Tuesday, October 30, 2012

हमदर्द की हिन्दी

 हमदर्द की हिन्दी  :  कविता वाचक्नवी





अपनी भाषा के प्रति हमदर्दी दिखाने के नाम पर दूसरी भाषाओं का मखौल उड़ाना अत्यंत हास्यास्पद और लज्जाजनक काम है। हिन्दी के दिखावटी हमदर्दों में यह प्रवृत्ति बहुत आम है कि वे हिन्दी को श्रेष्ठ दिखाने के लिए अंग्रेजी का मखौल उड़ाते हैं। अंग्रेजी की शक्ति को कम करके आँकने से हिन्दी की श्रेष्ठता सिद्ध नहीं होती अपितु उल्टे इस से हम हिन्दी वाले और मूर्ख ही प्रमाणित होते हैं। 


आज ऐसी ही एक और घटना देखी जब एक व्यक्ति ने प्रश्न उछला - "अगर शुभ रात्रि "GOOD NIGHT" होता है तो शुभ दीपावली "GOOD DEEPAWALI" क्यों नहीं ? या अगर शुभ दीपावली "HAPPY DEEPAWALI" होता है तो शुभ रात्रि "HAPPY NIGHT" क्यों नहीं ?"


उस पर उत्तर देने वालों ने लिखा - (1) "Because ...English is a very Funnnny language :)" और किसी ने लिखा "Kyunki Engligh Koi language nhi hai....jabardasti hi language haii"


यदि किसी भाषा के दो अलग अलग शब्दों का अनुवाद कोई अन्य भाषा अपने एक ही शब्द से करती है तो यह अनुवाद करने वाले की गलती है। Good और Happy दो अलग-अलग शब्दों को यदि दूसरी भाषा वाले एक ही अर्थ दे रहे हैं तो यह मूल भाषा की गलती कैसे हो गई, यह या तो अनुवादकों की गलती है या उनकी सुविधा। 


हिन्दी के दो अलग अलग शब्दों को अंग्रेजी के किसी एक ही शब्द से अनूदित कर दिया जाए तो आपको कैसा लगेगा ? यह हमारी समस्या या सुविधा है कि हम Haapy, Merry और Good तीनों के लिए 'शुभ' ही अर्थ लगा रहे हैं। .... और मजे की बात यह कि लोग हिन्दी से हमदर्दी दिखाने के नाम पर अंग्रेजी का मखौल उड़ा रहे हैं। 


काश, इन्होंने संस्कृत पढ़ी होती तो भाषा के विकल्पों की जानकारी होती और अंग्रेजी के तीन अलग-अलग शब्दों के लिए कुछ अन्य पर्याय प्रयोग करना कम से कम जानते तो, और संस्कृत पढ़ी होती तो हिन्दी की शब्दावली में पर्यायों का अभाव है जैसा हिन्दी का मखौल भी न बनाते। फिर उसे जानने के बाद तो अंग्रेजी का यह मखौल बनाने का आधार ही समाप्त हो जाता। अस्तु ! 


कोई भी समझदार व्यक्ति अपनी भाषा की श्रेष्ठता दिखाने के लिए दूसरी भाषा का मखौल कभी नहीं उड़ाता। अंग्रेजी यदि हिन्दी की तुलना में कमतर है तो उसके पक्ष में यह बात हिन्दी वालों को नीचा दिखाने के लिए पर्याप्त है कि एक कमतर भाषा होने के बावजूद संसार के सारे अधुनातन ज्ञान-विज्ञान को वे अपनी भाषा में ले आए हैं, यह उस भाषा की शक्ति भी है कि वह उस सारे को अभिव्यक्त करने में समर्थ है। दूसरी ओर हम लोग आज तक अपने यहाँ के उच्चशिक्षा के पाठ्यक्रमों में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों तक को हिन्दी में नहीं ला सके हैं। कोई भी समझदार व्यक्ति दूसरी भाषाओं का बहिष्कार नहीं करता क्योंकि स्वयं में कोई भी भाषा निकृष्ट या हास्यास्पद नहीं होती है वह एक बड़े भाषासमाज के सम्प्रेषण का सशक्त माध्यम होती है। फिर किसी बड़े भाषासमाज की भाषा का मखौल उड़ाना तो वस्तुतः अपनी मूर्खता या उथलापन प्रमाणित करना होता है। 


आम तौर पर दिनों दिन अधिसंख्य लोगों के वैचारिक 'बरियर' और वैचारिकता के अभाव पर चकित रह जाना पड़ता है, इतना अधिक दिवालियापन है। इसका कारण उनकी जल्दबाज़ी नहीं लगता और न ही बोलने से पहले सोचना नहीं, अपितु सोचने की क्षमता और संस्कार कम होता जा रहा है, क्योंकि बहुसंख्य समाज अब पढ़ता नहीं। स्वाध्याय बहुत आवश्यक होता है। पाती हूँ कि ऐसे लोग बड़े बड़े पदों पर हैं और ऐसी मूर्खता के साथ। तिस पर ये पद उनके अहंकार में और वृद्धि करते हैं । एक तो अज्ञान के कारण थोथा अहंकार और ऊपर से पद का अहंकार। 


लोगों की दूसरी भाषाओं का अपमान करने की ऐसी मूर्खताओं के चलते ही भारत में हिन्दी के विरुद्ध वातावरण निर्मित होने में बड़ी भूमिका बनी। ऐसे लोग अंग्रेजी ही नहीं अपितु दक्षिण भारतीय भाषाओं या उत्तरपूर्व की भाषाओं का भी ऐसा ही अपमान करते चले आए हैं। जिसका परिणाम है कि भाषा के नाम पर देश बुरी तरह बंट चुका है और दूसरी भाषाओं के लोग भी इस कारण हिन्दी के विरोधी होते चले गए हैं। 

किसी ने सच ही कहा है कि "जो दूसरे की माँ का सम्‍मान नहीं कर सकता, वह अपनी माँ का सम्‍मान स्‍वयं ही नष्‍ट कर देता है..." 


हिन्दी से हमदर्दी दिखाने के दूसरे भी कई तरीके हैं, कई काम हैं। वैसे हिन्दी को ऐसी हास्यास्पद हमदर्दी की जरूरत भी नहीं है।


Tuesday, October 23, 2012

प्रचलित तत्सम / तद्भव शब्द और उनके भाषांतर पर्याय

प्रचलित तत्सम / तद्भव शब्द और उनके भाषांतर पर्याय
               - (डॉ.) कविता वाचक्नवी
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संस्कृत के 'संस्कार' के लिए अंग्रेज़ी पर्याय खोजने वालों को बहुधा समस्या आती है क्योंकि संबन्धित कोषों में इसका एक ही अर्थ Rite (जैसे अंतिम संस्कार/ Last rites) बताया जाता है, जबकि इसके अनेक निहितार्थ होते हैं। 

केवल 'संस्कार' ही नहीं अपितु 'धर्म' के लिए भी किसी भाषा में कोई शब्द नहीं है, 'रिलिजन' तो 'सम्प्रदाय' अथवा 'पंथ' का वाचक है; इसी प्रकार `निर्वाण' शब्द के लिए भी कोई समानार्थी शब्द, असंभव है कि कहीं मिले। क्योंकि निर्वाण की संकल्पना केवल भारतीय दर्शन में उपलब्ध है। 

वस्तुत: दर्शन (+ जीवनदर्शन ) की शब्दावली के लिए यह समस्या बनी रहेगी कि उसके लिए अधूरे विकल्पों में से ही किसी का चुनाव मन मार कर करना पड़ेगा। 

जिन भाषासमाजों में जिस जीवनदर्शन की परम्परा है, उन भाषासमाजों में ही तो वे शब्द मिलेंगे ना! 

यही स्थिति रिश्ते नाते के शब्दों की भी है कि साढ़ू, समधिन, चचिया सास, पतोहू, चचेरा, ममेरा, फुफेरा, सलहज जैसे ढेरों संबंध वाचक शब्दों के लिए सही, सटीक व निश्चित शब्द भारतीय भाषाओं से इतर भाषा-समाजों में नहीं है; जहाँ भाभी भी 'सिस्टर इन लॉ ' है, तो साली भी, सलहज भी, ननद भी, जेठानी भी और देवरानी भी। 

अतः इनके लिए भी सही शब्द बस ढूँढते रह जाएँगे वाली बात है । 


इसीलिए भारतीय रचनाओं के अनुवाद करते समय, यहाँ तक कि गद्य का अनुवाद करते समय भी, हमारी जीवन व दर्शन की शब्दावली का सही सही अनुवाद नहीं हो पाता है। ऐसे में अनुवादक पाद-टिप्पणियों के द्वारा संबन्धित संकल्पना को कितना व कैसे समझा पाता है, यह उसकी निजी क्षमता पर निर्भर है। किन्तु इसके अभाव में सांस्कृतिक शैली की रचनाओं की हत्या अनुवाद में बहुधा हो ही जाती है। 


इसका एक पक्ष संस्कृत से भी जुड़ा है। खेद है कि देश के नहीं अपितु समूची मानव जाति के अहित में है / हुआ, कि भारत में संस्कृत को वर्गविशेष की भाषा के रूप में कर्मकाण्ड तक सीमित मान लिया गया और अब ऐसा ही षड्यंत्र हिन्दी के साथ स्वयं कुछ हिन्दी वाले भी करने में लगे हैं ( कि हिन्दी हिन्दुओं कि व उर्दू मुस्लिमों की भाषा है) | इसके कितने घातक परिणाम होंगे, इसका उन्हें अनुमान भी नहीं। विश्व के अन्य देशों के भाषाविदों या विद्यार्थियों द्वारा जिस प्रकार संस्कृत को भाषाओं की मूल मान कर अध्ययन किया जाता है उसी प्रकार भारत में भी सभी पूर्वाग्रहों से हट कर संस्कृत का अध्ययन किया जाना अनिवार्य है। दुर्भाग्य है कि भारत के अधिकाँश आधुनिक भाषाविज्ञानी संस्कृत के अध्ययन से कोरे होते हैं। प्रसंगवश बता दूँ कि पाणिनी पर अब तक विश्व में जितने कार्य हुए हैं उनकी परिगणना मात्र करने वाला एक सर्वेक्षण जर्मनी के एक भाषाचेता ने किया है, जो कई वॉल्यूम में छपा ( यद्यपि उसमें केवल लिस्टिंग की गई है)| दुर्भाग्य यह कि केवल दो भारतीय प्रखर विद्वान उस में अपनी महता प्रमाणित कर विशेषष रूप में उल्लिखित हैं, वे हैं श्रद्धेय ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी ( जो लाहौर में रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा संचालित एक मात्र आर्ष गुरुकुल के आद्य आचार्य व संस्थापक थे व पश्चात् मोतीझील बनारस आ गए थे; दूसरे उल्लिखित विद्वान हैं महामहोपाध्याय स्वर्गीय पं. युधिष्ठिर जी मीमांसक। 


मात्र इन दो प्रकांड विद्वानों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि इनके जितना गंभीर काम करने वालों में शेष सभी भाषावेत्ता विदेशी मूल के हैं, बहुधा फ्रांस व जर्मनी के। है ना आश्चर्य की बात ! यह संस्कृत और संस्कृत के भाषाविज्ञानी पाणिनी का महत्व प्रतिपादित करता है; जिसे अपने देश में ही सही महत्व नहीं मिला,जो मिलना चाहिए। इसलिए यदि कोई इस पूर्वाग्रह के कारण संस्कृत से पल्ला झाड़ता है कि वह केवल पंडितों या कर्मकाण्ड की भाषा है तो यह उस भाषा का नहीं अपितु स्वयं ऐसा करने वालों का दुर्भाग्य है। 

.... और उस भाषा का ही नहीं अपितु व्यापक अर्थ में यह हिंदी का भी दुर्भाग्य ही है; मात्र भाषा के रूप में नहीं अपितु हिंदी के साहित्य का भी दुर्भाग्य। क्योंकि आप हम भारतीय भाषाओं के साहित्य से सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को वर्जित या अलग नहीं कर सकते। उस पृष्ठभूमि के चलते उसके अनुवाद की ऐसी समस्याएँ सदा बनी रहेंगी। साहित्यानुवादकों का मात्र लक्ष्यभाषा में अधिकार होने ही से काम नहीं चलता अपितु स्रोतभाषा और उसकी पृष्ठभूमि पर उनकी बहुत अच्छी पकड़ होना अनिवार्य होता है। उसके अभाव में किस बूते हम भारतीय भाषाओं के सही व सटीक साहित्यिक अनुवाद की कल्पना कर सकते हैं ? 


अनध्ययन और अभाव के चलते होने वाली हानियों का यह मात्र एक ही पक्ष है। भाषा के सरलीकरण का कुतर्क भी इसी के साथ जुड़ा है। 

उन सब पर फिर कभी....

Sunday, October 21, 2012

भारत : खतरे की कगार और विस्फोट के ढेर पर

भारत : खतरे की कगार और विस्फोट के ढेर पर
- (डॉ.) कविता वाचक्नवी



कल ही एक लेख व समाचार पढ़ रही थी, जिसमें बैंगलोर में कचरे के प्रबंधन से जुड़े, महापालिका के एक सकारात्मक निर्णय की जानकारी साझा की गई थी व जिसमें बताया गया था कि  "कूड़े को हमें अब अपने घर में ही अलग करना होगा, महापालिका के कर्मचारी उन्हें उसी रूप में एकत्र करेंगे, आपके द्वारा ऐसा नहीं करने में आपका कूड़ा स्वीकार नहीं किया जायेगा। निश्चय ही यह बड़ा प्रभावी निर्णय है, नागरिकों को कार्य अधिक करना पड़ेगा, महापालिका को कार्य अधिक करना होगा, पर नगर स्वच्छ रहेगा। उपरोक्त नियम अक्टूबर माह से लागू हो जायेंगे " 



 महापालिका के इस निर्णय को पढ़ने के पश्चात् अच्छा लगा किन्तु उस निर्णय की खामियों और सहायक घटकों के अधूरेपन के चलते सरकार का वह निर्णय किस तरह थोथा रह जाने वाला है, यह विचार भी आया  और इस प्रकार इस लेख की पृष्ठभूमि तैयार हुई। 






विदेशों (विशेषतः योरप, अमेरिका व विकसित देशों ) में कचरे/कूड़े की व्यवस्था बहुत बढ़िया ढंग से होती ही है। प्रत्येक परिवार के पास काऊन्सिल के Bins and waste collection विभाग की ओर से बड़े आकार के 3 Waste Bins मुख्यतः मिले हुए होते हैं, जो घर के बाहर, लॉन में एक ओर अथवा गैरेज या मुख्यद्वार के आसपास कहीं रखे रहते हैं। परिवार स्वयं अपने घर के भीतर रखे दूसरे छोटे कूड़ेदानों में अपने कचरे को तीन प्रकार से डालता रहता होता है अतः घर के भीतर भी कम से कम तीन तरह के कूड़ेदान होते हैं। एक ऑर्गैनिक कचरा, दूसरा `रि-साईकिल' हो सकने वाला व तीसरा जो एकदम नितांत गंदगी है... जो न ऑर्गैनिक है व न `रि-साईकिल' हो सकता है। सप्ताह में एक सुनिश्चित दिन विभाग की तीन तरह की गाड़ियाँ आती है, अतः उस से पहले (या भर जाने पर यथा इच्छा) अपने घर के भीतर के कूड़ेदानों से निकाल कर तीनों प्रकार के बाहर रखे Bins में स्थानांतरित कर देना होता है, जिसे वे निर्धारित दिन पर आकर एक-एक कर अलग-अलग ले जाती हैं। 


इसके अतिरिक्त पुराने कपड़े, बिजली का सामान, पोलिथीन बैग्स, बैटरीज़ व घरेलू वस्तुओं (फर्नीचर, टीवी, इलेक्ट्रॉनिक सामग्री, जूते, काँच आदि ) को एक निश्चित स्थान पर पहुँचाने की ज़िम्मेदारी स्वयं व्यक्ति की होती है। बड़ी चीजों को कचरे में फेंकने के लिए उलटे शुल्क भी देना पड़ता है। 


इस पूरी प्रक्रिया के चलते लोगों में कचरे के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता बनी रहती है। जबकि ध्यान देने की बात यह भी है कि योरोप आदि के देश ठंडे हैं व यहाँ ठंडक के कारण रासायनिक प्रक्रिया (केमिकल रिएक्शन) बहुत धीमे होता है अतः कचरा सड़ने की गति बहुत कम है, इसलिए भारत की तरह बदबू और रोगों का अनुपात भी कम। ऐसा होने के बावजूद विकसित देशों की कचरे के प्रति यह अत्यधिक जागरूकता  देश के वातावरण व नागरिकों को ही नहीं अपितु पर्यावरण व प्रकृति को भी बहुत संबल देती है। 


स्वच्छता का सबसे कारगर ढंग होता है कि गंदगी कम से कम की जाए। यदि एक व्यक्ति किसी स्थान पर दिन-भर कुछ न कुछ गिराता-फैलाता रहे व दूसरा व्यक्ति पूरा दिन झाड़ू लेकर वहाँ सफाई भी करता रहे, तब भी वह स्थान कभी साफ नहीं हो सकता। अतः स्वच्छता का पहला नियम ही यह है कि गंदगी कम से कम की जाए। इसे व्यवहार में लाने के लिए व्यक्ति-व्यक्ति में स्वच्छता का संस्कार व गंदगी के प्रति वितृष्णा का भाव उत्पन्न होना अनिवार्य है। आधुनिक उन्नत देशों में एक छोटा-सा बच्चा भी गंदगी न करने/फैलाने के प्रति इतना सचेत व प्रशिक्षित होता है कि देखते ही बनता है। मैंने डेढ़ वर्ष की आयु के बच्चे को उसके माता पिता द्वारा बच्चे द्वारा फैलाई फल आदि की गंदगी उठाकर उसे दूर जाकर डिब्बे में डाल कर आने के लिए कहते (व बच्चे को करते) देखा है। अपने परिवेश के प्रति ऐसी चेतना भारतीय परिवारों में नाममात्र की है। वहाँ गंदगी तो परिवार व समाज का प्रत्येक सदस्य धड़ल्ले से फैला सकता है किन्तु सफाई का दायित्व बहुधा गृहणियों व सफाई कर्मचारियों का ही होता है। अतः सर्वप्रथम तो भारत में कचरा प्रबंधन के लिए लोगों में इस आदत के विरोध में जागरूकता पैदा करनी होगी कि स्वच्छता `सफाई करने' से होती है। उन्हें यह संस्कार बचपन ही से ग्रहण करना होगा कि स्वच्छता `गंदगी न करने' से होती है। 'सफाई करने' और 'गंदगी न करने' में बड़ा भारी अंतर है।


 विकसित देशों की जिस व्यवस्था, सफाई, हरीतिमा, पर्यावरण की शुद्धता आदि की प्रशंसा होती है व जिसका आकर्षण आम भारतीय सहित किसी अन्य एशियाई (या इतर आदि) के मन में भी जगता है, वे लोग स्वयं भी संस्कार के रूप में अंकित, गंदगी फैलाते चले जाने वाले अपने अभ्यास से, विकसित देशों में रहने के बावजूद मुक्त नहीं हो पाते हैं और उन देशों की व्यवस्था को लुके-छिपे बिगाड़ते हैं। ऐसे लोग सार्वजनिक रूप से भले व्यवस्था भंग करने का दुस्साहस नहीं कर पाते, किन्तु अपने देश (यथा भारत आदि) लौटने पर पुनः आचरण में वही ढिलाई भी बरतते हैं। 


  अब रही कचरा प्रबंधन के तरीकों को अपनाए जाने की बात। यह `अपनाया जाना' भारतीय परिवेश में (ऊपर बताए कारण के चलते भी ) बहुत संभव नहीं दीखता; क्योंकि लोग इस सारी ज़िम्मेदारी से बचने के लिए कचरे को नदी-नालों में फेंक देते हैं/देंगे। यह मानसिकता सबसे बड़ा अवरोध है किसी भी स्वच्छता के इच्छुक समाज, व्यवस्था, देश अथवा संस्था के लिए। दूसरा अवरोध एक और है। यहाँ विकसित देशों में प्रत्येक वस्तु और पदार्थ  पैकेट/कंटेनर/कार्टन में बंद मिलते हैं और उस पर अंकित होता है कि उसकी पैकिंग व उस पदार्थ/वस्तु के किस-किस भाग को किस-किस कचरा-विभाग में डालना है। भारत में लोगों को कचरे के सही विभाग का यह निर्णय लेने के लिए न्यूनतम शिक्षा, जानकारी तथा जागरूकता तो चाहिए ही, साथ ही जीवन में प्रयुक्त होने वाली प्रत्येक वस्तु और उत्पाद से जुड़े घटकों पर यह अंकित होना निर्माण के समय से ही आवश्यक है कि उनका अंत क्या हो, कैसे हो, कहाँ हो। सरकार उत्पादनकर्ताओं पर ऐसा नियंत्रण व नियम लागू करेगी, यह अभी पूरी तरह असंभव है। जो उत्पाद खुले मिलते हैं, उनका विसर्जन कैसे होगा यह अलग नया विषय होगा। 




बैंगलोर में कचरा प्रबंधन के लिए यद्यपि अच्छे निर्णय लिए गए हैं किन्तु इन सब कारकों के चलते वे निर्णय सही व पूरा फल दे पाएँगे, यह संदिग्ध ही नहीं, लगभग असंभव भी है। मुझे यह सब जल्दी संभव नहीं लगता कि ऐसा ठीक-ठीक आगामी 15-20 वर्षों में भी हो पाएगा।


भारत में जो लोग जागरूक व सचेत हैं वे अपने तईं कचरे का नियमन कर सकते हैं। हम जब भारत में थे तो ऑर्गैनिक कचरा (विशेष रूप से फल, सब्जी, अनाज व हरियाली आदि) को प्रतिदिन एक बैग में भर कर ले जाते थे व किसी पशु के आगे खाने को डाल देते थे। `रि-साईकिल' हो सकने वाली प्रत्येक वस्तु को धो साफ कर एक बड़े ड्रम में अलग-अलग सम्हाल रखा करते थे व उन्हें प्रति माह कार में भरकर, ले जाकर कबाड़ी को सौंप देते थे। केवल हर तरह से व्यर्थ हो चुकी गंदगी-मात्र को ही कूड़ेदान में डाल कर फेंकते थे। लॉन आदि के बुहारे गए सूखे पत्तों को लॉन के एक सिरे पर इसी प्रयोजन से बने स्थान पर गहराई में डाल देते थे ताकि उनकी खाद बन सके। 


अपने वातावरण के प्रति इतनी जागरूकता प्रत्येक में होनी ही चाहिए... वरना पूरे देश को कूड़े के ढेर में बदलने में समय ही कितना लगता है ? विदेश में रहने वालों के लिए इसीलिए भारत को देखना बहुधा असह्य हो जाता है व हास्यास्पद भी।




 प्रकृति की ओर से जिस देश को सर्वाधिक संसाधन व रूप मिला है, प्रकृति ने जिसे  सबसे अधिक सम्पन्न व तराशे हुए रूप के साथ बनाया है, वह देश यदि पूरा का पूरा आज हर जगह कचरे के ढेर में बदल चुका है, सड़ता दीखता है तो उसका पूरा दायित्व एक एक नागरिक का है।


मणिकर्ण में पार्वती नदी


 वर्ष 2010 के अंत में हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में कुल्लू से 45 किलोमीटर दूर व मनाली से आगे पार्वती व व्यास नदियों के मध्य स्थित  मणिकर्ण नामक अत्यधिक सुरम्य स्थल पर  अत्यधिक उल्लास व चाव से गई थी, किन्तु कार से बाहर पाँव रखते ही ऐसा दृश्य था कि पाँव रखने का भी मन नहीं होता था... सब ओर गंदगी के अंबार... उफ़...उबकाई आ जाए ऐसी स्थिति दूर दूर तक थी । यह स्थल अपने गंधक के स्रोतों के कारण भी विश्वप्रसिद्ध है। नदी के एक किनारे पर स्थित पर्वत से खौलता हुआ `मिनरल वाटर' बहता है जिसे नगर व होटलों आदि में स्नानादि के लिए भी धड़ल्ले से प्रयोग किया जाता है, जबकि उस पर्वत की तलहटी में बहती नदी का जल कल्पनातीत ढंग से बर्फ़ीला व हाड़ कंपा देने वाला है।  धार्मिक स्थल के रूप में भी इसका बड़ा माहात्मय लोग सुनाते हैं। 


मणिकर्ण में हिमालय का दृश्य 


किन्तु गंदगी में डूबी इस स्थल की प्राकृतिक संपदा व पर्यावरण की स्थिति को देख कर त्रस्त हो उठी थी।  ऐसी ही स्थिति चामुंडा, धर्मशाला, मैक्लोडगंज और धौलाधार पर्वतमाला के आसपास के अन्य क्षेत्रों  में थी। ये वे क्षेत्र हैं जो प्राकृतिक सुषमा की दृष्टि से अद्भुत हैं और हमारे जलस्रोत यहाँ से प्रारम्भ होते हैं। मैंने प्रत्यक्ष देखा कि हमारी नदियाँ, हमारे जलस्रोत अपने स्रोत स्थल पर ही प्रदूषण व गंदगी से लबालब कर दिए जाते हैं। बाढ़ आदि विभीषिकाएँ कालांतर में इसी का प्रतिफल हैं। पॉलीथीन इत्यादि के प्रयोग व विसर्जन तथा `रि-साईकिल' हो सकने वाली वस्तुओं को गंदगी में डाल/फेंक कर दो-तरफा हानि करने के  अन्य भी अनेक भीषण दुष्परिणाम हैं। अतः वृक्षों की कटाई का एक बड़ा पक्ष भी इस से जुड़ा है।


जब हिमालय की तराई के क्षेत्रों की ( जहाँ जनसंख्या व उसका घनत्व कम है)  यह स्थिति है तो भारत के नगरों की दयनीय स्थिति पर क्या लिखा जाए ! मेरे मस्तिष्क में इस समय ऐसा कोई उदाहरणीय नाम ही नहीं सूझ रहा जहाँ स्थिति दूभर न हो। उत्तर का हाल तो बेहद भयावह है, किन्तु दक्षिण भारत तुलना में स्वच्छ होते हुए भी ऐसे कुत्सित व कुरुचिपूर्ण दृश्य प्रस्तुत करता है कि उबकाई आ जाए। देश में विधिवत् सर्वाधिक स्वच्छ नगर की उपाधि पाने वाले हैदराबाद सिकंदराबाद जैसे महानगर के आधुनिक परिवेश वाले स्थलों पर भी गंदगी के अंबार लगे होते हैं। सार्वजनिक मूत्रालयों से `ओवर फ़्लो' हो कर फ़र्लांग-भर दूरी तक पहुँचने वाली मूत्र की धाराएँ और हर एक कदम पर फेंकी गई थूकों का अंबार ऐसी वितृष्णा पैदा करते हैं कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। दुर्गंध व गंदगी से भभकते-खौलते सार्वजनिक कूड़ेदानों से बाहर तक फैली गंदगी में कुत्तों का मुँह मारते मचाया जाने वाला उत्पात असहनीय कहा जा सकता है। 


इसी कूड़ा कचरा अव्यवस्था / अप्रबन्धन  के चलते कचरा बीनने वाले बच्चों का जीवन नष्ट हो जाता है। इस बार दिल्ली में एक युवक ने सप्रमाण पुष्टि की कि जब उसने कॉलोनी में साफ सफाई के लिए अपने हाथ से स्वयं अभियान चलाया तो एक माफिया ने उसे जान से मार देने की धमकियाँ दीं; क्योंकि बच्चों को चुराने व चुरा कर उन्हें कचरे के ढेरों में झोंकने व फिर आगे  कॉलोनियों में चोरी व हत्या आदि तक, इसी प्रक्रिया के माध्यम से सिरे तक पहुँचाए जाते हैं। पूरे अपराध- रैकेट इस से संबद्ध व इस पर केन्द्रित होकर गतिशील हैं। कितने जीवन भारतीयों की इस आदत व अ-नियमन से दाँव पर लगे होते हैं। दूसरी ओर यदि इसी कचरे का सही प्रबंध किया जाए तो देश को कितने प्राकृतिक उर्वरक मिल सकते हैं और `रि-साईकिल' हो सकने वाली वस्तुओं के सही प्रयोग द्वारा कितनी राष्ट्रीय क्षति बचाई जा सकती है, इसका अनुमान हजार लाख में नहीं अपितु अरबों खरबों में लगाइये। पर्यावरण व प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा तथा उनके क्षय पर रोक भी लगेगी। स्वास्थ्य व जीवन रक्षक दवाओं पर होने वाला खर्च कम होगा, व्यक्ति का शारीरिक मानसिक  स्वास्थ्य उत्तरोत्तर सुधरेगा... विदेशी पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी और इससे विदेशी पूँजी भी। देश की छवि जो सुधरेगी वह एक अतिरिक्त लाभ। 


एक-एक व्यक्ति के थोड़े-से उत्तरदायित्वपूर्ण हो जाने से कितने-कितने लाभ हो सकते हैं ... यह स्पष्ट देखा जा सकता है। अन्यथा विधिवत् विदेशी साहित्य और अंतर-राष्ट्रीय स्तर की फिल्मों (ऑस्कर विजेता  
Slumdog Millionaire ) के साथ साथ  मीडिया में  समूचे भारत को `सार्वजनिक शौचालय'  माना/कहा जाता रहेगा।  भावी पीढ़ियाँ कचरे के ढेर पर अपना जीवन बिताएँगी और उनके पास साँस लेने के लिए भी पर्याप्त साफ स्थान और वातावरण तक नहीं होगा। अच्छे स्थलों की खोज में कुछ अवधि के लिए धनी तो विदेश घूम आएँगे किन्तु मध्यमवर्ग व शेष समाज उसी त्राहि-त्राहि में जीवन जीने को शापित रहेगा। कचरे से उपजी विपदा के चलते भारत एक गंभीर खतरे की कगार और विस्फोट के ढेर पर बैठा है।





Children in Kanpur, India, sift through a garbage dump looking for anything that can be recycled to make money.


सोचना आपको है, निर्णय आपका !! क्या देना चाहते हैं अपने बच्चों को विरासत में ? केवल कूड़े कचरे की विरासत और गंदगी का साम्राज्य !!  जो स्वयं, कभी भी हो जाने वाले विस्फोट पर टिका है....  

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यह लेख दिल्ली, कोलकाता, लखनऊ व चंडीगढ़ से एकसाथ प्रकाशित होने वाले हिन्दी दैनिक 'जनसत्ता' के 21 अक्तूबर 2012 के "रविवारीय" में कवर स्टोरी के रूप में उनके पृष्ठ 13 पर प्रकाशित हुआ है।

उसे इस लिंक पर देखा जा सकता है - http://epaper.jansatta.com/63760/Jansatta.com/21-October-2012#page/13/1


बड़े आकार में देखने के लिए चित्र पर या इस लिंक क्लिक करें 





यहाँ भी इसे देखा जा सकता है 



20 अक्तूबर 2012 शनिवार के जनसत्ता के मुखपृष्ठ पर रविवारी अंक की सूचना 

Thursday, October 18, 2012

कबीर का अंग-राग और साबुन : जीवनमूल्य 'आऊटडेटेड'

कबीर का अंग-राग : जीवनमूल्य 'आऊटडेटेड' : कविता वाचक्नवी
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पिछले दिनों निराला की 'मातृवन्दना' को साझा किया तो एक मित्र ने टिप्पणी करते हुए कहा कि कविता तो अच्छी चुनी किन्तु इसमें तो पराधीन भारतमाता का स्मरण किया है। इस पर एक दूसरे मित्र ने तर्क दिया कि भारतमाता अभी भी बेड़ियों में बंद है, इसलिए समीचीन है। 


समय-विशेष या घटना-विशेष बीत जाने से कालजयी कविताओं के अप्रासंगिक अथवा अ-समीचीन हो जाने के तर्कों वाले इस काल में आज मुझे फिर से कबीर का एक दोहा पढ़ने को मिला। आपने भी कई बार पढ़ा सुना होगा - 

निन्दक नियरे राखिए आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना निरमल करे सुभाय॥

इसे पढ़कर बरबस एक हँसी मन में तैर गई। निंदा तो क्या, स्वस्थ आलोचना तक न सहन कर पाने वाले इस काल में [ जब आम आदमी से लेकर हिन्दी के दिग्गज तक अपने अस्तित्व को बनाए रखने की जद्दोजहद में एक दूसरे को गालियों से निरंतर नवाज रहे हैं और उन्हें धड़ाधड़ प्रकाशित भी करवा रहे हैं (देखिए, विष्णु खरे प्रसंग) ] तो यह दोहा उनके संदर्भ में कितना अप्रासंगिक ही कहा जाएगा !! 


हम लोगों ने इसका अवमूल्यन कर भले इसे 'आऊटडेटेड' प्रमाणित कर दिया हो किन्तु इतिहास की दृष्टि से कम से कम एक कारण से तो यह निस्संदेह सदा प्रासंगिक और महत्वपूर्ण रहेगा; यह प्रमाणित करने के लिए, कि कबीर के समय तक साबुन का आविष्कार हो चुका था और भारत में भी कबीर व उनके परिचित लोग साबुन का प्रयोग नियमित किया करते थे। 


संस्कृत साहित्य में तो कदापि नहीं व हिन्दी साहित्य में भी सबसे पहली बार साबुन का प्रयोग कबीर ही ने किया है, अन्यथा संस्कृत में तो "अद्भिर्गात्राणि शुध्यंति... ' (जल से देहशुद्धि) की बात है। पूर्ववर्ती साहित्य में तो केवल चूर्ण, अंगराग और उबटन आदि ही शुद्धि के इस कार्य के लिए प्रयोग होने के उदाहरण व संदर्भ मिलते हैं। 


हो सकता है, आने वाले समय में हिन्दी का कोई वीर शोधार्थी कबीर की सामाजिक चेतना व समाज से आडंबरों की धुलाई सफाई की प्रेरकशक्ति के रूप में इसी साबुन की महती भूमिका को प्रमाणित कर किसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसरशिप ही /भी पा जाए। 


विश्व हिंदी सम्मेलन : सार्थकता, औचित्य व दायित्व


विश्व हिंदी सम्मेलन : सार्थकता, औचित्य व दायित्व  :  (डॉ.) कविता वाचक्नवी



गत दिनों दक्षिण अफ्रीका में सम्पन्न हुए 9वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के संदर्भ में हिन्दी से जुड़े लेखकों, कलमकारों, तकनीक विशेषज्ञों, पाठकों व प्रेमियों के मध्य सम्मेलन को लेकर भिन्न भिन्न  प्रकार के संवाद, सम्मतियाँ, आपत्तियाँ, आरोप प्रत्यारोप, प्रश्नाकुलताएँ व विरोध, समर्थन इत्यादि का दौर चलता रहा है। इसी बीच हिन्दी के तकनीकी पक्ष से जुड़े हरिराम जी ने हिन्दी-भारत (याहूसमूह) पर एक लंबी टिप्पणी लिखी जिसमें सम्मेलन में भाग लेने वालों से कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे गए थे। उन प्रश्नों वाले संदेश को पढ़कर जो प्रतिक्रिया मैंने लिखी  उसे अगले दिन 'प्रवासी दुनिया' ने स्वतंत्र आलेख के रूप में प्रकाशित भी कर दिया    

 निम्नलिखित बॉक्स में हरिराम जी द्वारा उठाए गए वे महत्वपूर्ण प्रश्न ज्यों के त्यों पढे जा सकते हैं और
उत्तर में लिखी मेरी टिप्पणी को भी आलेख  (विश्व हिंदी सम्मेलन : सार्थकता, औचित्य व दायित्व ) के रूप में पढ़ा जा सकता है।  




*निम्न कुछ तथ्यपरक व चुनौतीपूर्ण प्रश्न 9वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में पधारे विद्वानों से करते हुए इनका उत्तर एवं समाधान मांगा जाना चाहिए..

 (1)---- हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने के लिए कई वर्षों से आवाज उठती आ रही है, कहा जाता है कि इसमें कई सौ करोड़ का खर्चा आएगा... बिजली व पानी की तरह भाषा/राष्ट्रभाषा/राजभाषा भी एक इन्फ्रास्ट्रक्चर (आनुषंगिक सुविधा) होती है.... अतः चाहे कितना भी खर्च हो, भारत सरकार को इसकी व्यवस्था के लिए प्राथमिकता देनी चाहिए।

 (2) ---- हिन्दी की तकनीकी रूप से जटिल (Complex) मानी गई है, इसे सरल बनाने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं? 
 -- कम्प्यूटरीकरण के बाद से हिन्दी का आम प्रयोग काफी कम होता जा रहा है...
 -- -- हिन्दी का सर्वाधिक प्रयोग डाकघरों (post offices) में होता था, विशेषकर हिन्दी में पते लिखे पत्र की रजिस्ट्री एवं स्पीड पोस्ट की रसीद अधिकांश डाकघरों में हिन्दी में ही दी जाती थी तथा वितरण हेतु सूची आदि हिन्दी में ही बनाई जाती थी, लेकिन जबसे रजिस्ट्री और स्पीड पोस्ट कम्प्यूटरीकृत हो गए, रसीद कम्प्यूटर से दी जाने लगी, तब से लिफाफों पर भले ही पता हिन्दी (या अन्य भाषा) में लिखा हो, अधिकांश डाकघरों में बुकिंग क्लर्क डैटाबेस में अंग्रेजी में लिप्यन्तरण करके ही कम्प्यूटर में एण्ट्री कर पाता है, रसीद अंग्रेजी में ही दी जाने लगी है, डेलिवरी हेतु सूची अंग्रेजी में प्रिंट होती है। -- -- 
अंग्रेजी लिप्यन्तरण के दौरान पता गलत भी हो जाता है और रजिस्टर्ड पत्र या स्पीड पोस्ट के पत्र गंतव्य स्थान तक कभी नहीं पहुँच पाते या काफी विलम्ब से पहुँचते हैं। अतः मजबूर होकर लोग लिफाफों पर पता अंग्रेजी में ही लिखने लगे है।
 *डाकघरों में मूलतः हिन्दी में कम्प्यूटर में डैटा प्रविष्टि के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं?* 

 (3)-- -- रेलवे रिजर्वेशन की पर्चियाँ त्रिभाषी रूप में छपी होती हैं, कोई व्यक्ति यदि पर्ची हिन्दी (या अन्य भारतीय भाषा) में भरके देता है, तो भी बुकिंग क्लर्क कम्प्यूटर डैटाबेस में अंग्रेजी में ही एण्ट्री कर पाता है। टिकट भले ही द्विभाषी रूप में मुद्रित मिल जाती है, लेकिन उसमें गाड़ी व स्टेशन आदि का नाम ही हिन्दी में मुद्रित मिलते हैं, जो कि पहले से कम्प्यूटर के डैटा में स्टोर होते हैं, रिजर्वेशन चार्ट में नाम भले ही द्विभाषी मुद्रित मिलता है, लेकिन "नेमट्रांस" नामक सॉफ्टवेयर के माध्यम से लिप्यन्तरित होने के कारण हिन्दी में नाम गलत-सलत छपे होते हैं। मूलतः हिन्दी में भी डैटा एण्ट्री हो, डैटाबेस प्रोग्राम हो, इसके लिए व्यवस्थाएँ क्या की जा रही है? 

 (4)-- -- मोबाईल फोन आज लगभग सभी के पास है, सस्ते स्मार्टफोन में भी हिन्दी में एसएमएस/इंटरनेट/ईमेल की सुविधा होती है, लेकिन अधिकांश लोग हिन्दी भाषा के सन्देश भी लेटिन/रोमन लिपि में लिखकर एसएमएस आदि करते हैं। क्योंकि हिन्दी में एण्ट्री कठिन होती है... और फिर हिन्दी में एक वर्ण/स्ट्रोक तीन बाईट का स्थान घेरता है। यदि किसी एक प्लान में अंग्रेजी में 150 अक्षरों के एक सन्देश के 50 पैसे लगते हैं, तो हिन्दी में 150 अक्षरों का एक सन्देश भेजने पर वह 450 बाईट्स का स्थान घेरने के कारण तीन सन्देशों में बँटकर पहुँचता है और तीन गुने पैसे लगते हैं... क्योंकि हिन्दी (अन्य भारतीय भाषा) के सन्देश UTF8 encoding में ही वेब में भण्डारित/प्रसारित होते हैं। *हिन्दी सन्देशों को सस्ता बनाने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं?*

 (5)-- -- अंग्रेजी शब्दकोश में अकारादि क्रम में शब्द ढूँढना आम जनता के लिेए सरल है, हम सभी भी अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश में जल्दी से इच्छित शब्द खोज लेते हैं, -- -- लेकिन हमें यदि हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोश में कोई शब्द खोजना हो तो दिमाग को काफी परिश्रम करना पड़ता है और समय ज्यादा लगता है, आम जनता/हिन्दीतर भाषी लोगों को तो काफी तकलीफ होती है। हिन्दी संयुक्ताक्षर/पूर्णाक्षर को पहले मन ही मन वर्णों में विभाजित करना पड़ता है, फिर अकारादि क्रम में सजाकर तलाशना पड़ता है... विभिन्न डैटाबेस देवनागरी के विभिन्न sorting order का उपयोग करते हैं। *हिन्दी (देवनागरी) को अकारादि क्रम युनिकोड में मानकीकृत करने तथा सभी के उपयोग के लिए उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?*

 (6) -- -- चाहे ऑन लाइन आयकर रिटर्न फार्म भरना हो, चाहे किसी भी वेबसाइट में कोई फार्म ऑनलाइन भरना हो, अधिकांशतः अंग्रेजी में ही भरना पड़ता है... -- -- Sybase, powerbuilder आदि डैटाबेस अभी तक हिन्दी युनिकोड का समर्थन नहीं दे पाते। MS SQL Server में भी हिन्दी में ऑनलाइन डैटाबेस में काफी समस्याएँ आती हैं... अतः मजबूरन् सभी बड़े संस्थान अपने वित्तीय संसाधन, Accounting, production, marketing, tendering, purchasing आदि के सारे डैटाबेस अंग्रेजी में ही कम्प्यूटरीकृत कर पाते हैं। जो संस्थान पहले हाथ से लिखे हुए हिसाब के खातों में हिन्दी में लिखते थे। किन्तु कम्प्यूटरीकरण होने के बाद से वे अंग्रेजी में ही करने लगे हैं। *हिन्दी (देवनागरी) में भी ऑनलाइन फार्म आदि पेश करने के लिए उपयुक्त डैटाबेस उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?*

 (7) ---सन् 2000 से कम्प्यूटर आपरेटिंग सीस्टम्स स्तर पर हिन्दी का समर्थन इन-बिल्ट उपलब्ध हो जाने के बाद आज 12 वर्ष बीत जाने के बाद भी अभी तक अधिकांश जनता/उपयोक्ता इससे अनभिज्ञ है। आम जनता को जानकारी देने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? 

 (8)--- भारत IT से लगभग 20% आय करता है, देश में हजारों/लाखों IITs या प्राईवेट तकनीकी संस्थान हैं, अनेक कम्प्यूटर शिक्षण संस्थान हैं, अनेक कम्प्टूर संबंधित पाठ्यक्रम प्रचलित हैं, लेकिन किसी भी पाठ्यक्रम में हिन्दी (या अन्य भारतीय भाषा) में कैसे पाठ/डैटा संसाधित किया जाए? ISCII codes, Unicode Indic क्या हैं? हिन्दी का रेण्डरिंग इंजन कैसे कार्य करता है? 16 bit Open Type font और 8 bit TTF font क्या हैं, इनमें हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाएँ कैसे संसाधित होती हैं? ऐसी जानकारी देनेवाला कोई एक भी पाठ किसी भी कम्प्यूटर पाठ्यक्रम के विषय में शामिल नहीं है। ऐसे पाठ्यक्रम के विषय अनिवार्य रूप से हरेक computer courses में शामिल किए जाने चाहिए। हालांकि केन्द्रीय विद्यालयों के लिए CBSE के पाठ्यक्रम में हिन्दी कम्प्यूटर के कुछ पाठ बनाए गए हैं, पर यह सभी स्कूलों/कालेजों/शिक्षण संस्थानों अनिवार्य रूप से लागू होना चाहिए। *इस्की और युनिकोड(इण्डिक) पाठ्यक्रम अनिवार्य करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?* 


 (9)---हिन्दी की परिशोधित मानक वर्तनी के आधार पर समग्र भारतवर्ष में पहली कक्षा की हिन्दी "वर्णमाला" की पुस्तक का संशोधन होना चाहिए। कम्प्यूटरीकरण व डैटाबेस की "वर्णात्मक" अकारादि क्रम विन्यास की जरूरत के अनुसार पहली कक्षा की "वर्णमाला" पुस्तिका में संशोधन किया जाना चाहिए। सभी हिन्दी शिक्षकों के लिए अनिवार्य रूप से तत्संबंधी प्रशिक्षण प्रदान किए जाने चाहिए। *इसके लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? 

 (10)--- अभी तक हिन्दी की मानक वर्तनी के अनुसार युनिकोड आधारित कोई भी वर्तनी संशोधक प्रोग्राम/सुविधा वाला साफ्टवेयर आम जनता के उपयोग के लिए निःशुल्क डाउनलोड व उपयोग हेतु उपलब्ध नहीं कराया जा सका है। जिसके कारण हिन्दी में अनेक अशुद्धियाँ के प्रयोग पाए जाते हैं। इसके लिए क्या व्यवस्थाएँ की जा रही हैं? 
 -- हरिराम



विश्व हिंदी सम्मेलन : सार्थकता, औचित्य व दायित्व   
 (डॉ.) कविता वाचक्नवी


“विश्व हिन्दी सम्मेलन” एक बहुत अच्छे उद्देश्य व मंतव्य से प्रारम्भ हुआ था। सरकार इसका खर्च वहन करती है, यह भी प्रशंसनीय है । किन्तु जैसा कि एकदम निर्धारित व स्थापित तथ्य बन चुका है कि बंदरबाँट के कारण बरती जाने वाली अदूरदर्शिता के चलते दुर्भाग्य से यह मात्र कुछ सांसदों, अधिकारियों व सम्बन्धों का आयोजन बन चुका है।


इसके लिए दोष किन्हीं अँग्रेजी वालों या अँग्रेजी को देना बहुत सीमा तक अनुचित है।....  क्योंकि मैं इसके लिए स्वयं हिन्दी वालों को उत्तरदायी समझती हूँ… वे किसी भी चीज का विरोध या समर्थन विवेक व सही गलत के आधार पर नहीं अपितु अपना लाभ-हानि देख कर करते हैं। इसीलिए जिन्हें जब तक इस सम्मेलन में सरकारी खर्च पर नहीं बुलाया जाता और जब तक इनके वांछितों के नियंत्रण में इसे नहीं सौंप दिया जाता, तब तक वे (हिन्दी से संबन्धित प्रत्येक संस्था, आयोजन, प्रकाशन आदि की तर्ज पर) इसका भी विरोध और मखौल उड़ाते रहेंगे/ रहते हैं और इस सम्मेलन के औचित्य पर प्रश्नचिह्न लगा कर इसे बंद कर देने के पक्ष में हल्ला मचाए रहेंगे/ रहते हैं। किन्तु हिन्दी से संबन्धित प्रत्येक संस्था, आयोजन, प्रकाशन आदि की तर्ज पर जैसे ही चीज उनके हाथ में आए या उन्हें सम्मिलित कर लिया जाए, उनका सारा विरोध और बहिष्कार टाँय टाँय फिस्स हो जाता है। मूलतः हम अधिकांश हिन्दी वालों की सारी लड़ाई अपने कारणों से शुरू होती है और अपने स्वार्थ की पूर्ति हो जाने पर समाप्त हो जाती है। हिन्दी वालों की पक्षधरताएँ स्वार्थ के बूते तय होती हैं। वे इस व्यापार को बखूबी जानते हैं कि कब किस के पक्ष में बोलना है, कब किसका विरोध करना है। मूलतः हिन्दी उनके व्यावसायिक हितों (?) को साधने का माध्यम- भर रह गई है।


ऐसे काल व वातावरण में व ऐसे ही लोगों के वर्चस्व के चलते कुछ बचे खुचे वास्तविक भाषाप्रेमियों की जगह-जगह व बार बार ऐसी-तैसी होती रहती है और उनके विचारों, सुझावों एवं मान्यताओं सहित उन्हें भी झटक कर दूर कर देने का कुचक्र जोर-शोर व सर्वमान्य ढंग से नियमित तथा प्रत्येक प्रकरण में जारी है।


इसी प्रवृत्ति का शिकार यह सम्मेलन भी गत कई वर्षों से होता आया है व हो रहा है। अधिकांश स्थापित लोग भी इसकी निंदा इसलिए करते हैं क्योंकि वे स्वयं इसका हिस्सा नहीं हैं। वे इसका बहिष्कार यहाँ तक करना चाहते हैं कि इस सम्मेलन को पूर्णतया समाप्त कर देने व सरकार द्वारा इसका खर्च न दिए जाने की वकालत करते हैं। जबकि सम्मेलन न होने देना समस्या का समाधान नहीं और न ही सम्मेलन का औपचारिकता-भर बन जाना केवल सरकार का दोष है। मेरे विचार में तो हिन्दी और भारतीय भाषाओं के पतन के लिए मूलतः इन भाषाओं के प्रयोक्ताओं  ही अधिक जिम्मेदार हैं, जो अपनी मानसिकता के कारण एक अच्छी चीज को भी अपने स्वार्थ/स्वार्थों के चलते नष्ट कर देने में सदा निमग्न रहते हैं।


वर्तमान संदर्भों में हिन्दी को जोड़ कर देखने वाले व उसका उत्थान चाहने वाले कुछ वरिष्ठ हिन्दी सेवियों ने इस सम्मेलन की `थीम’ सुझाने के लिए आयोजित हुई बैठक में `तकनीक और हिन्दी’ को `थीम’ के रूप में रखना प्रस्तावित किया था। किन्तु प्रस्ताव के चरण में ही उसे उस रूप में स्वीकार नहीं किया गया। इसका कारण क्या हो सकता है, यह अनुमान आप ऊपर लिखे गए वाक्यों के साथ जोड़ कर लगा सकते हैं। `तकनीक और हिन्दी’ एक ऐसा विषय है, जिस पर वही साधिकार बोल लिख सकता है, जो इस क्षेत्र से जुड़ा है। यह क्षेत्र नया होने के कारण इस पर सालों से तैयार पड़ी सामग्री का ढेर भी नहीं है कि कोई भी, कहीं से भी शुरू करे और कुछ भी बोल दे… जो कि सम्मेलनों में बरसों से बोलते चले आने का अभ्यास रखने वालों के लिए कठिन हो जाता । ऐसे में इस विषय का इस रूप में धराशायी हो जाना स्वाभाविक ही था।


अब इसी का दूसरा पक्ष एक और भी है। वह यह कि हिन्दी में तकनीक से जुड़े लोगों का 2-3 प्रतिशत भी ऐसा नहीं है जो भाषा संरचना, भाषा की सैद्धांतिकी आदि से परिचित हो। भारतीय भाषाओं और मुख्यतः हिन्दी में तकनीक के प्रयोक्ताओं में बहुत विरले लोग हैं जो भाषा का शास्त्र और भाषा का विज्ञान व सैद्धांतिकी जानते हैं व जिनकी एकेडमिक समझ प्रशंसनीय व तलस्पर्शी हो। इन 2-3 प्रतिशत को यदि हमारा भाषासमाज, आयोजक, संस्थाएँ और संगठन आदि सही व समुचित आदर, स्थान व महत्व नहीं देते हैं तो यह दोष उन लोगों का है, उस समाज का है और उसे हानि उठानी ही पड़ेगी। हर क्षेत्र की तरह यहाँ भी नकली लोग अपनी चाँदी काटने में व्यस्त हो ही जाएँगे… यथापूर्वम्… ! तकनीक व भाषिक उर्वरता के मध्य की इस खाई का लाभ स्वार्थसिद्धि में रत मानसिकता को मिलता ही है। इसका कुछ दोष उन अकादमिक लोगों पर भी है जो तकनीक से बिदकते हैं और उसे भाषा व साहित्य के लिए त्याज्य व निकृष्ट समझते हैं।


इन तथ्यों और वस्तुस्थिति के आलोक में देखने पर आपके ये प्रश्न जिनसे समाधान की आशा करते हैं …. उनके पास उत्तर नहीं होने से पहले, उत्तर देने वालों का ही न होना एक बड़ी त्रासदी है। किन्तु इस त्रासदी के लिए हम सभी स्वयं उत्तरदायी हैं, हमारे भाषा-समाज की मानसिकता उत्तरदायी है। … क्योंकि वस्तुत: सरकार पैसा लगा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है और कुम्भ की तरह सांसद, अधिकारी व उनके परिचित भी कृतकृत्य हो जाते हैं। आयोजन को सार्थक व ठोस बनाने रखने का दायित्व तो स्वयं हिन्दी वालों का है, अतः उसके सार्थक व ठोस न होने का दायित्व भी हमारा ही हुआ। सम्मेलन के आयोजन पर ही प्रश्नचिह्न लगाना मुझे इसीलिए उपयुक्त नहीं लगता।


जब तक हिन्दी भाषासमाज की मानसिकता कई ढेरों-ढेर इच्छाओं (?) से उबरती नहीं है, तब तक आपको व हमें यक्ष की तरह युधिष्ठिर के आने की प्रतीक्षा में अपने प्रश्नों के साथ जलाशय की रखवाली जिस किसी तरह करते रहने को शापित रहना होगा और युधिष्ठिरों का पथ प्रशस्त करने के लिए स्वयं बुरे बन कर अन्य `प्यासों’ को मूर्छना की कसैली औषध पिलाते रहना होगा।

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Saturday, October 13, 2012

संस्कृत : छंदविज्ञान, सैद्धांतिकी, काव्यशास्त्र और कबीर

संस्कृत : छंदविज्ञान, सैद्धांतिकी और कबीर  :  कविता वाचक्नवी


बहुत बचपन में ही पूरा छन्दशास्त्र पढ़ डालने के अनगिन लाभों की याद बरबस ही बनी रहती है। आज वह सैद्धांतिकी तो भले याद नहीं किन्तु कविता रचते समय उस सैद्धांतिकी का नियमन हर समय कलम की नोक को साधता आ रहा है। 


बचपन के उन दिनों में गुरुजी से निरुक्त पढ़ना कभी-कभी बड़ा कष्टसाध्य और कभी बड़ा रोचक लगा करता था। हजारों प्रसंग आज भी मन में करवट लिया करते हैं और किसी रुष्क विषय को कैसे सरस बनाया जा सकता है, यह स्मरण दिलाए रखते हैं। 


परंतु उसके पश्चात् जैसे ही लौकिक संस्कृत का छन्दशास्त्र पढ़ने लगे तो अलग तरह का आनंद आने लगा। पूरे छंदविज्ञान की आधार गणना को एक श्लोक में पढ़ लेने के बाद छन्दशास्त्र हस्तामलकवत् लगने लगा था। वह श्लोक आज भी कंठस्थ है जिसने सारी गणना साधना सिखा दिया था - 


मस्त्रिगुरुस्त्रिलघुश्च नकारो ।
भादिगुरुः पुनरादिलघुर्यः ।
जो गुरुमध्यगतो रलमध्यः
सोऽन्तगुरुः कथितोऽन्तलघुस्तः ॥


गत दिनों एक सज्जन ने इस बात पर आपत्ति की व तर्क देने लगे और कहने लगे कि 'जो भाषा आम आदमी की समझ में आ सके, उसी में अभिव्यक्ति हो तो मन को सुन्दर लगता है,और बरसों से अब रचनाकार, इसी सरलता की तरफ चल पड़े है। पक्का तो पता नही , लेकिन अमीर खुसरों और तुलसीदास जी आदि ने सरल, आम आदमी की ही भाषा को अपनाया और जनता में प्रसिद्ध भी हुये। कालिदास, भास , आदि कवि महान तो अवश्य है, मगर स्कूल--- कोलिज और पुस्तकालय तक सीमित हैं' । 


अब उन्हें कौन समझाए कि जो जिसे समझता है या समझने के लिए कुछ यत्न करता है, वही उसे समझने लगता है। बिना पढ़े और समझे तो लोगों को अब तुलसी और रसखान तक समझ नहीं आते। कल को वे इसी तर्क से ही उन्हें भी आऊटडेटेड करार दे देंगे और उन्हें भी स्कूल कॉलेज और पुस्तकालय तक सीमित रह जाने वाले घोषित कर देंगे, तब क्या कीजिएगा? किस किस को तज कर 'अपडेटेड' और 'अप टू डेट' बनेंगे हम ? सरलता के नाम पर तो सब से सरल कुछ भी न जानना है, तो फिर सारा ज्ञान विज्ञान भी क्यों पढ़ना ? उसे पढ़ना कोई सरल है क्या ? लोगों को अब हिन्दी भी अंग्रेजी मिलाकर बोली जाने पर समझ आती है। तब तो हिन्दी भी ठंडे बस्ते में डाल दी जाए। कुछ मेरे जैसे बेवकूफ लोगों को हमारे हाल पर  चीजों को जिंदा रखने की अलख जगाने के लिए छोड़ दें। 


इतने पर ही मामला ठंडा नहीं हुआ। उनका साथ देने कुछ और सज्जन फिर कबीर को घसीटने लगे कि 'कबीर तो पढे-लिखे नहीं थे, ये सब बेकार की चीजें हैं, असली चीज अपने मन के भाव होती है, क्या जरूरत है शास्त्र-वास्त्र की, आज के समय में कौन शास्त्र पढ़ता है और बिना शास्त्र जाने भी इतने कवि आदि हैं। कविता के लिए यह सब जरूरी चीजें नहीं हैं। बेकार है यह सब ' आदि आदि। 


उन्हें कैसे समझाया जा सके कि पढ़ा तो आज लाखों कवियों ने काव्यशास्त्र भी नहीं, या अलंकारशास्त्र भी नहीं । हजारों-लाखों लोगों ने आलोचना की प्रविधियाँ नहीं पढीं। इससे क्या आलोचना-शास्त्र को पढ़ने वाले अपराधी हो गए ? या विश्वविद्यालयों में उसका अध्ययन-अध्यापन बंद करवा दिया जाना चाहिए ? या पुस्तकों को आग के हावाले कर देना चाहिए और लिखने-पढ़ने पर प्रतिबंध लगवा देना चाहिए ? लोगों द्वारा किसी विषय के न पढ़ने से किसी ज्ञान की उपादेयता कम हो जाती तो संसार के सारे ज्ञान को तिलांजलि दे देनी चाहिए कि अमुक का जीवन उक्त विषय के ज्ञान के बिना भी मजे से कट गया। किसी ने कुछ नहीं पढ़ा तो उनके न पढ़ने से पढ़ने वाला दोषी कैसे हो गया ? अजब तर्क हैं ऐसे लोगों के ! किसी चीज को न पढ़ कर पढ़ने वालों या ज्ञान को ही धिक्कारा जाए .... क्या यही महानता है !! अहम् की भी पराकाष्ठा होनी  चाहिए और अहम भी कैसा !!  सही कहा गया है कि अज्ञानी का अहम् बहुत बड़ा होता है। 


 अत्याधुनिक पाश्चात्य जगत तक में अभी भी संगीत के शास्त्र से लेकर सब विद्याओं के शास्त्रों का मनोयोगपूर्वक अध्ययन-अध्यापन होता है और यह नया युग तो विधिवत् पारंगतता (स्पेशलाईज़ेशन) प्राप्त करने का है, लोग विषय की पारंगतता (स्पेशलाईज़ेशन) प्राप्त करने के लिए संबन्धित विषय की सैद्धांतिकी पर जीवन लगा देते हैं आजकल। ऐसे में हिन्दी साहित्य के प्रबुद्ध कहे जाने वालों की इस मानसिकता पर क्षोभ ही किया जा सकता है। वस्तुतः कष्ट सारा संस्कृत को लेकर है। इसलिए इनके तर्क से तो नागार्जुन और त्रिलोचन भी निरस्त हो जाएँ। मूलतः यह हिन्दी-साहित्य की एक बड़ी प्रवृत्ति के रूप में समाज में पनप रहा नया रोग है। लोग 'भाषा समझ नहीं आती' के तर्क से हमारी भाषाओं की हत्या कर रहे हैं, 'ग्रन्थ समझ नहीं आते' के तर्क से भारतीय ज्ञान-विज्ञान को खारिज करने की साजिश कर रहे हैं। अपना स्तर बढ़ाने की अपेक्षा चीजों के सरलीकरण के नाम पर हर चीज की हत्या करने को सहन करना उपयुक्त नहीं। 


इससे भी अधिक हास्यास्पद बात यह कि लोग चीजों को बिना पढ़े उन्हें अनावश्यक, घटिया, निरर्थक व महत्वहीन सिद्ध करने में दौड़े रहते हैं और उन्हें खारिज करने में जुट जाते हैं। इस से यही प्रमाणित होता है कि लोग अपने न पढ़े होने को भी अपनी विशिष्टता प्रमाणित करने की जिद्द इसलिए करते हैं क्योंकि मनोविज्ञान के अनुसार वे किसी कुंठा (कॉम्प्लेक्स) से ग्रस्त होते हैं। ऊपर से मजे की बात यह है कि ले-दे कर ऐसे लोगों को कबीर ही याद आते हैं, अर्थात् एक तरह से ये लोग स्वयं को कबीर सिद्ध करना चाहते हैं। लोगों द्वारा इस प्रकार अपनी तुलना कबीर से करते हुए रत्ती-भर भी संकोच नहीं करना मुझे सदा हैरत में डालता रहा है कि क्या खाकर लोग स्वयं को कबीर समझते हैं ? कबीर क्या अपढ़ या कुपढ़ थे जो ज्ञान को निरस्त करने वाले ऐसे लोग कबीर को सदा ज्ञान के विरोध का प्रतीक मान कर अपने स्वार्थ के लिए प्रयोग करते हैं? कबीर की 'मसि-कागद न छूने और कलम न पकड़ने' की बात से इन लोगों ने यह कैसे प्रमाणित कर दिया कि कबीर अज्ञानी थे या ज्ञानविरोधी थे, या अपढ़ थे ? कबीर के काव्य में रत्ती-भर भी छंद- मात्रा का दोष ढूँढ कर दिखाएँ तो सही ! कबीर का ज्ञान का स्रोत भले किताबें नहीं थीं, किन्तु उन्होंने अपने गुरुओं से जो शिक्षा पाई, उसका क्या कोई मोल नहीं है ? क्या कबीर ने उस शिक्षा को गाली दी, नकारा या निरस्त किया ? 

empathy
किसी भी विद्या के शास्त्र और ज्ञान अथवा सैद्धांतिकी को खारिज / निरस्त करने वाले तर्कों और तार्किकों  का दंभ देखकर यह तो निस्संदेह पता चलता ही है कि दंभ का स्रोत कहाँ व क्या होता है। ज्ञान को खारिज करना निस्संदेह सबको दम्भी ही बनाता है।


छंदविज्ञान की उपर्युक्त चार पंक्तियाँ जो उद्धृत की थीं; उन पंक्तियों का हिन्दी में भी अर्थ बताने की इच्छा कुछ मित्रों ने संदेश भेजकर व्यक्त की है। अतः इस बहाने मुझे भी अपनी स्मृतियों को व पाई हुई सीख को इन पंक्तियों के माध्यम से दुहराने का अवसर मिल रहा है। अतः थोड़ा संक्षेप में इन पंक्तियों के बारे में - 

काव्यशास्त्र के अनुसार विविध छंदों में विविध मात्राओं ( जिन्हें वहाँ लघु व दीर्घ कहा जाता है ) का नियोजन होता है। यों तो प्रत्येक काव्यरचना में वही दो प्रकार की मात्राएँ होती हैं, किन्तु संस्कृत में इन दो मात्राओं को तीन-तीन के अलग अलग प्रकार के 'सेट' (वर्गों ) में बाँट दिया गया है (मात्राओं को अलग अलग ढंग से प्रयोग करने के निर्धारित इन वर्गों को गण कहा जाता है) तो कई गण बने हुए हैं, जैसे यगण मगण तगण इत्यादि। ये यगण मगण तगण इत्यादि जिस क्रम से रचना में प्रयोग होते हैं, वही क्रम तय करता है कि उक्त रचना में उक्त उक्त छंद है। संगीत में जैसे राग रागिनियाँ होते हैं कुछ वैसा ही समझ लीजिए। 


अब एक उदाहरण देती हूँ। जैसे, एक छंद है 'इंद्रवज्रा ' । 'इंद्रवज्रा ' छन्द के प्रत्येक चरण में 11 -11 वर्ण होते हैं। ये 11 -11 वर्ण (यगण तगण मगण आदि ) जब, जहाँ, जिस रचना में एक निर्धारित क्रम मे आएँगे, वह रचना इंद्रवज्रा छंद की होगी। इस छंद की परिभाषा है - " स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः " अर्थात् इन्द्रवज्रा के प्रत्येक चरण में दो तगण, एक जगण और दो गुरु के क्रम से वर्ण होते हैं। 


अब छंद के इस लक्षण (परिभाषा) का पता होने के बावजूद किसी को भी 'वर्ण' को पहचानना कठिन हो सकता है कि तगण किसे कहते हैं और जगण आदि क्या होता है। इसलिए पूरे छंदविज्ञान के आधार को ऊपर  उल्लिखित चार पंक्तियों में समाहित कर दिया गया है। ( उन पंक्तियों की व्याख्या लिखने से पहले यह सब भूमिका लिखना अनिवार्य था ताकि बात पूरी स्पष्ट हो सके )। 


अब आते हैं उन चार पंक्तियों के शाब्दिक अर्थ पर। उनका अर्थ यह है कि -

म (मगण ) में तीन गुरु, तीन लघु न (नगण) में, भ (भगण) के आदि में गुरु (अर्थात् बाकी दो लघु), य (यगण) के आदि में लघु (अर्थात् बाकी दो गुरु), ज (जगण) के मध्य में गुरु (अर्थात् बाकी दोनों ओर लघु), र (रगण) के मध्य में ल (लघु) (अर्थात् बाकी दोनों ओर गुरु, स (सगण) के अंत में गुरु (अर्थात् उस से पूर्व दो लघु), त (तगण) के अंत में लघु (अर्थात् उस से पूर्व दो गुरु)। 

( 'ऽ' यह चिह्न गुरु मात्रा का है ) व '।' यह चिह्न लघु मात्रा का है ) 

म ऽऽऽ 
न ॥। 
भ ऽ॥
य ।ऽऽ 
ज । ऽ।
र ऽ। ऽ 
स ॥ ऽ 
त ऽऽ। 

अतः उन चार पंक्तियों में सारे गणों की गणना व परिभाषा अद्भुत ढंग से समझा/कह दी गई है। उसे याद कर लेते ही प्रत्येक छंद की गुत्थी सुलझ जाती है। "यमाताराजभानसलगम्" कह कर इसे और भी संक्षिप्त बना दिया गया किन्तु इस अति संक्षिप्तीकरण में गणना करनी पड़ती है, जबकि उपर्युक्त पंक्तियों में अंकों व गणना को भी साथ-साथ दे दिया गया है। जिसे जो विधि अनुकूल लगे वह उसे अपना सकता है। 

छंद और संगीत का सौंदर्य सृष्टि रहने तक समाप्त नहीं होने वाला। संस्कृत के आचार्यों ने इसके गूढ़ रहस्यों को सरलता से समझ में आने की विधियाँ भी विकसित कीं। यह उनका हम पर अत्यंत उपकार है। 


Monday, October 8, 2012

"मैं चल तो दूँ" : 'भाषा' : मूल व अनुवाद सहित सस्वर पाठ

"मैं चल तो दूँ" : 'भाषा' :  मूल व अनुवाद सहित सस्वर पाठ
- कविता वाचक्नवी


"भाषा" (केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, भारत सरकार की हिन्दी पत्रिका ) के नवम्बर-दिसंबर 2011 अंक में मेरी एक कविता "मैं चल तो दूँ" मूल हिन्दी व नेपाली अनुवाद (बैद्यनाथ उपाध्याय द्वारा किए गए ) के साथ प्रकाशित हुई थी । 

 सुखद यह है कि "भाषा" और केंद्रीय हिन्दी निदेशालय की इस पत्रिका में संयोग से वर्ष 2007 से निरन्तर थोड़े-थोड़े अंतराल में मेरी कविताएँ व उनके अनुवाद प्रकाशित होते चले आ रहे हैं, जिसका शत-प्रतिशत श्रेय कविताओं के अनुवादकों को ही जाता है। अन्यथा मुझे तो यकायक सूचना मिलने पर ही पता चल पाता है कि किसी अंक में कोई रचना व अनुवाद प्रकाशित हो रहे है। बस, विदेश में होने के कारण बहुधा स्कैन प्रति तक न देख पाने का मलाल बना रह जाता है.... जब तक कि कोई सहृदय मित्र बढ़िया स्कैन कर के न भेज दें। 

भाषा के उक्त अंक के अंक के मुखपृष्ठ तथा मूल व अनूदित पाठ के पन्नों की स्कैनप्रति उपलब्ध करवाने का आग्रह मैंने फेसबुक पर किया तो वरिष्ठ रचनाकार कवि सुधेश जी ने दिल्ली से उन पन्नों को स्कैन कर के मुझे गत दिनों उपलब्ध करवा दिया। उनके इस सौजन्य के लिए उनके प्रति आभार व्यक्त करती हूँ।


जो मित्र इस कविता का सस्वर पाठ भी सुनना चाहें वे -
  • - इस ब्लॉग के साईडबार में `तृणतुल्य मैं" विजेट में देखें 
  • - डेनमार्क के रेडियो सबरंग की साईट पर `कलामे शायर' अथवा `Poet Recites' पर जाकर सूची को स्क्रॉल कर मेरे नाम के साथ सहेजे संकलन में इसे सुन सकते हैं
  • - अथवा सीधे इस लिंक को क्लिक करें - मैं चल तो दूँ (सस्वर पाठ) 


बड़े आकार में पढ़ने के लिए अलग अलग चित्र पर क्लिक करें - 
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Saturday, October 6, 2012

विश्वहिंदी सम्मेलन बनाम वर्गसंघर्ष

विश्वहिंदी सम्मेलन बनाम वर्गसंघर्ष  : (डॉ.) कविता वाचक्नवी
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विश्वहिंदी सम्मेलन को लेकर आ रही प्रतिक्रियाओं के मध्य हिन्दी की पुरानी पीढ़ी व युवा पीढ़ी को लेकर कई स्थानों पर चर्चाएँ चल रही हैं, लेख लिखे जा रहे हैं और विमर्श हो रहे हैं। एक बड़ा मुद्दा इन दिनों ऐसे  सामान्यीकरण का यह है कि (व कुछ लोग इसलिए नाराज हैं कि)  हिन्दी के सब दादा लोग वहाँ हर बार पहुँच जाते हैं, जबकि युवा पीढ़ी ही हिन्दी का भविष्य है, उसे ही वहाँ महत्व व भागीदारी और प्रतिनिधित्व करना चाहिए और पुरानी पीढ़ी को हट जाना चाहिए। कुल मिलाकर बहसों में अब यह विवाद युवा पीढ़ी बनाम पुरानी पीढ़ी का बन गया है।


हिन्दी में यह वर्ग संघर्ष नया नहीं है किन्तु ऐसी किसी घटना के पश्चात् यह और अधिक मुखर हो जाता है।  यों भी हिन्दी वालों पर पहले ही से पुरातनपंथी होने का ठप्पा लगा रहा है। ऐसे में इस तर्क को निरस्त  करने के लिए कुछ लोग हिन्दी को नई चाल में ढालने के नाम पर लाभ-पक्ष के दोहन में भी जुटे हैं। ऐसे नई चाल-ढाल में ढलने/ढालने के लाभों के मध्य हिन्दी के शुभ-अशुभ और लाभ-हानि के प्रश्न का सिरे से अनुपस्थित होना अत्यंत चिंताजनक है। हिन्दी आय का साधन बने, हिन्दी रोजगार दे, हिन्दी व्यवसाय लाए आदि-आदि के तंत्र में हिन्दी के हित से जुड़े प्रश्नों की नितांत अनुपस्थिति नितांत विडंबनापूर्ण है। इस प्रश्न की अनुपस्थिति स्वयं में कई नए प्रश्न खड़े करती है। प्रश्न ही नहीं संदेह भी।


रही युवाओं को अवसर देने के तर्क की बात तो उसके लिए भी तो पहले स्वयं को प्रमाणित करना होता है। कोई सबको अवसर बाँटने लगे भी, तो लाखों की भीड़ लग जाएगी, हर कोई किसी न किसी की सिफ़ारिश, चिट्ठी या अनुशंसा लेकर अपने को पंक्ति में आगे मानने की हेकड़ी दिखाने लगेगा। इसलिए अवसर देने के समाधान की भी अपनी समस्या है।


विश्वहिंदी सम्मेलन पर युद्ध करने और ताल ठोंकने वालों के लिए आवश्यक है कि वे इसका अर्थ समझें कि इसका अर्थ हिन्दी का एक बड़ा अंतर-राष्ट्रीय सम्मेलन नहीं है, अपितु विश्वहिन्दी अर्थात् हिन्दी के वैश्विक स्वरूप और स्थिति से संबन्धित एक सम्मेलन है। जिस दिन यह बात लोग आत्मसात कर लेंगे उस दिन सम्मेलन पर और हिन्दी पर बड़ा उपकार करेंगे, वरना इस सम्मेलन के लिए मचने वाली बंदरबाँट यों ही चलती रहेगी और जिन्हें प्रसाद नहीं मिलेगा वे वंचित रहने की पीड़ा के चलते हाय-तौबा मचाते रहेंगे। इन सब के बीच जो वास्तविक लोग हैं, उनकी यथावत् न पूछ होगी, न आवाज बचेगी और जाने किस दिन कौन सच्चा सिपाही थक-हार कर कूच कर जाएगा....पर तमाशा यों ही चलता रहेगा। यों राजनीति और हायधर्म, दौड़धर्म और जुगाड़धर्म आदि सारे धर्मों का अस्तित्व विदेशों में बसे हिन्दीभाषी हिन्दी वालों में भी भारत की बराबरी का ही है। इसलिए मैं हिन्दी को लेकर कोई बड़ा स्वप्न फिलहाल नहीं देखती। संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनने के बाद हमारे इन सब धर्मों को नाम का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप ही मिलना बचा है, वस्तुतः ये वैश्विक तो पहले से हैं ही।


सम्मेलन को बंद किया जाना भी कोई समझदारीपूर्ण समाधान नहीं है। तब तो हिन्दी के लिए सरकार के नाममात्र के दायित्व की भी इतिश्री हो जाएगी। वस्तुतः चीजों को पारदर्शी बनाना, गुणवत्ता को तय करना, ठोस कार्यरूप देना आदि के लिए कड़ाई से कुछ करना होगा। अर्थात् सम्मेलन का विरोध नहीं, सम्मेलन की विधि और दोष का विरोध हो।


जहाँ तक हिन्दी की पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के नाम पर चलने वाले इस वर्गसंघर्षजन्य विवाद की बात है तो मुझे पीढ़ी के रूप में ऐसा वर्गीकरण यह कहने को बाध्य करता है कि वस्तुत: न पुरानी पीढ़ी ने कम अनर्थ किए हैं, न कम जोड़ तोड़ और लालसा रही है व न ही नई पीढ़ी उस से कुछ कम है, बल्कि पुरानी पीढ़ी से अधिक ही तिकड़मी और 'कैलकुलेटिव' है। नई पीढ़ी वे सारी तकनीकें जानती है (और बेखौफ अपनाती है ) कि कब क्या कर कर, कह कर, लिख कर, न लिख कर, हट कर, न हट कर, बोल कर, चुप रह कर, कंधे का सहारा लेकर या कंधा देकर, गिरा कर या चढ़ा कर.... आदि हर तरह की क्रिया के द्वारा किस तरह जोड़तोड़ की/से दौड़ में बेखौफ़ हर हथियार और हथकंडे से अपने को आगे रखना है। पुरानी पीढ़ी की कब वाह-वाह कह कर वे पुरानी पीढ़ी का कैसे व कब इस्तेमाल कर जाते हैं इसका पता ही इस्तेमाल हो जाने वाले को नहीं चलता।  इस्तेमाल के बाद में कब दूध से मक्खी की तरह निकाल फेंकना है, यह भी युवा पीढ़ी बहुत निपुणता से जानती व करती है। साहित्य की पुरानी पीढ़ी भी कोई दूध की धुली नहीं थी। उन्होंने भी विरासत में यही सब जरा कम अनुपात में नई पीढ़ी को सौंपा है। बस दोनों की लिप्साओं के प्रकार में एक-दो चीजों का अंतर है। 


इसलिए मेरी नजर में पूरे कुएँ में ही भाँग रही है। हाँ यदि कभी दो दुष्टों की स्पर्धा की बात है तो इतना जरूर है कि पुरानी पीढ़ी के यह सब करते रहने के बावजूद वे अनुपात में कम से कम अपने विषय के ज्ञाता, बहुपठ, विशेषज्ञ और अधिक ज्ञान-सम्पन्न रहे हैं, बनिस्बत इसके कि नई पीढ़ी पुरानी हर पीढ़ी की तुलना में बहुत अधिक खोखली व वितंडावादी है।


इसलिए मेरा समर्थन किसी को उसकी आयु के आधार पर श्रेष्ठ या कमतर मान लेने के पक्ष में नहीं है, अपितु उसके व्यक्तिगत आचार विचार, ज्ञान, समझ, विवेक, औदात्य आदि कई कसौटियों के आधार पर उसके रचनाकर्म व व्यक्तित्व के सम्पूर्ण आकलन के साथ साथ उसके सामाजिक व रचनात्मक योगदान के पक्ष में है ।


क्या कभी इन कसौटियों के आधार पर प्रतिभागिता तय करने का कोई नियामक हम बना पाएँगे ? जिस दिन उसे बना पाए  और क्रियान्वित कर पाए, उस दिन से पहली बार हम हिन्दी के हित को लेकर वास्तव में चिंतित होने की बात कह सकते हैं, अन्यथा हिन्दी की सेवा और हिन्दी के हित के नाम पर हिन्दी के दोहन की नई तकनीकों और तर्कों को हम बड़ी कुशलता से चलाने और मनवाने का वाग्जाल फेंक रहे होते हैं और जाल फेंकने व बटोरने के पीछे निरंतर हिन्दी का ही मांसाहार हमारा शौक बन चुका होता है। इस कथित वर्ग-संघर्ष के पीछे भी एक तरह के शातिर समझौते का अनुसरण कर रहे होते हैं। 

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