Sunday, September 21, 2008

आमंत्रण : केदार सम्मान समारोह एवं डॉ.रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान -2007


आमंत्रण : समारोह
केदार सम्मान -२००७ एवं डॉ राम विलास शर्मा आलोचना सम्मान -२००७












कवि केदार के ९८वें जन्मदिवस के
आयोजन में

केदार सम्मान -२००७
अनामिका

एवम्
डॊ. रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान -२००७
जितेन्द्र श्रीवास्तव
को प्रदान किए जाने के अवसर पर

आप सादर, साग्रह आमन्त्रित हैं.


भवदीय
केदार सम्मान समिति, बाँदा
प्रगतिशील लेखक संघ, बाँदा
अनामिका प्रकाशन, इलाहाबाद


तिथी
शनिवार,२७ सितम्बर, २००८


आवास एवम् कार्यक्रम स्थल
केदार शोध पीठ न्यास
अग्रवाल कम्पाउँड, बाँदा


केदार सम्मान

केदार सम्मान का मुख्य उद्देश्य केदार की परम्परा में लोकतांत्रिक, प्रगतिशील, आधुनिक, विवेकसम्मत, वैज्ञानिक चिंतन के पक्षधर, सृजन धर्मियों को सम्मानित करना है|

यह सम्मान मुख्यत: हिन्दी कविता के लिए है , जिसमें १९६० के बाद जन्मे रचनाकार के पिछले ५ वर्षों में प्रकाशित संकलन -विशेष को चयन करते समय रचनाकार के कृतित्व के समग्र योगदान को ध्यान में रखा जाता है |

सृजन की उत्कृष्टता को रेखांकित करने के लिए प्रगतिशील हिन्दी कविता के शीर्ष कवि `केदारनाथ अग्रवाल' की रचना धर्मिता के सम्मान में यह सम्मान प्रदान किया जाता है।




डॉ० रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान



डॉ० रामविलास शर्मा सम्मान ऐसे आलोचक को उत्साहित करने के लिए दिया जाता है, जिसकी आलोचना क्षमता एक तरफ़ विभिन्न प्रकाशनों से पहचान में है तो दूसरी तरफ़ उसके पास अभी इतना समय बचा है कि
जिस से वह उसे पूरी तरह से विकसित कर सके। लिहाजा ५० वर्षों की आयु तक के अपेक्षाकृत युवा आलोचक को दिया जा रहा है। इसके लिए किसी पुस्तक का छपा होना आवश्यक नहीं है । पत्रिकाओं में छपे स्तरीय लेख इसके लिए प्रयाप्त होंगे, यदि उनसे आलोचक की सामर्थ्य का पता चलता हो । अकादमिक लेखन की जगह रचनात्मक ढंग के लेखन को निर्णय के समय विशेष महत्व दिया जाता है।

यह सम्मान कविता की अनियतकालीन कविता `उन्नयन' द्वारा प्रदान किया जाता है।


कार्यक्रम


प्रथम सत्र

प्रात: ९ बजे से दोपहर २ बजे तक
अनामिका
को
केदार सम्मान

एवं
केदारनाथ अग्रवाल की काव्य परम्परा में समकालीन हिन्दी कविता :

विमर्श



द्वितीय सत्र
अपराह्न २ बजे से ५ बजे तक
जितेन्द्र श्रीवास्तव
को
डॉ रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान
एवं
आजादी के बाद के उपन्यासकारों की आलोचना पर आलेख, पाठ, एवं बहस




तृतीय सत्र

सायं बजे से रात्रि बजे तक बाहर से आए हुए आमंत्रित कवियों द्वारा काव्यपाठ

अध्यक्षता : केदारनाथ सिंह



आयोजक ---------------------संयोजक------------------- उत्तरापेक्षी
नरेंद्र पुण्डरीक------------------ प्रकाश त्रिपाठी--------------------- विनोदकुमार शुक्ल
सचिव-------------------------- सं. वचन------------------------- अनामिका प्रकाशन
केदार शोध पीठ------------------ इलाहाबाद------------------------- इलाहाबाद







Saturday, September 20, 2008

वरिष्ठ लेखिका प्रभा खेतान नहीं रहीं

वरिष्ठ लेखिका प्रभा खेतान नहीं रहीं





कोलकाता।

हिन्दी की सुप्रसिद्ध लेखिका, उघमी तथा समाजसेविका डॉ. प्रभा खेतान का कल देर रात निधन हो गया। 66 वर्ष की
डॉ. खेतान अविवाहित थीं। उन्हें 18 सितम्बर को सांस लेने में शिकायत होने पर साल्ट लेक स्थित आमरी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अगले दिन बाईपास सर्जरी के बाद उन्हें वेंटीलेटर पर रखा गया था। अचानक तबीयत बिगड़ जाने के बाद उन्होंने कल देर रात अंतिम साँस ली डॉ. खेतान उन प्रतिभाशाली महिलाओं में थीं जिन्हें सरस्वती एवं लक्ष्मी दोनों से वरदान प्राप्त था|


उनका जन्म 1 नवम्बर 1942 को हुआ था। दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर
डॉ. खेतान एक सफल उघमी थीं। उन्होंने हिन्दी साहित्य की भी सेवा की। उन्हें कलकत्ता चैंबर आफ कॉमर्स की एकमात्र महिला अध्यक्ष होने का गौरव प्राप्त था। फ्रांसीसी रचनाकार सिमोन द बोउवा की पुस्तक ‘दि सेकेंड सेक्स’ के अनुवाद ‘स्त्री उपेक्षिता’ ने उन्हें काफी चर्चित किया। किया। आआ॓ पेपे घर चलें, पीली आंधी, अपरिचित उजाले, छिन्नमस्ता, बाजार बीच बाजार के खिलाफ, उपनिवेश में स्त्री जैसी उनकी रचनाएं काफी लोकप्रिय हैं। विश्व विख्यात अस्तित्ववादी चिंतक व लेखक ज्यां पाल सार्त्र पर उनकी पुस्तकें काफी चर्चित हैं। इसके अतिरिक्त उनकी कई पुस्तकें और काव्यग्रंथ लोकप्रिय हुए। अपने जीवन के अनछुए पहलुओं को उजागर करने वाली आत्मकथा ‘अन्या से अनन्या’ लिखकर सौम्य और शालीन प्रभा खेतान ने साहित्य जगत को चौंका दिया। साहित्य जगत के लिए प्रभाजी का असामयिक निधन अपूरणीय क्षति है। विभिन्न व्यावसायिक सफलताओं के साथ ही एक कुशल रचनाकर के रूप में भी उन्हें याद किया जाता रहेगा। कल रविवार को स्थानीय नीमतल्ला घाट में उनकी अंत्येष्टि संपन्न होगी।



(एसएनबी)


Wednesday, September 3, 2008

विदेशी भाषाओं से हिन्दी में साहित्यिक अनुवादक संपर्क करें

एक प्रतिष्ठित स्थापित प्रकाशन के लिए, विदेशी साहित्य के अनुवादक संपर्क करें। अनुवाद के लिए सम्मानजनक भुगतान किया जाएगा.








यदि आप किसी विदेशी भाषा में साहित्यिक अनुवाद का अनुभव रखते हैं व साहित्यिक कृतियों के अनुवाद कार्य को करना चाहते हैं तो आप के लिए एक अच्छा अवसर हो सकता है।

एक प्रतिष्ठित व स्थापित साहित्यिक प्रकाशन को विदेशी भाषाओं से हिन्दी में साहित्यिक अनुवाद करने का अनुभव रखने वाले एवं साहित्य में गति रखने वाले ऐसे अनुवादकों की आवश्यकता है। अनुवाद के लिए ग्रन्थ सीधे अनुवादक के पते पर भेजे जाएँगे। साथ ही संतोषजनक एवं स्तरीय साहित्यिक अनुवादों के लिए अनुवादक को सम्मानजनक एवं समुचित धनराशि भी देने की व्यवस्था रहेगी। आवश्यक होगा की अनुवादक को पूर्व में साहित्यिक कृतियों (गद्य व पद्य) के अनुवाद का प्रयाप्त अनुभव हो.प्रमाण के लिए स्वयं द्वारा किए गए ऐसे अनुवादों की प्रति या /और प्रकाशक आदि के प्रमाण अपेक्षित होंगे.

जो भी इस सन्दर्भ में रूचि रखते हों, वे कृपया मुझसे संपर्क करें।

विदेशी भाषाओं से हिन्दी में साहित्यिक अनुवादक संपर्क करें

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यदि आप किसी विदेशी भाषा में साहित्यिक अनुवाद का अनुभव रखते हैं व साहित्यिक कृतियों के अनुवाद कार्य को करना चाहते हैं तो आप के लिए एक अच्छा अवसर हो सकता है।

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जो भी इस सन्दर्भ में रूचि रखते हों, वे कृपया मुझसे संपर्क करें।

Tuesday, September 2, 2008

रिश्ते : दो स्थितियाँ - (कविता वाचक्नवी)

रिश्तों पर ये दोनों कविताएँ काफी पहले लिखी थीं। लेखनी के सितम्बर अंक में भी इन्हें देखा जा सकता है



रिश्ते : दो स्थितियाँ
(डॉ.)  कविता वाचक्नवी

(1)












रूठें कैसे नहीं बचे अब, मान-मनोव्वल के रिश्ते
अलगे-से चुपचाप चल रहे, ये पल दो पल के रिश्ते


कभी गाँठ से बँध जाते हैं, कभी गाँठ बन जाते हैं
कब छाया कब चीरहरण, हो जाते आँचल के रिश्ते


आते हैं सूरज बन, सूने में चह-चह भर जाते हैं
आँज अँधेरा भरते आँखें, छल-छल ये छल के रिश्ते


कच्चे धागों के बंधन तो जनम-जनम पक्के निकले
बड़ी रीतियाँ जुगत रचाईं, टूटे साँकल के रिश्ते


एक सफेदी की चादर ने सारे रंगों को निगला
आज अमंगल और अपशकुन, कल के मंगल के रिश्ते


(2)








रँगी परातों से चिह्नित कर चलते पायल-से रिश्ते
हँसी-ठिठोली की अनुगूँजें भरते कलकल-से रिश्ते


पसली के अन्तिम कोने तक, कभी कहकहे भर देते
दिन-रातों की आँख-मिचौनी, हैं ये चंचल-से रिश्ते


उमस घुटन की वेला आती, धरती जब अकुलाती है
घन-अंजन आँखों से चुपचुप, बरसें बादल-से रिश्ते


पलकों में भर देने वाली उँगली पर रह जाते हैं
बैठ अलक काली नजरों का जल हैं, काजल-से रिश्ते


कभी तोड़ देते अपनापन, कभी लिपट कर रोते हैं
कभी पकड़ से दूर सरकते जाते, पागल-से रिश्ते



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