Monday, September 30, 2013

फेसबुक तथा सोशल मीडिया के शिष्टाचार : कविता वाचक्नवी

फेसबुक तथा सोशल मीडिया के शिष्टाचार  :  कविता वाचक्नवी


छुट्टी के दिन सुबह पाँच बजे मेरे मोबाईल में चैटिंग के लिए इनबॉक्स में अवतरित हुए एक मित्र को कहना पड़ा कि भई अभी यहाँ सुबह के पाँच बजे हैं और यात्रा पर निकलना है, इसी कारण मैंने इतनी तड़के उठ कर अपना मोबाईल ऑन किया है, अभी बात नहीं कर सकती। यह एक दिन नहीं बल्कि हर दिन होता है कि किसी-न-किसी को कहना पड़ता है।


मैं ( व पूरा परिवार) अपना मोबाईल रात में सोते समय या तो 'ऑफ' कर देती हूँ या 'फ्लाईट मोड' पर डाल देती हूँ, ताकि परिवार की नींद में कोई व्यवधान न डाले। सुबह नींद टूटने या उठने पर उसे 'ऑन' करती हूँ। उसे 'ऑन' करते ही संभवतः सबको ऐसा प्रतीत होता है कि मैं ऑनलाईन बैठी हूँ और लोग चैटिंग करने लग जाते हैं। मुझे बड़ा संकोच होता है कि उत्तर न देने पर अगला बुरा मान जाएगा, अतः अधमुँदी आँखों और दिनचर्या व घर के कामों की बजाय सब कुछ छोड़ कर उन्हें उत्तर देना पड़ता है। बहुत असुविधा होती है। ऐसे मित्रों से निवेदन है कि यदि सामने वाला आपको ऑनलाईन उपलब्ध दीख रहा है और हरी बत्ती भी जलती रही दीख रही है, तब भी आवश्यक नहीं कि वह ऑनलाईन हो ही। हम लोग रात्रि सोने के अतिरिक्त शेष पूरा समय ऑनलाईन दिखाई देते हैं क्योंकि मोबाईल सदा ही 3G+ या वाईफ़ाई में होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर समय फेसबुक या चैट पर समाधि जमाए बैठे हैं। इसलिए यदि कोई विशेष बात न हो तो यों ही इनबॉक्स में सन्देश भेजते रहना अच्छी बात नहीं है। या यदि कोई बहुत आवश्यक बात हो भी व सन्देश भेज ही दिया तो उत्तर की तुरन्त आशा न किया करें। 


दूसरी बात यह भी ध्यान रखनी चाहिए कि यहाँ ब्रिटेन का समय भारत से साढ़े पाँच घंटे पीछे है। जरा यह सोच-समझ लिया करें कि इस समय मेरे यहाँ क्या समय होगा। क्या उस समय किसी मित्र से व्यक्तिगत सन्देशों का आदान-प्रदान/चैटिंग उचित भी है या नहीं। उसके कामों में व्यवधान तो नहीं डाल रहे हम। आज के आधुनिक समय में ऐसा करके अपने को कितना नासमझ और मूर्ख प्रमाणित करते हैं। 


और तीसरी बात, मुझे शाम छह /सात बजे से अगली प्रातः 10 बजे तक किसी से बात करने में कोई रुचि नहीं होती है। मैं अपने परिवार के साथ व्यस्त भी होती हूँ और शाम के बाद किसी से व्यक्तिगत बातचीत व सन्देश आदि भेजने को उचित नहीं समझती हूँ। वह मेरा निजी पारिवारिक समय होता है, उसमें मैं ऑनलाईन तो हूँ, मध्यरात्रि तक नेट पर काम भी करती हूँ किन्तु व्यक्तिगत वार्तालाप में उलझने में कतई रुचि नहीं। इसलिए कृपया मुझ से व्यक्तिगत वार्तालाप करते समय इन बातों का ध्यान रखें। 


अपनी ओर से मैं बहुत ही आवश्यक होने पर वार्तालाप प्रारम्भ करती हूँ। कोई व्यक्तिगत सन्देश देना हो तो वह सन्देश इनबॉक्स में छोड़ देती हूँ, वार्तालाप करना उसका उद्देश्य कदापि नहीं होता, अपितु ईमेल की भाँति सन्देश भेजना ही उद्देश्य होता है। इसलिए जब आपको कोई आवश्यक सन्देश मुझे भेजना हो तो अपना सन्देश इनबॉक्स में छोड़ दें। मुझसे वार्तालाप की आशा न करें। न ही अपनी रचनाओं को पढ़ने के लिए बार-बार पुकार लगाएँ। अपने पटल (वॉल) पर या अपने ग्रुप्स पर इसकी सूचना दें। निजी रूप में  अपनी रचनाओं के लिए बुलाने वालों का सम्मान मेरी दृष्टि में बहुत ही कम हो जाता है, प्रत्येक की दृष्टि में कम होता है; इसलिए अपने मान-सम्मान की कीमत पर अपनी रचना के लिए पाठक न बटोरें। 


कुछ इसी विषय पर मैंने एक बार पहले भी अपने नोट्स में लिखा था, उसे भी एक बार यहाँ क्लिक कर पढ़ा जा सकता है -   आधी रात के असमय कष्ट

सामाजिकता के जिन सामान्य शिष्टाचारों का पालन समाज में आवश्यक व अपेक्षित होता है, वे सब शिष्टाचार व मर्यादाएँ सोशल नेटवर्किंग में भी आवश्यक होती हैं। यह ध्यान बना रहे तो सोशल नेटवर्किंग सबके लिए लाभकारी बनी रहेगी। 

Thursday, September 26, 2013

पितर, श्राद्ध और विधि

पितर, श्राद्ध और विधि  :   कविता वाचक्नवी


'श्राद्ध' शब्द बना है 'श्रद्धा' से। 'श्रद्धा' शब्द की व्युत्पत्ति 'श्रत्' या 'श्रद्' शब्द से 'अङ्' प्रत्यय की युति होने पर होती है, जिसका अर्थ है- 'आस्तिक बुद्धि। ‘सत्य धीयते यस्याम्’ अर्थात् जिसमें सत्य प्रतिष्ठित है। 
छान्दोग्योपनिषद् 7/19 व 20 में श्रद्धा की दो प्रमुख विशेषताएँ बताई गई हैं - मनुष्य के हृदय में निष्ठा / आस्तिक बुद्धि जागृत कराना व मनन कराना।


मनुष्य समाज की समस्या यह है कि वह दिनों-दिन विचार और बुद्धि के खेल खेलने में तो निष्णात होता जा रहा है, किन्तु श्रद्धा का अभाव उसके जीवन को दु:ख और पीड़ा से भरने का बड़ा कारक है। विचार के बिना श्रद्धा पंगु है व श्रद्धा तथा भावना के बिना विचार । वह अंध-श्रद्धा हो जाती है क्योंकि विवेक के अभाव में यही पता नहीं कि श्रद्धा किस पर व क्यों लानी है या कि उसका अभिप्राय क्या है। इसीलिए ध्यान देने की आवश्यकता है कि मूलतः श्रद्धा का शाब्दिक अर्थ हृदय में निष्ठा व आस्तिक बुद्धि है..... बुद्धि के साथ श्रद्धा। 


यह तो रही 'श्राद्ध' के अर्थ की बात। पितरों से जोड़ कर इस शब्द की बात करें तो उनके प्रति श्रद्धा, कुल- परिवार व अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, अपनी जातीय-परम्परा के प्रति श्रद्धा, माता-पिता-आचार्यों के प्रति श्रद्धा की भावना से प्रेरित होकर किए जाने वाले कार्यों को 'श्राद्ध' कहा जाता है। यदि हमने अपने घर-परिवार व समाज के जीवित पितरों व माता-पिता के शारीरिक-मानसिक-आत्मिक सुख की भावना से कुछ नहीं किया तो मृतक पितरों के नाम पर भोजन करवाने मात्र से हमारे पितरों की आत्मा शान्ति नहीं पाएगी। न ही पितर केवल भोजन के भूखे होते हैं। वे अपने कुल व सन्तानों में वे मूलभूत आदर्श देखने में अधिक सुख पाते हैं जिसकी कामना कोई भी अपनी सन्तान से करता है । इसलिए यदि हम में वे गुण नहीं हैं व हम अपने जीवित माता-पिता या बुजुर्गों को सुख नहीं दे सकते तो निश्चय जानिए कि तब श्राद्ध के नाम किया जाना वाला सारा कर्मकाण्ड तमाशा-मात्र है। 


संस्कृत न जानने वालों को बता दूँ कि 'पितर' शब्द संस्कृत के 'पितृ' से बना है जो पिता का वाचक है, किन्तु माता व पिता (पेरेंट्स) के लिए संस्कृत में 'पितरौ' शब्द है। इसी से हिन्दी में 'पिता' व जर्मन में 'Vater' (जर्मन में 'V' का उच्चारण 'फ' होने से उच्चारण है 'फाटर' ) शब्द बना है व उसी से अङ्ग्रेज़ी में 'फादर' शब्द बना। संस्कृत में 'पितरौ" क्योंकि माता व पिता (अर्थात् 'पेरेंट्स' ) का वाचक है तो जर्मनी में इसीलिए 'पितर' शब्द के लिए 'Manes' (उच्चारण कुछ-कुछ मानस शब्द जैसा) शब्द कहा जाता है जबकि इसी से अङ्ग्रेज़ी में शब्द बना Manes (उच्चारण मैनेस् )। 'माँ' से इसकी उच्चारण व वर्तनी साम्यता देखी-समझी जा सकती है।


समस्या यह है कि श्राद्ध को लोग कर्मकाण्ड समझते व करते हैं और वैसा कर वे अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। जबकि मृतक पितरों के नाम पर पूजा करवा कर यह समझना कि किसी को खाना खिलाने से उन तक पहुँच जाएगा, यह बड़ी भूल है। जीवित पितरों को सुख नहीं दो व मृतक पितरों के नाम पर कर्मकाण्ड करना ही गड़बड़ है। कर्मकाण्ड श्राद्ध नहीं है। कोई भी कर्मकाण्ड मात्र प्रतीक-भर है मूल जीवन में अपनाने योग्य किसी भी संस्कार का। यदि जीवन में उस संस्कार को आचरण में नहीं लाए तो कर्मकाण्ड केवल तमाशा है। घरों परिवारों में बुजुर्ग और बड़े-बूढ़े दु:ख पाते रहें, उनके प्रति श्रद्धा का वातवरण घर में लेशमात्र भी न हो और हम मृतक पितरों को जल चढ़ाते रहें, तर्पण करते रहें या उनके नाम पर श्राद्ध का आयोजन कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझते रहें, इस से बड़ा क्रूर व हास्यास्पद पाखण्ड और क्या होगा।


वस्तुतः मूल अर्थों में श्राद्ध, श्रावणी उपाकर्म के पश्चात् अपने-अपने कार्यक्षेत्र में लौटते समय वरिष्ठों आदि के अभिनंदन सत्कार के लिए होने वाले आयोजन के निमित्त समाज द्वारा प्रचलित परम्परा थी, जिसका मूल अर्थ व भावना लुप्त होकर यह केवल प्रदर्शन-मात्र रह गई है। मूल अर्थों में यह 'पितृयज्ञ' का वाचक है व उसी भावना से इसका विनियोग समाज ने किया था, इसीलिए इसे पितृपक्ष भी कहा जाता है; किन्तु अब इसे नेष्ट, कणातें, अशुभ, नकारात्मक दिन, शुभकार्य प्रारम्भ करने के लिए अपशकुन आदि मान लिया गया है। हमारे पूर्वजों से जुड़ा कोई दिन अशुभ कैसे हो सकता है, नकारात्मक प्रभाव कैसे दे सकता है, अपशकुन कैसे कर सकता है ? क्या हमारे पूर्वज हमारे लिए अनिष्ट चाह सकते हैं ? क्या किसी के भी पूर्वज उनके लिए अशुभकारी हो सकते हैं? माता-पिता के अतिरिक्त संसार में कोई भी अन्य सम्बन्ध केवल और केवल हितकारी व निस्स्वार्थ नहीं होता। सन्तान भी माता-पिता का वैसा हित कदापि नहीं चाह सकती जैसा माता-पिता अपनी संतान के लिए स्वयं हानि, दु:ख व निस्स्वार्थ बलिदान कर लेते हैं, उसे अपने से आगे बढ़ाना चाहते हैं, उसे अपने से अधिक पाता हुआ देखना चाहते हैं और ऐसा होता देख ईर्ष्या नहीं अपितु सुख पाते हैं। ऐसे में 'पितृपक्ष' (पितृयज्ञ की विशेष अवधि) को नकारात्मक प्रभाव देने वाला मानना कितना अनुचित व अतार्किक है। 


आज समाज में सबसे निर्बल व तिरस्कृत कोई हैं, तो वे हैं हमारे बुजुर्ग। वृद्धाश्रमों की बढ़ती कतारों वाला समाज श्राद्ध के नाम पर कर्मकाण्ड कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ले तो यह भीषण विडम्बना ही है। यदि हम घर परिवारों में उन्हें उचित आदर-सत्कार, मान-सम्मान व स्नेह के दो बोल भी नहीं दे सकते तो श्राद्ध के नाम पर किया गया हमारा सब कुछ केवल तमाशा व ढोंग है। यों भी वह अतार्किक व श्राद्ध का गलत अभिप्राय लगा कर किया जाने वाला कार्य तो है ही। जब तक इसका सही अर्थ समझ कर इसे सही ढंग से नहीं किया जाएगा तब तक यह करने वाले को कोई फल नहीं दे सकता (यदि आप किसी फल की आशा में इसे करते हैं तो)। वैसे प्रत्येक कर्म अपना फल तो देता ही है और उसे अच्छा किया जाए तो अच्छा फल भी मिलता ही है। 


मृतकों तक कोई सन्देश या किसी का खाया भोजन नहीं पहुँचता और न ही आपके-हमारे दिवंगत पूर्वज मात्र खाने-पीने से संतुष्ट और सुखी हो जाने वाले हैं। भूख देह को लगती है, आत्मा को यह आहार नहीं चाहिए। मृतक पूर्वजों को भोजन पहुँचाने ( जिसकी उन्हें आवश्यकता ही नहीं) से अधिक बढ़कर आवश्यक है कि भूखों को भोजन मिले, अपने जीवित माता पिता व बुजुर्गों को आदर सम्मान से हमारे घरों में स्थान, प्रतिष्ठा व अपनापन मिले, उन्हें कभी कोई दुख सन्ताप हमारे कारण न हो। उनके आशीर्वादों के हम सदा भागी बनें और उनकी सेवा में सुख पाएँ। किसी दिन वृद्धाश्रम में जाकर उन सबको आदर सत्कार पूर्वक अपने हाथ से भोजन करवा उनके साथ समय बिताकर देखिए... कितने आशीष मिलेंगे। परिवार के वरिष्ठों व अपने माता-पिता आदि की सेवा सम्मान में जरा-सा जुट कर देखिए, कैसे घर पर सुख सौभाग्य बरसता है। 


श्राद्ध के माध्यम से मृतकों से तार जोड़ने या आत्माओं से संबंध जोड़ने वाले अज्ञानियों को कौन बताए कि पुनर्जन्म तो होता है, विज्ञान भी मानता है; किन्तु यदि इन्हें आत्मा के स्वरूप और कर्मफल सिद्धान्त का सही-सही पता होता तो ये ऐसी बात नहीं करते। आत्मा का किसी से कोई रिश्ता नहीं होता, न आप हम उसे यहाँ से संचालित कर सकते हैं। प्रत्येक आत्मा अपने देह के माध्यम द्वारा किए कर्मों के अनुसार फल भोगता है और तदनुसार ही अगला जीवन पाता है । आत्मा को 'रिमोट ऑपरेशन' से 'कंट्रोल' करने की उनकी थ्योरी बचकानी, अतार्किक व भारतीय दर्शन तथा वैदिक वाङ्मय के विरुद्ध है।


अभिप्राय यह नहीं कि श्राद्ध गलत है या उसे नहीं करना चाहिए। वस्तुतः तो जीवन ही श्राद्धमय हो जाए तब भी गलत नहीं, अपितु बढ़िया ही है। वस्तुत: इस लेख का मूल अभिप्राय यह है कि श्राद्ध क्या है, क्यों इसका विधान किया गया, इसके करने का अर्थ क्या है, भावना क्या है आदि को जान कर इसे करें। श्राद्ध के नाम पर पाखण्ड व ढकोसला नहीं करें अपितु सच्ची श्रद्धा से कुल- परिवार व अपने पूर्वजों के प्रति, अपनी जातीय-परम्परा के प्रति, माता-पिता-आचार्यों के प्रति, समाज के बुजुर्गों व वृद्धों के प्रति श्रद्धा की भावना से प्रेरित होकर अपने तन, मन, धन से तथा निस्स्वार्थ व कृतज्ञ भाव से जीवन जीना व उनके ऋण को अनुभव करते हुए पितृयज्ञ की भावना बनाए रखना ही सच्चा श्राद्ध है। 




Monday, September 9, 2013

ब्रिटेन में आय / कमाई के औसत आंकड़े

ब्रिटेन में आय / कमाई के औसत आंकड़े (गत वर्ष के आकलन के आधार पर) -
स्रोत - याहू से प्राप्त आंकड़ों का अनुवाद  (By कविता वाचक्नवी) 

(कुछ समय से ब्रिटेन के अर्थतन्त्र ( अर्थव्यवस्था)  पर एक लेख लिख रही हूँ, ये आंकड़ें व तथ्य उसी लेख का एक हिस्सा हैं) 


नल आदि ठीक करने वाले (प्लम्बर) की -  न्यूनतम  £27,866   -  अधिकतम  £50,000

बस ड्राईवर - £22,701 (वार्षिक)

ट्राम व ट्रेन ड्राईवर - £44,617 (वार्षिक)

सेक्रेटरी आदि  - £20,474 and £18,866 (मेडिकल व लीगल वालों की इससे अपवाद हैं, जबकि व्यक्तिगत पीए £24,067 तक भी कमा पाते हैं)।(वार्षिक)

बहुराष्ट्रीय कंपनियों में सेक्रेटरी  -  £50,000 (वार्षिक)

सामान्यतः प्रकाशित होने वाला लेखक - £5,000 (J. K. Rowling जैसे लेखक इसके एकमात्र ढंग के अपवाद हैं जो £560 मिलियन तक कमा लेते हैं) (वार्षिक)

दिन में चौदह घंटे काम करने वाले टीवी के कलाकार -  £30,500 (एक पूरी शृंखला के लिए)

 टीवी कार्यक्रमों में सिलेब्रिटी जज आदि £110,000 से £550,000 (त्रैमासिक) व कुछ अति विशिष्ट सिलेब्रिटी £850,000 (पूरी सीरीज़)

प्रधानमंत्री - £142,500 (वार्षिक)

काऊन्सिल के 2,525 कर्मचारी - £100,000 से अधिक (वार्षिक)

42 स्थानीय संकाय-कर्मचारी -£250,000  से अधिक (वार्षिक)

राष्ट्रीय स्वास्थ्य परियोजना (NHS) के लगभग 8,000 कर्मचारियों को गत वर्ष (डॉक्टर स्तर) £340,000 वार्षिक (प्रति व्यक्ति) का भुगतान हुआ

वार्ड नर्स - £21,000 (वार्षिक)

गॉर्डन ब्राऊन ने अपने संसदीय दायित्वों से इतर कार्यों (भाषणों व लेखन) द्वारा £1.37m कमाए (गत वर्ष)

पद निवृत्ति के पश्चात् टोनी ब्लेयर ने निजी व्यापारिक रुचियों आदि से £20 मिलियन कमाए (गत वर्ष)

स्रोत - याहू से प्राप्त आंकड़ों का अनुवाद  (By कविता वाचक्नवी) 

Tuesday, September 3, 2013

'हाशिये उलाँघती स्त्री' .... व आप और मैं

'हाशिये उलाँघती स्त्री' .... व आप और मैं 
http://vaagartha.blogspot.com/2013/09/Indian-women-fiction-writers-and-a-historical-collection-of-their-stories-in-25-volumes.html


वर्ष 2008 में रमणिका गुप्ता जी ने 'युद्धरत आम आदमी' के "हाशिये उलाँघती स्त्री" विशेषांक की योजना का सूत्रपात किया था। जिसके अन्तर्गत सभी भारतीय भाषाओं की महिला रचनाकारों की स्त्रीविमर्श विषयक रचनाओं के संकलन की योजना थी, जिसे 'रमणिका फाऊण्डेशन' द्वारा काव्य-संकलन और कहानी-संकलन के रूप में छपना था। काव्य संकलन तो दो भागों में 26 मार्च 2011 को लोकार्पित हो गया था (यहाँ विस्तार से देखें - http://vaagartha.blogspot.co.uk/2011/12/blog-post_9899.html


... किन्तु कहानी संकलन का काम अब पूरा हुआ है।
यह कहानी संकलन कुल लगभग 25 खण्डों में आएगा व इसमें कुल 23 भाषाओं की महिला कथाकारों की कहानियाँ सम्मिलित हैं।  इसके प्रारम्भिक (भारत की हिन्दी कहानी) के तीन खण्डों का प्रकाशन हो चुका है और इनका लोकार्पण 11 सितम्बर को साहित्य अकादमी, दिल्ली में हो रहा है। शेष लगभग 20-22 खण्ड भी धीरे-धीरे एक-एक कर शीघ्र ही पाठकों के हाथ में होंगे। अच्छी बात यह भी है कि काव्य की तरह इस कहानी अंक में भी रचनाओं का क्रम रचनाकारों की जन्मतिथि के क्रम से रखा गया है। यथा भारत की हिन्दी कहानी के इन 3 खण्डों को 'कोठी में धान' नामक पहले खण्ड में 8 दिवंगत रचनाकार और तथा 1947 से पहले जन्मी रचनाकार सम्मिलित हैं। दूसरे खण्ड 'खड़ी फसल' में 1948 से लेकर 1964 तक जन्मी (36)  कथाकार सम्मिलित हैं व  तीसरे खण्ड 'नयी पौध' में 1965 वर्ष से लेकर 1984 तक जन्मी (33) युवा कथाकारों की कहानियाँ सम्मिलित हैं।


इस ऐतिहासिक महायोजना की मुख्य सम्पादक रमणिका दीदी है व सह संपादक हैं अर्चना वर्मा जी। कविता व कहानी वाले दोनों संकलनों में रचनाकार के रूप में तो मैं यद्यपि हूँ ही किन्तु मेरे लिए और सुखद बात यह भी है कि इसके विदेश / प्रवासी वाले खण्ड की सम्पादक के रूप में भी मुझे इस से जुड़ने का सौभाग्य मिला है; यह अवसर मेरे लिए एक ऐतिहासिक अनुभव व घटना है। यह अवसर उपलब्ध करवाने के लिए मैं रमणिका दीदी के प्रति कृतज्ञ हूँ; यद्यपि उनका आत्मीय स्नेह तो मैं लंबे अरसे से लेती आ ही रही हूँ । 


प्रवासी / विदेश वाले खण्ड के लोकार्पण में यद्यपि मुझे निस्संदेह उपस्थित रहना था, तदनुसार ही जनवरी 2014 में प्रवासी सम्मेलन में उसके लोकार्पण की योजना भी बना ली थी, किन्तु किन्हीं अपरिहार्य स्थितियों के कारण मेरा भारत जाना गत वर्ष से सम्भव ही नहीं हो पा रहा है। फिलहाल शायद जनवरी 2014 में लोकार्पण पर भी मैं उपस्थित न हो पाऊँ। ... इसका मलाल मन पर हावी है। 


जिन-जिन लेखिकाओं की रचनाएँ इसमें सम्मिलित हैं वे अपनी लेखकीय प्रति लोकार्पण के समय स-सम्मान प्राप्त करना चाहें व लोकार्पण के ऐतिहासिक अवसर पर सम्मिलित होना चाहें तो जनवरी में भारत जाने का कार्यक्रम बनाएँ। तिथियों की सूचना अलग से दूँगी। यदि भाग लेने के / की इच्छुक हैं तो सम्पर्क बनाए रखें
 जो लेखिकाएँ भाग नहीं ले सकेंगी वे भी कृपया सूचित करें ताकि उनकी लेखकीय प्रति भिजवाने की व्यवस्था तब की जा सके। ​


  



Sunday, September 1, 2013

सहजीवन, ‘को-हैबिटेशन’, ‘लिविंग टुगेदर’ और सम्बन्धों के ताने-बाने

सहजीवन, ‘को-हैबिटेशन’, ‘लिविंग टुगेदर’ और सम्बन्धों के ताने-बाने  : कविता वाचक्नवी

एक पत्रिका द्वारा आयोजित 'परिचर्चा' हेतु उनके प्रकाश्य विशेषांक (अक्तूबर 2013)  में 'लिव इन रिलेशनशिप' पर अपने विचार संक्षेप में लिख कर  देने को कहा गया; तो 18-19 अगस्त को उनके लिए जो लिखा उसे 'जनसत्ता' में भी प्रकाशनार्थ भेज दिया। आज वह लेख जनसत्ता (रविवार 1 सितंबर 2013) के 'रविवारी' में प्रकाशित हुआ है।

मूल लेख व 'जनसत्ता' में प्रकाशित लेख को नीचे एक साथ देखा जा सकता है।
लेख की क्लिपिंग व उस पर आई टिप्पणियाँ देखने के इच्छुक यहाँ देख सकते हैं -




बिना वैधानिक विवाह के स्त्री पुरुष का जोड़े के रूप में स्थायी तौर पर या लंबी अवधि के लिए साथ रहने लगना 'सहजीवन' कहा जाता है। यद्यपि अंग्रेज़ी में इस प्रकार के सम्बन्ध को Cohabitation कहा जाता है अथवा Living together, किन्तु भारत में इसके लिए प्रचलित शब्द 'लिव इन रिलेशनशिप' हो गया है जो यद्यपि अर्थ में त्रुटिपूर्ण है किन्तु अब रूढ़ जैसा है। 


वस्तुतः विवाह सभी सभ्य समाजों की बहुत गहराई से सोची समझी व गढ़ी गई संकल्पना/संस्था है, जिसका उद्देश्य स्त्री और पुरुष को पूरक देने की अपेक्षा बच्चों को सुरक्षा देना अधिक था; किन्तु विवाह नामक संस्था की आड़ में निरन्तर होते घातों-प्रतिघातों के चलते समाज ने इसके लिए विकल्प तलाशने प्रारम्भ किए और आधुनिकता के साथ-साथ पश्चिमी जगत की देखा-देखी भारत में भी इस प्रकार के सम्बन्धों के आंकड़े बढ़ने लगे हैं। यद्यपि ध्यान देने की बात यह है कि पश्चिम के आधुनिक समाजों में लगभग 70% जोड़े सहजीवन को विवाह की ओर बढ़ने के लिए उठाया गया एक कदम ही मानते हैं। इसे आप यों भी समझ सकते हैं कि वे विवाहपूर्व साथ-साथ रहना प्रारम्भ कर देते हैं और यह अवधि कई बार 2-4-8-10 साल से भी अधिक लंबी खिंच जाती है व साथ ही कई बार इसी अवधि में जोड़े को यह समझ आ जाता है कि वे साथ नहीं निभा सकते तो वे अलग भी हो जाते हैं और तब नए साथी के साथ यही प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। जब दोनों एक दूसरे के प्रति व अपने सम्बन्ध के स्थायित्व के प्रति आश्वस्त हो जाते हैं तब इस प्रकार के सहजीवन की परिणति ही उनके जीवन में विवाह के रूप में होती है। तो कुल मिलाकर पहली बात यह कि इस प्रकार के सम्बन्धों की अंतिम परिणति के रूप में विवाह की अनिवार्यता ज्यों की त्यों बनी हुई है व दूसरी बात यह कि इन सम्बन्धों में रहने वाले 80 प्रतिशत जोड़े इस सम्बन्ध को किसी स्थायी सम्बन्ध के निर्णय की प्रक्रिया / दिशा में बढ़ने के लिए उठाए गए कदम की भाँति अपनाते हैं। यह स्थिति उन समाजों की है जहाँ इस प्रकार के सम्बन्धों का सूत्रपात लगभग 30-35 वर्ष पहले से हो गया था व जिन समाजों में इसे गलत, निंदनीय, त्याज्य, गर्हित, वर्जित अथवा अजूबा आदि कुछ भी नहीं समझा जाता। 


मैंने वर्ष 95 में जब नॉर्वे (स्केंडेनिवियन देश) में रहना प्रारम्भ किया तो प्रारम्भ में बहुत आश्चर्य होता था जब 70 या 80 बरस के जोड़े को विवाह बन्धन में बंधते देखती थी, किन्तु धीरे धीरे स्पष्ट होता गया कि अत्याधुनिक समाजों में भी (स्केन्डेनेवियन देश अमेरिका व योरोप की तुलना में भी अग्रणी आधुनिक देश माने जाते हैं) (1) विवाह की अनिवार्यता ज्यों की त्यों बनी हुई है व (2) सहजीवन सम्बन्ध-प्रक्रिया की पूर्णता नहीं है। 


भारत में सामाजिक संरचना, वैधानिक स्थिति, आर्थिक व्यवस्था व समाज मनोविज्ञान आदि कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिनके कारण इस प्रकार के सम्बन्ध व उनसे प्राप्त आँकड़े ( यद्यपि अभी आंकड़े बन सकने की स्थिति का प्रारम्भिक चरण भी नहीं है ) कभी भी इस प्रकार के सम्बन्धों की सही गवेषणा तक नहीं पहुँचने देंगे किन्तु फिर भी भारत के आधुनिक नगरों में कई जोड़े साथ बसने लगे हैं, जिस कारण कई संवैधानिक परिवर्तन भी गत दिनों किए गए; जिनका मूल उद्देश्य मूलत: बच्चों व साथ ही स्त्री को सुरक्षा देते हुए उनके अधिकार सुनिश्चित करना है। जिन अत्याधुनिक देशों की देखा-देखी ऐसे सम्बन्धों का चलन प्रारम्भ हुआ है उन देशों में बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए पूरा का पूरा देश किस प्रकार कटिबद्ध है इसकी कल्पना भी भारत में नहीं की जा सकती, यद्यपि पिछले वर्ष एक दो घटनाएँ भारतीय बच्चों के सम्बन्ध में नॉर्वे में घटित होने से भारत के लोगों को कुछ अनुमान हो गया होगा किन्तु अधिकांश भारतीय ऐसी घटनाओं में नॉर्वे की ही आलोचना करते दीखे हैं, क्योंकि वे नहीं जानते कि नॉर्वे जैसा देश बच्चों के भविष्य को लेकर कैसा व कितना सम्वेदनशील है। 


किसी भी स्त्री पुरुष का विवाह के बिना साथ-साथ रहने लगना तब तक अविवेकी निर्णय ही कहा जाएगा जब तक वे इन सम्बन्धों से होने वाली सन्तान के विषय में सही निर्णय नहीं करते अथवा वे उन बच्चों के सही सामाजिक अधिकार, सुरक्षा व सम्मानजनक स्थिति के प्रति सुनिश्चित नहीं होते। भारत में अधिकांशतः ऐसे सम्बन्धों से होने वाली सन्तानों व ऐसे सम्बन्ध टूटने पर उस जोड़े से अलग हुई स्त्री के प्रति समाज का दृष्टिकोण सम्मानजनक होना तो दूर की बात है, लगभग अपमानजनक व घृणा के स्तर तक का है । ऐसे में किसी भी जोड़े का इस दिशा में आगे बढ़ते हुए साथ रहने लगना बहुत-सी चुनौतियों का कारक है। जिन समृद्ध आधुनिक देशों में व्यवस्था, समाज व संविधान स्त्री व बच्चों के प्रति बराबर व उदार हैं उन देशों में भी ऐसे सम्बन्धों से होने वाले बच्चों का भविष्य स्वस्थ गृहस्थों के बच्चों की तुलना में बहुत अंधकारमय पाया गया है। लघु आकार व कलेवर के इस लेख में मैं वे सब आंकड़े रख सकने की छूट नहीं ले सकती जिन्हें प्रस्तुत कर इन सम्बन्धों से जनित पारिवारिक व सामाजिक समस्याओं की भयावहता की बात बताई जा सके। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि यदि विवाह संस्था में आई खामियों के कारण या उसे त्रुटिहीन बनाने के लिए उसके विकल्प के रूप में इस विकल्प को चुना जाता है तो इस विकल्प की भी अपनी चुनौतियाँ, खामियाँ, समस्याएँ व दुष्परिणाम हैं, जो अधिक विकराल हैं। ऐसे में विवाह का यह विकल्प सही विकल्प कैसे कहा जा सकता है व कैसे चयनयोग्य हो सकता है, इस पर विचार कर लेना अनिवार्य है ; क्योंकि भारत के संदर्भ में तो समस्याएँ, चुनौतियाँ व दुष्परिणाम कहीं और भी अधिक बड़ी मात्रा में होने वाले हैं।




Related Posts with Thumbnails

Followers