Sunday, October 24, 2010

विदा


विदा
(अपने संकलन - ‘मैं चल तो दूँ’ से )
(डॉ.) कविता वाचक्नवी

 
Bride taking the rice to throw back.



This is done three times.


                   आज दादी, चाचियों, बहना, बुआ ने
                   चावलों से, धान से,
                   भर थाल
                   मेरे सामने ला
                   कर दिया है,
                   `मुठ्ठियाँ भर कर
                   जरा कुछ जोर से
                   पीछे बिखेरो
                   और, पीछे मुड़, प्रिये पुत्री !
                   नहीं देखो',
                   पिता बोले, अलक्षित।
   

                   बाँह ऊपर को उठा दोनों
                   रची मेहंदी हथेली से
                   हाथ भर - भर दूर तक
                   छिटका दिया है
                   कुछ चचेरे औ’ ममेरे वीर मेरे
                   झोलियों में भर रहे
                   वे धान-दाने
  
                   भीड़ में कुहराम, आँसू , सिसकियाँ हैं
                  
                   आँसुओं से पाग कर
                   छितरा दिए दाने पिता!
                   आँगन तुम्हारे
                   रोपना मत
                   सौंप कर
                   मैं जा रही हूँ.......।
               ***
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Monday, October 18, 2010

"मर रहे हैं हाथ के लेखे हमारे" *

कविता का मन


Dr.Kavita Vachaknaveeभारत में, विशेषतः हिन्दी में, साहित्य के मरने या उसमें भी कविता के मरने की आशंका दिन - प्रतिदिन साहित्य के कुछ आलोचकों को घेरे रही है. कविता जिस गति से हाशिए पर धकेल दी गयी, (गत कई दशकों से संभवत वह कभी केन्द्रक में थी ही नहीं) उसने कविता की आसन्न अवगति के संकेत तो दे ही दिए थे। परिणाम के रूप में दिखाई भी पड़ा कि कोई प्रकाशक कविता की पुस्तक को छापने का जोखिम नहीं उठाता; क्योंकि वह बिकती ही नहीं। इधर कवि भी "वादे वादे जायते तत्त्वबोध:" की भाँति विभिन्न कोटियों के हो गए। साहित्य व मंच तो पहले ही अलग हो चुके थे, किंतु मंच की भी कई प्रशाखाएँ बन गईं, जहाँ चुटुकुले से लेकर चोरी के घटिया माल तक को धड़ल्ले से चलाया - गाया गया, गलेबाजों की जोर आजमाईश हुई, फूहड़ व भोंडे हास्य प्रस्तुत किए गए। कुल मिला कर मंच से कविता अंतर्ध्यान हो गई। मंच पर असल कवि रहे ही नहीं। दूसरी और साहित्य में कविता इतनी नखरीली, सुविधाभोगी व परमुखापेक्षी हो गई कि पूरी की पूरी छद्म बन गई। नकली पुरस्कार, गुटबंदी, विश्वविद्यालयीय अध्यापकों द्वारा प्रकाशकों से एवज में पुस्तकें छपवाना, प्रायोजित समीक्षाएँ, सरकारी खरीद, शब्दाडम्बर, गद्य की टुकड़ाबंदी.... .. आदि जाने कितने बाह्याचार, छल व छद्म में वह मारी गई।



इधर जब से नेट पर साहित्य आने लगा तब से साहित्य के चोरों की भी बन आई। पर चोरी की जाने वाली सबसे बड़ी विधा आज भी कविता ही है । विश्वास न हो तो ऑरकुट और कई मनोरंजन केंद्रित समूहों पर जा कर नजारा ले लीजिए। साहित्य के ठेकेदारों ने इस प्रवृत्ति व ( लोकेषणा तथा इसके चलते की जाने वाली चोरी की) सुगमता को सुन जान कर नेट को साहित्य के लिए एकदम सिरे से खारिज भी किया।



किंतु यह सच है कि माध्यम स्वयं में कोई दूषित नहीं होता, प्रयोक्ता पर निर्भर करता है कि वह उक्त संसाधन का प्रयोग किस उद्देश्य की पूर्ति में कैसा करता है । यदि हम अपनी दूषित प्रवृत्ति, छपास व लोकेषणा को एक ओर करते हुए (तिलांजली देते हुए) इस संसाधन का उपयोग करें तो पूरे साहित्य के परिदृश्य को बदल सकते हैं । इसका एक सबल उदाहरण कुछ समय पूर्व  साक्ष्य में आया है ; जिसे जानना  हम सबके लिए, विशेषतः काव्य से प्रेम करने वालों के लिए अत्यन्त हर्षदायक सिद्ध होगा कि इंटरनेट कविता की हत्या करने की अपेक्षा उसके जीवन संवर्धन में सहाय्य सिद्ध हो रहा है और कवियों के लिए वरदान। अब वे अपनी प्रतिभा द्वारा अधिकाधिक पाठकों तक पहुँच पा रहे हैं। पूरे समाचार के लिए तो आपको स्वयं ही इसे पढ़ना पडेगा


By Stephen Adams, Arts Correspondent
Man reading poetry: Internet 'is causing poetry boom'

इसमें बताया गया कि -
Poetry Archive , which Mr Motion helped set up, now receives 135,000 visitors a month and a million page hits.



दूसरी ओर एक खेदजनक समाचार भी तभी आया था कि एक ऐतिहासिक पत्र, जो १५० वर्षों से नियमित निकल रहा था, उसे बंद कर देना पड़ा। हमारे यहाँ कुछेक वर्ष छाप कर जब पत्र - पत्रिका बंद होती है, तो भी क्षोभ से भर उठते हैं हम; फिर यह तो एक इतिहास का वर्त्तमान में उपस्थित होना -जैसी थी।



updated 5:50 a.m. ET Feb. 27, 2009
DENVER - Questions about the future of the Rocky Mountain News had become so common, the newspaper's staff put up a handwritten paper sign on the news desk that said, "We don't know."
On Thursday, someone wrote over it in heavy black marker: "Now we know."
Colorado's oldest newspaper, which launched in Denver in 1859, printed its last edition Friday, leaving The Denver Post as the only daily newspaper in town.


Image: last front page of the Rocky Mountain News
AFP - Getty Images
The last front page of the Denver, Colorado,

कुछ कुछ आगत की आहट देती शंकाओं को नेट के साथ जोड़ कर चीन्हा गया -




Lewis Carroll's handwriting
In 1864, Lewis Carroll wrote his most famous work for Alice Liddell.

Jane Austen's handwriting
Jane Austen completed her last novel, Persuasion, in 1816


Winston Churchill's handwriting
Aged 16, Winston Churchill wrote to his mother Lady Randolph Churchill

Jimi Hendrix's handwriting
Jimi Hendrix's lyrics for Machine Gun were written in 1969

King Henry VIII's handwriting
King Henry VIII wrote this love letter to Anne Boleyn (pic: British Library)


 If everything we do still had to be done by hand, there would not be enough hours in the day
Registrar Ruth Hodson
------------------------------------------------------------------------------------
*
" मर रहे हैं हाथ के लेखे हमारे " मेरी एक काव्यपंक्ति  है.


Sunday, October 10, 2010

नदी उदास नहीं थी

नदी उदास नहीं थी

आज तड़के ७ से ९ बजे तक बापू के सेवाग्राम आश्रम व विनोबा जी के पवनार आश्रम गए, जो कि पवनार नदी के घाट पर ही बसा है. मन आनन्दित व अभिभूत हो गया. अरसे बाद संवाद करते हुए, फ़ेसबुक के मित्रों को बताया तो एक रोचक चर्चा हो गई. संजो रही हूँ, ताकि यादें बनी रहें सुरक्षित.....



  • Settin




Dr.Kavita Vachaknavee

Dr.Kavita Vachaknavee सेवाग्राम आश्रम और पवनार नदी के तट पर पवनार आश्रम आज तडके घूमना हो गया. नदी को छूने की लालसा थी, सो साध ली. कई मित्रों का दल साथ था, खूब फ़ोटो शोटो खींचे गए. दिन सार्थक हुआ....

12 hours ago  ·  · 

    • Mayank Upadhyay What do you mean by this ???????????
      11 hours ago · 

    • Dr.Kavita Vachaknavee मयंक जी, अपने सिस्टम में देवनागरी पढ़ने की व्यवस्था करिए, तभी तो देवनागरी अपने सही स्वरूप में दीखेगी और आप सही सही पढ़ पाएँगे अन्यथा ये सब लिपि चिह्न आपको प्रश्नवाचक चिह्न ही प्रतीत होंगे.
      11 hours ago · 

    • Gita Dev बड़ा बढिया अनुभव रहा होगा ......
      11 hours ago · 





    • Oh, maine phir se Devanagari mein likh diya, Mayank ji ke liye unke naam likhe msg ka roman roop hai -


      Mayank ji apne system mein Devnagari padhne ki vyavastha karie, tabhi to Devnagari apne sahi swaroop mein deekhegi aur aap sahi sahi pad...
      See more

      11 hours ago ·  ·  1 person


    • Sumitra Varun congrats gr8 fun that is truly life


      enjoy to the full

      11 hours ago · 


    • Jasvinder Singh Dear Kavita Vachaknavee, Good day.


      Devenagari hamarey hamarey rashtra ki bhasha ki pehchan hai. Bhasha ke bina samaj goonga hota hai. Aapki devnagari me astha prashansniye hai.

      11 hours ago ·  ·  1 person

    • Shrish Benjwal Sharma ‎@Dr.Kavita Vachaknavee मयंक जी को उपर्युक्त सलाह अंग्रेजी में दीजिये तभी तो दिखेगी।
      10 hours ago ·  ·  1 person


    • Arunesh Mishra गाँधी . बिनोबा . बकरी . निर्मला सब एक साथ ।


      याद और यादगार ।
      विभूति भाई को धन्यवाद ।

      10 hours ago ·  ·  1 person

    • Shrish Benjwal Sharma और हाँ फोटो-शोटो दिखाइये न।
      9 hours ago · 


    • Ravindra Kumar Sharma पेड़ों के पास जा ज़रा चिडिओं से बात कर /


      बरसात में बाहर ज़रा खिड़की से हाथ कर /
      तारों को तोड़ कर कभी ले आ ज़मीन पर /
      दिन को कभी तो दिन समझ रातों को रात कर / (रवि )

      9 hours ago ·  ·  2 people

    • Umeshwar Dutt Mishra भाई क्या बात है
      8 hours ago · 

    • 5 hours ago · 

    • Sneh Chandra bahut sunder.aap sahaj aur saral likhti hain jo mun ko bada pyara lagata hai.
      4 hours ago ·  ·  1 person

    • Narendra Vyas is sarthakta kee badhai aapko regarding kavita di !!
      4 hours ago ·  ·  1 person

    • Sharad Kokas नदी छूना मुझे भी अच्छा लगता है ।
      4 hours ago ·  ·  1 person

    • Latant Prasun bapu ki kutiya dekhi hoge...us kutiya me abhi tak bijli nahin hai..gandhije ka kahna tha ki jab tak pure desh me bijli nahi aa jati tab tak meri kutiya me bijli nahin aani chahiye..iska palan abhi tak kutiya me ho raha hai..is kutiya ko gandhije ki bhawna aur vichar ke anuroop banaye rakhne ke liye vahan ke karykartaon ko bahut prayas karne par rahe hain....
      3 hours ago ·  ·  1 person





    • ‎@ गीता जी, सच में अनुभव आनन्दित करने वाला था. यों तो २००६ में भी यहाँ आई थी और सब देखा-भाला ही हुआ था, पर कुछ चीजें मानो हमारी जातीय स्मृति बन जाती हैं और हर बार मन उकसता है.



      @ सुमित्राजी! धन्यवाद.सच कहा आपने.

      @जसविन्दर जी, देवनागरी में मेरी आस्था आपसे भी देवनागरी लिखवाने की माँग करने जा रही है अब तो अपनी प्रशंसा सुन कर.

      @श्रीश जी, मयंक जी को रोमन में भी तुरन्त वही सन्देश लिख दिया था, बस जरा मिनट भर बाद ही सूझा था. और हाँ, मित्रों के सब कैमरों से सारे चित्र एकत्र कर लिए गए हैं, लगभग कई सौ की संख्या है, आगामी दिनों में चिट्ठाजगत् पर सब लोग डालेंगे. मेरे कैमरे के चित्र भी उस संयुक्त भंडार में जमा करा दिए गए हैं. :)

      @ अरुणेश जी, गाँधी, विनोबा तक तो ठीक है, बस यह बकरी नटखट कहीं न दीखी.हाँ खुर से सींग तक भूरी गैय्या के दल भावुक करते रहे.और निर्मला कहाँ मिलेगी, बताइयेगा...

      @ रवीन्द्र जी, आपकी कमाल की पंक्तियाँ पढ़ हर बार लगता है कि हाय ये मैंने क्यों न लिखीं.

      उमेश्वर जी, वेमा जी, स्नेह जी, आपकी सदाशयता के लिए आभारी हूँ.यह स्नेह बनाए रखें.

      @लतान्त जी, बापू और विनोबा जी का बहुत सामान देखा, एक चर्खा खरीदने की चाह थी, सो पूरी न हुई क्योंकि तड़के आश्रम का बिक्री केन्द्र तब तक खुला न था.

      @ प्रिय नरेन्द्र जी,कई दिन बाद सम्वाद कर अच्छा लग रहा है, जल्दी ही रंगीलो म्हारो राजस्थान भी आ रही हूँ.

      @ शरद जी, सही सही अनुभव कर पा रही हूँ. और आपको तो नदी छूना अनिवार्य है भाई, कविता की अनिवार्य शर्त है नदी के लिए हुलसना.... कल छल छल को मन प्राणों में भर लेने-सा.... गो कि नदी उदास न हो और अपने में डूबी सोई न हो कि हमें दबे पाँव लौटना पड़े.....

        • Monday at 01:30 · 
        • Bishwanath Singh A very good account worth to pen them down as one's own reminices.
          Monday at 06:44 ·  ·  1 person
        • Jasvinder Singh Dear Kavita Vachaknavee,
          I accept your suggestion but unfortunately I could not learn typing in Hindi. I shall write to you in roman lipin. Hope you will bear with me.
          With best wishes,
          Jasvinder Singh
          Monday at 07:22 · 



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