विदा
| (अपने संकलन - ‘मैं चल तो दूँ’ से ) (डॉ.) कविता वाचक्नवी |
आज दादी, चाचियों, बहना, बुआ ने चावलों से, धान से, भर थाल मेरे सामने ला कर दिया है, `मुठ्ठियाँ भर कर जरा कुछ जोर से पीछे बिखेरो और, पीछे मुड़, प्रिये पुत्री ! नहीं देखो', पिता बोले, अलक्षित। बाँह ऊपर को उठा दोनों रची मेहंदी हथेली से हाथ भर - भर दूर तक छिटका दिया है कुछ चचेरे औ’ ममेरे वीर मेरे झोलियों में भर रहे वे धान-दाने भीड़ में कुहराम, आँसू , सिसकियाँ हैं आँसुओं से पाग कर छितरा दिए दाने पिता! आँगन तुम्हारे रोपना मत सौंप कर मैं जा रही हूँ.......। *** |



