्र की बजाय ऐसी चर्चा करना ही उसका मखौल बना देना है
    May 24 at 6:01pm · Edited · Like · 1
  • DrKavita Vachaknavee व्यक्तिगत सम्बन्धों में और वह भी जो पचास बरस पहले छोड़े जा चुके हैं।
  • Raghvendra Awasthi सहमत
  • DrKavita Vachaknavee मैं अपनी बात कह चुकी। अब आप लोग अदालत बन मोदी के गृहस्थ बनने न बनाने का निर्णय सुनाएँ और फिर उन दोनों को आदेश दें कि वे आपका निर्णय मानें ही मानें। न मानने पर देश की जनता से उन्हें नीच और मक्कार प्रमाणित करवाएँ। धन्यवाद !
    May 24 at 6:03pm · Edited · Like · 1
  • Manika Mohini कविता जी, यह आपसी समझ की बात है. जसोदाबेन को यह समझ में आ गया कि उनके पति किसी अनुचित इच्छावश उनसे लग नहीं हो रहे बल्कि मन में दुनिया के प्रति विरक्ति होने से अलग हुए हैं. उन्होंने उनके इस निर्णय का सम्मान किया। ज़रूरी नहीं कि अलग होने से संबंधों में विष ही पैदा हो. फिर हमें क्या अधिकार है कि हम इस नकारात्मक तरीके से उनके रिश्ते की व्याख्या करें?
  • Raghvendra Awasthi जिस स्त्री ने पूरा जीवन साधना में बिताया और शांत रही .....लक्ष्मण जी की पत्नी का नाम याद नहीं आ रहा .........जिनके उद्देश्य बड़े होते हैं वे बड़ा त्याग ही करते हैं ....मित्रो '
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज अगर ये मखौल है तो उन्हें जसोदाबेन को अखबार में दिए बयान से रोकना चाहिये था
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज राजा का व्यक्तिगत कुछ नही होता सब समाज का होता है।
  • DrKavita Vachaknavee मैंने कब कहा कि नकारात्मक या विष ? कमाल है । मैं तो उल्टे कह रही हूँ कि ऐसा कर हम जसोदा जी के एकनिष्ठ जीवन का अपमान कर रहे हैं।
  • Raghvendra Awasthi नहीं .....स्त्री या पुरुष .....अकेले में एक स्वतंत्र इकाई है .....वह अपनी बात कह सकता है
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज राघवेन्द्र जी उर्मिला
  • Raghvendra Awasthi राजा कौन ?
  • Anju Shalini pati yani modi ji ne bhi doosa vivaha nahi kiya .....mutual understanding hai yeh ....dono apni apni jagha santusht aur khush hai ...mahan vyaktitiv hai dono ka ...ek desh seva ke liye pariwar chod ta hai to dusra chup chap sehmati deta hai saath nibhane ki ...esko yu mat prastut karo ki kuch galat hai ,....yeh patni ke tyag ka apmaan hoga aur modi ji ke saath anyaaye
  • DrKavita Vachaknavee उनके संबंध 'राजा' बनने से पहले से तय हो चुके हैं, इसलिए यह तर्क निराधार है। आप उनके पूर्व जीवन के सम्बन्धों को पलटने की जिद्द कर रही हैं।
  • Raghvendra Awasthi विषय एक बार फिर दोहरा लें .......सीधा प्रश्न करो दीप्ति ......बिना भूमिका के
  • Renu Bali Khurana jasodaben ji ek mahan tapasvini hai,prem may sirf dene ka bhaav hota hai,vo bilkul bhi peedit nahi hongi,....
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज कविता जी , आप पजेसिव क्यों ? मैंने तो मोदी जी की ही टीम में उत्तर प्रदेश में काम किया है। वे तो हम सब के हृदय हार हैं । एक बार उस स्त्री की पीड़ा कै अनुभव करिये । जिसने किसी कै नाम पर पूरा जीवन जिया है। स्त्री के प्रति ऐसी कठोरता
  • Anju Shalini dipti ji ....prashan ab adhikar ka hai hi nahi ....dono apni icha se alag reh ker ek doosre ko samman de rahe hai ....
  • DrKavita Vachaknavee आप तथ्य और सत्य को पज़ेसिवनेस्स समझती हैं ? भावुकता के समर्थन को सहमति ?
  • Shiva Tomar madam ji app kyu modi ke pichhe pade ho plzzzz..... rahne dooo
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज कविता जी। मेरी पोस्ट अखबार में छपे जसोदाबेन के बयान पर है। इसमें भावुकता नहीं वरन् प्रश्न है।
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज आज मोदी इन बहसो से ऊपर हैं ।
  • Anju Shalini aary patrakar baar baar puchte hai aap delhi aayengi to unhone kaha bulayenge to jaroor aaoongi
  • DrKavita Vachaknavee  डॉ. सरोज गुप्ता
  • Virendra Jain कुछ को मोदी को पत्नी के बिना देख कर अंतर्मन से सुख मिलता है। अरे भाई ये पति पत्नी के बीच का मामला है उन्हें आपस में तय करने दें
  • Kavi Sanjay Shukla आप लोग चिन्ता ना करे माननीय मोदी जी जसोदाबेन को पूरा सम्मान देगे! जो हो गया सो हो गया!
  • Krishna Bihari yah nitaant niji maamla hai .... anuchit hoga kuch bhi kahna .
  • Kamlesh Chauhan DrKavita Vachankavi ki har baat per sehmat hu . Lekin Deepti Bhardwaz aap kis yug ki baat kar rahi hai us yug ki jo ghar mai aurto ke rakhte huve bahar ki aurto se gulshare udate hai ? Modi ji se Pukar karne se pehale Jaayiye us samaz ka udhar Ki...See More
  • Kamlesh Chauhan Dr Deepti Bhardawaz apki bhavna ko namskar lekin eltza hai Modi ji aur Yashdabhen ke rishte ko emotional black mail mat kijiye. Indra Gandhi ne to do bacho ke janam ke baad Firoz Gandhi se algat le li thi kam se kam Modi ji ne jo phainsla kiya hai...See More
  • Kamlesh Chauhan Kavi Sanjay Shukla Modi ji ne Samman diya hai. Jis aurat ko Unhone padaya aur is kabil banaya ki woh apne pavn pr khada kiya kaya yeh samman nahi hai? Khud Kamandal Le kar Tapasavi banane chale gaye lekin Bhagaya mai unke Desh ki seva likha tha jo Unho...See More
    May 25 at 2:22am · Edited · Like · 1
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज Kavita VachaknaveeKamlesh ChauhanKrishna Bihari,Virendra Jain, जी ... आप सबके तर्क को प्रणाम । देश को एक सशक्त प्रधानमंत्री मिला है ये सौभाग्य है। आप सब मेरी पोस्ट एक बार फिर ध्यान. से पढ़ना । मैंने स्त्री दृष्टि से स्त्री के समर्पित जीवन को दृष्टि गत रखते हुए स्त्री के अवसर पर उचित सम्मान की बात की है। तीन वर्ष के साहचर्य ने मोदी जी के व्यवहार ने जसोदाबेन को जीवनभर बाँधे रखा। ये बात आज के संदर्भों में एक उदाहरण है। भारत में पतिव्रताओ के उदाहरण दिये जाते हैं ये उनमें से एक है। जिन्होंने पढ़ाई पूरी की शिक्षिका बनीं और मोदी जी के लिए एकनिष्ठ भाव से जीवन जिया। 
    जसोदाबेन जिस गाँव और परिवार से आती हैं वहाँ दूसरा विवाह या तलाक जैसे शब्द आम प्रचलन में नही हैं । पढ़ी लिखी कुछ स्त्रियों के आधार पर पूरे भारत की सामाजिक मान्यताओं की अनदेखी नही की जा सकती। 
    जसोदाबेन का जिक्र आया तो इसीलिए कि उन्होंने कोई दूसरा विवाह नही किया। उनकी साधना भी कम महत्वपूर्ण नहीं । स्त्री दृष्टि से स्त्री की संवेदना को अनुभव करते हुए ही मैंने बात कही है। एक मानवीय गरिमा के हितार्थ।सादर
  • Kumar Sauvir मोदी जब तक जसोदा को नहीं समझ सकते, तब तक वे खुद को जसोदा के तौर पर महसूस करें। लेकिन दीप्ति जी, जसोदा को भी मुंह खोलना पड़ेगा। केवल मोदी को नहीं, जसोदा को भी समझना पड़ेगा कि वह कब तक जसोदा बनी रहेगी। माना कि यह युद्ध महिलावादियों का भी है, लेकिन मूलत: तो यह प्रकरण जसोदा का ही है।
  • Arvind K Singh दीप्ति जी ये तो सचमुच बहुत गंभीर सवाल उठाया है आपने
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज Kumar Sauvir जी , बात महिलावादी की कतई नही है। मेरी बात सिर्फ संवेदना के धरातल से उपजे यक्ष प्रश्न की है। जैसे मोदी अब व्यक्ति गत नही रहे वैसे ही जसोदाबेन अब दुनिया के सामने हैं गुमनामी से बाहर। मैं बचपन से सीखती आई हूँ कि वरिष्ठो का जैसा आचरण होगा छोटे भी वैसे ही बनेंगे
  • Kamlesh Chauhan kitne dukh ki baat hai ki abh Yoshda ji ko muhn khulane pr ham majbur kar rahe hai . Logo ko koi aur kaam nahi hai? kaya Modi ji ko desh ki aur uljhane kaya kam hai jo aap log Yashodabhen ke muddo ko uthakar baith gaye ho . had ho gayi hai
  • Kamlesh Chauhan Kaya Modi ji apni ghar ki uljhane le kar desh mai shashan karenge
  • Ashok Rawat मोदी जी हर माँ आप जैसे पुत्र की कामना करेगी पर हर स्त्री आपसे डरेगी। आपने भारत के लिये जो साधना की वो तब तक बेमानी है जब तक उस साधना की मौन साधिका जसोदाबेन को उनका मान न मिले।..........आपकी बात सौ फीसदी सही है मोदी की पत्नी के त्याग को सम्मान मिलना चाहिए.
    May 25 at 4:41am · Edited · Like · 2
  • Kamlesh Chauhan Yoshoda ji ke naam per kar di hai rajniti ab nari ke hakko ke baare bolne walo logo ne .. achhi Rajniti hai .. Rape ke baare nahi , Kashmir mai hindu aurto ko blatkar kiya gaya unke gale kaate gaye unke liye to awaj uthi nahi lekin Yashodabhen jo...See More
  • Amit Agarwal Jab ye shadi barso pehle se khatm hai to ab biwi biwi ka shor kyun macha rahe ho. Abhi tak kuch nahi tha jaise hi pm bana to biwi saath aaney ko ready. Ye Kya???
  • Preet N Singh bullshit ................
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज बड़ी अजीब बात है कि जो स्त्री वादी होने का दावा करते रहे अब तक वे ही अपने निहित स्वार्थों के कारण. सच स्वीकारने से कतराने लगे। कोई बड़ा पुरस्कार या पद मिलने की आस में भाव और भाषा बदल गयी। मोदी जी के क्लोज फ्रैण्ड बन फोटो लगाने से बिजनेस मिलने में आसानी होगी । इसी लिए एक स्त्री के समर्पित भाव को स्वीकारने में इतना कष्ट। मुझे तो मीडिया से ही जानकारी हुई की मोदी जी की पत्नी हैं ।
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज preet n singh ji मैं आपसे परिचित नहीं ।
  • Shalini Nagaich Deepti ji, adbhut n hradysparshy chitran.
  • Kamlesh Chauhan Amit aggarwal very good point kaya kare logo ko dusro kai nizi mamalo mai bolna mahanata lagti hai. Please dont know how to mind their own biz sad.
  • Kamlesh Chauhan http://youtu.be/hSJbmB-AxMg She is not weak woman . This woman can speak for her own right . She is not weak woman get a life friends
    Jashodaben, a 62-year-old retired school teacher...
    YOUTUBE.COM
  • DrKavita Vachaknavee हम लोग दूसरों की निजता की सम्मान करना कब सीखेंगे !
  • Pratibha Dave Kitani shalinata hai Jasodabahenme!. Kyun anya log ise dhatane pe lagna chahte hai? Kisi ko is vishay me bolana, charcha uthana uchi nahi lagata aur vo bhi apani mahata ke liye!. Please, is sambandh ki shalinata aise hi rahene digia. Dil se vairagya ...See More
  • Kamlesh Chauhan I dont know You Pratibha Dave but I salute you. Thanks Ham Hind ki hai Nariya Jalti Chingariya Samjhe na Humen koi Phoolo Ki Kyariya.. If My hubby leave me I will not look back .. I wont let anyone to tell me what to do and I respect whatever the reason he has to leave me Politics or something else. Do we want men to be suffocated with us?
  • Kavi Laxminarain Agarwal मोदी देश निर्माण के कार्य में लगे हुए हैं न कि सत्‍ता भोग में।कोई भी भावनात्‍मक बाधा या कमजोरी इस यज्ञ खन्‍डित कर देगी।ये एक स्‍त्री के जीवन का सवाल नहीं है देश की 60 करोड़ स्‍त्रीयों के भविष्‍य का सवाल है।अगर ये देश तालिबानी मुसलमानों के हाथों में चला जाता है तो सोचिए 50 करोड़ हिन्‍दू महिलाओं का भविष्‍य क्‍या होगा।पाकिस्‍तान में हिन्‍दू महिलाओं का अपहरण करके तालिबान के लिए वंश्‍या की तरह इस्‍तेमाल होता है।जहॉ तक राम और सीता का प्रश्‍न है ये भी सत्‍य है कि राम ही वो महापुरूष हैं जिसने एक पत्‍नी प्रथा की नींव रखकर नारी के गौरव को बढ़ाया।
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज Kavi Laxminarain Agarwal ji आपने मेरी पोस्ट का सटीक जबाव दिया।वरना सारे गुजराती मुझे ये सोच कर घेर रहे थे कि सत्य बोल मैंने अपराध कर दिया और दिल्ली पर काबिज होने से उन्हें रोक दिया। सबका स्त्री वाद धरा रह गया।
  • Shyam Bhatia Well said -beautiful letter to Sh Narendra Modi
  • Kavi Laxminarain Agarwal कांग्रेस,RJD,JDU.SP,BSP. आदि ने तो सत्‍ता मुसलमानों को सौंपने की पूरी तैयारी कर ली थी हिन्‍दूओं के भातर निराशा बैठने लगी थी।मोदी जी के आने से हिन्‍दूओं में एक आशा का संचार हुआ है।केवज एक स्‍त्री की के दृष्‍टिकोण से हर बात को मत देखा कीजिए।नरेन्‍द्र मोदी न भी कभी किसी अन्‍य महिला से सम्‍बंध नहीं रखा वरना अन्‍य नेताओं को देख लीजिए।ये एक यज्ञ है जिसमें जशोदाबेन और नरेन्‍द्र मोदी दोनों ही अपने सुखों,भावनाओं की आहुति दे रहे हैं।मोदी की नजर बहुत दूर तक है बहुत विशाल एजेन्‍डा है उनके मष्‍तिस्‍क में उन्‍हें ऑख बन्‍द करके समर्थन दें।मेरी किसी टिप्‍पणी से आपको ठेस पहुंची हो तो क्षमा करें।
  • DrKavita Vachaknavee भाईसाहब बहुत अच्छा उत्तर दिया आपने कि मोदी सत्ता सुख में नहीं लगे, राष्ट्रनिर्माण में लगे हैं। 'मोदी की महत्वाकांक्षा' कह कर जबर्दस्ती गाली दी जा रही थीं। यदि उन्होने व्यभिचारियों की तरह किया होता या किसी अन्य से संबंध बनाने के लिए जबर्दस्ती पत्नी को तजा होता तब तो भी कोई कुछ कह भी सकता था, पर... हद्द हुई पड़ी थी। खैर ! धन्यवाद। Kavi Laxminarain Agarwal
  • Raghvendra Awasthi सहमत ....मोदी की जीवनयात्रा को एक अनुष्ठान की तरह देखा जाना ही समीचीन है ....वे समय द्वारा देश में परिवर्तन के लिए चुने गए व्यक्ति हैं .........मोदी को जो सफलता मिली है वह किसी भी दृष्टि से मानवीय सीमाओं से परे और अलौकिक है ...मोदी स्वयं भी यह सब न तो जानते होंगे ....न उन्होंने ऐसा सोचा होगा ....उनका कार्य उनके लिए तय पट कथानुसार चल रहा है ......वे बस उसमे अभिनेता हैं ...ऐसे समझे मित्रों 
  • डॉ. दीप्ति भारद्वाज सौ फीसदी राघवेन्द्र जी
  • Raghvendra Awasthi अब तुम खुश हो जाओ दीप्ति ......तुम्हारी पोस्ट सार्थक रही 
  • Rajeev Agnihotri bilkul sahi
  • Mahendra Tiwari  सार्थक तर्क वितर्क....
  • DrKavita Vachaknavee

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