Monday, December 24, 2012

स्त्री, यौन-हिंसा व समाज : कविता वाचक्नवी

स्त्री, यौन-हिंसा व समाज  : कविता वाचक्नवी  







बलात्कारों के विरुद्ध इतने हंगामे और विरोध के बीच भी गत सप्ताह-भर में कितने बलात्कार भारत में हुए हैं, इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि प्रति २० मिनट पर एक स्त्री बलात्कार की शिकार होती है भारत में. यह केवल दर्ज अपराधों का आंकड़ा है. अतः वास्तव में यह दर क्या होगी, इसकी कल्पना से रोंगटे खड़े हो जाएँगे ३, ५ व ८ वर्ष की बच्ची से तो आगामी दिन ही बलात्कार की सूचना समाचारपत्रों में थी. 


इसी बीच इम्फाल में १८ दिसंबर को ही एक २२ वर्ष की अभिनेत्री व मॉडल Momoko को भरी भीड़ में से खींच कर उसके साथ यौनिक व्यभिचार के लिए ले जाया गया . इसके विरुद्ध सड़कों पर विरोध के लिए उतरी भीड़ पर पुलिस द्वारा चलाई गयी गोली से दूरदर्शन के एक पत्रकार मारे गए हैं.


इस बार की दिल्ली की यह दुर्घटना छोड़ दें तो इस से पूर्व जब-जब भी महिलाओं के पक्ष में कुछ लिखा तब -तब लोग (अधिकाँश पुरुष बिरादरी ) ताबड़तोड़ विरोध, धमकियाँ, अश्लील टिप्पणियाँ, गाली गलौज करने के लिए जुट जाते रहे हैं. यह हाल आम भारतीय का नहीं बल्कि बहुधा राजनेता, नामचीन लोग, और साहित्य के पहरुए तक महिलाओं के प्रति इतनी अश्लील भाषा, अश्लील व्यवहार, अश्लील लेखन, अश्लील मानसिकता व अश्लील दृष्टि के शिकार हैं कि घिन व शर्म आती है. 'फेसबुक' पर ही मेरे द्वारा गोहाटी वाली घटना का विरोध करने पर 'हेमंत शेष' की आपत्ति व अश्लीलता वाला प्रकरण भी अभी ताजा ही है. दूसरे अनेक ख्यातनामों के किस्से भी साहित्य के लोग जानते ही हैं कि अमुक अमुक की स्त्री के प्रति दृष्टि कैसी है, बातें कैसी व व्यवहार कैसा है. 


स्त्री घर में हो, बाजार में हो, कार्यालय में हो, विद्यालय / कॉलेज में हो, बस / गाड़ी में हो, दिन में हो, रात में हो, ब्याही हो, अनब्याही हो, अकेली हो, दुकेली हो ..... प्रत्येक स्थान, प्रत्येक स्थिति व प्रत्येक अवसर /अवस्था में उसके साथ हर आयु वर्ग का पुरुष छेड़ छाड़ से लेकर अश्लील हरकत तक करने में स्वतन्त्र होता है और स्त्री यह सब देखती - झेलती है. ऐसे लोग अपनी क्लीवता, तुच्छताओं, कुंठाओं व दुर्बलताओं के कारण स्त्री को मनुष्य तक होने का अधिकार न देकर घृणित कार्य करते हैं या उस पर शासन करने की हिंसक प्रवृत्ति के शिकार हैं। ऐसे लोग मानव सभ्यता पर कलंक हैं....


फिलहाल दिल्ली के इस बलात्कार व उसके विरोध में उठ खड़े हुए जनसमूह के शोर से आक्रान्त होकर भले ही कुछ लोग अभी देखादेखी या सामाजिकता व दिखावे के लिए स्त्री व उसकी अस्मिता की पक्षधरता में बयान दे रहे हों या स्वयं को शालीन सिद्ध करते हुए स्त्रीपक्षीय छवि गढ़ने में लगे हों...... किन्तु सत्य यही है कि अधिकाँश पुरुषवर्ग स्त्री को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता व उसे 'मनोरंजन व दैनिक उपयोग की वस्तु' के रूप में ही स्वीकार करता है. जब तक समाज के एक एक व्यक्ति का यह कुसंस्कार नहीं दूर होता तब तक स्त्री की दशा भारतीय व दक्षिण एशियाई समाज में कदापि सुधरने वाली नहीं है. सड़कों पर उतरा जनसमूह स्त्री के प्रति मर्यादा का एजेंडा लेकर उसकी पक्षधरता में वस्तुतः नहीं है, अपितु यह विरोध व आन्दोलन भारतीय जनता में भरे जनाक्रोश की अभिव्यक्ति अधिक है. इस जनाक्रोश को सही दिशा देने की आवश्यकता कुछ इस तरह है कि दंड का प्रावधान भी किया जाए और दूसरी और समाज के जन जन को स्त्री के प्रति नैतिक, पारिवारिक, मानवीय, सामाजिक उत्तरदायित्वों की दैनंदिन जीवन में आवश्यकता समझ में आए . अन्यथा स्त्री के विरुद्ध अपराधों का क्रम अपनी जड़ों से सुधरता नहीं दीखता. आमूलचूल परिवर्तन के लिए स्त्री के प्रति एक एक व्यक्ति का रवैया बदलना आवश्यक है. जबतक स्त्री घर परिवार में सही मान सम्मान की अधिकारिणी नहीं बन जाती तब तक समाज व खुले में उसके लिए मान सम्मान की  कल्पना वृथा है और अधूरी व दिखावटी रहेगी। 




Tuesday, December 18, 2012

दिल्ली तुझ पर थू थू थू

दिल्ली तुझ पर थू थू थू :  कविता वाचक्नवी


एक समय था जब रेल दुर्घटना हुई तो रेल मंत्री दायित्व लेते हुए त्यागपत्र दे देते थे, या इसी प्रकार किसी अन्य विभाग की व्यवस्था में खामी के चलते कोई दुर्घटना होने पर संबन्धित विभाग और मंत्रालय के शीर्ष नेता सारा दायित्व लेते हुए पदत्याग देते थे। विदेशों में अब भी कई बार ऐसे उदाहरण दीख जाते हैं, जैसे अभी अभी बीबीसी के महानिदेशक ने एक गलत समाचार प्रसारित होने के चलते अपना पद स्वेच्छा से छोड़ दिया। भारत में अब वह युग कदापि नहीं रहा। कोई नेता, मंत्री या अधिकारी दायित्व नहीं लेता और बेशर्मों की तरह डटा और चिपका रहता है, भले ही कुछ भी हो जाए। 
A protest in Delhi on 29 November 2010 against the gangrape

यह बेशर्मी राजनेताओं के स्तर पर ही मात्र नहीं है, अधिकारियों व नौकरशाहों के स्तर पर भी है और उस से भी आगे बढ़कर उनके सगे संबंधियों के स्तर पर भी। और तो और यह बेशर्मी अब आम आदमी के स्तर पर भी है क्योंकि ऐसी दुर्घटनाओं के बाद जब यदि कुछ लोगों का गुस्सा व आक्रोश निकलता है तो उस गुस्से व आक्रोश तक का विरोध करने के लिए लोग जुट जाते हैं कि समाज में ऐसी घटना का हमसे कुछ लेना देना नहीं है अतः जिसने किया है वह जाने ! कोई बचाव का एक तर्क लाता है और कोई इसके लिए दूसरा। कोई संस्कारों के महत्व पर परिचर्चा करवाने के तर्क देकर अपनी नपुंसकता दिखाता है और कोई अच्छी चीजों को देखने की समझाईश देकर अपना पल्ला झाड़ता है। गलत को गलत कहने का साहस तक लोगों में शेष नहीं। कल चलती बस में सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई लड़की के समाचार पर आक्रोश के स्वर पढ़कर जिस तरह लोग इस दुर्घटना का विरोध करने वालों को ही समझाईश देते व कुतर्क करते नजर आए वह उनके लिए डूब मरने की बात है। 


यह बेशर्मी और यह गैरजिम्मेदारी शीर्ष से जड़ तक नहीं अपितु जड़ से शीर्ष तक गई है। इस बेहया समय और बेहया वातावरण में लोगों में इतना साहस तक नहीं बचा कि जो सच्चे मन से मान सकें कि हाँ धिक्कार है हमें और हमारी समूची नस्ल को जो ऐसे अमानवीय कार्य करते हैं और करने के बाद उस पर शर्म से लज्जित होने के बजाय, और यदि लज्जा भी नहीं तो मात्र विरोध करने की बजाय, विरोध करने वालों को ही उलटे धिक्कारते और नपुंसक बहानेबाजी करते तरह तरह के कुतर्क करते है। 
इस बेशर्मी व चालाक तर्कों वाली बुद्धि और शिक्षा को धिक्कार है


Thursday, December 13, 2012

बढ़ती आयु की स्त्री और हिन्दी-फिल्मोद्योग : 'इंग्लिश विंग्लिश'

बढ़ती आयु की स्त्री और हिन्दी-फिल्मोद्योग : 'इंग्लिश विंग्लिश'  :  कविता वाचक्नवी 
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'इंग्लिश विंग्लिश' देख कर लोगों ने बड़ी-बड़ी चर्चाएँ की हैं और फिल्म को अच्छी बताते हुए भी इसके भाषायी `एंगल' के चलते इसके अंत को लेकर आपत्तियाँ की हैं कि अंग्रेजी सीख लेने पर परिवार द्वारा सम्मान पाने का प्रसंग अंग्रेजी की जय दिखाने की 'गुलाम' मानसिकता से प्रेरित है। 


इन सभी तर्कों को देखने पढ़ने के बाद गत दिनों मैंने भी यह फिल्म देखी। खेद है कि फिल्म को भाषायी 'एंगल' देने वाले तर्कों से मेरी सहमति कदापि नहीं बनी। फिल्म में भाषा का मुद्दा मुख्य है ही नहीं। ऊपर ऊपर से देखने पर यद्यपि दीखता यही है। पर मूल मुद्दा स्त्री और उसकी अस्मिता का है। फिल्म में दृश्यों के बीच पल भर को बिना संवादों के कई कई बार जो संप्रेषित करना चाहा गया है, उसे कदापि कहीं शब्द नहीं दिए गए। संवादो व घटनाओं के बीच उस अनकहे को तलाशना व अनुभव करना होता है। यह उसकी सबसे बड़ी खूबी है। ऐसी अनेक घटनाएँ हैं जो दीखती कुछ और या सामान्य हैं परंतु उनका अर्थ दृश्य से पूरी तरह अलग कुछ और है, जिसे महसूसना पड़ता है। 


यह पूरी फिल्म स्वयं को घर-भर के लिए खपा कर उसी में सुख पाने वाली एक ऐसी स्त्री की प्रतीकात्मक कहानी है, जो सदा अपने से अधिक महत्व दूसरों को देती आई है, अपना अस्तित्व तक मेट कर। परंतु उसका अपने अस्तित्व को मेट देना ही/भी उसके उपहास, हास्यास्पद, निरर्थक, अवमानना व वस्तु की तरह प्रयोग करने का कारण बन जाता है और जहाँ परिवार में कोई उसके अन्तर्मन पर पड़ने वाले आघातों की वेदना को अनुभव करना तो दूर, उन आघातों का स्वर तक नहीं सुन पाता। पति प्रेम, हँसी और प्रशंसा के बहाने भी किस किस प्रकार आघात देते व चोट पहुँचाते हैं और पिता की देखादेखी अपने बच्चे भी। 


इस प्रकार के वातावरण में अपमान व निरन्तर अपनों द्वारा तोड़े जाते मनोबल के बीच उनके लिए अपने को न्यौछावर कर देने वाली वह घरघुस्सू कमजोर गृहणी कैसे एक छोटे से नाममात्र के अवसर के सहारे एक चुनौती (चैलेंज) लेती है और सफल होती है, यह मूलतः कथानक का मुख्यबिंदु है। जिन चीजों के लिए परिवार और समाज स्त्री को प्रताड़ितत करते अथवा नीची दृष्टि से देखते हैं, उनसे उबरने व वे लक्ष्य पाने का अधिकार व अवसर भी समाज व परिवार उन्हें नहीं देता। यदि स्त्री को समान अवसर उपलब्ध करवाए जाएँ तो वह  अपनी क्षमताओं व दूसरों की आशाओं से भी बढ़कर समर्थ हो सकती है। आवश्यकता है उसे इतना समय, सहयोग, मुक्ति व अवसर लेने दिए जाएँ। 


इस प्रतीकात्मक कथा में भाषा का मुद्दा मात्र प्रतीक या कथा के उपकरण के रूप में आया है। इस प्रतीक में उलझ कर रह जाने से कथ्य के साथ बड़ा अन्याय हो जाएगा। 


यह सुखद है कि युवा व्यक्तित्व को केंद्र में रख कर उसके इर्दगिर्द बुनी गई कहानियों से इतर विवाहित, बाल-बच्चेदार व बड़ी आयु की नायिका के जीवन के इर्दगिर्द बुने गए कथानक पर फिल्म बनाने का साहस भी हिन्दी फिल्म उद्योग में किया जाने लगा है। 


फिल्म में बीसियों प्रसंग ऐसे हैं, जहाँ घटना व संवादों के मध्य स्थित वे क्षण जिन्हें कुछ नहीं कहकर व्यक्त करने की चेष्टा की गई है, उन अव्यक्त को अनुभव कर अनेक बार आँसू आ जाते हैं।

पूरी फिल्म की कुंजी एक वाक्य में नायिका के एक संवाद द्वारा दर्शकों को थमायी गई है। ... और उस वाक्य में नायिका कहती है, मुझे अब "प्रेम नहीं, इज्जत चाहिए"। सारा स्त्रीविमर्श मानो एक इस वाक्य में सिमट आया है। हमारे समाजों में कुछेक स्त्रियों के कुछ रूपों को यद्यपि लाड़ दुलार, प्रेम, स्नेह आदि भले मिलता है किन्तु स्त्री व उसकी अस्मिता के प्रति सम्मान की भावना नहीं। थोड़ा पीछे जाएँ तो उस काल के पारंपरिक परिवारों में कम से कम स्त्री के मातृरूप का आदर शेष था और वह उस रूप में किंचित आदर सम्मान की अधिकारिणी हो सकती थी; किन्तु आधुनिकता की बयार के साथ आए सामाजिक परिवर्तनों के चलते बढ़ती आयु के सदस्यों की कष्टप्रद व अवमाननापूर्ण पारिवारिक स्थिति के इस युग में स्त्री का मातृरूप भी क्रमश: अब व्यवहार में आदरणीय नहीं रहा। यह स्त्री के प्रति समय की सर्वाधिक क्रूर अवमानना है।  

इन दिनों भारतीय समाज में हाशिये के बाहर के पात्रों को केंद्र में लाते हुए फिल्म बनाने का ऐसा चलन मुझे सुखद संकेत देता है। 

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Monday, December 10, 2012

क्रिसमस, पुनर्पाठ `चरित्रहीन' और 'बर्फ की चट्टानें'

 क्रिसमस, पुनर्पाठ `चरित्रहीन' और 'बर्फ की चट्टानें'  :  कविता वाचक्नवी
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शरतचंद्र को पढ़ना हर बार अपने को अपनी संवेदना को पुनर्नवा बनाने के कार्य में नियुक्त करने जैसा होता है।


'चरित्रहीन' सबसे पहली बार वर्ष 1976 में पढ़ा था; जब मेरी हिन्दी अध्यापिका 'तारा' ने पुस्तकों के प्रति मेरे अतिरिक्त अनुराग के चलते हमारे हायरसेकेंडरी स्कूल की भरपूर समृद्ध लायब्ररी में मुझे आधिकारिक रूप से विशिष्ट दायित्व की अनुमति (मेरे लिए वह अधिकार था) दिला दी थी।


मैं अपने साथ घर में इस उपन्यास को लेकर आई तो बुआ ने नाम देखकर परिवार के बड़े लोगों से मेरी शिकायत की कि 'चरित्रहीन' जैसे गंदेनामों के 'घटिया नॉवेल' (?) पढ़ने लगी है (पर संयुक्त परिवार की सारी लानत- मलानत, विरोध, प्रतिबंध के बावजूद छिप-छिपा कर यह उपन्यास दो दिन में पूरा पढ़ डाला था) ....... उन्हें नहीं पता था कि मैं विश्व के महान लेखक शरतचन्द्र के शब्दों का पारायण कर रही हूँ.... जिसका जादू एक बार सिर चढ़ जाए तो व्यक्ति बौरा जाता (हिप्नोटाईज़) है। शरतचंद्र ने 'चरित्रहीन' से मुझे पहले पहल जो हिप्नोटाईज़ किया तो आज तक "पुनर्मूषको भव" संभव ही नहीं हो पाया और मूर्च्छा बनी चली आ रही है। 


नशा तारी करने के लिए पुनर्पाठ हेतु इस बार फिर इसे खोजकर कहीं से ले आई हूँ और साथ ही दो और पुस्तकों का प्रबंध किया है।

 क्रिसमस और हिमपात के आयोजनों के बीच इनका साथ अक्षय ऊर्जा का स्रोत बनेगा, भले ही 'बर्फ की चट्टानें' भी साथ रख ली हैं। 




Sunday, December 9, 2012

समय, स्थिति और स्त्री

समय, स्थिति और स्त्री  : कविता वाचक्नवी
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जो लोग जमाना बदल चुकने या समाज और समय बदल गया की बात करते हैं, वे जीवन की वास्तविकताओं के प्रति अत्यन्त अगंभीर और परे होते हैं। 80% वाले भारत की बात तो दूर 20% शहरों वाले भारत में ही पूरा समय, ज़माना और समाज नहीं बदला है। जितने अर्थों में जीवन का दिखावा बढ़ा है, उस से भी अधिक बड़े अर्थों में समाज-मानसिकता में बदलाव का दिखावा भी बढ़ा है।


इसी दिखावे को देख कर या इस से प्रभावित हो, इसके आधार पर निर्णय लेना या परिवर्तन की स्थापना देना जीवन को उसके किनारे बैठ कर देखने जैसा है। स्त्रियों की स्थिति के प्रति ऐसे निर्णय सुनाने या निर्णय पर पहुँचने से पहले हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का 'बाणभट्ट की आत्मकथा' का सूत्र वाक्य सदैव स्मरण रखना चाहिए कि “स्त्री के दुःख इतने गंभीर होते हैं कि उसके शब्द उसका दशमांश भी नहीं बता सकते। सहानुभूति के द्वारा ही उस मर्म-वेदना का किंचित आभास पाया जा सकता है।”


'किंचित' के साथ वे पता, समझ, अनुभव, जानकारी इत्यादि शब्द नहीं अपितु केवल 'आभास' ही जोड़ते हैं, यह विशेष ध्यान देने की बात है।


यह वाक्य कक्षा 9वीं -10 वीं के बाद की छुट्टियों में 'बाणभट्ट की आत्मकथा' पढ़ते हुए सबसे पहली बार पढ़ा था और तभी अपनी डायरी में लिख लिया था। यह एक वाक्य मुझे (1) जीवन में मिली लाखों स्त्रियों में से किसी के भी बारे में निर्णय लेने या विचार बनाने से पूर्व चेताता रहा है तो साथ ही साथ (2) मेरी संवेदना को जागृत रखने वाले किसी 'टूल' की भांति 'अलार्म' का काम भी करता है। और तीसरा काम यह वाक्य यह करता आया है कि (3) तट पर बैठ कर समय बदलने और सामाजिक परिवर्तन की घंटी बजाने वालों की समझ को परखने का अवसर देता रहा है। 


स्त्री के लिए समय और समाज सही अर्थों में नाममात्र का बदला है। वह पहले भी दैनिक उपयोग व उपभोग की वस्तु थी.... आज भी दैनिक उपयोग की वस्तु ही है। नियंत्रक शक्तियाँ भले कुछ बदल गई हैं या अब शातिर बाजारू शक्तियों ने उपयोग व उपभोग की वस्तु बनने को स्त्री की स्वेच्छा व चयन की स्वतंत्रता के लुभावने आवरण में परिवर्तित कर दिया गया है। स्त्री समाज व जीवन की पूरी विकटता से झूझने की अपनी शक्ति और जीवन के प्रति अपनी आस्था के चलते कोई अन्य उपाय न पा इस कारा के पाश में बंधती चली जाती है। समाज में क्या कोई ऐसी भी वेश्या हैं जो मौज मस्ती के लिए उस दारुण जीवन को अपने लिए स्वीकारती या चुनती हैं ? 


कुछ गिने चुने उदाहरण देकर / दिखाकर बहुधा लोग समय व समाज को देखने की तमीज सिखाया करते हैं। परंतु वे नहीं जानते कि समय और समाज को देखने के अचूक यन्त्र (द्विवेदी जी वाले ) से बढ़कर कोई दूसरा यन्त्र हो ही नहीं सकता।..... और इस यन्त्र से दुनिया देखने वालों को कुछ साफ दीखा करता है। कई प्रबुद्ध शिक्षित आधुनिक महिलाएँ तक भी कुछ गिने चुने या अपने इर्दगिर्द के ऐसे उदाहरण और प्रमाण एकत्रित कर व फिर उन्हें दिखा कर घोषणा करना चाहती/चाहते हैं कि समय बदल गया। वस्तुतः आधुनिक नारीसमाज की कुछ स्त्रियों सहित ऐसे तर्क व उदाहरण देने वालों का यह व्यवहार उसी श्रेणी का होता है जिस श्रेणी की असंवेदना को केंद्र में रख द्विवेदी जी 'इतने गंभीर..." की बात कहते हैं। यह उस गंभीरता पर आवरण चढ़ाने और चढ़े हुए आवरण को न हटा पाने की असहानुभूतिजन्य मानसिकता का ही फल है। प्रभा खेतान जी की 'अन्या से अनन्या' पढ़ने के बाद मन में सबसे पहला व आज तक यही प्रश्न आया कि उस स्त्री के दु:ख का क्या, जिसका पति दो दो स्त्रियों से घात /प्रयोग कर रहा है और उसे विवाहिता के बंधन में बाँध एक दूसरी स्त्री के साथ मनोरंजन में लगा है। एक ही कालावधि / समय अन्या से अनन्या बनी स्त्री के लिए बदल गया होगा पर उसी कालावधि में जी रही उस स्त्री का क्या जो अन्या न थी, और कभी अनन्या भी न बनी और त्यक्ता रही जीवन-भर। ऐसे में वस्तुतः अनन्या वह है जो जीवन-भर एक स्त्रीविमर्श की पैरोकार के सामने पत्नी का आडंबर निभा ले गई और स्वयं स्त्रीविमर्श की झंडाबरदार तक उसकी वेदना के प्रति कटूक्त ही रहीं।


इसलिए समाज में सुखी,खुशहाल, आदि आदि दीखने वाली स्त्री भी बहुधा इसलिए ऐसी दीखती है क्योंकि यदि वह ऐसी न दीखे तो समाज उसे जीने न दे। ये तरकीबें और दिखावे उसके मजबूती से स्वयं को एक रूपविशेष में प्रस्तुत करने की विवशताएँ-भर हैं, न कि बदले हुए समय व वातावरण के उदाहरण। जिस दिन समाज का जो व्यक्ति इतना संवेदनशील होगा की वह स्त्री के कष्टों की मर्मवेदना का किंचित आभास पा सके, उस दिन वह जान पाएगा कि वे दु:ख वास्तव में कितने गंभीर होते हैं। आधुनिक समय की भागदौड़, आधुनिकीकरण से उपजी निर्मम क्रूरता ने मनुष्य को जिस अनुपात में असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में स्त्री के प्रति निर्ममता और असहानुभूति भी बढ़ी है। उसी का स्पष्ट भयावह परिणाम कि स्त्री के रूप में जन्मते ही नहीं अपितु जन्मने से पूर्व ही उसकी हत्या कर दी जाती है। 


इस निर्मम समय और समाज से उसकी क्रूरता जब व जैसे छूटेगी तब व तैसे ही कोई समाज अपने स्त्रीवर्ग के प्रति समय बदलने की बात को कहने का अधिकारी होगा।

Thursday, December 6, 2012

मानव तुम सबसे सुंदरतम....

जीवन और मानवमन का रूप सौंदर्य  :  कविता वाचक्नवी

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बहुधा हमारे समाज के लोग टीवी आदि पर आने वाले बिग ब्रदर या बिग बॉस सरीखे कार्यक्रमों को आड़े हाथों लेते हुए इन कार्यक्रमों की लानत-मलानत किया करते हैं।


भारत में बिताए समय में या उसके बाद भी जब कभी मैंने इस प्रकार के कार्यक्रमों को देखा... मुझे तब-तब व्यक्ति के भीतर बसे व्यक्ति और समाज के भीतर बसे मानवमन के दर्शन हुए।


आडंबरहीन साधारण मानवमन के सुख दु:ख, करुणा, क्रोध, ईर्ष्या-द्वेष, प्रेम-अनुराग, आक्षेप, अपेक्षा, रुदन, पीड़ा, व्यथाएँ, अकेलापन, संबंध, मेलजोल, सुरक्षा, कामना, कल्पना, भ्रम, उत्साह, भांति-भांति के मनोभाव और विचार, उल्लास, स्वप्न, आशाएँ, दुराशाएँ और आवेश आदि में लोक-चित्त व व्यवहार के विविध रूपों का सौंदर्य उभर-उभर कर मोहता रहा है। 


 मानवहृदय व व्यवहार के ये विविध मनोहारी रूप कहानी या उपन्यास लिखते समय रचे गए पात्रों की मानिंद लेखक के नियन्त्रण से स्वतंत्र हो कथा की दिशा बदल कर अपने साथ व अपने अनुकूल कर लेने वाले कथापात्रों की भाँति मुझे अपने जीवन की गति-मति से रिझाने-लुभाने वाले पात्र लगा करते हैं। और उनके सभी तरह के व्यवहार व मनोभावों का ऐसा सौंदर्य देखना मुझे मानव मन के और-और समीप ले जाकर स्वयं पर मुग्ध करने को ललसाता रहता है। मानव स्वभाव, जीवन और मनुष्य के प्रति और अनुराग जगाता है।





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