Thursday, November 22, 2012

डायरी-अंश : कसाब, मृत्युदण्ड, अपराध व न्याय

डायरी-अंश : कसाब, मृत्युदण्ड, अपराध व न्याय  :  कविता वाचक्नवी



4 वर्ष पूर्व 26 नवंबर को मुंबई में भारत पर हुए असैनिक आक्रमण के एकमात्र जीवित बचे आतंकवादी अजमल कसाब (पाकिस्तानी नागरिक) को आज 20 नवम्बर को भारत की पुणे स्थित ऐतिहासिक येरवदा जेल में प्रातः फाँसी दे दी गई। इस समाचार से जहाँ उस आक्रमण की स्मृतियाँ ताज़ा हो आईं वहीं उस आक्रमण में अपने प्राण गँवाने वालों का स्मरण भी बार-बार हो आता रहा। दिन-भर उस पूरे घटनाक्रम के प्रति मन में भाँति-भाँति के विचार आते रहे। डायरी में भी कुछ कुछ लिखा जाता रहा। 

यहाँ पढ़ें आज के मेरे डायरी-अंश - 




मृत्युदण्ड के लगभग 20 घंटे पश्चात् - 

उन युवकों, व्यक्तियों व अपराधियों के प्रति दया भी मन में पनपती है जो कुमार्गी होकर दूसरों का जीवन तो नष्ट करते ही हैं अपना व अपने परिवार का जीवन भी नष्ट कर लेते हैं। जो किसी दंडसंहिता द्वारा दंड नहीं पाते वे निरंकुश भले रहते हैं किन्तु जो किसी दंडसंहिता से घिर जाते हैं.... वे सामान्य से लेकर जघन्य तक की श्रेणी के दंड पाते हैं। 

उनको मिले दंड को देख-सुन कर साधारण से साधारण व विशेष से विशेष व्यक्ति का हृदय भी काँप उठता है। यह काँप उठना स्वाभाविक भी है क्योंकि यह हमारे मानव होने का प्रमाण है। किन्तु इस काँपने से द्रवित होकर दंड के औचित्य पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता। 

दंड का विधान ही वस्तुतः सामाजिकों के हृदय को कम्पाने के लिए है; ताकि उस भयावहता या पीड़ा से डर कर समाज के वे लोग ( जो किसी और विधि, प्रेरणा, सीख या बोध से नहीं सीखते और न अपराध करने से रुकते हैं ) अपराध की ओर प्रवृत्त न हों।


दंड वस्तुतः उस अपराधी लिए यद्यपि उतना कारगार न होता होगा ( किन्हीं विशेष परिस्थितियों में ) जिसने अपराध किया है क्योंकि आपराधिक दंड की संरचना / व्यवस्था अपराधी को उसके कर्म का फल देने के लिए नहीं, अपितु अपराध के मार्ग पर चलने वाले अन्य लोगों को अपराध से निवृत्त करने के लिए की गई है; उन लोगों को जो न दूसरों के दु:ख से द्रवित होते हैं, न किसी सदविचार, प्रेरणा, सही मार्गदर्शन आदि से सीखते या बदलते हैं ... वे अपराध के मार्ग का भयावह परिणाम देखकर तो कम से कम कुछ सीख सकते हैं। 




मृत्युदण्ड के लगभग बारह घंटे पश्चात् -

न्यायकारी होने का यह अर्थ नहीं होता कि अन्यायी को माफ कर दिया जाए जैसे न्यायाधीश दोषी को दंड देता व निर्दोष तथा निरपराध के पक्ष में अपना निर्णय सुनाता है, उसी प्रकार ईश्वर के न्यायकारी होने का अर्थ यह नहीं कि वह सारे अत्याचारियों को क्षमा कर दे या कर्मफल न दे।

न्यायकारी होने का अभिप्राय ही यही है कि जिसके जैसे कर्म हैं उसे उसी के अनुरूप फल मिले। इसी प्रकार मानवीय होने का यह अर्थ नहीं कि अत्याचारी, हत्यारे अथवा बलात्कारी आदि को दंड न दिया जाए। जो दूसरों की शांति, जीवन, सुख, धन, सम्मान या कुछ और भी कभी भी छल या बल से छीनता है, वह दोषी है, अपराधी है और दंड का भागी होता है। किसी न्यायाधीश से आतताइयों के पक्ष में खड़े होने या निर्णय लेने/देने की इच्छा या माँग सबसे बड़ी विडम्बना है। 




मृत्युदण्ड के लगभग नौ घंटे पश्चात् -


कसाब का मृत्युदंड क्रियान्वित होने का समाचार सब को मिल ही चुका है। अन्ततः राष्ट्रीय अस्मिता पर आक्रमण करने वाले हत्यारे आक्रमणकारी का यही अंत सुनिश्चित था। प्रत्येक देशप्रेमी व देश के लिए बलिदान होने वालों के परिवारों को अन्ततः इस निर्णय से राहत ही हुई है, होगी। 

कसाब की आत्मा की शांति की प्रार्थना भी करती हूँ। 

उसकी मृत्यु ट्रेनिंगकैंपों में तैयार हो रही आक्रमणकारियों की नई नस्ल को कम से कम इतनी शिक्षा अवश्य दे कि ऐसे कार्यों का यही परिणाम होता है। पकड़े जाने पर आपका अपना देश भी पल्ला झाड़ लेगा और शव तक को अपने यहाँ ले जाना नहीं चाहेगा। उन माता-पिता और भाई-बहनों के लिए भी अतीव दु:ख है जिनके परिवार का बेटा गलत राह पर चल पड़ा और आज उसके कारण उन्हें यह दु:ख देखना पड़ा कि अपने मृतक बेटे का मुँह तक न देखना नसीब हुआ। इसलिए अपनी संतान को बहकाने वालों से सावधान रहें और उनकी पहचान अच्छी तरह से कर लें, अन्यथा वे लोग अपने स्वार्थ और उन्माद के लिए लोगों का इस्तेमाल करते रहेंगे। उन शत्रुओं को चीन्हना अत्यन्त आवश्यक है और परिवार, समाज व देश के हित में भी। इस रास्ते पर चलने वालों का अंत ऐसा ही या यही होना अवश्यंभावी है।




मृत्युदण्ड के लगभग 1 घंटा पश्चात्, समाचार मिलते ही - 

अभी-अभी आज बुधवार को भारत में प्रातः 7.30 बजे कसाब को पुणे की यरवडा जेल में फाँसी दे दी गई।

आज मन को बड़ी शांति मिली।


Tuesday, November 6, 2012

ब्रिटिश पार्लियामेण्ट और आज की रात : एक छोटा संस्मरण




आज रात्रि जैसे ही ब्रिटिश पार्लियामेण्ट के 'हाऊस ऑफ लॉर्ड्स' से कार्यक्रम समाप्त कर बाहर निकली तो दाहिनी ओर भारी भीड़ लगी थी। पुलिसबलों ने सब ओर से उस भीड़ की घेराबंदी भी की हुई थी। किन्तु यहाँ पुलिस हाथ बाँधे मूकदर्शक की तरह शांति से केवल पंक्तिबद्ध खड़ी रहती है, तब तक, जब तक कि कोई अहिंसक घटना या बलप्रयोग आदि न हो। पुलिस आदि बलों को कतार बाँधे देख व प्रदर्शनकारियों को तरह-तरह की मुद्रा में व मुखौटे लगाए देख कर मैंने तुरंत कुछ चित्र ले लिए। 


पचासों लोग वहाँ चित्र ले रहे थे। भीड़ न तो उग्र थी व न ही नारेबाजी थी, एकदम शांत व सड़कों पर लेटे-बैठे युवक युवतियाँ पर्याप्त उत्सुकता तो जगा ही रहे थे किन्तु 3 डिग्री सेल्सियस तापमान में रात के समय, जब पार्लियामेण्ट बंद हो चुकी है, यों जुटना, कुछ न समझ पड़ने वाली घटना थी।


हमें इस प्रदर्शन को चीर कर दूसरी ओर जाना था। इस प्रक्रिया में लगभग 15 मिनट मैं इस भीड़ के मध्य रही व इसका हिस्सा भी। धड़ाधड़ कई चित्र लिए। उत्सुकतावश एक अल्पवय के किशोर के पास गई और उस से पूछा कि यह विरोध-प्रदर्शन किसलिए हो रहा है ? उसने कहा 'फ़्रीडम' (मुक्ति) के लिए। मैंने फिर पूछा - 'किस से ?' उसने कहा - "सरकार से' मैंने अगला प्रश्न किया- किस चीज की मुक्ति; फ्रीडम ऑफ स्पीच, फ़्रीडम ऑफ इन्फ़ोर्मेश्न, सेल्फ फ़्रीडम, पोलिटिकल फ़्रीडम, फ़्रीडम ऑफ this & this or that.... मुक्ति के कई प्रकार हैं ... । वह छोटा-सा किशोर मुस्काया और सिर के ऊपर को चढ़ा हुआ अपना मुखौटा खींच कर झट अपने चेहरे पर चढ़ा लिया व लगभग मेरे माथे के साथ माथा सटा मुखौटे में आँखों के आगे बनी झिर्रियों को एकदम मेरी आँखों के आगे ले आया। वस्तुतः वह अपने चेहरे पर आई शर्मीली मुस्कान छुपाने के लिए यह यत्न कर रहा था पर अडिगता प्रदर्शित भी करना चाहता था।  


मैंने उसकी बाँह पर हाथ रखा ... फिर धीरे-से उसे थपथपाया और हँस कर कहा - गुड लक ! ...... और भीड़ को इधर से इधर जाते, चीरते हुए, उस से पार हो आई। 


इस घटनाक्रम में जो चित्र हाथ में पकड़े अपने सैमसंग ओमनिया 7.5 विंडोज़ मोबाईल से लिए, वे यहाँ देखें ।

जिस कार्यक्रम में भाग लेने The Houses of Parliament गई थी, उसके चित्र व उस कार्यक्रम के विषय में भी शीघ्र ही लिखूँगी।

सभी चित्रों का स्वत्वाधिकार सूरक्षित है, अतःबिना अनुमति प्रयोग न करें 



















Saturday, November 3, 2012

उत्सवों पर एक टीप : कविता वाचक्नवी

उत्सवों पर एक टीप  :  कविता वाचक्नवी


Holi - Dancersमूलतः प्रत्येक देश के सभी उत्सव और त्यौहार तत् तत् स्थानीय प्रकृति और कृषि से प्रारम्भ हुए और उन्हीं से जुड़े हैं। कालांतर में ये सामाजिकता का पर्याय बन गए और समाज के चित्त की अभिव्यक्ति का माध्यम भी। 


समाज के चित्त में पारस्परिकता में आई स्वाभाविक खरोंचों के चलते कुछ और आगे आने पर क्रमश: लोगों ने जैसे जैसे इन्हें विभाजित किया तैसे तैसे इन्हें पूजा-पद्धतियों के नाम पर नियोजित आयोजित करना प्रारम्भ कर लिया और ऐसा करने का फल यह हुआ कि उत्सवों को ही बाँट दिया गया। इसी बँटवारे के बीच कुछ नए उत्सव और त्यौहार भी जोड़ दिए गए ताकि बँटवारे की रेखा स्पष्ट की जा सके या आयोजनों को संख्या  अधिक की जा सके । 


प्रकृति, ऋतुएँ, कृषि और स्थानीयता से मानवमन के विलय की मूल भावना से जुड़ कर प्रारम्भ हुए उत्सवों की संरचना और विधान बदल लिए गए। 


इस से और भी आगे आने पर, अब, उत्सव न तो कृषि आधारित रहे हैं, न सामाजिकता व लोकचित्त की पारस्परिकता और न ही उतना पूजा पद्धति और धर्म (?) के अधिकार में । 


धीरे-धीरे उत्सव अब बाजार की शक्तियों या बाजार की मानसिकता से संचालित व आयोजित होने लगे हैं। मानव-मन की उत्सवप्रियता ने इस सहसंबंध को और बल दिया है पर साथ ही इससे यह भी रेखांकित हुआ है कि मानव-मन और लोकचित्त से धीरे-धीरे जैसे कभी कृषि व पारस्परिकता की भूमिका क्रमश: कम होने लगी थी, उसी प्रकार वर्तमान समय में पंथों व पूजापद्धतियों का अंकुश भी कम होने लगा है.... कम से कम बाजार ने तो उसे पछाड़ ही दिया है। क्योंकि उत्सव अब सीधे-सीधे मनोरंजन पर केन्द्रित होने लगे हैं। 


उत्सवों व त्यौहारों का बाजार से धीरे धीरे अधिकाधिक संचालित होते चले जाने वाला यह परिवर्तन कितना सकारात्मक है अथवा कितना नकारात्मक यह तो नहीं कह सकती किन्तु यह बहुत थोड़े अर्थों में अंतराल को पाटने का काम करता अवश्य दीखता है। पर साथ ही यह कहीं एक नए वर्ग अन्तराल को भी जन्म दे रहा है जो भले धर्म या पूजापद्धति से अलग न हो किन्तु आर्थिक स्तर पर अलग अवश्य होगा / है। धर्म का नाम लेकर बंटे हुए या अर्थ के आधार पर बंटे हुए किसी भी समाज में कोई अंतर नहीं।


किन्हीं अर्थों में ये स्वाभाविक प्रक्रियाएँ प्रतीत होती हैं क्योंकि सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति की क्षमताएँ भिन्न हैं, विशेषताएँ व कमजोरियाँ भी भिन्न हैं, इच्छाएँ व आकांक्षाएँ भी भिन्न। इसी मनोविज्ञान को समझ कर इन सब अंतरालों को पाटने के काम आने वाले उत्सव और त्यौहार कभी समाज ने मूलतः इसी उद्देश्य से प्रारम्भ किए होंगे कि चलो एक समय तो ऐसा हो जब लोग परस्पर मिल कर हँसे और खुशी मनाएँ। इसीलिए जैसे-जैसे स्थानीय ऋतुएँ और प्रकृति तत् तत् स्थानीय समाज को खुले में मिलने जुलने की भरपूर अनुमति नहीं देतीं, उन्हीं दिनों त्यौहार अधिकाधिक आते हैं ताकि उस बहाने पारस्परिकता बनी रहे और मांनवमन का उल्लास व ऊर्जा भी। हमारे मनोभेदों ने उस उल्लास का भी क्या से क्या कर दिया ! 


इस बरस उत्सवों की इस बेला में उल्लास का यह बंटवारा कम से कम करें, यह हमारा उद्देश्य होना चाहिए। तभी आपका और हमारा त्यौहार मानना सार्थक है। स्थानीयता व स्थानीय समाज से कट कर या उन्हें काटकर, त्यौहार मनाना या उनके त्यौहारों से अलग रहना, दोनों सामाजिक अपराध हैं और त्यौहारों की मूल भावना के विरुद्ध भी। ऐसा कदापि न किया जाए। जो-जो जिस भौगोलिक स्थान पर है, वहाँ के स्थानीय समाज को उत्सव में सम्मिलित करें और उनके उत्सवों को स्वयं भी मनाएँ; तभी उत्सव मनाना कुछ अर्थों में सार्थक होगा। धीरे-धीरे समाज से जुड़ने की यह प्रक्रिया जब हमारे मनों के भीतर तक बस जाएगी, उस दिन पूरे अर्थों में सार्थक। 


Related Posts with Thumbnails

Followers