
घर : १० भाव चित्र
घर : दस भावचित्र
( कविता वाचक्नवी )
(1)
*
ये बया के घोंसले हैं,
नीड़ हैं, घर हैं- हमारे
जगमगाते भर दिखें
सो
टोहती हैं
केंचुओं की मिट्टियाँ
हम।
**********
(2)
*
आज
मेरी बाँह में
घर आ गया है
किलक कर,
रह रहे
फ़ुटपाथ पर ही
एक नीली छत तले।
*********
(3)
*
चिटखती
उन
लकड़ियों की गंध की
रोटी मिले
दूर से
घर लौटने को
हुलसता है
मन बहुत।
**********
(4 )
*
सपना था
काँच का
टूट गया झन्नाकर
घर,
किरचें हैं आँखों में
औ’
नींद नहीं आती।
*************
(5 )
*
जब
विवशता
हो गए संबंध
तो फिर घर कहाँ,
साँस पर
लगने लगे प्रतिबंध
तो फिर घर कहाँ?
***************
(6 )
*
अंतर्मन की
झील किनारे
घर रोपा था,
आँखों में
अवशेष लिए
फिरतीं लहरें।
*************
(7)
*
लहर-लहर पर
डोल रहा
पर
खेल रहा है
अपना घर,
बादल!
मत गरजो बरसो
चट्टानों से
लगता है डर।
************
(8 )
*
घर
रचाया था
हथेली पर
किसी ने
उँगलियों से,
आँसुओं से धुल
मेहँदियाँ
धूप में
फीकी हुईं।
************
(9 )
*
नीड़ वह
मन-मन रमा जो
नोंच कर
छितरा दिया
तुमने स्वयं
विवश हूँ
उड़ जाऊँ बस
प्रिय!
रास्ता दूजा नहीं।
***************
(10 )
*
साँसों की
आवाजाही में
महक-सा
अपना घर
वार दिया मैंने
तुम्हारी
प्राणवाही
उड़ानों पर।
(1)
*
ये बया के घोंसले हैं,
नीड़ हैं, घर हैं- हमारे
जगमगाते भर दिखें
सो
टोहती हैं
केंचुओं की मिट्टियाँ
हम।
**********
(2)
*
आज
मेरी बाँह में
घर आ गया है
किलक कर,
रह रहे
फ़ुटपाथ पर ही
एक नीली छत तले।
*********
(3)
*
चिटखती
उन
लकड़ियों की गंध की
रोटी मिले
दूर से
घर लौटने को
हुलसता है
मन बहुत।
**********
(4 )
*
सपना था
काँच का
टूट गया झन्नाकर
घर,
किरचें हैं आँखों में
औ’
नींद नहीं आती।
*************
(5 )
*
जब
विवशता
हो गए संबंध
तो फिर घर कहाँ,
साँस पर
लगने लगे प्रतिबंध
तो फिर घर कहाँ?
***************
(6 )
*
अंतर्मन की
झील किनारे
घर रोपा था,
आँखों में
अवशेष लिए
फिरतीं लहरें।
*************
(7)
*
लहर-लहर पर
डोल रहा
पर
खेल रहा है
अपना घर,
बादल!
मत गरजो बरसो
चट्टानों से
लगता है डर।
************
(8 )
*
घर
रचाया था
हथेली पर
किसी ने
उँगलियों से,
आँसुओं से धुल
मेहँदियाँ
धूप में
फीकी हुईं।
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(9 )
*
नीड़ वह
मन-मन रमा जो
नोंच कर
छितरा दिया
तुमने स्वयं
विवश हूँ
उड़ जाऊँ बस
प्रिय!
रास्ता दूजा नहीं।
***************
(10 )
*
साँसों की
आवाजाही में
महक-सा
अपना घर
वार दिया मैंने
तुम्हारी
प्राणवाही
उड़ानों पर।
(अपनी पुस्तक "मैं चल तो दूँ ", सुमन प्रकाशन, २००५, से )



