Wednesday, September 7, 2016

गगन गिल और अनिल जनविजय विवाद : कीचड़उछाल का खेल

गगन गिल और अनिल जनविजय विवाद  : कीचड़उछाल का खेल     - क. वा.


इधर कुछ दिनों से दो लोगों का एक व्यक्तिगत विवाद हिन्दी साहित्य से जुड़े लोगों की चर्चा के केंद्र में है और उसकी आग लगातार फ़ैल रही है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर #कीचड़ उछालने के खेल में रस ले-ले कर या बदले की भावना से तत्पर हो नित नए प्रहार कर रहे हैं और इस तरह वस्तुतः अपने आप को ही एक्सपोज़ कर रहे हैं और अपना स्तर गिराते-दिखाते जा रहे हैं। 


जो अनिल #जनविजय ने किया, वह गलत था और पहल उन्होंने ही की, जिसकी प्रतिक्रिया में #गगनगिल ने जो किया वह भी गलत ही था। एक व्यक्ति किसी की इज्जत उतारे तो वह गलत होता ही है, किन्तु बदले में हम उसकी इज्जत उतारते समय यह भूल जाएँ कि हमारी प्रतिक्रिया हमारा स्तर भी बताती है, यह तो कोई बात न हुई। 


दो लोगों के निजी संबंधों के चलते साहित्य से जुड़ा प्रत्येक व्यक्ति कटघरे में आ गया है,इसकी परवाह दोनों पक्षों में से किसी को नहीं रही। इक-दूजे के मान-सम्मान की धज्जियाँ उड़ाते समय अपने मान-सम्मान की धज्जियाँ और उड़ रही हैं, यह जब उनकी चिंता का विषय नहीं तो साधारण पाठक और दूसरे लोग क्यों और कब तक चिंतित हों ! 


दो लोग कीचड़ से खेल रहे हैं तो लथपथ होना स्वाभाविक है। जो निकट जाएगा, उस पर भी कीचड़ के कुछ न कुछ छींटे गिरेंगे ही। ऐसे में दोनों पक्षों के आत्मीय अपने पर कीचड़ गिरने का खतरा उठाते हुए भी उन्हें बचाने या साथ देने आगे बढ़ते हैं और कुछ-न-कुछ कीचड़ इस सहानुभूति के चलते वहन करते हैं। किन्तु बाकी बचे हुओं को उस कीचड़ में जाने की आवश्यकता क्यों है ? जो जितना कीचड़ से दूर रहकर बच सके उतना अच्छा है। 
यह कोई बड़ी सामाजिक नैतिकता और सामजिक मूल्यों या समाज-कल्याण की बात तो है नहीं कि हर किसी को लोक-कल्याण के लिए कीचड़ की परवाह न करते हुए भी उसमें कूदना-ही-कूदना है। 


इसलिए आवश्यक है कि किसी भी पक्ष की निंदा करने की अपेक्षा दोनों को शांत करने की और दूर हटाने की चेष्टा की जाए और उन्हें यह सन्मति और सलाह दी जाए कि इस कीचड़-उछाल में आपकी अपनी भी हानि ही हानि है। दूसरे पर कीचड़ उछाल कर आप दूध से धुले हुए निष्कलंक नहीं रह सकते। जितनी जल्दी जिसे समझ आ जाए और जो जितनी जल्दी इस से बचेगा उतना उसी का कल्याण है। 


दूसरे की गरिमा भंग करते समय व्यक्ति अपनी ही गरिमा से च्युत हो रहा होता है। हम तो इससे दूर रहने में ही सबका भला समझते हैं। जितने लोग अधिक जुड़ेंगे वे अपने-अपने पक्ष की हानि ही अधिक करेंगे, लाभ नहीं। सभी का दूर रहना और चुप रहना ही साहित्य और समाज के हित में है अन्यथा इस विकराल कीचड़-उछाल को और-और हवा-पानी मिल रहा है। 
यह कैसा प्रेम है, भई ?
- कविता वाचक्नवी 

Thursday, September 1, 2016

जूते वर्जित क्यों हैं

जूते वर्जित क्यों हैं :  क. वा.



दक्षिण-भारत में रहने वाले जानते हैं कि वहाँ लोग अपने व दूसरों के घरों के भीतर भी जूते नहीं ले कर जाते हैं। यदि पहनने ही हों तो घर के जूते अलग होते हैं जिन्हें भीतर ही पहना जाता है। इसके पीछे कारण यह है कि बाहर पहने जाने वाले जूतों में मल, मूत्र, थूक और इस बहाने जाने किस किस बीमारी के बैक्टीरिया घर व भवन के भीतर प्रवेश कर जाते हैं और अंदर / भीतर पनपने लगते हैं। खुले वातावरण में धूप आदि रहती है तो कुछ कीटाणु नष्ट भी होते हैं और खुले में अंकुश रखा भी नहीं जा सकता, सिवाय लोगों को यह समझाने के कि जगह जगह थूको / मूतो आदि मत / कूड़ा कबाड़ा न फेंको और न सड़ने दो। किन्तु घरों के भीतर छाया व बंद होने के कारण ऐसे कीटाणु दिन दूनी गति से पनपते हैं और बीमारियाँ फैलाते हैं। ऐसे में घरों की साफ सफाई दिन-भर / बार-बार / हर-बार करते रहना गृहिणी के लिए संभव ही नहीं होता। अतः सभी सामाजिक सदस्य अपने उत्तरदायित्व को समझ कर बाहर की गंदगी के संपर्क में आए जूते बाहर ही छोड़ देते हैं, बहुधा परिवारों में तो शौचालय के जूते भी अलग होते हैं। इसके पीछे बड़ा वैज्ञानिक रहस्य है कोई कठमुल्लापन नहीं। जिन स्थानों को हम शुद्ध देखना चाहते हैं, वहाँ ऐसा करते हैं। जापान में आज भी ऐसा ही होता है।  



मन की बात, तो मन कोई पदार्थ नहीं है जो कक्ष अथवा भवन में कीटाणु ले आएगा। वह तो यदि व्याधि वाले कीटाणुओं / विषाणुओं जैसे दोष से भरा है तो उसकी शुद्धि के तरीके अलग हैं, वह भले बाहर हो या भवन के भीतर बराबर बीमार करेगा। दूसरों को बीमार करने से पहले खुद अपने मालिक को ही। उसे शोध न सकने वाले को दूसरों को शारीरिक रूप से बीमार करने की अनुमति दे दी जाए यह उचित तो नहीं। न उस पर अंकुश लगाना संभव है। परंतु जितना अंकुश संभव है, उतना करना कोई अपराध नहीं।


शायद कुछ ने वह ज़माना देखा होगा जब ऑफिस के कंप्यूटर हॉल में जूते उतार कर जाना पड़ता था, क्योंकि उस समय के सिस्टम धूल आदि में तुरंत ठप्प पड़ जाते थे। आज यद्यपि कंप्यूटर सिस्टम काफी हद्द तक रफ इस्तेमाल करने योग्य हो गए हैं किन्तु अभी भी सेंसेटिव उत्पाद यथा ऑडियो स्टूडिओ, रोगियों के लिए बने विशेष यंत्रादि कक्ष व कई बार रोगी का विशेष (इंटेसिव केयर ) कक्ष आदि इस नियम का अनुपालन करते हैं। आजकल विकसित पाश्चात्य देशों में डिस्पोज़ेबल 'शू-कवर' भी होते हैं। मेरे अपने ही घर में प्रवेशद्वार पर रखे रहते हैं, हैंडीमैन, बिजलीवाला या कामगार आदि जिन्हें सुरक्षा कारणों से जूते पहने हुए ही रहना होता है, वे जब घर के भीतर आते हैं तो अपने जूतों पर उन्हें पहन लेते हैं और फिर शू-कवर को फेंक दिया जाता है। पुरातन समय में दरवाजे पर हल्दी की रंगोली और गोबर से लीपना प्राकृतिक कीटाणुनाशक विधि ही थी। हम परम्परा की वैज्ञानिकता को भूल कर पोंगापंथी मात्र बन गए, जिसका परिणाम यह निकला कि जो कुछ पारम्परिक है,वह सब त्याज्य है और उसे गाली दी जानी चाहिए का अधिकार तथाकथित आधुनिकों को दे दिया। #KavitaVachaknavee
(ये विचार वर्ष २०१२ में किसी प्रसंग में व्यक्त किए थे)
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